दिसंबर 16, 2016

POST : 577 काला शाह काला ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    काला शाह काला   (  हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

चलो शुरू करते हैं बात , सबसे पहले यही बताना चाहता हूं कि मामला काले धन का हर्गिज़ नहीं है , बात काले रंग की ही है । इक पंजाबी लोकगीत है , काला शाह काला , नी मेरा काला ऐ सरदार , गोरियां नू दफा करो । गायिका कहती है मेरा सरदार ( मेरा पति ) काला है बहुत ही काले रंग वाला है , मुझे यही पसंद है , जिनका गोरा रंग है उनको परे करो मुझे नहीं पसंद गोरा रंग । स्कूल में इक सहपाठी जो बहुत ही गोरे रंग का था , आज भी है बेहद गोरा और सुंदर , उसका नाम माता पिता ने काला रख दिया था घर का प्यार का नाम । कहते हैं इस से नज़र नहीं लगती , बच्चों को काले रंग का टीका भी तभी लगाया जाता है । गोरी महिलाएं काजल यही समझ लगती हैं कि कजरारी काली काली आंखें उनके गोरे रंग को और निखार देती हैं । काला रंग कुछ लोगों को बेहद पसंद होता है , मेरी श्रीमती जी के भाई को भी पसंद है और विवाह के समय उसने इक साड़ी काले रंग की भी खरीद ली थी । मगर मेरी ताई जी को पता चला तो उन्होंने साफ बोल दिया था काले रंग का कोई कपड़ा नहीं देना हमारी बहु को । मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा था उस बात से , मगर ताई जी को पता नहीं था कि मैंने अपनी बहन जी के साथ इक बेहद कीमती कपड़ा मैक्सी बनवाने को लिया था जिस का रंग भी काला था मगर उस पर कई रंग के गोल गोल रंग बिरंगे डॉट्स थे जो सभी को अच्छे लगे थे ।

                   काले रंग में जाने क्या बात है जो नेता लोग इस से डरते हैं । मुख्यमंत्री जी की जनसभा थी और अगले दिन खबरों में इक महत्वपूर्ण खबर इस को लेकर थी कि सुरक्षा कर्मियों ने उनको भीतर ही जाने दिया जो काले रंग के कपड़े पहने थे । जिनको जैकेट काली थी या जुराबें काली वो उतरवा कर रख ली थी । क्या काला रंग सुरक्षा के लिये खतरा है , जी नहीं उस से भी अधिक बड़ी बात है । प्रशासन नहीं चाहता था कोई मुख्यमंत्री जी को विरोध दिखाने को काले कपड़े का उपयोग करे । मुझे तो ये मालूम नहीं काली पट्टी या काले झंडे दिखाने की विरोध की परंपरा किस ने कब और क्यों शुरू की , मगर मुझे इस शांतिप्रिय विरोध में कोई खतरे की बात नहीं लगती है । एक तरफ आप जनता को भाषण देते हैं सरकार के किसी अंग से घूस की शिकायत हो तो निसंकोच बताने की बात और दूसरी तरफ कोई आपकी नापसंद की बात कहने वाला सभा ने दाखिल तक नहीं हो पाये ऐसी व्यवस्था करते हैं । जब दावा है लोग बेहद खुश हैं आपसे तो फिर डर किस बात का ।  कोई बता रहा था मुख्यमंत्री जी भगवान हैं बिना मांगपत्र समझते हैं क्या देना है । भाई वाह आपने तो चाटुकारिता को और ऊंचे आकाश पर पहुंचा दिया , ईनाम का हक तो बनता है ।

              चलो काले रंग और कालिख के डर की बात को किनारे कर पहले यही चरचा करते हैं , कौन दाता है कौन भिक्षुक । क्या जनता का निर्वाचित प्रतिनिधि जनता का धन जनता पर ही खर्च करता है तो दानवीर है दाता है भगवान है । ज़रा गहराई से समझते हैं इतिहास में मिसाल मिलती हैं कुछ तो । इक दोहा इक कवि का सवाल करता है और इक दूसरा दोहा उस सवाल का जवाब देता है । पहला दोहा गंगभाट नाम के कवि का जो रहीम जी जो इक नवाब थे और हर आने वाले ज़रूरतमंद की मदद किया करते थे से उन्होंने पूछा था :-
                                      सीखियो कहां नवाब जू ऐसी देनी दैन
                                      ज्यों ज्यों कर ऊंचों करें त्यों त्यों नीचो नैन ।

अर्थात नवाब जी ऐसा क्यों है आपने ये तरीका कहां से सीखा है कि जब जब आप किसी को कुछ सहायता देने को हाथ ऊपर करते हैं आपकी आंखें झुकी हुई रहती हैं। रहीम जी ने जवाब दिया था अपने दोहे में :

                                      देनहार कोउ और है देत रहत दिन रैन
                                       लोग भरम मो पे करें या ते नीचे नैन ।

अर्थात देने वाला तो कोई और है ईश्वर है जिसने मुझे समर्थ बनाया इक माध्यम की तरह , दाता तो वही है पर लोग समझते कि मैं दे रहा तभी मेरे नयन झुके रहते हैं । आज तक किसी नेता ने देश या जनता को दिया कुछ भी नहीं सत्ता मिलते ही शाही अंदाज़ से रहते हैं और गरीबी का उपहास करते हैं ।

              अब वापस विषय की बात , क्या लोकतंत्र इसी का नाम है । आप किसी को काले रिब्बन या काली पट्टी लगाने पर परिबंध लगा सकते हैं , ऐसा तो आपात्काल में भी नहीं देखा था । आप एक तरफ इतने साल बाद उनको सुविधा देने की बात करते हैं जो इमरजेंसी में जेल में बन्द रहे दूसरी तरफ विरोध करने की आज़ादी बिना घोषणा किये छीन रहे हैं । किधर जा रहे हैं जनाब । मुझे इक पुरानी बात याद आई इक नेता जी की , उनको जब काले झंडे दिखाने की बात हुई तो बोले थे मेरी मां का घाघरा इतने गज़ काले कपड़े से बना होता था , मुझे ये छोटा सा काले रंग का कपड़ा क्या रोक सकता है । जी नहीं मैं न इनकी न उनकी बात का पक्ष लेना चाहता हूं , मुझे खेद होता है इस देश के प्रशासन के रंग ढंग देख कर  , जो हर सत्ताधारी को ऐसे ही ठगता है असलियत से दूर रख कर । अगर लोग किसी मंत्री की सभा में विरोध करेंगे तो किस बात का , यही कि आपका प्रशासन सही काम करता नहीं है । अर्थात जो काले कपड़े वालों को भीतर नहीं जाने दे रहे थे उनको किसी बात का डर था , तभी उन्होंने ऐसा अनुचित काम किया लोगों की पोशाक पहनने की आज़ादी का हनन , संविधान क्या कहता है उनको पता है ।

           क्या काला रंग अशुभ है , क्या तभी नेता श्वेत वस्त्र पहनते हैं कालिख के काम करते समय भी ,
हां इक बात है काले रंग पे लगा धब्बा अधिक चमकता भी है और उसको मिटाना भी कठिन होता है । बाकी किसी रंग वाले कपड़े पर दाग़ लगे तो उसको काले रंग में रंगने से वो नहीं रहता । ये ज्ञान मुझे इक पुरानी फिल्म से मिला था जिस में नायक इक काल गर्ल से प्रेम करता है और चिंतित होता है क्या करुं । तभी उसकी इक कमीज़ पर लगा काला दाग़ नहीं मिटने पर धोबी सलाह देता है साहब इसको इसी रंग में रंगवा लो । अभी शनि देव जी की चर्चा है कि वो खराब नहीं हैं न्यायकारी हैं भाग्यफ़लदाता हैं । अब शनिदेव से या काले रंग से डरने की ज़रूरत नहीं हैं । शनि की पूजा किया करें काला धन या काला कपड़ा आपका कुछ नहीं बिगड़ सकता । ऐसा मुझ अज्ञानी पंडित जी का अभिमत है । 

दिसंबर 05, 2016

POST : 576 निर्णय डराने या निडर बनाने को ( न्यायपालिका का मकसद ) डॉ लोक सेतिया

   निर्णय डराने या निडर बनाने को ( न्यायपालिका का मकसद )

                                      डॉ  लोक सेतिया   

    सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश पारित किया था सिनेमाघर में फिल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगीत को सुनाने और दिखाने को और सभी दर्शकों को खड़े होकर आदर पूर्वक सुनने का। भला इस को कोई अनुचित बता सकता है या इसकी आलोचना कर सकता है , मगर ये जान कर अचरज होता है कि हालत ऐसी आ गई है। अब लोगों को देशभक्त भी कानून द्वारा बनाया जाना पड़ेगा , देश से प्यार की भावना भीतर से नहीं जाग सकती जो बाहर से करने को बाध्य किया जायेगा। शायद हमें बहुत गहराई से समझना होगा कि समस्या क्या है और उसकी जड़ कहां है। कानून बनाकर अभी तक जनता को बराबरी के सभी अधिकार तक नहीं मुहैया करवा पाये हम , शिक्षा और स्वास्थ्य की बात क्या जब बाल मज़दूरी और दहेज का दानव तक विकराल रूप धारण कर चुके हैं। मुख्य न्यायधीश का ये कहना कि न्यायधीशों के पद खाली हैं काफी नहीं है , न्यायपालिका को भी चिंतन करना होगा उसमें खामियां क्या हैं और क्यों हैं। अवमानना की तलवार से कोई समस्या खत्म नहीं होगी , भले लोग देख कर खामोश रहें डर से। काश सभी अपने अपने विशेषाधिकार की लड़ाई से इतर जनता की भलाई की चिंता करते। सत्यमेव जयते , लिखने से सत्य अपराजित नहीं होता जैसा माना जाता है कि सत्य कभी पराजित नहीं होता है। बहुत बार उसको कत्ल कर दिया जाता है ज़िंदा जलाया जाता है बेगुनाहों को और कातिल छूट जाते हैं कानूनी दांव पेच से। फिर भी आज इस विषय पर विचार विमर्श करने की ज़रूरत तो है।

          क्या आपको मालूम है किसी बैंक में कोई नियम है हर सुबह प्रार्थना करने का , जी बैंक ऑफ़ बड़ोदा में ऐसा ही है। मुमकिन है बाकी बैंकों में भी ऐसा हो , इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो ना , हम चलें नेक रस्ते पे हम से भूल कर भी कोई भूल हो ना। आशा की जा सकती है उस का थोड़ा असर तो रहता ही होगा दिन भर कर्मचारियों में। मगर सवाल ये है सिनेमा देखने वालों को ही देशभक्त बनाना बहुत है , यूं  भी आजकल फिल्म देखना काफी महंगा मनोरंजन है और शायद बेहद कम जनता सिनेमा हाल जाती है। सच्चाई और ईमानदारी की आवश्यकता सारे देश में है , तो क्यों नहीं शुरुआत वहीं से की जाये जहां सब से ज़्यादा ज़रूरत है। संसद और विधानसभाओं में कोई किताब  ईमानदारी का सबक सिखाने वाली अगर हर दिन हर अधिवेशन में पढ़ी जाये तो बेईमानी करने वालों को थोड़ी शर्म शायद आ ही जाये। वरना कौन उनको ये पाठ पढ़ा सकता है जो सभी को सबक पढ़ाना नहीं सिखाना अपना अधिकार समझते हैं। बस जनता ने निर्वाचित किया तो जो चाहे करने की छूट मिल गई उनको , इसे लोकराज
कदापि नहीं कह सकते।

          मुमकिन है आपको ध्यान नहीं भी हो सभी सरकारी दफ्तरों में साल में इक दिन ईमानदारी की भ्र्ष्टाचार नहीं करने की रिश्वत नहीं मांगने की बाकायदा शपथ दिलाई जाती है वो भी धूम धाम से समारोह आयोजित करके। नतीजा बताने की ज़रूरत ही नहीं है। जिस देश में सभी खुद को धार्मिक समझते हैं और नियमित मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाते हैं , बुरे कर्म छोड़ सद्कर्म करने का उपदेश सुन के आते हैं उस देश में पाप नफरत हिंसा बैर भाव और घिनोने अपराध कैसे हैं। आखिर उन उपदेशों का असर हो भी कैसे जब उपदेशक और धर्म का पाठ पढ़ाने वाले ही लोभ मोह अहंकार ही नहीं अधिक से अधिक चढ़ावा चढ़ने को ही धर्म मान रहे हों , ज़रूरत से अधिक मत जमा करो का उपदेश देकर खुद करोड़ों अरबों जमा करें और उसको इक कारोबार ही बना लें। बचपन में सभी लोग धर्म सभाओं  में कोई न कोई भजन आरती बोलते और सुनते आये हैं , किताबों में भी अच्छाई और भलाई की बातें ही पढ़ाई जाती हैं। इंसानियत का पाठ पढ़ा तो हर किसी ने मगर याद कितनों को रहा है। बड़े होते होते किताबी शिक्षा भुला ज़िंदगी से मिली शिक्षा मन मसितष्क में बैठ जाती है। बच्चे वही समझते और सीखते हैं जो बड़े आचरण करते नज़र आते हैं। चोर से कोई ईमानदारी का सबक नहीं सुनना चाहता।

                चर्चा करने से क्या होगा , सवाल है कि देश  में नैतिकता और ईमानदारी का चलन फिर से शुरू कौन करे और कैसे। अध्यापक और माता पिता पहला पाठ उनको बातों से नहीं अपने आचरण से पढ़ाना होगा। लेखक कथाकार कवि शायर भी विवेक को जागृत करने का दायित्व निभा सकते हैं अपने स्वार्थ को दरकिनार कर निष्पक्ष सच्चाई की बातें लिखकर। बड़े स्तर पर सिनेमा अपना वास्तविक फ़र्ज़ निभा सकता है ऐसे कहानियों पर फ़िल्में बनाकर जो दर्शक को केवल मनोरंजन ही नहीं दें अपितु शिक्षित भी करें। किसी समाजिक सरोकार पर जागरुकता पैदा करें , सिर्फ धन कमाना ही सफलता का पैमाना नहीं हो। खेद की बात है नग्नता और अंधविश्वास को बढ़ावा देने जैसे काम सिनेमा ने किये हैं , टीवी सीरियल भी जैसे बुराई को बढ़ावा देने की दौड़ में लगे हुए हैं। कहने को समाचार चैनेल या अख़बार हैं मगर विज्ञापनों ने सभी कोई अंधा कर दिया है। पत्रकारिता का पतन धर्म और राजनीति की तरह हर सीमा लांघ चुका है।  देश की चिंता किसे है , सभी को अपने अपने हित साधने हैं , मगर किस कीमत पर। नैतिकता कोई बाज़ार से खरीद कर नहीं ली या दी जा सकती औरों को , उसको पालन करने को बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है जो अनुचित नहीं भी कहलाये या गैर कानूनी नहीं भी हो पर अनैतिक हो। देश में चरित्र निर्माण करना शायद नहीं यकीनन बेहद ज़रूरी है। 
 
   अदालत से आवाज़ आती है आपको हमारी बनाई समिति के सामने आना ही होगा। ये क्या है कोई शर्त है चेतावनी है या समझाना चाहते हैं कि ये सोच लो अब आखिरी साया है मोहब्बत ,   इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा। शायर बशीर बद्र जी की ग़ज़ल का शेर है। और ऐसी समिति गठित की है जिनका अभिमत पहले से सत्ता की सोच के पक्ष में है उनको सदस्य बनाया है। चित भी मेरी पट भी मेरी अंटा मेरे बाप का की तरह मामा गवाह भेड़ें अपनी हुईं। इंसाफ की ऐसी मिसाल कभी नहीं देखी पहले किसी ने। बेबसी कह सकते हैं क्योंकि उनको पता चल चुका है सत्ता पर ऐसे लोग बैठे हैं जिनको यही आता है कि पंचायत का फैसला सर मथे पर परनाला उत्थे दा उत्थे। सरपंच जी की बात कोई नहीं मानता उसको अपनी सरपंची कायम रखनी है।

    

दिसंबर 01, 2016

POST : 575 जनता बोलो ये होना चाहिए या नहीं , मोदी जी पूछते हैं बार बार ( सवाल ) डॉ लोक सेतिया

   जनता बोलो ये होना चाहिए या नहीं , मोदी जी पूछते हैं बार बार 

                                      ( सवाल ) डॉ लोक सेतिया

         गरीब जनता को ही त्याग करने को कहा जाता है  हर बार , कभी किसी राजनेता से किसी ने नहीं कहा त्याग करने को। जनता को समझा रहे हैं इस में तुम्हारी भलाई है , अभी थोड़े से काम चला लो कुछ दिन फिर सब अच्छा हो जायेगा। भाषण में बार बार पूछते हैं सरकार काला धन बंद होना चाहिए या नहीं , फिर उस सवाल को दोहराते हैं , आप तैयार हैं थोड़ा कष्ट झेलने को। जनता को कितना चाहये भला सत्ता तय करती है , दो हज़ार बहुत है ए टी एम से रोज़ निकलवाने को , सप्ताह में चौबीस हज़ार क्या काम हैं। मान लिया जो भी आपने हुक्म दिया पर किसी को कभी तो लगता ऐसा ही परिबंध जनता के सेवक कहलाने वालों पर भी लगाया जाये जिनको हर महीने तमाम तरह से वेतन भत्ते और सुविधाओं के रूप में लाखों नहीं करोड़ों बिना मांगे मिलते हैं। 
 
    प्रधानमंत्री जी आप बताओ क्या उन पर अंकुश लगाया जाना चाहिए या नहीं , अगर जनता को आदेश देते हैं कि कुल मुद्रा के 1 6 प्रतिशत से काम चला लो तो खुद अपने भी खर्चे इतने न सही एक चौथाई कर काम चला लेने की बात करते। मगर किसी सांसद किसी विधायक किसी मंत्री पर कोई रोक नहीं लगी , आपको ढाई ढाई एकड़ के बंगले चाहिएं , तमाम सुरक्षकर्मी भी जनता के धन से और अपनी मर्ज़ी से निजि स्टाफ भी देश के ख़ज़ाने से। मोदी जी किसी भाषण में ये सवाल भी पूछते तो जनता बार बार दोहराती जी सरकार लोकतंत्र के नाम पर सभी लुटेरों की लूट अब तो बंद हो। कभी तो ये फैसला हो कि देश की आम जनता की आमदनी और मंत्रियों जनप्रितनिधयों पर खर्चे में कोई अनुपात रखा जाये। क्यों नहीं आप सभी पर इक शर्त लगाई जाये कि आपको सभी साधन सुविधाएं तभी मिलेंगी अगर जनता को जितना ज़रूरी उतना मिल सके ऐसा प्रबंध आप कर सकें। अगर आप में काबलियत ही नहीं देश की जनता की हालत को सही करने की तो कब तक मुफ्त में आपका बोझ सहती रहे जनता। आज आपको बताता हूं आपने किया क्या है।

                इक पुरानी कहानी नये ढंग से लिखनी पड़ेगी मुझे। सूरज ने वादा किया था मछलियों से उनको मगरमच्छ से सुरक्षित रखने का , बताया गया कि उसको बस में  करने का उपाय है 8 0 प्रतिशत पानी को सुखाने का।  थोड़ी सी परेशानी होगी कुछ दिन प्यास सतायेगी फिर सब ठीक हो जायेगा , सूरज का शासन था उसको सब करने का अधिकार मिल गया था।  अपनी ताकत की गर्मी से उसने तमाम पानी सुखा दिया और जिस जिस तालाब या नदी नाले के पास पानी था उसको जल्द ही वापस सरकार के समंदर में डालने का हुक्म सुना दिया जिस का पालन नहीं करना अपराध था। धीरे धीरे मछलियां मरती गई लेकिन मगरमच्छ को कुछ नहीं हुआ। आखिर सूरज को लगा मगरमच्छ को भी जीने का अधिकार है , और निर्णय किया गया आधा पानी मगरमच्छ को मिले और आधा सरकार के समंदर में भेंट कर अपने सारे अपकर्मों से मुक्त हो जाये। मछलियां अभी भी मर रही हैं पर मगरमच्छ सरकार की बात मानते हैं या नहीं कोई नहीं जानता।

           सीमा पर भी जैसा दावा किया गया था दुश्मन को समझ आ गई है वैसी बात दिखाई नहीं दे रही। यही तो सत्तर साल से होता आया है हर सरकारी दावा खोखला साबित होता रहा है। हर बार इक नई योजना पुरानी की जगह उसी की तरह और नाम से।  आज तक हर सरकार ने देश की जनता की तकलीफ को बढ़ाया ही है कम नहीं किया है। मोदी जी शायद अगले चुनाव में यही सवाल खुद से करेंगे जो किया नहीं पांच साल तक वो करना चाहिए था कि नहीं।  पर जवाब नहीं मिल सकेगा लगता है , मिल सकेगा फिर कोई नया नारा। 

 

नवंबर 29, 2016

POST : 574 काला धन मिल गया , गरीबों के पास ( सत्ता का उपहास ) डॉ लोक सेतिया

      काला धन मिल गया , गरीबों के पास ( सत्ता का उपहास ) 

                                           डॉ लोक सेतिया 

                      हा-हा-हा  , खुल कर हंसो सभी , उनका चुटकुला मज़ेदार है। 
   
आखिर पता चल ही गया काला धन उन्हीं के पास है जिनके जनधन खाते सरकार ने खुलवाये थे। थानेदार यही हमेशा से करते आये हैं चोरी की रपट लिखने से पहले ही घर के नौकर चाकर को पकड़ लाते और बहुत बार उनसे चोरी की मनवा भी लेते हैं। इस में इक राज़ छुपा रह जाता है कि चोर पुलिस का भाईचारा बना रहता है। कितनी बार जिस की चोरी हुई पुलिस उसी को चोर साबित कर देती है , आपने देखा था किसी को घर में घुसते जैसे सवाल इतना उलझाते हैं कि लोग हाथ जोड़ कहते हैं माफ़ करें कोई चोरी नहीं हुई। सामान गया भाड़ में जान सलामत है इतना क्या कम है। यकीन करें चोरी की शिकायत करना घर पर आफत को बुलाना है। अब सरकार को मालूम हो गया है काला धन बड़े बड़े महल में रहने वालों अमीरों के पास नहीं है , काला धन जनधन खाते वालों के पास जमा है। उनको बता रहे हैं सच सच बता दो अगर बचना है। बस मान लो काली कमाई है और आधा-आधा बांट लो सरकार से। तो बात यहां तक पहुंच ही गई। कमाल है मोदी जी।

               मगर आप सोचते होंगे ये जितने नोट सरकार के ख़ज़ाने में वापस जमा होंगे उनका करेंगे क्या। क्या ये कागज़ के टुकड़े रद्दी वाला खरीदेगा।  जी नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा , प्रधानमंत्री जी उनको किसी ऐतिहासिक प्रमाणपत्र की तरह सहेज कर रखेंगे और सभी को दिखाया करेंगे अपना महान कारनामा। आदेश दिया गया है उन तमाम पांच सौ और हज़ार रुपये के नोटों को सरकारी दीवारों में जितनी दरारें दिखती हैं उनको छुपाने को भीतर से चिपका दिया जाये सत्ता की गोंद के साथ। इस तरह किसी को भी कुछ दिखाई नहीं देगा , अंदर क्या है बाहर क्या है। भाई ये जो पब्लिक है नहीं कुछ भी जानती है। आखिर में दुष्यंत कुमार जी की ग़ज़ल के शेर।

                                     अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार

                                     घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार।

                                     इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-जुर्म हैं

                                     आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।

                                     आप बच कर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं

                                     राहगुज़र रोके हुए मुर्दे खड़े हैं बेशुमार।

                                    दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर

                                    हर हथेली खून से तर और ज़्यादा बेकरार। 


 

नवंबर 28, 2016

POST : 573 { बेवफ़ा तेरे प्यार में } कुर्सी का मोहजाल ( हस-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       कुर्सी का मोहजाल  ( हस-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      अजब नज़ारा है दो कुर्सियां आपस में सौतन का रिश्ता भूलकर बदलना चाहती हैं पिया रंग रंगना चाहती हैं झूठ को सच बनाना चाहती हैं । मैंने छोड़ दिया सभी कुछ कुर्सी से दिल लगा बैठा दूरी सहन नहीं होती ।  ख़ाली है जो मेरी मलकियत हैं बाप की जायदाद समझता हूं सत्ता की निशानी है दूसरी पर कोई बैठा है मगर उसका अधिकार नहीं है । सत्ता में कोई किसी का दोस्त नहीं किसी को किसी पर ऐतबार नहीं है लोकतांत्रिक शासन में उम्र भर का करार नहीं है झूठा राजनीति का इश्तिहार है सच्चा किसी का किरदार नहीं है ।  वो हर किसी को बेहद सुंदर लगती है , सब उसको अपना बनाना चाहते हैं । मेरी हो जाये सभी चाहते हैं , सत्ता रूपी सुंदरी के मोहजाल से भला कोई बच सकता है । राजनीति का महल उसी की खातिर तो बना है , हर राजनेता उसका वरण करना चाहता है । वो सदा ही नवयौवना बनी रहती है , सदा सुहागिन का वरदान भी उसे मिला हुआ है । कभी विधवा नहीं हो सकती और बार बार विवाह रचाने के बाद भी रहती कुंवारी ही है । उस को देख सभी ठंडी आहें भरते हैं , हासिल करने को उतावले रहते हैं । सब सोचते हैं कि हम ही उस के योग्य वर हैं । जानते हैं सभी कि सत्ता रूपी सुंदरी कभी किसी एक की बन कर नहीं रहती फिर भी अनजान बन जाते हैं । सभी मानते हैं कि हमीं उसके सच्चे आशिक़ हैं दिलोजान से प्यार करते हैं । और यकीन करते हैं कि उस के दिल में हमारी ही छवि बसी हुई है , ये किसी को भी मालूम नहीं कि इस सुंदरी के सीने में दिल नाम की चीज़ होती ही नहीं । ये इक पत्थर की मूरत है जो लगती वास्तविक है , जबकि है इक छलावा । बस मैं भी उस की चाह में राजनीति की दलदल में खिंचा चला आया था । यहां आने के बाद वापसी को कोई राह बचती ही नहीं , निकलना चाहो भी तो और फंसते चले जाते हैं । किसी जानलेवा रोग की तरह है जो मरने तक जाता नहीं है ।

      मैं आपको अपनी प्रेम कहानी सुनाना चाहता हूं ताकि आप मुझे गलत न समझें । आज सब सच सच बताना है इसलिये कोई कसम नहीं खाऊंगा , उम्र भर शपथ लेकर उसको भुलाता रहा और कसम खाकर झूठ बोलने वालों में शामिल रहा हूं । हम नेताओं का कुर्सी की खातिर ऐसी कसमें खाना इक रिवायत ही है , इसका कोई महत्व असल में नहीं होता । आज सच बोलकर अपने दिल का बोझ हल्का करना है , झूठ बोल बोल खुद अपनी ही नज़र में पहले ही बहुत गिर चुका हूं । जो अधिक शिक्षित लोग होते हैं वो अपनी जीवनी लिख पुस्तक छपवा लेते हैं , मैं अधिक पढ़ा लिखा नहीं इसलिये कहानी सुना रहा हूं । शायद मेरी कहानी किसी को अच्छा सबक सिखा सके हालांकि खुद मैंने औरों के लाख समझाने पर भी कोई सबक कभी नहीं सीखा है । गुरु जी ने पहला पाठ यही तो पढ़ाया था कि हर चमकती वस्तु सोना नहीं होती , फिर भी चमक देख आगे बढ़ता गया दलगत राजनीति में । दूसरा सबक भी वही था कि सुंदरता रंग रूप एक जाल है धोखा है इस से बच कर रहना , जो इस जाल में फंसता वो कहीं का नहीं रहता है । उन शब्दों का अर्थ समझ किसी हसीना के इश्क़ में तो नहीं फंसा , मगर उनके शब्दों का भावार्थ नहीं समझ पाया और इस बेवफ़ा की चाहत में उलझ गया और उसी से मेरा जो भी हाल बदहाल हुआ आपके सामने है ।

                   कल तलक मैं मंत्री था , आज आरोपी हूं भ्र्ष्टाचार का और घोटालों का । आप कल तक मेरी जय-जयकार करने वाले आज मुझे गलियां दे रहे हो । जब तक कुर्सी पर था सभी जान पहचान वालों को हर प्रकार से सहयोग देता रहा , आज मेरी बुराई करने वालों में वो भी शामिल हैं जिनकी खातिर मैं बुरा बना । मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं ये कहावत सभी पर लागू होती है सिर्फ नेताओं पर ही नहीं । वो क्या था , परिवारवाद कहें , जातिवाद कहें , धनबल या फिर बाहुबल या कोई दूसरा नाम दे लें गंदी राजनीति का , जिस ने मुझे चुनाव जिताया और मैं सत्ता पर आसीन हो गया । मंत्री पद की शपथ लेते कसम खाई थी निष्पक्ष रहने , सब से न्याय करने और देश के संविधान की रक्षा की । मगर जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई शासक बनने की , मैं उस सत्ता रूपी सुंदरी के जाल में फंस चुका था । जो सोचता था कि मैं जो मर्ज़ी करने को स्वतंत्र हूंगा वो इक भ्र्म साबित हुआ , मुझे वही करना पड़ता था जो सत्ता सुंदरी चाहती थी । कहने को मैं शासक था मगर असल में इक गुलाम था उस व्यवस्था का जिस ने मुझे कुर्सी दी थी । अपनी सोच अपनी नैतिकता अपने आदर्श सब का त्याग करना पड़ा था कुर्सी पर बने रहने को । अपनों के अनुचित काम करने को विवश और आम जनता के उचित काम भी करना कठिन था , प्रशासन और लालफीताशाही के कारण । बस सत्ता सुंदरी का आलिंगन मुझे जकड़े हुए था ।

            हम सभी राजनेता उसी सत्ता सुंदरी के पागल प्रेमी हैं , उसकी खातिर इस दलदल में घुस चुके हैं । आशिक प्रेमिका को पाने को किसी भी हद तक जा सकते हैं जानते हैं आप भी । अपने पुराने युग की , हीर-रांझा , लैला-मजनू , रोमियो-जूलियट की प्रेम कथायें सुनी होंगी , इस युग की सब से महान कहानी यही है जो केवल मेरी अकेले की नहीं हर नेता की है । अफसोस इसका है कि हमारी प्रेमिका की वफ़ा सत्ता बदलते बदल जाती है , उसकी वफ़ा पुराने को छोड़ नये के प्रति हो जाती  है । बेवफा की याद सताती है पल पल क्या करें बताओ । क्या से क्या हो गया , बेवफ़ा तेरे प्यार में । 
 
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POST : 572 दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर  ( तरकश )  डॉ लोक सेतिया

              नारद जी क्या कह रहे प्रभु को बिल्कुल समझ नहीं आया । कौन हैं जो भूखे हैं गरीब हैं । प्रभु को तो नहीं दिखाई दिये ऐसे लोग । रोज़ जो भी आते हैं उनके मन्दिरों मस्जिदों गिरिजाघरों गुरुद्वारों में सभी कितना अच्छा स्वादिष्ट प्रसाद लाते हैं और इतना अधिक धन उनको देते हैं चढ़ावे में कि अंबार लगे हुए हैं । रोज़ कितनी धूम धाम से कोई न कोई त्यौहार मनाते हैं । स्वर्गलोक से भी देखो तो धरती कैसी सुंदर अप्सरा जैसी चमकती हुई लगती है । वहां की रौशनी देख सभी देवी-देवताओं की आंखें चुंधिया जाती हैं । शासन करने वालों की कितनी जय-जयकार होती रहती है रोज़ हर तरफ । उनकी निराली शान देख कर तो प्रभु भी आह भरते हैं कि काश मेरे पास भी इतना सब कुछ होता । जिस देश के शासक का ऐसा ठाठ हो उसकी जनता भला भूखी कैसे रह सकती है । लोकतंत्र स्थापित यही सोच कर तो किया था कि जनता खुशहाल हो सके । नारद जी बोले मैं आपको कैसी समझाऊं जो सब जान समझ भी नासमझ बने हुए हो । आप अपनी महिमा का गुणगान सुनते सुनते इतना खो गये कि आपको बाकी कोई दिखाई नहीं देता । 
 
किसी शायर ने सही कहा है :-

                      " खुदा मुझ को ऐसी खुदाई न दे , कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे । "


यही हाल धरती पर आपके भारत देश का है । आपने तेतीस करोड़ देवी देवता बना डाले , उन्होंने कुछ हज़ार सांसद विधायक मंत्री और ऊंचे ऊंचे ओहदे बना लिये जिनको वी आई पी नाम दे दिया । बस उनको सभी कुछ चाहिए अपने लिये और सभी भाड़ में जायें । आप सोच रहे हो जनता के पास हर अधिकार है वही बनाती है नेताओं को शासक फिर उसको अनदेखा कोई किस तरह कर सकता है । आप ही बताओ आप भगवान बन गये पर बनाया किस ने , यही लोग हैं जिन्होंने आपको अपना भाग्य विधाता समझा और सब छोड़ दिया आप पर । युगों से ये आप ही के भरोसे जी रही है मगर आपने उनकी सुध ली नहीं कभी । अपनी आरती पूजा और स्तुतिगान में इतने मुग्ध हो गये कि ये भी याद नहीं रखा कि इतनी बड़ी दुनिया बना दी तो उसकी हालत भी अच्छी रखनी है । संतान को पैदा किया पर लालन पालन को अपना कर्तव्य नहीं समझा , काश जब लोग भूख से बिलखते और उनको रातों में नींद नहीं आती खाली पेट तब आपको उस हालत का एहसास होता ।

           भगवान है का विश्वास बेचारे लोगों को छलता रहा है , सभी सोचते हैं कभी तो भगवान उनकी सुनेगा और अच्छे दिन आयेंगे । उसे क्या पता भगवान अपनी इक अलग दुनिया में बड़े सुख चैन से रहता है दुनिया को उसके हाल पर छोड़कर । धरती पर शासक भी आपकी तरह हैं जब जनता से उसका सब कुछ छीनना चाहें पल भर में छीन लेते इक आदेश से ही , मगर जब जनता को थोड़ा भी देना हो तब विवशता की बात करते हैं । अच्छे दिन का वादा तो करते हैं मगर वादा पूरा कब तलक होगा कभी नहीं बताते । सत्ता मिलते वो वादा भूल जाते हैं और जनता को बहलाने को कोई नई चाल चलने लगते हैं । जनता को वही दिखाई देता है जिस का शोर होता है ।

                भगवान भी पछता रहे हैं दुनिया बनाकर , अकेले भगवान कुछ भी नहीं कर सकते , आज तक किसी भी देवी देवता ने उनको असलियत बताना ज़रूरी ही समझा । इन देवी देवताओं को ही तो नियुक्त किया था संसार की भलाई करने को , सभी खुदगर्ज़ बन गये अपना अपना स्वर्ग धरती पर बनाने में लग गये । अब उनको सुधारा भी नहीं जा सकता न ही खुद उनको अधिकार भी है उनको हटाने का , यही भूल हुई थी बनाते समय उनको ठीक कार्य नहीं करने पर हटाने का प्रावधान रखना था । नारद जी बोले भगवान तब भी कुछ नहीं होता , लोकतंत्र में पांच साल बाद जनता को सरकार बदलने का अधिकार है फिर भी जनता के लिये कभी बदलता कुछ भी नहीं ।  केवल सत्ताधारी लोग बदल जाते हैं । पर नहीं अब भगवान और तमाशाई नहीं बने रहेंगे , बुलवा भेजा है सभी देवी-देवताओं को । देखते हैं क्या निर्णय करते हैं सभी मिल कर । नारद जी चल पड़े हैं सभी को बुलाने । नारायण नारायण । 
 
 दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर - दुष्यंत कुमार / Dushyant Kumar -  YouTube

नवंबर 27, 2016

POST : 571 आपकी सुन ली , अब तो हमारी भी सुनो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

आपकी सुन ली , अब तो हमारी भी सुनो  ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया     

    आप जो भी सत्ता में हो , आपके पास हर साधन है , सुविधा है , तरीका भी है अपनी बात हम लोगों को बताने का समझाने का ही नहीं मनवाने का भी आदेश देकर । आपने कहा हमने सर झुका स्वीकार कर लिया कि आप हमारी और देश की भलाई चाहते हैं । आप टीवी से प्रसारण करें या सभा बुला भाषण दें , अपनी हर बात रख सकते हैं । कभी तो हो ऐसा भी कोई ढंग कि वोट डालने के सिवा भी हम किसी तरह अपनी बात कह सकें और आपसे अपने सवाल पूछ सकें । क्या ये ज़रूरी नहीं जनतंत्र में । आज बहुत साधारण से सवाल मुझे पूछने हैं देश की जनता की ओर से ।
 
                           पहला ज़रूरी सवाल :-

  आपने बहुत कुछ समझाया लोग समझ गये कि आप गरीबों की गरीबी मिटा देंगे , पर कब , कोई समय सीमा तो तय कर दो कि इस अवधि तक जनता को और झेलना है परेशानियों को हंसते या रोते । बस इतना बता दो कब कोई भूखा नहीं होगा , किसी को स्वास्थ्य सेवा की या शिक्षा की कोई कमी नहीं होगी गरीबी के कारण । बस इंसान की तरह जी सकें हम भी इतना ही चाहते हैं , और कितना इंतज़ार करना है ।

                   दूसरा ज़रूरी सवाल  :- 

आप सभी जनप्रतिनिधि कब तक इसी तरह खुद अपने पर जनता का सरकारी पैसा खर्च करते रहोगे , जैसे आप जनता और देश के सेवक नहीं मालिक हैं , राजा हैं । लोकतंत्र के नाम पर जारी ये लूट क्या कभी खत्म होगी । क्या जनता के लिये जैसे मापदंड बनाये हैं कि इतना है तो गरीब नहीं उसी तरह नेता मंत्री के लिये भी कोई सीमा अधिकतम की होगी । और उस में और आम जनता में अंतर ज़मीन और आसमान जैसा नहीं होगा । कभी हिसाब लगाना और जनता को भी बताना कि इतने सालों में कितने लाखों करोड़ सिर्फ सरकारी मंत्री और अमले पर ही खर्च होते रहे हैं , जिन से देश से गरीबी कभी की मिट सकती थी । लोग भूखे हैं क्योंकि आप नेता अफ्सर ज़रूरत से बहुत बहुत अधिक खुद पर बर्बाद करते हैं । सत्ता के अधिकारों का दुरूपयोग आपराधिक सीमा तक कर रहे करते आये हैं ।

             तीसरा ज़रूरी सवाल :-

ये आज तक का सब से बड़ा घोटाला है । जितना धन इस में बेकार बर्बाद किया जाता रहा और लगातार किया जा रहा है हर सरकार द्वारा चाहे केंद्र की हो या राज्यों की , उतना शायद बाकी सभी घोटालों में भी नहीं लूटा गया होगा । वो घोटाला है अनावश्यक सरकारी प्रचार के विज्ञापन का । कुछ मुट्ठी भर लोगों अख़बार टीवी वालों को छोड़ और किसी को इन से कुछ नहीं मिलता है ।

                            जवाब कौन देगा

क्या पत्रकार जनहित की बात करने वाले कभी ये सवाल पूछेंगे जब भी सत्ताधारी नेता या प्रशासनिक अधिकारी से साक्षात्कार हो उनसे ।  कभी तो अपना स्वार्थ छोड़ सच का पक्ष लें मीडिया वाले । 

 

POST : 570 उधर थे जो कल , आज इधर हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      उधर थे जो कल , आज इधर हैं (  व्यंग्य  ) डॉ लोक सेतिया 

   हंगामा हो गया उस इक बात से , हर जगह वही मुद्दा छाया हुआ है । अख़बार टीवी समाचार फेसबुक ट्विट्टर व्हाट्सऐप संदेश से गली पार्क में आपसी चर्चा उसी विषय की है । ऐसे में इस पर बहस आमंत्रित करने का विचार बना तमाम बुद्धिजीवी वर्ग को पत्र लिख कर पूछा कि आप किधर हैं , पक्ष में बोलना चाहते हैं अथवा विरोध में बात रखना चाहते हैं । जो भी चाहें करें मगर आयोजकों को कार्यक्रम से एक घंटा पहले सूचना अवश्य दें ताकि बहस को सार्थक बनाया जा सके इक संतुलन दोनों पक्ष में बना कर । लेखक चिंतक विचारक आलोचक और पत्रकार सभी को शामिल किया गया बहस में भाग लेने को । सभी को मांगने पर जो जो प्रश्न पूछे जाने हैं उनका विवरण उपलब्ध करवा दिया गया । लोकतंत्र की सफलता विफलता से लेकर अपने विचार प्रकट करने की आज़ादी तक हर बात शामिल थी सवालों में । नैतिक मूल्यों से देश की बिगड़ी हालत तक , नागरिक अधिकारों से सभी में समानता लाने की बात तक सब कुछ बहस में शामिल होगा । अधिकतर ने शुरू में ही विरोध में भाग लेने का मत प्रकट किया मगर उनको कहा गया अभी जल्दी नहीं है दो दिन बाद कार्यक्रम का आयोजन है तब तक मुमकिन है घटनाएं और रूप में सामने आयें और आपकी सोच बदल जाये इसलिये आप तय दिन बहस शुरू होने से एक घंटा पहले बताना जो चाहते हों । आप समर्थन करें या विरोध उसका मतलब आपकी निजि राय ही नहीं है अपितु समझना है कि उचित या अनुचित क्या है ।

                बहस आयोजित करने का जम कर प्रचार किया गया , तमाम जाने माने लोगों को बुलावा भेजा गया , इक अपने रसूख वाले टीवी चैनल को भी शामिल किया गया ताकि बहस के अंश खबरों में दिखाये जा सकें । लोग भी अधिक आयेंगे ये पता चलने पर कि श्रोता  बन कर ही सही टीवी पर चेहरा दिख तो सकता है । पहले भी अलग अलग विषयों पर चर्चा आयोजित करते रहे हैं और सभी सरकारों की अनुकंपा पाते रहे हैं , इस सरकार से पाने में सफल होंगे उनको भरोसा है । दो दिन भी उनके पास है और नई जानकारी नये तथ्य जुटाने के लिये । उधर हर तरफ शोर बढ़ता जा रहा था और उनको ख़ुशी हो रही थी मामला गर्म है अभी ठंडा नहीं हुआ । जो भी उनको तो हर हाल में बहस करवानी ही थी ।

           दो घंटे पूर्व सभी वक्ता आ गये थे और आयोजक ने फिर याद दिलाया था कि ठीक एक घंटा बाद आपको लिखित में अपना निर्णय उनको बताना है कि आप उधर हैं या इधर , मतलब पक्ष में बात रखना चाहते हैं या विपक्ष में । क्योंकि उनको इक चिंता थी कि बहस एकतरफा नहीं हो जाये अगर सभी समर्थन में ही बोलना चाहें इसलिये उनहोंने ये सूचना दे दी थी कि विरोध में बोलने वालों को काफी अधिक राशि का मानदेय मिलेगा प्रयोजकों की तरफ से जबकि पक्ष में बोलने वालों को दूसरे प्रयोजक उतनी राशि का मानदेय नहीं दे सकते । इस को भेद भाव नहीं हमारी विवशता समझना , विरोध करने के प्रयोजक धनवान हैं , पक्ष में बोलने वालों के थोड़ा कम अमीर हैं हालात के मारे हैं । कोई इस पर आपत्ति नहीं जता सकता , मगर चाहें तो अपना मत बदल सकते हैं और बता सकते हैं अब आप किधर खड़े होना चाहते हैं ।

                  सभी ने बंद लिफाफे में लिख कर दे दिया था किस तरफ हैं । जब सभी लिफाफे खोले गये तो पता चला सबने अपना इरादा बदल लिया है । सभी विरोध में बोलना चाहते हैं । मत बदलने का कारण भी सभी ने बताया था , निडर होकर सच का साथ देने का कर्तव्य निभाना । जो अभी तलक उधर थे अब इधर हैं , बहस का अंजाम जो भी हो , ये बात ज़ाहिर हो गई थी कि पैसे के महत्व पर सब एकमत हैं । 
 
 धन पर निबंध - Essay on Money in Hindi Language - Dhan par Nibandh

नवंबर 26, 2016

POST : 569 आधा-आधा , फिफ्टी-फिफ्टी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    आधा-आधा , फिफ्टी-फिफ्टी ( व्यंग्य  ) डॉ लोक सेतिया

  सिक्के के दो पहलू होते हैं , हर बात के दो पक्ष होते हैं । लोकतंत्र का खेल तमाशा भी सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों से चलता है । कुछ कुछ याद आता है बचपन में खेलते थे चोर-सिपाही आधा-आधा । काला धन भी पूरा ही काला नहीं होता , उसको भी सफेद किया जा सकता है । अभी जब नोट बंद हुए हज़ार और पांच सौ वाले तो खबर पता चली दस बीस प्रतिशत कम देकर नोट बदल देने की । तब सरकार ने चेतावनी भी दी कि ऐसा करते पकड़े गये तो दंड मिलेगा । कानून की यही बात बहुत अच्छी है पकड़े जाओ तभी अपराधी नहीं पकड़ में आओ तो सभ्य नागरिक । पकड़े भी गये तब भी खुद को निर्दोष साबित करने को एक नहीं अनगिनत अवसर मिलते हैं । रंगे हाथ पकड़े गये और जुर्म कबूल भी कर लिया तब भी अदालत में कसम खाकर मुकरने की इजाज़त है । आर्थिक अपराध यूं भी चोरी नहीं कहलाते , समझौता कर लो या जुर्माना भर दो मामला निपट जाता है ।  जब प्रधानमंत्री जी ने अचानक नोट बंदी की बात की और भाषण दिये हर दिन ये कहते हुए कि जो लोग सालों से लूट रहे थे अब उनकी खैर नहीं , उनको घोषित करने का अवसर पहले ही दिया जा चुका है । अब फिर बात होने लगी है काला धन घोषित करो और पचास प्रतिशत जुर्माना भर बाकी पचास प्रतिशत सफेद करा लो । क्या बात है चोर-सिपाही आधा-आधा । अब समझ लो ये काला धन कभी खत्म नहीं होगा , जब मर्ज़ी रंग बदलता रहेगा । आज काला है जो वही कल सफेद ही नहीं अल्ट्रा-वाइट होगा । लो जी भ्र्ष्टाचार जी आपका डर खत्म चिंता खलास । कबीरा तू क्यों भयो उदास ।
 
               बस सारी बातें चंद दिनों की थीं , महीना भी नहीं बीता और देश वापस वहीं जहां था । मगर सरकार यू-टर्न नहीं लेगी इस को लिख कर रखा हो तो मिटा देना । असल में सत्ता इक गोलचक्र में घूमती है उसको वापस आने को यू-टर्न लेने की ज़रूरत नहीं होती । आपने दिल्ली में इंडिया गेट देखा होगा , इक बड़ा घेरा है चौगिर्दा लोग घूम कर आनंद लेते नज़ारा देखते । अब वहां से रास्ता हर तरफ जाता है , पत्थर की हवेली से तिनकों के नशेमन तक , इस मोड़ से जाते है कुछ सुस्त कदम रस्ते कुछ तेज़ कदम राहें । सही याद आया आपको ये आंधी फिल्म का गीत है । राजनीति आज भी वही है जनता को भावनाओं से बहला शासन पाना । खिलाड़ी बदलते रहे खेल नहीं बदला , किसी ने तब खेल दिखाया कोई आज दिखा रहा है ।

              लो जी अभी तो पार्टी शुरू हुई है , सब खुश इधर वाले भी उधर वाले भी । जनता तू भरोसा रख काला धन आया है तो अच्छे दिन भी लाया ही होगा । देखना तेरी गरीबी कैसे मिटती है , दुख भरे दिन बीते रे भईया अब सुख आयो रे । डरता काहे को है जो भी धन किसी ने डाला तेरे खाते में आधा तेरा आधा सरकार का । सीधा सा हिसाब है कोई बनिया का बही खाता नहीं जो गिनती में चूक हो जाये । जन धन खाते इसी सोच से खुलवाये थे समझे आप , बेचारे जिन्होंने अपने खाते में औरों को काला धन नहीं डालने दिया फिर गरीब के गरीब ही रहे बदकिस्मत लोग । अभी भी दिन बाकी हैं अगर साहस हो कुछ करने का , क्योंकि गलत काम बिना साहस नहीं किया जा सकता । डरपोक कभी अमीर बन ही नहीं सकते । सुबह देश के सब से बड़े न्यायधीश कह रहे थे अदालतों में न्यायधीश के पद रिक्त हैं न्याय का क्या हो । जब भृष्ट लोगों का काला धन काली कमाई का आधा लेकर ठीक करना हो तब क्या ज़रूरत न्यायपालिका की भी । देखो हिस्सा मिला और इंसाफ हुआ उनका , ये कोई मुगलेआज़म फिल्म का फ़िल्मी तराज़ू नहीं जो झुकता दिखाई देगा । कहते थे विदेश तक में नाम रौशन होगा देश ईमान की राह चल पड़ा है , क्या नाम दिया था जंग है अपराध आतंकवाद नशे का कारोबार और रिश्वत तथा लूट के खिलाफ । कसमें वादे बातें नारे सब खोखले साबित होंगे क्या पूछना उन से शायद बता सकें , छल फरेब धोखा कोई शब्द बचा ही नहीं कहने को लगता है । चलो थोड़ा हंस लिया कुछ दिन अब थोड़ा रो लो दोबारा अपनी हालत पर । हंसना-रोना फिफ्टी-फिफ्टी , आधा-आधा फिफ्टी-फिफ्टी । 
 
 Ujalo Mee Hasna Andhero me Rona..
 

नवंबर 25, 2016

POST : 568 ज्योतिष विज्ञान और देश की हालत ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    ज्योतिष विज्ञान और देश की हालत ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        मैं भूल गया था , फिर से याद दिला दिया आपने , ऐसा अक्सर होता ही है हम सभी के साथ । ओह याद आया , काश पहले याद आ जाता तो समस्या ही नहीं होती । हर समस्या का समाधान है हमारे ज्योतिष शास्त्र और इधर लोकप्रिय हुए वास्तुशास्त्र के पास । कारण चाहे जो भी हो अख़बार टीवी वाले भी इस से सहमत हैं , तभी हर दिन इनको प्रचारित करते हैं । इन्हीं की अनुकंपा से मालामाल भी हैं । नया राज्य बना और नये मुख्यमंत्री को पता चला कि हैदराबाद का पुराना मुख्यमंत्री निवास वास्तु दोष से ग्रस्त है । खुद अपना घर होता तो उनसे सलाह लेकर कोई दरवाज़ा कोई खिड़की बदलवा उसको ठीक कर लेते । कोई पौधा किसी दिशा में लगाते या रसोई घर की जगह बदल जाती । खुद अपनी सुरक्षा का भी उपाय है , घर को किसी खास रंग में पेंट करवा महंगे फर्नीचर से सजा कर मुख्यद्वार के दोनों तरफ धातू की बनी ऊंची ऊंची योद्धा की मूर्ति रख लेते । वास्तु वाले इनको सुरक्षा कवच बताते हैं , हम भी ऐसा करने को बुरा नहीं बताते । जब बाकी नेताओं अधिकारियों को अरबों रुपये खर्च कर पाल सकते हैं सफेद हाथी बनाकर जो किसी काम नहीं आते तो ये भी स्वीकार कर लेते । मगर ये तो ज़रूरी नहीं था कल खबर सुनी कि ऐसा किया गया वास्तु दोष के कारण ।

               इक नया मुख्यमंत्री आवास बनाया गया आठ महीने के काल में इक रिकॉर्ड की तरह 3 8 करोड़ की राशि खर्च कर के । इसको लोकतंत्र कहते हैं , राजा का हुक्म हुआ और ताजमहल बना दिया गया जनता के धन से सभी ने वाह ताज कहा चाय की चुस्की लेकर । देखो उनकी जान को खतरा है , उनका स्नान घर तक बुलेट प्रूफ है शयनकक्ष ही नहीं । ऐसे मौत से डरे लोग भाषण देंगे जनता को साहस से काम लो निडर बनो और भगवान पर भरोसा रखो । इनको तमाम पूजा पाठ हवन यज्ञ करने करवाने के बाद भी भगवान पर इतना यकीन नहीं कि इनको बेमौत नहीं मरने देगा । इनकी जान कीमती है जनता की सेवा करनी है इसी तरह बहुत साल तक , बस चले तो आखिरी सांस भी सत्ता की गद्दी पर बैठे लेना चाहेंगे । हैरानी की बात है अपने देश के नेताओं की धर्म में बड़ी आस्था रहती है खुद की खातिर , मगर जब ईमानदारी से राजधर्म का पालन करने की बात हो तब उनको कुछ याद ही नहीं रहता ।

               याद आया अटल जी ने कभी उनको राजधर्म निभाने का संदेश दिया था । सत्ता मिलते सीस झुकाया जिस मंदिर की चौखट पर आजकल उसी में प्रवेश करने से बचते हैं । जब आपने कुछ गलत किया ही नहीं तो छप्पन इंच की छाती ठोक देते जवाब विपक्ष को । मगर इक सच मनोविज्ञानिक बताते हैं कि जो सुरक्षा कर्मी रखते हैं उनको डर सब से अधिक लगता है । लगता है अभी उनको समझ नहीं आ रहा कि अपने उचित निर्णय को उचित साबित कैसे करें , उनको सवाल पूछने वाले ही गलत लगते हैं । इसलिये नाराज़ प्रेमिका की तरह कहना चाहते हैं जाओ मैं नहीं बोलती । वे मैं नहीं बोलणा , क्या गीत है , तेरे सामणे बैठ के रोणा दिल दा दुखड़ा नहीं खोलणा । जाओ कोई उनके आवास पर उनके आंसू पौंछ कर मना लाओ , बस बहुत हुआ रूठना अब मान भी जाओ ।  ओह बात कुछ और हो रही थी कहां बीच में काला धन आ गया , करें क्या आजकल यही हो रहा है । सवाल आया था कि क्या नोट बंद करने से सब ठीक हो जायेगा और जो अभी तलक काले कारनामे करते रहे उनके पाप इस से धुल जायेंगे । क्या ये गंगा स्नान है सभी नेताओं के इतने साल तक दो नंबर के धन से चुनाव लड़ने के बाद उसका प्रायश्चित है । इक कथा है मां पार्वती ने शिवजी से यही पूछा था , और शिव जी ने जवाब दिया कि जो केवल तन गीला करते हैं उनको मोक्ष नहीं मिलता पर जो मन को पवित्र करते स्नान कर बस उन्हीं के पाप समाप्त हो जाते हैं । मगर कौन मात्र तन से नहाया कौन मन का मैल भी धोता कैसे पता चले पूछा पार्वती जी ने । 
 
   शिवजी इक कोड़ी का रूप बना और पार्वती को सजी धजी सुंदर औरत बनाकर उसी डगर पे बैठ गये जिस से लोग गंगा स्नान कर वापस लौट रहे थे । लोग पास आते तो पार्वती जी बताती कि ये मेरे पति हैं और मैं इनको कंधे पर लादकर लाई हूं गंगा स्नान को , थक गई इसलिये विश्राम कर रही हूं । लोग बुरी नज़र से देखते और सुंदर नारी देख प्रलोभन दे अपना बनाना चाहते , पार्वती चुप चाप शर्मसार हो जाती ये हालत देख । संध्या को इक पुरुष आये और उनकी बात सुन उसकी आंखों से आंसू की धारा बह निकली , उसने कहा चलो मैं आपकी सहायता करता हूं । उसने शिवजी को अपने कंधे पर उठाकर तट पर पहुंचा दिया और जो सत्तू था उसके पास वो भी खिला दिया । शिवजी पार्वती का प्रयोजन पूरा हो गया था और वो चले गये अपने लोक । देखते हैं इस कलयुगी उपाय से क्या काला राक्षस खत्म होता है अथवा नहीं ।

                     विषय पर आते हैं , ज्योतिष शास्त्र की बात की जाये । शुभारंभ बहुत ज़रूरी होता है , और जन्म समय और तिथि ही नहीं जगह भी मिलकर किसी का भविष्य तय कर देते हैं । ये सभी ज्योतिष विशेषज्ञ बताते हैं । हिंदुस्तान जब आज़ाद हुआ और इंडिया नामकरण किया गया तभी भविष्य निर्धारित हो गया था । तब ग्रह सिथ्ति बन गई थी , आज़ादी मिली चौदह - पंद्रह की आधी रात को , तभी आज़ादी का पक्ष सदा अंधेरा ही रहा , उजाला ढूंढने वाले निराश हुए और काले कारनामे और धंधे वालों को पूरी आज़ादी रही । पी एम कहना प्रधानमंत्री नाम रखना भी ऐसा ही था , पी एम शाम का समय होता है और प्रधानमंत्री जीवन की शाम में ही बने लोग । इक युवा बने तो उनकी आयु भी कम ही रही । अभी कल पूर्व प्रधानमंत्री बता रहे थे नोट बंदी से कितने प्रतिशत क्या कमी होगी , वही पी एम कहते थे मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूं जो बता सकूं महंगाई कब कम होगी । महंगाई डायन और गरीबी पापिन दोनों की कुंडली बनवा देखी जाये कब उनको राहू केतु की दशा खत्म करेगी । चलो आखिर में आज की नई इक कथा लिखते हैं ताकि सनद रहे और ज़रूरत पर काम आये , अरे ये तो वकीलों की भाषा है । पर इधर कथा पुराने ढंग की समझता कौन है इसलिये यही उचित है ।

            उस माता के दो पुत्र हैं , नेता और अधिकारी , और एक बेटी है जनता अनचाही औलाद जैसी । बड़े बेटे को सत्ता सभी अधिकार खुद देती है , छोटा जानता है नहीं मिलें तो कैसे छीन सकते हैं । देश की एक तियाही जनता की तरह बेटी को लेकर मां सोचती है अच्छा होता ये अभागी जन्म ही नहीं लेती । यही मापदंड है समाज का बेटा अपकर्म लूट मर करता रहे तब भी बुरा नहीं , बेटी की ज़रा सी बात भी बदनामी का सबब बन जाती है । गरीबी इक कलंक है जनता की दशा इक अभिशाप । कसूर किसी का नहीं विधाता ने इनका भाग्य ऐसा ही लिखा है । कितने उपाय किये सभी ने , आरक्षण देने से महिला आयोग बनाने , और मनरेगा से पहले भी कितने सूत्री कार्यक्रम चलाकर । कोई पता करे किसी वास्तु शास्त्र वाले या अंक शास्त्री अथवा ज्योतिष पंडित से , कोई उपाय ऐसा ही सही , और सब आज़मा लिया सबने । मुझे किसी महिला ने इक बार बताया था उनका करीबी रिश्तेदार मशहूर ज्योतिषी है , साथ ये भी बताया खुद वो जब उनसे किसी परेशानी का कारण और उपाय पूछने गई तब उन्होंने समझाया था हम लोगों के घर की सीढ़ियां भूलकर भी मत चढ़ना , नहीं तो इन्हीं में भटकती रहोगी । लेकिन महिला को भटकना मंज़ूर था भटकती रही है । इक पंडित जी से भारत इंडिया देश का भाग्यफल पूछा था उन्होंने बताया अमुक ग्रह अमुक घर में हैं इत्यादि । बस इतने से समझ गया सभी के सभी ग्रह इक साथ इक समय उचित जगह होना असंभव बात है , कोई जब भी पंडित जी से सही समय की बात करता है तो हमेशा अभी इंतज़ार करें कहते हैं । देश की दशा ठीक होना इक सुनहरा सपना है क्योंकि इतने साल में खराब से और भी खराब होती जा रही है ।  नई ईमारत बनाई गई संसद की मगर लोग वही हैं बदलाव की बातें करते हैं बदलना नहीं चाहते शायद कुंडली में दोष है । 

जन्म कुंडली - जीवन का मानचित्र | वैदिक ज्योतिष | Vedic Astrology

नवंबर 23, 2016

POST : 567 हमने दुनिया के सवालात का हल ढूंढ लिया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       हमने दुनिया के सवालात का हल ढूंढ लिया (  व्यंग्य  ) 

                                         डॉ लोक सेतिया

                        हमने दुनिया के सवालात का हल ढूंढ लिया

                        क्या बुरा है जो ये अफवाह उड़ा दी जाये ।

     शायर ने पहले ही सुझाव दिया था , किसी ने समझा ही नहीं। अब आया समझ इक नेता जी को और उन्होंने घोषणा कर दी है गरीबी को खत्म करने का तरीका उनको पता चल गया है। बस उन्होंने ये राज़ राज़ ही रखा है कि पता चला कब और कैसे , अभी चला या पहले से जानते थे। अगर पहले से जानते थे तो इतने दिन तक उसको आज़माया क्यों नहीं। लोग उनके पहले दिए भाषणों को फिर से सुन रहे हैं और सोच रहे हैं कि तब तो कुछ और ही बातें कहते रहे , फिर अचानक ये क्या हुआ जो सरकार इतना बदल गये। वास्तव में कुछ दिन पहले उनको इक पुरानी डायरी मिली थी अपने सचिवालय के तयखाने से जो कभी इक अर्थशास्त्री ने लिख कर भेंट की थी तब के शासक को , गरीबी का अंत करने का एक मात्र उपाय यही है समझाने को। लेकिन उस शासक ने देश के सभी राजनेताओं की भलाई समझते हुए डायरी को अति गोपनीय घोषित कर दिया था , साथ ही उस अर्थशास्त्री को आदेश सुना दिया था कि राष्ट्रहित में इस बारे कभी किसी को नहीं बताना है। मगर उस अर्थशास्त्री को सम्मान और पुरुस्कार भी दिया था , यही उचित था उनकी काबलियत को मानना ज़रूरी था और उनको खामोश रखना भी। चलो आपको उस डायरी के प्रमुख अंश पढ़ कर सुनाते हैं।

                                  प्रधानमंत्री जी , आपने संकल्प लिया है गरीबी हटाने का और सभी से सहयोग एवं सुझाव भी मांगे हैं। मैं आपको बताता हूं देश से गरीबी का सदा सदा के लिये खात्मा करने का एक मात्र उपाय क्या है , इसको छोड़ दूसरा कोई रास्ता है ही नहीं। संक्षेप में गरीब को गरीब ही बनाये रखना और उसको खैरात बांटना वोट हासिल करने को , इस खेल को बंद करना होगा और जो जनता के धन से राजा महाराजा की तरह ठाठ से रहते हैं उनको बदलना होगा। अकेले देश के राष्ट्रपति के निवास को इतना बड़ा महल होना लोकतंत्र का उपहास ही तो है। उस भवन के रख रखाव पर हर महीने करोड़ों रुपये खर्च किया जाना इक अपराध है जब देश की असली मालिक जनता को बुनियादी सुविधाएं भी हासिल नहीं हों। गरीबों की चिंता सब से पहले वहीं से शुरू की जाये फिर आप खुद भी ये विलासिता पूर्ण जीवन त्याग साधारण नागरिक की तरह रहें। आपके मंत्री और मंत्रालय के बड़े बड़े अधिकारी भी अपने फज़ूल खर्चों को बंद करें। सांसद विधायक सभी राज्यों के राज्यपाल मंत्री से लेकर जनता के सेवक प्रशासनिक अधिकारी समझें कि जब तक देश की जनता को उसको सभी अधिकार शिक्षा आवास स्वास्थ्य सेवा और रोज़गार उपलब्ध नहीं करवाते अपनी योजनाओं द्वारा तब तक खुद भी आम नागरिक की तरह ही रहें। लाखों रुपये वेतन भत्ते किसलिए जब आपको जो करना चाहिए वही कर ही नहीं पाये अभी तलक। अगर नाकाबिल नेताओं और प्रशासन के अधिकारियों को उनकी नाकामी का ईनाम आलीशान घर और सभी सुख सुविधाओं के रूप में मिलता रहा तो जनता कभी खुशहाल हो ही नहीं सकेगी। आपको नियम बनाना होगा कि ऐसी योजनायें बनानी हैं जिन से जनता को उतना पहले मिले जितना आप नेता और अफ्सर चाहते हैं पाना देश की जनता की कमाई से। जब ये मालूम होगा कि जनता की भलाई से ही खुद हमारा भला जुड़ा है तभी पूरी सरकार जनता को समर्पित होगी। ये कर के देखो कैसे सब अपने आप होता है। आखिर सेवक कब तक छपन भोग खाते रहेंगे और जनता भूखी सोती रहेगी। मगर तब के नेता जी को लगा था ऐसा किया तो हम कहने को ही शासक होंगे वास्तविक शासन तो जनता का होगा। उनके सभी सलाहकारों ने भी यही विचार प्रकट किये थे कि ये राज़ सदा को राज़ ही रहने दिया जाये। मगर हर बार चुनाव में ऐसा वादा किया जाता रहे कि हमारा मकसद आपकी गरीबी दूर करना है। पहले हम खुद अपनी उसके बाद अपने नाते रिश्ते वालों की फिर आस पास के लोगों की तो गरीबी मिटा लें तब बाद में जनता की भी बारी आएगी कभी। और डायरी पर लिख दिया था जब हमारे पास इतना धन जमा हो जाये कि उसको रख पाना ही असंभव हो जाये तब जनता की गरीबी मिटाने की शुरुआत की जाये। अब वो दिन आ गये हैं सभी बड़े बड़े लोग अपना धन कहीं गहरे में दबा देने को सोचने लगे हैं। इतना धन सभी के लिये सरदर्द बन गया है और अपनी नींद चैन सब का अंत हो गया है , तब ऐसे पैसे से क्या लाभ। प्रधानमंत्री जी ने घोषणा की है देश की खातिर सब कुछ त्याग करने की , वास्तविक त्याग। वो त्याग नहीं जिस में सन्यासी महलों में राजसी शान से रहे।

               थोड़े दिन मांगे हैं प्रधानमंत्री जी ने , फिर सब बदल जायेगा , गरीब लोग सुख चैन से रहेंगे और सारी बेचैनी हर परेशानी नेता मंत्री और सरकारी तंत्र झेलेगा। अफवाह है अगले बजट से यही होने वाला है। आने वाले हैं अबके आम लोगों के अच्छे दिन। आखिर में दुष्यंत कुमार का शेर :-

                                           खुदा  नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही ,

                                           कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये ।

नवंबर 22, 2016

POST : 566 कैसे होते हैं अच्छे दिन सरकार जी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    कैसे होते हैं अच्छे दिन सरकार जी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  तीस महीने से इंतज़ार था जिनका क्या वही अच्छे दिन हैं आजकल , जनता सोच रही है कतार में खड़ी । नेता लोग टीवी पर बहस में उलझे हैं ताकि जनता को अपनी अपनी परिभाषा समझा सकें कि अच्छे दिन होने का मतलब क्या है । ऐसे में लोग हर बात को बेबस हैं और समझ रहे हैं जीवन का सार क्या है , कुछ भी हो सकता है अनुपम खेर जी बताया करते हैं । मौत की बात करना बुज़दिली है , मौत आनी है आयेगी इक दिन , कब कहां कैसे क्या फर्क पड़ता है । जनता का जीना मरना यूं भी इक आंकड़े से अधिक कुछ नहीं होता । रोज़ बिना वजह मरना ही जनता की नियति है । ये टीवी वाले भी जले पर नमक छिड़कते हैं , जब सरकार जनता को दो हज़ार रुपये का महत्व समझा रही है तब खबर वाले बताते हैं एक एक सांसद एक एक विधायक एक एक मंत्री पर कितना खर्च हर दिन हर महीने हर साल होता है । आह भर सकते हैं आप , काश ऐसी देश सेवा का अवसर आपको भी मिल जाये । अच्छे दिन की सही परिभाषा अब समझ आई है , हम ने पहले ही बता दिया था , जिनको सत्ता मिली उनके अच्छे दिन हैं । थोड़ा कमी रह गई जो ये नहीं समझे कि सत्ता नहीं भी रही जिनकी उनके भी दिन बुरे नहीं हैं । ये बारी बारी का खेल है , पहले उनकी टीम बॉलिंग कर रही थी इनकी फीलडिंग , अब उल्टा है । खेल खेल भावना से खेलते हैं दोनों , जनता दर्शक बन भले किसी की जीत किसी की हार से खुश हो या दुखी हो । खेल में भी सब से अधिक महत्व पैसे का होता है , और पैसा दोनों टीमों को मिलता है चाहे जीतें या हारें । नेताओं का ठाठ बाठ बराबर है इधर भी उधर भी । जनता ज़िंदा रहे या मरे राजनेता सलामत रहने चाहिएं । मुझे तो लगता है मौत भगवान की मर्ज़ी नहीं सरकार की अनुकंपा से मिला वरदान भी हो तो बुरा क्या है । मेरा इक शेर अर्ज़ है :-

                                        " मौत तो दर असल एक सौगात है ,

                                         पर सभी ने उसे हादिसा कह दिया। "

                                       
            अच्छे दिन की बात स्वर्ग की बात होती है , स्वर्ग मौत के बाद ही मिलता है । स्वर्ग की कामना भी करते हो और मरना भी नहीं चाहते ये भला कैसे मुमकिन है । ज़िंदा रहते स्वर्ग का सुख केवल राजनेताओं को मिलता है , जनता के लिये ये धरती नर्क है तो नेताओं के लिये स्वर्ग । जो उपदेश देते हैं धर्म का वो साधु संत महात्मा और गुरु भी खुद मोह माया काम क्रोध लोभ अहंकार का त्याग नहीं करते , आपने देखा नहीं क्या । वास्तव में जिनको नर्क का भय नहीं है वही जो मर्ज़ी करते और स्वर्ग का सुख पाते हैं । पाप पुण्य में उलझे लोग स्वर्ग की राह देखते रहते हैं तब भी मानते हैं कि उनके बाद कोई उनकी खातिर दान आदि पूजा पाठ या अन्य कर्म करेगा तभी स्वर्ग मिलेगा । खुद पर भरोसा नहीं हो तो कुछ भी नहीं मिलता है , न स्वर्ग न ही अच्छे दिन  ।  ये बातें लोग आजकल भूल गये हैं , पहले याद रखते थे । मुझे दादा जी बताया करते थे अपने बाग होते थे आमों के और क्या बात होती थी उन दिनों । पिता जी को इक पैसा जेब खर्च मिलता था और वो झोला भर मिठाई खरीद लिया करते थे । पांच रुपये वेतन वाला क्या शान से रहता था , क्या ज़माना था , ये कहानियां सुना करते थे हम हैरान होकर । आज सब सामने है ज़रा दूसरे ढंग से , पिछले महीने जो लाख रुपये की कद्र नहीं करते थे आज हज़ार की कीमत समझने लगे हैं । यार क्या दिन थे और कैसे दिन आ गये हैं ।

       चलो कुछ अच्छी बातें करते हैं , सोचो अच्छे दिन कैसे होंगे अगर कभी आये तो । मेरा इक सपना है अच्छे दिनों का , वो बताता हूं आपको । जब कोई बड़ा कोई छोटा नहीं होगा , कोई शासक कोई जनता नहीं होगा , कोई धनवान कोई गरीब नहीं होगा , न कोई भूखा होगा न किसी के पास ज़रूरत से अधिक खाने को , कोई ताकतवर नहीं होगा न ही कोई कमज़ोर , सभी को सब बराबर हासिल होगा , कोई आम नहीं होगा न ही कोई ख़ास , कोई किसी से अधिकार की न्याय की भीख नहीं मांगेगा जिस दिन वही होंगे अच्छे दिन । 
 
                      चलो इक पुराना गीत गुनगुनाते हैं :-

               वो सुबह कभी तो आएगी , वो सुबह कभी तो आएगी ,

               जब अंबर झूम के नाचेगा जब धरती नग्में गाएगी ,

               वो सुबह कभी तो आएगी ।

               माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की कीमत कुछ भी नहीं ,

               मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की कीमत कुछ भी नहीं ,

               इंसानों की इज़्जत जब खोटे सिक्कों में न तोली जाएगी

              वो सुबह कभी तो आएगी , वो सुबह कभी तो आएगी । 

 Sahir Ludhianvi Nazm Wo Subah Kabhi Toh Ayegi - Amar Ujala Kavya - बेहतर  समाज की उम्मीद जगाती है साहिर की नज़्म 'वो सुब्ह कभी तो आएगी'

नवंबर 21, 2016

POST : 565 काले धन तेरा भी कल्याण हो ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          काले धन तेरा भी कल्याण हो ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   काले सफेद का भेद सभी की समझ नहीं आता , नोट कोई भी काली स्याही से नहीं बना होता , छपते भी सारे नोट एक ही जगह हैं। फिर ये भेद-भाव कैसा , काहे लक्ष्मी जी को बदनाम करते हो। भगवान ने दुनिया सभी के लिये एक समान बनाई थी , इंसानों ने उसको काले गोरे में तकसीम कर दिया। गोरों ने भारत देश पर दो सौ साल राज किया और हमने उनको निकाल बाहर किया देश को आज़ाद करवा कर। इस के बावजूद भी हम गोरे रंग के मोहजाल से निकले नहीं। काले से चिड़ आखिर किसलिये , काला होना अर्थात बुरा होना। दो नंबर की कमाई को काला धन बता इक शब्द ही नहीं इक रंग को भी नाहक बदनाम किया गया है। ठीक उसी तरह जैसे सोशल मीडिया ने सोनम गुप्ता बेवफा है हर नोट पर लिख दिया , बिना परखे कि नोट कैसा है काले धन वाला या सफेद। अपनी अपनी भड़ास लोग इसी तरह निकालते हैं। जो चाह कर भी धन एकत्र नहीं कर सके वही दूसरों के पास पैसा देख जलते हैं और बदनाम करते हैं काला है बता कर।  

            हमारा नाम हो शोहरत हो इस से सब से अधिक जलन उन्हीं को होती है जो हमारे मित्र कहलाते हैं मगर हम से आगे बढ़ना चाहते हैं पर हर बार और भी पीछे रह जाते हैं। अधिकतर ये हमारे करीब वाले होते हैं , पर कभी उनको भी तकलीफ होती है जिन से हमारा वास्ता ही नहीं होता। एक ही बिरादरी के लोगों में इक होड़ रहती ही है , और शायद ही कोई किसी दूसरे की सफलता से खुश होता हो। ये इक आम स्वभाव है दुनिया में इंसानों का , पशु पक्षी पेड़ पौधे इन बातों से बचे हुए हैं , तभी वो कभी रोते नहीं।  खुश होते हैं चुप भी रहते हैं और कभी शोर भी करते हैं पर उनको रोना नहीं आता। कई बार जानवर भी दूसरे जानवर को घायल देख संवेदना ज़ाहिर किया करते हैं जो दिखावे की नहीं होती इंसानों की तरह। आदमी अजीब है , जब पैदल होता है साइकिल वाले से जलन होती है , जब बस में होता है कार वाले से , कार मिल जाती है तो उनसे जलन होती है जो विमान में यात्रा करते हैं। वो सब से तेज़ भागना चाहता है और सब से जल्दी पहुंचना चाहता है मंज़िल पर , और अक्सर इसी दौड़ में ये भी भूल जाता है कि मंज़िल कहां है और जाना किधर है। ऐसा उनके साथ भी होता है जिनका काम ही औरों को राह दिखाना है , प्रवचन देने वालों को सब पता होता है फिर भी पता नहीं चलता क्या सही है और झूठ किसे कहते हैं। कुछ लोगों को लड़ने का शौक होता है , उनको जीतना पसंद है मगर जीतने के लिये लड़ना ज़रूरी है। अब लड़ना है तो कोई दुश्मन भी होना ही चाहिये , इसलिये दुश्मन भी खोज ही लेते हैं। अदालतों में हार जीत से अधिक महत्व विरोधी को मज़ा चखाना है का बन जाता है , खुद अपनी जीत से हासिल कुछ हो न हो विपक्षी की हार से इक अलग ही चैन मिलता है सुख मिलता है ख़ुशी मिलती है। किसी अमीर का महल जल गया हो जानकर छोटे मकान वालों को सकून मिलता है। लूट की दौलत से बनाया था , अब किया ऊपर वाले ने हिसाब बराबर।

                                            देश में आजकल यही हालत है , अधिकतर लोग कल तलक परेशान थे अपनी गरीबी को लेकर , जाने कब आयेंगे अच्छे दिन। जब उनके बुरे दिन आये जो बड़े बड़े अमीर थे तब खुश हैं कि किसी ने उनकी भी हालत खराब कर दी है। सरकार को भी समझ आ गया था कि सब के अच्छे दिन लाना उसके बस की बात नहीं है मगर जिन के अच्छे हैं उनके खराब दिन लाना बहुत आसान है। और ऐसा करने से वो भी थोड़ा तो खुश होंगे ही जिनके हमेशा ही बुरे दिन रहे हैं। चलो धरती पर हैं तो आकाश से नीचे गिरने का कष्ट तो नहीं झेलना पड़ा , अगर अमीर होते तो आज अपनी भी हालत पतली होती।बाग में सभी तरह के पेड़ होते हैं , सेब का पेड़ अमरूद के पेड़ से परे परे नहीं रहता खुद को खास समझ क्योंकि उसको लोग महंगे दाम देकर खरीदते हैं। न ही कोई पेड़ दूसरे पर अपने से ज़्यादा फल लगे देख उसको बुरी नज़र से देखता है। ये आदमी है जो धंधे में पड़ोसी दुकानदार की दुकान पर अधिक ग्राहक देख जल भुन जाता है। बुरी नज़र वालों से बचने को काले रंग का नजरबट्टू ही काम आता है। गाय और भैंस में काला सफेद होने की कभी तकरार नहीं होती , दोनों एक ही खूंटे से बंधी रहती ख़ुशी से। भैंस का दूध भी हीनभावना का शिकार नहीं होता , बिकते हुए। इंसान बिना कारण खुद उलझनों का शिकार हुआ रहता है , अपने चरित्र अपनी शख्सियत अपने सवभाव से अधिक महत्व रंग रूप वेशभूषा को देकर। कागज़ के नोट भी किसी को अपना पराया नहीं मानते , जिस की जेब में होते उसी के हो जाते हैं। उनको इस बात से भी कोई मतलब नहीं कि सरकार उनको किस श्रेणी में रखती है काले धन की या सफेद की। उनको मालूम है सरकार के खज़ाने में जाते ही दोनों एक समान हो जाते हैं , जब खुद सरकार को अपनी तिजोरी में काला धन रखते कोई लाज नहीं आती तो बाकी लोगों को काहे बदनाम करती है।

                               हमने तो भैया एक सबक सीखा है , सभी के लिये अच्छी दुआ करना , इक जेबतराश ने ये सर्वोतम ज्ञान दिया हमको आज। मधुर स्वर में इक गीत गाकर : -

                                   " उपर वाले इस दुनिया में कभी जेब किसी की न खाली रहे ,
                                     कोई भी गरीब न हो जग में हर पॉकेट में हरियाली रहे। "

      चलो फिर आज हम भी साथ मिलकर उन सभी के वास्ते दुआ मांगते हैं जिनको नोट बंदी से क्षति हुई है। भगवान उनको समझ दे ताकि वो जल्द अपने काले धन को फिर से सफेद कर के पहले जैसे खुशहाल हो सकें। और उनको अब किसी की बुरी नज़र नहीं लग पाये। क्योंकि और की भलाई से अपनी भलाई होती है। इक दोहा यही समझाता है :-
                                   " चार वेद षट-शास्त्र में बात मिली बस दोय ,
                                    दुःख देवत दुःख होत है सुख देवत सुख होय। "

नवंबर 20, 2016

POST : 564 हम्माम में सभी नंगे हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        हम्माम में सभी नंगे हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  देश की राजनीति निर्वस्त्र हो गई है , कोई परदा बचा नहीं है , सभी कपड़े पहने हुए हैं फिर भी नंगे नज़र आ रहे हैं। एक एक कर सब की असलियत सामने आ गई है , जिनकी अभी छुपी हुई है वो भी घबरा रहे हैं , जाने कब उनकी भी बारी आ जाये। सफेद रंग की समस्या यही है उसको पहन भीतर से सब बाहर झांकता लगता है। सफेद रंग अब सादगी का नहीं आडंबर का प्रतीक बन गया है। बाहर से हर कोई सफेद अंदर से सभी काले हैं , सफेदपोश लोग ही काले धंधे करते हैं। बचपन में इक अध्यापक जिनका नाम शास्त्री जी था , चकाचक सफेद धोती कुर्ता पहनते थे , उनको बच्चों ने सफेद नाग नाम दे रखा था। क्योंकि उनका स्वभाव था हर किसी को डस लेते थे मौका मिलते ही। उनकी फुंकार दूर से सुनाई दिया करती थी , उन जैसे कितने नाग आजकल सरकारी दफ्तरों में विराजमान हैं। मान्यता है कि जहां भी कोई खज़ाना दबा होता है वहां ही नाग भी मिलते ही हैं , नाग को कितनी बार दूध पिलाओ वो अपना नहीं बनता , डसने की आदत रहती ही है। हमारे पड़ोसी देश की भी यही आदत रही है। जिनको सांप को वश में करना आता है वही सत्ता पर काबिज़ होकर नागों को अपने इशारों पर नचाने का खेल खेलते हैं। राजनीति और प्रशासन सांप नेवले का सहमति का प्रयोजित धंधा है। उनके खेल तमाशे पर तालियां बजती हैं पैसा बरसता है।

                   सांप और नेवला इक दूजे की जान के दुश्मन हैं , मगर मदारी उन दोनों को वश में कर अपना तमाशा दिखाता है। संसद और विधानसभाओं में बहुमत को इसी तरह काबू किया जाता है , यही नये दौर की गठबंधन की राजनीति कहलाती है। इस को पशुप्रेमी मेनका गांधी भी नहीं रोक सकती। इक प्रधानमंत्री ने इक दल को इसी तरह वश में किया था बहुमत साबित करने को , आत्मा की आवाज़ पर भी इसी कारण मत दिया गया था कभी। लोग नंगे होने के बाद भी शर्मसार नहीं हुआ करते , नाचते रहते हैं नचाने वालों के इशारों पर। बस एक बार बेशर्मी करने से समस्या हल हो जाती है , नंगई वरदान बन जाती है। वस्त्रों की उपयोगिकता खत्म हो जाती है। नंगा होना इक समाजवाद है , सभी एक जैसे लगते हैं , कोई खूबसूरत लगता है न बदसूरत। सब बराबर हो जाते हैं , अमीर गरीब का भेद दिखाई नहीं देता।

                        फिल्म वाले टीवी वाले विज्ञापन का कारोबार वाले , नग्नता का व्योपार करते हैं , बेचते हैं अपना और अपने समाज का नंगापन पैसे की चाहत का। बदन को इस तरह ढकना कि नग्नता और छलकती दिखाई दे , उसको सौंदर्य प्रतियोगिता कहा जाता है। सुंदरता तन ढकने की कला में ही है , पूर्ण नग्नता आकर्षित नहीं करती कभी। किसी पेन के विज्ञापन में बच्चा कहता है , सब कुछ दिखता है , तब सब समझते हैं कि हम सारे ही नंगे हैं। नंगा होने में हास्य रस ढूंढ सकते हैं। विद्रूप हास्य।