फ़रवरी 17, 2014

POST : 417 नकाब देवताओं की , पहनी है दानवों ने ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     नकाब  देवताओं की  पहनी है दानवों ने ( हास-परिहास )

                                डॉ लोक सेतिया

कलयुग में होने लगी जब सत्य युग की बात
बस तभी बरसी बहुत नोटों की यहां बरसात
लगने लगे संतों के आश्रमों में सोने के भंडार
गली गली जो घूमते उनको मिलती नहीं खैरात ।

प्रवचन दिये सदकर्म के खुद रहे करते कुकर्म
लेकिन नहीं आती है अब तलक किसी को शर्म 
औरों को दिया उपदेश छोड़ो लोभ माया मोह  
अंबार धन के जमा करना है ख़ुद उनका तो धर्म ।

जाने किधर से आ गये हैं सच के नये अवतार
कहने लगे सब को तेरा होगा हमसे ही उद्धार
होने लगी सब तरफ जब उनकी जय जयकार
आम आदमी से बन गये सत्ता के भी दावेदार ।

कांटे सब को बताया हैं सब बोते शूल ही शूल  
इस जहां में इक हमीं हैं खुशबू वाले कुछ फूल
बिना किसी नींव के लो कर दिया खड़ा महल
बिखर गया इक झौंके से अब उड़ रही है धूल ।

दो दिन में आपके देखे हैं सबने अजब अंदाज़
अंजाम जाने क्या होगा अच्छा नहीं आगाज़
कल तक जिस जनता को मालिक थे बताते
अब छीन कर लेने लगे उसी के सर से ताज़ ।

देख लो बंदो में ही बंदे कुछ खुदा बन गये हैं  
हमने समझा आदमी हैं वो ये क्या बन गये हैं  
रात देखा इक डरावना सा हमने कोई ख्वाब
चेहरे बदल कर दानव सब देवता बन गये हैं ।