मई 10, 2020

POST : 1292 आपका बही-खाता झूठ का पुलिंदा ( देशसेवा के नाम पर लूट ) डॉ लोक सेतिया

   आपका बही-खाता झूठ का पुलिंदा ( देशसेवा के नाम पर लूट ) 

                                 डॉ लोक सेतिया 

    अगर अभी भी हमने नहीं समझा तो फिर शायद कभी भी नहीं समझेंगे। कृपया एक फरवरी के मोदी सरकार के बजट के निर्मला सीतारमन जी के भाषण को फिर से सुन लो। भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने को तैयार है। मगर देश के सामने संकट आया और लॉक डाउन में जब एक सौ तीस करोड़ लोग सरकार के कहने पर अपने काम धंधे छोड़कर घर में बैठे हैं और जैसे भी हो अपना गुज़र बसर कर रहे हैं तब ये देख कर हैरानी से बढ़कर शर्मिंदगी होती है कि देश और राज्यों की सरकारें जनता से दान में मांगने और पीएम केयर से लेकर तमाम अन्य कितने ही ढंग से धन जुटाने के बावजूद 45 दिन बाद ही अपने कर्मचारियों को वेतन भी समय पर नहीं दे पाने की हालत में हैं। आपको जान है तो जहान है का उपदेश देने वालों की जान आफत में आने लगी दो महीने जनता से कर नहीं मिल पाने से और बात बदल गई अब जान भी जहान भी। मगर जान किसकी आम नागरिक की जान तो होती ही है राजनेताओं के इशारों पर मरने मिटने को। जान की कीमत है तो देश के खज़ाने का तीन चौथाई भाग इस या उस तरह अपने पर खर्च नहीं लूट कर बर्बाद करने वाले मुट्ठी भर अधिकारी नेताओं या कुछ खास रसूख वाले धनवान लोगों के कभी नहीं भरने वाले भूखे पेट और हमेशा और अधिक जमा करने को व्याकुल उनकी तिजोरियां जो देश की आबादी का बीस फीसदी लोग भी नहीं हैं। मगर अभी भी आठ हज़ार करोड़ से अधिक मूल्य के दो जहाज़ केवल दो लोगों की सुविधा की खातिर खरीदने से संकोच नहीं हो रहा है। ये अंधेर नगरी चौपट राजा की ही बात है। 

       देश की आज़ादी के बाद से ये लूट की व्यवस्था और भी बेशर्म होती गई है और भाजपा सरकार जो पिछली सभी सरकारों को लूटने वाले घोषित करती रही है उस ने सबसे अधिक लूट मचाई है। किसी भी प्रधानमंत्री ने अपने ऐशो आराम और शानो शौकत पर इतना धन बेतहाशा खर्च नहीं किया है। जाने ये किस तरह की ईमानदारी है जो पिछली सभी दलों की सरकारें अपने दल के लिए अकूत धन वैभव नहीं जमा कर सकीं और भाजपा की मोदी सरकार पांच साल में ही पांच सौ से सात सौ करोड़ से दो एकड़ ज़मीन पर भव्य अतिआधुनिक पार्टी का शानदार दफ़्तर 1. 70 लाख स्केयर यार्ड में रिकॉर्ड समय में निर्माण करवा लिया। मोदी जी ने 92  देशों की सैर 55 महीने में की जिन पर 2021 करोड़ खर्च किये गए ये खबर आप इंडिया टुडे पर पढ़ सकते हैं जो कि औसत हर देश की यात्रा 22 करोड़ खर्च हुआ। इतना ही नहीं भाजपा सबसे अमीर राजनैतिक दल बन गई और चुनाव पर सबसे अधिक धन उसी ने खर्च किया। अगर इनके साथ मोदी जी के देश भर में अपने दल या किसी अन्य गैरसरकारी आयोजनों पर हुए खर्च को भी जोड़ लें जिसका शायद कोई हिसाब किताब आंकलन ही नहीं संभव होगा तो देश को इन खुद को सेवक चौकीदार बताने वाले के एक एक मिंट की कीमत कितने लाख अदा करनी पड़ी बताना आसान नहीं है। ये सब बताने का मकसद है कि आज भी भाजपा दल के पास कितना धन है कोई नहीं जानता है मगर इस में कोई संदेह नहीं कि अगले सौ साल तक भी उसकी झोली थैली भरी रहेगी। मगर देश का खज़ाना कुछ दिन आमदनी नहीं होने पर खाली होने लगा है तो क्यों। 

देश सबसे पहले कौन कहता है , कोई है जो किसी भी राजनैतिक दल का सांसद विधायक है या रहा हो जिसने करोड़ों की जायदाद और बैंक बैलेंस खड़ा किया हुआ है आज अपना सभी कुछ अपने देश को संकट की घड़ी में देने की बात कहता। उन सभी की देशभक्ति कितनी सच्ची है समझ आ जाना चाहिए। इतना ही नहीं जिन धार्मिक बड़े बड़े स्थलों के पास लाखों करोड़ बंद तिजोरी में पड़े हैं उनको भगवान खुदा वाहेगुरु देवी देवताओं की शिक्षा क्या इतना मानवीय धर्म नहीं समझा पाई कि संचय करना छोड़ गरीब दीन दुःखी असहाय लोगों की सहायता करने पर ये धन खर्च कर दो यही गुरु नानक जी का सच्चा धर्म है। शायद अब तो समझना होगा कि मंदिर मस्जिद गिरजा घर गुरूद्वारे बनाने से पहले अस्पताल धर्मशाला स्कूल और जिनके ऊपर छत नहीं उनके लिए घर बनाना ज़रूरी है। 

गांधी जी की विचारधारा की बात करते हैं तो ऐसा अपराध कैसे किया जा सकता है कि कोई सरकार विदेशी कंपनियों को बुलाने को अपने देश के मज़दूरों की सुरक्षा के कानून को ही अगले तीन साल तक निलंबित करने का अध्यादेश जारी करे और राष्ट्रपति को पारित करने को भेजे। सत्ता का ये पागपन है कि जो दबे कुचले हैं उनका शोषण करने की छूट विदेशी ही नहीं जो पहले से हैं उनको भी मिल जाए। क्योंकि सरकार को खुद अपने लिए हर दिन बर्बाद करने को बहुत पैसा चाहिए। एक एक नेता अधिकारी सांसद विधायक क्या जो कभी पहले बने उनको भी सुख सुविधा देने को लाखों की ज़रूरत है। और आम नागरिक को जैसे भी हो जीने मरने की छूट भी मांगनी पड़ती है। गरीब को हर दिन अगर पचास रूपये कमाते हैं तो बहुत हैं रोटी खाने को ये हमारा योजना आयोग बताता था जिसका नाम बदल गया हो मगर मानसिकता नहीं बदली है। 

जाने किस विकास की बात का दावा था जी मोदी जी की सरकार जाने क्या क्या नहीं बेचा और किस किस तरह से रिज़र्व बैंक से बार बार और अधिक धन छीनने का काम नहीं किया गया फिर भी नतीजा वही सबसे अधिक भूखी नंगी सरकार है। याद करो गांधी जी का नाम लेने से पहले उनकी कही बात को। हमारे देश के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है सभी की ज़रूरत को बहुत कुछ है मगर किसी की भी हवस को पूरी करने को काफी नहीं है। ये कुछ बीस तीस फीसदी लोगों की हवस है जिसने देश के अधिकांश हिस्से पर कब्ज़ा जमाया हुआ है फिर भी उनकी गरीबी मिटती नहीं। देश गरीब नहीं है सरकार हमेशा भिखारी और गरीब रही है।

राजनेताओं को मालूम है कि वो जो भी मनमानी करते रहें लोग खामोश होकर तमाशा देखते हैं , उनके अनुचित कार्यों पर कोई सवाल नहीं उठाता है। और उनकी विलासिता की बातों को नापसंद करने के बाद भी देश की जनता बेबस होकर देखती है कुछ भी कर नहीं सकती। मगर हम भूल कैसे जाते हैं बहुत जल्दी ही। मोदी जी पहले के शासकों को पचास साल बाद भी दोष देते रहते हैं साथ ही खुद उनसे बढ़कर किसी शहंशाह की तरह अपनी शानो शौकत दिखाने का काम करते रहते हैं। आपको याद है 24 फरवरी 2020 को गुजरात के अहमदाबाद में नमस्ते ट्रम्प का आयोजन किया गया था। मकसद क्या था विश्व के सबसे बड़े स्टेडियम में अमेरिका के शासक को अपनी शान दिखाना लाखों की भीड़ जमा कर दिखाना। मगर तब कितनी विडंबना की बात सामने आई कि  जिधर से विदेशी मेहमान को गुज़रना था गरीबों की बस्ती को ढकने छुपाने को मीलों लंबी ऊंची दीवार बनानी पड़ी थी और उस पर क्या शानदार पेंटिंग की गई थी। यही वो समय था जब कोरोना देश में दस्तक दे चुका था। मोदी जी जश्न मनाने में खोये थे। कोई असंवेदनशील व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है कि गरीबी को मिटाने पर नहीं छुपाने पर पैसा बर्बाद करता है। मोदी जी जैसे शासकों के पास गरीबों के लिए भाषण को छोड़ कुछ भी है। मगर अपने दोस्तों के लिए सब हाज़िर है , मोदी जी की दोस्ती भारत को बेहद महंगी पड़ी है।



POST : 1291 कोरोना वध घोषित ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

      कोरोना वध घोषित ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

      झूठ सच से बड़ा हो गया , महाभारत में अश्वथामा के वध की घोषणा ने बाज़ी पलट कर रख दी है। टीवी पर ये दृश्य देखते ही दौड़े दौड़े राजन के पास आये और बोले कब तक हम जीतेंगे का संदेश टीवी सोशल मीडिया पर देते रहेंगे। आप को महारत हासिल है दिन महीने सप्ताह क्या पल पल नया संदेश देते ही रहे हैं। अमेरिका के महाराज घोषित कर चुके हैं कि कोई दवा वैक्सीन से नहीं कोरोना खुद ब खुद ख़त्म हो जाएगा। यही समय है कि कोई और कोरोना को मिटाने का दावा करे उस से पहले हम घोषित कर सकते हैं कि हमने उसका अंत हमेशा हमेशा के लिए कर दिया है। जैसे अश्वथामा की मौत की झूठी खबर सुनते ही गुरु द्रोणाचार्य अपने हथियार डाल देते हैं उसी तरह कोरोना का वध का समाचार सुनते ही चीन भी घुटने टेक देगा और उस समय कोई भी चालाकी से उस से कोरोना का रहस्य जान सकेगा। कोरोना कैसे पैदा हुआ पता चलते ही कैसे ख़त्म किया जा सकता है समझना आसान हो जाएगा। 

   राजन सोचने लगे कि ये घोषणा किस से करवाई जाए जिस पर हमारे देश और दुनिया को सच बोलने का पूर्ण विश्वास हो। अपने दल में ऐसा कोई सत्यवादी ढूंढना मुमकिन नहीं है और चाहे जो भी तलाश करें मिल सकता है। जैसे महाभारत में भीम की बात का भरोसा नहीं किया मगर धर्मराज युधिष्ठर के झूठ का यकीन करना ही पड़ा कि वही सत्य है। जाने क्या सोचकर मनमोहन सिंह जी को फोन मिलाया और कहा क्या आप ऐसे समय हमारी सहायता कर सकते हैं। सरदारजी कहने लगे बताओ क्या सेवा है सिख धर्म में सेवा करना सबसे अच्छा समझते हैं। राजन बोले बस आपको इक झूठ बोलना है ये घोषणा करनी है कि हमने देश की सरकार और विपक्ष ने एक साथ मिलकर कोरोना को खत्म करने में सफलता हासिल कर ली है। सुनकर मनमोहन सिंह अचरज में पड़ गए और कहा जनाब झूठ बोलने में मेरा अनुभव इतना नहीं है कोई और हो सकता है जो इस कला में सिद्धस्त हो और जिसका बोला झूठ भी सच लगता हो। राजन समझ गए ये बहाने हैं साथ नहीं देने के , बोले अर्थात आप कोरोना से लड़ाई में सरकार का साथ पूरी तरह से नहीं दे रहे हैं। 

    मनमोहन सिंह ने समझाया आपको शायद विदित नहीं है हम हर दिन सुबह शाम " सत श्री अकाल " कहकर अभिवादन करते हैं जिस का अर्थ है " सत्य ही ईश्वर है "। ये हमारा मूल सिद्धांत है जैसे देश का     " सत्यमेव जयते " है अर्थात सच की विजय हो और आप झूठ की विजय की चाह कैसे कर सकते हैं। अब फोन बंद करने के इलावा कोई रास्ता बचा ही नहीं था। तभी भगवा धारण किये इक बाबा जी खुद ही चले आये और ये समस्या सुनते ही बोले आप चिंता मत करो , अन्यथा नहीं लेना आप तो ये घोषणा कभी नहीं करना क्योंकि आपकी बात को लोग सच समझते ही नहीं हैं। सबने समझ लिया है आप जो कहते हैं वास्तविकता उसके उल्ट नज़र आती है। मगर मुझे खूब आता है झूठ को सच से बड़ा बनाना , मेरा झूठ बाज़ार में सबसे ऊंचे भाव बिकता है। मैंने कुछ भी खोजा नहीं कोई शोध नहीं किया और खुद कुछ भी नहीं करता मगर मेरे नाम से सब सामान असली और शुद्ध कहला कर खूब बिकता है। अभी तक मैं सबको कोरोना से बचने के उपाय बताता था जो कितने सच हैं मुझे भी नहीं खबर मगर लोग मानने लगे थे। अब मेरे कहने से सभी भरोसा करेंगे ही और मेरी कंपनी के शेयर भी महंगे हो जाएंगे। राजन कलयुग में झूठ बिकता है आपने भी कभी जमकर बेचा था अच्छे दिन को फिर उसको आपके ही लोग जुमला बताने लगे। जब भी झूठ बोलना हो उसको हमेशा सच समझ कर यकीन से बोलना चाहिए। अभी आपको कुछ और अभ्यास करना पड़ेगा मुझे इसका अभ्यास किसी भी अन्य कार्य से बढ़कर है। टीवी चैनलों पर बाबाजी के हर विज्ञापन के साथ उनका ये दावा भी शामिल किया गया है कि उन्होंने कोरोना को जकड़ लिया था और उसका वध करने तक छोड़ा नहीं था। उसको भस्म कर दिया है।
 

POST : 1290 नसीब में जो नहीं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

        नसीब में जो नहीं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

नहीं मिला बस कोई इक शख़्स 
जो चाहता समझना मुझे भी । 

खुशनसीब होते हैं दुनिया में वो 
जिनकी बात अच्छी लगती है ।  

मेरे नसीब में नहीं रहा कोई भी 
सुनता समझता कोई बात मेरी । 

खुद कहना भी अपनी बात को 
खुद समझना भी अपनी बात । 

बदनसीबी नहीं तो क्या है भला 
बस यही चाहा यही नहीं मिला । 

इक सन्नाटा कोई आवाज़ नहीं 
जाने ये कैसी है ज़िंदगी मेरी । 

इतनी लंबी ख़ामोशी जैसे कोई 
सदियों से भटकता रहे वीराने में । 

न कोई आहट न कोई चाहत ही 
इक मकसद बेमकसद सा है जैसे । 

सबका नसीब अपने जैसा न हो 
कुछ नहीं लिखा इस किताब में । 
 

 




मई 09, 2020

POST : 1289 पुस्तक पाठक पब्लिशर और दर्शक ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

  पुस्तक पाठक पब्लिशर और दर्शक ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया 

    खाली बैठे लिखने वाले अपनी ही दुनिया में खो जाते हैं । लेखक जी पचास किताबें छपवा चुके हैं मगर जो शोहरत और नाम उनको लगता है मिलना चाहिए नसीब नहीं हुआ । अचानक विचार आया जैसी महान कथाओं की कहानी होती है उस तरह का कोई उपन्यास लिखा जाये । अब कोई जमापूंजी बची नहीं खुद अपनी जेब से पैसे देकर कुछ भी लिख छपवाने को इसलिए पब्लिशर से मिलकर चर्चा की पुरातन कथाओं का आधुनिक स्वरूप देकर कहानी पर उपन्यास लिखने को लेकर । शुरआत में ही जब असंभव घटना को आधार बनाया साफ लगने लगा तो पब्लिशर को कहना ही पड़ा भाई ये किस युग की बात कर रहे हो । लेखक ने याद दिलाया कि सदियों से लोग ऐसी कथाओं को सुनते हैं और भरोसा भी करते हैं जो भी सुनाया जाता है वास्तविक है । पब्लिशर बोले भाई ये इसलिए कि जब उनको लिखा और सुनाया जाना शुरू हुआ होगा तब लोग अशिक्षित और आस्था के नाम पर विश्वास से अधिक भय के कारण खामोश रहते थे । उस युग में अगर कोई सोच भी रहा होगा तो भी खामोश रहना उचित था क्योंकि शासन उन्हीं के इशारे पर चलता था ऐसे में सवाल करना जान जोख़िम में डालना था । आज कोई ऐसी किताब छापेगा तो कोई खरीद कर पढ़ेगा ही नहीं बल्कि जिनको समीक्षा के लिए भेजी वही उपहास और अपमान करेंगे ये कहकर कि आधुनिक समय में ऐसी अविश्वसनीय बातें लिखना छापना अर्थात सोच समझ को ताक पर रखना है । कोई भी जाना माना लिखने वाला इस जैसी कहानी को पढ़ कर समीक्षा लिखना नहीं चाहेगा । 

    लेखक जी बोले अपने कभी पढ़ा है उन पुरातन किताबों को , नहीं पढ़ा होगा मगर आज भी उनके लिखने वाले अमर हैं उनकी ऐसी ही कृतियों के कारण । अभी भी उन पर सीरियल फिल्म बनती हैं । चलो इसे छोड़ो आपने बाहुबली दबंग टाइगर ज़िंदा है रेस कोई मिल गया कृश पीके धूम दौड़ गॉड तुसी ग्रेट हो कितनी ही फ़िल्में हैं जो सफल ही नहीं कीर्तिमान स्थापित करती रही हैं क्या उनकी कहानी घटनाएं संभव हैं । अब पब्लिशर को हंसी आई और बोले भाई उनके दर्शक कोई कहानी संदेश समझने नहीं जाते हैं । शायद कुछ अपनी ज़िंदगी की उलझनों कुंठाओं हताशा खीझ से निराश इक झूठी उम्मीद संजोते हैं अपने पसंद के अभिनेता नायक की छवि को वास्तविक मान बैठते हैं कि उनके लिए भी कोई ऐसा हो सकता है । मगर ये जो सम्मोहन होता है ये कभी भी स्थाई नहीं होता है कुछ घंटे बाद हॉल से बाहर निकलते अपनी असली दुनिया दिखाई देती है जिस में कोई भी किसी की सहायता या साथ खराब समय में नहीं देता निस्वार्थ भाव से । 

   लोग छले जाते हैं अभी भी किसी के सुनहरे ख्वाब दिखलाने से और तब इक दिन वोट देकर आशा भी करते हैं कि शायद ये नेता ये सरकार पहले जैसी नहीं होगी और कुछ बदलेगा । मगर कुछ दिन में सपने टूट जाते हैं ऐसे में किसी लेखक की किताब जो केवल कल्पना ही नहीं ऐसे किरदार को दिखाती हो जो कभी नहीं हुए अभी नहीं नज़र आते और कभी भी होने की उम्मीद रखना भी पागलपन लगता है । लिखने वाले हैं आपको ऐसा हर्गिज़ नहीं करना चाहिए जैसा पुरातन महान किताबों में अन्याय अत्याचार मिटाने को कोई मसीहा आने का झूठा दिलासा दिलाया गया है । मैंने सभी को नहीं पढ़ा मगर जिनको भी जाना है समझा है साफ कहूं तो लिखने वाले की सोच समझ पर हैरानी होती है । उनकी कथाओं के किरदार कितने खोखले हैं जो हमेशा अधर्म अन्याय पाप को खामोश होकर बढ़ावा देने के बाद इंतज़ार करते हैं कब अपनी कायरता को विवशता या कोई और नाम दे सकें । 

   शायद दर्शक अपने मनोरंजन को महत्व देते समय भूल जाते हैं कि ख़लनायक की बातों पर तालियां पीटना समाज को भटकाना है , जिसे आप कहते हैं सदी का महनायक है उसकी फिल्मों को देख कर लोग हिंसा और गुंडागर्दी का सबक भले सीखते रहे हैं मगर उनकी गुंडागर्दी कोई असहाय की सहायता को नहीं नज़र आई बल्कि जब खुले आम कोई बेहद आपत्तिजनक आचरण करता है तब सभी तमाशाई बने होते हैं । क्योंकि बुराई का असर जल्दी होता है और बुराई करने वाले को अच्छा लगता है कोई उस से डरे , अच्छा बनना और भलाई की बात कोई नहीं सीखता है । पहले पुरानी फ़िल्में कहानियां संवेदना पैदा करती थी आज की फ़िल्में कहानियां दर्शक को समाज को संवेदनाशून्य बनाने का काम करती हैं । कोई भी अब शराफत के नाम पर अपनी जान को आफत में नहीं लेता है । आपको फिर भी नाम शोहरत की चाहत है तो आजकल ऐसे किरदार की बात लिखो जो आचरण रावण और कंस जैसा करता है मगर कहलाता ऱाम और कृष्ण है । वास्तविक नायक अब कहीं नहीं हैं ख़लनायक अब नायक घोषित किये जा चुके हैं । आपकी किताब भी बिकती है ऐसे हथकंडे अपनाने से मगर पढ़ी जाती है समझी जाती है ये बताना मुमकिन नहीं है । महंगी कीमत की किताबें सरकारी दफ्तरों और सभ्य समझे जाने वालों की अलमारी में रखी रहती हैं बिना खोले ही किसी अपराधी की तरह कैद में । 

 

POST : 1288 न इसको खबर न उसको पता ( फ़िल्मी मसाला ) डॉ लोक सेतिया

 न इसको खबर न उसको पता ( फ़िल्मी मसाला ) डॉ लोक सेतिया 

                                   ( जसपाल भट्टी जी को समर्पित )

   काश आज जसपाल भट्टी जी होते तो उल्टा पुल्टा सार्थक हो जाता । मुझे उनकी गैरहाज़िरी में ये लिखना पड़ रहा है नहीं तो ये मेरे बस की बात नहीं है । जैसे किसी कहानी में दो लोग दूर देस में अपना अपना सिक्का चलाने में सफल हुए उनकी धाक ऐसे जमी कि उनका मिलना ज़रूरी हो गया । दोनों को एक दूजे से सीखने थे गुण भी अवगुण भी साथ साथ । आपको कई पुरानी फिल्मों की कहानी फिर से याद करवानी है बिना उस के आपको समझ नहीं आएगा मतलब क्या है । गाइड फिल्म में नायक जालसाज़ी की सज़ा काटकर घर वापस नहीं जाना चाहता , वहां कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहां । चलते चलते बहुत दूर किसी और गांव में अपने शहर से पहुंच कर थक जाता है और सो जाता है । कोई साधु उस पर अपनी भगवा रंग की चादर डाल जाता है ठंड से बचाने को । सुबह उठते ही गांव वाले उस को कोई महात्मा समझ लेते हैं , आगे बहुत कुछ होता है मगर महात्मा का लेबल लग गया तो किरदार निभाना होता है । आखिर उस गांव के लोग महात्मा को उपवास रखने को विवश करते हैं ताकि गांव में बारिश हो सके और बरसात हो जाती है । नायक की जान रही या गई लोगों का विश्वास सच हो जाता है । 

     आपने फ़िल्मी गीत का मिक्स सुना होगा दर्द भरे गीत का डिस्को से मिलन । लगता है किसी ने कितनी फिल्मों की तस्वीरों को जोड़कर ब्लैक एंड वाइट रंगीन और तमाम और टैक्नीकलर जो मिला दिया है और इक नासमझ आने वाली रहस्यमयी फिल्म बना दी है । गाइड से कहानी पूरब और पश्चिम से जुड़ती है जिस में भारत लंदन जाकर पश्चिमी रहन सहन वाली नायिका को भारतीय सभ्यता सिखाने भारत लाता है इस वायदे पर कि वापस आने के बाद उस से विवाह करेगा और भारत छोड़ लंदन में बस जाएगा । बीच में पारसमणि अलीबाबा चालीस चोर फिल्म भी टुकड़े जोड़ शामिल किया गया है । अब भूमिका से आगे बढ़ते हैं । 

     दोनों मिले शान से नमस्कार हुआ , फिर कोई चमत्कार हुआ । भारत के मंदिर बंद हुए अमेरिका में मंत्रोचार हुआ । इधर भी उधर भी कोरोना का दोनों देश के राष्ट्रपति भवन में अवतार हुआ । अपने देश में कुछ और समझ आया मंदिर को ताला लगवाया मगर जाने क्या असर उस सात समंदर पार हुआ । माथे पर तिलक लगाकर अमेरिका वाला यार गुलज़ार हुआ । समझा हर किसी ने उसका बेड़ा पार हुआ । इधर जो नहीं काम आया उधर उसी से काम सफल होने की बात का राज़ कोई नहीं जानता मगर कुछ हुआ तो है उपहार दिया उपहार मिला भी होगा । अमेरिका वाला क्या कोई चाबी दे गया किसी खज़ाने के ताले की या कुछ और जो अभी दिखानी नहीं किसी को नहीं तो उसका काला जादू बेअसर हो जाएगा । दोस्ती करने से पहले दुश्मन की भी राय ली जाये ऐसा इक शायर कहते हैं । चीन से दोस्ती भारत अमेरिका दोनों को बड़ी महंगी साबित हुई है । आप क्या सोचने लगे ये चीन बीच में कहां से चला आया मुझे भी नहीं समझ आया कि ये कहानी दो की थी तीसरा कौन घुस आया मगर जिसने फिल्म का मसाला जोड़ा वही जानता है । 

ये संगम फिल्म की बात है प्यार किसी से शादी किसी से और प्यार की चिट्ठी शादी के बाद भी संभाली रखी है । चीन की अलमारी से कोई ऐसी चीज़ बरामद हुई है कि अमेरिका को उसकी बेवफ़ाई का सबूत मिल गया है । चीन अमेरिका का रिश्ता जो भी हो हम किधर जाएं इक तरफ कुंवां इक तरफ खाई है । किशोर कुमार बनाते थे ऐसी कहानी जो कब किस को बाप बेटा मालिक नौकर बना दे सब पहचानते उनको अपने पिता बेटे की पहचान नहीं होती थी । प्यार किये जा दिन जवानी के छार यार प्यार किये जा । ग़ज़ब है दोनों देशों में हाहाकार मची है और दोनों अजीब अजीब कारनामे करने लगे हैं । खास बात ये है कि भारत में लोग हैरान है क्या पढ़े लिखे अमेरिका के लोगों ने ऐसे व्यक्ति को चुन लिया था , और अमेरिका वाले अभी समझ नहीं पाए कि भारत वालों को क्या अच्छे दिन की परिभाषा नहीं समझ आई थी जो फिर उसी भूल को दोहराने की गलती की है । काठ की हांडी दो बार चढ़ती देखी नहीं कभी । कथा अभी है ये अध्याय कुछ दोहों को सुनकर विराम देते हैं । 

देश की राजनीति पर वक़्त के दोहे - डॉ  लोक सेतिया 

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख ।

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर ।

तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग ।

दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल ।

झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार ।

नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग ।

चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार ।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान । 
 

                               नया अध्याय ( पांच साल बाद )

दोस्त दोस्त न रहा , यार यार न रहा , अमेरिका पर दुनिया को ऐतबार न रहा । नशे की रात ढल गई अब खुमार न रहा । वक़्त ने बदला इतना बदला कि दोस्त दुश्मनी की हद से निकलते लगते हैं , पांव धरती से फिसलते लगते हैं । हाथ मिलाने वाले हाथ मलते लगते हैं कुछ रिश्ते ग़ज़ब होते हैं प्रेमी प्रेमिका नहीं पति पत्नी नहीं संगी साथी नहीं तलालशुदा नहीं फिर कैसा गठबंधन है मतलब की दुनिया सारी बिछुड़े सभी बारी बारी । 
 
 
अमेरिका ने पहले भी बड़े पैमाने पर अप्रवासियों को निर्वासित किया है। जानिए  क्या हुआ था। - POLITICO

मई 08, 2020

POST : 1287 मन ही देवता मन ही ईश्वर ( सुकून की चाह ) डॉ लोक सेतिया

  मन ही देवता मन ही ईश्वर ( सुकून की चाह ) डॉ लोक सेतिया

   आप जिस किसी पर आस्था रखते हैं उसी नाम से पढ़ना शुरू करें ताकि आपको भरोसा हो कि बात नास्तिकता की कदापि नहीं है । जब हम तमाम जगह नियम कानून बनाते हैं देश की जनता की सुरक्षा और तंदरुस्त और निर्भय होकर रहने को ध्यान में रख कर और चाहे कोई दवा हो खाने पीने का सामान या कोई भी यातायात का वाहन से सुविधाओं की चीज़ों तक इस का सबसे पहले जांचा परखा जाता है कि उनके उपयोग से कोई खराबी इंसान या हवा पानी कुदरत को नहीं हो सके । ऐसे में सरकार ने कड़े नियम बनाकर सराहनीय कदम उठाया है कि वही अस्पताल नर्सिंग होम खुल सकते हैं जिन में उपचार और रोग के फैलने से बचाव का हर ज़रूरी उपाय किया गया हो । जैसा कि कोरोना के फैलने के डर से सभी ऐसे धार्मिक स्थलों को बंद किया गया था क्योंकि इस में कोई शंका नहीं थी कि उस जगह जो कोई भी है वो अपने पास आने वाले श्र्द्धालुओं को बचाने का काम नहीं कर सकता है । अगर किसी ने ऐसा कुछ भी कहा है तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उसको पकड़ने की कोशिश की गई है । इसी से ये साबित होता है कि सरकार बेशक धर्म को आदर देती है सभी के और धर्मनिरपेक्षता की भी पैरोकार है मगर जब बात लोगों की ज़िंदगी और मौत की है तो विश्वास को नहीं वैज्ञानिक विचार और सोच को महत्व देना उसका फ़र्ज़ भी और राजधर्म भी बन जाता है । 

जितने भी बड़े बड़े भवन बनते हैं और जहां सैंकड़ों हज़ारों या लाखों लोग आ सकते हैं उन को बनाते समय मॉल पीवीआर या ऊंची इमारतों में तमाम तरह के सुरक्षा के कड़े नियम भी होते हैं और साथ में कोई अनहोनी होने पर बनाने वाले मालिक या संचालक की ज़िम्मेदारी भी दंड भी आर्थिक मुआवज़ा भी भरने का कानून होता है । इतना ही नहीं जिन जिन जगहों पर दुर्घटना होने की संभावना होती है सरकारी विभाग या निजी उद्योग चेतावनी भी लिखवाते हैं । पिछले कई हादिसे जिन में गैस रिसाव हुआ या सिनेमा में आग लगने से किसी स्कूल में पंडाल में आग लगने से कितनी जान किसी की लापरवाही से गई भविष्य में नहीं हो ये ध्यान रखते हुए सख्ती से नियम कानून का पालन करवाना ज़रूरी समझा गया । 

अब कोरोना को देख कर हमें विचार करना चाहिए क्या क्या धार्मिक स्थलों के लिए नियम कानून निर्धारित करने चाहिएं ताकि वहां जाकर कोई आशीर्वाद की जगह मुसीबत नहीं खरीद लाये । जैसा डॉक्टर्स को जिन के पास अल्ट्रासाउंड मशीन होती है ये लिखना पड़ता है कि यहां कोई जांच जो गैर कानूनी है नहीं की जाती है । ऐसे ही ये बताया जाये कि उस जगह कोई भी रोग नहीं फैले इसका समुचित उपाय है अथवा नहीं है और आपको चेतावनी दी जाती है अपना बचाव खुद रखे । साफ शब्दों में धर्म वाले इतना सच तो लोककल्याण को बता ही सकते हैं कि आपको सुरक्षित रहना ज़रूरी लगता है तो ईश्वर देवी देवता खुदा वाहेगुरु जीसस जिस किसी को मानते हैं और आरती पूजा ईबादत नमाज़ पढ़ना दीपक जलाना मोमबत्ती जलाना घर पर भी कर सकते हैं । लॉक डाउन से इतना तो सबने सीखा ही है । मन की शांति सबसे ज़रूरी है क्योंकि मन ही अशांत हो और असुरक्षित महसूस खुद को करते हैं तो भक्ति करना मुमकिन ही नहीं है ।

    सभी दुनिया वाले शांति चाहते थे अब जब शांति ही शांति है तब भी चैन नहीं करार नहीं बेचैनी है । शांति इधर उधर भागने से नहीं मिलती पर्वत जंगल नदियां झरने कहीं भी शांति बची नहीं । ये तब समझ आया जब घर में बैठे हैं तब अब बाहर जाते घबराते हैं डरते हैं घर से सुरक्षित जगह कोई भी नहीं है । अब हैरानी की बात है कि लोग शांति से भी उकताहट महसूस करने लगे हैं उनको कोलाहल की शोर शराबे की आदत लग गई थी शांति उनको लगता है कोई अनचाहा बोझ है ढोना पड़ रहा है । कोई इंसान किसी इंसान से लड़ना चाहता है जीतना चाहता है कोई देश किसी देश को अपने आधीन करने को बेताब है । बहुत लोगों का यही कारोबार भी है बात शांति की कारोबार युद्ध का अब उनकी हालत अजीब है न शांति है न युद्ध ही करने का साहस बचा है । आदमी पहले अपनी शांति को खुद ही भंग करता है फिर अशांत मन शांति शांति कहने लगता है । हां ऐसी शांति नहीं चाहता कोई भी श्मशान की शांति जैसी मगर बाहर कोई और शांति नहीं मिलती है । वास्तविक शांति अपने भीतर खोजनी होती है अपने खुद के साथ रहकर बाकी सब दुनिया से दूर अकेले में । समय बिताना नासमझी है समय की कोई कीमत नहीं अनमोल है इसका उपयोग करना चाहिए ।

 शांति को समझने ढूंढने और पाने के लिए आपको इक भजन सुनाते हैं इंसान ईश्वर से पूछता है आपको किस तरह पाया जा सकता है और ईश्वर बताता है मन को पा लो सब मिल जाएगा , मन ही देवता मन ही ईश्वर मन से बड़ा न कोय । मन उजियारा जब जब फैले जग उजियारा होय। जग से चाहे भाग ले कोई मन से भाग न पाये । तोरा मन दर्पण कहलाये । हां ये किसी नेता के मन की बात कदापि नहीं है , आपकी अपनी मन की बात है जो मन ही जानता है ।


 

POST : 1286 कहां सुनता आस्मां ज़मीं की सदा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   कहां सुनता आस्मां  ज़मीं की सदा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  हर एक सरकार यही सोचती है , भगवान सब ठीक करेगा , उसे कुछ भी करने की क्या ज़रूरत है । उधर आसमान पर बैठा भगवान समझता है जब सरकार बना ली है सभी ने अपनी अपनी तो वही खुद सब करेंगे । ये उलझन है कि दो घर का मेहमान भूखा रहता है । ये बात इक बार फिर से साबित हो गई कि ये महान देश सिर्फ भगवान भरोसे चलता रहा है । सरकार और भगवन दोनों भरोसा रखने को बनाये गए हैं और उसके किसी कदम पर कोई सवालिया निशान नहीं लगा सकते हैं । भगवान पर सवाल बहुत हैं सब अन्याय अत्याचार देखता है करता नहीं कुछ भी , सरकार तो कभी चाहती ही नहीं कुछ भी करना उसके लिए सरकार होने का अर्थ ही यही है । जब से कोरोना आया है वास्तव में सरकार को कुछ भी सूझता ही नहीं है और उसने जो भी करना है लोगों को करने को कहा है तब इतना भी उसकी मेहरबानी और समझदारी और महानता है । कोई माने या नहीं माने आज भी भारत देश को कोई बचा सकता है तो वही ऊपर वाला , हम आप बच गए और बचे रहे तो समझना भगावन की दया है । मगर भूले से भी जिनको नहीं बचाया जा सका उसका दोष उसको मत देना । आसमान वाला ज़मीं वालों की फरियाद सुन सकता तो समझता उसने भी दुनिया को अपने हाल पर छोड़ नहीं दिया होता ।

      सरकार का भी हर कदम उठाया जनहित को गया जाता है मगर साबित जनहित के खिलाफ होता है । शासक को कभी भी कोई दोष नहीं होता है उसकी लाठी गोली भी न्याय कहलाती है और जनता का अपना बचाव करना भी दंगा हो जाता है भले जनता निर्दोष भी हो । कानून की लाठी अंधी होती है और न्याय की देवी सच देखना नहीं चाहती अपनी आंखें बंद रखती है । गंधारी अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर अपनी निष्ठा धृतराष्ट्र के लिए होने का सबूत देती है । सत्ताधारी लोग देश की जनता की बदहाली ऊपर से आकाश मार्ग से देखते हैं जैसे कोई तमाशा है । बदहाली का मंज़र भी आसमान से खूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है । सरकार भी भगवान भी देख का समझता है सब भला चंगा है । चाहे भगवान हो या सरकार हमको कभी तो उनकी हक़ीक़त को समझना होगा कि ये दोनों भरोसे पर खरे उतरते हैं भी या नहीं और जो बार बार भरोसे को तार तार करते हैं उनको बार बार आज़माना समझदारी नहीं है । 

     शासक बनते ही सभी को चाहत होती है अपने देश राज्य को छोड़ और सभी देशों में राज्यों में अपनी शोहरत का कीर्तिमान स्थापित किया जाए । और जो धन जन कल्याण को खर्च कर नागरिक को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाई जा सकती हैं उसे अपने नाम का शोर और गुणगान का डंका पीटने पर बर्बाद किया जाता है । हम नासमझ नहीं हैं जानते हैं देखते हैं गरीब भूखे बेघर हैं और सरकार नेता अधिकारी मौज मस्ती पर जमकर सरकारी खज़ाने को उपयोग करते हैं । जनता की ज़रूरत होने पर बजट का रोना धोना होता है सरकार को जब चाहे जितना धन जिस तरह भी छीन कर वसूल कर लेने को तरीके होते हैं । भगवान देवी देवताओं की कथा कहानियों में भी हर कोई खुद को ऊंचा बड़ा और शक्तिशाली साबित करने को ही लगे रहते थे। यही दशा नेताओं अधिकारियों की बढ़ती हुई हवस की लालसा चाहत की भी है । भगवान के मंदिर हों या फिर सरकारी विभाग आपको चढ़ावा बहुत देना होता है मिलता थोड़ा है भोग लगाने के नाम पर किसी और को ज़रूरत से अधिक मिलता है । मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे दौलतमंद हो जाते हैं सबको संचय नहीं करने का उपदेश देते । सरकार नेता भी अपने लिए करोड़ों खर्च कर जो चाहे खरीद लेते हैं ।

   दुनिया में कोई देश किसी देश का दोस्त नहीं होता है दोस्ती देशों के शासक लोगों की होती है जिसकी कीमत जनता को चुकानी होती है । उनकी आपसी जंग भी इसी तरह होती है टकराव होने पर उनकी लड़ाई में भी जान जाती है जनता की । आपने कभी सांढों की लड़ाई देखी है दो सांढ लड़ते हैं बर्बाद उनके पैरों तले दबकर बूटे होते हैं या जो भी ढेर मिट्टी का हो या रेत का या कोई अनाज या कुछ भी उसको धूल में उड़ाकर जब तक जाते हैं तो अपनी अपनी राह चल देते हैं । जानवर से लोग डरते हैं मगर नेताओं अफसरों से बचते हैं क्योंकि ये कब कैसे आपको बर्बाद कर सकते हैं आप सोच भी नहीं सकते हैं । कुछ महीने पहले जो राजनेता गले मिल कर दोस्ती का दिखावा कर रहे थे आज समय बदला तो आरोप लगा रहे हैं तुमने मुझे बर्बाद किया है । सत्ता का घिनौना खेल सामने कुछ पर्दे के पीछे कुछ और चुपचाप करता है । अगर कोरोना चीन की लैब से निकला है तो उसकी पटकथा जाने कब की लिखी गई होगी । अब अगर हम हमारे शासक ये नहीं जान पाए समय पर तो दोष उनका है , आपको हर किसी की जानकारी लेनी आती है देश की जनता की मगर जिनकी दोस्ती या दोस्त बनकर दुश्मनी की खबर रखनी थी वही नहीं रख सके तो कसूर किसी और का नहीं है ।  सार की बात इतनी है कि कोई भी शासक किसी भी शासक पर भरोसा नहीं कर सकता है हर कोई इसी अवसर की तलाश में रहता है कि जब कोई अटूट भरोसा करने लगे तभी उसको घात लगाकर घायल कर दो ।  ये कलयुग है कलयुग में जिस पर भरोसा करो वही अपनी असलियत दिखलाता है । भगवान हो या सरकार अपने होने का एहसास करवाने को लोगों को नित नई परेशानी देते रहते हैं । जिस दिन हमने भगवान भरोसे रहना और सरकार भरोसे रहना छोड़ खुद अपने भरोसे जीना शुरू कर दिया हमारी तमाम समस्याएं अपने आप हल हो जाएंगी । मगर कुछ लोग हैं जो ऐसा होने नहीं देंगे और जिन्होंने हमें ये बात समझाई हमने उनकी सुनी मगर समझी नहीं कभी । आस्मां पे है ख़ुदा और ज़मीं पे हम , आजकल वो इस तरफ़ देखता है कम ।


खुदी को कर बुलंद इतना के तकदीर से पहले , 

ख़ुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है । 

( अल्लामा इक़बाल )

जब तक मंदिर और मस्जिद हैं , 

मुश्किल में इंसान रहेगा ।  

( गोपालदास नीरज )

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक , 

कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक । 

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन , 

ख़ाक हो जाएंगे हम तुम को खबर होने तक । 

( मिर्ज़ा ग़ालिब )

 Aasman Pe Hai Khuda - आसमान पे है खुदा - Mukesh - Phir Subah Hogi - PK -  YouTube

मई 07, 2020

POST : 1285 कोविड हिरासत में पूछताछ जारी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  कोविड हिरासत में पूछताछ जारी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

खबर गर्म है शोर मच गया है आखिर दुनिया भर के देशों की पुलिस उसके पीछे लगी थी कब तक बचता । इस से पहले कि आप अलग अलग टीवी चैनल की अपनी अपनी घड़ी कहानी और अख़बार वालों की खबरों में उलझ जाएं आपको मुंशी प्रेमचंद जी की कहानी नमक का दरोगा को याद करना होगा लघुकथा है फिर से पढ़ सकते हैं । मुंशी वंशीधर का नमक विभाग का दरोगा बनना पंडित अलोपीदीन को रंगे हाथ पकड़ना और अदालत में लक्ष्मी जी के आशिर्वाद से अलोपीदीन का बेगुनाह साबित होना और नमक के दरोगा का नौकरी से निलंबित होना और अंत में पंडित अलोपीदीन का खुद आकर मुंशी वंशीधर को अपना मैनेजर बनाना और ये कहना कि मैंने योग्यता और किताबी शिक्षा को खूब देखा है लक्ष्मी के सामने सर झुकाते हुए । मगर पहली बार किसी को अपना धर्म ईमानदारी से निभाते खुद सामने दर्शन किये हैं । आप इस युग के सबसे दुर्लभ व्यक्ति हैं मुझे ऐसी ही विश्वसनीय आदमी की ज़रूरत है ।

कोविड को पकड़ने को सभी लगे हुए थे अमेरिका ने तो बड़ा ईनाम भी घोषित किया हुआ था और उसका शक था कि चीन ने उसको पाला पोसा है और बढ़ावा दिया है । जिस तरह हम पाकिस्तान को जानते हैं आतंकवाद को समर्थन देने को लेकर । आखिर सुरक्षा एजेंसियों ने नमक के दरोगा का ही चयन किया और बदले नाम से उसे देश भर में राज्यों की पुलिस को भी उसी के साथ सहयोग करने को निर्देश जारी कर दिए और इस सूचना को गोपनीयता की शपथ दिलवाकर राज़ को राज़ रखने का काम किया गया । हर शहर दूर देश की पुलिस भी जानकारी भेजने लगी मगर वंशीधर को समझ आ गया था सब गलत सूचना ईनाम पाने को भेज रहे हैं । जैसा भारत की पुलिस करती है कितने थाने के थानेदार किसी को पकड़ कबूल करवा चुके हैं कि वही असली कोविड है । उधर कोविड अपने पकड़ से बाहर होने के सबूत भेजता रहा ।

नमक के दरोगा को वही पुराना तरीका आज़माना उचित लगा , किसी नाचने वाली हसीना से कोविड का भी नाता अवश्य हो सकता है । और ढूंढते ढूंढते वो सही जगह पहुंच भी गया । तब जानकारी मिली कि कोविड जब शराब के नशे में धुत होता है तभी नाच देखने मौज मस्ती करने उधर आता है । शराब की दुकानें बंद हैं तो पिये बिन वो यहां आया ही नहीं । तब नमक के दरोगा ने सभी सरकारों को शराब की दुकानें खोलने का उपाय बतलाया और शराबखाने की रौनक दिखाई देने लगी । हर शराब की दुकान पर निगरानी की जाने लगी और धर पकड़ होने लगी , कितने मदहोश शराबी नशे में खुद को कोविड होना स्वीकार करने लगे ।

मगर नमक का दरोगा अपना जाल बिछा चुका था और इंतज़ार करता रहा उसके अपनी महबूबा से आकर मिलने का । आखिर उसने कोविड  को नशे में झूमते हिरासत में ले ही लिया । और उसको उसी के हवाले कर दिया जिस ने उसको इस काम को नियुक्त किया था । नमक के दरोगा ने अपना काम कर दिया था मगर उसे नहीं पता था कि कोविड का खेल ख़त्म नहीं हुआ बल्कि अब तो इसकी शुरुआत हुई है । सरकार के अधिकारी नेता एंजेंसियां सब अपना अपना काम करने लगी और चर्चा होने लगी किस ने कितना ईनाम घोषित किया हुआ है और पुरुस्कार किसे मिलेगा । कोविड को बड़े अधिकारी गुप्त स्थान पर जांच और पूछताछ को ले गए थे । आधी रात को शोर मच गया कि कोविड हिरासत से भाग गया है । शायद उसको नकली मुठभेड़ में मार गिराया गया है । शंका जताई जा रही है कि या तो कोविड अपने पर घोषित ईनाम से बड़ी रकम रिश्वत में देकर सुरक्षित बच निकला है या फिर उसे किसी विदेशी सरकार को सौंप दिया गया है । नमक का दरोगा फिर इक बार अपनी ईमानदारी की खातिर निलंबित किया जा चुका है और इस बार उसको कोई पंडित अलोपीदीन भी मैनेजर रखने नहीं आने वाला है वो भी बदल गया है सत्ता से विरोध नहीं करना चाहता है ।

अदालत में कितने लोग नकाब से चेहरे ढके लाये गए हैं । नमक का दरोगा हाज़िर है उसको पहचान करनी है इन सब में असली कोविड कौन है । सरकारी वकील ने वादा किया है इन में ही किसी को असली बता दे तो उसके साथ नर्मी से बर्ताव किया जाएगा और माफ़ भी किया जा सकता है । कोविड की सूरत किसी और की सूरत से मेल नहीं खाती है । वंशीधर उसकी तस्वीर अपनी जेब में लिए गुनगुना रहा है , तेरी सूरत से नहीं मिलती किसी की भी सूरत , हम जहां में तेरी तस्वीर लिए फिरते हैं ।

 

अभी किसी सरकार ने खबर की पुष्टि नहीं की है और हर तरफ चुप्पी छाई है । कोई नहीं जानता इस में कितनी सच्चाई है । क्या किसी ने झूठी अफ़वाह उड़ाई है ।


मई 05, 2020

POST : 1284 सोमरस से कोरोना का ईलाज ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  सोमरस से कोरोना का ईलाज ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  जो काम पैसे से नहीं होता सिफारिश से नहीं होता शराब की इक बोतल से झटपट हो जाता है । ये राज़ हर कोई जानता है । आपके घर दामाद जीजा जी आएं उनको छपन्न भोग खुश नहीं कर सकते मगर उनकी पसंद की शराब पिलाओ तो उनकी ख़ुशी आसमान पर होती है । शराब पीने को लोग कितने फासले तय कर लेते हैं ये लॉक डाउन कोरोना उनको क्या रोक सकते हैं । जो पीते पिलाते थे सरकार उनको पीने का अधिकार दे रही है यही स्वर्णिम पल हैं जो कभी कभी मिलते हैं । मोक्ष मिलना आसान है इस युग में घर में बंद शराबी को शराब का वरदान मिलना बड़ी बात है ।  

    देर से ही  सही कोई शोध करने की कोशिश की जा रही है । ये जो बुद्धीजीवी तरह के लोग हैं उनको ताली थाली दिया जलाना फूल बरसाना मज़ाक लग रहा था मगर शराब की दुकानें खोलना कोई बिना सोचे समझे उठाया कदम नहीं है । सब देश अपने ढंग से दवा वैक्सीन बनाते रहें हम जानते हैं शराब सब दुःख दर्द मिटाने को ही कारगर नहीं है उस में अल्कोहल होता है जो हाथ धोने के सेनिटाइज़र में भी काम आता है और जिसको पीना भी खतरनाक नहीं अमेरिका के ट्रम्प के नीम हकीम जैसे नुस्खे की तरह । ये जांच करने को ही शराब के ठेके खोलने का निर्णय लिया गया है और उस को और महंगा करना भी उचित है दवा की तरह काम आने वाली हर चीज़ महंगी होनी लाज़मी है । अगले कुछ महीने में सरकार यही आंकड़े देखती रहेगी कि जैसे शराबी लोग सोचते हैं शराब कीटाणु नाशक है और उनके भीतर से सब जीवाणु कीटाणु का अंत कर देती है । शराबी को शराब को छोड़ कोई और नहीं मार सकता है । निडर होकर शराबखाने की कतार में बारिश धूप हर मौसम में खड़े होने का दम खम और हौसला रखने के बाद कोरोना खुद उनसे अपनी जान बचाने को दूर रहता है या नहीं । और फिर भी कोरोना उनको अपना शिकार नहीं बना सकता पाया जाता है तो हमारी बल्ले बल्ले है । जो अमेरिका इंगलैंड नहीं कर सकता भारत देश बड़ी आसानी से कर सकता है शराब बनाना यहां गांव क्या वीरान जगह रहने वाले तक जानते हैं और मानते हैं उनकी घर की बनाई शराब की बात ही और है । शराब पीने से आदमी का हौंसला बढ़ जाता है और चिंता दूर हो जाती है इसलिए भी जब लोग कोरोना से घबराए हुए हैं शराब सहायक बन सकती है ।

     कोरोना पर शराब का असर देखने क ये शोध सफल हुआ तो देश में शराब की नदियां भले नहीं बहाई जा सकती हैं मगर रसोई गैस और पानी की लाईन की तरह सप्लाई करने का काम किया जाना मुमकिन है । घर घर शराब को सोमरस नाम से उपलब्ध करवाया जा सकता है क्योंकि जिनको नहीं मालूम उनको बता देते हैं कि ऐसा न केवल आयुर्वेद में वर्णन है बल्कि 1978 तक या उस के भी कुछ समय बाद आयुर्वेदिक दवा की दुकानों पर ये बिकती रही है और वास्तव में इसका उपयोग दवा की तरह नहीं शराब की तरह किया जाता रहा है । दाम भी कम और जिस दिन ड्राई डे होता ठेके बंद तब भी आसानी से मिल जाती थी । तब मुझे ये बात मेरी क्लिनिक के सामने खुली इक दुकान से पता चली थी । आपने भी किसी जगह शराब की बोतल चढ़ाने की बात सुनी होगी । शराब को शराब की तरह पीना हर किसी को नहीं आता अन्यथा शराब खराब नहीं होती खराबी शराब पीने वाले में होती है जो मदहोश होने को नहीं होश खोने को पीते हैं । शराब का हल्का हल्का सुरूर काफी होता है होश में रहना मदहोशी भी । जब सोमरस का गलत उपयोग किया जाने लगा तब इसको बंद करवा दिया गया था ।

   सबसे अच्छी बात है कि शायद एक धर्म को छोड़कर किसी भी धर्म में मदिरा पान की मनाही नहीं है । जिस धर्म में मना है उन को भी मरने के बाद शराब मिलने की चाहत रहती है क्योंकि उनको यही बताया जाता है । मेरा आशय किसी धर्म की बात पर कुछ भी कहना नहीं है बल्कि जान है तो जहान है ये सोचकर शायद जो हम जैसे नहीं पीते या पीना छोड़ चुके हैं वो भी इसका स्वाद चख सकते हैं । किसी ज़माने में परमिट मिला करते थे ताकि हर कोई निर्धारित सीमा में नशा सेवन कर सके वही व्यवस्था फिर से लागू करनी होगी या ये भी किया जा सकता है कि डॉक्टर की लिखी पर्ची से ही कौन सी और कितनी शराब पीनी है खरीद सकेंगे । डॉक्टर्स की मौज हो जाएगी उनको शराब बनाने वाली कंपनियां मुफ्त सैंपल देकर अपना धंधा बढ़ाने का काम करेंगी । दवा कंपनी वाले अभी भी यदा कड़ा डिनर मीटिंग में शराब परोसती हैं ।  यहां इक समस्या खड़ी हो सकती है क्योंकि आयुर्वेद में सोमरस का वर्णन है इसलिए युर्वेदिक डॉक्टर इस पर अपना अधिकार समझ सकते हैं । मगर वास्तव में ये उपचार संभव है भी या नहीं इस को लेकर कोई आयुर्वेदाचार्य भी विश्वास पूर्वक नहीं कह सकते दावा करना तो बहुत दूर की बात है ।

     ऐसे में ये उपाय आज़माने को किसी चिकत्सक ने नहीं बल्कि जब सभी भविष्यफल बताने वाले कोई भविष्वाणी नहीं कर सके तब किसी लाल किताब वाले ने कोशिश करने को ये गोपनीय संदेश भेजा होगा  कुछ ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है । क्योंकि लाल किताब वालों के जितने भी उपाय होते हैं उनको बिना किसी की जानकारी करना ही सफलता की शर्त होता है । लाल किताब वाले बताया करते हैं कि कोई उपाय किस दिन किस समय और किस ढंग से किया जाना चाहिए । कभी बहते पानी में शराब की उनकी बताई संख्या की बोतलें उंडेलनी होती हैं कभी किस वीरान में ज़मीन में दबानी और कभी जो बहुत दिन से प्यासा हो उसकी प्यास बुझाना भी उपाय होता है । शायद चालीस दिन की प्यास की भी कोई शर्त रही हो सकती है । पता चला है कि लाल किताब वाले उनको जो शराब का सेवन नहीं करते हैं घर की अलमारी में इक बोतल रखने का उपाय बताया करते हैं ।

( ये सच है या अनुमान कोई नहीं जानता । मगर इक चेतावनी आपको अवश्य देनी है कि ये इक काल्पनिक रचना शुद्ध मनोरंजन के लिए है अंधविश्वास को बढ़ावा देने को नहीं , क्योंकि जैसा सुनते हैं बताया जाता है कि अगर किसी के पास सही में कोई लाल किताब होगी तब आपको खुद उसके पास जाकर अपना परिचय देने की ज़रूरत नहीं होगी क्योंकि विश्वास है कि उसको अपनी किताब से पहले से जानकारी होगी किस ने कब क्यों आना है । असली नकली की पहचान इस से भी हो जाएगी कि न तो वो कोई पैसे लेगा और आपको खुद कुछ भी लिख कर देगा बल्कि आपको अपने पेन से अपने हाथ से कागज़ पर लिखवाएगा जो जो भी उपाय करना है । और क्योंकि ऐसा कोई नहीं मिलेगा इसलिए जब कोई आपको लाल किताब होने की बात कहे तो इस को आज़मा कर देख सकते हैं । सोशल मीडिया पर ऐसे नकली लोग मिलते हैं सावधान । )


 
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POST : 1283 यमराज - कोरोना संवाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      यमराज - कोरोना संवाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

    बस बहुत हुआ अब और नहीं , कोरोना हाथ जोड़ यमराज से इस काम से छुट्टी मांग रहे हैं । यमराज समझा रहे हैं आप किन की चिंता कर रहे हैं जो लॉक डाउन से परेशान हैं । आपको उनके कर्मों का हिसाब पता चले तो उनको जेल में बंद करने की नौबत आने की बात लगेगी । अभी उनको सज़ा मिलने का तो सवाल ही नहीं है ये तो केवल समझाने को चेतावनी भर है । वैसे भी ये लोग आज़ाद कभी नहीं रहे हैं गुलामी इनकी फ़ितरत बन गई है उसकी नहीं तो इसकी गुलामी करने की आदत है । कोरोना कहने लगे आपकी बात अपनी जगह ठीक है मगर जब कोई घबराता डरता खुद अपने आप से है नाम मेरा नाहक बदनाम करते हैं । यही रहा तो हर किसी की मौत का इल्ज़ाम मेरे सर पर धर दिया जाएगा । कोई नहीं जानता कितने लोग अपनी अपनी सरकार की लापरवाही से मौत के शिकार होते रहे कितने लोग खाने पीने शीतल पेय तक क्या मिलावट और नकली दवाओं से जान से हाथ धो बैठे किसी ने किसी को दोषी नहीं बताया । कौन जाने जो बाबा सब बेचते हैं योग को भी कारोबार बनाया है उनकी वास्तविकता कुछ और हो । उनके सभी कामों से कमाई बहुत हुई मगर रोग कितने घटे हैं कोई नहीं सोचता है । मुझे चिंता है ऐसे लोग मेरे उपचार का भी दावा कर और भी मालामाल हो सकते हैं । कैसे इन सभी को कोई समझाए कि कोरोना है क्या और क्यों है ।

    यमराज बोले तुम भी नहीं जानते खुद अपने आप को देखो डॉक्टर्स सच बता रहे हैं तुम अपना स्वरूप बदल रहे हो तुम पहले भी थे आज भी हो और बहुत लोग ये भी समझते हैं कि तुम हमेशा रहोगे । कोरोना का नहीं होना का मतलब ये नहीं है कि कोई भी नहीं मरेगा । मौत अपनी जगह है तुम अपनी जगह हो कोरोना नहीं होता तो कोई और नाम होता । तुम अपने आप नहीं आये हो तुम्हें बुलाया गया है हैरानी है जिन्होंने तुम्हें बुलाया भी और समझाया भी उनकी बात भी लोग भूल गए हैं । कितनी बार कितने लोग तुम्हें बुलाने को उस मंत्र को रटते रहे थे कोरोनॉलजी को समझो । नहीं समझ आया अभी भी कौन क्यों क्या समझा रहा था । ये बदला रंग ढंग तुम्हारा उसे कोरोनॉलजी शब्द से पैदा हुआ है । खुद को जान लो और जिनकी संतान बनकर आये हो उनको पहचान लो । मगर यहां भूल कर भी किसी से कोई नाता मत जोड़ना क्योंकि ये वो दुनिया है जिस में कोई किसी का सगा नहीं है । मतलब हो तो गधे को बाप और मतलब नहीं हो तो बाप को गधा कहने में संकोच नहीं करते लोग ।

   मुझे अच्छा नहीं लगता मुझसे हर कोई डरता है नफरत करता है घबराता है । मेरे नाम को सुनते लोग दूर भागते हैं भले मुझसे उन्हें कोई भी नुकसान नहीं हुआ हो ।

    देखो कोरोना जी आजकल जब किसी से लोग भयभीत होते हैं किसी को ताकतवर समझते हैं किसी का नाम सबकी ज़ुबान पर रहता है तब वह व्यक्ति खुद को भाग्यशाली समझता है । कभी किसी महिला का नाम विश्व की सबसे ताकतवर महिला के लिए समझते थे जब्कि उस के पास सत्ता का कोई ऊंचा पद नहीं था । बाद में कोई और नाम शोहरत की ऊंचाइयों को छूने लगा था । आजकल तुमने उन सभी को जाने किस किस को पछाड़ दिया है । सबसे ख़ास बात ये है कि अभी तक लोग बड़े बड़े रोगों से डरते थे और चाहते थे उनको दिल का दौरा लिवर का गुर्दे का फेल होना कैंसर टीबी शुगर जैसे रोग नहीं हों रक्तचाप की बिमारी से बचे रहें सेहत अच्छी हो मगर मोटापा नहीं हो । कोई भी ऐसे मरने को तैयार नहीं था । कभी किसी ने भी कोरोना जैसे जीवाणु जो खांसी ज़ुकाम थोड़ा बुखार जैसे लक्षण पैदा करता है उस से बचने की बात नहीं सोची थी । कभी अपने ईश्वर देवी देवता क्या डॉक्टर से भी ऐसा नहीं कहा था कि उसे इस रोग से नहीं मरना है ।

   अभी भी कोई ये नहीं सोचता कि कोरोना नहीं कोई और गंभीर रोग भले हो जाए । अभी तुम से कोई शिकायत नहीं कर रहा है हर कोई दोषी किसी और को घोषित कर अपने को निर्दोष साबित करना चाहता है । जो तुम करते हो नेताओं अफ्सरों उद्योगपतियों हर किसी ने किया है । छोटी सी गलती पर मौत की सज़ा कत्ल करना भयभीत करना अपने अहंकार ताकत से दहशत पैदा करना । तुम ने तो ये जानकर नहीं किया है । कितने आराम से तुमने बिना कोई शोर कोई आहट किये दुनिया भर को अपना घर बनाया है । मुझे ये काम करते कितने युग हो गए हैं और लोग किस किस तरह नहीं मरे हैं मगर कभी इस से आसान मौत नहीं देखी मैंने इस से पहले । डॉक्टर भी समझा रहे हैं इस से डरने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि कोरोना रोग होने के बाद भी दो तीन प्रतिशत को छोड़ सभी ठीक हो जाते हैं अधिकांश तो किसी दवा उपचार के बिना ही । आखिर कोरोना को यमराज ने समझा ही लिया है ।

दुनिया की बात क्या है किसी की सौ अच्छाईयां नहीं देखती इक बुराई को देख लेती है। अभी भी कुछ लोग देख रहे हैं तुम्हारे आने से क्या क्या अच्छा हुआ है कुदरत इंसानियत बहुत कुछ। शायद कुछ समय बाद तुम्हारा धन्याद करेंगे उनको ज़िंदगी का सबक सिखाने को मौत का सामना करने का हौंसला दे कर ।  
 
 
 बाइक पर यमराज - 'कोरोना राजदूत' यमराज ने लोगों से लॉकडाउन के दौरान घर पर  रहने को कहा | द इकोनॉमिक टाइम्स



मई 04, 2020

POST : 1282 टीवी एंकर का कोरोना साक्षात्कार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  टीवी एंकर का कोरोना साक्षात्कार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

गहरी नींद में खुद को सबसे अधिक देखे जाने वाले टीवी चैनल की सबसे अच्छी एंकर कहलाने वाली को सपने में इक बदसूरत अजनबी ने आकर ये कह चौंका दिया , क्या मुझसे डर गई आप । क्या बोलते हो कौन हो तुम जो मुझसे इस तरह की बात करने की भूल कर रहे हो । डर और मुझे किस से क्यों कभी भी नहीं तुम अपनी औकात सोचकर बात करना । जी मैडम जी आपकी बात उचित है और मुझे भी बेअदबी से बात करना बिल्कुल भी पसंद नहीं है । मगर मुझे ये कहना इसलिए पड़ा क्योंकि आप लोग तो बड़े बड़े आतंकवादी को भी तलाश कर उसका साक्षात्कार लेते नहीं घबराते हो । पहले कहा जाता था जहां न पहुंचे रवि वहां भी पहुंचे कवि । अर्थात जिस जगह सूर्य भी नहीं पहुंचता कवि उस जगह भी चले जाते हैं मगर अब आप लोग टीवी अख़बार वाले तो ज़मीन का पाताल से भी निकाल लाते हो कैसे कैसे खतरनाक अपराध करने वालों को । मैं भी जब से दुनिया भर को अपने नाम से भयभीत हुआ देखा तो यकीन था कोई तो अवश्य मेरे को भी खोज लेगा और आमने सामने बैठ मुझसे भी तीखे तीखे सवाल करेगा । आपको देखता रहा कितनी जगह क्या खूब शान से दावा करते हुए अपनी जान की परवाह नहीं करते हुए हम आपको अमुक अमुक शहर की लाइव तस्वीर दिखला रहे हैं । विश्वास करें आपका फैन हो गया मैं भी । 

अच्छा तो आप कोरोना हैं सच में या फिर शोहरत हासिल करने को ये नाम रख लिया है । जी नहीं मैडम जी मैं और मैं ही कोरोना हूं और मेरे पास ये साबित करने के सभी सबूत हैं । मुझे जितनी शोहरत मिली है भले उसको शोहरत नहीं बदनामी कहना उचित होगा उस से बढ़कर नाम हो ही नहीं सकता और होना भी नहीं चाहिए क्योंकि खुद मुझे भी अपने आप से डर लगने लगेगा । दर्पण में अपनी ही सूरत मुझे डरावनी लगने लगेगी । मैं तो अपनी छवि को और खराब नहीं होता देखना चाहता तभी जब कोई नहीं आया मेरे करीब तो मुझे ही तलाश करनी पड़ी कौन है जो मुझसे मिल मेरी बात सुनकर सबको बताए और जिसकी बात का भरोसा भी सभी करते हों । बार बार आपका इश्तिहार वज्ञापन या दावा आपके ही चैनल पर देखा कि लोग सबसे अधिक भरोसा आप के चैनल पर करते हैं और सबसे बढ़िया साक्षात्कार खुद आप ही लिया करती हैं । बस मुझे भी भरोसा है आप ही मेरी छवि बदल सकती हैं । अधिक समय व्यर्थ बर्बाद नहीं करते हुए आप अपना कार्य शुरू कर सकती हैं और आपको मुझे कोई सवाल पहले से बताने की ज़रूरत नहीं है । 

साक्षात्कार :-

आप क्यों दुनिया भर को इस कदर विचलित कर रहे हैं । कोई तो मकसद होगा आपका बिना कारण हर किसी की ज़िंदगी को संकट में डालने से आपको क्या हासिल होगा । 

नहीं मैडम जी मुझे किसी को भी भयभीत नहीं करना और किसी से मुझे कोई बैर ही है । वास्तव में मुझे तो कुदरत ने ये पता करने को भेजा है कि दुनिया में इंसानों में इंसानियत कितनी बची हुई है । यही देखने मुझे सभी लोगों के भीतर श्वास के साथ जाना पड़ता है और मुझे अच्छा लगता है अभी बहुत लोगों में इंसानियत और भलेमनानुष होने का दर्शन होता है और उनको मैं कोई नुकसान नहीं पहुंचाता हूं । मगर जो तब भी इंसान और इंसानियत की बात को नहीं समझते उनको भी गंभीर दशा में भी अपने अमानवीय आचरण पर पछतावा होने पर छोड़ देना चाहता हूं । 

आप मेरा इतना काम कर देना कि जब भी कभी जिसका मुझसे पाला पड़ जाए उनको तब खुद सोच विचार कर भविष्य में अच्छे इंसान बनने की बात का निर्णय मन ही मन करना चाहिए । 

क्या आप मेरे साथ भी यही सब करोगे अगर कभी मुझे भी कोरोना से करीब से मिलना हुआ । 

मैडम जी ये क्या आप तो मेरे पास खुद आने की बात कहती हैं । मेरे लिए कोई देश कोई सीमा कोई धर्म किसी भी तरह से कोई अंतर दुनिया के लोगों में नहीं है । मैंने सभी को इक समान समझा है आपने देख लिया है । आपके मन में भी मैं हूं ही कभी आपकी सांस में भी जाने का अवसर मिल जाए क्या खबर । मगर आप घबराना नहीं बस शुद्ध भावना से सच्चे मन से अच्छे इंसान और इंसानियत की बात का निर्णय करना । यही एक ही दवा भी है और बचाव की वैक्सीन भी यही है । 

आप तो रोज़ अपने चैनल पर धर्म की बातों की चर्चा करती रहती हैं । आपने खुद कभी ये बात भी ज़रूर बताई होगी कि जब कोई इंसान सच्चा इंसान बनकर इंसानियत का धर्म अपना लेता है तब उसको मौत का भी कोई डर नहीं छू सकता है । 

अचानक फोन की घंटी बजी और टीवी एंकर की नींद खुल गई । क्या सपना था एंकर ने विचार किया इसको खबर नहीं बनाया जा सकता है । मानो चाहे नहीं मानो , यही उचित जगह है आधी रात को दिखाया जाता है । सोचकर खुश हो गई ऐसा कोई हमारे से पहले नहीं दिखला दे आज ही रात को दिखाने की ज़रूरत है । 
 
 पूरी ग़ज़ल...🥀 अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे मर के भी चैन न पाया  तो किधर जाएँगे तुम ने ठहराई अगर ग़ैर के घर जाने की तो इरादे
 
 

POST : 1281 पत्नी सेवा का पुरुस्कार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    पत्नी सेवा का पुरुस्कार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

     महिला मुक्ति मोर्चा की अध्यक्षा से ये सहन नहीं हुआ , ऊपर जाने के बाद देखा कुछ एक को छोड़ तमाम पुरुष स्वर्ग जाने की कतार में खड़े हैं और इक्का दुक्का को छोड़कर तमाम महिलाओं को नर्क जाने की कतार में खड़ा किया हुआ है । ऊपरवाले के दरबार के बाहर खड़े होकर अपने ऊंचे स्वर में भाषण देना शुरू कर दिया । नहीं हम इस अन्याय को स्वीकार नहीं करने वाली हैं । आखिर ऊपरवाले को उसे अपने पास बुलाना ही पड़ा । कहो देवी आपको क्या अनुचित लग रहा है । महिला मोर्चा की अध्यक्षा ने कहा चलो कोई तो कारण होगा जो आपने फिर हम महिलाओं को नर्क भेजने का निर्णय किया है मगर ये तो बताओ इन सभी पुरुषों ने ऐसा क्या पुण्य कर्म किया जो इनको स्वर्ग इतनी आसानी से मिल रहा है । महिला मुक्ति मोर्चा की अध्यक्षा को उनके सवाल का जवाब जानने को नारद मुनि जी के पास भेजा गया । नारद जी को ये काम कितनी बार करना पड़ता है इसलिए उन्होंने इस को इक कथा का स्वरूप देकर लिखकर रखा हुआ है । हर बार की तरह जब भी कोई नारी उनके पास लाई जाती है उनकी कथा अपने आप शुरू हो जाती है । 

    कलयुग में पत्नी की सेवा भगवान की भक्ति से बढ़कर फलदाई है । अपनी पत्नी की जीवन भर सेवा करने से पिछले जन्म-जन्म के अपकर्मों पापों से मुक्त हो सकते हैं । विवाह के समय हर महिला को इक घर मिलता है जो स्वर्ग बनाया जा सकता और नर्क भी बन सकता है । जिस भी नारी ने अपने घर को स्वर्ग समान बनाया उसे बाद में स्वर्ग मिलता है और नर्क बनाने वाली नारी को नर्क मिलना ही होता है । पत्नी भी अपने पति के लिए जीवन भर सब कुछ करती है लेकिन अपने पति को हर दिन ताने भी मारती है और कहती रहती है मुझे पाकर आपको अच्छी पत्नी मिली है मगर मेरे ही नसीब खोटे हैं जो तुम जैसे को मेरे पल्लू से बांध दिया । इसी से पत्नी के हर दिन अच्छे कर्म भी व्यर्थ हो जाते हैं जबकि पति उलाहने व्यंग्यबाण झेल कर भी हमेशा अपनी पत्नी को खुश करने की कोशिश करते रहते हैं । उनके सभी पाप जुआ शराब और झूठ बोलना भी माफ़ हो जाते हैं और पत्नी सेवा का सबसे बड़ा धर्म निभाने से उनके लिए स्वर्ग के द्वार खुद - ब- खुद खुल जाते हैं । अपने पति का अपमान करने का पत्नी का ये अपराध इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि समाज को दिखाने को वे उन देवियों की उपासना करती हैं जो सीता या पार्वती जैसी पति को भगवान मानती थीं । जबकि खुद उन्होंने अपने पति को इंसान भी समझना नहीं चाहा है । कोई भी पति अपनी पत्नी की सभी इच्छाओं को पूरा नहीं कर सकता है क्योंकि किसी के पास भी कोई अलादीन का चिराग़ होता नहीं है । जो भी पत्नी जितना मिला उसे पाकर और पति से आदर मिलने पर खुश रहती हैं उनको भी स्वर्ग मिलना ही है । लेकिन जिन्होंने जीवन भर अपने स्वर्ग को नर्क बताया उनको वास्तव में नर्क क्या होता है इसे दिखलाना भी ज़रूरी है विधाता के लिए । मगर जब नर्क को देखने के बाद जिस भी नारी को समझ आता है कि उसने अपने को मिले स्वर्ग को नहीं पहचाना था उसको नर्क से मुक्ति मिल जाती है । 
 






POST : 1280 समझ नहीं आती लगती खूबसूरत ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  समझ नहीं आती लगती खूबसूरत ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

  आपने महाभारत सीरियल देखा या नहीं , कुछ देखते हैं कुछ नहीं देखते हैं जो देखते हैं जानते हैं जो नहीं देखते हैं समझते हैं । बात समझ आई आपको ये कोई उलझन नहीं है दो दिन से भगवान कृष्ण कुछ इसी तरह वचन सुना रहे हैं । जो बाहर ढूंढते हैं जो भीतर ढूंढते हैं जो खाते हैं जो खाते नहीं हैं जो जागते हैं जो जागते नहीं हैं जो सोते हैं जो सोते नहीं हैं । कुछ भी नहीं छोड़ा सब की गिनती कर ली इधर भी उधर भी मगर आखिर में मैं ही मैं हूं मुझ पर विश्वास करो और जो भी कहता हूं करो । देखने सुनने वाले गदगद हैं क्या ऊंचे लेवल की बात कहते हैं । माफ़ करना मुझे लगा क्या कोई नहीं है जो जाता और अर्जुन कृष्ण से कहता भाई जो करने आये हो युद्ध का शंख बज चुका है अब इन बातों को करने का समय नहीं है । कहां धर्म युद्ध की बात और कहां कृष्ण कहते हैं मेरे बन जाओ सभी पाप क्षमा सभी अपराध माफ़ । ये तो कोई सत्ताधारी विधायक सांसद को अपने दल में शामिल करते हुए कहता है । हम अपनी बात पर आते हैं ।

  (  आपकी जानकारी के लिए गीता में 18 अध्याय हैं 700 श्लोक हैं , 18 अंक का बड़ा महत्व है महाभारत 18 दिन युद्ध हुआ , पांडव-कौरव के पास 18 अक्षोहिनी सेना थी , ऋषि वेदव्यास ने महाभारत की रचना की जिस में 18 पर्व हैं , महाभारत के युद्ध में 18 सूत्रधार थे जिनके नाम इस तरह हैं , श्रीकृष्ण धृतराष्ट्र भीष्म द्रोण कृपाचार्य शकुनि दुर्योधन दुशासन कर्ण अशव्स्थामा कृतवर्मा युधिष्ठर भीम अर्जुन नकुल सहदेव द्रोपदी एवं विदुर । आश्चर्य की बात है किए महाभारत युद्ध के अंत में 18 लोग ज़िंदा बचे थे 15 पांडवों की रतफ से 3 कौरवों की तरफ से )


( भगवान कृष्ण आखिर में अपना विराट स्वरूप दिखाते हैं जो हर कोई नहीं देख सकता केवल दिव्य दृष्टि से ही देख सकते हैं तब अर्जुन ने दर्शन किये और संजय जो धृतराष्ट्र का सारथी था उसको महृषि वेदव्यास ने दिव्य दृष्टि दी थी जो हस्तिनापुर महल में बैठा युद्ध का हाल सुना रहा देख सकता था । चमत्कार को नमस्कार ये जाने कब से कहा जाता है । कोई ऐसा सीसीटीवी जो बस किसी किसी को दिखाई देता है । )


    ये बीच के दो पहरे रचना की ज़रूरत नहीं हैं तभी इनको कोष्ठक चिन्ह ( ब्रैकेट ) लगा अलग किया गया है । अर्जुन भी हैरान परेशान था और हम भी कृष्ण जी की बात को कब समझ सकते हैं ये भी वो भी दोनों सही भी दोनों गलत भी । सोचो अगर आज कोई देश किसी देश से जंग लड़ने मैदान से आकाश और समंदर में हथियार लिए खड़ा हो और वाहन चालक उसको लंबा उपदेश देकर खुद को सभी कुछ कहलाने की बात करे तो क्या होगा । कथा है और कथा लिखने वाला जब कहेगा कहानी बढ़ेगी अन्यथा रुक कर खड़ी रहेगी ।  ये कोई नई कथा है जो कोई उपदेशक कभी ये कभी वो करने को कहता है और कोरोना से लड़ाई जब जीतेंगे तब जीतेंगे अभी ये ज़रूरी है ।

विश्व में कोरोना से सभी परेशान हैं जनता घर में बैठ महभारत रामायण देख रही है । सरकार चिंतित है रोज़ कुछ न कुछ करती है , खुद भी कुछ करती है कोई नहीं जानता लगता है सब वही करती है । आदेश देती है नियम बनाती है और उसे लागू भी करती है । ताली बजवाती है दिया जलवाती है और हम जो हुक्म मेरे आका कहते हैं कि शायद कोई चमत्कार होने वाला है । कल तीनों सेनाओं ने बहुत कारनामे दिखाए और ये उनका आदर करना था जो डॉक्टर अस्पताल कोरोना के रोगियों का उपचार कर रहे हैं । ये अच्छी बात है मगर कब क्या किया जाये ये कोई नहीं जानता । खुद डॉक्टर्स भी नहीं जानते जो रोगी गंभीर हालत में हैं उनको देखें या अस्पताल के बाहर उस समय का इंतज़ार करें जब फूलों की बारिश होगी । फिर सबको लगा सरकार कितना अच्छा काम कर रही है अब ये भी मुमकिन है सरकार का फरमान जारी हो इक दिन अपनी सरकार की भी जय जयकार करने को सबको कुछ करना है समय दिन और क्या उन्हीं को पता । 
 
मुझे इक घटना याद आई है सच्ची है । अपनी डॉक्टर की पढ़ाई करते हुए एनॉटमी की इक किताब मुझे खरीदनी थी । तब तक वो किताब विदेश से आती थी पहली बार भारत में छपवाई हुई उपलब्ध थी ये इक विशेष अवसर था , मेरे साथ इक दोस्त था जो अब नहीं रहा है 2002 में ही उनका निधन हो गया था । आपको भी कभी ऐसी आदत रही होगी किसी को अपनी कॉपी किताब डायरी पर शुरुआत के पन्ने पर कुछ शुभकामना संदेश लिखने को कहने जैसी । और डॉ बी डी शर्मा ने तब जो लिखा आपको नहीं बताना चाहता क्योंकि बचपन में जिसे दोस्ती कहते हैं आजकल पागलपन समझा जाता है । पूरी ईमानदारी से कहता हूं तब उस दिन मुझे उसकी बात रत्ती भर भी समझ नहीं आई थी , मगर ये भी सच है कि फिर भी मुझे उसकी लिखी बात बेहद खूबसूरत लगी थी । तब मुझे कविता लिखने का शौक था कविता ग़ज़ल कहानी को समझे बिना ही , और जो समझ नहीं आता वो लगता बड़ी महान बात है । तब अपनी डायरी पर मैंने भी लिख दिया था समझ पाया नहीं मगर लगती है खूबसूरत वो बात जो तुमने लिख दी थी मेरी किताब पर । 

बचपन की पुरानी नासमझी की बातें याद करते हैं तो हंसी आती है । क्या सरकार जो भी कहती करती है उन बातों को उस तरह समझे बगैर वाह वाह क्या बात है का शोर मचा सकते हैं । ये कोई कवि सम्मेलन या मुशायरा नहीं है कि ताली नहीं बजाओगे तो सब समझेंगे आपको शेर का अर्थ कविता का मतलब नहीं समझ आया । और कितनी बार देखा है खुद शायर को कहना पड़ता है आपको वहां ताली नहीं बजानी चाहिए थी जब अपने खूब तालियां बजाईं और अब जब बजानी चाहिएं थी नहीं बजाईं । कभी सोचा कभी समझा ये जो हर दिन कुछ भी करने को कहते हैं उनको कभी जो बातें अनुचित लगती थीं खुद सत्ता मिली तो वही सब अच्छी लगने लगीं थी । निराधार बात नहीं आधार की बात है मन की बात नहीं मनरेगा की बात है । मगर क्या कभी उन्होंने स्वीकार किया तब उन्होंने जो कहा था सही नहीं था । महान लोग जब भी जो कहते हैं तब वही सही और वास्तविक सत्य हो जाता है । पिछली बात को अपने इतिहास से मिटा देते हैं । ये उनका युग है उन्हीं का सिक्का चलेगा पुराने हज़ार के पांच सौ के नोट बेकार थे कालिख लगी थी उन पर तभी आते ही गुलाबी हरे भगवा नए नए रंगीन करंसी नोट जारी किये । काला धन गुलाबी बन गया बस गांधी जी को रखना मज़बूरी थी क्योंकि गांधी जी विवशता और रिश्वत का दूसरा नाम बन गए थे । क्या किया क्यों किया कब किया ये सवाल उन पर कोई नहीं दाग़ सकता ये पिछले शासकों पर दाग़ने को सुरक्षित हैं उनके लिए ।

        छोड़ दो जो उनको करना है करने दो हम अपनी इक ग़ज़ल कहते हैं । बाकी कहना नहीं समझना ज़रूरी है समझ नहीं आये तो गीता को पढ़ने को नहीं शपथ उठाने को उपयोग करें ।

            ग़ज़ल  - डॉ लोक सेतिया "तनहा"


ज़माना झूठ कहता है , ज़माने का है क्या कहना ,
तुम्हें खुद तय ये करना है , किसे क्यों कर खुदा कहना ।

जहां सूरज न उगता हो , जहां चंदा न उगता हो ,
वहां करता उजाला जो , उसे जलता दिया कहना ।

नहीं कोई भी हक देंगे , तुम्हें खैरात बस देंगे ,
वो देने भीख आयें जब , हमें सब मिल गया कहना ।

तुम्हें ताली बजाने को , सभी नेता बुलाते हैं ,
भले कैसा लगे तुमको , तमाशा खूब था कहना ।

नहीं जीना तुम्हारे बिन , कहा उसने हमें इक दिन ,
उसे चाहा नहीं लेकिन , मुहब्बत है पड़ा कहना ।

हमें इल्ज़ाम हर मंज़ूर होगा , आपका लेकिन ,
मेरी मज़बूरियां समझो अगर , मत बेवफ़ा कहना ।

हमेशा बस यही मांगा , तुम्हें खुशियां मिलें "तनहा" ,
हुई पूरी तुम्हारे साथ मांगी ,  हर दुआ कहना ।  
 
 50+ जिंदगी पर दो लाइन शायरी, Zindagi Shayari In Hindi 2 Line

मई 03, 2020

POST : 1279 यही ज़िंदगी का चलन अब बना दो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

         यही ज़िंदगी का चलन अब बना दो ( ग़ज़ल ) 

                                     डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

यही ज़िंदगी का चलन अब बना दो
पकड़ हाथ में हाथ नाता निभा दो । 

नहीं अजनबी लोग हैं सारे अपने 
सभी से सभी का तआरुफ़ करा दो । 

कहो अब सभी से डरो मत किसी से 
हरा मौत को ज़िंदगी को जिता दो । 

लड़ेंगे सभी मिल के हर इक लड़ाई 
बदल वक़्त की चाल को भी दिखा दो । 

नई मंज़िलें   ,  रास्ते भी नये हैं 
हैं पत्थर जो राहों में सारे हटा दो । 

निशां तक ख़िज़ा का मिटा दो चमन से 
न मुरझाएं जो फूल ऐसे खिला दो । 

ख़ुशी दर्द "तनहा" सभी मिल के बांटें 
सलीका ये सीखो सभी को सिखा दो ।
 

 

POST : 1278 शोहरत का सर्वोच्च कीर्तिमान ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  शोहरत का सर्वोच्च कीर्तिमान ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

    हर वर्ष वो इक घोषित किया करते हैं सब से अधिक नाम शोहरत किस की है । अभी तो इस वर्ष के चार मास ही बीते हैं मगर पिछले दो महीने में दुनिया में उसी एक नाम का डंका बज रहा है । पिछले सौ साल ही नहीं जब से दुनिया बनी है किसी अन्य का क्या ऊपर वाले का नाम भी दो महीने में इतनी संख्या में नहीं उच्चारित किया गया जितना इस एक नाम ने अपना शोहरत का सर्वोच्च कीर्तिमान स्थापित कर लिया है । विश्व के सभी लोग चाहे ऊपर वाले को अपने अपने अलग नाम से जानते पहचानते हैं इसको एक ही नाम से जानकर हर घड़ी सोते जागते वही नाम ज़ुबान पर रखते हैं । जो नीचे धरती पर पांव नहीं रखते थे और जिनको आकाश भी अपने कद से छोटा लगता था और जो आकाश की ऊंचाई से भी ऊपर उड़ान भरते थे उन सबकी औकात ऐसी हो गई जैसे किसी बड़े ऊंचे पर्वत पर खड़े होकर किसी को ज़मीन पर चलते फिरते लोग कीड़े मकोड़े की तरह रेंगते लगते हैं । सरकार बेशक दूरदर्शन पर रामायण महाभारत से लेकर तमाम पुराने सीरियल अपनी बंद पेटी से निकालकर परोस ये उम्मीद करे कि लोग राम कृष्ण जपने लग जाएंगे ऐसा हुआ नहीं है हर पल हर जुबां पर उसी का नाम दिल में उसी का भय और मन में उसी को समझने जानने की इच्छा है । विश्व भर में लोकमत को आधार समझा जाए तो सभी देशों में वास्तविक शासन उसी का है । सबने स्वीकार कर लिया है उस से अधिक खतरनाक ताकतवर दूसरा कोई नहीं और सभी को मिलकर उसी को हराना है । अब तो नायक महनायक सदी के नायक से राजनीति खेल कलाजगत के भगवान कहलाने वाले सभी उसी की बात करने लगे हैं । फोल्लोवेर्स की संख्या अब कोई महत्व नहीं रखती है चाहने वाले कितने हैं ये मापदंड आजकल पुराना हो गया है दुश्मन और बुराई करने वाले असली पहचान है किसी की शोहरत की । जो लोग समझदार हैं समझ गए हैं जिनको नहीं समझना उनको समझाना व्यर्थ है ।

आप सब कैदी हैं अर्थात गुनहगार होना साबित है । अब ये सोचकर कि आपको किस रंग की पोशाक मिली है हरी संतरिया या सुर्ख लाल खुश या उदास होने की बात नहीं है । पिंजरा सोने का चांदी का या लोहे का हो होता पिंजरा ही है और यहां सरकार की मर्ज़ी है आपको जब चाहे बदले रंग का आदेश जारी कर दे । आपको प्याज़ चुराने की सज़ा मिलनी है पहले आप सौ प्याज़ खाने को आसान समझोगे फिर सौ कोड़े खाने को राज़ी हो जाओगे और आखिर में सौ रूपये जुर्माना भी भरने को मानकर तीनों सज़ा भुगतनी हैं । जिसकी महिमा का गुणगान हो रहा है असली शासक वही है और किसी का उस पर कोई बस नहीं चल रहा है । उसकी मर्ज़ी है जिसे चाहे छोड़ दे जिसे चाहे जकड़ ले ।

क्या ज़माना है कितना बदल गया सब कुछ कभी भगवान को खोजते थे वन पर्वत समाधि लगाकर माला जपकर । अब शोध हो रहा वो कौन है क्या है और उसका सामना कैसे किया जा सकता है । अघोषित ढंग से उसका आधिपत्य सबने स्वीकार कर लिया है क्योंकि उसका कोई अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा किसी को नज़र तक नहीं आया है किधर से कहां चला किस किस देश पहुंच गया है । ये कलयुग है तो कलयुग में कोई ऐसा ही सब का विनाश करने वाला ही खुद को मालिक घोषित कर सकता है । जो बच गए हैं हाथ जोड़कर उसका आभार जता सकते हैं शायद उसे किसी पर कभी दया आ ही जाए । उसकी कथा अभी शुरू हुई है और कितनी लंबी है कब तक चलेगी किसी को नहीं खबर । खबर वाले भी बेखबर हैं जो अपनी शोहरत को लेकर घोषित करते हैं कितने करोड़ दर्शक उनके चैनल को देख रहे थे ये नहीं जानते किसी के सामने उनकी औकात इक तिनके से भी कम है । कोई समंदर से विशाल बनकर खड़ा है आकाश से ऊंचाई पाकर और ये सभी टीवी चैनल राजनेता अभिनेता खिलाड़ी बाबा लोग धर्म उपदेशक इक बूंद भी नहीं किसी हवा के बुलबुले की तरह हैं जिसका क्षण भर का जीवन है । समझ लो और अब छोड़ दो ये झूठे दावे और अहंकार की बातें । कितनी अजीब बात है कुछ साल हुए हैं दुनिया भूल भी गई पांच साल पहले जिस कोरोना का रोना था अब तो समझ रहे हैं किसी का कोई खिलौना था , चूर चूर होना था । फिर भी नाम अमर रहने की ख़्वाहिश कितनों की बाक़ी है ।  बाद ए फ़नाह फज़ूल है नामो निशां की फ़िक्र , जब हमीं न रहे तो रहेगा मज़ार क्या । 

Rahul Tripathi posted on LinkedIn