नवंबर 20, 2016

POST : 563 बातें राजा और बेताल की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      बातें राजा और बेताल की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  बेताल खुद वापस लौट आया और शासक  के कंधे पर लटक गया और बोला , " राजन अब आपको मौन रहने की ज़रूरत ही नहीं अब आप निश्चिंत  हो कर जो भी कहना हो कह सकते हैं ।  अब मैं आपको छोड़ कहीं जा ही नहीं सकता क्योंकि जिस पेड़ पर मेरा ठिकाना था आपने उसे ही जड़ से काट कर उसका नामोनिशान तक मिटा दिया है ।  आपको हर दिन मैंने इक नई कहानी सुनाई है अभी तक , मगर आपने कभी खुद अपनी कहानी मुझे नहीं सुनाई ।  विश्व के सब से बड़े महान देश  के आप निर्वाचित शासक हैं , आपकी ताकत का अंदाज़ा मुझे भी है ।  आपका पांच साल का कार्यकाल कब खत्म हो जायेगा आपको पता ही नहीं चलेगा , आपने देश की जनता को सुनहरे भविष्य का सपना दिखाया था और उसी से चुनाव जीता था ।  अभी तक जनता के जीवन में कोई ऐसा बदलाव हुआ दिखाई नहीं देता फिर भी आपको यकीन है अगला चुनाव भी आपका दल जीतेगा आपके ही भरोसे ।  आपके दल को भी आपके नेतृत्व और करिश्मे का ऐतबार है और सभी सोचते हैं आज आपसे चतुर सुजान  कोई दूसरा नेता नहीं है न दल के भीतर न किसी और दल के पास ।  आप भी खुद को पहाड़ समझते हैं और बाकी सभी आपको बौने लगते हैं ।
 
 राजन आपने घोषणा कर दी है उस काले राक्षस का आपने अंत कर दिया है , जबकि आप भी जानते हैं उस दैत्य का ठिकाना जहां रहा है वहां तक जाने का साहस आप भी नहीं कर पा रहे हो ।  आप भी वही करने लगे हो जो पहले बहुत शासक करते आये हैं , शोले फिल्म के गब्बर सिंह की तरह सभी को समझाते हो कि मुझ से बचना है तो दूसरा कोई रास्ता नहीं है मेरी शरण में चले आओ ।  आपने किसी परिवार का अंत कर उसके मुखिया को अपाहिज बना डाला है , ताकि कोई आपसे लड़ने का साहस नहीं कर सके भविष्य में ।  आपके दल में सिर्फ आप ही आप हो और कोई कद्दावर नेता बचा नहीं है ।  आपके पास हर दिन इक नई योजना भी रहती है जनता को बताने को कि आप बहुत कुछ करना चाहते हैं ।  मगर आपको नहीं मालूम कि एक सौ चालीस  करोड़ जनता को सुनहरे दिन किस तरह दिखाई दे सकते हैं , आप चाहते हो कि अगले चुनाव में जनता आपका पुराना वादा भूल जाये और इक नया नारा सुन कर फिर से आपकी बातों में आ जाये ।  शायद पिछले चुनाव में सुनहरे दिनों का सपना दिखलाते समय आपको लगा ही नहीं था कि जनता उस पर भरोसा कर आपको इतना बहुमत दे सकती है ।  आपने सोचा तक नहीं था वो सपना हकीकत बनाना किस तरह है । "
 
 शासक महोदय  बोले , " बेताल तुम्हें चुनावी राजनीति का ज़रा भी ज्ञान नहीं है ।  जनता ने मुझे नहीं चुना था , जो पहले सत्ता में था उसको हराना था और विकल्प में मेरे सिवा कोई दूसरा दिखाई दिया ही नहीं उसको ।  पिछली सरकार की बदनामी मेरे बड़े काम आई , काला रंग सामने होता तभी सफेद रंग की चमक नज़र आती है ।  मुझे अपनी चमक बरकरार रखनी है पांच साल तक और अपने से ज़्यादा किसी को चमकने नहीं देना है , बस और कुछ भी नहीं करना है ।  रही जनता की बदहाली तो सरकार कोई भी हो उसकी चिंता अपना खज़ाना बढ़ाने की रहती है ।  कर तो जनता से ही वसूल करना होता है , और हर शासक अधिक धन चाहता है सत्ता की खातिर ।  यही अर्थशास्त्र है राजनीति का ।  चलो आज तुम्हें इक नीति कथा सुनाता हूं ।  जाग कर सुनना , कहीं नींद में आधी सुन बाद में भूल मत जाना , आम लोगों की तरह ।
 
 धरती का रस ।  यही नाम है उस कथा का ।  इक राजा शिकार को गया और रास्ता भटक अपने सैनिकों से अलग हो गया , दोपहर होने को थी और उसको गर्मी में प्यास लगी थी ।  चलते चलते उसको इक खेत में इक झोपड़ी नज़र आई तो वहां चला गया ।  इक बुढ़िया बैठी थी वहां , मगर सादा भेस में उसको राजा की पहचान मालूम नहीं हुई थी ।  राजा बोला मईया मुझे प्यास लगी है पानी पिला दो , बुढ़िया ने सोचा मुसाफिर है जाने कितनी दूर से आया है और आगे भी जाना होगा , इसलिये उसको पानी की जगह गन्ने का रस पिलाती हूं , और वो खेत से इक गन्ना काट लाई और उसका रस निकाल गिलास में भर राजा को दिया पीने को ।  रस पीकर राजा को बहुत अच्छा लगा और वो थोड़ी देर को वहीं छाया में चारपाई पर आराम करने लगा ।  राजा ने बुढ़िया से पूछा उसके पास कितनी भूमि है कितने बच्चे हैं और कितनी आमदनी होती है ।  बुढ़िया ने बताया उसके चार बेटे  हैं और चार जगह ऐसा ही इक खेत है सबका अपना अपना ।  चार रुपया आमदनी है , एक रुपया खर्च आता है और तीन रूपये बचत होती है , दो रूपये से घर चलता है , फिर भी एक बच ही जाता है जो बचत करते हैं ।  बात करते करते राजा सोचने लगा कि अगर मैं ऐसे हर खेत से एक रुपया अधिक कर लेने लग जाऊं तो मेरा खज़ाना कितना बढ़ सकता है ।  और उसको नींद आ गई थोड़ी देर को , जागा तो देखा दूर से उसके सैनिक आ रहे हैं ।  राजा ने बुढ़िया से कहा , मईया क्या मुझे एक गिलास और गन्ने का रस पिला सकती हो , बुढ़िया बोली ज़रूर , और फिर से खेत से इक गन्ना काट कर ले आई ।  मगर जब रस निकाला तो वो बहुत थोड़ा था इसलिए बुढ़िया इक और गन्ना लाई , मगर तब भी गिलास नहीं भरा , इस तरह चार गन्ने से एक गिलास रस मुश्किल से निकला ।  राजा भी ये देख हैरान हुआ और उसने बुढ़िया से सवाल किया , मईया पहले तो एक ही गन्ने से गिलास भर रस निकल आया था अब क्या बात हुई जो कम निकला रस ।  बुढ़िया बोली ये मुझे भी समझ नहीं आया कि इतनी देर में ऐसा क्या हुआ , मगर इतना सुनते आये हैं कि जब राज्य या देश का शासक लालच में आ जाता है और लोकहित को भुला देता है तब धरती का रस सूख जाता है ।  और प्रकृति में सब गलत होने लगता है ।  राजा समझ गया था ऐसा क्यों हुआ था । "

        बेताल शासक  जी की कथा सुन कर हंस दिया , तो शासनकर्ता  ने हंसने का कारण पूछा । बेताल बोला राजन कोई भी व्यक्ति देश से बड़ा नहीं होता , सभी को कभी न कभी सत्ता को छोड़ना ही पड़ता है ।  एक सौ चालीस करोड़ की जनता किसी भी नेता या दल के रहमोकरम पर कभी नहीं रही है ।  चाहे कोई खुद को कितना शक्तिशाली समझता रहा हो सभी को जनता ने जब चाहा बदल दिया है ।  जाने क्यों तब भी किसी को ये बात कभी समझ नहीं आई है ।  मैंने सभी को आगाह किया है , आपको भी बताना चाहता हूं , जनता को मूर्ख समझने की भूल मत करना ।  राजन मैं तुम्हें फिर से छोड़ कर जा रहा हूं , मुझे किसी राजा किसी शासक के कंधे की सवारी की ज़रूरत नहीं है , न ही कोई पेड़ मेरा ठिकाना है ।  आज तुम्हें समझाया है कभी पहले वाले को समझाया था , कल जो शासक बनेगा उसको भी समझाऊंगा ही ।  मैं अपना फ़र्ज़ निभाता आया हूं , कोई समझे न समझे , अब वक़्त जाने या इस देश की अभागी जनता , जो बार बार ठगी जाती है । आपकी काठ की हांडी कितनी बार चढ़ती है इतिहास जानता है लेकिन जैसा जो बोता है उसको वैसा फल मिलता है , हां गलत कर्मों का नतीजा सामने आने में समय लगता है , शोहरत जितनी बड़ी होती है उसका अंत उतना ही भयावह होता है । खुद को अजेय समझना नासमझी है कब कौन कैसे पराजित होता है इसका अनुमान कभी किसी शासक को नहीं होता है । 

 

नवंबर 19, 2016

POST : 562 ईमानदारी का पाठ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      ईमानदारी  का पाठ  (  व्यंग्य  ) डॉ लोक  सेतिया

 सबक पढ़ाने का अपना ही मज़ा है , पढ़ाने वाले को उस पर अमल करना कभी ज़रूरी नहीं होता। सरकारी स्कूलों में अक्सर ऐसा भी होता है कि जिस विषय का अध्यापक को बिल्कुल ज्ञान नहीं हो उसको वो भी छात्रों को पढ़ाना पड़ता है। किसी अध्यापक के छुट्टी पर होने पर मुख्य अध्यापक की मज़बूरी होती है जो खाली उपलब्ध हो उसी को आदेश देना छात्रों को पढ़ाने का। साधु संत महात्मा प्रवचक भी लोभ लालच का त्याग करने का उपदेश देने के बाद खुद अधिक चढ़ावे और आलीशान आश्रम व सभी आधुनिक सुख सुविधाओं की चाह रखते ही हैं। सरकार किसी की भी हो जनता से हर नियम कायदा कानून ईमानदारी से मानने की उम्मीद रखते हैं और भाषण देते हैं मंत्री बनकर कि उनके आदेशों का पालन किया जाना चाहिए। ऐसे में खुद कितने ईमानदार हैं कहां सोचते हैं। क्या उन्होंने चुनाव आयोग की बताई सीमा में खर्च किया था चुनाव लड़ते समय। क्या जीतने को तमाम अनैतिक हथकंडे नहीं अपनाये थे , दो नंबर का धन नहीं लिया था चंदे में , क्या जाति धर्म के नाम पर जनता को गुमराह नहीं किया था। क्या तब जनता से सब कुछ सच सच बोला था , जो कभी नहीं निभाने वो वादे नहीं किये थे। क्या जैसा वो कहते हैं कि हम तो जनता के सेवक हैं और हमें खुद अपने लिये कुछ नहीं चाहिए उसी तरह बनना चाहते हैं। क्या जनप्रतिनिधि बनते ही उनको मलाईदार पद पाने की इच्छा नहीं थी , मंत्री बनते ही क्या हर निर्णय ईमानदारी से करने लगे हैं। अपने ख़ास लोगों को कोई फायदा नहीं देते हैं , प्रशासन के कामों में अनावश्यक दखल नहीं रखते। किसी की सिफारिश न तो करते हैं न कभी मानते हैं। क्या ये सारी बातें उनकी ईमानदारी की परिभाषा में आती हैं।

                          क्या उनकी सरकार का हर विभाग अपना काम नियमानुसार करता है , उचित कार्य के लिए जनता को कोई कठिनाई नहीं होती है। क्या ईमानदारी सरकार और प्रशासन से ही शुरू नहीं होनी चाहिए ताकि जनता को किसी नेता की सिफारिश की ज़रूरत ही नहीं हो। क्या पुलिस और न्याय प्रणाली सभी के साथ एक जैसा बर्ताव करते हैं , क्या नेता उनका दुरूपयोग नहीं कर पा रहे। क्या ये सभी मंत्री नेता और उच्च अधिकारियों को खुश करने में नहीं लगे हुए , क्या उनकी तरक्की या तबादला निष्पक्षता से किया जाता है। क्या सरकार की प्राथमिकता अधिक कर वसूलना नहीं है , क्या नेता और अफ्सर देश पर इक बोझ नहीं हैं सफेद हाथी की तरह। क्या आपकी विकास की परिभाषा पूरी तरह गलत नहीं है , विकास किसका , लोगों का या इमारतों और सड़कों का , जनता की भलाई वाला विकास आपको कभी समझ आया है क्या। आपको केवल वही विकास पसंद है जिस से आपको खुद खाने को मिलता रहे। लोकतंत्र , लोकतंत्र , लोकतंत्र। कैसा लोकतंत्र , देश की जनता को शिक्षा देना आपकी प्राथमिकता नहीं उस निजि स्कूलों के भरोसे छोड़ दिया , ऐसे स्कूलों के हवाले जिनकी फीस केवल अमीर ही चुका सकते हैं। यही हालत स्वास्थ्य सेवाओं की है , प्राइवेट नर्सिंग होम जितनी मर्ज़ी कीमत वसूल करें बीमार लोगों से ईलाज की , उन पर कोई रोक नहीं कोई सीमा नहीं। क्या हॉस्पिटल में रोगी के उपचार को कमरे होते हैं या होटल की तरह महंगे अमीरों की सुविधाओं के लिए बनाये जाते हैं। शिक्षा स्वास्थ्य जैसी ज़रूरी ज़रूरतों में इतना भेदभाव होना क्या गरीबों के साथ अन्याय नहीं है। मगर इस से अधिक गलत बात ये है कि आज तक सरकार ने कोई नियम ही नहीं बना रखा इन के लिये कि क्या क्या सुविधा क्या क्या मापदंड होने चाहियें अस्पताल या नर्सिंग होम के। कोई हद किसी उपचार पर कितना पैसा लिया जाना सही है , जानते हुए भी कि इस मानवीय सेवा के कार्य में हर चीज़ में कमीशन का गंदा खेल जारी है आप आंखें बंद किये हैं क्योंकि आपको जब ज़रूरत हो हर सुविधा मिल ही जाती है। क्या इस को जनता की सेवा कहते हैं और जनता की बेबसी को नहीं समझ इक फरेब करते हैं जनता को देश की मालिक बताकर।

                   देश को आज़ाद हुए सत्तर साल होने को हैं और देश की आधी आबादी बदहाली में जीती है , तब भी आपकी सुख सुविधाओं पर ही नहीं , आपके झूठे प्रचार पर भी व्यर्थ धन बर्बाद किया जाता है। कितने आडंबर प्रतिदिन करते हैं आप लोग शाही शान के साथ , गरीबों का उपहास करने जैसा। रोज़ आपकी बेकार की सभायें सिर्फ धन की बर्बादी ही नहीं होती उन में , सरकारी तंत्र भी हमेशा उसी में व्यस्त रहता है। आपने देश और जनता को न्याय देने की शपथ ली थी क्या याद आया कभी। अपनी शपथ को और देश के प्रति अपने कर्तव्य को कितनी ईमानदारी से निभाया है आज तक सभी नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों ने। क्या ईमानदारी का पाठ पढ़ाने की सब से ज़्यादा ज़रूरत आप ही को नहीं है। खुद को आईने में देखना ज़रूरी है जब औरों को नसीहत दो तो सोचो आपको हक है भी ऐसी शिक्षा देने का जिसको आपने कभी जाना नहीं समझा नहीं , अपनाया ही नहीं। सच तो ये है कि अभी तक आप सभी दलों की सरकारों ने जनता को सिर्फ झूठे वादों से बहलाया ही है सत्ता की खातिर। आज तक किसी भी दल के नेता को कितने बड़े घोटाले करने पर भी कोई सज़ा नहीं मिल सकी है। आपकी सभी योजनायें इक धोखा साबित हुई हैं जनता के विश्वास के प्रति। आपके दल में कितने अपराधी हैं जो सांसद या विधायक बने हुए हैं ताकि आपका शासन कायम रहे। हर थोड़े दिन बाद आप इक नया तमाशा जनता के सामने दिखलाते हैं और जो पिछला था उसको छोड़ देते हैं। कुछ भी वास्तव में करना या बदलना जनता की खातिर आपको कभी ज़रूरी लगता ही नहीं। आप कब क्या रंग बदल लें ये गिरगिट भी नहीं समझ पाता , जिस को कहते हैं राजनेताओं का प्रेरणास्रोत है।
इक मतला और इक शेर मेरी ग़ज़ल का पेश है : -

                                            " लोग कितना मचाये हुए शोर हैं ,

                                              एक बस हम खरे और सब चोर हैं । "

                                            

                                                " हाथ जोड़े हुए मांगते वोट थे ,

                                             मिल गई कुर्सियां और मुंहज़ोर हैं ।  "

                                            

POST : 561 गंगा स्नान से पापी पुण्यात्मा बन जाता है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 गंगा स्नान से पापी पुण्यात्मा बन जाता है   (  व्यंग्य )  डॉ लोक सेतिया   

  बात समझने की है और समझते वही हैं जो समझदार हैं , समझदार शासक होता है , उसको जो उचित लगता है वो उसी तरह नियम बनाता है , लागू करता है और सभी को मानने पड़ते हैं। ये तो नहीं पता लिखा कहां है और लिखा किस ने है पर कहते हैं राजा अर्थात शासक कभी गलत नहीं होता। पहले कहा जाता था कि शासन की नाफरमानी करना बगावत होती है , मगर जब सरकार का कानून नहीं मानना बगावत बन कर बदलाव लाने में सफल हो जाता है , तब उसको क्रांति कहते हैं। आज़ादी का अंदोलन क्या था , क्या उसको तब की सरकार के क़ानून नहीं मानने की छूट मिली थी , अगर नहीं तो उस समय का विरोध सही था या गलत। आज भी सरकार मानती है जो उस से सहमत नहीं वो देश हित को नहीं समझता , ऐसे में लोग डरते हैं उसकी किसी बात को अनुचित कहने में। मगर सर्वोच्च अदालत ने सरकार की बात नहीं मानी है कि जो लोग नोट बंदी के खिलाफ अदालत जायें उनकी अर्ज़ी नहीं सुनी जाये। क्या ये वही लोग हैं जो अपने फैसले पर जनता की परेशानी को ऐसा कहकर उचित ठहराते हैं कि कभी किसी ने आपात्काल घोषित कर देश को उनीस महीने कैद में बंद कर दिया था। कोई सवाल करे कितनी जनता को बंद किया गया था , और पता चले कुछ लाख राजनीति से जुड़े लोगों को तो क्या समझा जाये वही लोग देश थे। मेरा मकसद आपत्काल को सही ठहराना नहीं है , और ये भी दोबारा दोहराता हूं कि मैं उस सभा में शामिल था दिल्ली के रामलीला मैदान में जिस में जे पी जी ने भाषण दिया था जिस को आधार बना इमरजेंसी लागू की गई थी। मैं तब भी सत्ता और सरकार के खिलाफ लिखता था मगर मुझे तो जेल में नहीं डाला गया आज तक कभी , जबकि हर सरकार का विरोध किया है मैंने , चाहे जब जब जिसकी भी सरकार रही हो। अफसोस होता है जो उस दौर में संविधान में बताये अधिकारों की बात करते थे और जेल जाने के डर से छुप छुप कर भागते रहे वही आज अपनी सरकार द्वारा लागू निर्णय का विरोध करने वालों को देश हित की बातें समझाते हैं। ऐसे में इक अंदेशा होना लाज़मी है हम किस दिशा को जा रहे हैं। लोकतंत्र में सरकार का विरोध अपराध नहीं हो सकता , और जिनको मोदी जी के नोट बंद करने से परेशानी हो उनको अदालत जाने से रोकने की बात सोचना ही बताता है कि सोच अलोकतांत्रिक और संविधान की भावना के विरुद्ध है। शुक्र है सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की बात मानने से इनकार करने के साथ इक चेतावनी भी दी है कि ज़रूरत से ज़्यादा जनता को दबाना खतरनाक हो सकता है , लोग इतने परेशान हैं कि दंगा भड़क सकता है। अब आप सर्वोच्च न्यायलय की बात  को किसी सिरफिरे केजरीवाल का बयान नहीं बता सकते।

                कुछ टीवी चैनेल समझते हैं जो उनकी सोच है वही उचित है , और कहने को वो हर दिन कोई बहस करवाते हैं अलग अलग लोगों को आमंत्रित कर के। मगर इनका लहज़ा किसी तानाशाह जैसा ही होता है , जैसे ही कोई उन के ठूंसे शब्द बोलने से मना करता लगता है वो किसी न्यायधीश की तरह नहीं किसी बंदूक धारी की तरह डराते लगते हैं। इतनी बात समझ लेना ज़रूरी है कि लोकतंत्र में विरोध या असहमति को स्वीकार करना लाज़मी है। विचारों को अभिव्यक्त करने का अधिकार केवल आप का ही नहीं है। जहां तक काले धन की बात है देश की जनता उसका विरोध करती है हमेशा ही , मगर कोई दल ये समझे कि उनको छोड़ बाकी सभी दल काले धन पर चलते रहे हैं तो ये अर्धसत्य ही नहीं पूर्ण झूठ होगा। आज़ादी के बाद से जनता के धन की लूट में , काली कमाई वालों से चन्दा लेने वालों में आप भी शामिल रहे हैं। इक निर्णय से आपके सभी पाप भी धुल नहीं सकते , आपको लगता है ये फैसला गंगा स्नान है , कि डुबकी लगाई और पापी से धर्मात्मा हो गये। माना ये निर्णय उचित है काला धन बंद किया जाना चाहिये मगर ऐसा करने में मनमानी और बिना सोच विचार हर दिन नियम बदलना बताता है सरकार को समस्या समझने में नाकामी हुई है। इक बात और भी मुझे लगता है कि अभी बेशक कुछ लोग खामोश है मगर उनको इस फैसले से परेशानी हुई है वो जैसा आप सोचते हैं , आपके ही समर्थक वर्ग रहे हैं कारोबारी लोग , अगली बार आपके विरोधी हो सकते हैं।  इसलिये देश हित में जनता को थोड़ा समय साथ देने को कहते हुए खुद भी इस बात के लिये तैयार रहें। जनता क्या सोचती है अक्सर कुर्सी पर बैठे नेता नहीं समझ पाते हैं।

नवंबर 18, 2016

POST : 560 देश की राजनीति और हास्य रस ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  देश की राजनीति और हास्य रस ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   हंसना भी जीवन का एक अंग है , मगर हंसने हंसने में अंतर भी बहुत होता है। कभी अधिकतर चुटकुले सरदार जी को लेकर हुआ करते थे। आजकल पत्नी को लेकर पुरुष ही नहीं महिलायें भी चुटकुले सुनाती हैं। विशेष बात ये है की इधर हास्य रस में इक क्रांति सी आ गई है। अब चुटकुले शब्दों से अधिक कार्टूनों या तस्वीरों में दिखाई देते हैं। टीवी और सिनेमा में हास्य रस की दशा इतनी बिगड़ चुकी है कि फूहड़ता की सीमा लांघ लिया है। मज़ाक करने में और किसी का उपहास करने में ज़मीन आसमान का अंतर होता है। पुरानी फिल्मों में कुछ महान कलाकार हुए हैं जिन्होंने दर्शकों को हंसाने को कमाल के चरित्र दिखाये बनाये और निभाये हैं। आज उनकी कमी खलती है फिल्मों में , मगर कुछ सालों से नायक ही हास्य कलाकार का भी किरदार निभाने लगे हैं , शायद इसी से फिल्मों के नायक अब केवल मनोरंजन ही करते हैं , लोगों को सही राह बताने का आदर्श स्थापित नहीं करते। ये बदलाव अच्छा है या बुरा ये दूसरी बात है , मगर ऐसा हो चुका है और हमने भी स्वीकार कर लिया है। कॉमेडी शो में हास्य-रस को इस कदर घायल किया जाता है कि देखने वाले सोचते हैं हंसा जाये या रोया जाये। मैं इक व्यंग्यकार हूं और हास्य रस मेरा प्रिय रस है साहित्य में। मेरी आधी रचनाएं व्यंग्य ही नहीं हैं बल्कि मेरी ग़ज़ल कविता क्या कहानी तक में व्यंग्य शामिल रहता है। मुझे याद है महान व्यंग्य लेखक स्वर्गीय के पी सक्सेना जी ने मुझे खुद उन्हीं पर मेरे द्वारा लिखी व्यंग्य रचना पर इक पत्र भेजा था तारीफ का। जिस में उनहोंने लिखा था सभ्य व्यंग्य लिखने वालों की बिरादरी बहुत छोटी है और मुझे उस को ऐसे ही बनाये और बचाये रखना है। हरी सिहायी में लिखा वो खत मेरे पास आज भी रखा है इक कीमती पारितोषिक की तरह।

                                   राजनीति में हास्य रस होना अच्छी बात है , मगर राजनेताओं को आपस में या राजनीति पर हंसी मज़ाक करना चाहिये , जनता के साथ मज़ाक नहीं किया जाना चाहिये। मगर इन दिनों ऐसा किया जा रहा है , नेता लोग जनता की समस्या और परेशानी की गंभीर बात को टाल देते हैं , यूं ही कुछ भी बोलकर। जब कोई मुख्यमंत्री कहता है कि मुझे किसी ऑटो चालक ने बताया है कि अब वो मीटर से ही पैसे लेने लगा है क्योंकि पुलिस वाला रिश्वत नहीं मांगता , या किसी चाय वाले ने बताया है कि अब उस ने चाय सस्ती कर दी है क्योंकि घूस नहीं देनी पड़ती , तब आपको क्या लगता उनकी बात सही है यकीन किया जाना चाहिये या ये इक उपहास ही है। इसी तरह जब कोई देश का प्रधानमंत्री कहता है मुझे किसी बज़ुर्ग महिला ने कहा है कि नोट बंद होने से मेरे बेटे ने मेरे खाते में ढाई लाख जमा करा दिये हैं और वो मुझे आशिर्वाद देती है , तब भी क्या इसको सच माना जाये या जनता ही नहीं काला धन की बात के साथ भी इक उपहास कहा जाये। मगर खेद की बात है नेताओं को जनता की समस्याएं शायद मज़ाक ही लगती हैं जिनको वो उपयोग करते हैं वोट हासिल कर सत्ता पाने को। इन लोगों को कभी खुद अपने दिये भाषण की रिकॉर्डिंग सुननी चाहिये , ऐसा करते अगर थोड़ी शर्म भी महसूस हो तो कोई बुराई नहीं है , समझना अभी उनमें संवेदना बाकी है , पूरी तरह मरी नहीं।

                             जिनको पुराने युग के नेताओं की याद है उनको पता होगा देश की संसद में भी नेता सत्ता पक्ष या विपक्ष का मतभेद भुला हंसी मज़ाक आपस में किया करते थे।  भाषण तक में चुटकी लिया करते थे नेता नेता की बात पर। अटल बिहारी वाजपेयी जी भी ऐसा किया करते थे और भाषण देने की उनमें लाजवाब कला थी , मुझे आज भी याद है जब उनको बहुमत साबित करना था तब बहस के जवाब में उन्होंने ये कह कर चुटकी ली थी विपक्षी नेताओं से , " आप कहते हैं वाजपेयी जी अच्छे हैं पर गलत दल में हैं , तो आज आप उस अच्छे आदमी से क्या करने वाले हैं "। अपनी बात का अंत उन्होंने ये बोलकर किया था कि मैं इस्तीफा देने राष्ट्रपति जी के पास जा रहा हूं , शायद ऐसा करने से उनको खुद हार से ही नहीं बचाया था , साथ में उन नेताओं को दुविधा से बाहर निकाल दिया था जो उनको अच्छा भी बता रहे थे और हटाना भी चाहते थे। इक और नेता हेमवती नंदन बहुगुणा जी का भाषण भी याद है , इंदिरा गांधी की बात कि मैं बेटी हूं यहां की पर , कहा था ठीक है बेटी हो मानते हैं शगुन देंगे आदर प्यार भी मिलेगा लेकिन वोट नहीं देंगे। आज कल के नेता सत्ता मिलते ही सभ्यता की सीमा को भूल जाते हैं और हास्य नहीं क्रूर मज़ाक करने लगते हैं। 
 
 Funny Poem On Election By Alhad Bikaneri - Amar Ujala Kavya - चुनाव पर  अल्हड़ बीकानेरी की हास्य कविता- मुझको सरकार बनाने दो
 

नवंबर 17, 2016

POST : 559 लाख ब्लॉग व्यूवर्स का मतलब ( आज की बात ) डॉ लोक सेतिया

  लाख ब्लॉग व्यूवर्स का मतलब (  आज की बात )  डॉ लोक सेतिया 

 कभी कभी लगता है किसी संख्या का विशेष महत्व है।  कुछ दिन से मैं जैसे इंतज़ार कर रहा था कि कब मेरे ब्लॉग पर पेज वीवर्स की ये संख्या हो एक लाख की जो अभी अभी हुई मालूम हुआ। फिर सोचता हूं इसका मतलब क्या है , मैंने जब लिखना शुरू किया था , ब्लॉग पर नहीं बहुत साल पहले डायरी पर , तब क्या सोच कर लिखना शुरू किया था , उस उद्देश्य का क्या हुआ। लिखना शुरू किया था इक अजीब सी सोच को लेकर कि कोई इक दोस्त कभी मुझे मिलेगा जो मुझे मेरी हर बात को समझेगा , उसको बताऊंगा अपनी जीवन की हर बात। हमेशा लगता था ये दुनिया और समाज जैसा होना चाहिए वैसा क्यों नहीं है। समाज और देश की दुर्दशा मुझे परेशान करती और राजनीति और पत्रकारिता को लेकर हैरान होता रहता। मौज मस्ती की बातें कभी ज़रूरी लगी ही नहीं और गंभीर बातें करना आदत बन गया जवानी की उम्र में ही। इक आक्रोश सा छाया रहता इक आग सी दिल में जलती रहती कुछ बदलाव करने की , और बगैर लिखे रहना कठिन लगता जैसे दम घुटता हो। नहीं मालूम कहां से इतना विद्रोह मेरे भीतर जमा होता रहा जिस से हर दिन मैं बेचैन रहता तड़पता रहता। कभी समझना ही नहीं चाहा कि जो भी बदलाव मैं लाना चाहता हूं वो अकेला मैं या कोई भी दूसरा अकेले नहीं ला सकता। फिल्मों का शौक बेहद रहा है और कई फ़िल्मी कहानियां मुझे प्रभावित करती रही हैं , कभी कभी लगता जैसे मैं कुछ पुराने युग का बंदा हूं।

                            पता नहीं कैसे इक सपना सा बुनता रहता हमेशा , कहीं इक खूबसूरत दुनिया बसाने का। जिस जहां में सभी अपने हों , इक दूजे से प्यार करते हों , कोई किसी से नफरत नहीं करता हो , किसी को कोई अपमानित नहीं करे उस दुनिया में। कोई मतभेद कोई टकराव कोई धोखा कोई छल कपट नहीं हो। यूं समझो धरती पर इक स्वर्ग की कल्पना किया करता था। अपनी दुनिया से हर दिन पूरी उम्र इक जंग लड़ता रहा हूं मैं , मेरे प्रयास कभी सफल नहीं हुए , हर बार हारता रहा हर किसी से। पर हार ही से ऊर्जा भी मिलती रही दोबारा खड़े होने की। आज जब तमाम लोग मुझे पढ़ते हैं ब्लॉग से कहीं अधिक अन्य पत्र पत्रिकाओं में , कितने कोई अंदाज़ा नहीं संख्या का , तब सोचना चाहता हूं फिर से अपने मकसद के बारे में। ये भी जानना चाहता हूं कि जो मेरा लेखन पढ़ते रहे हैं वो मुझे कितना जान पाये या समझते हैं। क्या अभी भी मुझे तलाश है किसी दोस्त की। मंज़िल क्या है नहीं मालूम , रास्ता कितना लंबा है नहीं पता , कोई कारवां साथ नहीं तब भी , यही चाहता हूं चलते जाना है , ठहरना नहीं है। जीवन का सफर जैसा भी है मुसाफिर हूं चलना ही मेरा काम है।

   प्रिय पाठको ,
   आपका आभारी हूं नियमित स्नेह देने के लिये। अपना संबंध ऐसे ही बना रहे यही कामना है।
   धन्यवाद ,

    डॉ लोक सेतिया 

 

POST : 558 जुर्म है आम जनता होना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      जुर्म है आम जनता होना ( तरकश )  डॉ लोक सेतिया

        सत्ता का आदेश था , जनता को मानना लाज़मी था। कोई चारा नहीं होता आम आदमी के पास , विकल्प क्या है सर झुकाने के सिवा। लोग कतार में खड़े रहे आखिरी सांस तक तो विशेष क्या बात है। आप उनकी सुनो जो बतला रहे हैं अपने त्याग की बात। याद आया कुछ साल पहले भी विदेशी मूल की है का सवाल उठा तो किसी ने अपनी जगह इक ऐसे ईमानदार और काबिल व्यक्ति को प्रधानमंत्री बना दिया जिसने आगे चल कर नया इतिहास रचा। ऐसी कठपुतली कभी पहले देखी न सुनी जिस ने अपने शासन में घोटालों का पंचम इतना ऊंचा फहराया हो। आज तक उनको किसी ने अपराधी समझा , दी कोई सज़ा , कदापि नहीं। इनका भी त्याग महान है। काश सभी को घर बार छोड़ प्रधानमंत्री पद मिल सकता तो सभी इक बार क्या सौ बार छोड़ देते। मगर जो दुनिया ही छोड़ गये चंद रुपये अपने ही खाते से निकलवाते हुए , उनकी मौत पर आंसू भी कोई नहीं बहाता। दिन भर चिंता रही इक नेता की बीमारी की जिनको देश के सब से अच्छे एम्सस अस्पताल में सब से बेहतरीन स्वास्थ्य सेवा मिल रही है। कोई आम नागरिक नहीं होते नेता जो नोट नहीं बदलने पर बिना उपचार मर जाते हैं। कोई नहीं कहता आप कुछ सुधार नहीं करो , सब इतना ही चाहते हैं जैसे आप बड़े लोगों की खातिर हर प्रबंध हर हालत में हो जाता है उसी तरह मरते हुए ही सही आम और खास दोनों बराबर हो जायें। ज़िंदगी नहीं दे सकते आप जनता को सुकून की तो कम से कम मौत ही सुकून की दे दो। जनता होना क्या बेमौत मरना है , क्या इसी को लोकतंत्र कहते हैं।

                   पहली बार हैरानी हुई ऐसी मौत पर कोई मुआवज़ा भी सरकार ने घोषित नहीं किया , वरना शायद व्हाट्सऐप वालों को इक और चुटकुला मिल जाता मनोरंजन को। चार हज़ार लेने वाले को चार लाख मिले मर जाने पर। मगर नेता लोग सोचते हैं इन गरीबों का जीना क्या और मरना क्या , इक मोहरा ही तो हैं राजनीति की शतरंज की चाल का। चलो मर कर ही सही इस आज़ाद  देश में नर्क सा जीवन जीने से तो मुक्ति मिली , उनको न सही उनकी आत्मा को आभारी होना चाहिये सरकार और प्रधानमंत्री जी का। इनके पास आपकी हर बात का जवाब है , आपकी किसी भी समस्या का समाधान नहीं। सुनी उनकी बातें , अपना अपराध नहीं मानते औरों का याद दिलाते हैं , उन्होंने 1 9 महीने देश को जेल में बंद किया था , ... खाली स्थान भर लेना आप खुद आगे क्या कहना चाहते हैं। आपका इरादा क्या है बता देते आप भी। याद आया किसी वकील ने किसी नेता को पत्र लिखा था ये शब्द उपयोग करते हुए , " ये कहना बेकार है कि आपको शर्म आनी चाहिये "। किसी भी नेता की मौत कितनी बड़ी आयु में हो बयान वही रहता है देश को अपूरणीय क्षति का। इन कतार में मरने वालों से देश का कोई नुकसान नहीं हुआ , जो भी क्षति हुई बस किसी परिवार वालों को हुई। कहीं आग लगी तो मरने वालों को सरकार बताती है दोषी वो सिनेमा हाल का मालिक है , ऐसे मरने वालों की मौत का दोषी कोई भी नहीं। किसी को अफसोस नहीं , खेद नहीं , दुःख नहीं तो अपराधबोध का प्रश्न ही नहीं। आपको ऐसे ही मरना है क्योंकि आपका अपराध है आम जनता होना। भारतवर्ष में यही सब से बड़ा अपराध है।

नवंबर 16, 2016

POST : 557 पागलपन अपना अपना ( बुरी लगे या लगे भली ) डॉ लोक सेतिया

 पागलपन अपना अपना ( बुरी लगे या लगे भली ) डॉ लोक सेतिया

     सब से पहले मैं मानता हूं कि मैं इक पागल हूं , उम्र भर मैंने पागलपन ही किया है। कुछ साल पहले मैंने पहली अप्रैल को तमाम लोगों को आमंत्रित किया इक सभा आयोजित कर , ये बताने को कहा गया सभी से कि बताएं आपने क्या क्या और कैसी कैसी मूर्खतापूर्ण बातें जीवन में की हैं। मुझे तब सभी ने मूर्ख शिरोमणि का ख़िताब एकमत से दिया था इसी बात के लिये कि ऐसी सभा उस शहर में बुलाना जिस में साहित्य और अदब की बात शायद ही लोग समझते थे , केवल कोई पागल ही कर सकता था। मगर मेरे लिये उसी दिन शुरुआत थी इक नई तलाश की यहां साहित्य से सरोकार रखने वालों को जोड़ने की। मगर आज यहां इक और पागलपन की बात करनी है।
                                           देश में कुछ भी होता रहे कुछ लोग उस में हंसी मज़ाक ढूंढ ही लेते हैं। मगर इन दिनों जो दिखाई दिया वो हैरान करता है। लोग परेशान हैं किसी समस्या को लेकर और आप स्मार्ट फोन वाले व्हाट्सऐप पर चुटकुले बना बना अपना और औरों का मनोरंजन करने में व्यस्त हैं। फेसबुक पर बड़ी बड़ी बातें पोस्ट पर लिखने से चाहते हैं सभी को वह बात समझा दें जो खुद ही समझ नहीं रहे कि कर क्या रहे हैं। जैसे लोग प्यासे हों और आप पानी पानी लिख कर या पानी की तस्वीर दिखा कर अथवा जल शब्द का उच्चारण कर समझते हों उनको राहत मिलेगी। इतना ही नहीं लोग इसी को बहुत महान काम भी बता रहे हैं। कहते हैं ये इक क्रांति है नये युग की।

                                  हम किस हद तक असंवेदनशील बन गये हैं कि औरों का दर्द हमें रुलाता नहीं हंसाता है। क्या नेताओं से सीखा है हमने ये सबक , कृपया नेता मत बनिये , इंसान बनिये। सोचिये क्या हर विषय मात्र मनोरंजन का होना चाहिए। किस दिशा में अग्रसर हैं हम सभी। काश जितना समय या धन आपने बेकार के कामों में लगाया उसको किसी अच्छे और सार्थक प्रयास में लगाते तो मुमकिन था किसी का थोड़ा भला ही हो जाता। पागल बनो मगर किसी उद्देश्य की खातिर , व्यर्थ का पागलपन बंद करो। चलो कुछ शेर ही याद करते हैं पुराने शायरों के।


                          उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें ,

                         चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये।

                       

                      हसरतें और भी हैं वस्ल की हसरत के सिवा ,

                      और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा।

                    

                        हमें मालूम है तगाफुल न करोगे लेकिन ,

                       ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक।


 

                    

नवंबर 15, 2016

POST : 556 जनता बेचारी , लोकतंत्र की मारी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     जनता बेचारी , लोकतंत्र की मारी (  तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          जनता गरीब की बेटी की तरह है , जिसको ऐसे योग्य वर की चाहत है जो उसका आदर करे , उसके सुख दुख का साथी हो , उसके भरोसे को कभी तोड़े नहीं , उसको दिये वचन या किये वादे याद ही नहीं रखे उनपर खरा भी उतरे , उसको अपने से छोटा नहीं समझे , उसके साथ कभी छल कपट नहीं करे। कोई बड़ी चाहत नहीं है उसकी , फिर भी सत्ता के दलाल बन नेता उसकी बेबसी का फायदा उठाना चाहते हैं। उस पर बुरी नज़र रखने वाले हैं , उसका शोषण करने को हमेशा तैयार रहते हैं , उसकी आबरू बचाने वाला कोई भी नहीं। सालों से अपना सम्मान अपनी आज़ादी को बचाने को वह संघर्ष कर रही है। आप यकीन करें ये कोई प्रेम कथा नहीं है , ये वास्तविकता है देश की राजनीति और लोकतंत्र की।

        कुछ साल पहले इक नेता आया था उसके पास , हाथ जोड़ कर विनती करने लगा इस बार मुझे अपनी सेवा का अवसर दे दो। मैं तुम्हारा दर्द तुम्हारी परेशानियां देख कर बहुत दुखी हूं , तुम्हारे सभी कष्टों का निवारण करना चाहता हूं। मैं सच्चे मन से तुम्हें चाहता हूं , हर ख़ुशी हर अधिकार लेकर तुम्हारे कदमों में डालना चाहता हूं , जनता का शासन कायम करना मेरा एक मात्र उदेश्य है। तुम ही देश की असली मालिक हो , सभी नेता सत्ताधारी मंत्री और देश का प्रशासन तुम्हारी सेवा के लिये ही होते हैं। तुमने पिछली बार सही नेता का चुनाव नहीं किया था , कुर्सी मिलते ही तुम्हारा भरोसा तोड़ कर उल्टा तुम पर अत्याचार करने लगा। अपना कर्तव्य निभाना भूल गया है , मैं तुम्हें उस के कुशासन से छुटकारा दिलाना चाहता हूं। जनता का कल्याण ही मेरा धर्म है। जनता उसकी मीठी मीठी बातों में आ गई थी और उस पर विश्वास कर जीत की माला उस को पहना दी थी। सुनहरे सपने दिखाने वाले नेता ने सत्ता मिलते ही रंग बदल लिया था और मनमानी करने लगा था। जनता खामोश उसके सितम सहती रही , कोई नहीं था जिसके सामने अपनी फरियाद करती। नेता उसको अपनी सेवक और गुलाम समझता और ऐसा करने को अपना उचित अधिकार बताता।

         बेचारी अवसर की तलाश करती रही खुद को मुक्त करने को , चुनाव का समय आ ही गया था। सत्ताधारी नेता की महिमा और उसके किये विकास कार्यों का लगातार प्रचार किया जाता रहा था। सत्ताधारी नेता को यकीन था उसके करोड़ों रुपये के विज्ञापन उसको फिर से बहुमत दिल देंगे , जनता के पास उस से बेहतर कोई विकल्प ही नहीं है। शासनतंत्र का दुरूपयोग कर देश भर में भीड़ जमा कर सफल जनसभायें आयोजित करने के बावजूद भी जनता ने उसको बुरी तरह हरा दिया था। ये देख कर वह बौखला गया था और जनता को गुमराह होने की बात कहने लगा , उसको नासमझ और बेवफा तक कह दिया था। हारने के बाद भी उसका अहंकार खत्म नहीं हुआ था। मीडिया और नवनिर्वाचित नेता उसके बयानों की निंदा करने लगे और इसको अलोकतांत्रिक करार देने लगे। तभी उसके चाटुकार सामने आकर उसका बचाव करने लगे और कहने लगे उनके नेता के बयानों को सही नहीं समझा गया उनका अभिप्राय ऐसा कदापि नहीं था। नेता जी तो जनता का बेहद आदर करते हैं और उसके निर्णय को सर झुका मानते हैं। जनता फिर से उनको चुनेगी अगली बार , लोकतंत्र में जीत हार होना कोई बड़ी बात नहीं है। हारे नेता जी सोचते हैं काश उनको इसका आभास पहले हो जाता तो चुनाव की नौबत ही नहीं आती , मगर तब भी उनको लोकतंत्र पसंद है क्योंकि उसी से उनको सत्ता वापस मिल सकती है। उनके दरबारी अभी भी उनको सच्चा जनसेवक बताकर उनकी जय जयकार करते हैं।

                      जनता की दशा द्रोपदी जैसी है , जिस के पांच पति हैं तब भी उनके सामने ही उसका चीरहरण किया जा रहा है। सभी खुद को उसका मालिक समझ दांव पर लगा सकते हैं मगर उसके सम्मान की परवाह किसी को नहीं है।  उनका झगड़ा द्रोपदी की लाज के लिये कभी नहीं होता , होता है केवल शासन पाने को। जनता का रक्षक कोई भी नहीं है , पहले की ही तरह बेचारी जनता आज भी खामोश है। बोलना चाहती है शायद पर बोलने की अनुमति नहीं है , इजाज़त है बस ताली बजाने की भाषण सुन कर।  सवाल करने का अधिकार अभी नहीं है , जब दोबारा चुनाव होंगे तब भी चुप चाप अपना फैसला देना होगा। जनता क्या चाहती है कोई नहीं पूछना चाहता , सब जनता के मत की व्याख्या अपनी ज़रूरत और मर्ज़ी से कर लेते हैं। सच तो ये है कि जनता को इन में से कोई भी पसंद नहीं है , जनता ने कभी किसी से चाहत का इज़हार नहीं किया है। कोई भी उसके काबिल नहीं है , आज तक किसी को भी पचास प्रतिशत भी वोट मिले नहीं हैं।  लोकतंत्र का अर्थ बहुमत होता है तो वोट डालने वालों का बहुमत सदा सत्ता पाने वाले के विरुद्ध ही जाता रहा है। कभी इस ने कभी उस ने छला है बेचारी को , उसकी दशा कभी बदली नहीं , कोई सुधारना भी नहीं चाहता। जनता बेचारी , लोकतंत्र की मारी , कल भी बेबस थी , आज भी बेबस ही है।

नवंबर 14, 2016

POST : 555 आस्तिकता और नास्तिकता के भंवर में ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

आस्तिकता और नास्तिकता के भंवर में ( कविता )  डॉ लोक सेतिया

ये मेरी कैसी दुविधा है
बचपन से आज तक
मानता रहा हूं कि वो है 
हर दुख में हर परेशानी में
उदासी के हर इक पल में
जब नहीं होता था कोई साथ
तब यकीन करता रहा हूं
कोई हो न हो वो तो है ना ।

जो जानता है मेरी हर इक बात
समझता है मेरे हालात मेरी विवशता 
और मैं मन ही मन करता रहा विनती
उसी से निराशाओं की हर घड़ी में ।

और तमाम उम्र बिता दी
इक ऐसी झूठी उम्मीद के सहारे 
जो कभी हो नहीं पाई पूरी जीवन भर ।

जब लगने लगा टूट चुकी है आस्था
और सोच लिया बस अब नहीं रहना
तकदीर बदलने की झूठी आशा में
जो पूरी नहीं हो पाई कभी भी अब तक ।

आशा और अंधविश्वास को लेकर 
तब भी पल पल रहती है वही बात
मेरे दिल और दिमाग में इक डर बनकर
कहीं उसको नहीं मानना उसको और भी
नाराज़ तो नहीं करता होगा जिसको मैं
कभी खुश नहीं कर पाया अपनी आस्था से ।

मालूम नहीं इसको क्या कहते हैं
मैं आस्तिक हूं या नास्तिक रहा हूं
ढूंढता रहा उसको निराशा में मतलब को
पूजता रहा अपनी ज़रूरत की खातिर
अधूरा रहा मेरा विश्वास मेरी आस्था
इक शक रहा है विश्वास अविश्वास के बीच 
आज भी खत्म नहीं हुई मेरे मन की दुविधा
उसको चाहता हूं मैं या केवल डरता हूं मैं । 
 
 

नवंबर 13, 2016

POST : 554 सूरत बदलनी चाहिए - भाग दो ( हालात-ए-वतन ) डॉ लोक सेतिया

 सूरत बदलनी चाहिए - भाग दो ( हालात-ए-वतन ) डॉ लोक सेतिया

   काला धन केवल साहूकारों नेताओं अफसरों और अपराधियों के पास ही नहीं है। अधिकतर तथाकथित धार्मिक संस्थाओं के पास जो पैसा जमा है वो भी ऐसे ही लोगों द्वारा दिया दान ही है। अभी किसी ने गंगा में नोट बहाये और उस पर बयान भी दिया गया मगर क्या आप मानते हैं ऐसा करने से किसी को पुण्य मिलेगा। जो ये सोचते हैं उनको शायद पावन शब्द का अर्थ समझना होगा , आप पाप की कमाई से गंगा को अपवित्र नहीं कर सकते। न कोई देवी देवता आपकी ऐसी कमाई से चढ़ाई राशि से आसीस ही देता है , लगता है लोग धर्म का कार्य नहीं दिखावे को आडंबर करते हैं। दाता को आपने भिखारी समझ रखा है , परमात्मा दाता है सब को देता है मांगता नहीं , जो आपको बताते हैं पैसे से देवी देवता या भगवान को खुश करने को उनका अपना स्वार्थ है। जिन भी आश्रमों में , मंदिरों में , या किसी भी धर्म स्थल में नोटों के अंबार जमा हैं उनको धर्म की किताब को ठीक से पढ़ना और समझना चाहिए। उनको सोने चांदी के मुकट या आसन बनवाने की जगह वही धन जनकल्याण के कामों पर खर्च करना चाहिए। धर्म और अधर्म का अंतर सब से पहले उन्हीं को समझना होगा। कोई नियम धर्मों पर भी लागू हो उनकी क्या सीमा होनी चाहिए धन संपति रखने की और जमा राशि जनता पर खर्च किया जाना अनिवार्य हो उसकी भी।

     जहां तक सरकार की बात है , देश भर में तमाम सरकारी भवन बने हुए हैं जिनकी शायद ही ज़रूरत हो , और बनाने की ज़रूरत ही नहीं , बल्कि उनको भी जनता की खातिर उपयोग किया जाना चाहिए। कुछ महीना पहले इक सभा हरियाणा मानव अधिकार आयोग ने आयोजित की थी , हैरानी हुई देख कर कि तमाम सरकारी भवन उपलब्ध होने के बावजूद सभा इक आलीशान बैंकट हाल में आयोजित की गई ताकि कुछ अतिविशिष्ट लोगों को ऐरकंडीशन हाल में आराम मिल सके। अब ऐसे आराम पसंद लोग गरीब जनता की तकलीफ क्या समझेंगे।  और ये बात तब और खुलकर सामने आई जब आयोग के उच्च अधिकारी भाषण में मानवाधिकार की हालत की नहीं , आयोग के पास अपना भवन होने और इक अतिरिक्त स्थान भी होने की बात गर्वपूर्वक बता रहे थे। सेवानिवृत अधिकारी को सरकारें उपकृत करती हैं ऐसे पदों पर बिठाकर जबकि उनका सरोकार समस्या से नहीं अपनी सुख सुविधा से होता है। जनता का धन इस तरह अपने चाटुकारों को किसी अकादमी का प्रमुख बनाकर खर्च करना भी अनुचित ही है।  मुझे ऐसे लोगों का जनता का धन अपनी सहूलियात पर खर्च करना उतना ही गलत लगता है जितना रिश्वत लेने वालों का जनता से घूस लेना।  कई देशों में ऐसा नियम है कि जब शाम को सरकारी दफ्तर बंद हो जाते हैं , उसके बाद उसी जगह को उनको आश्रय देने को उपयोग किया जाता है जो बेघर हैं और वो रात वहां सो सकते हैं व सुबह चले जाते हैं।  अपने देश में प्रशासन जनता से ऐसा सहयोग करने की सोचता तक नहीं है। जनता की परेशानी से उनको मतलब ही नहीं होता है। 

        इक अन्य बुराई की शुरुआत ही बहुत पहले हो गई थी आज़ादी के बाद ही। किसी भी नेता की मौत के बाद उसकी समाधि बनाना वह भी कई कई एकड़ ज़मीन पर , इस देश की गरीब जनता के साथ क्रूर मज़ाक है। उस के बाद कितने लोगों की याद में कितनी भूमि कितना धन ऐसे कार्यों पर खर्च किया जाता रहा जो वास्तव में उन्हीं महान नेताओं के आदर्शों के ही विरुद्ध है। ऐसी बहुत सी बातें हैं जिन पर फिर से विचार किया जाना ज़रूरी है। देश में दो वर्ग नहीं हो सकते इक आम दूजा ख़ास। वी आई पी शब्द ही अलोकतांत्रिक है। क्या हम सच्चे लोकतंत्र हैं , अगर हैं तो लोक अर्थात जनता कहां है। अभी सिर्फ तंत्र ही तंत्र दिखाई देता है। 

 

POST : 553 जिन्हें अंधकार से प्यार हो गया है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      जिन्हें अंधकार से प्यार हो गया है ( व्यंग्य  ) डॉ लोक सेतिया

  घटना पुरानी है दस साल पहले की , लोग भूल भी गये होंगे , मुझे बार बार याद आती रहती है , क्योंकि उसी तरह की खबरें आये दिन पढ़ने को मिलती ही रहती हैं।  घटना इतनी सी है कि एक आदमी अपने एक कमरे के किराये के घर में ज़िंदा जलकर मर गया। हम सभी ने कभी न कभी अपने हाथ को किसी गर्म बर्तन से छूने से या गलती से आग को छूने का एहसास किया होगा , वो जलन वो दर्द सिरहन पैदा करता है। जब भी सुनते हैं कोई आग में झुलस गया या ज़िंदा जल गया तन बदन में कंपकंपी सी होने लगती है। मगर उस दिन इक अख़बार ने वो खबर छापी थी तब के विधायक की तस्वीर के साथ ये बताने को कि उस गरीब की अस्वाभाविक मौत पर जब उन्होंने ये जानकारी नेता जी को दी तो वह खुद गये उस पिड़ित परिवार को पचीस हज़ार की सहायता राशि देने को। क्या ऐसी घटना के बाद  मात्र यही मान लेना काफी है कि आग बिजली के शार्ट सर्किट से लगी होगी , और क्योंकि घर के बाकी चार सदस्य बाहर गये हुए थे , और वह अकेला एक साल से तपेदिक से बीमार था चारपाई पर लाचार लेटा रहा , चल फिर नहीं सकता था खुद अपना बचाव नहीं कर सका और तड़प तड़प कर मर गया। सरकार आज भी यही करती है और दावा करती है उनकी योजनाएं लोकहितकारी हैं। कई बार समाचार से हमें जितनी बात मालूम होती है उस से अधिक महत्वपूर्ण वो होता है जो न कोई बताता है न शायद कभी हम भी सोचते ही हैं। उस खबर से मेरे मन में जो सवाल उठे और मैंने संबंधित लोगों से पूछे जिनको सुन वो खफा हुए मेरे साथ आज बताता हूं , अर्थात दोहराता हूं। जो आदमी इस कदर बीमार हो उसको तो हॉस्पिटल में भर्ती होना चाहिए था , मगर पता चला सरकारी हॉस्पिटल ने इनकार कर दिया था , जबकि स्वास्थ्य विभाग का प्रचार है टी बी की दवा "डॉट्स " घर घर पहुंचाने का। उस गरीब परिवार को सरकारी बी पी एल कार्ड भी नहीं मिला था न ही कोई मुफ्त प्लाट सौ गज़ का जैसा सरकारी विज्ञापन दावा करता है। आप प्रतिदिन कितने ऐसे विज्ञापन टीवी पर या अख़बार में देखते या पढ़ते हैं , असलियत कोई नहीं जानता।

                               क्या हर खबर आपके लिये इक तमाशा भर है। अब लगता है जैसे कुछ लोगों को अंधकार से प्यार हो गया है। पतन को उत्थान घोषित कर दो , पाप को पुण्य बताओ , झूठ पर सच का लेबल लगा दो , धृतराष्ट्र को दूरदर्शी बताकर उसका गुणगान करो। राजनीति रूपी नर्तकी सभी को लुभा रही है , उसे हासिल करने को किसी भी सीमा तक नीचे गिरने को तैयार हैं लोग। स्वार्थ की आंधी सभी को उड़ा कर ले जा रही है , सफल होना एकमात्र ध्येय है और सफलता का मतलब धनवान होना ही है। जानते हुए भी अंधविश्वास और छल कपट को बढ़ावा दे रहे हैं चंद सिक्कों में ईमान बिक रहा है। पैसे का मोह ऐसा बढ़ा है कि जो सच का चिराग लेकर चले थे आज रौशनी से बचने और अंधेरों का कारोबार करने लगे हैं। मकसद आम नहीं ख़ास कहलाना है , उसकी कीमत चुकाने को राज़ी हैं। जनता के ज़िंदा रहने या मरने से अधिक महत्व खुशहाल जीवन और सुख सुविधा धन दौलत बंगला गाड़ी जैसी चीज़ों का लगता है। हमारा किसी विचारधारा से कोई सरोकार नहीं है , बस इक अवसर की तलाश है। जो हमें ऊपर ले जा सके उसी का गुणगान करने को तत्पर हैं। हमें इक दल मिल गया है जो अपने को कहता आम है मगर समझता सब से ख़ास है। उसका रंग उसका पहनावा यही हमारी पहचान है , कथनी और करनी का विरोधभास तक हमें मंज़ूर है। कल तक जिन आदर्शों जिन मूल्यों की बात किया करते थे हम आज वो फज़ूल लगती हैं। हमारा मकसद अपने कार्य को इक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना था , ऊपर आते ही उस सीढ़ी को नष्ट कर दिया है ताकि कोई दूसरा उसका उपयोग नहीं कर सके। अब हमें अपने नेता की जयजयकार करनी है , आडंबर करना है जनसेवा का और जनता ही नहीं खुद को भी धोखा देना है। हमारा दल लोकतंत्र के नाम पर व्यक्तिपूजा करने में आस्था रखता है , दल के भीतर असहमति के लिए कोई स्थान नहीं है। अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के अधिकार को हमने दल के नेता का पास गिरवी रख दिया है।

POST : 552 सूरत बदलनी चाहिए ( हालत-ए-वतन ) डॉ लोक सेतिया

      सूरत बदलनी चाहिए ( हालत-ए-वतन ) डॉ लोक सेतिया

 बस यही अथवा इस से आगे भी , ये सवाल बेहद ज़रूरी है। चलो थोड़ा अलग ढंग से समस्या को समझते हैं। मैं गांव में रहा हूं और ये बात वहीं से समझी है। गांव में तालाब का बहुत महत्व होता है , तालाब का पानी जीवन की पहली बुनियाद होता है आज भी , शहर में भी तालाब हुआ करते थे जिनको धीरे धीरे मिट्टी से भर दिया गया और उस पर बस्तियां बसा ली। जब भी तालाब का पानी गंदा हो जाता था , आदमी और जानवर दोनों के काम का नहीं रहता था , आजकल की भाषा में प्रदूषित हो जाता था , तब उस तालाब के पूरे पानी को निकाल देते थे बाहर सफाई के लिये। अगर खराब पानी में ही और साफ पानी मिलाया जाता रहता तो नया डाला साफ पानी भी गंदा हो जाता। इसलिये पहले गंदे पानी को निकाला जाता फिर उस तालाब की सारी गाद सारी गंदगी को तल से निकाल दिया जाता था। फिर उसकी पूरी सफाई के बाद सारा कीचड़ निकालने और दूर फैंकने के बाद नया साफ पानी डालते थे। ये इक साधारण ज्ञान था जिसके लिये किसी अध्यापक या किताब की ज़रूरत नहीं होती थी। आजकल हमें पानी गंदा करना तो आता है साफ करना नहीं आता , तभी आर ओ जैसी मशीनों की ज़रूरत पड़ती है। अभी भी समझ नहीं रहे कि यही हाल वायु का भी होता जा रहा है , सांस लेना दूभर होने लगा है ,  मगर हम तथाकथित समझदार लोग खुद समस्या पैदा करते हैं फिर उसका हल तलाश करते हैं। बात स्वच्छता की कर रहे थे , हवा पानी की बात तो उदाहरण मात्र को की समझने को। समझना यही है की बात पूरे तालाब के पानी को बदलने की है , अधूरे काम से बात नहीं बनेगी। सारा पानी बदलना ही नहीं होगा सारी गाद काई कीचड़ और खराब मिट्टी को भी निकलना होगा। दुष्यंत कुमार ने तालाब के पानी बदलने की तभी की थी , उनके शेर में और भी उदाहरण हो सकता था।  चलो उस शेर को दोहराते हैं।

                                       " अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ,
                                          ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं। "
                                         
       ये केवल विषय की भूमिका थी , आगे विस्तार से असली समस्या की बात करते हैं। सवाल काले धन और भृष्टाचार का है , समस्या केवल पांच सौ और हज़ार रुपये के नोटों को बंद कर नये नोट बदलने से हल नहीं होने वाली। काला धन सिर्फ नकद धन के बंडलों में ही नहीं है , उस से कई गुणा अधिक काली कमाई ज़मीन प्लॉट्स फ्लैट्स और आलीशान महल नुमा मकानों में छुपी हुई है। कानून बनाने से कुछ नहीं होगा , जैसे पांच सौ और हज़ार रुपये के नोटों को लेकर निर्णय किया गया और साफ बताया गया कि पचास दिन में जमा करवा बदल सकते हो अन्यथा वो नोट खाली कागज़ के टुकड़े रह जायेंगे , उसी तरह सभी को अपनी ज़मीन जायदाद की घोषणा करनी ज़रूरी हो कुछ दिन में , और बिना घोषित सम्पति होना अपराध समझा जाये जिसकी कठोर सज़ा भी हो। अगर सरकार चाहती है कि हर नागरिक को घर की छत हासिल हो तो किसी को भी ज़रूरत से अधिक सम्पति रखने की अनुमति नहीं होनी चाहिये। आपके पास कितने घर हों इसकी सीमा होनी ही चाहिए। किसी को भी बीस मंज़िला महल बनाने की अनुमति नहीं हो ताकि सभी के लिये ज़रूरत की जगह उपलब्ध हो सके। यही अर्थशास्त्र का नियम है , गरीब इसी लिये गरीब हैं कि कुछ लोग ज़रूरत से कहीं अधिक एकत्र किये बैठे हैं। जब तक सभी के लिये न्यूनतम और अधिकतम की सीमा नहीं बनाई जाती , देश में अमीर और गरीब में अंतर बढ़ता ही जायेगा।  सभी को समानता का अधिकार कभी नहीं मिल सकेगा। काम आसान नहीं है , शुरुआत कहां से की जाये ये भी सवाल आयेगा। सब से पहले उनको जो दूसरों से नियम कानून का पालन करने को कहते हैं उनको खुद अपने पर यही लागू करना होगा , क्या सरकार ऐसा करती है , कदापि नहीं , यही समस्या की जड़ है। जैसे अभी खुद प्रधानमंत्री जी ने बताया कि उनके प्रयासों से सवा सौ करोड़ का काला धन जमा हुआ पिछले दिनों में , कुछ महीने पहले भी आय सीमा से अधिक जमा किया धन बताने का अवसर दिया गया 4 5 प्रतिशत कर चुका कर। मतलब क्या हुआ , सरकार को हिस्सा मिल गया तो चोरी चोरी नहीं रही , ईमानदारी बन गई। ये तरीका ही अनुचित है , मगर सरकारें यही करती रही हैं , नियम तोड़ो और जुर्माना भर अनुचित को उचित घोषित करवा लो। इसी से लोग कानून को खिलौना समझने लगे हैं , जांच की जाये तो पता चलेगा सब से अधिक कायदे कानून खुद सरकार और प्रशासन ने तोड़े हैं। आपको मेरी बात गलत लगी हो तो समझाता हूं। खुद सरकार ने घोषित किया कहां क्या बनाना है , हर नगर का मानचित्र बाकायदा पास किया गया कानूनी ढंग से। जनता को पालन करना ही है कहां घर बनाये , किस जगह दुकान , किस जगह उद्योग लगाना आदि आदि। मगर खुद नेताओं ने जनहित की बात की आड़ लेकर जहां जो मर्ज़ी बदलाव कर लिया। अपने लोगों को भूमि जायदाद खैरात की तरह बांटी गई और उसके लिये सारे नियम कानून बदल लिये गये। ऐसा बिल्कुल ज़रूरी नहीं था , वोटों की खातिर बाज़ार की ज़मीन किसी वर्ग को धर्मशाला बनाने को दी गई , जो कानूनन गलत था , किसी पार्क को बदल जो मर्ज़ी बना लिया। सरकारी दफ्तर की खाली हुई जगह , जब दफ्तर किसी बड़े भवन में स्थानांतरित हुआ तो , अपनी सुविधा से अपनों को आबंटित किया गया। कितने धर्म स्थल तक गैर कानूनी ढंग से बनाये गये , बिना विचारे कि भगवान उस में रहेगा भी या नहीं। मर्यादा की बात को दरकिनार कर अमर्यादित तरीके से आश्रम मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरिजाघर बने , प्रशासन नेताओं , सरकारों की सहमति से। एक गलत परंपरा शुरू की गई हर गलत को सही बनाने की पैसे से , ये खेल किसने शुरू किया , क्या जनता ने , नहीं खुद सरकार ने अपनी सुविधा अपने फायदे की खातिर। इतने साल तक बढ़ावा देते रहे नियम कानून तोड़ने वालों को , और आज दोष अपना नहीं मानते , औरों को कटघरे में खड़ा करने वाले भी शामिल रहे हैं अपराध को बढ़ावा देने में। 

                   घोटालों की चर्चा बहुत हुई , मगर जो सब से बड़ा घोटाला हुआ , होता रहा , अभी भी जारी है , उसका ज़िक्र किसी ने किया ही नहीं। हर वो जनता का धन , सरकारी पैसा , जिसको इस तरह खर्च किया जाये जिस से जनता को कुछ भी हासिल नहीं हो , और कुछ ख़ास लोगों को फायदा पहुंच सके , किसी विशेष वर्ग को खुश किया जा सके ,  अपनी नाकामी को छुपाया जा सके , उसको घोटाला ही कहेंगे। समझ गये या नहीं। सरकारी विज्ञापन देश का सब से बड़ा घोटाला हैं , आज़ादी से आज तक जितना धन उन पर बर्बाद किया गया उसका हिसाब लगाओगे तो चौंक जाओगे। शायद देश की सभी समस्याएं इतने धन से हल हो सकती थीं। काला धन किसको माना जाये , सवाल टेड़ा है , आपने किसी को कानून का दुरूपयोग कर फायदा पहुंचाया , तो कसूरवार वो नहीं आप हैं। मगर आज भी झूठे प्रचार का मोह किसी सत्ताधारी से छूटता नहीं है। इतिहास क्या समझेगा मुझे नहीं मालूम , यूं भी ये मेरा प्रिय विषय नहीं रहा शिक्षा में भी , मुझे कभी समझ ही नहीं आया यही विषय। आज डिजिटल युग में ब्लैक एंड वाइट फिल्मों की बात करना थोड़ा असहज लगेगा सभी को , मगर मुझे देश समाज में दोनों इक साथ दिखाई देती हैं आज भी। किस पर यकीन किया जाये और किस को झूठ समझा जाये। सरकार करोड़ों रुपये खर्च करती है नित नये आयोजन आयोजित करने में , महानगरों में बहुमंज़िला भवन , फ्लाइओवर , जगमगाती सड़कें , बड़ी बड़ी गाड़ियां , पांच तारा होटल ही नहीं पांचतारा सुविधा वाले अस्पताल भी , बड़े बड़े स्कूल जिन में लाखों रुपये खर्च कर धनवान अपने बच्चों को दाखिल करवा सकते हैं , इस चमकती दुनिया में इक और संसार भी बसता है। झुग्गी झौपड़ी में बसर करते लोग , भूख से तड़पते बच्चे , शिक्षा से वंचित बचपन गलियों में कूड़ा बीनता हुआ , सर्दी गर्मी बरसात में खुले आसमान में रहने वाले , रात को फुटपाथ पर सोने वाले लोग , साफ पीने के पानी को तरसते देश के अधिकतर लोग। मगर विकास की अंधी दौड़ में सरकार की प्राथमिकता गरीबी और भूख नहीं है , समानता का अधिकार क्या यही होता है , अमीर की शिक्षा अलग गरीब की अलग , उपचार भी अलग अलग , मानवता का हक भी अलग अलग। आज भी सरकार उस से आयकर वसूलना चाहती है जिसकी आमदनी इक सीमा से अधिक है , मगर जिस की आमदनी गुज़ारे लायक नहीं उसको देना नहीं चाहती उसका अधिकार मान , भले कहने को खैरात देती हो जो इक छल है धोखा है। बेबस लोग सरकार से निराश ही होते हैं। 

                      इस देश का दुर्भाग्य है कि हम भाग्यवादी हैं , रोज़ ज्योतिष विशेषज्ञ से अपनी राशि पूछते हैं , जो हमेशा हमें जल्द ही अच्छे दिन आने का दिलासा देते हैं। हम सोचते ही नहीं हमारी खराब हालत भगवान ने नहीं की , कुदरत ने सभी को सब इक बराबर ही दिया था , कुछ शक्तिशाली लोगों ने हथिया लिया है औरों का हक यही वास्विकता है। भले इसके लिए व्यवस्था और सामजिक ताने बाने को ढाल बना लिया गया हो।  लोकतंत्र का क्या अर्थ है , जनता देश की मालिक और प्रशासन और निर्वाचित प्रतिनिधि उसके सेवक हों। क्या ऐसा है , मालिक भूखा हो और सेवक मालपूरे खाये इसको लोकतंत्र नहीं कह सकते। देश का राष्ट्रपति जब सैंकड़ों कमरों के महल नुमा भवन में रहे और देश की इक तिहायी जनता बेघर हो तो इसको राजशाही कहा जाना चाहिये। छोटे से छोटे अधिकारी को शानदार घर मिलना रहने को तब तक जघन्य अपराध है जब तक आम नागरिक को छत तक नहीं मिलती। मोदी जी प्रधानमंत्री बनते ही किसी मंदिर में करोड़ रुपये मूल्य की 2500 किलो चंदन की लकड़ी दान दे आये थे , क्या ये सही था गरीब देश की जनता का पैसा आप दान नहीं कर सकते दानी बनकर। 

                      परिवारवाद राजनीति का कोढ़ है और जनतन्त्र का विरोधी , फिर भी आप अपने दल में ही नहीं इसको रोकते बल्कि ऐसे दलों को साथ लेते हैं जो बने ही किसी नेता की जागीर की तरह हैं। आज भी कोई नेता अपने सहयोगी को ये कहने का साहस नहीं कर सकता कि आप किसी राज्य या क्षेत्र की नहीं देशहित की बात करें और पूरा देश एक है सभी का है।

               ( विषय अभी काफी लंबा है और बहुत कहना बाकी है। जारी रहेगा अगली पोस्ट पर। ) 

               

नवंबर 12, 2016

POST : 551 मेरा तेरा राज्य नहीं , सभी का देश ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  मेरा तेरा राज्य नहीं , सभी का देश ( आलेख  ) डॉ लोक सेतिया 

           पानी की इक बूंद नहीं देंगे , ये ऐलान किया है बादलों ने , इक बड़ा बादल इक छोटा बादल। अपने नाम की ही लाज रख लेते। मगर क्या किया जाये हवा चल रही है चुनावी , और चुनाव किसी जंग से कम नहीं होते। सत्ता की खातिर हर बात को ताक पर रख सकते हैं। कानून या न्यायालय किस खेत की मूली हैं। उनका बस नहीं चलता अन्यथा हवा को भी अपने राज्य की सीमा पर रोक लेते। लेकिन इस के बावजूद जब कभी खुद के लिये ज़रूरत हो यही नेता संविधान और न्याय पर भरोसा करते हैं वाला बयान रट लिया करते हैं। देश की एकता अखंडता को कायम रखने की कसम भी खाया करते हैं। देश को एक समझते भी हैं क्या ये तमाम नेता चाहे किसी राज्य के हों और जिस किसी दल से संबंध रखते हों। वोटों की खातिर जनता को कितनी तरह से बांटते हैं , कोई हिसाब नहीं। जिस देश में लोग खुद को देशवासी नहीं समझते बल्कि अपनी अपनी अलग पहचान बताते हों , उस देश का भविष्य सुनहरा भला कैसे हो सकता है। सत्तर साल होने को हैं आज़ाद हुए मगर आज भी इतनी दीवारें बीच में खड़ी हुई हैं , और उनको गिराना तो क्या हम और ऊंची उठाने और मज़बूत करने का काम करते रहते हैं अपने अपने मतलब या दलगत स्वार्थ की खातिर। परिवार , शहर , राज्य , जाति - धर्म , हमारे लिये पहले हैं देश बाद में। नफरतों के बीज बोते हैं तमाम नेता लोग , आग लगाना जानते हैं , मुहब्बत करना नहीं आता , बारिश की बात कैसे करें। शायद खुद जिस धर्म को मानने की बात करते हैं उसी की शिक्षा भूल गये हैं। मिल कर खाना , सच ही ईश्वर है , सभी की भलाई , मानवता की बातें , केवल पढ़ने को नहीं लिखी हुई। भटक गये हैं शायद सभी सच्चाई की राह से। कुदरत को कैद करने लगे हैं बिना समझे कि अंजाम क्या होगा। परमात्मा सभी को सदबुद्धि प्रदान करे , मन में अहंकार नहीं हो , सोच छोटी नहीं हो।  ये कोई जयकारा नहीं है , इक संदेश है जिसको याद रखना है समझना है और अपनाना है। विनती है , उपदेश नहीं जिसे सुन लिया मगर भुला दिया। विचार अवश्य करना सभी , इधर भी उधर भी। 

 

नवंबर 10, 2016

POST : 550 श्रद्धासुमन पांच सौ और हज़ार के नोटों को ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

श्रद्धासुमन पांच सौ और हज़ार के नोटों को ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      आपने किसी को फांसी की सज़ा मिलते नहीं देखा होगा। फिल्मों में दिखाया जाता है फांसी की सज़ा सुनाने के बाद न्यायधीश पेन की निब को तोड़ देते हैं। ऐसा करने का सीधा सा मतलब यही है कि भले गुनाहगार कितना भी बुरा हो उसकी मौत का मातम मनाया जाना चाहिये। बेशक पांच सौ के नोट और हज़ार वाले नोट काला धन जमा करने के कितना भी काम आते रहे हों , उनकी हमेशा को विदाई पर थोड़ी संवेदना तो जताई  ही जानी चाहिये। मोदी जी ने जिस कलम से ये निर्णय लिखा उसको तोड़ा तो अवश्य गया होगा। कुछ नेता अभी उनका मातम मना रहे हैं मगर अपने दुःख को जनता की परेशानी बताकर। उन नेताओं के साथ सहानुभूति रखने में बुराई नहीं है , आखिर उनकी जीवन भर की कमाई दौलत राख होने को है। अब नेताओं की कमाई को सफेदी लगानी पड़े तो राजनीति हो चुकी। नेता और सरकारी अमला काला धन उसी को मानता है जो उनको छोड़ औरों के पास है। कालिख और चमकदार सफेद होने का यही अर्थ उनको समझ आता रहा है कि सत्ता वालों को सब कुछ करने की अनुमति है और उनके सौ खून माफ़ हैं। खैर आज बात उनकी है जो अब नहीं रहे , पांच सौ के नोट और हज़ार के नोट। सभी दो मिंट को मौन धारण करें।

                   शाम आठ बजे बताया गया उनके बस चार घंटे बाकी हैं , रात को बारह बजते ही उनका अंत तय हो चुका है। भगवान भी उसे नहीं बचा सकता जिसे सरकार खत्म करने का आदेश कर दे , इसलिये कहीं कोई ईबादत  कोई दुआ भी नहीं की जा सकती। चार घंटे पहले ठीक ठाक थे दोनों ही। आधी रात से उनका सांस लेना भी वर्जित , चल ही नहीं सकते। ये अनहोनी भी अजीब है , समझ ही नहीं आता क्या हुआ , इसको क्या समझा जाये। अब उनके अवशेष ठिकाने लगाने को थोड़े दिन हैं , टुकड़ों में , किश्तों में उनका विसर्जन किया जाना है। हाय कितने अच्छे लगा करते थे दोनों , कितना मनमोहक रूप था उनका। यूं इक साथ कभी कोई प्यार करने वाला युगल भी नहीं मरा होगा। स्वाभाविक मौत नहीं है , ख़ुदकुशी भी नहीं कह सकते , कोई दुर्घटना भी नहीं , कत्ल हुआ हो ऐसा भी सबूत नहीं है। फिर भी इतना साफ है वो नहीं रहे। अफसोस इस बात का है कि जिनको उनसे अपनी जान से अधिक प्यार था  , वो काला धन वाले उनकी मौत का मातम भी नहीं मना सकते। कोई कब्र खोद उनको दफ़्न भी नहीं कर सकते ताकि बाद में वहां जाकर आंसू बहा सकें , दो फूल चढ़ा सकें , मोमबत्ती जला सकें। भीतर ही भीतर रोना पड़ेगा उनको इनकी जुदाई में , जान अटकी हुई है कितनों की इन्हीं नोटों के बंडलों में।

                  कोई प्रवचन दे रहा है , खुद को ज्ञानी कह कर , जो खुद पर अधिक अभिमान करते हैं , सोचते हैं बिना उनके दुनिया का कोई काम नहीं चल सकता उनका यही अंत होता ही है। किसी को अहंकार नहीं होना चाहिये कि वही खुदा है , जो कहते थे पैसा खुदा से कम नहीं उनका आज नाम भी कोई याद नहीं करता। याद आया वो भी इक नेता ही थे। इन नोटों की आयु भी अधिक नहीं थी , जो इन से कम कीमत के हैं वो बहुत पहले से हैं , आज उनकी कद्र मालूम पड़ी सभी को , जब उन्हीं की ज़रूरत हुई। कल तलक बैंक वाले भी इन्हीं को संभाल कर गिनते थे बार बार , सौ पचास की औकात ही नहीं समझी जाती थी। छोटे भी बेकार नहीं होते अब समझे लोग , जनता की भी कद्र किसी दिन ऐसे ही समझ आएगी। लोग नाहक चिंता कर रहे हैं उनके बिना कैसे गुज़ारा होगा , आज तक किसी के नहीं रहने से कोई काम रुका है भला। अमर कोई नहीं है , सभी का अंत अवश्य होता है , देखना अभी इनकी जगह दूसरे आयेंगे जो सभी को और भी मोहक लगेंगे। फिर भी देखना उनको भी लगेगा उनका अंत कभी नहीं हो सकता।

            आशा है ये इक अच्छा कदम साबित होगा और भविष्य में कालिख किसी चेहरे पर नहीं होगी। मगर इक निवेदन ज़रूरी है भारतीय रिज़र्व बैंक से कि किसी दिन ऐसे तमाम नोटों की याद में इक शोक सभा आयोजित की जाये जो मृत घोषित किये जाते रहे या अभी किये गये हैं। उनका योगदान रहा है सरकार का कर एकत्र करने से हर योजना चलाने की खातिर , कल तक आप भी इन्हीं की पूजा किया करते थे। भले थे या बुरे थे काम सभी के आते तो थे , दो शब्द संवेदना के कहना तो बनता है। अभी भी मुद्रा परिवार ही आपके हर काम में योगदान देता ही है , बजट बनाना हो या खर्च करना , इनकी ज़रूरत होगी , रुपया रुपया है कीमत जो भी हो। माना उनका उपयोग काला धन जमा करने और तमाम अपराधों को अंजाम देने में किया जाता रहा , मगर दोषी कौन था , वो नोट या हम लोग और खुद सरकार जो आंखें बंद कर ये सब होने देती रही। इक रिवायत है किसी के चले जाने के बाद उसकी निंदा या बुराई नहीं की जाती है , श्रद्धांजलि सभा कर उसके गुणों का बखान किया जाता है , और दुआ मांगी जाती है।



      टीवी पर बहस में बाबा रामदेव बता रहे थे कि अब गरीबों के खातों में धन जमा होगा , कैसे , वो कह रहे थे अमीर अपना धन गरीबों के खातों में डाल देंगे। यकीनन खुद रामदेव ऐसा नहीं करने वाले , ये उनका जनता के साथ भद्दा मज़ाक ही था।  मगर जनता जानती है काला धन अपने बैंक खाते में डलवाना अर्थात किसी की आफत अपने सर मोल लेना है। भाई इन बाबा जी से बचना।  
         

नवंबर 08, 2016

POST : 549 अमीर लोगों के बुरे दिन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    अमीर लोगों के बुरे दिन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

            लाला जी के पास पांच सौ के और हज़ार रुपये के नोट हैं और रुलदू की जेब में सौ सौ रुपये वाले नोट हैं। लाला जी के पैसे आज किसी काम के नहीं और रुलदू के पैसे कीमती लगने लगे हैं। शायद इसी को समाजवाद कहते हों। जो लोग इतराते थे कल तक बताते थे भाई इतने भी पैसे घर में नहीं हों तो शान ही क्या , उनकी तिजोरी भरी हुई भी लगता है उदास है। अभी भी नहीं समझे क्या समझाते रहे महापुरुष कि जितना ज़रूरत उतना ही धन पास रखो अधिक जमा करोगे तो बेकार परेशान होगे। इक सरकारी कर्मचारी खुश है , उसने अभी अभी उम्र भर की काली कमाई बेटी की शादी में खर्च कर दी , शानदार ढंग से विवाह का आयोजन और लेन देन पर खर्चा कर के। अब भले बेटी की ससुराल वाले चिंता करें कि इतनी नकद राशि कैसे दिखायें कि कहां से आई है। दहेज लेना देना अपराध जो है। चलो ये तो छोटी सी बात है , मुश्किल तो उनकी है जिन्होंने करोड़ों रुपये घर में छुपा रखे हैं जनता से रिश्वत ले लेकर या सरकारी योजनाओं से लूट लूट कर। मोदी जी आज वास्तव में कमाल कर दिया है आपने पांच सौ और हज़ार के नोटों को बंद कर के। अब आज लगता है सभी इक समान हैं , कोई अमीर नहीं न कोई गरीब। दो दिन को ही सही सभी को छोटे मूल्य वाले नोट क्या सिक्के तक की कीमत समझ आ जायेगी , कल तक जिनकी औकात कोई समझता ही नहीं था। तभी कहते हैं सभी के दिन फिरते हैं। अच्छे दिन आने वाले हैं। लोग भूल ही गये थे उस नारे को , अब लगता है सच कहीं वो सपना साकार ही न होने वाला हो , अन्यथा अभी तलक गरीब को कोई बदलाव दिखाई दिया ही नहीं था। जैसे छोटे नोटों की कदर समझ आई है आज लोगों को शायद छोटे आदमी की भी कीमत सरकार और प्रशासन को समझ आ जाये। कल तक पचास रुपये चपरासी भी नहीं लेता था , भिखारी समझा है क्या , साहब को फाईल पहुंचानी है तो हरी पत्ती का पांच सौ वाला नोट जेब से निकालो। कहते हो लो चाय पी लेना पचास रुपये दिखला कर। अब दस दस वाला भी लेने को राज़ी होगा देखना। 

                           दो नंबर वालों की खबर ली ये तो ठीक है मगर इस में गेहूं साथ घुन भी पिस जायेगा , उसका क्या। महिलायें कैसे कैसे बचत करती हैं घर खर्च से थोड़े थोड़े पैसे जमा कर पति से छिपा रखती हैं , ताकि कभी मुसीबत में काम आ सके। उनकी पोल खुल जायेगी जो आज सुबह ही पर्स खाली की बात कहने के बाद अब बतायेंगी कितने हज़ार बिस्तर के नीचे छिपा रखे हैं , कल से बदलवाने हैं बैंक से। किसी महिला पर इस से अधिक अत्याचार कुछ नहीं हो सकता कि उनको अपना राज़ पति को बताना पड़े। कोई पति भले कुछ कह नहीं सके मगर सोचेगा अवश्य , कि मैं और से कर्ज़ लेता रहा आज तक ब्याज पर और साहूकार मेरे घर पर ही है। मगर अच्छा है क्योंकि इस साहूकार का ब्याज बाहर वाले से अधिक ही होता।

             खबरें आती रही हैं करोड़ों रुपये सरकारी छोटे छोटे अधिकारी से बरामद होने की , आज कितने ऐसे लोग बेचैन होकर भी चैन से सोयेंगे क्यों अब न चोरी का डर न किसी छापे का। शायद किसी ने आज किसी से घूस ली हो शाम को तो आज उसको खुद फोन कर सकता है भाई अपनी अमानत वापस ले जाओ। मेरा ज़मीर जाग गया है और मुझ से ऊपर वालों का भी , आपका काम उचित है तो रिश्वत किस बात की। इक बात तय है गरीब जनता के अच्छे दिन बेशक न भी आयें अमीरों के बुरे दिन आने वाले हैं। कल से इक नया टीवी सीरियल शनिदेव पर भी ऐसा ही दावा करता है।

नवंबर 06, 2016

POST : 548 ज़मीर ज़िन्दा रखना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

        ज़मीर ज़िन्दा रखना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

         मुझे प्रशासन को जनहित के पत्र लिखते चालीस साल बीत गये हैं। अनुभव अच्छे भी रहे और बुरे भी। मैं कभी इस बात से घबराया नहीं कि जब भी सच बोलता हूं कुछ लोगों को मेरी आदत खराब लगती है खासकर उनको जिनकी असलियत सामने आती है। हैरानी इस बात की होती है कि जो भ्रष्टाचार करते हैं या कोई गैर कानूनी काम करते हैं उनको अपना अनुचित कार्य गलत नहीं लगता बल्कि जो उनको अनुचित काम नहीं करने दे वही गलत लगता है। और बहुत बार काफी लोग उनकी तरफदारी भी करते हैं , क्योंकि ऐसे लोग मान चुके होते हैं कि हमारे देश समाज में सभी कुछ जायज़ है। गंदगी फैलाना औरों के घर के सामने उनको अपना अधिकार लगता है। नेता और अधिकारी भी कभी कभी गैर कानूनी काम करने वालों को बचाते हैं निजि कारणों से। ऐसा भी होता है कोई किसी अख़बार वाले से शिकायत करता है सच छापने पर। जब कोई अपनी गलती मानने की जगह गलती बताने वाले को गलत कहने लगे तब उस से कुछ भी कहना बेकार है। इक बात साफ़ करता हूं कि समाज को वास्तविकता दिखाना हर लेखक का फ़र्ज़ है , भले ऐसा करने से कुछ बदले या नहीं। कोई अधिकारी अपना काम करना चाहे या नहीं चाहे ये उसका अपना विवेक है। मुझे समाजहित का कार्य करना है भले लोग नाराज़ हों या खुश हों। मुझे वो लोग अच्छे नहीं लगते जो मेरे सामने बढ़ाई करते हैं और औरों के पास जाकर बुराई किया करते हैं। इतना चाहता हूं कि अगर आपको देश और समाज की भलाई चाहिए तो कम से कम समाजहित का काम करने वालों को हतोत्साहित नहीं करें अगर सहयोग नहीं करना चाहते हो। अच्छे बुरे कर्म के फल की बात नहीं भी की जाये तब भी इक बात अवश्य याद रखना , आपकी अंतरात्मा जानती है आप अपना कर्तव्य निभाते हैं देश और समाज के प्रति अथवा नहीं। इसलिए आप मेरे लिए नहीं खुद अपने ज़मीर के लिए सही व्यक्ति का साथ दें और ईमानदारी से फ़र्ज़ निभाएं।


POST : 547 अपनी अपनी सुविधा के आंकड़े ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    अपनी अपनी सुविधा के आंकड़े ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                   9 5 प्रतिशत लोग खुश हैं , मंत्री जी का बयान है आज की खबरों में। आप ऐसा कदापि नहीं कह सकते कि उनके आंकड़े सही नहीं हैं। वो साबित कर देंगे उनके आंकड़े तथ्यों पर आधारित हैं। कितनी संख्या है कुल और विरोध करने कितने आये आप खुद गिनती कर लो , हो गया उनका गणित सही। जो विरोध करने नहीं आते वो सभी सरकार का समर्थन करते हैं। आप नहीं पूछ सकते फिर आपका समर्थन करने वाले आपके समर्थन में भी सामने आते क्यों नहीं। ये सुविधा के आंकड़े हैं। कोई साबुन 9 9 प्रतिशत किटाणु  नष्ट करने का दावा करता है किसलिये , जब कोई दिखला दे कि आपका साबुन उपयोग किया तब भी किटाणु  बचा रहा , तब उनका एक प्रतिशत काम आता है उनको सही साबित करने को। मीडिया वाले सर्वेक्षण करते हैं हर दिन , हज़ार लोगों से पूछते हैं या उनके एस एम एस आते हैं , और तय हो जाता है करोड़ों लोगों का अभिमत। ये झूठ हो सकता है तब भी प्रमाणित सत्य यही है। वास्तविक सच खुद को बेबस पाता है क्योंकि उसकी प्रमाणिकता साबित ही नहीं हुई होती। टीवी के रियल्टी शो का सच यही है। किसी खबर पर समाचार टीवी चैनल की असलियत भी यही है। सरकार पांच साल तक इसी खुशफहमी में जीती हैं , उनकी सभाओं में जय जयकार वाले अधिक होते हैं और काली पट्टी वाले बेहद कम। लोकतंत्र संख्या का खेल है , समस्या ये है कि मतदान में गणित गलत साबित हो जाता है क्योंकि खामोश रहने वाले भी चुप चाप अपना मत ज़ाहिर कर देते हैं।

                      सरकारी आंकड़े अजीब होते हैं , जो वो बताते हैं वो जनता को वास्तव में नज़र आता ही नहीं। उनकी योजनाएं उनका प्रचार कुछ भी ज़मीन पर दिखता नहीं , उनको देखने को सत्ता का चश्मा पहनना ज़रूरी है। इक खबर और छपी है , सत्ताधारी दल के नव-नियुक्त अधिकारी ने कई लोगों को गोली मार कर कत्ल कर दिया , दल का दावा है अपराधियों को शामिल नहीं करने का। दल कोई भी हो सत्ता मिलते नेता कहलाते ही भीतर का गुंडा बाहर आ जाता है। बड़े बड़े नेता जब भी किसी शहर जाते हैं उनके समर्थक शिकायत करते हैं कि प्रशासनिक अधिकारी उनकी बात नहीं मानते , और वे अफ्सरों को निर्देश दे जाते हैं अपने दल के लोगों की बात मानने को। सरकार केवल निर्वाचित विधायक सांसद ही नहीं चलाते , सत्ताधारी दल का हर कार्यकर्ता खुद को शासक मानता है कि दल की सरकार है। सेवक कोई नहीं है , नेता हों चाहे मंत्री या दल में शामिल आम कार्यकर्ता सभी शासक की तरह आचरण करते हैं। अपराधी नेताओं का प्रतिशत भी वो आंकड़ा है जो किसी को समझ नहीं आता , जिन पर मुकदमें हैं वो खुद को निर्दोष बताते हैं , जो कभी पकड़े नहीं गये लोग उनकी शराफत से डरते हैं।

       आंकड़ों की भाषा को समझना आसान नहीं है , शिक्षा , स्वास्थ्य , गरीबी , ख़ुदकुशी करने , स्वच्छता अभियान से खुले में शौच बंद होने तक सभी झूठे होने के बावजूद सरकारी प्रमाण पत्र हासिल किये हुए हैं। मेरा शहर खुले में शौच मुक्त घोषित ही नहीं पुरस्कृत भी है , मगर मेरे घर के ठीक सामने ग्रीन बैल्ट कुछ और दिखाती है। जो सच मुझे नज़र आता है वो प्रमाणित नहीं है , प्रशासन के पास प्रमाण है ज़िला खुले में शौच की समस्या से मुक्त है। झौपड़ी वाले पूछते हैं क्या उनको शौचालय उपलब्ध हो चुका है , अगर है तो कोई उनको दिखला दे।आज तक घोटालों पर बहुत कुछ लिखा और समझा समझाया जा चुका है , आपको आंकड़े मिल जायेंगें किस घोटाले में कितना धन लूटा गया। मगर अभी तक किसी ने आपको सब से बड़े घोटाले के बारे शायद ही बताया होगा। वो कब से हो रहा है और आज भी जारी है। जानते हैं क्या है वो घोटाला , सरकारी विज्ञापनों का घोटाला। उन पर बिना किसी ज़रूरत या जनता की भलाई के करोड़ों करोड़ रूपये सभी सरकारें हर साल बर्बाद करती रही हैं केवल अपने महिमामंडन की खातिर। इस गरीब देश में जनता का इतना धन व्यर्थ खर्च करना किसी अपराध से कम नहीं है। सूचना के अधिकार का उपयोग कर कभी पता लगायें आज़ादी के बाद से आज तक कितना धन फज़ूल बर्बाद किया गया है। आप चौंक जाओगे। 

नवंबर 03, 2016

POST : 546 ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ( कटु - सत्य ) आलेख - डॉ लोक सेतिया

         ख़ुदकुशी आज कर गया कोई (  कटु - सत्य ) 

                           आलेख - डॉ लोक सेतिया

        शब्द नहीं हैं बयान करने को , इक फौजी देश की सुरक्षा में जान देता तब और बात होती , मगर जब देश की व्यवस्था से निराश और परेशान होकर ख़ुदकुशी करता है तब बात अत्याधिक खेद की हो जाती है। और इस से अफ़सोस की बात ये होती है कि जो जीते जी आम नागरिक के दर्द को नहीं समझते वही नेता और सरकारें किसी के ख़ुदकुशी करने पर दिखावे की सहानुभूति से ओछी राजनीति तक सभी कुछ करते हैं। इक पंजाबी गीत है:-

                 " जिऊंदे जी कंडें देंदी ऐ ,

                  मोयां ते फुल चढ़ाऊँदी ऐ ,

                   मुर्दे नू पूजे ऐ दुनिया ,

                  जिऊंदे दी कीमत कुझ वी नहीं।

                  जी करदा ऐ इस दुनिया नू मैं हस के ठोकर मार दियां। "

     आज मेरा भी यही कहने का दिल है। कोई एक करोड़ की सहायता देने की घोषणा करता है , कोई परिवार के सदस्य को नौकरी और दस लाख देने की घोषणा। क्या मतलब है , आपने जिन बातों से विवश किया किसी को आत्महत्या करने को उनको दूर करने की ज़रूरत नहीं समझते आज भी , पहले भी कितनी बार आपने यही किया , मगर लोग क्यों इस कदर बेबस और निराश हैं , कभी सोचा ही नहीं। कहने को जो भी कहते हों नेता या प्रशासनिक अधिकारी हद दर्जे के निष्ठुर और पाषाण हृदय और असंवेदनशील हो चुके हैं। मानवता का दर्द उनको रत्ती भर भी समझ नहीं आता। आम आदमी जाता है इनके पास विवशता में , मगर ये नीचे से ऊपर तक सभी कर्मचारी अधिकारी मंत्री , उसको इंसान ही नहीं समझते। आज इक वही नहीं मरा जिसकी बात हो रही है , ये लोग हर दिन कितनों को जीते जी मारते रहते हैं बिना किसी अपराध या कारण। लोकतंत्र को लूटतंत्र बना रखा है इन लोगों ने।  आप शायद कल ही भूल जाओगे इस को भी जैसे सत्येन्द्र दुबे को भूल गये हैं। कौन है उसका कातिल। कौन इनका भी कातिल है। अफ़सोस होता है किसी की मौत को ऐसे इक तमाशा बना देना।

      कभी कभी लगता है इस देश में आम आदमी की ज़िंदगी की कीमत है न मौत की ही। लेकिन इस तरह की घटना से सवाल उठता है क्या यही विकल्प बचा है आम बेबस इंसान के पास , मौत को गले लगा कर ही अपने लोगों का कुछ भला कर सकते हैं। इक तमाचा है ये घटना उस व्यवस्था के मुंह पर जो अभी स्वर्ण जयंती मनाने में दावे करती दिखाई दी थी प्रगति और विकास की। मगर जानता हूं कोई खुद को उत्तरदायी नहीं समझेगा शर्मसार होना तो दूर की बात है। उस व्यक्ति को श्रद्धा सुमन भेंट करना चाहता हूं अपने ही कुछ शेरों  द्वारा।

             " तू कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं , मेरी अर्थी को उठाने वाले "

              

               ख़ुदकुशी आज कर गया कोई , ज़िंदगी तुझ से डर गया कोई।

                तेज़ झौंकों में रेत के घर सा , ग़म का मारा बिखर गया कोई।

            " ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है , उस पे इल्ज़ाम धर गया कोई "।


 

          

POST : 545 अंधे-बहरे लोग , जलसा करते हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  अंधे-बहरे लोग , जलसा करते हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

              अंतर तो है , ख़ास लोग जश्न मनाते रहते हैं , स्वर्ण जयंती का कभी गणतंत्र दिवस कभी स्वतंत्रता दिवस का। आम लोग बस किसी तरह बदहाली में मर मर के जीते हैं। ख़ास लोग भीड़ एकत्र करते हैं सत्ता का उपयोग कर के , देश की जनता का धन व्यर्थ के आयोजनों पर बर्बाद कर के खुद का गुणगान करने को। और आपस में इक दूजे को महान बताकर खुश होते हैं , इसी को वो तरक्की की  तरफ इक कदम बढ़ाना मानते हैं। भाषण देते हैं समझाने को , कि अगर सभी इक कदम आगे बढ़ेंगे तो देश या राज्य करोड़ों कदम आगे बढ़ेगा। मगर इक बात नहीं बताते कि कदम बढ़ाना किस ओर है। सच की तरफ या दिखावे को झूठ की तरफ। लो इक खास व्यक्ति को सम्मानित किया गया राज्य को इक बुराई या समस्या से मुक्त घोषित किये जाने के लिये। और मान लिया गया अब वो समस्या समाप्त हो चुकी है। ऐसी कितनी समस्याएं सरकार समाप्त कर चुकी मानती है  , जब कि जनता आज भी उनसे त्रस्त है। गरीबी , बाल - मज़दूरी , बंधुआ  - मज़दूरी , शिक्षा की बदहाली , स्वास्थ्य सेवा की बीमार दशा , पुलिस - प्रशासन का तौर तरीका और जनता को अकारण परेशान करने की आदत , नेताओं का प्रशासन में अनुचित दखल देना और सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों पर करवाई करने से सरकारी विभाग को रोकना , अपराध और गैर कानूनी कार्यों को बढ़ावा देना , योजनाओं के नाम पर मिल बांट खाना , जैसी कितनी बातें बादस्तूर चल रही हैं। देश जल रहा है नीरो बंसी बजा रहा है। क्या देश सच में स्वर्ग बन चुका है जो आप रोज़ दीवाली मनाते हैं राम-राज्य की स्थापना की।

                 लोकतंत्र का अर्थ लोक का शासन होना चाहिये , लोक तो दर दर भटक रहा है और नेता और अधिकारी अपने दफ्तर में नहीं मिलते कई कई दिन तक। व्यस्त हैं कोई जश्न कोई समारोह आयोजित करने में , चिंता की कोई बात नहीं धन की कमी ऐसे काम में कभी रुकावट नहीं बनती। पैसा पानी की तरह बहाया जाता है , माले-मुफ्त दिले -बेरहम। ये खास लोग शाही शान से रहते हैं फिर भी कहते हैं हम जनता के सेवक हैं। भाषणों की खेती में वादों की फसल लहराती लगती है सरकारी सभाओं में और लोग तालियां बजाते हैं , अधिकतर उनके इशारों पर जो एकत्र कर के लाये थे , लुभावने वादे और स्वार्थ सिद्ध करने को। ताली बजाना जनता की मज़बूरी है अथवा आदत नहीं मालूम। मगर अगले दिन का अख़बार ध्यान से देखना , टीवी समाचार ठीक से सुनना , प्रमुख खबर सरकारी आयोजन की बातों की होती है मगर नीचे बाकी खबरें वही पुरानी जैसी दोहराई जाती हैं हर दिन , शहर गांव का नाम और स्थान अलग होता है। गंदगी की बात , खुले में शौच की बात , महिला से अनाचार की बात , भ्र्ष्टाचार की बात , सत्ता की उदासीनता की बात , हर समस्या यथावत है। आप कितनी शिकायत करते रहो उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगती आज भी। सरकार अंधी है और बहरी भी। खुद शोर मचाते हैं बहरे और अंधे लोग , सुन सकते नहीं देख सकते नहीं।
                                     दुष्यंत कुमार का शेर है :-
 
                               " यहां तो सिर्फ गूंगे  और बहरे लोग बसते  हैं ,
                               खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा। " 

 मुझे आज के हालात पर अपनी ग़ज़ल का भी इक शेर याद आया है , वो भी पेश है :-

                           " तुम्हें ताली बजाने को सभी नेता बुलाते हैं ,
                             भले कैसा लगे तुमको तमाशा खूब था कहना। "

तमाशा दिखाने वाले बदल जाते हैं , तमाशों का आयोजन करने वाले वही रहते हैं प्रशासनिक लोग ,
तमाशाई भी वही होते हैं और वही रहते हैं तालियां बजाने वाले भी। लिबास बदला है बाहर से , भीतर बदन वही है  , गंदगी को छिपा कर खुशबू लगाई हुई है , मेकअप है मुखौटा है।                                      

अक्टूबर 27, 2016

POST : 544 भगवान भी बदल गये हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    भगवान भी बदल गये हैं  (  व्यंग्य  )   डॉ  लोक  सेतिया  

         दादा जी कहते थे ढूंढने से भगवान भी मिल सकते हैं । तुम तलाश करते रहना सच्चे मन से । मां सुबह शाम इक भजन गुनगुनाती रहती थी " भगवन बनकर तू अभिमान न कर , तेरा नाम बढ़ाया हम भक्तों ने "। मैंने उनको छोड़ और किसी को भगवान को ऐसे चेतावनी देते नहीं सुना , कि भले तुम विधाता हो फिर भी कोई अकड़ मत रखना , क्योंकि अगर हम तेरे उपासक ही तुझे नहीं मानेंगे तो तुम काहे के भगवान रहोगे , बस नाम मात्र के ही । मुझे इस से बढ़कर श्रद्धा किसी साधु संत सन्यासी या गुरु में नहीं नज़र आई । तभी मैंने किसी को गुरु नहीं बनाया आज तक । मिलता रहा भगवा सफेद पीला काला हरा नीला परिधान पहने महान समझे जाते लोगों से , तथाकथित धर्म को स्थापित करने में लगे प्रवचन करने वालों से । उनसे भी जो गीता ज्ञान या रामायण अथवा गुरु ग्रन्थ साहिब का या फिर कुरान बाईबल का अर्थ समझाते हैं । और बार बार इक शायर का शेर याद आता रहा । " तो इस तलाश का मतलब भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला "।

                लेकिन कहते हैं ना लगे रहो तो सफलता इक दिन मिल ही जाती है । कल रात मुझे भगवान मिल ही गये साक्षात रूप में । नहीं किसी धर्म स्थल पर नहीं यूं ही इक उजड़े हुए वीरान घर में वह भी अकेले उदास और बेहाल । मैं दुनिया के लोगों से घबरा कर यूं ही चला गया था उधर जिधर कोई जाता ही नहीं । शहर की भीड़ से दूर गंदी बस्ती से भी और आगे जाकर । अंदर गया था उस खंडर नुमा इमारत में छुप कर अकेले में आंसू बहाने देश समाज की बदहाली को देख कर । मेरा दर्द किसी को समझ आता ही नहीं है , सभी कहते हैं मैं पागल हूं जो व्यर्थ चिंता करता रहता हूं । मुझे चुपचाप रोते रोते आभास हुआ कोई और भी है यहां पर , अंधेरा था तब भी मुझे दिखाई दिया वो चमकती लौ की तरह दिया बनकर या शमां की तरह । मन ही मन सोचा इस वीरान घर में कौन है जो रौशनी करता है , नज़र क्यों नहीं आता सामने , छिपकर रहता है , कोई चोर है या अपराधी । बस इतना सोचते ही वो मेरे सामने खड़ा थे , मुझे प्यार से गले लगा लिया और कहने लगे , तुम तो मुझे चोर या अपराधी मत समझो । मैं तो कब से तुम्हारी और तुम जैसे और उन लोगों की राह देखता रहा हूं जो मुझे ढूंढते रहते हैं । आज मिला हूं तो मुझे पहचाना भी नहीं , भूल गये अपने दादा जी की बात , तुम्हारी माता जी जो गुनगुनाती थी उस भजन को भी भूल गये । याद करो और आज पहचान लो मुझे। और मुझे यकीन करना पड़ा था क्योंकि उन्होंने मुझे सब कुछ साफ साफ़ दिखला भी दिया था और समझा भी । भगवान की लीला थी कि मैं सुबह जागा तो अपने घर में बिस्तर पर । मगर वो कोई सपना नहीं था , मैं वास्तव में रात भाग कर गया था इस दुनिया से ।  वापस कौन कब कैसे मुझे पहुंचा गया , मुझे नहीं मालूम । मुझे याद है भगवान ने मुझे जो भी बताया था , आपको सुनाता हूं , चाहे आप विश्वास करना या नहीं ।

             भगवान ने बताया था , तुमने पढ़ा होगा , सुना होगा , देव और दानव , पुण्य और पाप , सत्य और झूठ , अच्छाई और बुराई , धर्म और अधर्म के बारे में । पढ़ना इक बात है समझना दूसरी और तीसरी बात होती है विचार करना । दुनिया बनाते समय सभी को सोचने समझने को बुद्धि दी और कर्म करने को हाथ पैर , देखने को आंखें और अन्य कामों को सभी अंग भी । भगवान कौन है क्या है कहां है सोचा समझा विचार किया कभी । जाने किस किस को भगवान बना लिया आपने अपनी सुविधा से या स्वार्थ की खातिर । जैसे तुम इंसानों में अच्छाई और बुराई दोनों रहती हैं , विवेक से तुम अच्छा बनते हो बुराई लुभाती हो  तब भी बचते हो , उसी तरह मुझ में भी राम-रावण , कृष्ण-कंस , दोनों बसते हैं । और ईश्वरीय सत्ता उसी के पास रहती है जिसको सभी भगवान मानते हैं । आज मेरा जो रूप बुराई का है वही पूजा जाता है इसलिये जिस भगवान को तुम ढूंढते रहे वो तुम्हें किसी मंदिर मस्जिद गिरिजाघर या गुरूद्वारे में मिला ही नहीं । मुझे , मेरे उस स्वरूप को निकाल दिया गया उन सभी जगहों से , आज जो विशाल भवन मेरे नाम पर दिखाई देते हैं , उन में मैं नहीं रहता । कभी जाता ही नहीं उस ओर मैं भूल कर भी , करोड़ों की आमदनी संपति , चढ़ावा । मुझे क्या समझ लिया लोभी लालची रिश्वतखोर जो खुश होकर आपकी हर मनोकामना पूरी करता है । ठीक से पढ़ना फिर से सभी धर्म ग्रन्थ , उनमें समझाया गया है देवता वही होते जो देते हैं , दानव होते जो औरों का छीनते हैं । आज कलयुगी भक्त अपने जैसे बुरे की उपासना करते हैं , सही करते या गलत बिना सोचे । यूं समझ लो अधर्म का नाम बदलकर उसको धर्म नाम दे दिया है । पहचान करना भगवान जो थे वो अब नहीं हैं , बदल गये हैं । भगवान पापियों की सुनते हैं उनकी कामनाओं की पूर्ति करते हैं , बुराई तभी बढ़ रही है । खेद है मेरे लिये लोकतंत्र जैसा चुनाव भी नहीं होता , जो मैं आपको समझाता , बुरे को नहीं अच्छे को भगवान बनाना इस बार । देखता हूं भारत में सत्ता बदलते ही भला लगने वाला भी बुरे से बद्दतर आचरण करने लगता है । मैं भी क्या करुं आप बताओ मुझे । वो भगवान खुद को बताने वाले चले गये मगर इक किरण रौशनी की मुझे दिखला गये हैं । 
 
 
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अक्टूबर 24, 2016

POST 543 क्या इसको मुहब्बत कहते हैं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 क्या इसको मुहब्बत कहते हैं  ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया 

क्या इसको मुहब्बत कहते हैं
प्रेमिका हो चाहे हो पत्नी
आपकी सोच आपकी समझ
वही रहती है पुरातन पुरुषवादी
औरत के लिये सारे कर्तव्य निभाने को
और पुरुष के लिये सभी अधिकार ।

औरत की  नहीं हो सकती  कभी भी
कोई राय न कोई सोच न  कोई विचार
उसको नहीं सोचने तक का अधिकार
क्या इसको मुहब्बत कहते हैं ।

आप भले कितने शिक्षित हो जायें
आपको बेशक मालूम हो ये भी
होना चाहिये समानता का अधिकार
हर महिला को हर इक पुरुष को भी
आपका धर्म भी देता हो शिक्षा नारी
को आदर देने को , देवी समझ कर ।

लिखा हो वाणी में , समझाया गया हो
" सो किंव मंदा आखिये जिन जन्में राजान  "
तब भी आपको लगता हो श्रेष्ठ हैं पुरुष
नहीं देते  अगर उचित स्थान नारी को ।

फिर भी चाहते अच्छे  इंसान  कहलाना
करते हों पवित्र बंधन के नातों की बातें
क्या इसको मुहब्बत कहते हैं ।

आपको याद अपना  हक निर्णय का
अपने सभी निर्णय
करना चाहते आप
महिला के हर फैसले पर देते आप दखल ।

जो आपका है समझते है वो आपका ही
आपकी मर्ज़ी है जिसे  दें या नहीं दें ।

महिला का जो भी समझते  आपका है
खुद उनको भी नहीं है उस  पे अधिकार ।

ये मानसिकता भला कहला सकती है
उचित उनके लिये जिनको करते प्यार
क्या इसको मुहब्बत कहते हैं ।



अक्टूबर 18, 2016

POST : 542 तू कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं ( सत्येन्द्र दुबे की आत्मा पूछती है ) आलेख डॉ लोक सेतिया




तू कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं (  सत्येन्द्र दुबे की आत्मा पूछती है ) 

 आलेख -  डॉ लोक सेतिया 

    
   प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ,  हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जी  , टीवी और अख़बार वालो पत्रकारो , सच के झंडाबरदार मीडिया वालो , खुद को जनसेवक कहने वाले और देशभक्त बताने वाले नेता और आला अधिकारी , आप सभी देखो ध्यान से इन तस्वीरों को , नहीं याद आया ये चेहरा , आप सभी से सवाल करती है सत्येंद्र दुबे की आत्मा । नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया में इंजीनियर युवक जिसका दोष यही था कि उसने तब के देश के प्रधानमंत्री जी के कार्यालय को सूचित किया था भ्र्ष्टाचार के बारे में और वो गोपनीय जानकारी भृष्ट लोगों तक पहुंची और उसको कत्ल करवा दिया गया ।

                             जन्म :-   2 7 नवंबर 1 9 7 3

                          कत्ल हुआ :- 2 7 नवंबर  2 0 0 3

     
     कोई सबक सीखा किसी ने , बिल्कुल भी नहीं । आज भी कोई शिकायत करे अगर सरकारी धन संम्पति की लूट की अपराध की तब क्या होता है जानते हैं । सत्ताधारी दल का कोई नेता आदेश देता है विभाग को अधिकारियों को जो अनुचित कार्य या गैर कानूनी काम करता उसको बचाने को । शिकायत करने वाले को जब मालूम होता है सभी देश को लूटने में शामिल हैं तब उसको क्या समझ आता है , खामोश रहो या जान से हाथ धोने को तैयार रहो । जाने कितने निर्दोष कत्ल हो रहे हैं कोई नहीं जानता किस तरह , आप ऐसे वातावरण में देश और समाज को महान और प्रगति की राह पर जाता बताते हैं । बेशक ऐसे मरने वाले की लाश पर मगरमच्छ जैसे आंसू बहाने वो भी जाते हैं जिनके कारण कत्ल हुआ ।

               अब और कुछ नहीं रहा कहने को हां मेरी ग़ज़ल का इक शेर पेश है :-


                  " तू कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं , मेरी अर्थी को उठाने वाले "