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फ़रवरी 09, 2017

POST : 600 अब अच्छे दिन आये हैं ( हास्य - व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

अब अच्छे दिन आये हैं ( हास्य - व्यंग्य कविता )  डॉ लोक सेतिया

सुन लो बहरो , देख लो अंधो ,  अच्छे दिन ले आये हैं
तिगनी का नाच नचाने को , हमने लंगड़े सभी बनाये हैं ।
 
रंग  सब का इक जैसा होगा , काले सब गोरे बन जाएंगे  
अपने रंग में रंगना सब को , अपना पाउडर बिंदी लाये हैं ।

मुर्दों की अब बनेगी बस्ती , ऐसी नई योजना इक बनाई है  

होगी नहीं लाशों की गिनती , क़ातिल की होती रुसवाई है । 

अपने दल की टिकेट देकर , जितने अपराधी खड़े किये हैं
माननीय बन शरीफ कहलायें , इंकलाब कुछ ऐसा लाये हैं ।

सुन लो बहरो , देखो लो  अंधो ,  अच्छे दिन ले आये हैं ।

सब इश्तिहार हमारे देखो तुम , झूठे हैं सब सच्चे हैं हम

हम सब छप्पन इंच वाले लोग  , बाकी तो अभी बच्चे हैं ।

मत देखो जो कुछ भी बुरा है , तुम गांधी जी के बंदर हो
जो सत्ता कहती सच वही है , सच की परिभाषा बनाये हैं ।

सुन लो बहरो , देखो लो  अंधो ,  अच्छे दिन ले आये हैं ।
 

 

फ़रवरी 08, 2017

POST : 599 सत्ता के मद में हैं जनाब ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     सत्ता के मद में हैं जनाब ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

शायद इसकी कल्पना किसी को नहीं थी जिस तरह से सत्ता अपने मद में चूर हर किसी को अपमानित कर रही है। बेशक जिन से सत्ता छीनी है जनता ने और आपको सत्तासीन किया है उन्होंने बहुत गलत किया था , जिस की राजनीतिक सज़ा उनको चुनाव में हार के रूप में मिली है। पर आप शायद भूल गये उनके अपकर्मों की सज़ा देने को ही आपको जिताया देश की जनता ने आप पर भरोसा कर के कि आप जनता की बदहाली को दूर करेंगे। पिछली सरकार के घोटालों की जांच और कानूनी सज़ा दिलवाना आपका काम है , मगर उसी तरह जैसे निष्पक्ष न्याय किया जाता है। मगर जिस तरह आप संसद में विपक्ष को निम्न स्तर की भाषा से अपमानित करने का कार्य कर रहे  हैं उस से खुद आपके भीतर का डर दिखाई देता है। कैसी विडंबना की बात है आप ऐसा करते हुए इतिहास और नीति की बात कर रहे हैं जब की खुद उसी का पालन नहीं कर रहे हैं। सुना तो आपने भी होगा जिस पेड़ पर फल लगते हैं वो झुकता है। किसी को अपमानित करना भले वो आपका विरोधी भी हो आपका गौरव नहीं बढ़ाता है। जब आपको संसद में सवालों के जवाब देने थे तब आपने संसदीय मर्यादा की चिंता छोड़ अपनी मर्ज़ी से जनसभा में अपनी बात रखी ताकि आप पर सच या झूठ कहने  के लिये किसी नियम में संसद में कोई करवाई  नहीं हो सके। आपने भाषणों  में जिसे चाहा काले धन का समर्थक घोषित कर दिया और ये साबित करना चाहा केवल आप और आपका दल ही सच्चा देशभगत व ईमानदार है। अदालत आपकी वकील आप न्यायधीश भी आप , ये कैसा लोकतंत्र है। आपने देश को जो वादे किये थे वो अभी तलक सच हुए लगते तो नहीं। आपने कहा इतिहास को पढ़ते रहना चाहिए मगर शायद आप खुद भूल गये देश का पुराना नहीं आज़ादी के बाद का इतिहास। जिसे बुरी तरह हराया जनता ने लोकतंत्र की रक्षा की खातिर , जब देखा नये शासक सत्ता का दुरूपयोग बदले की भावना से करने लगे तब उनको भी हटाकर फिर  से उसी को चुन लिया , पांच साल भी नहीं रही वो सरकार। आज आपको अगर खुद अपने कामों पर यकीन होता कि आपने सत्ता पाकर अच्छे काम किये हैं जिन से जनता खुश है तो आप अपने काम पर वोट मांगते , जब कि आज भी आप दूसरे लोगों की गलतियों की ही बात करते हैं भाषण में। क्यों नहीं कह सकते देखो मेरी सरकार ने वास्तव  में अच्छे दिन ला दिये हैं। क्योंकि आपकी घोषित की सभी योजनाएं उसी तरह भ्र्ष्टाचार और लालफीताशाही से असफल की जा चुकी हैं। आप हर बार रावण बताकर किसी को बुरा साबित कर भी लें तब भी आप राम हैं ये साबित नहीं हो सकता। कब तक आपको केवल इसी लिये सत्ता मिलती रह सकती है कि कोई दूसरा बुरा है। आप खुद कब अच्छे बनकर दिखाओगे।

          इक कहानी है , इक बुरा आदमी शराबी जुआरी और धूम्रपान करने वाला होता है , दूसरा जो ये सब नहीं करता और खुद को शरीफ समझता है , अन्यायी और अत्याचारी साबित होता है , जब कि पहला अत्याचार को मिटाने वाला बन नायक कहलाता है। पहले की बुराईयां सिर्फ खुद उसी को नुकसान पहुंचा रहीं थीं जबकि दूसरे की सारे समाज को। 
 

 

POST : 598 सत्ताधारी और विपक्षी दोनों समधी - समधी ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

 सत्ताधारी और विपक्षी दोनों समधी - समधी ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

     रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था , ये पुरानी कहावत कितनी सच है क्या पता । मगर    आजकल  देश की संसद में लगता है शुद्ध मनोरंजन की बातें की जा रही हैं । होता है जब हमारे पास करने को कुछ नहीं होता तब हम गप शप करते हैं टीवी देखते हैं या पूरा दिन फेसबुक व्हाट्सएप्प  पर बेकार की बातों को ज़रूरी मान कर समय बिताते हैं । इक अजीब बात है समय नहीं है का बहाना बनाते हैं अक्सर जब कि समय सभी के लिए एक समान है चौबीस घंटे । समय तब नहीं बचता जब प्राण जाते हैं छूट , राम नाम  की लूट है लूट सके तो लूट , सुबह होते ही मंदिर से भजन कीर्तन सुनाई देता है । उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन कहां जो सोवत है , जो जागत है सो पावत है जो सोवत है सो खोवत है । तो संसद में बहस के नाम पर जनता की बदहाली की बातें नहीं आपसी छेड़-छाड़ , ताने व्यंग्य , हास-परिहास चल रहा था । ठहाके लगा रहे थे शायद जनता की समझ पर हंस रहे थे किन नेताओं को मसीहा समझ उनकी जय जयकार करती है । किसे फ़िक्र है जनता की , जो देश में होता है होने दो , पहरेदारों को सोने दो , जनता रोती है रोने दो । तब होगा बचाव का काम शुरू घर बाढ़  को और डुबोने दो । आज समझ आया पक्ष और प्रतिपक्ष कोई दुश्मन या विरोधी नहीं हैं , इनका बहुत मधुर रिश्ता है समधी - समधी वाला हास उपहास छेड़ - छाड़ वाला । बुरी नहीं लगती आपसी बात , मेरे ताया जी कहते थे समधी को तो कोमल पुष्प की तरह रखते हैं । बड़ा ही नाज़ुक रिश्ता होता है , मगर आजकल दहेज और दिखावे की चाहत ने इस नाते में खटास ही नहीं कटुता भी ला दी है । सत्ता पक्ष विपक्ष भी सत्ता के मोह  में अंधे होकर संसद और लोकतंत्र की गरिमा को भूल गये हैं ।
 
   अब लगता है सरकारों को फुर्सत ही फुर्सत है , सोशल मीडिया पर कितना कुछ करना ज़रूरी है वास्तविक समस्याओं पर फिर कभी सोचेंगे । सत्ता की प्रेमिका को खुश करने को किसी सीमा तक झूठ सच फरेब चालाकी यही सब करते हैं ।  हर दल देश की सत्ता  को अपनी बहु समझता है , जिसे गरीब जनता ने उनको सौंप दिया है । किसी  को भी वो अपनी बेटी लगती ही नहीं । बहु के आंसू झूठे लगते हैं , उसकी तकलीफ बहाना , पता  नहीं नेताओं की अपनी बेटियां होती भी हैं कि नहीं । समधी लोग मिलते रहते हैं हर अवसर पर , मगर खुद को बेटी का पिता कोई नेता नहीं मानता , हर नेता बहु का ससुर ही समझता खुद को । अपने समधी की कमियां निकालना उसका मज़ाक बनाना असभ्यता नहीं समझा जाता , ये प्यार की लड़ाई है । इस सत्ताधारी और विपक्ष वाले नाते में दोनों तरफ से पिसती बेचारी जनता की बेटी है जिसे हर कोई बहु मानता सेवा करवाने को । बहू  को घर की मालकिन कोई नहीं समझता । संसद विधानसभाएं जैसे सिनेमा हाल या पीवीआर हैं जहां राजनेता अभिनय करते हैं जनता को दिखाने को कभी झूठ मूठ बेटी के पिता बनकर तो कभी सच में बहु के ससुर का किरदार निभाते हुए । समय आ गया है अब आपको इक और कर भी चुकाना चाहिए , मनोरंज कर । बाकी जो आप देते रहते हैं सभी दल के नेताओं को वो तो आपको अपनी बेटी की ख़ुशी नहीं सुरक्षा की खातिर देना लाज़मी है । बेटी का मायके की चौखट से निकलते ही बहू बनकर सयानी बन कर दिखाना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता है । जनता की हालत यही है लोकतंत्र की तरह लाचार नेताओं की मनमानी का शिकार बेबस हो गई है । सरकार तमाशाओं से चलती है लोग तालियां बजाते हैं तमाशा देख कर देश की राजनीती खुद तमाशा मज़ाक बन गई है , हर गंभीर बात को उपहास बना दिया गया है ।    
 
 हंगामे के कारण दोनों सदनों की कार्यवाही स्थगित | Proceedings of both the  houses were adjourned due to uproar

फ़रवरी 06, 2017

POST : 597 आया नहीं दाग़ अब तक छुपाना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

  आया नहीं दाग़ अब तक छुपाना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आया नहीं दाग अब तक छुपाना
मैली है चादर हमें घर भी जाना ।

हम ने किया जुर्म इक उम्र सारी
बस झूठ कहना नहीं सच बताना ।

सुन लो सभी यार मुझको है कहना
की जो  खताएं उन्हें भूल जाना ।

मुझ से बुरा और कोई नहीं है
मैं खुद बुरा हूं भला सब ज़माना ।

दस्तूर मेरा यही तो  रहा है
जीती लड़ाई को खुद हार जाना ।

तुमने निकाला हमें जब यहां से
फिर ठौर अपना न कोई ठिकाना ।

"तनहा" जहां छोड़ जाये कभी जब
सबको सुनाना उसी का फसाना । 
 

 

फ़रवरी 05, 2017

POST : 596 उनको था साथ लाना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

              उनको था साथ लाना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

       हर कारवां से कोई ये कह रहा है " तनहा " , पीछे जो रह गये हैं उन को था साथ लाना ।

                  मुझे अपनी ग़ज़ल का ये आखिरी शेर याद आया आज , जब इक टीवी शो पर देखा कभी एक साथ एक प्रतियोगिता में शामिल दो कलाकार इक मंच पर थे , मगर एक निर्णायक की कुर्सी पर और दूसरा सालों बाद इक प्रतियोगी बन कर। सवाल प्रतिभा का नहीं है , सवाल किस्मत का भी नहीं है। सवाल अवसर मिलने का है और सवाल ये भी है कि काबलियत की पहचान से अधिक महत्व सफलता हासिल करने का है। ऐसे ही इक और टीवी शो में भी आज देखा , कल तक गांव के घर घर में काम करने वाली महिला का बेटा जब टीवी पर गा रहा तो तमाम गांव के लोग उसके  फोटो और नाम लिखी तख्तियां लेकर बार बार उसका नाम पुकार कह रहे हैं तुम ने गांव का नाम रौशन किया है। कौन जनता है यही लोग कल तक उसी को खुद से कितना छोटा समझते रहे हैं। मान लो अब वो शो का विजेता भी बन जाये मगर बाज़ार में सफलता नहीं हासिल कर सके तब फिर इन्हीं लोगों की नज़रें पहले की तरह दिखाई देने लगेंगी। सब इतनी तेज़ी से दौड़ भाग रहे हैं कि कोई ध्यान ही  नहीं देता कब कोई हमसफ़र किस जगह कैसे पीछे छूट गया कारवां से बिछुड़ गया। कभी बहुत देर बाद जब हमारे पास सब कुछ होता है मगर वो साथी नहीं होता जो अपना अकेलापन मिटा सकता था , तब समझ आता है उतना पाया नहीं जितना खोया है। इसलिए आज इक बात कहना चाहता हूं , हम मित्रता दिवस की बात करते हैं और बहुत संवेदना प्रकट किया करते हैं लेकिन बिछुड़ जाने पर कोई खबर ही नहीं रखते उसी मित्र की।  काश हम देशवासी यही सबक भूले नहीं होते कि अकेले खुद नहीं आगे बढ़ना , सभी को संग लेकर चलना है आगे और भी आगे। और ये बात राजनेताओं के झूठे और खोखले नारे जैसी हर्गिज़ नहीं है।

                                   आजकल सब इक अंधी दौड़ में भाग रहे हैं। साथ साथ कोई नहीं चलना चाहता। सब औरों को पीछे छोड़ आगे निकलना चाहते हैं। सोशल मीडिया पर लिखते हैं सब की भलाई की बातें और हर बुराई से दूर रहने के उपदेश। वास्तविक ज़िंदगी में साहस नहीं करते सच बोलने का , झूठ का विरोध करने का और सच्चाई के पक्ष में खड़ा होने का। ये ऊंचा उठना तो नहीं है और भी नीचे गिरना है। बड़ी बड़ी बातें कहने सुनने को नहीं हैं जीवन में अपनाने की हैं। खुद अपने लिए जीना कोई जीना नहीं होता है। जीना वही सार्थक है जो औरों की खातिर समाज और देश की खातिर जिया जाये। 

 


फ़रवरी 04, 2017

POST : 595 नये कीर्तिमान की योजना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        नये कीर्तिमान की योजना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

                        
    सौ साल जीने का कीर्तिमान बनाना किसी काम का नहीं होता अगर आप वास्तव में कभी जीने का लुत्फ़ ही नहीं उठा सके। ज़िंदगी का मज़ा सही या गलत तरीके पर चल कर नहीं लिया जा सकता , जिनको मज़ा लूटना वो लोग हर ढंग अपनाते हैं। बात राजनेताओं और अधिकारियों की अथवा बड़े बड़े पत्रकारों अभिनय करने वालों या उद्योगपतियों धन्नासेठों की नहीं है। अपराधी से लेकर मनमानी करने वाले वास्तव में इसी मानसिकता वाले लोग होते हैं जो खुद मज़ा लेने को सब से बड़ा काम समझते हैं। ये तो इक भूमिका थी आपको समझाने की कि कीर्तिमान किस को कहते हैं। अब उस योजना की बात जो इक नया ही नहीं नवीनतम कीर्तिमान स्थापित करेगी। फरवरी महीने में 2 8 -2 9 दिन अभी तक होते रहे हैं , इस बार 3 0 दिन का महीना जल्द ही घोषित किया जा सकता है। कब कौन कैसे मत पूछना अभी इसको गुप्त रखना है नोट बंदी की तरह। मगर योजना का मकसद क्या है उसे बताया जा सकता है , यूं भी ये योजना उसी योजना का विस्तार है। बताने की ज़रूरत नहीं है कि नोटबंदी से न काला धन समाप्त हुआ है न गरीबी ही मिट सकी है। ये पैसे वाले अमीर लोग बेहद धूर्त और काइयां तरह के चालाक अवसरवादी होते हैं , इनको सब तरीके आते हैं अपना काम निकालने के। सरकार समझ चुकी है इन से कुछ हासिल नहीं हो सकता , उनको नाराज़ भी नहीं किया जा सकता ये मज़बूरी भी सब जानते हैं।

                   मगर सरकार को आगामी चुनाव से पहले देश से गरीबी नाम का अभिशाप जो विश्व में सब से बड़े लोकतंत्र के माथे का कलंक है उसको दूर करना ही है। तरीका ढूंढ लिया गया है। आपने स्वेच्छा से सबसिडी छोड़ने की बात सुनी होगी , कुछ कुछ उसी तरह की योजना है। गरीबी का प्रमुख कारण जनसंख्या भी है , इस योजना से एक तीर से दो निशाने लगने की बात सच साबित हो जायेगी। सरकारी अथवा गैरसरकारी सर्वेक्षण से पता चला है कि करोड़ों लोग ज़िंदगी से ऊब चुके हैं और मरना चाहते हैं। उनकी समस्या है कि उनको लगता है ख़ुदकुशी करना अपराध भी है और ऐसा करने वाले को लोग कायर भी कहते हैं। सरकार पुलिस पशासन खुद बेशक लोगों का जीना दुश्वार करते रहें , जो ख़ुदकुशी करता है उसके जुर्म का दोषी कौन ये तलाश करती रहती है ताकि ख़ुदकुशी को विवश करने का इल्ज़ाम लगाया जा सके। जबकि हम विश्वास करते हैं जो तकदीर में लिखा वही होता है , जनता की तकदीर में अच्छे दिन विधाता ने अगर नहीं लिखे तो कोई सरकार कोई प्रधानमंत्री कोई राजनेता क्या कर सकता है। तकदीर का लिखा कोई नहीं मिटा सकता है। आप किसी को दोष मत दो मेहरबानी करके।  चलिए अब मुद्दे की बात की जाये , योजना क्या है आगे बताता हूं  , मगर पहले आप शपथ खाओ इस को राज़ रखोगे जब तक खुद सरकार घोषित नहीं कर देती कि ये अफवाह सच है। सच पर यकीन करें अफवाहों पर ध्यान नहीं दें।

                                तीस फरवरी को जीवन मुक्ति योजना शुरू की जानी प्रस्तावित है जिस में सब से पहले जनता को मौत का अधिकार दिया जायेगा और जो भी ज़िंदा नहीं रह सकता या नहीं रहना चाहता उसको जान देने ख़ुदकुशी करने का हक कानूनन मिल जायेगा। धनवान लोग या सनकी लोग कोई बड़ा समारोह या पार्टी भी आयोजित कर शान से मौत को गले लगा सकेंगे। मगर सरकार केवल गरीबों की सहायता हर तरह से इस काम में करेगी क्योंकि ऐसा करने से गरीबों की संख्या के साथ देश की आबादी की जनसंख्या भी कम होगी। जो गरीब भी ख़ुदकुशी करने की अर्ज़ी देगा उसको उसकी मर्ज़ी  की मौत देने का प्रबंध निशुल्क किया जायेगा और किसलिए मरना चाहते जैसा सवाल पूछकर परेशान नहीं किया जायेगा। ख़ुदकुशी के बाद उसको इक शहीद समझा जायेगा और उसके परिजनों को खूब मुआवज़ा दिया जायेगा जिस से उनकी गरीबी खत्म हो सके। ऐसा करने से बहुत लोग ख़ुदकुशी करने को आकर्षित होंगे और सरकार इसको बढ़ावा देना चाहती है। जो लोग नोटबंदी में मारे गये उनको भी इस योजना में शामिल कर सभी लाभ देगी सरकार। अच्छे शहर और खुले में शौच की तरह ही कोशिश की जायेगी गांव - गांव तक ये सुविधा पहुंचाने की। जीवन मुक्ति योजना में सुसाइड सेंटर खोलने में जो भी शामिल होंगे उनको अनुदान मिला करेगा , हर पुरानी योजना की तरह मगर इस में झूठे नाम गलत आंकड़े नहीं चलेंगे। हर मौत का पंचनामा किया जायेगा और ख़ुदकुशी के सबूत रखने होंगे , जो इस योजना में अनुचित करेगा उसकी सज़ा खुद उसी सेंटर में सूली पर टांग कर दी जाया करेगी।

           सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि कुकरमुत्ते की तरह फ़ैल रहे हैं कोचिंग सेंटर। रिहायशी इलाकों  में खोलने  पर अदालती आदेशों की पालना विभाग नहीं करते जिस से महिलाओं बज़ुर्ग लोगों और निवासियों को परेशानी होती है। अभी भी सरकार हर दिन नये नाम से ऐसे लूट के सेंटर खुलवा  रही है। हर योजना ठेकेदार या बिचोलिये असफल करते रहे हैं , उनको शिक्षा स्वास्थ्य या रोज़गार  की जानकारी होती है या नहीं कोई नहीं देखता। मगर मुझे इस योजना का सलाहकार पूरी जांच के बाद बनाया गया है। ख़ुदकुशी को लेकर मेरा चिंतन और शोध मेरे पूरे लेखन में दिखाई देता है। कहानियों कविताओं और व्यंग्य में बहुत जगह ऐसा विवरण मिलता है। मेरी ग़ज़लों में अनगिनित शेर ही इस विषय पर नहीं अपितु इक ग़ज़ल तो लिखी ही इसी को लेकर गई है।

 बाकी शेर बाद में , पहले मेरी ये पूरी ग़ज़ल पढ़ें :-

ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ,
ज़िंदगी तुझसे डर गया कोई।

तेज़ झौंकों में रेत से घर सा ,
ग़म का मारा बिखर गया कोई।

न मिला कोई दर तो मज़बूरन ,
मौत के द्वार पर गया कोई।

खूब उजाड़ा ज़माने भर ने मगर ,
फिर से खुद ही संवर गया कोई।

"ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है" ,
उस पे इल्ज़ाम धर गया कोई।

और गहराई शाम-ए-तनहाई ,
मुझ को तन्हा यूं कर गया कोई।

है कोई अपनी कब्र खुद ही "लोक" ,
जीते जी कब से मर गया कोई।


    बहुत बार पहले ऐसा भी हुआ है , किसी  की मौत पर लोग जमा हुए मोमबत्तियां जलाईं , आंदोलन किया , नारे भी लगाये। सरकार ने तब बहुत बातें कही कोई फंड भी बनाया , मगर उस फंड से किया कुछ भी नहीं गया। लेकिन इस योजना को कोई भुला नहीं सकेगा , इतिहास में लिखा जायेगा कि जब सालों तक देश  की सरकारें गरीबी नहीं मिटा सकीं तब गरीबों को मरने का हक दिया गया। और तमाम अनाम गरीबों ने देश से गरीबी का कलंक धोने को अपनी जानें कुर्बान कर दीं। ये उन्हीं गरीबों  की शहादत है की देश खुशहाल हुआ।

अंत में उन्हीं गरीबों  आत्माओं के नाम मेरी कुछ ग़ज़लों के  कुछ शेर पेश हैं :-

                    ( निर्भया के नाम चार शेर सब से पहले )

बहाने अश्क जब बिसमिल आए ,
सभी कहने लगे पागल आए।

हुई इंसाफ  की बातें फिर भी , 
ले के खाली सभी आंचल आए।

किसी  की मौत का पसरा मातम ,
वहां सब लोग खुद चल चल आए।

नहीं सरकार के आंसू निकले ,
निभाने रस्म बस दो पल आए।


                ख़ुदकुशी पर कुछ और शेर :-

मौत तो दरअसल एक सौगात है ,
पर सभी ने इसे हादिसा कह दिया।

सत्ता का खेल क्या है उनसे मिले तो जाना ,
लाशें खरीद कर जो शमशान बेचते हैं।

अब लोग खुद ही अपने दुश्मन बने हुए हैं ,
अपनी ही मौत का खुद सामान बेचते हैं।

ख़ुदकुशी का इरादा किया जब कभी ,
यूं लगा है किसी ने पुकारा हमें।

हैं  कुछ ऐसे भी इस दौर के चारागर ,
ज़हर भी जो पिलाते हैं कहकर दवा।

हो गया जीना इन्सां का मुश्किल यहां ,
इतने पैदा हुए हैं जहां में खुदा।

                              अंत में देश के रहनुमाओं से इक बात :-

                              सब को जीने के  कुछ अधिकार दे दो ,
                              मरने  की फिर सज़ा सौ बार दे दो।

माना ये दवा बेहद कड़वी है , मगर इक बार पीनी होगी और तमाम समस्याओं से निजात मिल जाएगी। अभी तलक  की सभी सरकारों  की नाकामियों और उनके अपकर्मों पर इस से पर्दा पड़ जाएगा।
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां कहलाएगा।  

फ़रवरी 03, 2017

POST : 594 सब दुखों की एक दवा है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     सब दुखों की एक दवा है     ( व्यंग्य )   डॉ लोक सेतिया

  बिजनेस मैनेजमेंट की क्लास में सभी विद्यार्थी अपना अपना शोध प्रस्तुत कर रहे हैं ।  प्रशिक्षण पूर्ण करने के बाद  कौन क्या क्या कारोबार करेगा ये पता चल रहा है । इक होनहार छात्र बता रहा है आजकल सफल होने के लिये अपने उत्पाद के शुद्ध स्वदेशी सस्ता और असली साबित करना या ऐसा घोषित करना प्रचार द्वारा बेहद ज़रूरी है । आज हर उत्पाद पर किसी न किसी का दावा है उत्तम क्वालिटी का सस्ते दाम पर और प्रभावी होने का । मगर अभी भी ऐसी इक वस्तु है जो असली है और  प्रभावी भी ये कोई भी दावा कर बेचता नहीं है । ज़हर किसी का भी असली मिलता नहीं है उन्हें जो जीना नहीं चाहते ख़ुदकुशी करने को । ठीक होने के लिए दवा नकली खाकर लोग मर जाते हैं लेकिन नकली ज़हर से मौत भी मिलती नहीं है । आप सोचोगे सरकार भला ज़हर बनाने और बेचने देगी , जबकि सभी जानते हैं ऐसा करती है सरकार टैक्स की खातिर । आप ज़हर बनाते किसी और काम की खातिर मगर बिकता किसी और काम आने को है । आप विष का प्रचार किसी भगवान या सुकरात जैसे सच बोलने वाले का नाम जोड़ कर भी कर सकते हैं । यकीन रखें जिसका आजकल बहुत अधिक शोर है हर चीज़ असली बनाने बेचने का उसको मैं अपना ये नया विचार बताकर भी कमाई कर सकता हूं । क्योंकि उसको आता है ऐसा कारोबार कर धनपति बनना , मेरा आदर्श वही ही है । इस  देश में करोड़ों लोग हैं जो जीवन से तंग आ चुके हैं मगर ख़ुदकुशी करने को शतप्रतिशत गरंटी वाला विष मिलता नहीं है । सब दुखों की एक दवा है क्यों न आज़मा ले , स्लोगन भी मुझे उपयुक्त लगता है । 

   योग का शोर बहुत है , दावा है योग से रोगमुक्त होने का ।  योग जितना बढ़ता दिखाई दे रहा है रोगी उससे भी अधिक बढ़ रहे हैं । अभिनेता विज्ञापन करते हैं बीमा करवाते तो ये हाल नहीं होता । जो बीमा करवा कर भी अदालतों में भटकते फिरते उनसे कोई पूछे । सब मिलता है बाज़ार में ईमान बिकता नहीं ईमानदारी मिलती नहीं । बीमा कंपनियां इमानदार नहीं हैं सरकार और इमानदारी का छतीस का आंकड़ा है और अधिकारी कर्तव्य ईमानदारी से निभाना सीखे नहीं कभी । लेकिन टीवी वाले खबर दिखलाते हैं लोग किसी योजना का सामान चुरा कर ले गए । छोटे चोर चोर हैं जो योजनाओं को कागज़ों पर चट कर गए उनका पता ही नहीं । ज़हर को ज़हर बताकर नहीं बेच सकते , जैसे सरकार जनता को लूटती है मगर देश सेवा और विकास की आड़ लेकर । ज़हर भी दवा का काम करते हैं ऐसा शायर भी मानते हैं । जो दवा के नाम पे ज़हर दे उसी चारागर की तलाश है । चारागर डॉक्टर को कहते हैं कभी होगा नहीं मिलते होंगें दवा के नाम पर ज़हर पिलाने वाले , अब तो तलाश करने की ज़रूरत नहीं हर गली मिलते हैं । 
 

 

फ़रवरी 02, 2017

POST : 593 बजट के पिटारे में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

         बजट के पिटारे में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

इंतज़ार की घड़ियां लंबी बहुत थीं , पर जनता ने काट ही लीं । पिया ने वादा किया था इस बार गरीब जनता की बारी है । सब की गरीबी दूर की जाएगी । तीन लाख आमदनी वाले गरीबों से कोई आयकर नहीं लिया जायेगा । पांच लाख की आय वालों को पांच प्रतिशत की छूट दे दी गई है । किस किस को कितनी आमदनी वाले को कितना फायदा हिसाब बताया है । शायद फिर भूल गये उस बदनसीब को जिस की आमदनी है ही नहीं , जगह नहीं तो घर बनाने को कर्ज़ मिलने का क्या करें । जिनकी ज़मीन है उनको कृषि करने को सहयोग की बात की , मगर जो खेतिहर दिहाड़ीदार मज़दूर वो किधर जायें । उनको कैसे इतना मिलेगा कि ज़िंदा रह सकें , मनरेगा की बात लगता भूल गये किनको मिलता काम , ठेकेदार इंसान से नहीं मशीनों से तालाब खुदवाते कम पैसे से । कागज़ पर अंगूठा ही तो लगा दिखवाना है , फोटो भी बना ली जाती हैं । याद आया अब मज़दूरी बैंक के खाते में सीधे मिलेगी , मगर बैंक में खाता कैसे खुलेगा । पैन कार्ड कहां से बनवायें , अब ज़रूरी है । चलो किसी तरह सौ दिन मज़दूरी मिल ही गई तो क्या सब ठीक हो जायेगा । आज़ादी का मतलब क्या दो वक़्त पेट भरना है , बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य उसका क्या होगा । वो तो आपने निजि कारोबारियों को पूरी छूट दे रखी है लूट की । कोई नियम कायदा ही बना देते डॉक्टर या हॉस्पिटल अथवा प्राइवेट स्कूल कितनी फीस ले सकते । ये दोनों पेशे सेवा का दम भरते हैं उनको लूट की इजाज़त नहीं दी जा सकती । सब बाकी बातों को भूल कर ज़रा इतना तो देखते जो पिछले साल बताया कितना वास्तव में किया है ।

             सब की नहीं इक योजना की मिसाल सामने है ।  कहते हैं  पका है  देखने को इक चावल निकाल कर देख लेते हैं सब का पता चल जाता है । पिछले साल आठ लाख तालाब बनाये गये उनकी बात है । काफी तो अधूरे हैं जिनको पूरा बताया गया है । बहुत कुछ लोगों ने अनुदान लेकर अपने खेत में बनाये जो उनकी निजि ज़रूरत को काम आयेंगे ।  मगर असली मकसद किसी से पूरा नहीं होगा , जल को संचित करने का ताकि भूमि के नीचे के जल का स्तर ऊंचा हो सके । सब तालाब ज़मीन पर ऊंचे बने हैं जिनमें पानी बाहर से जमा हो ही नहीं सकता , उनको भरने को नीचे से ही पानी निकाल भरा गया है । जिस से ज़मीन के नीचे का जल और नीचे जायेगा । यही हर सरकारी योजना का सच है । राजधानी के दफ्तर में बैठकर यही किया जाता रहा है हमेशा से ।
                       आखिर में दो शेर :-

             हक नहीं खैरात देने लगे ,
             इक नई सौगात देने लगे !
             रौशनी का नाम देकर हमें
             फिर अंधेरी रात देने लगे।

             (  डॉ लोक  सेतिया )

जनवरी 31, 2017

POST : 592 कलयुग के अवतारों की बात ( तीरे-नज़र ) डॉ लोक सेतिया

           कलयुगी अवतारों की बात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

                       
 आत्मा का मिलन प्रमात्मा से हुआ तो भगवन ने पूछा बताओ क्या क्या पाया जीवन भर में। आत्मा बोली भगवान मुझे नहीं पता क्या पाना था और कैसे पाना था , मुझे तमाम उम्र यही सवाल परेशान करता रहा कि मुझे जीवन मिला किसलिए है। सच बताती हूं मैं कभी जीवन को जी ही नहीं सकी , इसी में उलझी रही क्या इसी को जीवन कहते हैं। शिक्षक मिले धर्म-उपदेशक भी मिले और खुद भी बहुत तरह से प्रयास भी किया ज्ञान प्राप्त करने का मगर नहीं समझ पाई मैं क्यों धरती पर आई। भगवान बोले लगता तुम भूल ही गई तुझे भेजा था धरती पर क्या क्या हुआ क्या होता आया बताने को। तुमको लिखना सिखाया था ताकि जो जो देखो समझो लिखती रहो और याद रखो मुझे आकर बताओ जिन जिन को मैंने जिस जिस प्रयोजन से भेजा वो सब अपना काम ठीक से कर रहे भी अथवा नहीं। मैंने कहा भगवन आपको तो सब मालूम है सभी यही समझते हैं , आप जानते ही हैं दुनिया की हालत कितनी खराब है। लोग बिमार हैं भूखे हैं बदहाल हैं और बेबस और लाचार हैं। सब उम्मीद करते हैं कलयुग में भी आप कोई अवतार लोगे और सभी के दुःख-दर्द मिटाओगे। भगवन ने पूछा क्या तुम्हें कोई अवतार नहीं दिखाई दिया , मैंने तो बहुत भगवा धारी साधु संत सन्यासी और कितने ही जनता के सेवक भेजे हैं जनता का कल्याण करने को। अभी भी दो अवतार हैं भेजे हुए जिनको जनता की गरीबी भूख और बदहाली को , लूट खसूट को दूर करना है और लोगों को स्वस्थ रहने के उपाय समझाने हैं। भगवन ने उन दोनों के चित्र उसे दिखलाये , आत्मा पहचान भी गई मगर हैरान और दुखी भी थी। सोचने लगी भगवान को क्या बताये उसके भेजे कलयुगी अवतार क्या कर रहे हैं। मगर भगवन आत्मा की दुविधा समझ गये और बोले तुम मुझे बताओ ये क्या क्या कर रहे हैं। अब तक तो लोग सभी रोगों से मुक्त हो चुके होंगे और जनता की गरीबी भूख और बदहाली खत्म हो चुकी होगी। ऐसा होने के शोर की बात मुझे हर दिन आत्माएं आकर बताती रही हैं। तुम बताओ अच्छी तरह से कितना कुछ बदला है इन कलयुगी अवतारों ने अब तलक।

           वो आत्मा बोली जिस भगवा भेसधारी बाबा को सभी को निरोग रहने के उपाय समझाने थे , उसने तो लोगों को योग सिखाने का कारोबार कर खूब नाम और धन कमाया है मगर अभी तक रोग या रोगी तो कम हुए लगते नहीं धरती पर। अब तो उसकी इतनी शोहरत है कि उसका नाम बिकता है , हर शहर में उसके नाम से लोगों का उपचार किया जाता है , जाने किस किस को नियुक्त किया हुआ है उसने। बस उसी की बनाई दवायें बेचते हैं गली गली अप्रशिक्षित लोग नीम हकीमों की तरह। और ऐसा कर वो बाबा जी आज दुनिया के गिने चुने अमीरों में शामिल हो चुका है। आजकल तो उसका घी तेल आटा शहद फेस क्रीम सौन्दर्य प्रसाधन से हर चीज़ बिकती है।  ऐसा भी प्रचार है कि जैसे कभी राम जी का नाम लिखने से पत्थर तैर गये थे समुद्र में सेतु बनाने को ठीक उसी तरह उसकी कंपनी का नाम लेबल लगने से हर वस्तु शत प्रतिशत शुद्ध हो जाती है। दो घूंट पीने और योग करने से बताता है लोग रोगों के कुचक्र से मुक्त हो जाएंगे , फिर भी कितनी दवायें भी बेचता है। भगवन आपका ये अवतार तो आज का सफलतम व्योपारी है। दावा है शुद्ध और सस्ता बेचने का फिर भी खूब कमाई होती है , ऐसी अनहोनी पहले सुनी न देखी। लगता कोई घर फूंकने की बात कर भी ऐसी कमाई कर सकता है , कुछ तो राज़ की बात अवश्य है।

           आत्मा ने कहा जिस दूसरे अवतार की बात है उसने जनता को अच्छे दिन का वादा किया तो था , मगर कब आएंगे वो अच्छे दिन ये शायद बताना भूल गया। अभी तलक को अच्छे दिनों की परछाई भी नज़र नहीं आई , मालूम नहीं किसे अच्छे दिन कब नसीब होंगे। कहने को उसने हर दिन इक नया काम करने की घोषणा की है योजनाओं का अंबार खड़ा कर दिया मगर उनसे हुआ कुछ भी नहीं लगता। बस हर नेता की तरह कागजों पर बहुत विकास वास्तव में नहीं कुछ भी। स्वच्छता अभियान भी है इश्तिहारों में और गंदगी भी पहले की तरह ही नहीं शायद और भी अधिक , न गंगा साफ़ हुई , न मेक इन इंडिया , स्टार्ट अप इंडिया से घर घर शौचालय और सुंदर शहर कहीं सच में दिखते हैं। कितने लोग मर गये इक योजना में मगर न काला धन खत्म हुआ न ही नेताओं अधिकारियों की लूट ही बंद हुई है। जिनको सपने दिखलाये थे गरीबी मिटाने के वो ख़ुदकुशी तक करने को विवश हैं , सर्वोच्च अदालत भी परेशान है। राजनीति में अपराधी आज भी खुद उन्हीं की सभा में उनके साथ मंच पर बैठते हैं और उन्हीं के भाषण में महानता की उपाधि पाते हैं। शासक बनते ही अपनी सत्ता का विस्तार सभी राजनेता हमेशा ही चाहते रहे हैं , ये भी उन्हीं की राह पर हैं , अलग नहीं हैं। उनको जनता की बदहाली मात्र इक उपहास लगने लगती है शासक बनते ही। आये थे हरि-भजन को ओटन लगे कपास की तरह अच्छे दिन की बात कर आये थे और ला रहे और भी खराब दिन। व्यवस्था जैसी थी वैसी चल रही है , नहीं बदला कुछ भी केवल नाम ही बदले हैं। आत्मा सोच कर आई थी मरने के बाद स्वर्ग नहीं तो नर्क ही मिलेगा , मगर यहां तो कुछ भी दिखता , भगवन से पूछा मुझे किधर भेजोगे बता तो दो। भगवान बोले मैंने तो दुनिया को स्वर्ग ही बनाना चाहा है हमेशा और ऐसा कैसे करना इंसानों को राह दिखलाने और समझाने को अवतार भी भेजता रहा , मगर लगता कलयुग में उनकी मति मारी गई जो अपना दायित्व भुला बैठे हैं। परमात्मा अंतर्ध्यान हो गये हैं , आत्मा खड़ी है अकेली अचरज में भगवन की बातें सोचती।

जनवरी 27, 2017

POST : 591 कोई नन्हा फ़रिश्ता आज भी आ जाता ( बात फिल्मों-संगीत-साहित्य-कविता-कहानियों की ) डॉ लोक सेतिया

         मैं , मेरी फ़िल्में , मेरे गीत , मेरी शिक्षा ( लोक सेतिया )

   मुझ में अगर थोड़ा सा कोई अच्छा इंसान है , इंसानियत की समझ है , दूसरों के दर्द को समझने की संवेदना है , तो वो किसी शिक्षक किसी धर्म प्रवचक या किसी गुरु का दिया ज्ञान नहीं है। ये सब मुझे मिला है इक आदत से जो किसी ज़माने में अच्छी आदत नहीं समझी जाती थी। बचपन से संगीत का चाव और मेरी आवाज़ भले बहुत सुरीली नहीं हो तब भी हर दम गाने-गुनगुनाने का शौक। कॉलेज गया तो फिल्मों से जैसे इश्क़ ही हो गया। सोचता हूं अगर आज के इस युग में मैं पला बढ़ा होता तो कैसा बनता , कठोर हृदय मतलबी , चालबाज़ , खलनायक , या कोई ज़ालिम जो बदले की आग में कातिल बन गया। भगवान का शुक्र है मैं उस युग में पला और बढ़ा जिस में माफ करना और नफरत को प्यार से जीतना सिखाया जाता था। आज सुनते हैं किसी फिल्म ने कितने सौ करोड़ का कारोबार किया , मगर किस कीमत पर , इंसान को हैवान या शैतान बनाने की कीमत पर। आज मैं खुद लिखता हूं ग़ज़ल कविता कहानी , मगर मुझे अभी तक लगता नहीं कुछ भी वास्तविक सार्थक लेखन किया है मैंने। इतने साल कलम घिसाई ही की है , काश इक कविता इक ग़ज़ल इक कहानी ऐसी लिखता जो सच में संदेश देती मानवता का। थोड़ा प्रयास किया है , हिलती हुई दिवारें कहानी , औरत कविता , दोस्त बनाने चले हो ग़ज़ल , सत्ताशास्त्र जैसा व्यंग्य जैसी कुछ रचनाएं हैं जिनको मैं समझता हूं कुछ तो सोचने को विवश करती होंगी। मेरी पसंद की फिल्में कई हैं , सफर , ख़ामोशी , बहारें फिर भी आएंगी , नया दौर , नया ज़माना , सैकड़ों हैं। मगर इक फिल्म जिसकी मुझे लगता आज भी फिर से बनाने की या उसी को फिर से दिखाने की बेहद ज़रूरत है वो है " नन्हा फरिश्ता "।

                        हम सब अपने भीतर झांक कर देखें तो अपने अंदर इक डाकू इक ज़ालिम इंसान इक बेरहम लुटेरा मिल सकता है। इक छोटी सी बच्ची तीन डाका डालने आये डाकुओं को घर में अकेली मिलती है जिसे इक डाकू उठा साथ ले जाता है। और पूरी फिल्म झकझोर देती है भावनाओं को जब इक मासूम फरिश्ता उन खूंखार डाकुओं को अच्छे इंसान बना देता है। मुझे भी लगता है मैं आज भी बहुत बुरा हूं और चाहता हूं कोई उस जैसा नन्हा फरिश्ता मुझे बदल दे और मेरे भीतर से सारी बुराई को मिटा मुझे अच्छा आदमी बना दे। काश कोई फिल्म निर्माता दोबारा ऐसी कहानियों पर फिल्म बनाये बेशक उस फिल्म से करोड़ों रूपये नहीं मिलें पर करोड़ों दिलों को बदल दे जो।





जनवरी 25, 2017

POST : 590 इक गुनाह है गरीबों से मज़ाक है ( जश्न कैसा ) डॉ लोक सेतिया

  इक गुनाह है गरीबों से मज़ाक है ( जश्न कैसा ) डॉ लोक सेतिया

   मना लो जश्न कि वतन आज़ाद है , कौन करता गरीबों से मज़ाक है , झांकियां देखना ताकतवर हैं हम , मत बताना किसी को कि भूखे हैं हम। हर साल ये बेरहमी का नज़ारा होता है , किसको मालूम गरीबी में कैसे गुज़ारा होता है। आज तक देश के रहनुमाओं से नहीं सवाल किया , अब बताओ तो क्या क्या है कमाल किया। कितना धन किया बर्बादी के सामान पर , कर सकते जंग पानी में और आसमान पर। जंग लड़नी थी भूख से गरीबी से , नहीं गिला हमको आपकी अमीरी से। चलो आज पूछते हैं उसी से जिसने बताया था सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा , आज देख लेता तो मिटा देता नहीं लिखता दुबारा। सबको याद उसका यही गीत रहा , कोई नहीं सोचता उसी ने था ये भी कहा।

                      उट्ठो मिरी दुनिया के गरीबों को जगा दो ,
                      काखे-उमरा के दरो-दीवार हिला दो।    
                
                       ( काखे-उमरा = अमीरों के महल )

                  जिस खेत से दहकां को मयस्सर नहीं रोज़ी , 
                        ( दहकां = किसान )
                  उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गन्दुम को जला दो।          
                   ( ख़ोशा-ए -गन्दुम = गेहूं की बाली )

आज तक किसी ने ये नज़्म आपको सुनाई , इसको शायर ने " फरमाने-ख़ुदा " शीर्षक दिया था। चलो आज उसी की ज़ुबानी सुनते हैं कुछ और भी जो कल भी सच था और आज भी सच है।

            सुन तो ले मिरी फरियाद , ये भी इक़बाल जी का कलाम है , ज़रा दो शेर देखते हैं :-

                    असर करे न करे सुन तो ले मिरी फरियाद ,
                   नहीं है दादा का तालिब यह बन्दा -ए -आज़ाद।    
      
                    ( वाह वाह चाहने वाला नहीं हूं मैं )
             
                       कसूरवार -ओ-गरीबउदयार हूं लेकिन ,
                     तिरा खराबा फ़रिश्ते न कर सके आबाद।

    कल जो नेता भाषण देंगे बड़ी बड़ी बातें कहेंगे देश की प्रगति की। हम कितने ताकतवर हैं , क्या क्या नहीं कर सकते अब। वही चुनाव में घोषणा कर रहे हैं मुफ्त में दाल रोटी से ज़रूरत का हर सामान तक। कैसा लोकतंत्र है कौन दाता है किसको भिखारी बना दिया है , लानत है ऐसी देश सेवा पर जो खुद ऐश आराम से राजा की तरह रहते और जनता को मालिक से गुलाम बना रहे और इसको भी उपकार समझते।  करोड़ों लोग भूख से और समस्याओं से मरते हों और आप हर दिन जश्न मनाते हैं इसको गुनाह ही समझना होगा। जाने कब इनके पापों का घड़ा फूटेगा।  क्या आप शामिल होंगे ऐसे आज़ादी के जश्न के आयोजन में , देश की बदहाली को अनदेखा कर के। सोचना ज़रूर।  


जनवरी 24, 2017

POST : 589 मोक्ष की चाह है सबको ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      मोक्ष की चाह है सबको  ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिये , ये हमारे वक़्त की सब से बड़ी पहचान है । दुष्यंत कुमार को तब भी पता था कुछ रास्ते आरक्षित हैं खास लोगों के लिये । मोदी जी से नासमझ लोग उम्मीद करते हैं कोई चमत्कार करेंगे , सब ठीक कर देंगे । परिवारवाद को खत्म करने , अपराधियों को राजनीति से निकाल बाहर करने की बातें क्या भाषण तक । अभी जिन राज्यों में चुनाव हैं उसकी असलियत क्या है ज़रा ध्यान देना । उम्र भर जो किसी ऐसे दल में था जिसको खुद मोदी जी इक घर की पार्टी बताते हैं , नब्बे साल की उम्र में अपने दल में शामिल कर क्या साबित करना चाहते हैं । सच तो ये है मछली जल में रहती है फिर भी बास अर्थात बदबू नहीं जाती , और ये राजनीति तो कभी का गंदा गटर बन चुकी है । आप विज्ञापनों से इश्तिहारों से उसको गंगा साबित नहीं कर सकोगे । आपके दल में तीस प्रतिशत उम्मीदवार बड़े बड़े राजनितिक परिवारों से जुड़े हैं , आपके गठबंधन में तमाम दल किसी एक नेता की जागीर हैं , आपने खुद तमाम बाहुबलियों को चुनाव में टिकट दिया है , कितने आपराधिक मुकदमें जिस पर दायर हैं उसको प्रधानमंत्री जी न केवल अपने मंच पर जगह देते हैं बल्कि उसका नाम लेते हैं सभा में आदर के साथ माननीय अमुक जी कहकर । मोदी जी जिस पर पर चलकर अभी तक सभी रसातल में जाते रहे हैं आप कैसे उसी पर चल आसमान को छू लेंगे । आपके दल में या बाकी दलों में ही जब कथनी और करनी में इतना विरोधाभास है तब होगा क्या । कितनी विडंबना की बात है कि आपने भी संविधान की भावना की कदर नहीं की , सभी नागरिक समान हों कैसे ।

             आप काला धन खत्म करना चाहते हैं ऐसा दावा करते हैं , आपकी सभाओं में अपार भीड़ है ये भी बताते हैं , मगर ये क्यों नहीं बताते कि हर सत्ताधारी की सभा में भीड़ क्यों और कैसे एकत्र की जाती है । मगर कहते हैं हवन करते हुए भी लकड़ी में जीव अगर होते हैं जल जाते हैं , हम शाकाहारी गोबर के उपले जलाते हैं मगर सोचते ही नहीं उसमें कितने जीव मर गये जलकर । हमारी पवित्रता की परिभाषा विचित्र है । ठीक उसी तरह नेताओं के मापदंड अपने लिये अलग औरों के लिये अलग होते हैं । उस दल का पापी अपने दल में आकर पुण्य आत्मा बन जाता है , आपने दल से जो दूसरे दल में चला गया वो पापी और स्वार्थी कहलाता है । कोई किताब है जो केवल नेताओं को पढ़नी आती है , जिस में अच्छा आरक्षण बुरा आरक्षण , अच्छा दलबदलू बुरा दलबदलू , और टिकट देने को अच्छा धनवान और बुरा धनवान , किसको समझते बताया हुआ है । आप जनता को झूठ से बहलायें तो देशहित और कोई और बहलाये तो दलगत स्वार्थ , शायद इसी को राजनेताओं का धर्म कहते हैं जिस में पाप ही पुण्य है और पुण्य भी पाप है । जीत वो मोक्ष है जिसकी चाहत सभी को है , मोक्ष जीते जी नहीं मिलता , जीत भी अपनी अंतरात्मा अपना ज़मीर और तमाम नैतिक मूल्यों को छोड़ कर ही मिलती है । राजनीति तभी कहते हैं वैश्या जैसी होती है , हर दिन बदलती है अपना रंग , अपना प्रेम का ढंग भी । कुर्सी की चाहत इतनी बढ़ती गई है कि राजनेता स्वर्ग मोक्ष से अधिक सत्ता की खातिर बेचैन हैं अभी जीना है मरने के बाद क्या मिलता है इसकी परवाह कौन करे । कुर्सी मोक्ष से अधिक सुंदर है तभी सब दीवाने हैं उसी के पाने को क्या क्या नहीं करते नेता लोग । 

इसी जीवन में मोक्ष कैसे प्राप्त करें? | Hindi Podcast | How to Get  Salvation in This Life? - YouTube

जनवरी 20, 2017

POST : 588 कहा विकास किया विनाश ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       कहा विकास किया विनाश ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

धीरे धीरे चली जब हवा
सत्ता को आया नहीं मज़ा
और तेज़ करनी है रफ्तार
कहती रही हर सरकार ।

हवा बन गई देखो आंधी
आंधी से बनी फिर तूफ़ान
उड़ा ले गई झुग्गी झौपड़ी
तबाह होते गये सब किसान
बाहर रौशनी भीतर अंधकार
है ऐसा अपना भारत महान ।

इक राक्षस की नई कहानी
सुन लो आज मेरी ज़ुबानी
फैला इतना विकास देखो
विनाश की बन गया पहचान
जाने कैसी राह पे चले हम
सोच सोच होते लोग हैरान
बड़े ऊंचे महल बने घर हैं  
जिनमें छोटे दिल इंसान ।

किस को बनाया मसीहा

किस को कहते रहे शैतान
बहुत ऊंची हैं दुकानें जिनकी

फीके उनके निकले पकवान
इस राक्षस को मिली सुरक्षा
इसकी बड़ी निराली शान
पाया जनता ने क्या उससे
भाग भाग बचाई है जान । 
 

 

जनवरी 15, 2017

POST : 587 बिकाऊ माल अर्थात ब्रांड होना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    बिकाऊ माल अर्थात ब्रांड होना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       " कैसे बाज़ार का दस्तूर तुम्हें समझाऊं , बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता। "

आज महत्व ब्रांड होने का है , ब्रांड होना ऊंचे दाम बिकना है। लोग अपने नेता को ब्रांड बता रहे हैं , उनकी शान बढ़ा रहे हैं। सच गांधी जी कोई ब्रांड नहीं थे , शुक्र है उनको लाख प्रयास कर के भी कोई बाज़ार में बिकता ब्रांड नहीं बना पाया। कभी वो लोग महान समझे जाते थे जिनकी कोई कीमत नहीं लगा सकता था , जो किसी भी दाम बिकने को तैयार नहीं होते थे। अब तो माना जाता है सब बिकते हैं सब को खरीदा जा सकता है बस मोल अपना अपना है। गरीब दो रोटी में बिक जाता है , मज़बूरी इक मां को दो हज़ार में बच्चा बेचने को विवश कर देती है , और गरीब की गरीबी और जनता की बदहाली की बातें कहकर कोई राजनीति करते हुए ब्रांड बन जाता है। कोई दूसरा ब्रांड योग और आयुर्वेद से लेकर हर शुद्ध वस्तु को बेच मालामाल हो जाता है , जबकि उसके पास आयुर्वेद की कोई शिक्षा ही नहीं है। वो अपने विज्ञापनों में कहता है " मेरा विश्वास है जो योग करेगा और दो घूंट रोज़ पियेगा वो रोगों के कुचक्र में ही नहीं फंसेगा। " आपको मालूम है इसका अर्थ , विश्वास है भगवान है , मगर विश्वास है ऐसा करने से रोग नहीं होंगे , में अंतर है। विज्ञान मात्र विश्वास पर नहीं चलता , आयुर्वेद भी इक चिकित्सया शास्त्र है कोई धर्मकथा नहीं। मुझे नहीं पता इस तरह किसी बात को बेचने को क्या कहा जाये , मगर इतना जनता हूं ऐसा कर किसी ने न आयुर्वेद न ही योग की भलाई की है। फिर भी अगर आप सवाल करें तो आपको बताना ज़रूरी है विज्ञान तथ्य और प्रमाण पर आधारित होता है। किसी भी दावे को परखा जाता है ये जांच कर के कि उसके उपयोग से कितनों को क्या लाभ हुआ। किसी की दुकान गली गली खुल गई इतना काफी है उसके व्योपार की सफलता के लिये , मगर कितने प्रतिशत रोग कम हुए या लोग तंदरुस्त हुए पहले से ये कौन बतायेगा।  स्वास्थ्य विभाग और डब्ल्यू एच ओ नहीं मानता देश में रोग या रोगी कम हुए।

      असली सवाल बाकी है , क्या बिकना और ब्रांड होना गर्व की बात है। उनके नाम से मुनाफा होता है उनके दल वालों को लगता है , फिर तो उनकी तस्वीर हर जगह लगवा दो , कुछ आधुनिक संत अपनी तस्वीर अपने अनुयायियों को कुछ हज़ार में अपने हाथ से आशिर्वाद के साथ देते हैं , चोखा धंधा है। कुछ अभिनेता भी अपनी फोटो किसी के साथ भी करवाते हैं पैसे लेकर , उनकी कमाई होती है इसी तरह। कभी लोग बाज़ारी होना अपमान समझते थे , आज बाज़ार बताता है आपका मोल कितना है। इक और दल के नेता का उपहास किया जाता है कि उसका खरीदार कोई नहीं , यहां कल क्या हो जाये क्या पता। कल वही सत्ता पर काबिज़ हो जाये तो लोग जनता क्या मीडिया तक उसका गुणगान करेंगे , उसके फोटो भी विज्ञापन में दिखाई देंगे नित नई योजना की घोषणा के साथ। अब समय आ गया ही शेयर बाज़ार में राजनीति के शेयर भी दर्ज हों और उनका भाव भी बढ़ता गिरता नज़र आता रहे। जब यही सब से बड़ा कारोबार है जिस में आकर सभी अरबपति बन जाते हैं तो इसको खुले बाज़ार की अर्थव्यवस्था में शामिल करना ज़रूरी है। कब तक आम आदमी दूर से तमाशा देखता रहेगा , सभी को सत्ता की भागीदारी की इजाज़त मिलनी चाहिए। जो चाहे जिस राजनितिक दल के शेयर खरीद सके और जब वो दल सत्ता में आये तब अपने शेयर मनचाहे भाव पर बेच सके। सरकार इसको गरीबी की योजना में शामिल कर सकती है। अजीत जोगी और जूदेव जैसे महात्मा पहले ही राजनीति में धन के महत्व पर प्रवचन दे चुके हैं। आज इंसान भी इक वस्तु बन चुका है और उसकी कीमत लगाई जाती है , विधायक और सांसद भी बिकते खरीदे जाते हैं ये भी अब राज़ की बात नहीं है। बड़े बड़े उद्योगपति हर दल को चंदा देने की तरह हर दल के शेयर खरीदा करेंगे और जिस दिन उनके पास इतना धन होगा की बहुमत संख्या के विधायक खरीद सकें सरकार बनाने का दावा पेश कर सकते हैं। जो अभी तक परदे के पीछे होता आया चोरी से अब कानूनी तौर पर खुलेआम होगा। इधर इक दलाल बता रहा है कि राजनीति में ईमानदारी की कीमत माइनस में आ गई है और बेईमानी को मुंह मांगी कीमत मिलने लगी है। आप कुछ शेयर बेईमानी के खरीद कर और कुछ हेरा फेरी दल के भी साथ फ्री पाकर शुरुआत तो करो , इसमें सभी ब्रांड उपलब्ध हैं , लाल , भगवा , नीला  , हरा , अब तो काला भी शामिल हो चुका है , बहुरंगी तो है ही।

             ऊपर स्वर्ग लोक में बहस चल रही है , एक अंग्रेज़ की आत्मा भारतीय आत्मा से कह रही है , तुम क्या समझते थे हम देश को लूट रहे हैं , हमें बाहर निकाल दिया था। क्या शिक्षा दी थी तुमने चरित्र निर्माण की , आज हर बात को बेचा जा रहा खरीदा जा रहा , मूल्य आदर्श भी तोले जा रहे सत्ता के तराज़ू पर।  और  देख लिया झूठ का पलड़ा भारी है सब उधर झुके हुए हैं , सच की कद्र कुछ नहीं उसकी कीमत दो कौड़ी भी नहीं है। तुम सत्य अहिंसा की पुजारी थे , तुम्हारी समाधि पर फूल चढ़ाने वाले तुम्हारी सोच को कत्ल करते हैं। खुद विदेशी कम्पनियों को बुलाते हैं , स्वदेशी की बात कोई नहीं करता। गांव में देश बसता है तुम मानते थे , अब गांव भी गांव जैसे नहीं हैं , चरखा आज मिलता ही नहीं कहीं। आपको पता है लोग मन्नत मांगते हैं बहुत सालों से मांगते आये हैं और मन्नत पूरी होने पर चरखा लोहड़ी में जलाया करते थे , आज चरखा नहीं मिलता बस इक मॉडल छोटा सा बिकता है रस्म निभाने को। 2 अक्टूबर 3 0 जनवरी को रस्म निभाते हैं नेता। सत्तर साल हो गये हैं अभी तक देश के अंतिम आदमी के आंसू कोई पौंछता  क्या देखता तक नहीं है।

जनवरी 14, 2017

POST : 586 भीतर मिट्टी बाहर चूना , दिल्ली शहर नमूना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      भीतर मिट्टी बाहर चूना , दिल्ली शहर नमूना ( व्यंग्य ) 

                                     डॉ लोक सेतिया

ये अंदर की बात है , बाहर दिन का उजाला है भीतर अंधेरी रात है। इंसानियत का सूखा पड़ा है ये कैसी बरसात है। सत्ता के खेल में मोहरे हैं सब लोग , राजनेताओं की शह है कभी मात है। कमल उनका हाथ उनका उनका हाथी उनकी साईकिल उनकी हँसिया हथौड़ा और तारा है जनता को मिली सभी से पीठ पर उनकी लात है। कहने की नहीं है बस समझने की बात है। बाहर किसी को नहीं बतानी ये अंदर की बात है। ये हमारा समाज है जो अपने हर गुनाह को किसी गलीचे के नीचे दबा कर छुपा कर रखता है। कभी कोई खिड़की खुलती है और कोई तेज़ हवा या आंधी आती है जो सारे परदे हटा देती है बिछे कालीन उतार फैंकती है और सब नंगा दिखने लगता है। कमाल ये है तब भी हम तथाकथित सरकार प्रशासन और आला अधिकारी अपनी करतूतों पर शर्मसार नहीं होते इस बात पर कि हमारे भीतर कितना गंद भरा है , बल्कि हम सोचते हैं ये क्यों हुआ और फिर सच सामने नहीं आये इसका उपाय करते हैं। ये कहना कि जिसके साथ अन्याय हो उसको बाहर किसी को नहीं बताना चाहिए हमारे पास आकर रोना चाहिए। जब कि न पहले उनको किसी का दर्द समझ आया न आगे कभी दिखाई देना ही है। सरकार की सभी योजनाओं की हक़ीक़त यही है , दिल्ली शहर नमूना अंदर मिट्टी बाहर चूना। और ये कहावत आज की नहीं पुरानी है। महलों में युगों से अत्याचार ऐसे ही होते आये हैं , विरोध को दीवारों में ज़िंदा चुनवा दिया जाता है। आज भी शासक चाहते हैं अंदर की घुटन कोई बाहर नहीं आने दे , घुट घुट के मरना अनुशासन है। तानाशाही का मतलब यही होता है , अन्याय करने वाला ही इंसाफ भी करता है। फिर लोकतंत्र क्या है , सच बोलने की आज़ादी नहीं है तो सत्यमेव जयते को हटा दो जहां कहीं लिखा है।

             सवाल सर्फ सेना और सुरक्षाबलों का नहीं है। घर में बहु पर अत्याचार करने वाले भी यही चाहते हैं बहु खामोश ही रहे , परिवार की लाज के नाम पर गुलाम बनी रहे। इतना ही नहीं सभी संगठन यही चाहते हैं , उनकी असलियत किसी को पता नहीं चले। राजनीति तो है ही इसी का नाम , बाहर दिखाने को लोकतंत्र है , भीतर किसी की मनमानी या किसी की तानाशाही। कोई भी दल अपने आम कार्यकर्ता क्या विधायक सांसद तक को अपनी राय बताने की आज़ादी नहीं देता , व्हिप का चाबुक उनको भेड़ बकरी की तरह जिधर आदेश उधर चलने को मज़बूर करता है। और हम कहते हैं हम आज़ाद हैं , तो आज़ादी है क्या।  जनता की आज़ादी वहीं तक है जहां तक सरकार को कोई चुनौती नहीं दिखाई दे।

                   आपको तमाम योजनाओं की जानकारी दी जाती है , मेक इन इंडिया , स्टार्ट अप इंडिया , रोज़ इक नया नाम। भीतर की बात अभी भी भीतर छुपी हुई है , गरीबी मिटानी तो है मगर कैसे , कुछ ऐसे कि गरीब मिट जायें मर जायें और उनका नामोनिशान तक नहीं रहे ताकि ये अभिशाप खत्म हो। न बचेगा कोई गरीब न बाकी रहेगी गरीबी। इस योजना पर काम जाने कब से चल रहा है , हालात बनाये जाते रहे हैं ताकि गरीब ज़िंदा ही नहीं रहे मर जायें सभी गरीब। ख़ुदकुशी का सामान खुद सरकार देती है सस्ते दाम पर , मौत सस्ती है ले लो , ज़िंदगी बहुत महंगी है उस पर अमीरों का नेताओं का अफसरों का धन्ना सेठों का हक है। सरकार की मज़बूरी है इस योजना को खुलेआम नहीं बता सकती। बस इतना ही करती है कि समस्या को हल ही नहीं करो , बनाये रखो उस सीमा तक जब लोग तंग आकर खुद ही मौत को चुन लें। किसी शायर का इक शेर है :--

                                   वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता ,
                                  तो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवायें नहीं दीं।

सरकार ज़ालिम है पापी नहीं , आपका ईलाज नहीं करती मगर आपको ज़हर भी नहीं दे सकती।

जनवरी 11, 2017

POST : 585 दाग़ मिटाने का शर्तिया उपाय ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

 दाग़ मिटाने का शर्तिया उपाय ( हास्य कविता )  डॉ लोक सेतिया   

परेशान क्यों होते हैं जनाब
बुरे नहीं होते सभी दाग़
आप जैसे भी हैं सच्चे हैं
आप पर लगे दाग़ अच्छे हैं ।

आप से पहले भी आये लोग
हमने सभी के मिटाये दाग़
लोग कहते रहें उनको चोर
फैसला हमने किया कर गौर
झूठ अपराध का नहीं निशान
बस इसी से बढ़ गई थी शान
बरी जो हुआ वो नहीं गुनहगार
फिर से बन गई थी सरकार ।

सुन जो आज इनकी भी बात
अदालत को नहीं भाया सबूत
आप मान लो नहीं ली घूस
हुई नहीं कभी ऐसी करतूत ।

कल तलक यही कहते थे औरों को
घोटालों के हो गुनहगार
उन पर भी किसी अदालत ने अभी
दिया क्या कोई निर्णय सरकार ।

चारा घोटाला  हवाला घोटाला या
चाहे कोई भी हुआ घोटाला
नहीं साबित हुआ आज तक
किसी का अपराध सुनो रे लाला ।

बस अदालत जब कहती नहीं हैं
काफी सबूत जुर्म होने के
समझो दिन ख़ुशी के हैं
अब नहीं आजकल दिन रोने के ।

बड़े बड़े वकील छोटी से बड़ी
अदालत तक का लंबा सफर
डिटरजेंट बहुत मिल जाते
 हैं हर किसी के दाग़ धोने के ।

जनता बेशक कभी किसी को
आरोप मुक्त करती नहीं
सच ये है सज़ा किसी को
भी मिलती अभी तक नहीं ।

बातें बहुत मगर तुम्हें कहना नहीं
कुछ सिवा शब्द तीन
अभी नहीं आया निर्णय
मुझे अदालत पर है पूरा यकीन ।

सोचो अगर अभी तक जिन जिन
घोटालों में नहीं हुआ फैसला
क्या यही समझ लिया जाये
वो सब सच में नहीं हुआ ।

जांच आयोग कितने खुद ही
बिठाये नेताओं ने बार बार
खोदा पहाड़ कितना निकाली
मरी चुहिया ही सरकार । 
 

 

जनवरी 09, 2017

POST : 584 आपका आदेश है , हमारी आज़ादी नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   आपका आदेश है , हमारी आज़ादी नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    पिता कहते हैं मैं ऐसा चाहता हूं , बच्चों को मानना पड़ता है , अपनी मर्ज़ी नहीं चलती। मगर पिता की हर बात सही हो ये भी ज़रूरी नहीं , जब अनुचित बात माननी पड़ती है तभी एक हद के बाद विद्रोह होता ही है। पिता की समझदारी इसी में है कि उस हद तक मनमानी नहीं करे। सरकार चाहती है अब लोग अपना पैसा अपनी सहूलियत से नहीं खर्च करें , नकद खरीदारी नहीं कर कार्ड से या चेक से भुगतान करें। सरकार को काले धन को रोकना है मगर रोक काले धंधों पर नहीं लोगों पर लगाना चाहती है। नहीं समझे , कल थानेदार आपको आदेश दे घर में पैसा सोना या कीमती सामान नहीं रखो ताकि चोर चोरी नहीं कर सके। उसका सीधा मतलब यही है कि चोरों पर पुलिस का बस नहीं चलता इसलिए शरीफ लोगों पर ही हुक्म चलाते हैं , आपकी गलती है आप सभी रात को सो जाते हो। अगर कोई न कोई जागता होता तो खुद ही चोर को पकड़ लेते , भाई ये नया चौकीदार यही तो चाहता है "जागते रहो "। सोना मना है इस राज में , चैन से सोना तो गुनाह है। अब आप आज़ाद हैं मगर आपको आज़ादी उतनी ही मिलेगी जितनी सरकार चाहेगी। पैसा आपका है मगर आपको सप्ताह में कितना निकालना है ये आपकी मर्ज़ी क्या ज़रूरत पर भी निर्भर नहीं। आप आज़ाद हैं उसी तरह जैसे खूंटे से बंधा जानवर , उसकी रस्सी जितनी है उतनी दूर तक आजा सकता है। तो ये नया तरीका है जनता को खूंटे से बांध नेता लोग छुट्टे सांड की तरह घूमेंगे , उन पर कोई बंदिश नहीं। प्रशासन और सरकार जब जैसे सुविधा हो नियम बदल सकती है , आम नागरिक ही कुछ नहीं कर सकता अपनी सुविधा से। लोकतंत्र मैं और तानाशाही में अब कोई अंतर नहीं रहा , बस जो भी आदेश है आपकी भलाई में है। स्वीकार करना लाज़मी है।

                  कल ऐसा भी मुमकिन है सरकार का बयान आये वो चाहती है लोग शाम होते ही घर में बंद होकर खिड़की दरवाज़े बंद रखें अपनी सुरक्षा की खातिर। अर्थात वो जनता को सुरक्षा देने में नाकाम है। किसी भी अपराध को रोकने का ऐसा तरीका उचित नहीं है। आप अपनी नाकामी या कर्तव्य नहीं निभाने को इस तरह जनता पर अनुचित प्रतिबंध लगा सही नहीं साबित कर सकते। आपको भ्र्ष्टाचार रोकना है , अंकुश उन पर लगाना था जो घोटाले करते हैं , हर काम में रिश्वत खाते हैं , या जो अवैध धंधे करते हैं। आम नागरिक पर अनावश्यक रोक लगा आप अपनी हार मान रहे हैं कि बदमाशों को पकड़ना मुश्किल है तो शरिफ को ही समझाते हैं खुद बदमाश से बचकर रहो। यही आपका तरीका है पुलिस हवालदार वाला , जो सभ्य नागरिक को ही कहता है आप अपराधी के अपराध की बात किसी प्रशासन को मत बताओ। सच है , जिस देश में प्रधानमंत्री का दफ्तर ही ऐसा हो , जिसे कोई सत्येंद्र दुबे जैसा ईमानदार अफ्सर पत्र लिखे भ्र्ष्टाचार की सूचना देने को , और ये जानकारी भृष्ट लोगों तक पहुंच जाये और उसका कत्ल कर दिया जाये , उस देश में और क्या हो सकता है। चुप रहने में भलाई है , सच बोलना मौत को बुलावा देना है। मैंने भी खुद देखा है झेला है इसी शासन में। अंधेर नगरी चौपट राजा , सुना था अब देख भी लिया है। 

 

जनवरी 08, 2017

POST : 583 काठ की हांडी से लेकर हाथी के दांतों तक की बात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   काठ की हांडी से लेकर हाथी के दांतों तक की बात  ( व्यंग्य ) 

                                         डॉ लोक सेतिया

 अभी की बात है इक रियल्टी शो में कुछ लोगों को पहले चुना गया फिर जब उनमें से आधों को आगे शो में रखना था तब उन सभी को एक साथ बाहर कर दिया गया। जब लिया था तब उनको आम भाग लेने वालों से अधिक बेहतर बताया गया क्योंकि उन सभी में कोई न कोई शारीरिक कमी थी जिसके बावजूद उनकी पतिभा हारी नहीं उनका हौसला टूटा नहीं। कुछ बातें कैमरे पर की जाती हैं कुछ सच ऑफ दि रिकॉर्ड बताई जाती हैं , ऑफ दि रिकॉर्ड सच ये है कि उनको लिया ही इक मकसद से गया था। वो मकसद पूरा हो गया एक बार दर्शकों की वाहवाही लूट कर कि कितने संवेदनशील हैं जज करने वाले लोग। ये हर टीवी शो में कभी न कभी होता है , मगरमच्छ के आंसू बहा दिखलाते हैं। कौन बनेगा करोड़पति में भी यही दर्शाया जाता था कि वो कितने गरीबों की भलाई करते हैं। लोग तो करोड़पति नहीं बने आयोजक और प्रायोजक से संचालक तक अरबपति होते गये। नेता हमेशा से गरीबों की गरीबी दूर करने की बात करते आये हैं और खुद सत्ता पाकर मालामाल होते आये हैं। आज भी जो सत्ता में है उसकी सभाओं की भीड़ और शान मुफ्त की नहीं है , हर सभा करोड़ों रूपये खर्च कर आयोजित की जाती है। क्या उनके पास कोई पेड़ है जिस पर नोट बंदी के बावजूद भी नोट उगते ही हैं , जी हां उनको चंदा बेहिसाब मिलता है। मगर चंदा देने वाले गणित में कमज़ोर नहीं होते , सब हिसाब पहले गिना करते हैं।

                    तो अब ये चुनाव सत्ताधारी दल उस बात का ज़िक्र बिना किये लड़ना चाहते हैं , जिस बात से उनको जीत मिली थी , अच्छे दिन आने वाले हैं। अब बात होने लगी है गरीबों की गरीबी की , खुदा खैर करे , गरीब डरते हैं ये सुनकर। जब जब गरीबी की बात हुई गरीब और गरीब हुए हैं। बात दरअसल हाथी के दांतों की है , गरीबी की बात दिखाने वाले दांत हैं , खाने वाले हाथी के मुंह में छुपे रहते हैं। आज तक किसी दल के किसी नेता ने ऐसा कभी नहीं कहा कि उनकी सरकार बनी तो हर नागरिक को न्यूनतम इतनी आय देने को वो परिबद्ध होगी जिस से आम नागरिक की मूलभूत ज़रूरतें पूरी हो सकें। और जिसकी इतनी आय नहीं उसको हर महीने इतने पैसे सीधे मिलते रहेंगे ताकि लोग जीवनयापन कर सकें। संविधान में सभी को समानता का अधिकार है का इतना तो अर्थ है कि सब को दो वक़्त रोटी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा एक समान मिल सके अधिकार पूर्वक न कि सबसिडी की भीख जो केवल अपमानित करती है। मगर नेता जो खुद अपने लिये लाखों नहीं करोड़ों की सुविधायें चाहते हैं कि उनका हक है पाना , आम नागरिक को न्यूनतम भी देना ज़रूरी नहीं समझते। इनकी सारी सहानुभूति झूठी है मतलब की है , असल में ये सभी सफेद हाथी हैं जो चुप चाप देश का धन खुद अपने पर विलासिता पूर्वक रहन सहन पर उड़ाते हैं। इक बोझ हैं ये सभी , चाहे किसी भी दल के हैं।

             कभी धर्म की बात , कभी समान नागरिक सहिंता की बात , कभी किसी भी राज्य को विशेष दर्जा नहीं होने की बात , कौन करता था। सब छोड़ दिया तो इस बात को भी जीत कर निभायेंगे  कैसे यकीन करें , लगता है नेता इस बात का फायदा उठाते हैं कि हर बार कोई नई बात सुन लोग पुरानी को भूल जाते हैं। अर्थात ये किसी विचारधारा को नहीं मानते केवल अवसरवादी हैं। बार बार नया तमाशा दिखा जनता से खिलवाड़ करते हैं। कभी माना जाता था काठ की हांडी एक बार चढ़ती है। मगर यहां तो उनको हर बार काठ की हांडी चढ़ानी आती है। हर बार इक नई बात की नई हांडी बनाते हैं और चढ़ाते हैं। इस बार की हांडी पर रंग चढ़ाया हुआ है गरीबी दूर करने का। देखते हैं ये हांडी क्या पकाती है , इसी रंग की हांडी कभी पहले भी किसी ने सफलता पूर्वक चढ़ाई थी। गरीबी और गरीब दोनों आज तक पहले से भी बुरी हालत में हैं।

जनवरी 04, 2017

POST : 582 डरने की क्या बात है , जब पिया साथ है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  डरने की क्या बात है , जब पिया साथ है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    अरी पगली काहे को डरती हो , पिया चाहते हैं तुझे जब भरोसा है तो सज संवर लिया फिर धड़कन इतनी क्यों बढ़ी हुई है दिल काहे घबराता है। सखी समझाती है अब तो घड़ी है पिया आयेंगे बरात लेकर। मोदी जी और भाजपा जब आप जानते हैं आपने नोट बंदी जनता की भलाई के लिये की और देश से भ्र्ष्टाचार मिटाने को काला धन समाप्त करने को लिया ये कदम , इतना भी जानते जनता खुश है आपके साथ है फिर चुप किसलिए। जिन राज्यों में चुनाव हैं खुद कहें हमने पहली बार इतना सफल कार्य किया है। नये साल की पूर्व-संध्या को प्रधानमंत्री जी का संबोधन सुना सभी ने। कितने उपहार दिये उनहोंने हर नेता की तरह , किसे मिलते नहीं मिलते , कैसे मिलेंगे की फ़िक्र क्या। घोषणा करने से हमेशा सब होता रहा है , ये भी हो ही जायेगा , नहीं भी होगा तब भी आपको चुनाव जिता फायदा तो देगा ही। सभी नेताओं का ध्येय यही तो है , उसके बाद छाती ठोक कहना जनता ने सही समझा तभी जिताया है। बस चुनाव जीतो और जीत को प्रमाणपत्र बना लो अपनी हर बात का। बाकी दल यूं भी उलझे हुए हैं अपनी अपनी उलझनों में , आपका गणित खराब नहीं कर सकते। अब लोग आपकी सभाओं में भाषण ही सुन सकते हैं , सवाल तो नहीं कर सकते , तालियां बजा सकते हैं। कोई काले कपड़े तक पहन आपकी सभाओं में नहीं आ सकता आपकी सुरक्षा का ऐसा प्रबंध होता ही है , ताकि कोई काले झंडे नहीं दिखा सके विरोध प्रकट करने को। जब आपके लोकतंत्र में विरोध की आज़ादी ही नहीं तो किसकी मज़ाल है जो अपनी जान मुफ्त में गवाये। मर भी गये सौ लोग भीड़ में तो क्या हुआ , देश में आपके प्यारे सवासौ करोड़ बाकी तो हैं , हाज़िर हैं जनाब। आपका आदेश सर माथे।

               गर्भवती महिलाओं को पूरे छह हज़ार वो भी उस महिला के बैंक खाते में , सभी का खाता खुलवा दिया आपने। जिनका नहीं खुला वो जाने , मगर उन पैसों को निकाल सकती हैं ऐसी हालत में आज के हालात में गर्भवती महिलायें। बस पैसे हैं तो सब हो जाना है , हॉस्पिटल नहीं हैं दूर दूर तक , साफ पानी भी नहीं और आप इन पैसों से उनको जीवन देना चाहते हैं। प्रधानमंत्री हैं तो देश की दशा से वाकिफ ही होंगे क्या हाल है देश में स्वस्थ्य सेवाओं का , आपकी प्राथमिकता ही नहीं है। आप नेतओं के लिये स्वास्थ्य के लिए करोड़ों हैं और देश की जनता के लिये कितना कौन सोचता है , विश्व में हेल्थ पर सब से कम बजट देने वालों में हैं आपकी सरकार। आपकी सब से भली बात क्या थी भाषण में जानना चाहते हैं , सब को ईमानदार होने का पाठ पढ़ाने वाले कहते हैं राजनैतिक दलों से खुद अपने आप खुद को मुक्त करो जैसे पहले भी सभी दल ऐसा प्रयास करते रहे हैं। ये क्या था भद्दा मज़ाक गरीबों के साथ , अपने घर को छोड़ बाकी को साफ सफाई रखने को लताड़। पर आपका करिश्मा आपकी वाणी कितनी मधुर है , जनता मुग्ध है आप चिंता नहीं करें। जब पिया साथ तब डरने की क्या बात है , मुहावरा तो ठीक है , मगर पिया कौन हैं और डर किसको है यही समझना है।

दिसंबर 28, 2016

POST : 581 भ्र्ष्टाचार , नेता अफ़्सर सबका यार ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   भ्र्ष्टाचार , नेता अफ़्सर सबका यार  (  तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       भ्र्ष्टाचार हंस रहा है , प्रहसन चल रहा है , उसकी पहचान तक नहीं अभी उनको जिनको इसका अंत करना है । चलो घुमा फिरा कर नहीं सीधे बात करते हैं , संविधान को तो मानते ही होंगे सभी दल के सब नेता । मज़बूरी है उसको मानने से इनकार करें तो चुनाव ही नहीं लड़ सकते । तो उसी संविधान में तय किया हुआ है किसका क्या कर्तव्य है क्या अधिकार । विधायिका , संसद - विधानसभा , का काम है नियम कानून बनाना और निगरानी रखना उनका पालन किया जा रहा है । बजट बनाना आपका काम है अधिकार भी , मगर इक और अंग है सरकार का जिसको कार्यपालिका कहते हैं , बजट के अनुसार पैसे को खर्च करना विधायक या सांसद के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता संविधान में । तीसरा भाग सरकार का है न्यायपालिका जिसका कर्तव्य है न्याय करना , और न्याय सभी को मिले , हर विभाग को हर राज्य को , हर आम को हर ख़ास को । आपने देखा ही होगा जब भी किसी को लगता उसके साथ अन्याय हुआ वो अदालत का दरवाज़ा खटखटाता है । इक रिवायत सी है कहने की मुझे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है । जब कि सब चाहते हैं न्याय उसी के पक्ष में हो , मगर न्याय भी मुफ्त नहीं मिलता है । बहुत ही महंगा है अपने देश में न्याय भी , जैसे स्वास्थ्य सेवा में मुंह मांगी फीस लेते हैं डॉक्टर उसी तरह वकील ही नहीं न्याय व्यवस्था में जुड़े सभी अंग । इस से उस अदालत तक पीड़ित भटकता है अपराधी को अपराधी साबित करने में । क्या क्या ज़िक्र करें छोड़ो विषय की बात करते हैं ।

           सभी जानते हैं श्री नरसिंहराव जी ने सांसद निधि की शुरुआत की थी जब उनको अल्पमत की सरकार चलानी थी , अंधे की रेवड़ियां बंटनी शुरू क्या हुई सभी कतार में खड़े हो गये । हर नेता को रास्ता मिल गया खुद अपने हाथ से खाने का , फिर हर राज्य में विधायकों को भी कल्याण राशि मिलने लगी । उसी कल्याण राशि से सभी दलों के चुने विधायक-सांसद अपना अपना कल्याण करते आये हैं । ये तथाकथित कल्याण राशि अपनों को ही बांटी जाती है अग्रिम कमीशन लेकर , इस राज़ से कौन वाकिफ नहीं है । संसद को भी संविधान की भावना के विरुद्ध कानून बनाने का अधिकार नहीं , मगर ऐसा किया गया बार बार , संसद में विधानसभाओं में । जाने क्यों जनहित याचिका दायर करने वालों को ये ज़रूरी नहीं लगा कि अदालत जाते और सवाल उठाते क्या सांसद विधायक खुद देश जनता का धन खर्च कर सकते हैं । नहीं जा सके क्योंकि इन भृष्ट नेताओं ने पहले ही बीच का रास्ता निकाल लिया था , दिखाया जाता है कि राशि सरकारी विभाग खर्च करता है , मगर करता कैसे जैसे विधायक या सांसद आदेश देता है । चलो आपको उद्दाहरण से समझाते हैं , मेरे शहर में पिछले विधायक जी ने शहर की गलियों में टाइलें लगवाईं । जो सड़क ठीक थी उसे भी तोड़कर फिर बनाया गया , बनवाई भी हरियाणा शहरी विकास परारधिकरण ने । मगर टाइलें खुद विधायक जी की फैक्टरी से ऊंचे दाम खरीद कर । लो बिठा लो जांच कोई साबित नहीं कर सकता भ्र्ष्टाचार हुआ । मुझे लगता है ये शाकाहारी तरीका है किसी को कष्ट नहीं होता और उनको खाने को सब मिल भी जाता है । क्या काला धन और भ्र्ष्टाचार बंद करने वाली सरकार में साहस है इसको बंद करने का ।

   वक़्त बदला है आजकल जनता को भी बहलाया जाने लगा है , कहते हैं सभी को खैरात मिलती है बिन बादल की बरसात मिलती है । जिनकी किस्मत खोटी है उनकी बात अलग है सरकारी धन जनता को मिलने की अपनी कसौटी है । हलवा पूरी सत्ता खाती है कहने भर को गरीबों को अनाज बंटवाती है , सरकार प्रशासन देश के लिए सफेद हाथी है । जनता जूठन से ज़िंदगी बिताती है सत्ता एहसान जताती है । कौन गोरा है कौन कितना काला है राजनीति किस की खाला है मत पूछो सब घोटाला है । जीजा की के सहारे ज़िंदा है जो सोशल मीडिया अख़बार टेलीविज़न सरकारी साला है ये राज़ खुलता कैसे जब गहरी नींद सोया जगाने वाला कुंभकर्ण सोने वाला है ।  अभी बात शुरू हुई है , देश में आज तक का सब से बड़ा घोटाला सामने आना बाकी है , क्या है वो । सरकारी विज्ञापन जिन पर रोज़ करोड़ों रूपये बर्बाद होते हैं इन नेताओं के सरकारों के झूठे प्रचार के । मीडिया वाले कभी इसकी चर्चा नहीं करते क्यों ? क्योंकि जिस जनता के पैसे की बर्बादी से आपको हिस्सा मिलता हो उसको बुरा कैसे बतायें । सच वही अच्छा जो मुनाफा देता है , घाटे वाला सच झूठ है । इक झूठ और भी , गांव को गोद लेने पर ज़ोर देते हैं । सब से पहले गोद लेते हुए लगता है गांव अनाथ है उसको माई बाप मिल गये । कल टीवी चैनेल कितने बड़े बड़े नाम वालों की गोद ली औलाद की बदहाली दिखा रहे थे । वास्तव में हमारे सभी नेता पाषाण हृदय और संवेदनारहित हैं जिनको अपने सिवा कुछ दिखाई नहीं देता । जनता की भलाई का आडंबर करते हैं छल कपट और वोटों की खातिर । कोई अंत नहीं इनकी अधर्मकथा का । बस दुष्यंत जी की ग़ज़ल के कुछ शेर कहता हूं । 

                    अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार

                    घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार ।

                    इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-जुर्म हैं

                    आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार ।

                      रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख्याल आया हमें

                     इस तरफ आती तो हम भी देखते फसले बहार । 

 

 Lok Sabha elections 2024 corruption in BJP Narendra Modi Government -  लोकसभा चुनाव 2024 में भ्रष्टाचार कितना बड़ा मुद्दा? | Jansatta