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मई 16, 2020

POST : 1300 देने वाला एक है मांगत बीस लाख करोड़ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 देने वाला एक है मांगत बीस लाख करोड़ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   कुछ गड़बड़ है देश की आबादी एक सौ तीस करोड़ ही है फिर बीस लाख करोड़ क्या दुनिया भर से लोग आये हैं हाथ पसारे। नहीं ऐसा नहीं है मांगने वाले नहीं हैं बीस लाख करोड़ बंट रहे हैं। किसको कितना मिलता है देने वाला बता रहा है नहीं बता रही भी हैं इंग्लिश में हिंदी में अनुवाद करता है साथ बैठा कोई। ये हिंदी की बारी बाद में यही सच है। टुकड़े टुकड़े दिन बीता धज्जी धज्जी रात मिली , जिसका जितना आंचल  था उतनी ही सौगात मिली। टीवी पर सब मिल रहा है बाहर जाने की ज़रूरत क्या है टीवी के सामने हाथ फैलाओ और ले जाओ। क्या कहते हो टीवी से कैसे मिलेगा सबको ये समझाओ , चलो इधर आओ मंदिर के कपाट भी खुल गये हैं क्या करोगे ज़रा बताओ। भगवान के सामने जाकर जितना है जेब में भावना से चढ़ाओ फिर अपना सीस झुकाओ और आरती गाओ घंटी बजाओ भजन उपदेश सुन लो खुश हो जाओ। आंखें बंद कर भगवान से जितना चाहो मांग लो बिल्कुल नहीं शर्माओ। सामने देखो उधर ऊपर भगवान देवी देवता का हाथ आपको आशीर्वाद देता हुआ नज़र आएगा कितना अच्छा लगा जैसे कह रहे तथास्तु जाओ झूमो नाचो गाओ। ये विश्वास भरोसे की बात है सवालात मत उठाओ जाओ भाई जाओ पीछे लंबी कतार है कदम उल्टे घर को बढ़ाओ। भगवान सब देता है सबको देता है आपकी कमीज़ फ़टी थी झोली कैसे भरती जिनके पास पहनने को नहीं था नंगे बदन थे झोली नहीं थी हाथ पसारे खड़े थे उनको वही मिला जो बड़े लोग होते हैं झोला लेकर आते थे आजकल बड़े बड़े सूटकेस भरवा जाते हैं। भगवान से कोई हिसाब नहीं पूछ सकता किस को कितना दिया क्या क्या दिया कौन खाली हाथ चला गया सबकी झोली भरने की बात सच है आपकी बात झूठी है। बस ये वरदान मिलने की तरह की बात है , देने वाली की हैसियत मांगने वाले की औकात है। राजा बोला रात है रानी बोली रात है मंत्री बोला रात है संत्री बोला रात है ये सुबह सुबह की बात है।

   आपको पहले भी कितनी बार बताया था कुछ भी ज़रूरत हो कोई भी परेशानी किसी की शिकायत हो बस ऐप्प खोलो और जैसे जैसे संदेश मिले हां नहीं भरते जाओ , आपने सही विकल्प नहीं चुना है फिर से वापस जाओ। सही की दबाओ , आपने अधिक समय लगा दिया है अभी और संभव नहीं है बाद में कोशिश करें। भगीरथ कोशिश करने के बाद आपको इक संख्या एसएमएस से मिली है भविष्य में उपयोग करने को। बस अब आपको इंतज़ार करना है जब भी पता करोगे आपकी समस्या विचाराधीन है मिलेगा। फिर इक दिन आपको एसएमएस मिलेगा आपकी समस्या का समाधान किया जा चुका है। अब आपको अपना माथा पीटना बाकी है। किसी भी जगह आपकी कोई बात दिखाई नहीं देगी ढूंढते रह जाओगे। जिन खोजा तीन पाइया गहरे पानी पैठ , मैं बपुरा डूबन डरा रहा किनारे बैठ। कबीर जो का इशारा समझो बहती गंगा में डुबकी लगाओ अब गंगा निर्मल हो गई है। आपको तैरना नहीं आता तो किसी खेवनहार को तलाश करो फिर कश्ती से उस पर आओ जाओ कोई तरीका सोचो कोई जाल बिछाओ। ये नहीं होता तो डूब जाओ भवसागर को पार कर जाओ।

   अपने कहीं कोई कभी भगवान देखा है जो गरीब हो मुझे सभी भगवान बड़े बड़े भवन सोने चांदी के गहने और चमकीले रेशमी लिबास पहने सुबह शाम छप्पन भोग का आनंद उठाते दिखाई दिए हैं। अमीरों के नाम खुदे हैं शिलालेख पर दानवीर और धर्मात्मा का सच्चे भक्त होने का सबूत। ऐसे भगवान को गरीब लोग परेशान क्यों करते हैं अपना कोई और भगवान तराशते जो उनकी तरह भूखा नंगा उनकी व्यथा समझता। ये सरकार भी कहलाती गरीबों की है होती अमीरों की ही है क्या शान है जब जो चाहती है किसी अलदीन के चिराग की तरह मांगने से पहले मिल जाता है कभी भूखी नहीं सोती है पेट भर सोने के बाद ही तो सुनहरे ख्वाब दिखाई देते हैं। दस लाख कभी ख्वाब थे जब इस नाम की फिल्म बनी थी और दस लाख की लॉटरी लगते ही सब बदल गया था। आजकल दस लाख की औकात क्या है जनाब दस लाख का इक इक सूट बनवा पहनते हैं। क्षमा मांगते हुए कवि प्रेम धवन जी से गीत को आधुनिक ढंग से पैरोडी बनाया है क्योंकि यही वास्तविकता है।

चाहे लाख करो तुम बातें बोलो झूठ हज़ार , 

जब तक गरीब नंगे पांव चलते तुम कैसी सरकार। 

साथी संगी अमीरों के तुम कैसी लूट मचा ली , 

आधी आबादी भूखी उसकी थाली है खाली। 

बेबस लोगों के आंसू उनकी आहें तक बेकार , 

इनकी सब उम्मीदों का किया है तूने बंटाधार। 

सबसे ज़्यादा धन दौलत है पास तुम्हारे पर , 

नहीं ख़त्म होती और भूख और पाने की कभी। 

बेघर बेचारों की किस्मत में ठोकरें खाना है , 

झूठे हैं सरकारी आपके दावों के सब इश्तिहार। 

क्या किसी का ईलाज करोगे जनाब खुद जब , 

है आपकी व्यवस्था है लाचार सबसे बीमार। 

आपको शायद नहीं मालूम उनकी चिंता कितनी बड़ी है। लॉक डाउन ने कोरोना को हराया या नहीं उनको बचाया है सच सामने कम आया है और जाने कितना छुपाया और दफ़नाया है। ये बीस लाख करोड़ भी जैसे झूठी माया है कोई समझ नहीं पाया ये क्या जाल बिछाया है। डर है घबराहट भी है सन्नाटा छाया है नहीं पता इतने दिनों में क्या खोया है क्या पाया है। दलील नहीं काम आई अपील करने लगे हैं मगर लोग ख़ामोशी को छोड़ चिल्लाने लगे हैं। ऐसे में आपको दुष्यन्त कुमार की ग़ज़ल सुनाने लगे हैं। 

                दुष्यन्त कुमार जी की लाजवाब ग़ज़ल ( साये में धूप , से साभार )

होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिये , 

इस परकटे परिंदे की कोशिश तो देखिये। 

गूंगे निकल पड़े हैं ज़ुबां की तलाश में , 

सरकार के खिआफ़ ये साज़िश तो देखिये। 

बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन , 

सूखा मचा रही है ये बारिश तो देखिये। 

उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें , 

चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये। 

जिसने नज़र उठाई वही शख़्स ग़ुम हुआ , 

इस जिस्म के तिलिस्म की बंदिश तो देखिये।

  अभी तक सरकार को समझ नहीं आया था मज़दूर और किसान मेहनतक़श लोग देश की नींव होते हैं बिना आधार की अर्थव्यस्था किसी आधार कार्ड से संभलेगी नहीं। 

मई 15, 2020

POST : 1299 जादू है नशा है मदहोशियां ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  जादू है नशा है मदहोशियां ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

खूबसूरती हुस्न अदाएं नज़ाकत इक चिंता बनी रहती है असर कहीं कम नहीं हो जाए । चालीस पार करते ही संवरने की ज़रूरत बढ़ जाती है । कुछ ऐसा ही उनके साथ होता है जिनका शोहरत पाने का ख्वाब सच हो जाता है तो शायर की कही बात याद आती है सताती है तड़पाती है , शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है , जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है । सत्ता के खिलाड़ी को खेल की चिंता से अधिक जीत की हार की चिंता होती है । जब हालात अच्छे होते हैं तब उल्टा फैंका भी सीधा पड़ता है । यहां आपको इक की व्याख्या समझानी ज़रूरी है । गांव के दो चौधरी रोज़ आपस में जुआ खेलते थे , इक दिन उन में से एक अपने घोड़े पर बैठ कहीं जाने को तैयार था कि तभी दूसरा उसके दरवाज़े पर आ पहुंचा । देख कर कहने लगा आज तो बहुत मन था खूब जमकर खेलने का मगर आप तो जा ही रहे हैं चलो किस्मत खराब है कि अच्छी है आज़माने की बात रह गई । सुनकर वो चौधरी बोले भाई चिंता क्यों करते हो बताओ कितना दांव पर लगाना चाहते हैं अभी पल भर में बाज़ी खत्म हो जाएगी । घोड़े पर बैठे बैठे कहने लगे देखो मैं अपना जूता उछालता हूं आप बताना सीधा या उल्टा , नीचे ज़मीन पर जूता जैसे पड़ेगा जीत हार का फैसला हो जाएगा । घर से जाते जाते भी एक चौधरी जीत कर खुश थे और एक हार कर भी खुश थे हसरत बाकी तो नहीं रही खेलने की ।

   ये पुराने समय की बात थी आजकल चौधरी अपने विरोधी की क्या उसके पुरखों तक की पगड़ी उछालते हैं । दाग़ अच्छे बन जाते हैं उनके साथ मिलने से सबसे अधिक दाग़दार उनकी के लोग हैं मगर कहते हैं इधर कोई दस रूपये में दाग़ साफ करता है कोई समझाता है जब कोई आप पर भरोसा करता है तब आपका फ़र्ज़ बन जाता है उसके आंचल को बेदाग़ करने का जिस का आंचल मैला हुआ वो भी कहती है मेरे पास भी है हमने मिलकर इसको बनाया है नंबर वन । पहले आज़माओ फिर विश्वास करो । ये सारा खेल नंबर वन को लेकर है । बीवी कुली हीरो से कितनी फ़िल्में नंबर वन जोड़ कर बनाई गई हैं । खान बंधुओं को लेकर मीडिया बहुत चिंतित रहता था । किसी अभिनेता को तो सदी का महानायक घोषित कर दिया गया है । टीवी चैनल कितने घटिया और बिकाऊ समझे जाने लगे हों रहते सब नंबर वन की दौड़ में शामिल हैं । टीआरपी का नशा पागलपन से बढ़कर मदहोश करता है ।
         
     कोरोना क्या आया तमाम लोगों की धड़कनें बढ़ने लगी हर किसी को जान की चिंता से अधिक किसी जहान की चिंता सताने लगी । अपनी अपनी सबकी परेशानी होती है , जाने कब से उनकी चाहत थी अपनी शोहरत को बुलंदी के शिखर पर पहुंचाने की । क्या नहीं किया और क्या नहीं छोड़ दिया , सबकी चादर को मैली बताने से लेकर जिसकी चादर पर कोई छींटा भी नहीं था उस पर भी तोहमत लगा दी आपने चादर को जस की तस रख दीनी चदरिया किस तरह बचाए रखा जब हम सभी हम्माम में नंगे नहाते हैं सदन में सभाओं में कीचड़ उछालते हैं कोई तो छींटा नज़र आता सच बड़ी निराशा हुई उनको । कोई रैनकोट पहन नहाते हैं खिसियाहट में कह दिया मगर मौनी बाबा मौन रहे । कहते हैं जहां लोग ऐसे चर्चा करते हैं समझदार खामोश रहना उचित समझते हैं , सफाई देने की कोई ज़रूरत ही नहीं जब पूछने वाला खुद आरोप लगाने में ही बेगुनाही का सबूत दे रहा हो । नंबर  वन होने को एड़ी छोटी का ज़ोर लगाया है कभी ऐसे ऐसे काम भी किये जो नेकनामी नहीं बदनाम करने वाले समझे गए । मगर बदनाम होना भी नाम वाला होना होता है ये सोचकर मनमौजी अंदाज़ से ज़िंदगी का लुत्फ़ उठाते रहे ।

   टीवी वाले अखबर को खबर बनाते हैं खबर की खबर नहीं रखते । जाने किस आधार पर घोषणा नहीं करते बल्कि कोई राज़ की बात बताते हैं कि विश्व भर के सभी देश कोरोना को लेकर उन्हीं से सलाह मशविरा करते हैं । साल पहले दावा था उनसे पहले जितने भी इस कुर्सी पर रहे उन सभी से इनकी शोहरत बढ़कर है । अब जब तमाम अटकलें हैं और हज़ारों सवाल हैं जिनका जवाब नहीं है उनके पास और तब सवाल करने पर ही सवाल उठाते हैं । दुष्यन्त कुमार के शब्दों में , हमने सोचा जवाब आएगा , इक बेहूदा सवाल आया है । जाने कोई जादू की छड़ी है जबाब के हाथ लगी , जो दुनिया को कोरोना को लेकर कोई और नहीं दिखाई देता । ये टीवी वालों की काल्पनिक कहानी हो मुमकिन है क्योंकि उनके लिए सब कुछ मुमकिन है अन्यथा हम से अधिक विकसित और आधुनिक देश जो वैज्ञानिक सोच से चलते हैं आस्था भरोसा अंधविश्वास से किस्मत नहीं आज़माते डॉक्टर्स और कोरोना के शोध पर हमसे कहीं अधिक ध्यान देते हैं शोध पर जितना धन ज़रूरी खर्च करने को तैयार हैं भला उनसे क्या सलाह मांग सकते हैं ।
 
 हां ये मुमकिन है उनसे इस बात की राय कोई शासक लेता हो कि कैसे कुछ भी नहीं कर के भी सब कुछ कर दिया और क्या कुछ नहीं कर सकते कहने और समझने का आत्मविश्वास किस तरह से हासिल किया जा सकता है । हमारे हरियाणा की कहावत है , जिसकी खाओ बाजरी , उसकी साजो हाज़िरी । ये नशा ये मदहोशी सब पैसे का खेल है , जिस दिन खेल खत्म पैसा हज़्म । पहला नंबर हमारा है भूख अन्याय बदहाल व्यवस्था से निराश लोगों का समाज  फिर भी इश्तिहार हैं खुशहाली और गौरव की परंपरा है , कथनी करनी अलग अलग हैं महान देश में शासक धर्म की बातें करते हैं राजधर्म नहीं निभाते लूट खसोट को कहते हैं ये सरकारी पॉलिसी है । वो करम उंगलियों पे गिनते हैं ज़ुल्म का जिन के कुछ हिसाब नहीं ।  भारत ख़ुशी को लेकर 140 वें स्थान पर है पिछ्लीये साल 133 वें स्थान पर था अर्थात नीचे गिर रहा है , हरियाणा भला पीछे रहता है सबसे आगे है हताश जनता मदहोश सरकार । 
 
 उम्मीद और जीवन भर की बचत छिन जाने से अमेरिका से निर्वासित लोग हताश, सपना  दुःस्वप्न

POST : 1298 अच्छे दिनों की ढलती शाम के लंबे लंबे साये ( दो व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    अच्छे दिनों की ढलती शाम के लंबे लंबे साये ( दो व्यंग्य ) 

                             डॉ लोक सेतिया 

चाहा कुछ और था मिला कुछ और ये ऑनलाइन खरीदने का नतीजा है । तारीख़ पर तारीख़ जैसे ऐप्प्स ही ऐप्प्स मगर नतीजा वही इंसाफ नहीं मिलता मिलती है नित नई कोई ऐप्प । अच्छे दिन होते ही नहीं है ऐसा नहीं है हमने दादा जी से सुना था कभी बहुत अच्छे दिन थे जब जीने की ज़रूरत की चीज़ें सस्ती हुआ करती थी और इंसानियत की मूल्यों की कोई कीमत नहीं होती थी सिक्कों में ये सब अनमोल होते थे । जब सब कुछ बाज़ार में बिकने लगा तो सरकारी बाबू  से बड़े अफ़्सर तो क्या सांसद विधायक यहां तक किसी हर्षद मेहता ने देश को सबसे ऊंचे पद वाले की कीमत केवल एक करोड़ बताई थी । जनसत्ता के संपादक को कहना पड़ा था कि अगर ये सच है तो उन्होंने अपना ईमान बहुत सस्ते में बेचा है । अब उनकी बात का अर्थ क्या यही नहीं निकलता कि बिकना ही है तो अपना दाम बढ़ चढ़ कर रखना चाहिए । कम कीमत में ज़मीर नहीं बेचना चाहिए आखिर ज़मीर एक ही होता है कितनी बार बेचोगे । कभी समय था समझते थे बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता । मगर कितना बदल गया वक़्त भी इंसान भी अब बिक गये जो वही खरीदार हैं । टीवी अख़बार मीडिया सबने अपने मुहमांगे दाम वसूले हैं आजकल उनके शोरूम हैं जहां क्या नहीं बिकता क्या नहीं खरीद सकते । आज कई साल पहले लिखी रचना याद आई है । ब्लॉग पर है अब फिर से दोहराना चाहता हूं कुछ बदलाव करने के बाद । 

        1                    चुनाव अध्यक्ष का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      हम शांति पूर्वक घर के अंदर बैठे हुए थे कि तभी बाहर से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें आने लगी । श्रीमती जी देखने गई कि इतनी आवाज़ें किसलिये हो रही हैं । और तुरंत घबरा कर वापस भीतर आ गई और कहने लगी कुछ ख्याल भी है कि बाहर क्या हो रहा है । हमने पूछा ये इतना शोर क्यों है , लगता है गली से बाहर का कोई कुत्ता आया होगा , और अपनी गली के सारे कुत्ते उस पर भौंकने लगे होंगे । श्रीमती जी बोली आप बाहर निकल कर तो देखो यहां अपने घर के सामने वाले पार्क में सारे शहर के कुत्ते जमा हो गये हैं और वे एक दूसरे पर नहीं भौंक रहे , जो आदमी उनको भगाने का प्रयास करे उसको काटने को आते हैं । अपना टौमी भी उनके बीच चला गया है , ऐसे आवारा कुत्तों में शामिल हो कर वो भी आवारा न बन जाये , उसको बुला लो । घर से बाहर निकल कर हमने जब अपने टौमी को आवाज़ दी तो पार्क में जमा हुए सभी कुत्ते हमारी तरफ मुंह करके भौंकने लगे । जब हमने देखा कि हमारा टौमी भी उनमें शामिल ही नहीं बल्कि हम पर भौंकने में सब से आगे भी है तो हम घबरा गये । तब हमें कुत्तों के डॉक्टर की बात याद आई कि अगर कभी टौमी कोई अजीब हरकत करे तो तुरंत उसको सूचित करें । हमने तभी उनसे फोन पर विनती की शीघ्र आने की और वे आ गये । आते ही सीधे वे उन कुत्तों की भीड़ में चले गये और उनको देख कर कोई कुत्ता भी नहीं भौंका सब के सब खामोश हो गये । जैसे बच्चे चुप हो जाते हैं अध्यापक को देखकर । हम दूर से देख कर हैरान थे और वे एक एक कर हर कुत्ते को पास बुलाते और उसके साथ कुछ बातें करते इशारों ही इशारों में । हम कुछ भी समझ नहीं पा रहे थे मगर लग रहा था उनको मालूम हो गया है क्या माजरा है । थोड़ी देर बाद डॉक्टर साहब ने आकर बताया कि चिंता की कोई बात नहीं है , आपका टौमी और बाकी सभी कुत्ते तंदरुस्त हैं । आज उनकी एक विशेष सभा है । हमने उनकी फीस दी और उनसे पूछा कि ये कैसी सभा है , ऐसा तो पहले नहीं देखा कभी भी हमने । उन्होंने बताया कि वे कुत्तों की भाषा को समझते हैं और हमें बता सकते हैं कि आज क्या क्या हो रहा है इस सभा में । वे कुत्तों से बातें करते रहे हैं और आज उन सब ने बताया है कि यहां आज शहर के कुत्तों ने अपना प्रधान चुनना है ।

          डॉक्टर साहब ने बताया हमें जो जो भी बातें आपस में कर रहे थे सब कुत्ते । कई कुत्ते चाहते हैं प्रधान बनना और वो अपना अपना दावा पेश कर रहे हैं । आप विश्वास रखें उनमें कोई लड़ाई नहीं हो रही है , हर कोई अपनी बात रख रहा है और सब की बात सुनी जा रही है ।  जिसको भी ज़्यादातर सदस्य पसंद करेंगे वही प्रधान घोषित कर दिया जायेगा , प्रयास है कि चुनाव सभी की सहमति से ही हो । कोई वोट नहीं , बूथ कैप्चरिंग नहीं ,जात पाति , रिश्ते नातों का कोई दबाव नहीं , न ही कोई प्रलोभन , सब खुले आम पूरे लोकतांत्रिक ढंग से हो रहा है । जो बातें उन्होंने देख कर बताई वो वास्तव में दमदार हैं ज़रा आप भी सुनिये ।

                सब से पहले शहर के प्रधान का कुत्ता बोला कि उसको ही प्रधान बनाया जाना चाहिये । जब तुम सभी के मालिकों ने मेरे मालिक को अपना प्रधान चुना है तो तुम सब को वही करना चाहिये , शहर के प्रधान का कुत्ता होने से मेरा हक बनता है प्रधानगी करने का । इस पर कई सदस्यों ने सवाल उठाया कि शहर वाले तो हमेशा प्रधान चुनने में गलती कर जाते हैं और जिसको समझते हैं काम करेगा वो किसी काम का नहीं होता है । प्रधान बनने के बाद सारे वादे भूल जाता है और कुर्सी को छोड़ने को तैयार नहीं होता चाहे लोग न भी चाहते हों । प्रधान का कुत्ता बोला कि मैं ऐसा नहीं करूंगा , जब भी कहोगे हट जाउंगा , मैं कुत्ता हूं आदमी जैसा नहीं बन सकता । तब एक सदस्य ने सवाल उठाया कि तुमने अपना धर्म नहीं निभाया था , जब तुम्हारे मालिक के घर में चोरी हुई थी तब तुम भौंके ही नहीं । प्रधान के कुत्ते ने कहा ये सच है कि मैं नहीं भौंका था लेकिन तुम नहीं जानते कि ऐसा इसलिये हुआ कि प्रधान के घर से जो माल चोरी गया वो माल भी चोरी का था और उसको जो चुराने वाले थे वो भी प्रधान के मौसेरे भाई ही थे । इस पर पुलिस वाले का कुत्ता खड़ा हो कर बोला हम सभी को अपनी सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिये , आजकल चोर चोरी से पहले कुत्ते को जान से मारने का काम करने लगे हैं , हमें पुलिस से रिश्ता बनाना चाहिये ताकि वो हमारी सुरक्षा कर सके । तब एक सदस्य ने कहा क्या हम पुलिस पर यकीन कर सकते हैं , पुलिस खुद चोरों से मिली रहती है । जान बूझकर चोरों को नहीं पकड़ती है , उनसे रिश्व्त लेकर चोरी करने देती है । तब पुलिस के कुत्ते को क्रोध आ गया और वो बोला था , और तुम खुद क्या करते हो । तुम्हारा मालिक जनहित का पैरोकार बना फिरता है और सब से फायदा उठाता रहता है ये क्या मुझसे छुपा हुआ है । इस बीच शहर के बड़े अधिकारी का कुत्ता खड़ा हो गया और बोला आप सभी ख़ामोशी से ज़रा मेरी बात सुनें । जब सब चुप हो गये तो वो पार्क के बीच में बने चबूतरे पर खड़ा हो लीडरों की भाषा में बातें करने लगा । कहने लगा मैं ये नहीं कहता कि मुझे अपना प्रधान बनाओ , मगर जिसको भी बनाया जाये उसको पता होना चाहिये कि हम सब को क्या क्या परेशानियां हैं । हमारी तकलीफों को कौन समझता है , हम केवल चोरों से घर की रखवाली ही नहीं करते हैं , अपने अपने मालिक के शौक और उनका रुतबा बढ़ाने के लिये भी हमारा इस्तेमाल किया जाता है । मालकिन के साथ कार में , उसकी गोदी में , उसके साथ खिलौना बन कर पार्टियों में जाकर हमें कितनी घुटन होती है , और कितना दुःख होता है सब के सामने उसके इशारों पर तमाशा बन कर । हम क्या उसके पति हैं । इसके इलावा हम में बहुत सदस्य ऐसे भी हैं जिनके मालिक न भरपेट खाना देते हैं न ही रहने को पूरी जगह ही । हम बेबस जंजीर में जकड़े कुछ भी नहीं कर पाते । हमें जब मालिक बचाव के टीके न लगवायें और हम बीमार हो जायें , तब खुद ही हमें गोली मार देते हैं ये क्या उचित है । आपको पता है कितने मालिक अपने कुत्तों से पीछा छुड़ाने के लिये उसको दूर किसी जंगल में छोड़ आते हैं भेड़ियों के खाने के लिये । और भी बहुत सारी बातें हैं जिनसे हम अनजान ही रहते हैं । मेरे को यूं भी फुर्सत नहीं है कि प्रधान बन कर ये सब काम करूं , आप किसी को भी अपना प्रधान चुनो मगर वो ऐसा हो जो ये बातें जनता हो समझता हो और इनका समाधान कर सके । सभी कुत्ते तब एक साथ बोले थे कि वो आपके बिना दूसरा कोई हो ही नहीं सकता है । और आला अधिकारी के कुत्ते को प्रधान चुन लिया गया , उसको फूलमाला पहना दी गई ।

      अब फिर उसी बात पर आते हैं जहां से चर्चा की शुरआत हुई थी । इक और रचना भी है । 

     2              जो बिक गये , वही खरीदार हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

कहानी एक वफादार कुत्ते की है । अपने गरीब मालिक की रूखी सूखी रोटी खा कर भी वो खुश रहता । कभी भी गली की गंदगी खाना उसने स्वीकार नहीं किया । वो जानता था कि मालिक खुद आधे पेट खा कर भी उसको भरपेट खिलाता है । इसलिये वो सोचता था कि मुझे भी मालिक के प्रति वफादार रहना चाहिये , उसके सुख़ दुःख को समझना चाहिये । वो दिन रात मालिक के घर और खेत खलियान की रखवाली करता । अचानक कुछ लोग मालिक के घर महमान बन कर आये और उसके कुत्ते की वफादारी को देख उससे कुत्ते को खरीदने की बात करने लगे । गरीब मालिक अपने कुत्ते को घर का सदस्य ही मानता था इसलिये तैयार नहीं हुआ किसी भी कीमत पर उसको बेचने के लिये । तब उन्होंने कुत्ते को लालच दे कर कहा कि तुम इस झौपड़ी को छोड़ हमारे आलीशान महल में चल कर तो देखो । मगर वफादार कुत्ते ने भी उनके साथ जाने से इनकार कर दिया । ऐसे में उन्होंने दूसरी चाल चलने का इरादा कर लिया और कुत्ते से कहा कि तुम रहते तो यहीं रहो , बस कभी कभी ख़ास अवसर पर जब हम बुलायें तब आ जाया करना । हम भी तुम्हें खिला पिला कर दिखाना चाहते हैं कि तुम हमें कितने अच्छे लगते हो । बस यही राजनीति की चाल थी , वे यदा कदा आते और कुत्ते को घुमाने को ले जाते । कभी कोई बोटी डाल देते तो कभी हड्डी दे देते चबाने को । धीरे धीरे कुत्ता उनकी आने की राह तकने लगा , और उनके आते ही दुम हिलाने लगा । इस तरह अब उसको मालिक की रूखी सूखी रोटी अच्छी नहीं लगने लगी और धीरे धीरे उसकी वफादारी मालिक के प्रति न रह कर चोरों के साथ हो गई । जब महमान बन कर आये नेता ही चोर बन उसका घर लूटने लगे तो बेखबर ही रहा । अपने कुत्ते की वफादारी पर भरोसा करता रहा जबकि वो अब चोरों का साथी बन चुका था ।

                आजकल किसी गरीब की झौपड़ी की रखवाली कोई कुत्ता नहीं करता है । अब सभी अच्छी नस्ल के कुत्ते कोठी बंगले में रहते हैं कार में घूमते हैं । मालकिन की गोद में बैठ कर इतराते हैं , और सड़क पर चलते इंसानों को देख सोचते हैं कि इनकी हालत कितनी बदतर है । हम इनसे लाख दर्जा अच्छे हैं । इन दिनों कुत्तों का काम घरों की रखवाली करना नहीं है , इस काम के लिये तो स्कियोरिटी गार्ड रखे जाते हैं । कुत्ते तो दुम हिलाने और शान बढ़ाने के काम आते हैं । जो आवारा किस्म के गली गली नज़र आते हैं वे भी सिर्फ भौंकने का ही काम करते हैं , काटते नहीं हैं । जो रोटी का टुकड़ा डाल दे उसपर तो भौंकते भी नहीं , जिसके हाथ में डंडा हो उसके तो पास तक नहीं फटकते ।

      चुनाव के दिन चल रहे हैं , ऐसे में एक नेता जी अखबार के दफ्तर में पधारे हैं , अखबार का मालिक खुश हो स्वागत कर कहता है धनभाग हमारे जो आपने यहां स्वयं आकर दर्शन दिये । मगर नेता जी इस बात से प्रभावित हुए बिना बोले , साफ साफ कहो क्या इरादा है । अब ये नहीं चल सकता कि खायें भी और गुर्रायें भी । संपादक जी वहीं बैठे थे , पूछा नेता जी भला ऐसा कभी हो सकता है । हम क्या जानते नहीं कि आपने कितनी सुविधायें हमें दी हैं हर साहूलियत पाई है आपकी बदौलत । आप को नाराज़ करके तो हमें नर्क भी नसीब नहीं होगा और आपको खुश रख कर ही तो हमें स्वर्ग मिलता रहा है । आप बतायें अगर कोई भूल हमसे हो गई हो तो क्षमा मांगते हैं और उसको सुधार सकते हैं । नेता जी का मिज़ाज़ कुछ नर्म हुआ और वो कहने लगे कि कल आपके एक पत्रकार ने हमारी चुनाव हारने की बात लिखी है स्टोरी में , क्या आपको इतना भी नहीं पता । संपादक जी ने बताया कि अभी नया नया रखा है , उसको पहले ही समझा दिया है कि नौकरी करनी है तो अखबार की नीतियों का ध्यान रखना होगा । आप बिल्कुल चिंता न करें भविष्य में ऐसी गल्ती नहीं होगी । अखबार मालिक ने पत्रकार को बुलाकर हिदायत दे दी है कि आज से नेता जी का पी आर ओ खुद स्टोरी लिख कर दे जाया करेगा और उसको ही अपने नाम से छापते रहना जब तक चुनाव नहीं हो जाते । सरकारी विज्ञापन कुत्तों के सामने फैंके रोटी के टुकड़े हैं ये बात पत्रकार जान गया था ।
 

             सच कहते हैं कि पैसों की हवस ने इंसान को जानवर बना दिया है । जब नौकरी ही चोरों की करते हों तब भौंके तो किस पर भौंके । भूख से मरने वालों की खबर जब खूब तर माल खाने वाला लिखेगा तो उसमें दर्द वाली बात कैसे होगी , उनके लिये ऐसी खबर यूं ही किसी छोटी सी जगह छपने को होगी जो बच गई कवर स्टोरी के शेष भाग के नीचे रह जाता है । कभी वफादारी की मिसाल समझे जाते थे ये जो अब चोरों के मौसेरे भाई बने हुए हैं । जनता के घर की रखवाली करने का फ़र्ज़ भुला कर उसको लूटने वालों से भाईचारा बना लिया है अपने लिये विशेषाधिकार हासिल करने को । जब मुंह में हड्डी का टुकड़ा हो तब कुत्ता भौंके भी किस तरह । अपना ज़मीर बेचने वालों ने जागीरें खड़ी कर ली हैं इन दिनों । जो कोई नहीं बिका उसी को बाकी बिके लोग मूर्ख बता उपहास करते हैं ये पूछ कर कि तुमने बिकने से इनकार किया है या कोई मिला ही नहीं कीमत लगाने वाला क्या खबर । वो मानते हैं कि हर कोई किसी न किसी कीमत पर बिक ही जाता है । तुम नहीं बिके तभी कुछ भी नहीं तुम्हारे पास , खुद को बेच लो ऊंचे से ऊंचा दाम लेकर ताकि जब तुम्हारी जेब भरी हो तिजोरी की तरह , तब तुम औरों की कीमत लगा कर खरीदार बन सको और ये समझ खुश हो सको कि सब बिकाऊ हैं तुम्हारी ही तरह ।

                         दोनों रचनाओं का सारांश यही है :-

हमने अध्यक्ष का चुनाव क्या सोचकर किया और जो हमारे घर की चौकीदारी को रखवाली को अपना कर्तव्य बताते थे उनको लोभ लालच ने बिकने पर विवश कर दिया है । आजकल पालतू कुत्ते हैं जो दुम हिलाते हैं भौंकना छोड़ काटना भूल गए हैं । 
 
 Shaam Shayari ~ शाम पर शेर

मई 14, 2020

POST : 1297 सोने-चांदी के कलम नहीं लिखेंगे आंसू की दास्तां ( गरीबी की पीड़ा ) डॉ लोक सेतिया

सोने-चांदी के कलम नहीं लिखेंगे आंसू की दास्तां ( गरीबी की पीड़ा ) 

                                     डॉ लोक सेतिया 

जो लिखना चाहता हूं उस असहनीय दर्द की व्यथा कथा को लिखने को अश्कों का इक समंदर चाहिए । पता नहीं जो टीवी पर अपने घर किसी तरह वापस जाते भूखे नंगे गरीब मज़दूर महिलाएं बच्चे सैकड़ों मील का फासला धूप या बारिश जैसा भी मौसम हो जाते नज़र आ रहे हैं उनकी पीड़ा को कोई समझ भी रहा है । उनकी बदहाली को भी टीवी चैनल वाले बताते दिखलाते हैं तब रत्ती भर भी मानवीय संवेदना उनके चेहरे और खबर बताने के ढंग में दिखाई नहीं देती है । दो दिन से तो मोदी जी की भारत सरकार द्वारा की बीस लाख करोड़ की घोषणा की चर्चा से अधिक महत्व किसी और विषय का नहीं का रह नहीं गया है । सरकार के लोग टीवी पर आकर बीस लाख करोड़ का विवरण बताते हुए अपने चेहरे पर गर्व और मुस्कुराहट लिए नज़र आते हैं जिसे देख कर लगता ही नहीं उनको करोड़ों बेबस उन गरीबों की दशा का कोई एहसास भी है । खुद ही अपनी पीठ थपथपाते लगते हैं जबकि जो भी किया गया या किया जाना है वो कोई उपकार नहीं है आपको करना ही चाहिए था और माफ़ करें ये जनता का धन है जनता के लिए ही है कोई महानता की बात नहीं है । क्या हम को अपनी साहूलियत से इस बात को अनदेखा कर देना चाहिए कि कोरोना को लेकर लॉक डाउन घोषित करने से पहले क्यों सरकार को देश की सबसे नीचे की पायदान पर गरीबी रेखा से नीचे के करोड़ों उन मज़दूरों की कोई चिंता नहीं होनी चाहिए थी जो अपने घर से हज़ार मील दूर रोज़ी रोटी की खातिर गए हुए हैं । अगर आप कोरोना की आहत होने के बाद भी नमस्ते ट्रम्प आयोजित करते हैं तो क्यों नहीं काम और सभी अन्य तरह की रोक लगाने से पहले उनकी उचित व्यवस्था करते । घोषणा करने से हुआ कुछ नहीं लोग बेसहारा और मज़बूर होकर अपनी जान हथेली पर रखकर निकल पड़े । 

हमने सुनी हैं दर्द की कहानियां उन से जो आज़ादी के समय बंटवारा होने पर इधर आये उधर से या उधर गए इधर से । मुहाज़िरनामा , मुनव्वर राणा की ज़ुबानी सुनते ही आपकी आंखें अगर नम नहीं होती है तो फिर आप ज़िंदा नहीं हैं एहसास मर चुके हैं । मगर तब हालात और थे नफरत की आग थी दोनों तरफ ही और कोई नहीं जानता था जिधर जा रहे हैं उधर भविष्य क्या होगा । सब कुछ छोड़ या जितना मुमकिन था समेट कर घर नहीं मकान नहीं शहर नहीं बहुत कुछ छोड़ आये थे । जाने कितने साल लगे थे उनको फिर से खुद को खड़ा करने में फिर भी जीवन भर इक तीस चुभती रहती थी जब कोई उनको शरणार्थी कोई मुहाज़िर कह कर बुलाता । आज अपने ही देश में अपने ही घर लौटने में अपनी ही बनाई सरकारों की असंवेदनशीलता ने जो दर्द उनको दिया है वो बंटवारे से बढ़कर है । उस से अधिक खेदजनक बात है देश राज्य की सरकार के साथ बाकी समाज का भी उनको लेकर उदासीन नज़र आना । आपने सोचा नहीं होगा भले जानते हैं कि देश की सड़कें बहुमंज़िला इमारतें आलीशान बाजार जहां जो भी है इन्हीं की मेहनत और पसीने से ही निर्मित हैं । कोई उद्योग कोई विकास इनके बिना नहीं मुमकिन था मगर जब इनको ज़रूरत थी कोई आसरा नहीं कोई दर्द बांटने वाला नहीं मिला । अपनी सबसे अधिक पसंद की गई ग़ज़ल से कुछ शेर यहां उपयुक्त हैं । 

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया


हमको ले डूबे ज़माने वाले ,
नाखुदा खुद को बताने वाले।

देश सेवा का लगाये तमगा ,
फिरते हैं देश को खाने वाले।
उनको फुटपाथ पे तो सोने दो ,
ये हैं महलों को बनाने वाले।

तूं कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं ,
मेरी अर्थी को उठाने वाले।

मैं तो आइना हूँ बच के रहना ,
अपनी सूरत को छुपाने वाले।

उन लाखों लोगों के आंसू भी खुश्क हो चुके हैं उनके चेहरे जाने कैसे अपनी निराशा और बेबसी को छुपाए अपने बच्चों की भूख और पांव के छालों को अनदेखा कर चल रहे हैं । जाने कितने कब कैसे कोरोना से नहीं अव्यवस्था का शिकार हो कर परलोक सिधार गए कोई उसका दोषी नहीं कोई मुजरिम नहीं । आज उनकी मौत कोई हादिसा नहीं कोई समाचार नहीं और कुछ दिन बाद उनके लंबे दर्द भरे सफर की भी कोई बात किसी इतिहास के पन्ने पर दर्ज हुई नहीं दिखाई देगी । उनकी मौत बेमौत मरना उनकी नियति समझी जाएगी और हमेशा की तरह गरीबी अभिशाप है कहकर भूल जाएंगे गरीबी क्यों है । आज बीस लाख करोड़ का पैकेज कोई पहला नहीं है पचास साल से कितनी योजनाओं का नतीजा शून्य रहा है । और ये तो घोषणा गरीबी को मिटाने की है ही नहीं ये तो है अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने की । जिनके पास कुछ है उनको थोड़ा और साथ या सहारा देने की बात है जिनके पास कुछ भी नहीं उनके लिए कुछ है भी नहीं ।

 बीस लाख करोड़ की राशि को बताते हुए टीवी वाले दो के बाद 13 जीरो लगती हैं सुनकर इक बात का ख्याल आया की आज से पांच सौ साल पहले बीस रूपये की कीमत कितनी होती थी । तब नानक को पिता ने बीस रूपये देकर कोई अच्छा कारोबार करने को भेजा था । रस्ते में उनको कुछ भूखे साधुओं की टोली मिली । तब उनको लगा इनको रोटी खिलाने से अच्छा और कोई कारोबार क्या हो सकता है । और उन्होंने सारे बीस रूपये इसी नेक काम पर खर्च कर दिए थे । वो इक अकेले इंसान की बात थी पांच सौ साल पहले । मुझे नहीं लगता आज इतने बढ़े देश की सरकार के बीस लाख करोड़ की कीमत उस से बढ़कर होगी । मगर इन में भी वास्तव में भूखे गरीबों को क्या कब कितना मिलता है विश्वास से कोई नहीं जानता क्योंकि भाषण बहुत सुनते रहे हैं हुआ क्या सामने है । दो और बातें हैं जो बाद में कहनी हैं इक गांव की मुखिया की बेटी ऐश्वर्या की और इक बड़ी पुरानी कविता पंजाबी की ।

                    वतन से इश्क़ गरीबी से बैर और प्यार अमन से ,

                         सभी ने ओढ़ रखे हैं नकाब जितने हैं।





मई 13, 2020

POST : 1296 कोरोना ज्ञान का संदेश है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     कोरोना ज्ञान का संदेश है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

शायद अभी नहीं पहचानोगे समझोगे तभी जानोगे कभी कोरोना की कथा लिखोगे उसका संदेश मानोगे। क्या अभी कुछ सालों से आपको इक कमी नहीं महसूस हो रही थी कि अब तो समाज के पतन की हद हो गई है अब तो कोई समाज सुधारक आना चाहिए। शायद इस से भी आप भी सहमत होंगे कि ये भी साफ लगने लगा था कि इस युग में उपदेश सुनकर लोग नहीं सुधरने वाले। जब उपदेशक खुद अपनी शिक्षा पर नहीं चलते तब गीता बांचने से भला कोई धर्म को आत्मा नश्वर है जैसी बात को समझेगा गीता ज्ञान या कोई भी धर्म उपदेश जब समझाने वाले ही नहीं समझे तो उनका समझाना किस काम का। तभी आधुनिक युग में सुधार लाने को कोरोना जैसा उपाय ज़रूरी हो गया था। नहीं यहां कोरोना को अवतार नहीं घोषित करना है वो क्या है कौन है कोई नहीं समझा तो मुझ जैसे को क्या पता इसलिए मुझे उसे अच्छा या बुरा नहीं साबित करना है बस सोचना है समझना है जानना है कि उसके आने से क्या हुआ है। आज के अध्याय में इसी विषय की चर्चा करनी है। 

कुछ महीने पहले कितनी बिमारियां कितने डॉक्टर नर्सिंग होम अस्पताल शहर शहर रोगी ही रोगी खड़े रहते थे इंतज़ार में। और स्वास्थ्य सेवाओं के लोग जितनी भी भीड़ रहती हो चाहते थे कारोबार को अधिक बढ़ाना। विस्तार में जाना अनावश्यक है कुछ बातों को भूल जाना अच्छा होता है मिट्टी डालो उन सब पर। आज देखते हैं तो लगता है कोरोना को छोड़ कोई रोग नहीं है कोई भीड़ नहीं नज़र आती है। ऐसा नहीं है कि अब वो ठीक हो गई हैं हुआ ये है कि अब समझ आया जिनसे हम घबराते थे वो कोई इतनी भयानक नहीं थीं जितनी ये है। इक बार कोई इंसान भाग्य विधाता के पास गया और शिकायत की कि आपने मुझे इतनी भारी गठड़ी सर पर बोझ बना लाद दी कोई छोटी हल्की होती तो अच्छा था। विधाता उसको लेकर किसी जगह गया जहां बड़े छोटे कितने ही पत्थर रखे हुए थे , और फिर उस इंसान से कहा इन सभी को उठाओ और पढ़ लो किस पर किसका नाम लिखा हुआ है फिर जो भी तुम्हें उठाते हुए छोटा और हल्का लगे उसी पर अपना नाम मुझसे लिखवा लेना। एक एक कर कितने पत्थर उठा कर देखे उन पर किस किस का नाम लिखा है पढ़ कर देखा कोई भी पसंद नहीं आया तभी इक छोटा पत्थर दिखाई दिया मगर जब उसे पलट कर देखा तो अपना नाम लिखा हुआ था। वास्तव में जब तक औरों के दुःख दर्द समझते नहीं तभी तक अपने दुःख दर्द परेशानियां बड़ी लगती हैं जब बाकी दुनिया के दर्द तकलीफ समझते हैं तभी पता चलता है कि हमसे भी बदनसीब और तमाम लोग हैं। हैरानी की बात ये भी है कि अब डॉक्टर अस्पताल नर्सिग होम वाले भी कोरोना से घबराते हैं और नहीं चाहते उनके पास भीड़ जमा हो , खुद ही कहते हैं आपको आने की ज़रूरत नहीं है फोन पर ही सलाह ले सकते हैं। कभी उनको फोन पर खुद बात करने की फुर्सत नहीं होती थी और उनका स्टाफ रोगी को समय पर आने की बात कहता क्योंकि डॉक्टर व्यस्त हैं। 

अब इसी तरह क्या क्या सुधार नहीं हो गया नज़र आता है , पुलिस वाले लोगों को वास्तव में सुरक्षित रखने का फ़र्ज़ निभाने लगे हैं। अब तो वही नेता जो भरी सभा में गोली मारने की बात करते थे आज टीवी पर उसी अपनी सरकार के बीस लाख करोड़  के आर्थिक पैकेज की जानकारी दे रहे हैं। जब तक पानी नाक तलक नहीं आया समझे ही नहीं देश की अर्थव्यवस्था की नैया डोल रही है , जब लगा ये डूबी तो हमें भी ले कर डुबोएगी तब खुद अपनी जान और सबकी जान बचाने की बात समझ आई है। नाखुदा को खुदा कहा है तो फिर , डूब जाओ खुदा खुदा न करो। बड़ी देर कर दी मेहरबां आते आते। कौन कौन नहीं सुधरने लगा है सामने है। गंगा मैली हो गई थी पापियों के पाप धोते धोते अब सब पापी घर बैठे हैं मेरे जैसे तो गंगा कितनी साफ लगने लगी है। जो लोग रात दिन पैसे कमाने में भाग दौड़ में घर परिवार बच्चे जीने का आनंद तक भूल गए थे अब समझने लगे हैं थोड़ा आराम भी कर लें तो सुकून है। बाहर जाने किस किस ढंग का खाना पीना छोड़ अब घर पर बना सब अच्छा लगने लगा है। मुझे याद नहीं कितने समय से कोई दोस्त कोई जान पहचान वाला कोई रिश्ते नाते वाला बिना काम मिलने क्या फोन भी करना याद रखता हो। अब सभी को मिलने की चाहत दिल से होने लगी है और फोन नहीं तो सोशल मीडिया पर बात मैसेज वीडियो कॉल पर ही सही सम्पर्क बना रहता है। 

समाज में और भी बहुत कुछ बदल रहा है मगर ये भी जानते हैं हम सभी कि जैसे सब ठीक होने लगता कभी भी हम वापस अपनी पुरानी आदतों और चाहतों के गुलाम बन जाते हैं। लेकिन अब हर किसी ने समझ लिया जैसे देश की सरकार से विश्व भर की सरकारों ने स्वीकार कर लिया है कि शायद लंबे समय तक या फिर हमेशा हमेशा कोरोना के साथ ही रहना होगा। जब किसी से लड़कर हराना मुश्किल लगता है तब बीच का कोई रास्ता बनाते हैं। जिओ और जीने दो , कोरोना को समझना समझाना होगा हम हारे न तुम जीते मैच बराबरी पर समाप्त करते हैं। 21 ओवर्स 19 ओवर्स 14 ओवर्स अभी कितने और ओवर्स लॉक डाउन के घरों में बैठे टीवी सोशल मीडिया पर दुनिया भर की जंग देखते रहेंगे। लेकिन जैसा लग रहा है कोरोना दुनिया को बदलने को इक संदेश की तरह आया है मगर अभी भी लोग अपने अहंकार और ताकत से सबको डराने लगे हैं कभी किसी को धमकी कभी सबक सिखाने की बात होती है। कोरोना मुमकिन है ऐसे सभी लोगों की हेकड़ी निकलने तक अपना समाज सुधर जारी रखे। 

  आजकल कोई ऐसी बात नहीं करता है कभी फ़िल्मकार कथाकार इक सपना देखा करते थे जब सब अच्छा होगा। फैज़ अहमद फैज़ की नज़्म अकेली नहीं है हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे। नया ज़माना इक फिल्म बनी थी हेमा मालिनी धर्म जी की लिखी किताब से पढ़कर गीत गाती है। कितने दिन आंखें तरसेंगी , कितने दिन यूं दिल तरसेंगे। इक दिन तो बादल बरसेंगे , ए मेरे प्यासे दिल। आज नहीं तो कल महकेगी खुशियों की महफ़िल। नया ज़माना आएगा। ज़िंदगी पर सबका एक सा हक है सब तसलीम  करेंगे , सारी खुशियां सारे दर्द बराबर हम तकसीम करेंगे। नया ज़माना आएगा नया ज़माना आएगा।


शायद यही ढंग हो उस ख्वाब की हक़ीक़त में बदलने का , नया ज़ामना मुमकिन है अच्छे दिन लेकर आये।

POST : 1295 सिक्कों के बाज़ार में इंसान का मोल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 सिक्कों के बाज़ार में इंसान का मोल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    कुछ समझ नहीं आता कहां से शुरू करूं , किसी समय मुझे मेरे पिता जी ने भी पैसे की कीमत इसी तरह समझाई थी। तब सौ रूपये की कीमत बहुत होती थी मुझे कहा था जेब में सौ रूपये हों तो बोतल का नशा होता है। मगर मैं परले दर्जे का मूर्ख पिता जी का समझाया पाठ कभी नहीं सीखा। तभी न मेरी जेब में कभी पैसा रहा और न कभी शराब का नशा क्या होता है मुझे पता चला। देखा है कई लोगों को पैसा आया तो शराब भी पीना भी सीख लिया और लगता है कि उनकी पत्नी भी सोने चांदी की झंकार से शराबी पति को भी बहुत आदर देती हैं भले शराब पीकर वो क्या से क्या हो जाता है। खैर बात आज की है शाम या रात आठ बजे टीवी पर मोदी जी बार बार समझा रहे थे। बीस लाख करोड़ करीब करीब जीडीपी का कितना हिस्सा होता है , साल 2020 में बीस लाख करोड़ किस बजट का कितना भाग होता है। सच बीस लाख करोड़ शब्द कहते हुए उनके चेहरे पर चमक दिखाई देती थी। उनके आने से जो आ जाती है चेहरे पर रौनक वो समझते हैं बीमार का हाल अच्छा है। तो हमारे चारागर को ईलाज समझ आ गया था कोरोना कोरोना का रोना छोड़ ये हिसाब लगाओ बीस लाख करोड़ में कितने ज़ीरो लगते हैं और 130 करोड़ के हिस्से में कितना पैसा आएगा। नहीं कोई जुमला नहीं ये सच है आपके बैंक खाते में नहीं मगर आपके ही नाम पर इनकी बंदरबांट होगी। 

कहते हैं हर बात का कहने का सही वक़्त होता है मुझे तो ये जले कटे पर नमक छिड़कना लगा शायद किसी को पसंद आई हो ये बात। जाने कितनी फिल्मों के डायलॉग याद आने लगे , सबसे मशहूर डायलॉग कितनी फिल्मों में अमीर बाप गरीब लड़के को खाली चेक देकर कहता इस में जितनी चाहे कीमत भर लो अपनी मगर मेरी बेटी को छोड़ दो। दामिनी फिल्म में एडवोकेट चड्ढा बताता है उसका मुवकिल पांच लाख दे रहा है इक लड़की की कीमत इतनी कम नहीं है। नायक कहता है इसे भड़वागिरी कहते है कानून की दलाली से इज़्ज़त की नीलामी तक पहुंच गए। खैर पैसा बोलता है तो अंदाज़ यही होता है अमेरिका पाकिस्तान को ही नहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन तक को हड़काता है सहायता देने को बंद करने की धमकी या कारनामा। ये कोई ताकत नहीं कमज़ोरी होती है। राज्य सभा की सीट कहते हैं कीमत देनी पड़ती है अमीरों की बात है। हम लोग कभी अपनी जान की कीमत नहीं लगवाते हैं और सरकार भी आम आदमी की जान की कोई कीमत नहीं समझती है। जाने किस फिल्म की बात है नायक खलनायक का पैसों से भरा बैग खोलकर नोटों की बारिश कर देता है और उस खलनायक के सभी साथी नोट झपटने में लग जाते हैं। 

राजनीति का सच यही है सभी किसी न किसी दाम पर बिकने को तैयार हैं। टीवी चैनल मीडिया वाले तो शर्मसार भी नहीं होते ज़मीर बेचने को कोई अच्छा सा नाम दे देते हैं। सभी जानते हैं पैसा सबसे अधिक वैश्या के पास होता है ये भी सच है कि राजनीती और वैश्यावृति इक जैसे धंधे बताये गए हैं। कितनी फिल्मों में यही देखा भी है मगर मुझे पाकीज़ा फिल्म की मीनाकुमारी की बात अलग लगती है। जिसने उसको पाला पोसा जब पता चलता है रईस नवाब साहब अपनी बेटी को छीनने आने वाले हैं तो लखनऊ चली जाती है उसे लेकर। मगर उसे जन्म देने वाली मां भी मीनाकुमारी का ही निभाया किरदार है जो जीते जी खुद कब्रिस्तान चली जाती है। लखनऊ में जाकर शानदार बंगला गुलाबी महल खरीद कर मीना कुमारी की परवरिश करने वाली बाई बड़े धनवानों के सामने उसका मुजरा नाचना गाना करवाती है , साहिब जान लखनऊ की शान बन जाती है। 

   मोदी जी के बाद टीवी पर बारी थी नितिन गडकरी जी टीवी पर साक्षात्कार दे रहे थे , यकीन मानिये कोई दर्द का चिंता का भाव नहीं दिखाई दिया। क्या मुस्कान है जान कुर्बान करने के काबिल। शायर का कहना याद आया , क्या बात है कि अमीरों के घर मौत का दिन भी लगता है त्यौहार सा। मगर ये कोई बड़े छोटे लोगों की मौत का मातम नहीं है मातम होना चाहिए था कोरोना का और आपने कोरोना से हार मान ली उसे साथ लेकर जीना मरना है। सुना था कफ़न में जेब नहीं होती और सिकंदर भी जब दुनिया से गया दोनों हाथ खाली थे। ये किस अवसर की बात करने लगे आप हद है। मुझे आज भी याद है इक दोस्त जो मेरी तरह डॉक्टर भी है और लेखन भी करते हैं मुझे फोन पर अपनी पहचान इस तरह से बता रहे थे , मेरे नर्सिंग होम में कितने बिस्तर हैं एक्स - रे भी तीन है और जाने क्या क्या। मगर मुझे उनकी किताब मैगज़ीन बिकवानी नहीं आती थी ये साफ मना किया तो बुरा मान गए। नहीं मुझे नहीं आता किसी से भी चंदा मांगना ये आदत है इसी पर तकरार करने लगे। मेरी हैसियत जो भी है खैरात नहीं चाहिए किसी भी नाम से। मैंने बहुत ऐसे गरीब लोग देखे हैं जिनके पास पैसे के सिवा कुछ भी नहीं। मगर मेरा पागलपन देखिये मैंने अपनी नयी ग़ज़ल उन्हीं की बात पर कहकर उन्हीं को भेजी भी थी। ग़ज़ल कहते हैं समझ गए होंगे। ग़ज़ल ये है :-

 

कैसे कैसे नसीब देखे हैं  ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कैसे कैसे नसीब देखे हैं ,
पैसे वाले गरीब देखे हैं।

हैं फ़िदा खुद ही अपनी सूरत पर ,
हम ने चेहरे अजीब देखे हैं।

दोस्तों की न बात कुछ पूछो ,
दोस्त अक्सर रकीब देखे हैं।

जिंदगी को तलाशने वाले ,
मौत ही के करीब देखे हैं।

तोलते लोग जिनको दौलत से ,
ऐसे भी कम-नसीब देखे हैं।

राह दुनिया को जो दिखाते हैं ,
हम ने विरले अदीब देखे हैं।

खुद जलाते रहे जो घर तनहा ,
ऐसे कुछ बदनसीब देखे हैं। 

 

मई 12, 2020

POST : 1294 कुछ कहना है खामोश हैं सभी ( सन्नाटा ) डॉ लोक सेतिया

  कुछ कहना है खामोश हैं सभी ( सन्नाटा ) डॉ लोक सेतिया 

   यूं तो महफ़िल सजी है कितनी रौनक नज़र आती है मगर हर कोई मिलता है तो इक नज़र देख कर पास से गुज़र जाता है। इक सन्नाटा सा छाया हुआ है कोई सरसराहट भी नहीं किसी के कदमों की आहट तक सुनाई नहीं देती है। शायद कोई अनहोनी घटना घटी हो या कोई बड़ा जादूगर आया और सबको अपने जादू से सम्मोहित कर चला गया पत्थर बना कर जो चलते फिरते हैं किसी जादू के खिलौने की तरह। जादूगर फिर वापस आएगा और सबको मुक्त करवा देगा मदहोशी से अपनी छड़ी से। ठीक होने के बाद सभी को कुछ भी याद नहीं रहता कितने साल से हम किसी की कठपुतली बने हुए हैं। ऐसा लगता है देश के नागरिक अहिल्या की तरह किसी श्राप से शिला बन गए हैं और किसी राम के आने तक निर्जीव संवेदना रहित होकर रहना नियति है। कोई राम नहीं आएगा कोई और अपने जादू से फिर से जीवन भर दे अगर नसीब अच्छा है। 

    लोग फिर सम्मोहन का शिकार हो जाते हैं , जादूगर अपनी जादूगिरी दिखलाते हैं। लोग पीते हैं लड़खड़ाते हैं दिल की दुनिया के ग़म भुलाते हैं। एक हम हैं जो तेरी महफ़िल में प्यासे आते हैं प्यासे जाते हैं। तुम बताओ तुम्हारी दुनिया है क्यों खुदा कोई खुद ही बनाते हैं सब इसी बात से परेशां हैं रहबर क्यों कारवां लुटवाते हैं। आप पंडित नहीं मौलवी भी नहीं आप सरकार हैं आते जाते हैं काम की बात कभी नहीं करते जाने क्या राज़ है छुपाते हैं। आपने बात जो बताई है सुन रखी है और सुनाई है मेरा है आप जो समझते हैं सच कहें चीज़ वो पराई है। आज कुछ और बात करते हैं कभी कोई और बात कहते थे , हर किसी को यही कठिनाई है क्या क्या बात क्यों बनाई है। आपको तालियां ही भाती हैं सवाल सुनते ही तिलमिलाते हैं खुद को समझ बैठे हैं नहीं जो धोखा देते हैं मुस्कुराते हैं। आपको सभी को जगाना था आप तो खुद ही किसी गहरी नींद में हैं और सपनों के आकाश में उड़ते फिर रहे हैं । आप भी हैं और हम भी मुसाफ़िर हैं भौर हुई , चाय पीते पिलाते हैं। राजधर्म किस तरह निभाते हैं लोग भैंस के सामने बीन बजाते हैं। रावण महाराज भी आजकल रामकथा गाकर सुनाते हैं।

    यही आजकल का निज़ाम है असली सवाल पर चर्चा नहीं करते हैं। बेसिर पैर की बातें बनाते हैं सुनाते हैं। आप इंसान हैं या कोई इश्तिहार हैं क्या क्या गज़ब ढाते हैं। सच कहें आप बड़े झूठे हैं फिर भी हमको बहुत लुभाते हैं। आपको देखते ही रहते हैं लोग क्या अंदाज़ है क्या खूबसूरत अदा है सभी हैरान रह जाते हैं। हमने माना सबसे बड़े जादूगर हैं आप सभी को दिखाई देता वही जो दिखाते हैं। करिश्मा है अजब लोग जानते हैं ये जादू धोखा है फिर भी धोखा खाने चले आते हैं। कितने जादू टोने कितने मंत्र आपने दिए हैं काम कोई वक़्त पर नहीं आते हैं। लूटते हैं सभी लुटते हैं और मसीहाई यही है समझा जाते हैं। अपने खूब बनाया बहाना  है कोई नहीं आपका ठिकाना है फिर मिलेंगे अभी चलते हैं मज़बूरी है नहीं बहाना है शाम ढल गई घर भी जाना है। आपके बिन नहीं दिल लगता क्या करें ज़ालिम बहुत ज़माना है , आशिक़ी है कहते हैं  जिगर मुरादाबादी इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। आशिक़ महबूबा चांद तारों खूबसूरत नज़ारों की बातें करते हैं उनको वास्तविकता को छोड़ ख्यालों की दुनिया अच्छी लगती है। उनके पास तर्क की कोई बात नहीं होती बस चाहत ने अंधा बना रखा होता है। सत्ता का भी यही हाल है सत्ताधारी को हक़ीक़त देखना पसंद नहीं होता है चाटुकार सच नहीं देखने देते झूठा गुणगान करते हैं और अपने महिमामंडन से इंसान खुद को मसीहा समझने लगता है।


  देश और राज्य की सरकारों के नैतिक पतन की कोई सीमा नहीं है जब आजकल लोग आपदा से पीड़ित हैं इनको अपने खज़ाने भरने की पड़ी है। मैंने कहीं पढ़ा कि जब किसी देश के माहमारी आपदा होती है तब शासक को अपने खज़ाने भरने की नहीं खज़ाने को बांटने की बात करनी होती है। शायद आपको लगेगा कि ये कैसे मुमकिन है तो खोजना आपके धर्म की किसी किताब में शासक का यही धर्म बताया है। इक जानकर से बात की तो उन्होंने इस को ज़रूरी भी और उचित के साथ संभव भी है बताया। उनके पास समझाने को आसान ढंग था , देश के बीस प्रतिशत रईस लोग अगर अपनी जमापूंजी का पांचवा नहीं दसवां भाग भी गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को दान नहीं उनका अधिकार समझ कर सौंप देते हैं तो उनकी हालत एक साल से दो तीन साल में सुधर कर मध्यम वर्ग जैसी हो जाएगी। क्योंकि उनके पास जो ज़रूरत से अधिक दौलत है वो गरीबों की हक की मेहनत की कीमत नहीं देने से ही होती है। शोषण किये बिना संभव नहीं इतना ज़मीन आसमान का अंतर होना। लेकिन यही अमीर अपने पास जमा पूंजी को घटने से चिंतित होते हैं मगर देश की सरकार उनको अनुचित सहयोग देने की जगह उन्हें आदेश दे सकती है कि आप ऐसा करेंगे तो आपको अगले साल दो तीन आयकर नहीं भरना पड़ेगा। सरकार को कुछ भी देना नहीं है केवल लेना नहीं और जिनसे लेना उनको वही गरीबों को देने का निर्णय लागू करवाना है। मध्यम वर्ग को कोई अनुदान नहीं देने की ज़रूरत मगर बदहाली में उनसे तमाम तरह के कर वसूलना छोड़ सकते हैं विपदा खत्म होने तक। यकीन करें बड़े छोटे आसान कदम उठाकर देश की तीन चौथाई जनता की हालत सुधार सकते हैं।

   मगर सरकार कभी ऐसा नहीं करती है क्योंकि पहली बात तो उनकी अवधारणा अर्थव्यवस्था की उल्टी है जो सबको बराबरी पर लाना नहीं चाहती अमीर को अमीर गरीब को और गरीब बनाने का काम करती है। दूसरी सबसे अनुचित बात सरकार सत्ताधारी नेताओं अधिकारी लोगों का खुद पर रहीसाना ढंग से जीने को कितनी तरह की सुविधाओं को वीवीआईपी लोगों के लिए उपलब्ध करवाने का लूट और आमनवीय तौर तरीका बना लिया गया है जिसको छोड़ना नहीं चाहते। अगर इनमें थोड़ी भी मानवीय संवेदना रत्ती भर भी मानव धर्म का भाव बाकी है तो इनको खुद देश के औसत नागरिक की आय के बराबर वेतन लेकर देश और समाज की वास्तविक सेवा करने का आदर्श दिखाना चाहिए। और इस के लिए उनके पास कोई कमी नहीं हो सकती है इतना सब है देश के संसाधन और विरासत में मिले तमाम अन्य साधन। देश की जनता ने हर बात मानी तब भी सरकारी हिसाब और आंकलन गलत साबित हुआ। अब कहने लगे लोग क्या चाहते हैं बताएं हम लॉक डाउन करें या कैसे खोलें। जनाब पहले नहीं सोचा न ही पूछा था बस जब मर्ज़ी जैसा निर्णय किया और अंजाम नहीं समझा सोचा न ही वही फिर से दोहराना बंद किया।

शायद आज इक नीति- कथा की बात करना भी अनुचित नहीं होगा। जिनको धर्म ईश्वर और अच्छाई बुराई के फल आदि पर भरोसा है उनको सोचना होगा इस कथा के अनुसार शासक का अधिक लोभ लालच ही कारण होता है देश में कुदरत के नराज़ होने का। धर्म की किताब में भी लिखा है शासक के अनुचित कर्म आचरण की सज़ा देश राज्य की जनता को मिलती है। आखिर जनता का दोष है किस को शासक बनाती है।  

 

मई 11, 2020

POST : 1293 समझौता कोरोना से कर लो ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  समझौता कोरोना से कर लो ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

            " ये खैरखाह ज़माने ने तय किया आखिर , नमक ही ठीक रहेगा जले कटे के लिए। " 

   गुरूजी आर पी मह्रिष जी का शेर है। जनाबेआली समझा रहे हैं अब दर्द की दवा यही है दर्द सहना होगा। दर्द के साथ जीने की आदत डालनी होगी। कब तलक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहोगे , भला ऐसे भी कोई राज करने का मज़ा है। बहुत हाल चाल जान लिया तसल्ली दे दे कर थक गए अब भूखे भजन न होये गोपाला। सरकार को कर चाहिए कर देने को आपको कारोबार करना होगा बहुत कारोबार अपनी ज़रूरत को किया अब देश की तिजोरी खाली होने को है वही नहीं भरी तो सत्ता का हासिल क्या है। कभी विचार ही नहीं किया था राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों ने कि जनता नहीं है सरकार के भरोसे , सरकार का वजूद ही जनता के सहारे है। चलो पता चला सेवक सेवक होता है मालिक मालिक रहता है। 45 दिन में टें बोलने लगे लोग 72 साल से हिम्मत नहीं हारे हैं। उनको यही लगता था जनता ज़रूरी  है शासन करने को लोग होने चाहिएं और वोट देने को भी जनता की ज़रूरत आमदनी को भी होती है इसकी कल्पना नहीं की थी। अब तो बात आशिक़ी जैसी बन गई है तुम बिन जीवन कैसा जीवन। हम तुमसे जुदा हो के मर जाएंगे रो रो के।

    सरकार ने घोषित किया है ये ऐसा दुश्मन है जिसे घर मैं बंद रहकर भी घर से निकाल नहीं सकते। जैसे कोई अपने प्यार को दिल से निकाल नहीं सकता चाहे साथ हो चाहे दूर हो। जान का दुश्मन है जिसे अपनी जान समझ बैठे हैं अजीब बात है कोरोना क्या क्या रंग दिखलाता है कभी ताली कभी थाली कभी दिया कभी कोई और बात लगता ही नहीं रोग है या कोई संजोग है। शायर बशीर बद्र जी का कहना है आखिर कोई कब तक लड़ेगा। परिवार अदालत सरहद की जंग ये सिलसिला कभी खत्म नहीं होता है। आखिरकार समझौता ही रास्ता बचता है। साथ ये भी समझाते हैं कि दुश्मनी करते समय उस सीमा तक नहीं पहुंचना चाहिए कि बाद में आंख से आंख मिलाना मुश्किल हो। जो कभी लड़ने को छोड़ कुछ भी नहीं सीखे किसी को नहीं छोड़ा कोरोना से लड़ाई से ऐसे भागने की बात कहने लगे हैं। 

        दुश्मनी का सफर एक कदम दो कदम , तुम भी थक जाओगे हम भी थक जाएंगे। 

   दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे ,जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिन्दा न हों।

     दुनिया में सब किसी की पसंद का नहीं हुआ करता। पसंद नापसंद दोनों तरह के लोग माहौल चीज़ें गांव शहर रास्ते आदमी रिश्ते नाते होते हैं। पहले सभी सब कुछ बदलने की कोशिश करते हैं फिर ऐसा भी होता है कि जिनको बदलना था खुद उन्हीं जैसे हो जाते हैं , या जो न बदलते हैं न ही बदलना चाहते हैं हालत को देख कर समझ कर समझौता कर लेते हैं। टकराव आखिर कब तक हर कोई थक जाता है।  आखिर बड़े बड़े शूरवीर घुटने टेक देते हैं हार नहीं मानते मगर शांति समझौता करने की बात होने लगती है। चीन पाकिस्तान आतंकवाद से हम रोज़ लड़ते हैं रोज़ मिल बैठते हैं , सयाने लोग कहते थे बीच का रास्ता बनाए रखना चाहिए ज़िद करके रूठे हैं तब भी मान जाने की उम्मीद कायम रखनी चाहिए और जब कोई मनाने आये तो मान भी जाना चाहिए। इतनी जल्दी हार मानने की उम्मीद तो नहीं थी जैसे सरकार ने सीना ठोककर कहा था कोरोना को हराना ही है चाहे कुछ भी हो। दो महीने भी नहीं हुए और सरकार ने झुकने का निर्णय कर लिया है देश की जनता का हौंसला कायम रहता है उसे कितनी तरफ से किस किस ने घेरा हुआ है सबसे लड़ती रहती है हर पल उसकी जंग किसी जद्दोजहद की तरह चलती रहती है। राजनेताओं को केवल एक ही लड़ाई लड़नी आती है चुनावी जंग में उनको कोई रोक नहीं सकता है सत्ता लुभाती रहती है।

      इक कहानी याद आई है इक नगर के शासक को सूचना मिली कोई बदमाश नगर भर को परेशान करने लगा है। अपने सिपहसलार को कहा उसको आदेश भेजो दरबार में हाज़िर हो अभी , हवालदार आदेश देकर वापस लौट आया मगर बदमाश ने कोई जवाब नहीं दिया। उसके बाद दरोगा को जाकर पकड़ने का आदेश जारी किया गया मगर दरोगा का हुक्म नहीं माना बदमाश ने कह दिया जाओ नहीं चलता साथ। दरोगा अकेला हाथ में डंडा पकड़े समझ गया जान है तो जहान है आकर बताया जनाब मुझसे नहीं पकड़ा गया। अब सिपहसलार खुद साथ अपनी सेना लेकर बदमाश को सबक सिखाने पहुंचा मगर अकेला बदमाश दस पर भारी पड़ने लगा जाने क्या क्या हथियार लिए थे जो शहर के शासक के पास नहीं थे। आखिर शासक को बदमाश को समझौता करने को शांतिवार्ता को किसी की मध्यस्ता से मिलना पड़ा। जब आमना सामना होता है तब कोई छोटा बड़ा नहीं होता है जो जीता वही सिकंदर होता है। सरकार ने अभी तक सोचा भी नहीं था कि कोई छोटा सा जीवाणु उसको विवश कर सकता है हारने की तो बात सपने में नहीं थी दुनिया को जीतने का भरोसा था। जल्द समझ गए ये कोई चुनाव नहीं है जो किसी भी तरह जीत लेंगे और नहीं जीत सके तब भी जोड़ तोड़ खरीद फ़रोख़्त से अपनी सरकार बनवा लेंगे। यहां खुद को चाणक्य होने का दावा करने वाले भी खामोश हैं उनको सब जानकारी सबको समझानी ज़रूरी लगती थी अब कोरोना शब्द बोलते ज़ुबान लड़खड़ाने लगती है।  सवाल कोरोना का होना नहीं है सवाल सरकार का सरकार होना है।

       सुदर्शन फ़ाक़िर की ग़ज़ल है।


आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यों है , ज़ख्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यों है।

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी , अपनी नज़रों में हर इक शख़्स सिकंदर क्यों है।

जब हक़ीक़त है कि हर ज़र्रे में तू रहता है , फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यों है। 

ज़िंदगी जीने के काबिल तो नहीं अब फ़ाकिर , वर्ना हर आंख में अश्कों का समंदर क्यों है। 

क्या बदनसीबी है कि जब लोग जीने से तंग आकर मौत का भी सामना करने को तैयार होते हैं , फ़रमान जारी किया जाता है जीने के लिए। ये भी कोई जीना है डर डर कर हर पल मौत को देखना , इक बार मरना मुश्किल नहीं ये बार बार नहीं मरना चाहते लोग।

   जाते जाते अपनी इक ग़ज़ल भी पेश करता हूं :-

हमको जीने की दुआ देने लगे ,
आप ये कैसी सज़ा देने लगे।

दर्द दुनिया को दिखाये थे कभी ,
दर्द बढ़ने की दवा देने लगे।

लोग आये थे बुझाने को मगर ,
आग को फिर हैं हवा देने लगे।

अब नहीं उनसे रहा कोई गिला ,
अब सितम उनके मज़ा देने लगे।

साथ रहते थे मगर देखा नहीं ,
दूर से अब हैं सदा देने लगे।

प्यार का कोई सबक आता नहीं ,
बेवफा को हैं वफ़ा देने लगे।

कल तलक मुझ से सभी अनजान थे ,
अब मुझे मेरा पता देने लगे।

मांगता था मौत "तनहा" रात दिन ,
जब लगा जीने , क़ज़ा देने लगे। 

        ( ग़ज़ल लोक सेतिया "तनहा" )

 



मई 10, 2020

POST : 1292 आपका बही-खाता झूठ का पुलिंदा ( देशसेवा के नाम पर लूट ) डॉ लोक सेतिया

   आपका बही-खाता झूठ का पुलिंदा ( देशसेवा के नाम पर लूट ) 

                                 डॉ लोक सेतिया 

    अगर अभी भी हमने नहीं समझा तो फिर शायद कभी भी नहीं समझेंगे। कृपया एक फरवरी के मोदी सरकार के बजट के निर्मला सीतारमन जी के भाषण को फिर से सुन लो। भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने को तैयार है। मगर देश के सामने संकट आया और लॉक डाउन में जब एक सौ तीस करोड़ लोग सरकार के कहने पर अपने काम धंधे छोड़कर घर में बैठे हैं और जैसे भी हो अपना गुज़र बसर कर रहे हैं तब ये देख कर हैरानी से बढ़कर शर्मिंदगी होती है कि देश और राज्यों की सरकारें जनता से दान में मांगने और पीएम केयर से लेकर तमाम अन्य कितने ही ढंग से धन जुटाने के बावजूद 45 दिन बाद ही अपने कर्मचारियों को वेतन भी समय पर नहीं दे पाने की हालत में हैं। आपको जान है तो जहान है का उपदेश देने वालों की जान आफत में आने लगी दो महीने जनता से कर नहीं मिल पाने से और बात बदल गई अब जान भी जहान भी। मगर जान किसकी आम नागरिक की जान तो होती ही है राजनेताओं के इशारों पर मरने मिटने को। जान की कीमत है तो देश के खज़ाने का तीन चौथाई भाग इस या उस तरह अपने पर खर्च नहीं लूट कर बर्बाद करने वाले मुट्ठी भर अधिकारी नेताओं या कुछ खास रसूख वाले धनवान लोगों के कभी नहीं भरने वाले भूखे पेट और हमेशा और अधिक जमा करने को व्याकुल उनकी तिजोरियां जो देश की आबादी का बीस फीसदी लोग भी नहीं हैं। मगर अभी भी आठ हज़ार करोड़ से अधिक मूल्य के दो जहाज़ केवल दो लोगों की सुविधा की खातिर खरीदने से संकोच नहीं हो रहा है। ये अंधेर नगरी चौपट राजा की ही बात है। 

       देश की आज़ादी के बाद से ये लूट की व्यवस्था और भी बेशर्म होती गई है और भाजपा सरकार जो पिछली सभी सरकारों को लूटने वाले घोषित करती रही है उस ने सबसे अधिक लूट मचाई है। किसी भी प्रधानमंत्री ने अपने ऐशो आराम और शानो शौकत पर इतना धन बेतहाशा खर्च नहीं किया है। जाने ये किस तरह की ईमानदारी है जो पिछली सभी दलों की सरकारें अपने दल के लिए अकूत धन वैभव नहीं जमा कर सकीं और भाजपा की मोदी सरकार पांच साल में ही पांच सौ से सात सौ करोड़ से दो एकड़ ज़मीन पर भव्य अतिआधुनिक पार्टी का शानदार दफ़्तर 1. 70 लाख स्केयर यार्ड में रिकॉर्ड समय में निर्माण करवा लिया। मोदी जी ने 92  देशों की सैर 55 महीने में की जिन पर 2021 करोड़ खर्च किये गए ये खबर आप इंडिया टुडे पर पढ़ सकते हैं जो कि औसत हर देश की यात्रा 22 करोड़ खर्च हुआ। इतना ही नहीं भाजपा सबसे अमीर राजनैतिक दल बन गई और चुनाव पर सबसे अधिक धन उसी ने खर्च किया। अगर इनके साथ मोदी जी के देश भर में अपने दल या किसी अन्य गैरसरकारी आयोजनों पर हुए खर्च को भी जोड़ लें जिसका शायद कोई हिसाब किताब आंकलन ही नहीं संभव होगा तो देश को इन खुद को सेवक चौकीदार बताने वाले के एक एक मिंट की कीमत कितने लाख अदा करनी पड़ी बताना आसान नहीं है। ये सब बताने का मकसद है कि आज भी भाजपा दल के पास कितना धन है कोई नहीं जानता है मगर इस में कोई संदेह नहीं कि अगले सौ साल तक भी उसकी झोली थैली भरी रहेगी। मगर देश का खज़ाना कुछ दिन आमदनी नहीं होने पर खाली होने लगा है तो क्यों। 

देश सबसे पहले कौन कहता है , कोई है जो किसी भी राजनैतिक दल का सांसद विधायक है या रहा हो जिसने करोड़ों की जायदाद और बैंक बैलेंस खड़ा किया हुआ है आज अपना सभी कुछ अपने देश को संकट की घड़ी में देने की बात कहता। उन सभी की देशभक्ति कितनी सच्ची है समझ आ जाना चाहिए। इतना ही नहीं जिन धार्मिक बड़े बड़े स्थलों के पास लाखों करोड़ बंद तिजोरी में पड़े हैं उनको भगवान खुदा वाहेगुरु देवी देवताओं की शिक्षा क्या इतना मानवीय धर्म नहीं समझा पाई कि संचय करना छोड़ गरीब दीन दुःखी असहाय लोगों की सहायता करने पर ये धन खर्च कर दो यही गुरु नानक जी का सच्चा धर्म है। शायद अब तो समझना होगा कि मंदिर मस्जिद गिरजा घर गुरूद्वारे बनाने से पहले अस्पताल धर्मशाला स्कूल और जिनके ऊपर छत नहीं उनके लिए घर बनाना ज़रूरी है। 

गांधी जी की विचारधारा की बात करते हैं तो ऐसा अपराध कैसे किया जा सकता है कि कोई सरकार विदेशी कंपनियों को बुलाने को अपने देश के मज़दूरों की सुरक्षा के कानून को ही अगले तीन साल तक निलंबित करने का अध्यादेश जारी करे और राष्ट्रपति को पारित करने को भेजे। सत्ता का ये पागपन है कि जो दबे कुचले हैं उनका शोषण करने की छूट विदेशी ही नहीं जो पहले से हैं उनको भी मिल जाए। क्योंकि सरकार को खुद अपने लिए हर दिन बर्बाद करने को बहुत पैसा चाहिए। एक एक नेता अधिकारी सांसद विधायक क्या जो कभी पहले बने उनको भी सुख सुविधा देने को लाखों की ज़रूरत है। और आम नागरिक को जैसे भी हो जीने मरने की छूट भी मांगनी पड़ती है। गरीब को हर दिन अगर पचास रूपये कमाते हैं तो बहुत हैं रोटी खाने को ये हमारा योजना आयोग बताता था जिसका नाम बदल गया हो मगर मानसिकता नहीं बदली है। 

जाने किस विकास की बात का दावा था जी मोदी जी की सरकार जाने क्या क्या नहीं बेचा और किस किस तरह से रिज़र्व बैंक से बार बार और अधिक धन छीनने का काम नहीं किया गया फिर भी नतीजा वही सबसे अधिक भूखी नंगी सरकार है। याद करो गांधी जी का नाम लेने से पहले उनकी कही बात को। हमारे देश के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है सभी की ज़रूरत को बहुत कुछ है मगर किसी की भी हवस को पूरी करने को काफी नहीं है। ये कुछ बीस तीस फीसदी लोगों की हवस है जिसने देश के अधिकांश हिस्से पर कब्ज़ा जमाया हुआ है फिर भी उनकी गरीबी मिटती नहीं। देश गरीब नहीं है सरकार हमेशा भिखारी और गरीब रही है।

राजनेताओं को मालूम है कि वो जो भी मनमानी करते रहें लोग खामोश होकर तमाशा देखते हैं , उनके अनुचित कार्यों पर कोई सवाल नहीं उठाता है। और उनकी विलासिता की बातों को नापसंद करने के बाद भी देश की जनता बेबस होकर देखती है कुछ भी कर नहीं सकती। मगर हम भूल कैसे जाते हैं बहुत जल्दी ही। मोदी जी पहले के शासकों को पचास साल बाद भी दोष देते रहते हैं साथ ही खुद उनसे बढ़कर किसी शहंशाह की तरह अपनी शानो शौकत दिखाने का काम करते रहते हैं। आपको याद है 24 फरवरी 2020 को गुजरात के अहमदाबाद में नमस्ते ट्रम्प का आयोजन किया गया था। मकसद क्या था विश्व के सबसे बड़े स्टेडियम में अमेरिका के शासक को अपनी शान दिखाना लाखों की भीड़ जमा कर दिखाना। मगर तब कितनी विडंबना की बात सामने आई कि  जिधर से विदेशी मेहमान को गुज़रना था गरीबों की बस्ती को ढकने छुपाने को मीलों लंबी ऊंची दीवार बनानी पड़ी थी और उस पर क्या शानदार पेंटिंग की गई थी। यही वो समय था जब कोरोना देश में दस्तक दे चुका था। मोदी जी जश्न मनाने में खोये थे। कोई असंवेदनशील व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है कि गरीबी को मिटाने पर नहीं छुपाने पर पैसा बर्बाद करता है। मोदी जी जैसे शासकों के पास गरीबों के लिए भाषण को छोड़ कुछ भी है। मगर अपने दोस्तों के लिए सब हाज़िर है , मोदी जी की दोस्ती भारत को बेहद महंगी पड़ी है।



POST : 1291 कोरोना वध घोषित ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

      कोरोना वध घोषित ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

      झूठ सच से बड़ा हो गया , महाभारत में अश्वथामा के वध की घोषणा ने बाज़ी पलट कर रख दी है। टीवी पर ये दृश्य देखते ही दौड़े दौड़े राजन के पास आये और बोले कब तक हम जीतेंगे का संदेश टीवी सोशल मीडिया पर देते रहेंगे। आप को महारत हासिल है दिन महीने सप्ताह क्या पल पल नया संदेश देते ही रहे हैं। अमेरिका के महाराज घोषित कर चुके हैं कि कोई दवा वैक्सीन से नहीं कोरोना खुद ब खुद ख़त्म हो जाएगा। यही समय है कि कोई और कोरोना को मिटाने का दावा करे उस से पहले हम घोषित कर सकते हैं कि हमने उसका अंत हमेशा हमेशा के लिए कर दिया है। जैसे अश्वथामा की मौत की झूठी खबर सुनते ही गुरु द्रोणाचार्य अपने हथियार डाल देते हैं उसी तरह कोरोना का वध का समाचार सुनते ही चीन भी घुटने टेक देगा और उस समय कोई भी चालाकी से उस से कोरोना का रहस्य जान सकेगा। कोरोना कैसे पैदा हुआ पता चलते ही कैसे ख़त्म किया जा सकता है समझना आसान हो जाएगा। 

   राजन सोचने लगे कि ये घोषणा किस से करवाई जाए जिस पर हमारे देश और दुनिया को सच बोलने का पूर्ण विश्वास हो। अपने दल में ऐसा कोई सत्यवादी ढूंढना मुमकिन नहीं है और चाहे जो भी तलाश करें मिल सकता है। जैसे महाभारत में भीम की बात का भरोसा नहीं किया मगर धर्मराज युधिष्ठर के झूठ का यकीन करना ही पड़ा कि वही सत्य है। जाने क्या सोचकर मनमोहन सिंह जी को फोन मिलाया और कहा क्या आप ऐसे समय हमारी सहायता कर सकते हैं। सरदारजी कहने लगे बताओ क्या सेवा है सिख धर्म में सेवा करना सबसे अच्छा समझते हैं। राजन बोले बस आपको इक झूठ बोलना है ये घोषणा करनी है कि हमने देश की सरकार और विपक्ष ने एक साथ मिलकर कोरोना को खत्म करने में सफलता हासिल कर ली है। सुनकर मनमोहन सिंह अचरज में पड़ गए और कहा जनाब झूठ बोलने में मेरा अनुभव इतना नहीं है कोई और हो सकता है जो इस कला में सिद्धस्त हो और जिसका बोला झूठ भी सच लगता हो। राजन समझ गए ये बहाने हैं साथ नहीं देने के , बोले अर्थात आप कोरोना से लड़ाई में सरकार का साथ पूरी तरह से नहीं दे रहे हैं। 

    मनमोहन सिंह ने समझाया आपको शायद विदित नहीं है हम हर दिन सुबह शाम " सत श्री अकाल " कहकर अभिवादन करते हैं जिस का अर्थ है " सत्य ही ईश्वर है "। ये हमारा मूल सिद्धांत है जैसे देश का     " सत्यमेव जयते " है अर्थात सच की विजय हो और आप झूठ की विजय की चाह कैसे कर सकते हैं। अब फोन बंद करने के इलावा कोई रास्ता बचा ही नहीं था। तभी भगवा धारण किये इक बाबा जी खुद ही चले आये और ये समस्या सुनते ही बोले आप चिंता मत करो , अन्यथा नहीं लेना आप तो ये घोषणा कभी नहीं करना क्योंकि आपकी बात को लोग सच समझते ही नहीं हैं। सबने समझ लिया है आप जो कहते हैं वास्तविकता उसके उल्ट नज़र आती है। मगर मुझे खूब आता है झूठ को सच से बड़ा बनाना , मेरा झूठ बाज़ार में सबसे ऊंचे भाव बिकता है। मैंने कुछ भी खोजा नहीं कोई शोध नहीं किया और खुद कुछ भी नहीं करता मगर मेरे नाम से सब सामान असली और शुद्ध कहला कर खूब बिकता है। अभी तक मैं सबको कोरोना से बचने के उपाय बताता था जो कितने सच हैं मुझे भी नहीं खबर मगर लोग मानने लगे थे। अब मेरे कहने से सभी भरोसा करेंगे ही और मेरी कंपनी के शेयर भी महंगे हो जाएंगे। राजन कलयुग में झूठ बिकता है आपने भी कभी जमकर बेचा था अच्छे दिन को फिर उसको आपके ही लोग जुमला बताने लगे। जब भी झूठ बोलना हो उसको हमेशा सच समझ कर यकीन से बोलना चाहिए। अभी आपको कुछ और अभ्यास करना पड़ेगा मुझे इसका अभ्यास किसी भी अन्य कार्य से बढ़कर है। टीवी चैनलों पर बाबाजी के हर विज्ञापन के साथ उनका ये दावा भी शामिल किया गया है कि उन्होंने कोरोना को जकड़ लिया था और उसका वध करने तक छोड़ा नहीं था। उसको भस्म कर दिया है।
 

POST : 1290 नसीब में जो नहीं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

        नसीब में जो नहीं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

नहीं मिला बस कोई इक शख़्स 
जो चाहता समझना मुझे भी । 

खुशनसीब होते हैं दुनिया में वो 
जिनकी बात अच्छी लगती है ।  

मेरे नसीब में नहीं रहा कोई भी 
सुनता समझता कोई बात मेरी । 

खुद कहना भी अपनी बात को 
खुद समझना भी अपनी बात । 

बदनसीबी नहीं तो क्या है भला 
बस यही चाहा यही नहीं मिला । 

इक सन्नाटा कोई आवाज़ नहीं 
जाने ये कैसी है ज़िंदगी मेरी । 

इतनी लंबी ख़ामोशी जैसे कोई 
सदियों से भटकता रहे वीराने में । 

न कोई आहट न कोई चाहत ही 
इक मकसद बेमकसद सा है जैसे । 

सबका नसीब अपने जैसा न हो 
कुछ नहीं लिखा इस किताब में । 
 

 




मई 09, 2020

POST : 1289 पुस्तक पाठक पब्लिशर और दर्शक ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

  पुस्तक पाठक पब्लिशर और दर्शक ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया 

    खाली बैठे लिखने वाले अपनी ही दुनिया में खो जाते हैं । लेखक जी पचास किताबें छपवा चुके हैं मगर जो शोहरत और नाम उनको लगता है मिलना चाहिए नसीब नहीं हुआ । अचानक विचार आया जैसी महान कथाओं की कहानी होती है उस तरह का कोई उपन्यास लिखा जाये । अब कोई जमापूंजी बची नहीं खुद अपनी जेब से पैसे देकर कुछ भी लिख छपवाने को इसलिए पब्लिशर से मिलकर चर्चा की पुरातन कथाओं का आधुनिक स्वरूप देकर कहानी पर उपन्यास लिखने को लेकर । शुरआत में ही जब असंभव घटना को आधार बनाया साफ लगने लगा तो पब्लिशर को कहना ही पड़ा भाई ये किस युग की बात कर रहे हो । लेखक ने याद दिलाया कि सदियों से लोग ऐसी कथाओं को सुनते हैं और भरोसा भी करते हैं जो भी सुनाया जाता है वास्तविक है । पब्लिशर बोले भाई ये इसलिए कि जब उनको लिखा और सुनाया जाना शुरू हुआ होगा तब लोग अशिक्षित और आस्था के नाम पर विश्वास से अधिक भय के कारण खामोश रहते थे । उस युग में अगर कोई सोच भी रहा होगा तो भी खामोश रहना उचित था क्योंकि शासन उन्हीं के इशारे पर चलता था ऐसे में सवाल करना जान जोख़िम में डालना था । आज कोई ऐसी किताब छापेगा तो कोई खरीद कर पढ़ेगा ही नहीं बल्कि जिनको समीक्षा के लिए भेजी वही उपहास और अपमान करेंगे ये कहकर कि आधुनिक समय में ऐसी अविश्वसनीय बातें लिखना छापना अर्थात सोच समझ को ताक पर रखना है । कोई भी जाना माना लिखने वाला इस जैसी कहानी को पढ़ कर समीक्षा लिखना नहीं चाहेगा । 

    लेखक जी बोले अपने कभी पढ़ा है उन पुरातन किताबों को , नहीं पढ़ा होगा मगर आज भी उनके लिखने वाले अमर हैं उनकी ऐसी ही कृतियों के कारण । अभी भी उन पर सीरियल फिल्म बनती हैं । चलो इसे छोड़ो आपने बाहुबली दबंग टाइगर ज़िंदा है रेस कोई मिल गया कृश पीके धूम दौड़ गॉड तुसी ग्रेट हो कितनी ही फ़िल्में हैं जो सफल ही नहीं कीर्तिमान स्थापित करती रही हैं क्या उनकी कहानी घटनाएं संभव हैं । अब पब्लिशर को हंसी आई और बोले भाई उनके दर्शक कोई कहानी संदेश समझने नहीं जाते हैं । शायद कुछ अपनी ज़िंदगी की उलझनों कुंठाओं हताशा खीझ से निराश इक झूठी उम्मीद संजोते हैं अपने पसंद के अभिनेता नायक की छवि को वास्तविक मान बैठते हैं कि उनके लिए भी कोई ऐसा हो सकता है । मगर ये जो सम्मोहन होता है ये कभी भी स्थाई नहीं होता है कुछ घंटे बाद हॉल से बाहर निकलते अपनी असली दुनिया दिखाई देती है जिस में कोई भी किसी की सहायता या साथ खराब समय में नहीं देता निस्वार्थ भाव से । 

   लोग छले जाते हैं अभी भी किसी के सुनहरे ख्वाब दिखलाने से और तब इक दिन वोट देकर आशा भी करते हैं कि शायद ये नेता ये सरकार पहले जैसी नहीं होगी और कुछ बदलेगा । मगर कुछ दिन में सपने टूट जाते हैं ऐसे में किसी लेखक की किताब जो केवल कल्पना ही नहीं ऐसे किरदार को दिखाती हो जो कभी नहीं हुए अभी नहीं नज़र आते और कभी भी होने की उम्मीद रखना भी पागलपन लगता है । लिखने वाले हैं आपको ऐसा हर्गिज़ नहीं करना चाहिए जैसा पुरातन महान किताबों में अन्याय अत्याचार मिटाने को कोई मसीहा आने का झूठा दिलासा दिलाया गया है । मैंने सभी को नहीं पढ़ा मगर जिनको भी जाना है समझा है साफ कहूं तो लिखने वाले की सोच समझ पर हैरानी होती है । उनकी कथाओं के किरदार कितने खोखले हैं जो हमेशा अधर्म अन्याय पाप को खामोश होकर बढ़ावा देने के बाद इंतज़ार करते हैं कब अपनी कायरता को विवशता या कोई और नाम दे सकें । 

   शायद दर्शक अपने मनोरंजन को महत्व देते समय भूल जाते हैं कि ख़लनायक की बातों पर तालियां पीटना समाज को भटकाना है , जिसे आप कहते हैं सदी का महनायक है उसकी फिल्मों को देख कर लोग हिंसा और गुंडागर्दी का सबक भले सीखते रहे हैं मगर उनकी गुंडागर्दी कोई असहाय की सहायता को नहीं नज़र आई बल्कि जब खुले आम कोई बेहद आपत्तिजनक आचरण करता है तब सभी तमाशाई बने होते हैं । क्योंकि बुराई का असर जल्दी होता है और बुराई करने वाले को अच्छा लगता है कोई उस से डरे , अच्छा बनना और भलाई की बात कोई नहीं सीखता है । पहले पुरानी फ़िल्में कहानियां संवेदना पैदा करती थी आज की फ़िल्में कहानियां दर्शक को समाज को संवेदनाशून्य बनाने का काम करती हैं । कोई भी अब शराफत के नाम पर अपनी जान को आफत में नहीं लेता है । आपको फिर भी नाम शोहरत की चाहत है तो आजकल ऐसे किरदार की बात लिखो जो आचरण रावण और कंस जैसा करता है मगर कहलाता ऱाम और कृष्ण है । वास्तविक नायक अब कहीं नहीं हैं ख़लनायक अब नायक घोषित किये जा चुके हैं । आपकी किताब भी बिकती है ऐसे हथकंडे अपनाने से मगर पढ़ी जाती है समझी जाती है ये बताना मुमकिन नहीं है । महंगी कीमत की किताबें सरकारी दफ्तरों और सभ्य समझे जाने वालों की अलमारी में रखी रहती हैं बिना खोले ही किसी अपराधी की तरह कैद में । 

 

POST : 1288 न इसको खबर न उसको पता ( फ़िल्मी मसाला ) डॉ लोक सेतिया

 न इसको खबर न उसको पता ( फ़िल्मी मसाला ) डॉ लोक सेतिया 

                                   ( जसपाल भट्टी जी को समर्पित )

   काश आज जसपाल भट्टी जी होते तो उल्टा पुल्टा सार्थक हो जाता । मुझे उनकी गैरहाज़िरी में ये लिखना पड़ रहा है नहीं तो ये मेरे बस की बात नहीं है । जैसे किसी कहानी में दो लोग दूर देस में अपना अपना सिक्का चलाने में सफल हुए उनकी धाक ऐसे जमी कि उनका मिलना ज़रूरी हो गया । दोनों को एक दूजे से सीखने थे गुण भी अवगुण भी साथ साथ । आपको कई पुरानी फिल्मों की कहानी फिर से याद करवानी है बिना उस के आपको समझ नहीं आएगा मतलब क्या है । गाइड फिल्म में नायक जालसाज़ी की सज़ा काटकर घर वापस नहीं जाना चाहता , वहां कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहां । चलते चलते बहुत दूर किसी और गांव में अपने शहर से पहुंच कर थक जाता है और सो जाता है । कोई साधु उस पर अपनी भगवा रंग की चादर डाल जाता है ठंड से बचाने को । सुबह उठते ही गांव वाले उस को कोई महात्मा समझ लेते हैं , आगे बहुत कुछ होता है मगर महात्मा का लेबल लग गया तो किरदार निभाना होता है । आखिर उस गांव के लोग महात्मा को उपवास रखने को विवश करते हैं ताकि गांव में बारिश हो सके और बरसात हो जाती है । नायक की जान रही या गई लोगों का विश्वास सच हो जाता है । 

     आपने फ़िल्मी गीत का मिक्स सुना होगा दर्द भरे गीत का डिस्को से मिलन । लगता है किसी ने कितनी फिल्मों की तस्वीरों को जोड़कर ब्लैक एंड वाइट रंगीन और तमाम और टैक्नीकलर जो मिला दिया है और इक नासमझ आने वाली रहस्यमयी फिल्म बना दी है । गाइड से कहानी पूरब और पश्चिम से जुड़ती है जिस में भारत लंदन जाकर पश्चिमी रहन सहन वाली नायिका को भारतीय सभ्यता सिखाने भारत लाता है इस वायदे पर कि वापस आने के बाद उस से विवाह करेगा और भारत छोड़ लंदन में बस जाएगा । बीच में पारसमणि अलीबाबा चालीस चोर फिल्म भी टुकड़े जोड़ शामिल किया गया है । अब भूमिका से आगे बढ़ते हैं । 

     दोनों मिले शान से नमस्कार हुआ , फिर कोई चमत्कार हुआ । भारत के मंदिर बंद हुए अमेरिका में मंत्रोचार हुआ । इधर भी उधर भी कोरोना का दोनों देश के राष्ट्रपति भवन में अवतार हुआ । अपने देश में कुछ और समझ आया मंदिर को ताला लगवाया मगर जाने क्या असर उस सात समंदर पार हुआ । माथे पर तिलक लगाकर अमेरिका वाला यार गुलज़ार हुआ । समझा हर किसी ने उसका बेड़ा पार हुआ । इधर जो नहीं काम आया उधर उसी से काम सफल होने की बात का राज़ कोई नहीं जानता मगर कुछ हुआ तो है उपहार दिया उपहार मिला भी होगा । अमेरिका वाला क्या कोई चाबी दे गया किसी खज़ाने के ताले की या कुछ और जो अभी दिखानी नहीं किसी को नहीं तो उसका काला जादू बेअसर हो जाएगा । दोस्ती करने से पहले दुश्मन की भी राय ली जाये ऐसा इक शायर कहते हैं । चीन से दोस्ती भारत अमेरिका दोनों को बड़ी महंगी साबित हुई है । आप क्या सोचने लगे ये चीन बीच में कहां से चला आया मुझे भी नहीं समझ आया कि ये कहानी दो की थी तीसरा कौन घुस आया मगर जिसने फिल्म का मसाला जोड़ा वही जानता है । 

ये संगम फिल्म की बात है प्यार किसी से शादी किसी से और प्यार की चिट्ठी शादी के बाद भी संभाली रखी है । चीन की अलमारी से कोई ऐसी चीज़ बरामद हुई है कि अमेरिका को उसकी बेवफ़ाई का सबूत मिल गया है । चीन अमेरिका का रिश्ता जो भी हो हम किधर जाएं इक तरफ कुंवां इक तरफ खाई है । किशोर कुमार बनाते थे ऐसी कहानी जो कब किस को बाप बेटा मालिक नौकर बना दे सब पहचानते उनको अपने पिता बेटे की पहचान नहीं होती थी । प्यार किये जा दिन जवानी के छार यार प्यार किये जा । ग़ज़ब है दोनों देशों में हाहाकार मची है और दोनों अजीब अजीब कारनामे करने लगे हैं । खास बात ये है कि भारत में लोग हैरान है क्या पढ़े लिखे अमेरिका के लोगों ने ऐसे व्यक्ति को चुन लिया था , और अमेरिका वाले अभी समझ नहीं पाए कि भारत वालों को क्या अच्छे दिन की परिभाषा नहीं समझ आई थी जो फिर उसी भूल को दोहराने की गलती की है । काठ की हांडी दो बार चढ़ती देखी नहीं कभी । कथा अभी है ये अध्याय कुछ दोहों को सुनकर विराम देते हैं । 

देश की राजनीति पर वक़्त के दोहे - डॉ  लोक सेतिया 

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख ।

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर ।

तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग ।

दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल ।

झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार ।

नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग ।

चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार ।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान । 
 

                               नया अध्याय ( पांच साल बाद )

दोस्त दोस्त न रहा , यार यार न रहा , अमेरिका पर दुनिया को ऐतबार न रहा । नशे की रात ढल गई अब खुमार न रहा । वक़्त ने बदला इतना बदला कि दोस्त दुश्मनी की हद से निकलते लगते हैं , पांव धरती से फिसलते लगते हैं । हाथ मिलाने वाले हाथ मलते लगते हैं कुछ रिश्ते ग़ज़ब होते हैं प्रेमी प्रेमिका नहीं पति पत्नी नहीं संगी साथी नहीं तलालशुदा नहीं फिर कैसा गठबंधन है मतलब की दुनिया सारी बिछुड़े सभी बारी बारी । 
 
 
अमेरिका ने पहले भी बड़े पैमाने पर अप्रवासियों को निर्वासित किया है। जानिए  क्या हुआ था। - POLITICO

मई 08, 2020

POST : 1287 मन ही देवता मन ही ईश्वर ( सुकून की चाह ) डॉ लोक सेतिया

  मन ही देवता मन ही ईश्वर ( सुकून की चाह ) डॉ लोक सेतिया

   आप जिस किसी पर आस्था रखते हैं उसी नाम से पढ़ना शुरू करें ताकि आपको भरोसा हो कि बात नास्तिकता की कदापि नहीं है । जब हम तमाम जगह नियम कानून बनाते हैं देश की जनता की सुरक्षा और तंदरुस्त और निर्भय होकर रहने को ध्यान में रख कर और चाहे कोई दवा हो खाने पीने का सामान या कोई भी यातायात का वाहन से सुविधाओं की चीज़ों तक इस का सबसे पहले जांचा परखा जाता है कि उनके उपयोग से कोई खराबी इंसान या हवा पानी कुदरत को नहीं हो सके । ऐसे में सरकार ने कड़े नियम बनाकर सराहनीय कदम उठाया है कि वही अस्पताल नर्सिंग होम खुल सकते हैं जिन में उपचार और रोग के फैलने से बचाव का हर ज़रूरी उपाय किया गया हो । जैसा कि कोरोना के फैलने के डर से सभी ऐसे धार्मिक स्थलों को बंद किया गया था क्योंकि इस में कोई शंका नहीं थी कि उस जगह जो कोई भी है वो अपने पास आने वाले श्र्द्धालुओं को बचाने का काम नहीं कर सकता है । अगर किसी ने ऐसा कुछ भी कहा है तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उसको पकड़ने की कोशिश की गई है । इसी से ये साबित होता है कि सरकार बेशक धर्म को आदर देती है सभी के और धर्मनिरपेक्षता की भी पैरोकार है मगर जब बात लोगों की ज़िंदगी और मौत की है तो विश्वास को नहीं वैज्ञानिक विचार और सोच को महत्व देना उसका फ़र्ज़ भी और राजधर्म भी बन जाता है । 

जितने भी बड़े बड़े भवन बनते हैं और जहां सैंकड़ों हज़ारों या लाखों लोग आ सकते हैं उन को बनाते समय मॉल पीवीआर या ऊंची इमारतों में तमाम तरह के सुरक्षा के कड़े नियम भी होते हैं और साथ में कोई अनहोनी होने पर बनाने वाले मालिक या संचालक की ज़िम्मेदारी भी दंड भी आर्थिक मुआवज़ा भी भरने का कानून होता है । इतना ही नहीं जिन जिन जगहों पर दुर्घटना होने की संभावना होती है सरकारी विभाग या निजी उद्योग चेतावनी भी लिखवाते हैं । पिछले कई हादिसे जिन में गैस रिसाव हुआ या सिनेमा में आग लगने से किसी स्कूल में पंडाल में आग लगने से कितनी जान किसी की लापरवाही से गई भविष्य में नहीं हो ये ध्यान रखते हुए सख्ती से नियम कानून का पालन करवाना ज़रूरी समझा गया । 

अब कोरोना को देख कर हमें विचार करना चाहिए क्या क्या धार्मिक स्थलों के लिए नियम कानून निर्धारित करने चाहिएं ताकि वहां जाकर कोई आशीर्वाद की जगह मुसीबत नहीं खरीद लाये । जैसा डॉक्टर्स को जिन के पास अल्ट्रासाउंड मशीन होती है ये लिखना पड़ता है कि यहां कोई जांच जो गैर कानूनी है नहीं की जाती है । ऐसे ही ये बताया जाये कि उस जगह कोई भी रोग नहीं फैले इसका समुचित उपाय है अथवा नहीं है और आपको चेतावनी दी जाती है अपना बचाव खुद रखे । साफ शब्दों में धर्म वाले इतना सच तो लोककल्याण को बता ही सकते हैं कि आपको सुरक्षित रहना ज़रूरी लगता है तो ईश्वर देवी देवता खुदा वाहेगुरु जीसस जिस किसी को मानते हैं और आरती पूजा ईबादत नमाज़ पढ़ना दीपक जलाना मोमबत्ती जलाना घर पर भी कर सकते हैं । लॉक डाउन से इतना तो सबने सीखा ही है । मन की शांति सबसे ज़रूरी है क्योंकि मन ही अशांत हो और असुरक्षित महसूस खुद को करते हैं तो भक्ति करना मुमकिन ही नहीं है ।

    सभी दुनिया वाले शांति चाहते थे अब जब शांति ही शांति है तब भी चैन नहीं करार नहीं बेचैनी है । शांति इधर उधर भागने से नहीं मिलती पर्वत जंगल नदियां झरने कहीं भी शांति बची नहीं । ये तब समझ आया जब घर में बैठे हैं तब अब बाहर जाते घबराते हैं डरते हैं घर से सुरक्षित जगह कोई भी नहीं है । अब हैरानी की बात है कि लोग शांति से भी उकताहट महसूस करने लगे हैं उनको कोलाहल की शोर शराबे की आदत लग गई थी शांति उनको लगता है कोई अनचाहा बोझ है ढोना पड़ रहा है । कोई इंसान किसी इंसान से लड़ना चाहता है जीतना चाहता है कोई देश किसी देश को अपने आधीन करने को बेताब है । बहुत लोगों का यही कारोबार भी है बात शांति की कारोबार युद्ध का अब उनकी हालत अजीब है न शांति है न युद्ध ही करने का साहस बचा है । आदमी पहले अपनी शांति को खुद ही भंग करता है फिर अशांत मन शांति शांति कहने लगता है । हां ऐसी शांति नहीं चाहता कोई भी श्मशान की शांति जैसी मगर बाहर कोई और शांति नहीं मिलती है । वास्तविक शांति अपने भीतर खोजनी होती है अपने खुद के साथ रहकर बाकी सब दुनिया से दूर अकेले में । समय बिताना नासमझी है समय की कोई कीमत नहीं अनमोल है इसका उपयोग करना चाहिए ।

 शांति को समझने ढूंढने और पाने के लिए आपको इक भजन सुनाते हैं इंसान ईश्वर से पूछता है आपको किस तरह पाया जा सकता है और ईश्वर बताता है मन को पा लो सब मिल जाएगा , मन ही देवता मन ही ईश्वर मन से बड़ा न कोय । मन उजियारा जब जब फैले जग उजियारा होय। जग से चाहे भाग ले कोई मन से भाग न पाये । तोरा मन दर्पण कहलाये । हां ये किसी नेता के मन की बात कदापि नहीं है , आपकी अपनी मन की बात है जो मन ही जानता है ।


 

POST : 1286 कहां सुनता आस्मां ज़मीं की सदा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   कहां सुनता आस्मां  ज़मीं की सदा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  हर एक सरकार यही सोचती है , भगवान सब ठीक करेगा , उसे कुछ भी करने की क्या ज़रूरत है । उधर आसमान पर बैठा भगवान समझता है जब सरकार बना ली है सभी ने अपनी अपनी तो वही खुद सब करेंगे । ये उलझन है कि दो घर का मेहमान भूखा रहता है । ये बात इक बार फिर से साबित हो गई कि ये महान देश सिर्फ भगवान भरोसे चलता रहा है । सरकार और भगवन दोनों भरोसा रखने को बनाये गए हैं और उसके किसी कदम पर कोई सवालिया निशान नहीं लगा सकते हैं । भगवान पर सवाल बहुत हैं सब अन्याय अत्याचार देखता है करता नहीं कुछ भी , सरकार तो कभी चाहती ही नहीं कुछ भी करना उसके लिए सरकार होने का अर्थ ही यही है । जब से कोरोना आया है वास्तव में सरकार को कुछ भी सूझता ही नहीं है और उसने जो भी करना है लोगों को करने को कहा है तब इतना भी उसकी मेहरबानी और समझदारी और महानता है । कोई माने या नहीं माने आज भी भारत देश को कोई बचा सकता है तो वही ऊपर वाला , हम आप बच गए और बचे रहे तो समझना भगावन की दया है । मगर भूले से भी जिनको नहीं बचाया जा सका उसका दोष उसको मत देना । आसमान वाला ज़मीं वालों की फरियाद सुन सकता तो समझता उसने भी दुनिया को अपने हाल पर छोड़ नहीं दिया होता ।

      सरकार का भी हर कदम उठाया जनहित को गया जाता है मगर साबित जनहित के खिलाफ होता है । शासक को कभी भी कोई दोष नहीं होता है उसकी लाठी गोली भी न्याय कहलाती है और जनता का अपना बचाव करना भी दंगा हो जाता है भले जनता निर्दोष भी हो । कानून की लाठी अंधी होती है और न्याय की देवी सच देखना नहीं चाहती अपनी आंखें बंद रखती है । गंधारी अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर अपनी निष्ठा धृतराष्ट्र के लिए होने का सबूत देती है । सत्ताधारी लोग देश की जनता की बदहाली ऊपर से आकाश मार्ग से देखते हैं जैसे कोई तमाशा है । बदहाली का मंज़र भी आसमान से खूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है । सरकार भी भगवान भी देख का समझता है सब भला चंगा है । चाहे भगवान हो या सरकार हमको कभी तो उनकी हक़ीक़त को समझना होगा कि ये दोनों भरोसे पर खरे उतरते हैं भी या नहीं और जो बार बार भरोसे को तार तार करते हैं उनको बार बार आज़माना समझदारी नहीं है । 

     शासक बनते ही सभी को चाहत होती है अपने देश राज्य को छोड़ और सभी देशों में राज्यों में अपनी शोहरत का कीर्तिमान स्थापित किया जाए । और जो धन जन कल्याण को खर्च कर नागरिक को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाई जा सकती हैं उसे अपने नाम का शोर और गुणगान का डंका पीटने पर बर्बाद किया जाता है । हम नासमझ नहीं हैं जानते हैं देखते हैं गरीब भूखे बेघर हैं और सरकार नेता अधिकारी मौज मस्ती पर जमकर सरकारी खज़ाने को उपयोग करते हैं । जनता की ज़रूरत होने पर बजट का रोना धोना होता है सरकार को जब चाहे जितना धन जिस तरह भी छीन कर वसूल कर लेने को तरीके होते हैं । भगवान देवी देवताओं की कथा कहानियों में भी हर कोई खुद को ऊंचा बड़ा और शक्तिशाली साबित करने को ही लगे रहते थे। यही दशा नेताओं अधिकारियों की बढ़ती हुई हवस की लालसा चाहत की भी है । भगवान के मंदिर हों या फिर सरकारी विभाग आपको चढ़ावा बहुत देना होता है मिलता थोड़ा है भोग लगाने के नाम पर किसी और को ज़रूरत से अधिक मिलता है । मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे दौलतमंद हो जाते हैं सबको संचय नहीं करने का उपदेश देते । सरकार नेता भी अपने लिए करोड़ों खर्च कर जो चाहे खरीद लेते हैं ।

   दुनिया में कोई देश किसी देश का दोस्त नहीं होता है दोस्ती देशों के शासक लोगों की होती है जिसकी कीमत जनता को चुकानी होती है । उनकी आपसी जंग भी इसी तरह होती है टकराव होने पर उनकी लड़ाई में भी जान जाती है जनता की । आपने कभी सांढों की लड़ाई देखी है दो सांढ लड़ते हैं बर्बाद उनके पैरों तले दबकर बूटे होते हैं या जो भी ढेर मिट्टी का हो या रेत का या कोई अनाज या कुछ भी उसको धूल में उड़ाकर जब तक जाते हैं तो अपनी अपनी राह चल देते हैं । जानवर से लोग डरते हैं मगर नेताओं अफसरों से बचते हैं क्योंकि ये कब कैसे आपको बर्बाद कर सकते हैं आप सोच भी नहीं सकते हैं । कुछ महीने पहले जो राजनेता गले मिल कर दोस्ती का दिखावा कर रहे थे आज समय बदला तो आरोप लगा रहे हैं तुमने मुझे बर्बाद किया है । सत्ता का घिनौना खेल सामने कुछ पर्दे के पीछे कुछ और चुपचाप करता है । अगर कोरोना चीन की लैब से निकला है तो उसकी पटकथा जाने कब की लिखी गई होगी । अब अगर हम हमारे शासक ये नहीं जान पाए समय पर तो दोष उनका है , आपको हर किसी की जानकारी लेनी आती है देश की जनता की मगर जिनकी दोस्ती या दोस्त बनकर दुश्मनी की खबर रखनी थी वही नहीं रख सके तो कसूर किसी और का नहीं है ।  सार की बात इतनी है कि कोई भी शासक किसी भी शासक पर भरोसा नहीं कर सकता है हर कोई इसी अवसर की तलाश में रहता है कि जब कोई अटूट भरोसा करने लगे तभी उसको घात लगाकर घायल कर दो ।  ये कलयुग है कलयुग में जिस पर भरोसा करो वही अपनी असलियत दिखलाता है । भगवान हो या सरकार अपने होने का एहसास करवाने को लोगों को नित नई परेशानी देते रहते हैं । जिस दिन हमने भगवान भरोसे रहना और सरकार भरोसे रहना छोड़ खुद अपने भरोसे जीना शुरू कर दिया हमारी तमाम समस्याएं अपने आप हल हो जाएंगी । मगर कुछ लोग हैं जो ऐसा होने नहीं देंगे और जिन्होंने हमें ये बात समझाई हमने उनकी सुनी मगर समझी नहीं कभी । आस्मां पे है ख़ुदा और ज़मीं पे हम , आजकल वो इस तरफ़ देखता है कम ।


खुदी को कर बुलंद इतना के तकदीर से पहले , 

ख़ुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है । 

( अल्लामा इक़बाल )

जब तक मंदिर और मस्जिद हैं , 

मुश्किल में इंसान रहेगा ।  

( गोपालदास नीरज )

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक , 

कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक । 

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन , 

ख़ाक हो जाएंगे हम तुम को खबर होने तक । 

( मिर्ज़ा ग़ालिब )

 Aasman Pe Hai Khuda - आसमान पे है खुदा - Mukesh - Phir Subah Hogi - PK -  YouTube