अप्रैल 13, 2020

POST : 1262 कोरोना के अंत के बाद ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       कोरोना के अंत के बाद ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

अंत होना ही था हर बुराई हर रोग हर समस्या का कभी न कभी आखिर ख़ात्मा होता ही है । ये तब की बात है जब विश्व में सभी देश की जनता और सरकारों ने कोरोना नाम की चीज़ को जड़ से मिटा दिया है । अब जब दुनिया के तमाम लोग फिर से ज़िंदगी की लड़ाई लड़ने लगे हैं वहीं कुछ लोग जो खुद को आम इंसानों से अलग और बड़ा महान और महत्वपूर्ण मानते हैं जिनका निधन होने पर शोर होता है उनके निधन से जो क्षति समाज को हुई है उसे कभी पूरा नहीं किया जा सकता है । बाद में उनके नाम के भवन मूर्तियां बुत और सरकारी योजनाओं का नाम से पार्क चौराहे का नाम रखते हैं । मगर सच यही है कि ये सब फज़ूल ही है जैसे आपने समझा भी होगा शाहजहां ने ताजमहल बनवाया मगर मुमताज को उस से क्या मिला। दुनिया देखती है मुमताज ने नहीं देखा इसलिए मुझे हमेशा लगता है अपनी पत्नी को इक छोटा सा घर बनवा कर देना अधिक अच्छा है उसके रहने को न कि उसके बाद उसकी याद में कोई महल बनवाने का काम करना । 

      बाद ए फ़नाह फज़ूल है नामो - निशां की फ़िक्र , जब हमीं न रहे तो रहेगा मज़ार क्या। 

शायर की बात उचित है । बादशाहों की तरह राजसी ढंग से जीने वाले तमाम ऐसे बड़े नाम पद या शोहरत वाले धनवान लोगों को कोरोना के अंत के बाद भी चिंता है जाने कब किसी और तरीके से यमराज आ कर उनको अपनी खूबसूरत दुनिया से दूर किसी और दुनिया में ले जा सकते हैं । इसलिए इन सभी की खातिर कोई ऐसी जगह उनके निवास को तलाश की जाए जिस जगह यमराज उन तक नहीं पहुंच सकते हों । धरती पाताल समंदर सब जगह सुरक्षित नहीं समझी गईं मगर अभी अंतरिक्ष को लेकर कुछ एक घटनाओं को छोड़ कोई ऐसी बात नहीं दिखाई दी और जो भी घटना या दुर्घटना अंतरिक्ष में हुई उस में भी मौत धरती पर समंदर में गिरकर या किसी पाताल में समाने जैसा ही हुआ है । चांद और मंगल पर जीवन संभव है या नहीं अभी मुश्किल है मगर अंतरिक्ष में जितने दिन चाहें लोग रहते ही नहीं रहे जो जो भी करना था करने में सफल रहे हैं । 

अब इन सभी लोगों को जिनका रुतबा वास्तव में भगवान खुदा जैसा ही है ऐसी किसी जगह बस्ती कॉलोनी या कोई निवासीय सोसाइटी निर्मित कर बसाने का उपाय किया जा सकता है । उनको अपने सभी काम धंधे कारोबार या शासन या शासकीय व्यवस्था चलाने को धरती पर आने की ज़रूरत ही नहीं होगी और ऊपर अंतरिक्ष से ही अपना सब कार्य अपनी एप्पस या इंटरनेट से संपर्क कर करेंगे । अभी तक लोग अपने पास थोड़ा पैसा जमा होने पर देश विदेश घूमने जाते थे अब उनको अंतरिक्ष में घर नहीं मिलने का नियम होने के बाद भी जाकर देखने की अनुमति मिल सकेगी । चेतावनी ज़रूरी है कि कोई जायदाद ज़मीन बेचने खरीदने का दलाल आपको ठग सकता है अंतरिक्ष में प्लॉट दिलवाने की बात कहकर जबकि वहां आम इंसान को आम आदमी को रहने को किराये पर भी जगह देना निषेध होगा । लुटियन ज़ोन की तरह आपको देखने की अनुमति मिल सकती है भीतर जाने को इजाज़त भी नियत समय तक देख बाहर निकलना होगा । 

     नाम बताने की ज़रूरत नहीं है आज विश्व के बड़े बड़े देशों के महान शासकों से उनकी दोस्ती दोस्ती फिल्म के दो दोस्तों या फिर शोले फिल्म के जय वीरू से भी अधिक है। इतनी है कि कोई अपनी मांग नहीं मानने पर अंजाम की धमकी देता है और जिसको धमकाया गया वो मान जाता है मगर दोस्त की धमकी को धमकी नहीं मज़ाक मानकर बदले में वही दोस्त अपनी मनवाने के बाद दोस्ती की बात कहते हुए और पक्की यारी की बात कहता है। ऐसे जिन देशों के शासकों से उनकी गाढ़ी छनती है जो चुनाव के समय भी दो देशों की आपसी संबंधों में दलगत विषय से परे देशों की आपसी दोस्ती के उसूल को नहीं जानते और आपसी भाईचारा निभाने अपने दोस्त की राजनैतिक सभाओं में जाकर उनका साथ देते हैं को भी अंतरिक्ष में हम सब साथ साथ हैं की मिसाल बनाते हुए शामिल किया जाना है। चांद के पार चलो आशिक़ कहते थे ये दोस्त अंतरिक्ष को सब यार चलो का गीत मिलकर गाएंगे। हम घर दफ्तर वहीं बनाएंगे जिस जगह मौत के फ़रिश्ते भी देखने से घबराएंगे। जनाब ने अपने पुराणों की बात से सभी को भरोसा दिलवाया है कि हमारे यहां काल अर्थात मौत के फ़रिश्ते को भी बंधक बनाकर रखने का कीर्तिमान किया जा चुका है अगर अंतरिक्ष में यमराज का कोई दूत आएगा तो वापस नहीं जाने पाएगा। शक्तिमान टीवी सीरियल की नहीं देशों के शासकों की बात हो रही है कि ये समस्या खड़ी होनी ज़रूरी है कि सबसे अधिक शक्तिमान कौन है। अर्थात उनकी बनाई मायानगरी से उनका शासन तो चलेगा मगर उस अंतरिक्ष की नगरी का राजा कौन होगा। अब मुझसे बढ़कर भला कौन हो सकता है उनका दावा है रहेगा यही इक विषय है जिस पर एकमत नहीं हुआ जा सकता है। कोई भी खुद को नंबर वन से कम नहीं समझता है और बारी बारी बनने की भी सहमति नहीं हो सकती क्योंकि सभी जानते हैं इक दूसरे को इक बार सत्ता हथिया ली तो हटने को तैयार नहीं होगा कभी कोई । 
 
 मज़ार शब्द के अर्थ | mazaar - Hindi meaning | Rekhta Dictionary


POST : 1261 दिखावा अच्छे कर्म , दान धर्म , कर्तव्य - आदर्श - नैतिक मूल्यों का

 दिखावा  अच्छे कर्म , दान धर्म , कर्तव्य - आदर्श - नैतिक मूल्यों का  

                                 ( आलेख - चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

    आज जो भी लिख रहा हूं वास्तव में खुद मेरा अपना लिखा या समझाने का विषय नहीं है । हमने जिन जिन किताबों को धार्मिक आदेश उपदेश माना स्वीकार किया हुआ है उनकी ही बताई बात को आधुनिक काल के युग में आचरण को देखने समझने और विवेचना करने समाज को जो भी जैसा है आईना दिखलाने की बात है । दो शायरों के शेर आपको सुनाता हूं यूं कोई भी शायर कवि ऐसा नहीं जिसने आईना दिखलाने को लेकर कहा नहीं हो । कृष्ण बिहारी नूर कहते हैं :- 

           " चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो आईना झूठ बोलता ही नहीं । " 

 
अब जो लोग टीआरपी विज्ञापन या पैसे के लिए काम करते हैं वो सच का आईना नहीं हैं ये किसी तरह मनचाहे ढंग से छवि बनाने का छल करने वाले आईने हैं जैसे अजायबघर में देखे हैं । 
राजेश रेड्डी जी कहते हैं :-
 

        " न बोलूं सच तो कैसा आईना मैं , जो बोलूं सच तो चकनाचूर हो जाऊं । " 

 
सच कहना आसान नहीं है सच का स्वाद मीठा नहीं होता और कड़वा सच कोई नहीं सुनना चाहता है । 

आज पहला विषय अच्छे कर्म और दान की परिभाषा को समझना है । शायद ही कोई होगा जिसने राजनेता सरकारी विभाग के कर्मचारी अधिकारी पुलिस के सिपाही से थानेदार दरोगा तक सभी के घूस रिश्वत या कोई काम करने के बदले उपहार की मांग किसी भी रूप में लेने को लेकर देखा नहीं हो । अब कुछ लोगों को हम देख रहे हैं जो किसी भी ढंग से कमाई कर अपनी जेबें भरते थे , अन्याय करते थे , अब नाम शोहरत की खातिर  दानवीर बन कर और अच्छे कर्म करने लगे हैं प्रचार करवा कहते हैं कि जनता की सहायता कर रहे  हैं । क्या उनकी सोच बदल गई है , कदापि नहीं , ये बिलकुल उसी तरह है जैसे काली कमाई झूठ धोखा व्यवसाय कारोबार में गड़बड़ मिलावट जैसे ही नहीं हर किसी की जान से खिलवाड़ कर ज़हर बेचने तक का कारोबार करने के बाद किसी धार्मिक जगह दान आदि करते हैं ये मानकर कि उनके पाप अपराध का भार कम हो गया मगर पापी की पाप की कमाई के दान से वो डाकू से धर्मात्मा बन नहीं जाते ।  हां चाहते हैं लोग उनके अधर्मों को नहीं दान देने की चर्चा करें । ये धर्म है ही नहीं जब कोई किसी जगह पाप करता रहता और जाकर माफ़ी मांगता रहता है या फिर पूजा अर्चना करता ही किसी स्वार्थ की चाहत से है । 

 आपने बड़े बड़े धनवान लोगों के दान देने की भी चर्चा सुनी है जो घोषणा करते हैं सरकार को किसी संस्था को या किसी और समय पर दाता बनकर अच्छे काम की । लेकिन इनका ये काम दो कारण से होता है या तो पहले से नाम शोहरत अथवा सरकार से कोई मतलब लेने के बाद या भी देने के बाद उसका कई गुणा पाने की खातिर । वास्तविक दान या अच्छा काम वो होता है जो हम अपनी खून पसीने की कमाई से अपनी ज़रूरत को छोड़ किसी की सहायता करते हैं कठिनाई में । ऐसे अधिकतर दस बीस सौ या हज़ार का दानकर्म को लेकर कोई शोर नहीं करते न ही बदले में कुछ चाहते हैं । 

अब बात सरकार शासक की राजधर्म की । चाणक्य उपनिषिद रामायण गीता गुरुग्रंथ साहिब बाईबल कुरान सभी राजा और शासक का कर्तव्य बताते हैं जब नागरिक विपदा में हों उनकी देखभाल सहायता करने को अपने खज़ाने का मुंह खोलना । मगर यहां तो जब भी समस्या होती है सरकार का मुखिया जनता से ही मांगता है और लोग देते हैं ऐसा सरकार विवशता की खातिर नहीं करती कि उसका खज़ाना खाली है । हमने देखा है उनको अपने उचित क्या अनुचित खर्च को जनता के पैसे से ही नहीं देश के संसाधन को संपत्ति को बेचकर गिरवी रखकर भी शान से रोज़ धन की बर्बादी करते रहना । क्या जब देश की जनता को ज़रूरत है तब भी किसी तरह से उसी से लेकर उसको देने को अपनी महानता बताना उचित है । कहीं किसी भी धर्म में ऐसा नहीं सबक सिखाया गया । मगर आपको समझाया जाएगा कि ऐसे में बहुत धन की ज़रूरत है मज़बूरी है तभी जो दे सकते हैं उनसे विनती है और वास्तव में सरकारी विनती आदेश की तरह से होती है जिस को जो भी अधिकारी या नेता कहते हैं नहीं देने पर अंजाम जानते हैं । मगर कोई कुछ नहीं कहता ये सोचकर कि जो भी कर रहे भलाई का काम कर तो रहे हैं । 

अब आपको वास्तविकता बताते हैं हर नेता हर सरकार पिछली सरकार के पास धन का अंबार होने पर सवाल करती है । खुद सत्ता में हैं तब इनके पास भी सत्ता के अधिकार के उपयोग कर चंदा और जगह जगह ज़मीन जायदाद आलीशान दफ्तर और साधन आ जाते हैं । किस तरह से किस किस से सब को पता है माजरा लेन देन का है । आपने अपने शासन में जिन लोगों की सेवा की बात और ये जो भी अनुचित होता था उसको बदलने की बात कही थी मगर अपने भी वही किया और पिछली सरकारों से बढ़कर किया । तभी आज उन सबसे अधिक धन आपके पास है क्या इस कठिन समय आपने अपने नेताओं की जमा की करोड़ों की पूंजी और दल के पास जमा धन जायदाद से इक कौड़ी भी जनता को देने की बात की है । एक महीने का वेतन या कम वेतन जनता की आंखों में धूल झौंकने की बात है । नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली । 

अंत में बात आदर्श और नैतिक मूल्यों की । कोई कहता है लॉक डाउन में शराब की दुकान खोलनी चाहिएं क्योंकि उनसे सरकार को खूब आमदनी होती है । मगर वास्तव में ये जितने भी धंधे होते हैं सत्ता धारी नेताओं का हिस्सा होता है भले दो नंबर का । उनकी आमदनी का सवाल है । अब सबसे बड़ा सवाल ये कह रहे हैं कि किसान को फसल काटनी है कुछ उद्योग को काम करना है उनको अनुमति देनी होगी और उनकी मज़बूरी है पेट भरना है तो अपनी उगाई फसल को छोड़ नहीं सकते । मगर क्या उनकी जान की कोई कीमत है क्योंकि दावा कुछ भी करें उनकी सभी की जीवन की रक्षा नहीं की जा सकेगी । कोई कह सकता है रास्ता क्या है । अब आपको बताते हैं जो राह हो सकती है आप के पास संसाधन हैं और संसाधन हासिल करने को अधिकार भी हैं । क्या ऐसा नहीं किया जा सकता कि सरकार किसान की फसल खुद खेत से कटवाने और उसकी कीमत चुकाने का काम करे । जब आप देश भर में हर किसी के घर की जानकारी अपने सरकारी विभाग के कर्मचारी अधिकारी भेजकर कुछ दिन में कागज़ पर लिख सकती है तो अब ज़मीन पर भी काम कर दिखाने का काम किया जाना मुमकिन है । मगर खेद की बात यही है कि सरकार को जनता की सुविधा ज़रूरत के समय कर्तव्य नहीं निभाने ज़रूरी लगते आदेश लागू करना आता है । ये सब मापदंड साबित करते हैं कि वास्तव में हमारे समाज की धर्म की सरकार की कारोबारी लोगों की समाचार और समाज की वास्तविकता दिखाने वालों की जो असलियत है उसको आदर्श तो हर्गिज़ नहीं कह सकते हैं । 
 
 भारत के भविष्य को आकार देने में धर्म की भूमिका - स्वदेशी शोध संस्थान
 


 

अप्रैल 12, 2020

POST : 1260 झूठ सच से बड़ा हो गया ( गोदी मीडिया ) डॉ लोक सेतिया

 झूठ सच से बड़ा हो गया ( गोदी मीडिया ) डॉ लोक सेतिया 

    कल शाम को इक पोस्ट लिखी थी हमारे देश के हालात को लेकर मगर फिर विचार किया उसको पढ़कर हो सकता है अभी भी जो विश्वास बचा है वो भी नहीं रहे इसलिए उसको ही नहीं और भी कुछ बातों को अपनी फेसबुक से हटवा दिया था । जाने क्यों लगा कि आज जब विश्व कठिन दौर से गुज़र रहा है और लगने लगा है अधिकांश लोग सही दिशा को जाते हुए नज़र आते हैं शायद नंगा सच दिखाने का उचित समय नहीं है । मगर रत भर इसी को लेकर चिंतन करता रहा और निर्णय किया कि सच का सामना करने का साहस होना ही चाहिए और झूठ का जितना भी शोर करें सच नहीं बन जाता है । शायद दो साल होने को हैं जब 30 जून 2018 को झूठ के देवता के मंदिर शीर्षक से व्यंग्य रचना लिखी थी । जहां गीता रामायण कुरान बाईबल से लोग सबक नहीं सीख पाए वहां मेरे या किसी के सच लिखने या झूठ का पर्दा फाश करने की कोशिश से भला क्या हो सकता है । मगर आज जब हर कोई डरा हुआ है मौत सामने खड़ी है लगता है उस समय भी हम लोग झूठ ही झूठ बोलते जा रहे हैं तो फिर सच कब बोलेंगे या समझेंगे । किसी पर आक्षेप आरोप नहीं कोई
विरोध नहीं और किसी को नीचा दिखाना नहीं चाहता बस बिना घटनाओं की चर्चा इक बोध कथा की तरह इशारे में वास्तविकता बताने का कठिन कार्य करने की कोशिश है । अपनी बहुत पुरानी ग़ज़ल से बात शुरू करता हूं ।

फिर वही हादिसा हो गया
झूठ सच से बड़ा हो गया ।

अब तो मंदिर ही भगवान से
कद में कितना बड़ा हो गया ।

कश्तियां डूबने लग गई
नाखुदाओ ये क्या हो गया ।

सच था पूछा ,बताया उसे
किसलिये फिर खफ़ा हो गया ।

साथ रहने की खा कर कसम
यार फिर से जुदा हो गया ।

राज़ खुलने लगे जब कई
ज़ख्म फिर इक नया हो गया ।

हाल अपना   , बतायें किसे
जो हुआ , बस हुआ , हो गया ।

देख हैरान "तनहा" हुआ
एक पत्थर खुदा हो गया ।

किस किस की बात की जाए जब जिधर भी देखते हैं हर कोई झूठ को सच बनाने को लगा है । सरकार जो सच है बताती नहीं छुपाती है और जो नहीं हुआ जो किया नहीं करते हैं का दावा करती है । नज़र आता है बाहर से सब ठीक है मगर भीतर सब खोखला है कोई भरोसा नहीं कब क्या अंजाम हो । बहुत शोर मचाया पिछली सरकारों ने कुछ नहीं किया कभी ये नहीं बताया खुद आपने क्या कर दिखाया है । इक महामारी से देश क्या दुनिया परेशान है और आप आंकड़ों से बहला रहे हैं कहते हैं जो वास्तविकता नहीं है दिखाने को बहुत मगर असलियत में कुछ नहीं क्या ऐसे सामना करते हैं समस्या का । अपनी गलती का दोष किसी और को गुनहगार बनाकर बच नहीं सकते हैं । हमने सभी ने मिलकर ताली थाली बजाई दिया जलाया क्या वास्तव में जिस मकसद से करना था वो मकसद हासिल हुआ भी । जिनका आभार व्यक्त करना था फिर कितनी जगह उन्हीं से आपराधिक आचरण नहीं किया कितने लोगों ने वो किसी और देश समाज से नहीं हैं । और एकता हम साथ साथ साथ हैं का दिया जलाने वाले एकता का अर्थ भी जानते हैं । हर कोई किसी न किसी को लेकर अपने अंदर की नफरत को दर्शाता लगता है और जो सबक पढ़ाने वाले हैं खुद वही अमल नहीं करते हैं । हम आदी हैं घर की चमक बाहरी दिखावे को और भीतर कितनी गंदगी कालीन के नीचे छिपी रहती है । ज़रा सी बात को बढ़ा चढ़ा कर खुद को महान विश्वगुरु कहने की नासमझी करते हैं अपना गुणगान करना कोई अकलमंदी की बात नहीं होती है ।

इक बोधकथा है किसी नगर में इक राक्षस से सभी डरे हुए थे और किसी ने उपाय बताया कि अगर इक अंधेरी रात को नगर के हर घर का वासी बाहर जो कुंवा है उस में इक इक बाल्टी दूध डालेगा तो राक्षस का अंत हो जाएगा । मेरा मकसद अंधविश्वास को बढ़ावा देना कदापि नहीं है समझने को उद्दारहण लिया है । इक बुढ़िया ने सोचा कि मुझे दूध की कमी है अगर मैं नहीं डालती तब भी बाकी सभी डालेंगे और कुंवा भर जाएगा किसी को खबर नहीं होगी कि मैंने नहीं डाला दूध और बाल्टी भर पानी डाल आई थी । अगली सुबह सबने जाकर देखा तो कुंवे में इक बूंद भी दूध की नहीं थी पानी भरा था क्योंकि जो बात उस बुढ़िया को सूझी वही सबने किया था । हम सब लोग यही करते हैं ये समझते हैं और हैं करने को हमने नहीं किया तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला । बूंद बूंद से समंदर भरता है और थोड़ा थोड़ा हर कोई बेईमानी करता है तो सब व्यर्थ जाता है ।

अब बात किस किस ने नहीं किया यही , धर्म वालों ने धर्म की नहीं आडंबर की राह दिखाई और धर्म को इक कारोबार बनाकर वास्तव में धर्म का अंत ही कर दिया । सामाजिक संस्थाओं ने कब से समाज सेवा को इक सीढ़ी बना लिया अपने अपने मकसद की खातिर । राजनेताओं और सरकारों ने जनता की सेवा के नाम पर खुद अपने आप पर बेतहाशा धन आंबटित किया बर्बाद किया ऐशो आराम पर खर्च करने का गुनाह किया है । न्यायपालिका से सवैंधानिक संस्थाओं तक ने निजि स्वार्थ और अपने लोभ लालच या डरकर कर्तव्य को भुलाने का कार्य किया है । बड़े बड़े पद मिलने पर अधिकारी देश समाज को बेहतर बनाने की बात भूलकर धन दौलत और नाम शोहरत की दौड़ में शामिल होते रहे तभी ऐसा हुआ जिनको आदर सम्मान तमगे मिले बाद में उन्हीं को अनुचित आपराधिक कार्य करते पाया गया । देश की संसद राज्यों की विधानसभाएं जैसे अपराधी और बाहुबली गुंडागर्दी करने वालों का अड्डा बन गईं हैं । किसी भी राजनैतिक दल को चुनाव जीतने की खातिर अपराध को बढ़ावा देते कोई संकोच नहीं हुआ । अंजाम हर देश उस मोड़ पर है जहां कोई राह नहीं सूझती है ।

सत्यमेव जयते का वाक्य लिखा हुआ है मगर सत्य का पक्ष कोई नहीं लेता है हर कोई दरबारी बनकर झूठ का साथी बन बहुत कुछ पाना चाहता है कोई देश समाज को देना कुछ भी नहीं चाहता है । टीवी मीडिया अख़बार लिखने वाले कलम के सिपाही कला संगीत के उपासक समाज की वास्तविकता को उजागर करने का फ़र्ज़ भूलकर धन वैभव तमगे या किसी तरह से अपनी शोहरत को भुनाकर सांसद बनने या कोई एनजीओ बनाकर अपने मकसद पूरे करते हैं । झूठ को सच साबित करते हैं झूठ का गुणगान करते हैं बिकते हैं या चाटुकार बन जाते हैं । सच का झंडाबरदार होने का दम भरने वाले सच को कत्ल करते हैं । तीस साल पुरानी इक ग़ज़ल फिर से याद आती है ।

इक आईना उनको भी हम दे आये
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं ।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं ।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं ।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं ।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं ।

मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं । 
 
 
Godi Media - Single - Album by Jai A - Apple Music



 

अप्रैल 10, 2020

POST : 1259 कौन भले कौन मंदे ( अफ़साना ए कुदरत ) डॉ लोक सेतिया

  कौन भले कौन मंदे ( अफ़साना ए कुदरत ) डॉ लोक सेतिया 

आपने जाने किस किस को खुदा भगवान मसीहा समझा हुआ था घोषित किया हुआ था । और जाने किस किस को अपनी ताकत दौलत शोहरत और किस किस का अहंकार है या रहा है । आज इक अनाम या बदनाम शब्द ने सबको अपने सामने बौना ही नहीं साबित कर दिया बल्कि सोचने को विवश कर दिया है कि मौत के सामने किसी की नहीं चलती है और जब मौत का डर सताता है तो कुछ भी और याद नहीं रहता है । दुनिया बनाने वाले ने किसी को बड़ा छोटा अच्छा बुरा नहीं बनाया था हमने ही कितनी तरह से इंसान को इंसान से और इंसानियत से अलग करने का अपराध किया है । हम भूल गए थे मौत से डरना चाहिए और ये भी कि सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है । मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊं । अपने अपने स्वार्थ में अंधे होकर हर किसी ने केवल खुदगर्ज़ी की सोच रखकर अपने लिए इतना जमा कर लिया कि बाकी के लिए छोड़ा नहीं कुछ भी । आपके ऊंचे ऊंचे महल और कितने ही साधन धन दौलत किसी काम के नहीं हैं जब कोई इक ऐसा शब्द आपके सामने खड़ा हो ।

   भारत में ही बताते हैं कि सौ लोगों के पास जितना है उसका दस बीस फीसदी बाकी करोड़ों को मिला है क्या ये अनुचित और अपराध नहीं है । चाहे किसी ने मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे के नाम पर या उपदेशक बनकर शहर शहर गांव गांव अपने डेरे अपने आलीशान बड़े बड़े भवन बना रखे हैं और उनकी कोई सीमा नहीं है और अधिक की चाह की या कोई उद्योगपति या कारोबारी या इधर तो समाज सुधारक से योग सिखाने से स्कूल कॉलेज में शिक्षा का व्यौपार करने या बड़े बड़े अस्पतालों में उपचार के नाम पर अधिक से अधिक धन संचय करने वाले लोग एवं राजनीति और सरकारी विभाग के अधिकारी से कलाजगत से टीवी अख़बार के लोग ये सभी अपने वास्तविक धर्म कर्म को छोड़ केवल इक अंधी दौड़ में शामिल हैं । और बड़ा और ऊंचा और अमीर और ताकतवर बन जाने के पागलपन में ये जानते हुए भी आखिर इंसान को दो ग़ज़ ज़मीन ही चाहिए या शायद वो भी नहीं बस राख बनकर बिखर जाना है । अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि किसी के अधिक तभी होता है जब किसी को कम मिलता है और अमीर बनने का तरीका किसी को गरीब बनाकर हासिल होता है । जब सबको अपनी काबलियत महनत का सही मूल्य मिले तब अमीर और अमीर गरीब और गरीब नहीं हो सकते हैं । 

  कभी आपने सोचा है हमने क्या किया है धरती को कुदरत को सुरक्षित नहीं रख सके बल्कि उसका अस्तित्व खतरे में डालते रहे हैं अपनी ज़रूरत और चाहत पूरी करने को । बड़े बड़े विनाशकारी हथियार बनाते रहे मगर बातें विश्व कल्याण की करने का आडंबर करते रहे । हर कोई आदमी से देश तक अपने से कमज़ोर को मिटाने की कोशिश करता रहा सबसे बड़ा ताकतवर होने को । चांद को छूना कितना ज़रूरी है क्या चांद पर जाओगे आज भागकर मौत से घबराकर । मौत इक हक़ीक़त है आनी ही है ये जानते हैं मगर फिर भी समझते रहे जैसे करोड़ों साल जीना है इतना सामान इकट्ठा किया है कुछ मुट्ठी भर लोगों ने क्या आज अपना सब कुछ दे कर इक पल भी जीवन खरीद सकते हैं । आज वैज्ञानिक करोड़ों रूपये खर्च कर गार्ड पार्टिकल की खोज कर समझते हैं हम शायद कोई अपनी दुनिया बना सकते हैं । नानक जी ने ये बात कितनी आसानी से समझाई थी कुछ शब्दों में ।

 अव्वल अल्लाह नूर उपाया , कुदरत दे सब बंदे ।

 एक नूर ते सब जग उपजेआ कौन भले कौन मंदे । 

  धर्म की महनत की कमाई मिलकर बांटकर खाना सबकी भलाई का सबक देकर आदमी को अंधविश्वास और  भ्रमजाल से जागरूक करने का कार्य किया । ईश्वर को मानते थे सर्वेश्वरवादी थे रूढ़ियों कुसंस्कारों का विरोध किया और ईश्वर का साक्षात्कार बाह्य साधनों से नहीं वरन आंतरिक साधना से संभव है ये कहा । उनके दर्शन में वैराग्य तो है साथ ही तत्कालीन राजनीतिक धार्मिक और सामाजिक दशाओं पर भी नज़र डाली । संत साहित्य में शायद वही अकेले हैं जिन्होंने उस युग में भी नारी को बड़प्पन दिया है । हिंदू मुस्लिम या अन्य सभी को उपासना की अच्छे मार्ग पर चलने की बात की है । यहां सिख धर्म की बात नहीं है मगर ऐसे सभी साधु संतों की बात है जो समानता और आपसी मेल मिलाप की सीख देते रहे हैं ।

   पिछले कई सालों से नफरत की फसल बोने का काम करते रहे हैं लोग लोकलाज छोड़ किसी व्यक्ति को बदनाम करते रहे झूठ सच की मिलावट से । गांधी को आपने भी अपनाया कब उपयोग किया है समाधि पर फूल चढ़ाने से गांधीवादी नहीं हो जाते बल्कि गांधी को जाने कितनों ने मरने के बाद भी उनकी आत्मा को घायल किया है । अंतिम व्यक्ति की आंख का आंसू पौछना छोड़ आपने अपने बाणों से हर किसी को रुलाया भी और करोड़ों की मुश्किल बढ़ाई पर अपनी भूल नहीं स्वीकार की । ये किस धर्म की शिक्षा है कि जिस देश में करोड़ों लोग बेघर हैं भूखे हैं उनको जीने की बुनियादी ज़रूरत की चीज़ें नहीं मिलती सरकार या सत्ताधारी लोग अथवा धनवान अपने पैसे को आडंबर करने अपने ऐशो आराम करने ही नहीं उन लोगों की समाधियां और मूर्तियां बुत बनाने पर देश का धन सम्पदा बर्बाद करने का पाप करें । ऐसा करके उनको जीवित नहीं बार बार मरते हैं । अपने से पहले हुए राजनेताओं की गलतियां बुराईयां आपको दिखाई देती हैं मगर ये नहीं नज़र आया उनका योगदान भी रहा है देश समाज को बनाने में । औरों को छोटा साबित करने को आपने नफरत का ज़हर हर तरफ फैलने दिया या फैलाया है । नानक कबीर को छोड़ो आपने तो जेपी जैसे व्यक्ति या विनोबा भावे जैसे संत की भी विचारधारा को नहीं समझा है । मंदिर मस्जिद के झगड़े किसी देश समाज की भलाई नहीं कर सकते हैं आपसी बैर भेदभाव को बढ़ाना देशभक्ति कदापि नहीं है । 

     सत्ता पाने की खातिर कितना धन खर्च किया क्या क्या हथकंडे नहीं अपनाये और सत्ता का गलत उपयोग कर ही आपके दल को कोई नहीं जानता किस किस ढंग से इतना पैसा मिला कि दुनिया का सबसे अमीर राजनैतिक दल आपके दल को समझने लगे हैं । जिनको लगता है यही सब होना ताकतवर होना है उनको पिछले इतिहास को पढ़ना समझना होगा । भारतवर्ष की परंपरा उनको आदर्श मानने की रही है जिन्होंने अपना सब कुछ जनकल्याण पर खर्च किया न कि जिन्होंने अपने नाम अपनी आकांक्षाओं पर देश का धन बर्बाद किया । जिनको आपने खराब समझा समझाया और साबित करने की कोशिश की उन्होंने भी अपने आप पर बेतहाशा धन खर्च नहीं किया होगा । लोग औरों की की गलतियों से सबक लेते हैं उनको दोहराते नहीं तभी समझदार कहलाते हैं अन्यथा जो आज ज़िंदा नहीं उनकी आलोचना कर उनका क्या बिगाड़ लेंगे खुद को ही इक ऐसा व्यक्ति साबित कर सकते हैं जो ऊंचा होकर भी किसी को साया नहीं देता न ही उसके फल किसी को मिलते हैं । खजूर की तरह ऊंचे पेड़ जैसी मूर्तियां बनाना व्यर्थ है ये मिसाल जानते हैं । अच्छी अच्छी चिकनी चुपड़ी बातें करने से क्या हासिल जब भी कोई निष्पक्ष होकर विवेचना करेगा तो न केवल आपके गलत निर्णय की बात होगी बल्कि आपने जिन जिन संस्थाओं को अपने मतलब की खातिर नुकसान पहुंचाया उसकी भी चर्चा अवश्य की जाएगी । 

  आपके सामने उद्दाहरण है जब विपत्ति आई तो अमेरिका को उसके हथियार या लड़ाकू विमान नहीं काम आये और भारत से इक दवा की मांग करनी पड़ी । किसी भी अहंकारी का अहंकार हमेशा कायम नहीं रहता है । कहते हैं फलदार पेड़ झुकता है और इतना ही नहीं फलदार पेड़ को कोई पत्थर भी मारता है तो बदले में फल देता है । जिन जिनको भी कुदरत ने समय ने नसीब ने ये सब दिया है उनको कुदरत या ऊपर वाले का उपकार समझ इसका उपयोग औरों की भलाई को करना चाहिए । इतना सबक नहीं सीखा पढ़ा तो धर्म को नहीं जाना है इन लोगों ने मंदिर मस्जिद जाकर बेकार समय और साधन उपयोग किये हैं । मुझे फिर से कवि गंगभाट और रहीम जी की चर्चा याद आई है आखिर में उसकी बात करते हैं । 

रहीम इक रियासत के नवाब थे जो अपने पास आने वाले लोगों की सहयता किया करते थे । इक दिन उनकी सभा में कवि गंगभाट ने देख कर उनसे इक दोहा पढ़कर सवाल किया :-

     सीखियो कहां नवाब जू ऐसी देनी दैन , ज्यों ज्यों कर ऊंचों करें त्यों त्यों नीचो नैन । 

अर्थात नवाब जी आपका ये क्या ढंग है कि जैसे ही किसी को कुछ देते हैं आपका हाथ आगे बढ़ता है ऊपर जाता है मगर तब आपकी आंखें झुकी हुए रहती हैं । रहीम ने उनको जवाब दिया था :-

         देनहार कोऊ और है देत रहत दिन रैन , लोग भरम मोपे करें या ते नीचे नैन । 

अर्थात देने वाला तो कोई और है जो रात दिन देता रहता है मगर लोग समझते हैं मैं दे रहा हूं यही सोचकर मुझे एहसास होता है और मेरी नज़र झुक जाती है । 

   अब जो भी राजनेता सरकार कुछ भी समाज पर खर्च करती है वास्तव में उनकी अपनी कमाई नहीं है देश की जनता का ही धन जनता को देना उपकार नहीं है बल्कि शायद इक अपराध ही है जिस देश में करोड़ों लोग गरीब बदहाल हैं उसके शासक खुद शानो शौकत पर अपने खुद पर इतना धन व्यर्थ खर्च करते हैं । 

        कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर , न काहू से दोस्ती न काहू से बैर ।

    समाज की असलियत बताना अपना कर्तव्य है किसी से कोई विरोध नहीं समर्थन नहीं । 


 


       

अप्रैल 07, 2020

POST : 1258 बात काम की या समय की बर्बादी ( संदेश ) डॉ लोक सेतिया

   बात काम की या समय की बर्बादी ( संदेश ) डॉ लोक सेतिया 

    विषय फेसबुक व्हाट्सएप्प और आपसी चर्चा में बातचीत को लेकर है। सबसे पहले आपको विचार करना है किस संदेश से आपको क्या हासिल होता है। आपको अधिकतर संदेश ऐसे मिलते हैं जिनका कोई महत्व नहीं होता आपका समय बीत जाए या थोड़ा हंसी मज़ाक चुटकले जैसे आपको कोई सोच विचार नहीं देते हैं। जो लोग आपको बीस संदेश फॉरवर्ड करते हैं कभी पूछना उन्होंने खुद देखे सुने या समझे भी हैं। और कुछ लोग जो किसी राजनितिक विचारधारा या अपने फायदे के मकसद से भेजते हैं उनकी सोचने समझने की शक्ति जंग लगे हथिहार या सामान की तरह हानिकारक होती है खुद रोगी हैं आपको भी बीमार बना सकते हैं। अगर आपको अपनी पसंद की बात ही सुनना अच्छा लगता है तो ये खुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारना है। भले कोई शासक हो या अधिकारी या धनवान अपना गुणगान उसी को वास्तविकता से दूर करता है और कभी बाद में उसको खेद होता है जब अहंकार में अपना ही नुकसान करता हुआ पछताता है कि काश कोई पहले उसको सच बताता। अपने सुना तो होगा निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छुवाये , बिन साबुन पानी बिना मैल साफ कर जाए। शब्द अलग हो सकते हैं भाव ये है कि आप अपनी कमी बताने वाले से दूरी मत रखना उनका साथ उसी तरह है जैसे साबुन पानी से आप अपना मैल साफ करते हैं। आपने सुना होगा कभी फकीर गली गली कोई गीत गाते थे नानक कबीर की वाणी सुनी है तब धर्म वाले उनको जाने क्या क्या कहते थे क्योंकि वो निडरता से धर्म के नाम पर अंधविश्वास या आडंबर को गलत कहते थे। ईश्वर को वास्तव में वह अधिक जानते मानते थे अन्यथा उनकी कही बात जन जन तक नहीं पहुंचती और किसी धर्म की किताब में दर्ज होती नहीं कभी। मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाना कोई धर्म नहीं है धर्म है उस जगह से आपको संदेश क्या मिलता है अच्छा क्या बुरा क्या है ये चिंतन करने की बात है केवल जाकर सर झुकना माथा टेकना या कुछ पैसे वस्तु कोई खाने को चढ़ाना धर्म नहीं धार्मिकता का दिखावा भर है। 

अब बात इस युग के समय की , होना तो यही संभव था कि कोरोना जैसी आपदा पर जब हम घर में बैठे हैं तो विवेक से काम लेते सोचते समझते कि आज कोई भगवान धर्म मंदिर मस्जिद का उपदेश नहीं विज्ञान और शिक्षा डॉक्टर अस्पताल और हमारा वास्तविक विकास उपयोगी है। शायद अगर हम विचार करते तो व्यर्थ के कार्यों या धार्मिक आडंबरों से बाहर निकलते और साहस से सामना करने समाधान खोजने की बात करते। मगर जिन लोगों को अपना धंधा ही देश की जनता को मूर्ख बनाने से चलाना है उन्होंने अपने मकसद के लिए फिर आपको वापस भूलभुलैयां में उलझाने का कार्य किया है। आपको ताली बजानी है या दिया जलाना है कोई बुराई नहीं है लेकिन जिन उद्देश्यों को लेकर ये करने की बात है क्या वो सच में होते हैं। अपने ताली बजाई उनको आभार जताने को जो आपकी जान की रक्षा करते हैं मगर क्या ये आपको पहले भी नहीं मालूम मगर आप तो जाने क्या क्या समझते हैं कहते हैं। क्या आपको नहीं लगता अपने उनको फीस या पैसा दिया है जबकि आपकी जान की कीमत किसी पैसे से आंकी नहीं जा सकती और न ही जिनको अपना कर्म धर्म केवल धन कमाने को करना है उनका भी बचाव मुझे करना है। समझना है कि डॉक्टर और रोगी या हमारे समाज का संबंध आपसी विश्वास और ईमानदारी का हो। उपचार करने का पैसा लेकर अपनी आजीविका चलाना सही है मगर पैसे कमाने को ही उपचार करने को साधन बनाना अनुचित है। इनमें अंतर है। कुछ इसी तरह अपने दिया जलाया एकता के नाम पर मगर दिन भर भेदभाव और बड़े छोटे या समर्थक विरोधी की चर्चा से मन नहीं मिलते हाथ मिलाने की औपचारिकता निभाते हैं। 

उधर आपको रामायण महाभारत दिखाने की बात हो रही है मगर सवाल ये है कि अपने गीता रामयण अन्य धार्मिक किताबों से कोई सबक सीखा है शायद आपके घर पर धूल चाटती हैं ये किताबें जिनको अपने पढ़ा ही नहीं समझने की बात क्या करें। फिर भी अगर आपको इन सीरियल को देखना है तो विचार करना उनसे क्या हासिल होता है और अवश्य आपको समझ आएगा कि देश में शासन और न्याय कैसा होना चाहिए। ये मुझे भी रामायण देख कर पता चला कि तब राजा होते थे मगर जनता को विरोध करने की मनाही नहीं थी और जब कोई सामने खड़ा होकर दरबार में सवाल करता था तब राजा उसको ताकत भय सत्ता से अधिकार का उपयोग करवा खामोश नहीं करता था बल्कि न्याय और सत्य का पक्ष लिया जाता था। महाभारत से खुद कृष्ण संदेश देते हैं कि राजा को कर देने नहीं देने का औचित्य क्या है और इतना ही नहीं किसी भी देवता की पूजा उसके कोप से डरकर नहीं करनी चाहिए। देवता या जो भी आपको सुरक्षा देता है आपको प्यार देता है वही आदर योग्य है और देवराज इंद्र का अभिमान समाप्त कर उसको अपनी गलती मानने पर विवश करते हैं। अपने समझा किसकी पूजा की जानी चाहिए जिनसे हम को जीवन मिलता है उन सभी की। कोई कह सकता है ये नास्तिकता की बात है जो आपके ही धर्म की किताब की कथा है किसी ने लिखी होगी कोई आज नहीं बदल रहा है। महभारत की विशेषता है कि समय का पहिया घूमता है जो अपनी बात बताता है और समय कभी किसी के आदेश से वापस नहीं लौटता है। लेकिन शायद कुछ लोग समय को बांधना ही नहीं चाहते पीछे ले जाना चाहते हैं। 
 

 

अप्रैल 05, 2020

POST : 1257 बात कोरोने की है फिर भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  बात कोरोने की है फिर भी  ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   ये सोचने विचारने समझने या मतलब क्या है की बात नहीं है। आपने कितनी पुरानी फिल्मों में हंसाने वाले
किरदार देखे हैं उनकी बातें हरकतें देख कर सब हंसते थे। जोकर फिल्म राजकपूर की असफल होकर भी बेमिसाल थी। ऐसे कुछ दृश्य मुझे याद आते हैं। हंसते ज़ख्म में नशे में चूर सब बस्ती वाले बारात बनकर निकलते हैं और पुलिस थाने में भी सभी इक वाक्य दोहराते हैं। तेरा धोबन से वास्ता क्या है। ख़ामोशी फिल्म में नायक पागल है और नायिका उसका ईलाज अपने डॉक्टर के आदेश पर इक अनुसंधान करते हुए उसकी महबूबा बनकर करती है। ये उपचार सफल रहता है जाने क्यों ऐसे पागलखाने बनाये नहीं गये। मगर उस फिल्म में नायक का दोस्त उसका हाल चाल देखने आता है और सभी पागल पागलपन की हरकतें कर रहे होते हैं और उसको स्वयं डॉक्टर भी पागलखाने का रोगी लगता है। थोड़ा थोड़ा पागलपन हम सभी में होता ही है तभी हम किसी की बात को बिना सोचे विचारे मानते ही नहीं औरों को भी समझाते हैं। विषय को गंभीर होने से बचाना है इसलिए कोई चिंतन की सोचने की बात नहीं करनी और बेसिर पैर की हांकनी है।

       घर से चले थे हम तो ख़ुशी की तलाश में , ख़ुशी की तलाश में। ग़म राह में खड़े थे वही साथ हो लिए।
खुद दिल से दिल की बात कही और रो दिए। अच्छे दिन लाने को निकले थे गले पड़ गए खराब दिन।
अब नसीब में जिसके जो लिखा था वो तेरी महफ़िल में काम आया , किसी के हिस्से में प्यास आई किसी के हिस्से में जाम आया। अब आपको इन गीतों की पैरोडी बनानी है टीवी पर एंकर आपको अपनी समस्या का यही समाधान बता रही है। गोविंदा को याद करो कृष्ण नहीं अभिनेता गोविंदा उनकी हर फिल्म हिट रहती थी जबकि उस में तार्किक कोई बात नहीं होती थी फूहड़ हास्य पर हम कहकहे लगाते हैं। अपने वास्तविक हास्य कलाकार भी देखे तो होंगे जिनकी बात गुदगुदाती भी थी मगर कोई संदेश भी छुपा रहता था। अपने चार्ल्स चैपलिन का नाम सुना होगा 1889 में 16 अप्रैल को जन्म लंदन में 25 दिसंबर 1977 को स्विट्ज़रलैंड में निधन हुआ और ऐसे ही किशोर कुमार अभिनेता निर्माता निर्देशक भारत में हुए हैं। उन्होने जब महमूद से मिलकर पड़ोसन फिल्म बनाई तो अभिनेता सुनील दत्त को हैरानी होती थी जब उनसे अजीब अजीब ऊट पटांग हरकतें करने को निर्देशक कहते थे। मगर फिल्म बेहद सफल रही और अभी तक इक लाजवाब समझी जाती है।

    हमारे समाज में सफलता को मापदंड समझा जाता है और गुरु दत्त जैसे फ़िल्मकार की लाजवाब फिल्म प्यासा कागज़ के फूल लोग नहीं देखते मगर चौदवीं का चांद देखते हैं। जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं आपको हैरानी होगी देश की बदहाली को दर्शाने वाले इस गीत पर रोक लगाई गई थी मगर बाद में अदालत ने ऐसा करने को अनुचित करार दिया था। आज विषम हालात पर विचार करने और भविष्य की चिंता करने की जगह हम मिलकर ऐसे कार्य करने की बात करने वाले हैं जिनका हासिल केवल वास्तविकता से नज़र चुराना घबराकर भागना है। अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे , मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे। अपने भूलभुलियां के बारे में सुना होगा जिस में भीतर जाने वाले को भटकाने को व्यूह रचना की तरह रास्ते बनाये गए होते हैं जिस तरफ बाहर निकलने को जाओ घूम फिर कर किसी और दिशा में अंदर ही पहुंच जाते हैं। कोई जो दावा करता है हमको निकलने की राह समझा सकता है वास्तव में खुद कभी ऐसी उलझनों में रहा ही नहीं होता है। कल्पना से बिना विषय की गंभीरता को जाने सबको अतिविश्वास से कई उपाय सुझाता है और नासमझ उसकी कही बात को कोई छुपी हुई शक्ति या भविष्यवाणी की तरह मानकर जो बताया अमल करते हैं। जाने कितनी बार उसने कितने कार्य यही कहते हुए किये कि ऐसा करने से अमुक समस्या का नाम तक नहीं रहेगा लेकिन कोई भी समस्या हल हुई नहीं। गरीबी बेरोज़गारी से किसानों की हालत अच्छी होने की जगह और खराब हुई है। खास बात ये है कि उस ने कभी अपनी किसी योजना की नाकामी को स्वीकार नहीं किया है। अब जाने किस आधार पर अंधेरे रौशनी का नया खेल खेलने की बात कही है सभी से। उनके बताये समय पर घर की सभी रौशनियां बंद कर उनके अनुसार बताये मिंटों तक दिया टॉर्च मोमबत्ती या फोन की सर्च लाइट से उजाला करना है। हमारे देश में लोग विश्वास अंधविश्वास के बीच अधर में लटके रहते हैं और ऐसे में डरते हैं घबराते हैं कि ये नहीं किया तो जाने क्या होगा और क्या सही ढंग से नहीं हुआ तो कोई चिंता की बात नहीं होगी। नौ मिंट बाद दिया जलता रहने देना है कि बुझाना है और लोग दिया जलाकर बुझाना उचित नहीं समझते हैं। पहले अंधकार बढ़ाना घर भर की रौशनी बंद करना फिर कुछ मिंट को ये सब करना क्या कोई जादू टोटका या कोई लाल किताब का उपाय है। मगर समस्या उनकी है जो अखंड ज्योति जलाने की बात करते हैं। नहीं ये फ़िल्मी पारो और देवदास की बात नहीं है देश भर में कितनी जगह अखंड ज्योति जलती रहती है। कहीं ये केवल इक नया कीर्तिमान या इतिहास रचने की बात ही तो नहीं है क्योंकि खुद को विश्व इतिहास में महान कहलाने को बाकी कोई भी कार्य सफल हुए लगे नहीं हैं। मगर इतिहास की कथाओं में ऐसे निर्णय करने वाले शासक भी हुए हैं पहले भी।

      बात रोने की लगे फिर भी हंसा जाता है , यूं भी हालात से समझौता किया जाता है।     

अप्रैल 04, 2020

POST : 1256 साथ-साथ हैं दिल में चाहत के बिना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   साथ-साथ हैं दिल में चाहत के बिना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   ये वही लोग हैं जो हमेशा हमें आपस में लड़वाते  बांटने और नफरत का सबक पढ़ाने को लगे रहते हैं। राजनेताओं की ही नहीं धर्म वालों की ही नहीं टीवी चैनल वालों की क्या समाज के हर वर्ग की मानसिकता हम सबसे अच्छे बाकी सभी खराब हैं का शोर मचाते रहने की बन गई है। मगर जब दिखावा करने को कहते हैं किसी दिन किसी अवसर पर हम गले मिलते हैं हाथ मिलाते हैं दिल नहीं मिलते हैं। हैरानी है जिस को विवाह करने के बाद अपनी पत्नी को हम साथ साथ हैं जीवन भर को कहना था मगर साथ छोड़ दिया और जिसने कभी विरोधी दल वाले को दिल से अपना नहीं समझा हर किसी का उपहास किया तमाम पहले हुए नेताओं को खराब और सिर्फ मैं अच्छा साबित करने की राजनीती की देश की जनता को एकता का दिखावा करने को कह रहा है। जब से सत्ता मिली देश भर में नफरत की गंदी राजनीति और न केवल किसी एक संगठन के लोगों को मनोनीत करने तमाम राज्यों और उच्च पदों पर नियुक्त करने जैसे काम बल्कि सत्ता की खातिर अपराधी दाग़ी लोगों को अपने दल में शामिल करने का काम किया बल्कि जब भी सत्ताधारी दल के नेताओं ने हिंसा और नफरत फ़ैलाने वाले ब्यान भाषण दिए खामोश होकर उनको बढ़ावा देने का काम किया। देश के सबसे बड़े पद पर रहते झूठ को सच सच को झूठ साबित करने को उचित अनुचित की चिंता नहीं की अचानक देशवासिओं को एक साथ खड़े होने का सबक सिखा रहा है।

  मगर बस नौ मिंट की बात है और दिखाना किसे है जब खुद आप हम जानते हैं कितने साथ साथ हैं। कभी गांव भर इक साथ होता था फिर गली के लोग फिर संयुक्त परिवार साथ साथ हुआ करता था अब भाई भाई क्या पति पत्नी किसी विषय पर एकमत नहीं होते आपस में तकरार बिना कारण होती है मगर रहना साथ साथ है। ईश्वर तो एक है सभी जानते हैं फिर भी हम मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे बनाते हैं और अपने अपने धर्म को औरों से अच्छा साबित करते हैं। शायर कहता है " जब हक़ीक़त है कि हर ज़र्रे में तू रहता है , फिर ज़मीं पर कहीं मंदिर कहीं मस्जिद क्यों है। क्रिकेट के खेल और 15 अगस्त 26 जनवरी वाली देशभक्ति नहीं वास्तविक देशभक्ति हर देशवासी को हमेशा अपना और अपने समान समझने की वास्तिक एकता होनी चाहिए। क्या ऐसा नहीं होगा कि नौ मिंट रौशनी करने में भी हम एक दूसरे को गलत समझने की बात को भूल जाएं , और उसने दिया जलाया उसने मोमबत्ती उसने टॉर्च या फोन मगर किसकी रौशनी किस का समय किस का तरीका सही था हर कोई यही देखता समझता वास्तविक मकसद से भटका हो।

देश की एकता वास्तविक होनी चाहिए जो कुछ मिंट का दिखावा नहीं असली हो। जब कोई किसी पर अन्याय करे जब कोई भी विपदा में हो जब कोई भी भूखा हो बेबस हो जब कोई भी अकेला हो बेबस हो हम बढ़कर उनका हाथ थामकर अपना बनाएं। मगर हम तो हर दिन आपसी अनावश्यक मुकाबले में हर किसी को पीछे छोड़ने को लगे रहते हैं हमने साथ साथ चलने का ढंग सीखा कब है। अपने पक्षिओं जानवरों को साथ साथ उड़ते देखा है बिना टकराए बिना किसी की राह में टंगड़ी लगाए सुविधा से। हम समझते हैं किसी को नीचे दिखला कर हम बड़े बन जाते हैं और ऐसा आचरण करने के बाद सबसे बड़ा झूठ ये आडंबर करना है कि हम साथ साथ हैं।

शायर बशीर बद्र जी की ग़ज़ल पेश है  :-

मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला ,
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला।

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे ,
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला।

तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था ,
फिर उसके बाद मुझे कोई अजनबी न मिला।

खुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैंने ,
बस एक शख़्स को मांगा मुझे वही न मिला।

बहुत अजीब है ये कुर्बतों की दूरी भी ,
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला।

अप्रैल 03, 2020

POST : 1255 सवालों से भागते लोग ( आईने के सामने ) डॉ लोक सेतिया

   सवालों से भागते लोग ( आईने के सामने ) डॉ लोक सेतिया 

अब जब देश समाज अन्य विश्व के साथ इक ऐसे कठिन दौर में खड़ा है तब आरोप आक्षेप लगाना सही नहीं मगर क्या हमको वास्तविकता को समझने की ज़रूरत भी होनी नहीं चाहिए। बहुत मुमकिन है ऐसे में कुछ लोग वास्तविक धर्म और धर्म के नाम पर आडंबर का अंतर समझना चाहते। जब ये सवाल खड़े होने संभव थे कि जिन भी तमाम धर्म के पूजा अर्चना इबादत के स्थलों पर ईश्वर के होने का विश्वास करते हैं और सोचते हैं उनकी पूजा अर्चना इबादत से सभी कष्ट दूर हो सकते है और सब सुख हासिल हो सकते हैं उनकी स्तुति चढ़ावा अन्य बातें करने से। समझ आने लगा था उनकी वास्तविकता कुछ और ही है और इस से आगे जो सवाल उठ सकते थे वो धर्म और अंधविश्वास की परतें खोल सकते थे जिस से धार्मिक भावनाओं का उपयोग अपने मकसद से करने वाले के स्वार्थ को क्षति हो सकती थी अगर लोग विचार करते कि उन सभी को जिन जिन लोगों ने भी धन वैभव और सोने चांदी हीरे जवाहरात अर्पित किये अगर सच्चे धर्म की राह पर दीन दुखिओं की सहायता और अच्छे सामाजिक कार्यों पर व्यय किये गए होते तो अधिक सार्थकता होती। 

शिक्षित आधुनिक विवेकशील धर्मों के बनाये जाल से उनके चंगुल से निकलते और विज्ञान और विचार एवं तर्क की कसौटी पर परखते तो मुमकिन था किसी अंधे कुंवे से निकलते और रौशनी और हवा आज़ादी को जान पाते। मगर ऐसे में जिनको डर था कि देश की जागरूक जनता धर्म वालों से सवाल करे या नहीं उनसे तो सवाल कर ही सकती है कि कल तक आप देश को विश्वगुरु और आर्थिक शक्ति और महानता का डंका बजने का दावा करते थे और आज बताते हैं कि इस विपत्ति कठिन समय हम कितना पीछे हैं स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर। क्या ऐसे में इतने साल तक तमाम आडंबर करने और झूठी शानो शौकत पर धन बर्बाद करने का अपराध नहीं किया जाता रहा है। अभी भी आपको आम नागरिक को बुनियादी स्वास्थ्य और शिक्षा की सेवाएं उपलब्ध करवाने से अधिक महत्व अनावश्यक अपने गुणगान और अहंकार के दिखावे पर पैसा खर्च करना सही लगता है। 

ऐसे में जैसे कोई नासमझ बच्चों को बहलाने को खेल तमाशे करता है अपने अपने दूरदर्शन के बंद बक्से से धर्म के नाम वाले टीवी सीरीयल दिखाने का कार्य शुरू किया है जिस से खाली समय अपने सामने खड़े सवालों से टकराने की जगह ऐसी कथा कहानियों में गुम हो जाएं जिनसे उनको अपनी बदहाली किसी सरकार या योजनाओं की गलती नहीं और अपने भाग्य की रेखाओं और दुर्भाग्य या किस्मत को समझने लगें।  अपनी वास्तविकता से नज़र चुराना लगता है।

अब अगर रामायण की बात करनी है तो सबसे पहले भारत देश और राज्यों के सत्ताधारी नेताओं को उसको देखना समझना चाहिए। राम दशरथ के बेटे राजकुमार हैं फिर भी सत्ता का कोई मोह नहीं और आदर्श की राह पर महल शासन करने का त्याग करते तनिक भी विचलित नहीं होते जबकि तथकथित राम के अनुयायी सत्ता की खातिर हर मर्यादा को ताक पर रखते हैं। आज जब विषय होना चाहिए था सत्ता पाकर किस ने देश की जनता को शिक्षा स्वास्थ्य बुनियादी सुविधाओं में क्या उपलब्ध करवाया और कैसे अपने आडंबर और अपनी महत्वांक्षाओं को हासिल करने पर देश विदेश घूमने और अपने रहन सहन गुणगान पर गरीब देश की जनता का धन बर्बाद किया , तब इक माहमारी में ऐसे शासक का गुणगान किया जाने लगा है इसको भी इक अवसर बनाया गया है। शायद ही किसी ने अपनी माता के नाम पर राजनितिक फायदा उठाने का कार्य किया हो मगर इक तरफ कहने को घर परिवार छोड़ने का दम भरते हैं साथ ही माता के नाम का उपयोग किसी न किसी तरह किया जाता है।

केवल भारत ही नहीं विश्व भर में सत्ताधारी शासकों का आचरण विश्व कल्याण की बातें ही करने और वास्तव में निरंकुशता और ताकत का गलत उपयोग विश्व को विनाश की राह पर धकेलने का रहा है। कहीं न कहीं उनके अनुचित कर्मों का नतीजा बेकसूर नागरिक बेबस होकर हर दिन समस्याओं से घिरे हुए हैं। राम तो कहीं दिखाई नहीं देते मगर रावण जैसा अहंकार कितने शासकों में नज़र आता है। देश की संस्थाओं को पंगु बनाने उनको अपनी कठपुतली बनाने और संविधान न्यायपालिका के साथ मनमानी करने जैसे कार्य करते कोई संकोच नहीं किया गया और आलोचना या वास्तविकता दिखलाना जान जोखिम में डालना लगता है। मगर अभी भी लगता नहीं कोई देश और समाज की वास्तव में भलाई करने को अपनी पिछली गलतियों को सुधारना चाहेगा और मंदिरों मूर्तियों पर धन बर्बाद करना बंद कर देश की गरीब जनता को शिक्षा स्वास्थ्य खाने को रोटी रहने को घर पीने को पानी उपलब्ध करवाने को अधिक महत्व देगा। और सबसे बड़ा जो अपराध लोकतंत्र के नाम पर जनसेवकों का राजसी जीवन जीने पर देश के खज़ाने को लूटने का चलन चलता रहा है और सांसद विधायक अधिकारी किसी महाराजा जैसा जीवन बिताते रहे हैं और देश के वास्तविक मालिक नागरिक भूखे नंगे बेबस बना दिए गए जो अपने ही सेवकों के सामने हाथ फैलाये भीख मांगते नज़र आते हैं उसको बदलना होगा। अब रामायण का अर्थ जनता को अंधविश्वास के लिए नहीं इन शासन करने वालों को अपने भीतर झांकने को करना होगा।

जिसको शायद सरकार जवाब समझ रही थी असल में वही रामायण महाभारत और भी कठिन सवाल बनकर सामने है क्योंकि अब लोग सोचने लगे हैं समझने लगे हैं और समय आ गया है जब बोलने भी लगेंगे। 
 

 

अप्रैल 02, 2020

POST : 1254 कोरोना के अंत की शोध-कथा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   कोरोना के अंत की शोध-कथा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   आप सभी जानने को उत्सुक हैं कि कोरोना क्या बला है और क्या इस से बचा जा सकता है कब इसका अंत होगा। आप के मन की दुविधा और संशय का अंत करने को ये अध्याय शुरू किया गया है। कोरोना डर है और कायरता है और डर और कायरता का अंत निडरता और साहस से किया जा सकता है। क्या कोई भी रोग ऐसा है जो अगर नहीं होता तो लोग अमर हो जाते ये तो आपको विदित है जो भी आया है उसको जाना है ये कोरोना भी केवल बहाना है। मौत के सौ नहीं असंख्य बहाने हैं जाने किस बहाने कब कहां उस से मिलन या मुलाकात हो जाये , ज़िंदगी से पहचान हो नहीं हो मौत से सामना होना विधि का विधान है। अपने सुना होगा जब कभी किसी जगह कोई मानवीय आपदा कोई महामारी फैलती थी तब शासक अन्य भले लोग खुद जाते थे उन की सहायता करने को घबराते नहीं थे कि हमको भी वहां जाकर कोई रोग हो सकता है और मौत के डर से भलाई का कार्य करना नहीं छोड़ते थे। अब आपको उनसे दूर रहकर घर में छिपने की सलाह देने वाले आपकी सुरक्षा नहीं करने और आपको खुद अपनी जान बचाने की सलाह देते हैं क्योंकि उनको केवल अपने जीवन ही नहीं जो जो भी हासिल किया है जिस किसी भी तरह से सत्ता धन ताकत उन सभी के खोने का भय है उनकी मोहमाया उन्हें अपने जाल में जकड़े हुए है। अब आपको रामायण और महाभारत टीवी सीरीयल से बहलाने की बात करते हैं मगर क्या वास्तव में उस में जैसा बताया सब उचित और आदर्श था फिर किस बात का झगड़ा था , राजा की गद्दी और सुंदर महिला को हासिल करना और दुश्मनी और सत्ता ताकत का अहंकार ये सभी तो थे और कोई भी बचा हुआ नहीं था। आपको जब जिस बात को जैसे चाहा अच्छा खराब उचित अनुचित बता दिया गया और आपको समझाया गया इस पर कोई शक कोई सवाल नहीं करना ये अधर्म है। जो धर्म खुद को विवेचना की कसौटी पर खरा साबित करने से डरता घबराता है उसको कैसे कोई कसौटी अच्छाई बुराई को तय करने को मापदंड बना सकते हैं। 

   किसी को कोई वरदान किसी को अभिशाप किसी को क्या क्या अधिकार कैसे कैसे हथियार असंभव को संभव बनाने के उपाय कपोल कल्पना के पंख लगाकर दादी नानी की कहानियां जैसा स्वप्नलोक बना दिया। लेकिन जिनके बारे अमरत्व और काल को बंधक बनाने की बात बताई गई उनका भी अंत हुआ ही। कोरोना भी कोई सदा रहने का वरदान नहीं पाया हुआ कोई राक्षस ये भी स्वयं बुलाया हुआ संकट है। आपको मंत्र की शक्ति और आवाहन करने की बातें बताई गई हैं अगर उनमें सच्चाई है तो याद करो कौन है जो अभी कुछ महीने पहले इस शब्द को ऊंची ऊंची आवाज़ में कह रहा था "कोरोनोलॉजी को समझिये "। और हर कोई रटने लगा था क्या ये वही दैत्य तो नहीं जिसको कोई नफरत की आग जलाकर उसकी रट लगा रहा था जब सामने आया कोरोना तो वो खुद कहीं छुपा हुआ है। आपको अपने इतिहास से सबक सीखने को मिले तो बहुत हैं मगर आपने समझा नहीं सीखना क्या था सीखा जो नहीं सिखलाया गया था। ये राजनीति युग युग से उल्टी पढ़ाई पढ़ती पढ़ाती रही है और कोई भी राजा कोई भी शासक विशेषकर राजनेता कभी मसीहा नहीं होते हैं। सत्ता सिंहासन के लिए इन्होंने क्या क्या नहीं किया है। जिनको वफ़ा का अर्थ नहीं मालूम उन्हीं से लोग वफ़ादारी की अपेक्षा रखते हैं। भूल गए राजनीति और वैश्यावृति दुनिया के सबसे पुराने पेशे हैं और इन दोनों में बहुत समानता है। वैश्या तो फिर भी खुद को बेचती है ये सत्ता की खातिर ईमान तक बेच देते हैं। 

    आपको अब तो प्यार मुहब्बत की कोई बात कोई कहानी याद नहीं है। जबकि दार्शनिक और अध्यात्म से साधु महात्मा तक आपको इंसान से इंसान को प्यार करने की बात करते रहे हैं। आपके भीतर कितनी नफरत कितने लोगों को लेकर भरी हुई है और प्यार तो उस हृदय में रहता ही नहीं जिस में नफरत हो। आपको नफरत वाले अच्छे लगते हैं उनकी जयजयकार करते हैं तो खुद आप विषपान करते हैं और ज़हर पीकर जीने की आशा करते हैं। ज़िंदगी चार घड़ी की है और वही जीवन है जो प्यार भाईचारे और मानव कल्याण की खातिर जी जाये अन्यथा सौ साल जीना व्यर्थ है। मुसीबत के समय लोग मिलकर मुकाबला करते थे और मुसीबत को खत्म कर देते थे मगर अब हम मुसीबत से नहीं आपस से मुकाबला कर इक दूजे को दोष देकर हराना चाहते हैं ये इतिहास समझाता है कि भेदभाव और बांटने की नीति हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है जो दुश्मन को ताकतवर बनाती है और हमें विवश और कमज़ोर। कोरोना ही नहीं हर दुश्मन और समस्या का अंत इस कथा को समझने से मुमकिन है। विवेकशील बनकर विचार करें।  

मार्च 25, 2020

POST : 1253 कथाओं का आधुनिक स्वरूप ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  कथाओं का आधुनिक स्वरूप ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

हर सुबह आठ बजते टीवी चैनल पर कोई भविष्य बांचने आता है। हर दिन दावा करता है हम आपके साथ हैं उपाय बताते हैं आपका कुछ भी बुरा नहीं होने देंगे। फिर राशिफल बताते है किस का दिन सप्ताह महीना साल कैसा होने वाला है। आखिर में किसी राशि का जैकपॉट खोलने का दावा करते हैं और तमाम लोग उनकी बात पर भरोसा करते हैं ये उनको चिट्ठियां मिलती रहती हैं। इसके बावजूद कोई भी नज़र नहीं आता जिसको कोई समस्या नहीं हो या उनकी सलाह से सब वास्तव में अच्छा हो गया हो। इक और हैं जो जाने क्या सोचकर जब भी कुछ कहना हो शाम को आठ बजे का समय चुनते हैं कोई राज़ छिपा हो सकता है। कई लोग घबराते हैं अबकी बार जाने क्या दूर की कौड़ी लाये हैं।

कड़ियां जोड़ना दर्शकों का काम है उनका काम ठीक समय पर हर बार नये विषय किरदार की बात निदेशक बन कर समझाना है। ये लगता है देश की सरकार और राज्यों की सरकारें सागर मंथन कर अमृत कलश की खोज करना चाहते हैं। पौराणिक कथा में पहाड़ की शिला को मथनी बनाकर देवताओं दानवों ने रस्साकशी की थी अब देश की जनता को मथनी बनाने को जकड़ा गया है और लोग खुश हैं कि उनकी सुरक्षा और भलाई को जो भी संभव है किया जा रहा है। कहने को सबको घर की लक्ष्मण रेखा में रहना है सीता माता की तरह बाहर निकलने की गलती की तो रावण जैसा कोई दैत्य गंभीर रोग का भेस धारण कर प्राण को हर ले जाएगा। जैसे कभी महिलाओं को घर की चौखट नहीं लंगने की बात समझाई जाती थी यहां तुम सुरक्षित हो। ये प्यार की रिश्तों की जंजीर पहन कर महिलाएं अपना शृंगार समझती थी। शायद सबको यकीन है इस बार बच गए तो अमर हो जाएंगे और वो सब पुरानी बातें झूठी साबित हो जाएंगी कि जब जैसे जिसकी मौत आनी है टाली नहीं जा सकती और यमराज आपको हज़ार तालों में बंद होने पर भी खोज ही लेगा।

अभी तक कोई डॉक्टर आदमी में आत्मा को तलाश नहीं कर सका है अन्यथा अगर कोई आधुनिक उपकरण ये दिखलाता कि किस किस की अंतरात्मा मर चुकी है और वो ज़िंदा होकर भी ज़िंदगी से अनजान हैं। अपनी अपनी लाश का बोझ उठाए मौत का इंतज़ार करते हैं। गीता में क्या लिखा हुआ है अब किसी को याद नहीं अर्जुन को उपदेश देते हैं कृष्ण हथियार उठाओ जिनको मारने से तुम डरते हो उनको काल के मुंह में जाना ही है तुम सिर्फ माध्यम बनते हो और शरीर मरता है आत्मा जन्म लेती है जैसी जाने कितनी बातें आखिर कायरता और मोह छोड़ युद्ध करने को तैयार कर लेती हैं। अच्छे वक्ता अपनी वाणी और चतुराई से हर किसी को मोहित कर सकते हैं तभी कौरव पांडव दोनों पक्ष कृष्ण को अपना मानते हैं। कृष्ण वो शासक है जो खुद पांडवों की तरफ है और अपनी सेना कौरवों को देते हैं , इक कवि की कविता में राधा सवाल करती है कान्हा तुम अपनी सेना जो आपकी जनता थी जिसकी सुरक्षा करना आपका फ़र्ज़ था उसको अर्जुन के तीरों से कैसे मरने देते रहे। शासक बनकर लोग कितने भी समझदार हों निष्ठुर बन जाते हैं।

सागर मंथन से अमृत ही निकलेगा या विष भी निकल सकता है। और अगर विष मिलेगा तो कौन है जो शिव बनकर हालाहल पी नीलकंठ बन सकता है। सत्ता का अमृत कलश सभी की चाहत है मगर अब कोई सच झूठ को परखने की चर्चा करता है तो सभी उसको जाने क्या क्या कहने लगते हैं। विदुर जैसा महात्मा इस कलयुग में कोई नहीं है। सच तो ये है कि आजकल जितने भी नायकत्व के किरदार वाले हैं सब नकली हैं असली रामायण गीता के किरदार कहीं नहीं हैं।

यमराज अपने बॉस भगवान के पास आये हैं सूचित किया है भारत सहित कई देश लॉकडाउन की घोषणा कर रहे हैं। भगवान नहीं समझे यमराज को इन बातों से क्या मतलब है। यमराज ने कहा क्यों नहीं आप मुझे भी भारत की सरकार की तरह तीन सप्ताह घर पर बैठने की अनुमति दे दें। मेरा भैंसा भी कभी तो आराम करने का हकदार है। भगवान ने कहा भला जन्म मृत्यु पर भी कोई बंदिश लगती है कभी। दुनिया में जीवन मृत्यु को कभी विराम नहीं मिल सकता है। आप तो जाते रहते हैं भारत की सरकार ने सबको घरों में रहने को आदेश दे तो दिया है मगर क्या हर नागरिक को घर मिला हुआ भी है। लोग बाहर नहीं निकलेंगे तो क्या इतने दिन कोई भी मरेगा नहीं ये नहीं जानते जन्म मरण उनकी मर्ज़ी से नहीं हो सकता है। मौत को जिसे जैसे अपनी आगोश में भरना है घर बैठे भी मुमकिन है ऊंचे महल की दीवारें भी किसी को मरने से बचा नहीं सकती हैं। आपको कोई टारगेट नहीं दिया जाता विधाता को केवल संतुलन कायम रखना होता है , जन्म लेते रहे और मौत नहीं होगी तो दुनिया की मुश्किल और बढ़ जाएगी। यमराज बोले अभी मैं इक सज्जन पुरुष को लाने गया था मुझे देख कर बोलने लगा कि जब तक लॉक डाउन है मुझे रहने दो अन्यथा मेरी अर्थी को उठाने कांधा देने कौन आएगा। किसी ईश्वरभक्त की ये दशा हो ये तो मुझे उचित नहीं लगा और मैंने उसे कुछ दिन की मोहलत अपने विशेषाधिकार उपयोग कर दे दी है।

भगवान ने अपने चक्षु बंद किये विचारमग्न होकर समस्या को समझा , फिर बोले ये बताओ अगर भारत में किसी वीवीआईपी का अंत आने वाला हो क्या तब भी ये सब नियम लागू रहेंगे। यमराज बोले भला ये भी कोई पूछने वाली बात है इस देश में खास लोगों की खातिर सब बदल जाता है। अभी देखा अमेरिका के सरकार आये तो मीलों लंबी दीवार बनाई गई गरीब बेघर बस्ती वालों को छुपाने को। ऐसे लाखों करोड़ बर्बाद करते हैं आडंबर और तमाशाओं पर उतने से कितने बेघर को घर भूखों को रोटी और रोगिओं को अस्पताल मिल सकते थे। सच तो ये है कि आज तक किसी रोग महामारी क्या दुर्घटना हादिसे से इतने लोग नहीं असमय मरे हैं जितने इन राजनेताओं और बड़े बड़े अतिविशिष्ट लोगों के सही आचरण नहीं करने और लापरवाही और मनमानी तथा अमानवीय कर्मों से मरते हैं जिनका दोष कभी कुदरत कभी भाग्य कभी विधाता को देने की बात की जाती है। भगवान ने चित्रगुप्त से जन्म मृत्यु का आंकड़ा पूछा तो उन्होंने बताया कि जैसा हमेशा से था उसी तरह सब सामान्य है अब मौत के कारण समय समय पर इंसानी फितरत को देख बदलते रहते हैं। समस्या विकट है जिनकी बारी है उनको मरना मंज़ूर नहीं मगर जिनको अभी जीना है वो खुद अपनी जान देने को व्याकुल हैं ऐसे में सरकार को कुछ नहीं सूझता क्या समस्या है और उपाय क्या है। सरकारों को जब जो करना होता है करती नहीं बाद में पछताती हैं मगर यमराज बोले हमको जो करना है किसी सरकारी आदेश से क्या रोक सकते हैं।

   कोई दार्शनिक चिंतित है कि जैसे पंछी जानवर पिंजरे में रहने के आदी हो जाते हैं तो उनको खुली हवा में आज़ाद होना घबराहट पैदा करता है। कहीं घर में बंद रहने की आदत बन गई तो हर शहर गांव गांव इक ख़ामोशी नहीं छाई रहने लग जाए। 

मार्च 24, 2020

POST : 1252 मौत से डर के जीना छोड़ दोगे ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

   मौत से डर के जीना छोड़ दोगे ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

     शीर्षक से समझ सकते हैं " करो- ना " का उल्टा है ना करो। कुछ भी नहीं करना घर बैठ चिंतन करना है। इसी को कहते हैं जब किसी का वक़्त आता है तो हर तरफ उसकी धूम मची होती है। अब लग रहा है दिल के रोग कैंसर का रोग किडनी का डॉयबिटीज़ का जिगर का शरीर के हज़ारों रोगों का नाम निशान बाकी नहीं है। कोई किसी और रोग से मरने से नहीं घबराता बस इक रोग की दहशत है हर कोई उस से बचना चाहता है। गब्बर सिंह का रुतबा पचास कोस तक था लादेन का कुछ देशों तक मगर इन का भय उन देशों तक को है जिन्होंने दुनिया को अपनी ताकत से डराने और अपने आधीन करने के मनसूबे पाल रखे थे। हर सेर को सवा सेर मिलता है ये शाश्वत सत्य है। 

      कहीं बैठा कोई किसी को अपनी वास्तविकता बता रहा है। आज मेरा समय है मगर मुझे भी खबर है मेरा भी अंत इक दिन होना है अहंकार करने वालों का अंजाम यही होता है। लोग गीता रामायण बाईबल कुरान गुरुग्रंथ साहिब को भूलकर जाने किस किस को सुबह शाम रटने लगे थे। भगवान से मंदिर मस्जिद बड़े लगने लगे थे और हर किसी ने कितने लोगों को इन सभी से बढ़कर समझ लिया था। किसी को कोई साधु किसी को कोई अभिनेता किसी को कोई खिलाड़ी किसी को कोई राजनेता किसी को कोई योगी किसी को कोई झूठ का कारोबारी किसी को दुनिया का सबसे अमीर उद्योगपति अपना आदर्श लगता था। अब इन सभी से किसी को कोई उम्मीद नहीं रही कि हमको बचा लेगा क्योंकि ये सभी तथाकथित ऊंचे रुतबे वाले खुद ही बहुत बौने साबित हो गए हैं। हम हैं ना अब इनसे कोई भी आपको ये दिलासा नहीं देने वाला। हर किसी को अपनी जान की पड़ी है भाई जान है तो जहान है। 

     कल इक दोस्त ने चार शब्द लिखे थे अपनी फेसबुक पोस्ट पर। " प्यास लगी है , चलो कुंआं खोदें ''। बात नई नहीं है हमने यही ही नहीं किया बल्कि हम तो उल्टा करते रहे हैं। ये मेरा पानी ये मेरी नदी ये धरती मेरी है सब अपने खातिर मानवता को दरकिनार कर अब खामोश हैं सभी आपसी मतभेद भूलकर अपनी अपनी जान को लेकर चिंतित हैं। उधर जितने भी बाकी रोग हैं खिलखिला रहे हैं जैसे राजनेताओं को किसी अदालत ने बेगुनाह करार दे दिया हो। अब सारे इल्ज़ाम उसी एक के सर जाने हैं अभी तक जितने लोग उन रोगों से मरे उनकी मौत स्वाभाविक समझी जानी चाहिए क्योंकि इक इस रोग को छोड़ कोई और रोग कभी था ही नहीं तभी हर देश और सरकारी स्वास्थ्य विभाग से विश्व स्वास्थ्य संगठन तक इक इसी को लेकर चिंतित हैं। कितने झगड़े कितनी नफ़रतें जो नहीं कर सके इक बिमारी ने कर दिखाया है।

               आप क्या हैं कोई दानव हैं राक्षस हैं या कोई अवतार देवी देवता क्या हैं। जवाब मिला देखो आपकी यही गलती है हर बात को किसी अंधविश्वास से मिलाने लगते हैं। अब भले कोई मुझे गाली दे या मेरी बढ़ाई करने की बात मूर्खता होगी। कोई अब भी मुझे अपना कारोबार बना सकता है मगर ऐसा कर मुझसे बच नहीं सकता है। मुझे किसी ईश्वर ने नहीं भेजा बनाया ये यहीं के दुनिया वालों की देन है। कितने नासमझ इंसान हैं विनाश के हथियार बनाने पर अपनी ताकत दिखलाने पर धन समय ऊर्जा संसाधन बर्बाद करते रहे और चांद से लेकर मंगल तक की बात की मगर वास्तविक मानवता का मंगल और उजाले की चिंता ही नहीं की अन्यथा कुदरत ने इतना सब दिया था जिस से दुनिया में सभी की सब ज़रूरत पूरी की जा सकती थी। अभी भी जाने कितने देश और लोग विचार कर रहे हैं कि हम बच गए तो मेरा उपयोग धंधा बढ़ाने में करना है। ये आपकी दुनिया खुद ही मौत की सौदागर है मौत को इतना बड़ा कारोबार बना दिया है। आदमी की ज़िंदगी की कीमत समझते कहां हैं , ये जिन्होंने देश दुनिया को इंसान के लिए सुरक्षित बनाने का काम करना था उन्हीं लोगों ने इंसानियत और कुदरत से खिलवाड़ किया है और नतीजा सामने है।

        मैं इनको क्या सिखला सकता हूं जब गांधी नानक कबीर और तमाम महान आत्माओं को इन्होने दिखावे और आडंबर का माध्यम बना लिया है उनकी विचारधारा की धज्जियां उड़ाई हैं। गांधी जी की सादगी और नानक कबीर जैसे संतों की क्या गीता रामायण तक को समझने नहीं अपने अपने हित साधने स्वार्थ पूरे करने को दुरूपयोग किया जाता रहा है। पाप अधर्म का फल कड़वा ही होना था मगर लोग भूल गए हैं कि ऊपर वाले की लाठी आवाज़ नहीं करती। अपने बबूल बोये हैं तो कांटें भी मिलने हैं आम कैसे मिलते। अभी भी सही मार्ग पर चलकर अपने इंसानों की स्वास्थ्य शिक्षा और सभी की बुनियादी ज़रूरतों को ध्यान रखते हुए धन संसाधनों का सदुपयोग करें। अस्पताल स्कूल शिक्षा के मंदिर विद्यालय निर्मित करें सच्चा धर्म और ईश्वर की अर्चना दीन दुखियों के दर्द दूर करने को कहते हैं। समाज को अपनी मानसिकता को स्वस्थ बना लेंगे तो किसी भी अनहोनी से घबराने की ज़रूरत नहीं होगी। रोग पाप अन्याय से लड़ने को सत्य और ईमानदारी के मार्ग पर निस्वार्थ कर्म करने की ज़रूरत होती है। खाली बातों से कुछ भी हासिल नहीं होता है। जब तक ज़िंदगी है ज़िंदादिली से जीना सीखो मरना होगा तो मर ही जाना है। कुछ गीत कुछ बोल जीवन के आखिर में दोहराता हूं।

      जीने का अगर अंदाज़ आए तो बड़ी हंसी है ये ज़िंदगी , मरने के लिए जीना है अगर तो कुछ भी नहीं है ये ज़िंदगी। अभी तो जीने का हौंसला कर लें जब आएगी मौत तो उसका भी स्वागत करेंगे। घबराने की कोई बात नहीं है इस दुनिया में कोई बचकर नहीं रहा। सब चले गए हमको भी जाना ही है। मौत से डर डर कर जीये तो जीये क्या ख़ाक। अब जीने सीख लें हम सभी मौत से सामना करने से पहले। मौत है इक लफ्ज़ ए बेमानी , जिसको मारा हयात ने मारा।  शायर कहता है गलत तो नहीं है। हमने जीना सीखा ही नहीं। सोचो कितने उपदेश देते रहे हर किसी को अनमोल वचन संदेश भेजते रहे। बस फिर से उनको याद करें और समझें तो बात आसान हो जाएगी।

                  अपने लिए जिए तो क्या जिए तू जी ऐ दिल ज़माने के लिए।
                   बुझते दिए जलाने के लिए तू जी ऐ दिल ज़माने के लिए।

    अब छोड़ो ये लफड़ा कब कौन कैसे उठेगा। सफर फिल्म का डायलॉग है हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ है कब कौन कैसे उठेगा कोई नहीं जानता। जीना सार्थक है अगर कुछ भी अच्छा कर जाओ। बीती जो बेकार थी जितनी बाक़ी है उसको कुछ अच्छा करने में लगाएं तो ज़िंदगी का मकसद होगा। सौ साल जीना ज़रूरी नहीं है जितना भी है उसको भरपूर जीना है तो अपने नहीं औरों के लिए जिओ।

मार्च 23, 2020

POST : 1251 अब तो जागो भारतवासियो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   अब तो जागो भारतवासियो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 


ये आलोचना की बात नहीं है आत्मावलोकन की घड़ी है। जब अन्य देश भयानक स्वास्थ्य समस्या से मुकाबला करने को नये अस्पताल बनाने  और उपचार के ढंग और खोज जांच की बात करते हैं हमारे देश का सबसे बड़ा अस्पताल अपनी ओ पी डी बंद करने का निर्णय करता है। बड़े बड़े दावे खोखले साबित हुए हैं तमाम सरकारों के आम नागरिक को उचित स्वास्थ्य सेवाओं के उपलब्ध करवाने के। पिछले कई सालों से हर सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी ज़रूरी बुनियादी साहूलियत को निजि नर्सिंग होम या बड़े बड़े अस्पतालों के भरोसे छोड़ दिया है जो कम से कम देश की आधी आबादी के लिए असंभव है बेतहाशा खर्च कर हासिल करना।

हमने भी पुरानी चली आ रही धार्मिक निशुल्क चिकित्सालय या स्कूल बनाने को छोड़ अन्य तरह से धार्मिक आयोजनों पर पैसा खर्च करने का काम किया है। बड़े बड़े उद्योगपति भी अब अस्पताल या स्कूल कॉलेज गरीब नागरिकों के लिए नहीं बनाते अगर बनाते हैं तो किसी कारोबार की तरह। सबसे आपत्तिजनक बात है देश की जनता का धन और संसाधन हर देश की सरकार और राज्यों की सरकारों ने व्यर्थ के आयोजनों और अपनी महत्वांक्षाओं की पूर्ति और आडंबर अपनी शोहरत गुणगान करने पर बर्बाद कर मानवता के विरुद्ध इक अपराध किया है। जैसे हर दिन इक इक राजनेता और आलाधिकारी से तमाम पदों पर बैठे लोगों ने अपने सुख सुविधा और ऐशो आराम पर लाखों करोड़ों बर्बाद करने को अपना अधिकार समझ लिया है इस गरीबी भूख से पीड़ित देश में देशसेवा के नाम पर लूट ही है।

इनके देश विदेश के अनावश्यक सैर सपाटे और सांसदों विधायकों को मिलने वाली लाखों की राशि देख लगता है जैसे सरकार और अधिकारी वर्ग सफेद हाथी की तरह हैं। टीवी मीडिया जो कहने को बड़ी बड़ी बातें करते हैं वास्तव में देश में चलते आये सबसे बड़े घोटाले के भागीदार हैं। सरकारी विज्ञापन के नाम पर हर दिन करोड़ों रूपये ऐसे विज्ञापनों पर सरकार के तमाम विभाग खर्च नहीं फज़ूल उड़ाने का काम करते हैं।
काश ये सारा धन स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने पर खर्च किया जाता तो आज हम इस कदर बेबस नहीं होते। आज हम सभी को घर पर रहने को कहने वाले खुद किसी राज्य में अपनी सरकार बनाने को जमा होने वाले हैं। ऐसे में उनसे संवेदशीलता की उम्मीद क्या की जाए।

हम सभी को मिलकर भविष्य में अन्य धार्मिक कर्मकांड या आयोजन की जगह सार्वजनिक स्वस्थ्य सेवाओं और शिक्षा की तरफ ध्यान देना चाहिए। किसी धार्मिक स्थल पर चढ़ावे की जगह अपना वही धन अच्छे उदेश्य की खातिर देने का चलन फिर से शुरू करना चाहिए। 
 

 

मार्च 22, 2020

POST : 1250 हादिसों की अब आदत हो गई है ( हाल-ए-गुलिसतां ) डॉ लोक सेतिया

   हादिसों की अब आदत हो गई है ( हाल-ए-गुलिसतां ) 

                                     डॉ लोक सेतिया  

 सच से भागना संभव नहीं है भले आपको सच सुनना अच्छा नहीं लगता है। जब कोई मुसीबत सामने खड़ी हुई तब समझ नहीं आया सामना कैसे करें। अब लोग या तो उपदेश देते हैं ये करना ज़रूरी है या फिर अपनी मूर्खता का सबूत देते हुए चुटकले बनाते हैं। गंभीर समस्या पर गंभीरता से चिंतन नहीं करते हम लोग। चलो जो हुआ अब कोई सबक तो समझ सकते हैं क्योंकि हर घटना आपको सबक सिखाती है। सरकार ने कहा लोग घर से बाहर नहीं जाएं अपना बचाव सबका बचाव करना है , चलो माना ये करने से कुछ तो बचाव शायद मुमकिन हो मगर कितना और कब तक कोई नहीं जानता। आधुनिक उपचार निदान के समय हम ये कहां खड़े हैं। मगर सवाल करना लगता है आलोचना है जबकि कमियां निकालना और वास्तविकता से नज़र मिलाने की बात करना दो अलग बातें हैं। 

विचार करो क्या सबक मिल रहा है। सच ये है कि चांद पर जाने एटम बंब बनाने सबसे ऊंची मूर्ति बनाने की बातें करने वाली सरकार ने देश की वास्तविक समस्याओं की अनदेखी की है उपचार क्या जांच की भी सुविधा उपलब्ध नहीं है। जब समस्या खड़ी तब उपाय सूझता नहीं तब शोर मचाने जैसे काम किये जाते हैं। अभी खबर दिन भर सुनते रहे किसी फ़िल्मी गायिका की लापारवाही के आचरण की और हर कोई उसको दोष देता रहा मगर क्या हम सब भी अपना फ़र्ज़ निभाते हैं जब भी कोई बात हो अपने बारे सच जाकर बताते हैं और अपने कारोबार को छोड़कर सबकी भलाई की बात करते हैं। वास्तव में अधिकतर लोग यही किया करते हैं सच बताने से घबराते हैं। कितने लोग जब पता चला जांच करवाने की जगह शहर छोड़ भाग गए। 

इक और बात समझना ज़रूरी है। भगवान को लेकर कोई गलतफ़हमी मत रखना सब कुछ उसकी इच्छा से नहीं होता है हमने अपनी दुनिया को कितना बर्बाद किया है और जो जो भी अनुचित करते हैं उसका दोष किसी और पर नहीं दिया जा सकता है। अपने मतलब स्वार्थ को अंधे होकर हम कितना खिलवाड़ कुदरत से करते हैं। अब जब मंदिर मस्जिद धार्मिक स्थल वाले उनको बंद कर रहे हैं तब भी आपको समझ नहीं आया कि इन जगह वास्तव में कोई भगवान आपको क्या खुद को भी नहीं बचाने वाला। विश्वास के नाम पर आपकी भावनाओं का दोहन किया जाता है , कितना अंबार धन आदि जमा करना धर्म उचित ठहराता है , कदापि नहीं। यही जन कल्याण पर खर्च करते तो सच्चा धर्म हो सकता था। 

टीवी चैनल वाले खुद अपने पर कोई नियम नहीं मानते हैं। विज्ञापन के जाल में आपको फंसाते हैं अपनी पीठ थपथपाते हैं जबकि अपना कर्तव्य नहीं बिभाते निष्पक्षता से और टीआरपी और कमाई की खातिर अंधे हुए हुए हैं। राजनेताओं को अपने आप पर रोज़ लाखों करोड़ ऐशो आराम पर खर्च करते लज्जा नहीं आती है। हर दिन बेशर्मी से कोई कहता है देश जनता की सेवा नहीं कर सकता बिना संसद या कोई पद मिले इसलिए इस दल से उस दल में जा रहा हूं , क्या ऐसे स्वार्थी मतलबी लोग किसी की भलाई कर सकते हैं। और राजनीति के इस हम्माम में सभी नंगे हैं। टीवी चैनल वाले आज भी उसी से करोना पर चर्चा कर रहे हैं जिसका अनुभव केवल सब कुछ बेचकर मुनाफा कमाकर भी महानता का दावा करना है। उसकी शिक्षा जानकारी से नहीं इन को मतलब है उसके विज्ञापन से मिलने वाली राशि से। मामला चोर चोर मौसेरे भाई वाला है। हद है कि ये भी उसको अवसर लगता है अपने धंधे को लेकर। 

ध्यान से देखें तो पिछले सालों में धर्म राजनीती और खबर वालों टीवी अख़बार वालों का नैतिक पतन सबसे बढ़कर हुआ है। राजनेताओं की कठपुतलियां बनकर अधिकारी और अन्य संस्थानों में नियुक्त लोग देश से धोखा करते हुए शर्मसार नहीं हैं। ये सब अपना कर्तव्य नहीं समझते निभाने की तो बात क्या करें मगर आपको आम नागरिक को आदेश उपदेश देते हैं और फिर भी उनकी नहीं मानो तो कानून की लाठी न्याय नहीं अत्याचार करने को तैयार है व्याकुल है। 

कल ये भी बीत जाएगा और सब सामान्य हो जाएगा मगर क्या हम इन से कोई सबक भविष्य को बेहतर बनाने को लेते हैं या नहीं ये हम पर निर्भर है। 

 

POST : 1249 पिंजरा कैद बंधन और हम ( समाज और सुरक्षा ) डॉ लोक सेतिया

  पिंजरा कैद बंधन और हम ( समाज और सुरक्षा ) डॉ लोक सेतिया 

पहले कुछ गीत याद करते हैं । पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय । चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना । पंछी से छुड़ा कर उसका घर तुम अपने घर में ले आये , ये प्यार का पिंजरा मन भाया हम जी भर के मुस्काए , जब प्यार हुए इस पिंजरे से तुम कहने लगे आज़ाद रहो । हम कैसे भुलाएं प्यार तेरा तुम अपनी ज़ुबां से ये तो कहो । तोड़ के पिंजरा इक दिन पंछी तो उड़ जाना है । कोई गिनती नहीं है और ये भी सच है हम सभी खुद अपने बनाए पिंजरे में बंद हैं निकलते ही नहीं अपनी कैद से । मेरी इक कविता है । 

कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

कब से जाने बंद हूं
एक कैद में मैं
छटपटा रहा हूँ
रिहाई के लिये।

रोक लेता है हर बार मुझे 
एक अनजाना सा डर
लगता है कि जैसे 
इक  सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये।

मगर जीने के लिए
निकलना ही होगा
कभी न कभी किसी तरह
अपनी कैद से मुझको।

कर पाता नहीं
लाख चाह कर भी
बाहर निकलने का
कोई भी मैं जतन ।

देखता रहता हूं 
मैं केवल सपने
कि आएगा कभी मसीहा
कोई मुझे मुक्त कराने  ,
खुद अपनी ही कैद से।



आज हमने किसी के कहने पर खुद को घर में कैद रखना चुना है। सुरक्षा की खातिर। सच तो ये भी है कि शायद भगवान भी चाहता होगा इंसान की बनाई ऊंची ऊंची इमारतों की कैद से मुक्त होना। ये जाने कैसे आस्तिक उसको मानने वाले हैं जिन्होंने उसे भी अपने तालों में कैदी बना रखा है। कितना बड़ा मज़ाक है जिसके लिए भरोसा है सबको दुनिया को बनाया है मिटाता है उसको आपके सहारे की ज़रूरत है घर बनवाने को रहने को। भगवान को दाता नहीं बेबस भिखारी बना दिया है। कब किसी भी धर्म के ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु यीशु मसीह ने कहा मुझे आलीशान महल चाहिए चढ़ावे में पैसा हीरे मोती जवाहरात चाहिए , शानदार पोशाक चाहिए।

अभी भी आपको धर्म भगवान के नाम पर कुछ करना है तो समझो वास्तविक सच्चा धर्म क्या चाहेगा। किसी भूखे को खाना किसी गरीब को आसरा किसी बेघर को घर रोगियों के लिए अस्पताल बच्चों के लिए स्कूल कॉलेज और उनको वास्तविक जीवन का ज्ञान देना। अंधविश्वास और भेदभाव का अंत करने का संकल्प। अब ये भी समझ लेना चाहिए कि क्या करना अधर्म है। अपना काम ईमानदारी से नहीं करना अधर्म है। शिक्षा स्वास्थ्य जनसेवा राजनीति निजी कारोबार को बेतहाशा धन कमाने का साधन बनाना भी अधर्म है। व्यौपार और लूट में यही अंतर है सही कारोबार उतना मुनाफा लेना जिस से आपका गुज़र बसर हो सके को कहते हैं मगर अपने लिए तमाम साधन और सुख सुविधाओं को हासिल करने को व्यवसाय में मनमाने ढंग से और उचित अनुचित की परवाह नहीं करते हुए धन कमाना अधर्म है। धर्म सबको सब कुछ मिलने का मार्ग है जब लोग अपने पास बहुत अधिक जमा करते हैं तब धर्म की बात कहना आडंबर भी है और छल कपट अधर्म भी।

इक तरफ मानते हैं जीना झूठ है मरना शाश्वत सत्य है दूसरी तरफ जीने को इतना सामान जमा करते हैं जैसे सब सुख साथ लेकर जाना है। विचार करें तो लगता है हम भगवान को धोखा देते हैं ये समझते हैं कि चाहे कुछ भी करते हैं पूजा अर्चना ईबादत और स्तुति चढ़ावे से उसको बहला लेंगे। ये समझदारी है या अज्ञानता है शायद इस से अच्छा होता हम ईश्वर को नहीं मानते नास्तिक ही होते मगर इंसान और इंसानियत को समझते। वास्तविकता में हम जिस पिंजरे में बंद हैं और खुद ही कैदी बने हैं वो पिंजरा है हमारे स्वार्थों और खुदगर्ज़ी के जाल का बुना हुआ पिंजरा। उसे तोडना है और फैंकना है किसी गहरी खाई में इस कथा के अनुसार।

                साधु और पिंजरे में बंद पक्षी ( बोध कथा )

 पहाड़ों पर सैर करते इक साधु को घाटी में कहीं दूर से आवाज़ सुनाई दी मुझे आज़ाद करो। ढूंढते हुए उसको इक पक्षी पिंजरे में बैठा ऐसा कहता मिला। मगर पिंजरा तो खुला था बंद नहीं फिर भी साधु ने भीतर हाथ डालकर उसको बाहर निकाला और आसमान में उड़ने को छोड़ दिया। अगली सुबह फिर साधु को वही आवाज़ सुनाई दी और जाकर देखा तो पाया कि पक्षी वापस उसी पिंजरे में चला आया है। उसकी आदत बन गई थी आज़ाद होने को कहना मगर खुद ही कैद होकर रहना। अब साधु ने उस पक्षी को निकाला उड़ाया और फिर उस पिंजरे को उठाकर बहते पानी में गहराई में फेंक दिया। इस तरह उसके लिए पिंजरा ही नहीं रहा वापस आने को। लेकिन आजकल जो संत साधु मिलते हैं उनके पास हमारे लिए पिंजरे हैं वो कभी हमें सही दिशा नहीं समझाने वाले। अपने विवेक से हमने ही अपने आप को स्वार्थ और खुदगर्ज़ी के पिंजरे से मुक्त करना है। घर बैठे चिंतन कर सकते हैं क्योंकि जब आपको बाहर नहीं जाना तभी अपने भीतर जाने का समय होता है । 

 

मार्च 05, 2020

POST : 1248 महिला दिवस पर इक नारी की बात ( विचारणीय ) डॉ लोक सेतिया

महिला दिवस पर इक नारी की बात ( विचारणीय ) डॉ लोक सेतिया 

मुझे पिता से पति से बराबरी करने की ज़रूरत नहीं है । जैसे कोई नदी अपने दो तटबंधों के बीच बहती है और अपने आस पास की दुनिया को बनाती संवारती रहती है । तटबंध उसको रोकते नहीं आगे बढ़ने से बांधे रखते हैं पानी को किनारे तोड़ कर बाढ़ होने नहीं देते । आधुनिक महिला को अपना बदन ढकना उचित नहीं लगता है क्योंकि उसको नहीं मालूम उसकी नग्नता जिनको पसंद है उनकी नज़र में महिला कोई इंसान नहीं इक सामान है नुमाईश का औरों के दिल बहलाने को सजना और अपने खुद के लिए संवरना दो अलग बातें हैं । महिला कम नहीं किसी से नासमझ भी नहीं है फिर भी जो किसी को चाहता है उस पुरुष भाई पिता पति या कोई दोस्त भी सखी भी हो सकती है अगर देश समाज की कड़वी वास्तविकता को जानकर किसी को उसी की सुरक्षा की खातिर संभलने को कहता है तो ये समझना किसी को क्या अधिकार है आदेश उपदेश देने का तो विचार करना होगा अपना अहम बड़ा है कि सुरक्षा और आदर की खातिर सलाह पर ध्यान देना । 

जैसे महिलाओं की भावनाओं को महिला समझती है जिस तरह पुरुष शायद नहीं ठीक उसी तरह पुरुष भी अपने पुरुषवादी समाज को हमसे बेहतर जानते समझते हैं । ये हम स्वीकार करें चाहे नहीं करें नारी कोमल मन और भावनाओं से कुदरत की रची रचना है जबकि पुरुष सवभाव से कठोर और मन से काम वासना के अधीन भीतर से किसी शिकारी की तरह है और अधिकांश पुरुष अपनी घर की महिलाओं को छोड़ बाकी को बस इक औरत ही समझते हैं और हर कोई खूबसूरत महिला को हासिल करना चाहता है । महिलाओं को अपने सजने संवरने और पुरुष से महंगे उपहार की चाहत रखने ने खुद उसी को छोटा बनाया है क्योंकि हर उपहार देने वाला खुद को बड़ा और अधिकारी होने का भाव रखता है । महिला कमज़ोर नहीं होती है उसकी इच्छाएं ही उसको कमज़ोर बनाती हैं । जब महिला उम्मीद रखती है पिता भाई पुरुष उसको आगे बढ़ने को सहायक हों तब उसे स्वीकार करना होगा खुद अपने लिए समाज से समानता हासिल करना कठिन है असंभव नहीं । और वास्तव में उन्हीं महिलाओं ने अपने समाज को दिशा दिखाई है जो बिना कोई समझौता किये अपने मकसद पाने की राह पर चलती रही हैं । जो बंधन सामाजिक ताने बाने को मधुरता बनाये रखने को हैं उनको निभाना कोई खराब बात नहीं है । 

बेशक समाज की कुत्सित सोच को बदलना चाहिए मगर नारी को ये अपनी अस्मिता खोकर नहीं कायम रखते हुए करना है। अपने बेटे-बेटी को उचित समझ और शिक्षा देकर खुद अपनी न सही अपनी आगे की आने वाली पीढ़ियों को इक अच्छा और सुरक्षित समाज देने में योगदान दे सकती हैं। सिर्फ अपने लिए अधिकार और समानता हासिल करना कोई महान उद्देश्य नहीं हो सकता है। आप शिक्षित हैं स्वालंबी हैं तो उन महिलाओं को आगे बढ़ाने को साथ दे सकती हैं जिनको अपनी शक्ति और स्वाभिमान को समझना अभी बाकी है। मगर जब महिला दिवस मनाने वाली महिलाएं अपने घर या पार्टी में कामकाजी महिलाओं को अपने से कम समझती हैं और उनको भी महिला दिवस में शामिल नहीं करती उनकी बातें भाषण व्यर्थ हैं केवल आडंबर हैं। क्या इस 8 मार्च को अपनी महिला कर्मचारी को छुट्टी देकर महिला दिवस की शुरुआत कर सकती हैं। 
 

 

मार्च 03, 2020

POST : 1247 लौट के आना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                लौट के आना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 हम छोड़ चले हैं सोशल मीडिया को याद आये कभी हंसते हंसते रो लेना , जनाब आली हज़ूर आपको कोई रोक नहीं सकता है । आपने  ठान लिया जो भी कर के रहते हैं । सबको समझ आ गया है । आपको आपकी पत्नी नहीं रोक सकी थी और किसी का शासन आप पर क्या चलेगा । जाना है ख़ुशी से जाओ और भी ग़म हैं ज़माने में सोशल मीडिया ट्विटर फेसबुक इंस्टाग्राम व्हाट्सएप्प के सिवा । आपको जितना फायदा मिलना था मिल गया अब लगता है शायद नुकसान होता दिखाई दिया होगा । फिर भी बड़ी चहल पहल रौनक थी जाने कितने लोग तो आपने ही रख छोड़े थे गुणगान को उनको ये कमी खलनी लाज़मी है जब आप नहीं रहोगे सोशल मीडिया पर देखने को तब उनको कुछ भी पोस्ट करना किसी काम का नहीं लगेगा । अब अपने अपने दल या पद छोड़ने की बात कही होती तो चाटुकार लोगों को अवसर मिलता आपके समर्थन में भीड़ लेकर नारे लगाकर अपने नंबर बढ़ाने को । आपके दल के शासन वाले राज्यों से लोग आते आपको मनाने मगर जिनका ऐसा ख्वाब है कभी नहीं सच होने वाला । भला कुर्सी से कोई नेता कभी तंग आता है वास्तव में तो आपका ही करिश्मा है जो बड़े पद पर रहते इतना सोशल मीडिया पर रह सकते हैं । 

साफ बात तो ये है कि मुझे भी और तमाम लोगों को ये व्यर्थ की ऊर्जा और वक़्त की बर्बादी के इलावा कुछ भी नहीं है । मगर ये ऐसा नामुराद रोग है जिसका कोई उपचार नहीं आशिक़ी की तरह दर्द बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की । आपको इस से छुटकारा मिले तो लोग दोबारा कहेंगे आप हैं तो सब मुमकिन है । फिर भी मुझ जैसे जो आपके अथवा किसी के भी समर्थक या चाहने वाले नहीं हैं चाहेंगे आपके दर्शन सोशल मीडिया पर होते रहें तो खूब चर्चा को विषय उपलब्ध होते रहें । सत्ता का विरोध करने वाले लोगों को ऐसे आपका छोड़ कर जाना जैसे कुछ खालीपन दे जाएगा । ये मत समझना वास्तव में ऐसा करने से किसी को कोई फर्क पड़ेगा कुछ भी नहीं अंतर होता कोई रहता है या छोड़ जाता है बेचैनी उसी को होती है जो छोड़ता है मगर चैन नहीं आता जिस की आदत थी उसके बगैर । 
 
 AI Monitoring system to control fake news on social media platforms  facebook instagram x and more | सोशल मीडिया चलाने वाले हो जाएं सावधान! अब  अफवाह फैलाते ही उठा ले जाएगी पुलिस,


मार्च 02, 2020

POST : 1246 इस युग के शिक्षक फेसबुक व्हाट्सएप्प ( होली है ) डॉ लोक सेतिया

 इस युग के शिक्षक फेसबुक व्हाट्सएप्प ( होली है ) डॉ लोक सेतिया 

कथा का सार इतना है बिना देखे मिले अपनापन और दोस्ती संदेश से अचानक संबंध तोड़ने दरवाज़ा बंद करने अर्थात व्हाट्सएप्प फेसबुक मैसेंजर पर ब्लॉक करने तक का सफर। इन सब में छिपी हुई है अहंकार की भावना जो विचार विर्मश और आपस में शिष्ट वार्तालाप को जंग के अखाड़े में बदल देती है। अब कुछ घटनाओं की अनुभव की बात बिना किसी को दोष देते हुए कहना चाहता हूं। 

व्हाट्सएप्प ग्रुप में पहचान हुई संदेश आदान प्रदान के बाद व्हाट्सएप्प कॉल पर कहने लगे मिलना चाहिए। अगले दिन संदेश भेजा अगर समय है तो पास पार्क में मिलते हैं मगर जवाब नहीं मिला पता नहीं संदेश को बिना पढ़े ही डिलीट किया हो खैर। इक वीडियो भेजा जिस में साफ नहीं था कौन हैं और कब की बात है संदेश भेजा आपको पता है तो जानकारी देने का कार्य करें अच्छा होगा। कोई जवाब नहीं दिया ये भी नहीं बताया पता है या नहीं है। कल इक वीडियो आया तो लिखा जब तक सब जानकारी नहीं होती यकीन नहीं होता आपके भेजे वीडियो को फॉरवर्ड नहीं कर सकूंगा। नोटेड। संदेश इक शब्द का और ब्लॉक्ड। अब कौन उनको किस तरह समझाए कि जीवन भर लिखने से पहले सच को समझना पहचाना है अब कोई बात शेयर करने से पहले विचार करना होता है कि हज़ारों चाहने वाले पढ़ने वालों को भरोसा है ये ध्यान रखना महत्वपूर्ण होता है। हम लोग सोशल मीडिया पर रिश्ते बनाते हैं और उनको आपसी विश्वास के धागे से नहीं पिरोते हैं बड़ी कच्ची डोरी है ये आधुनिक इंटनेट और सॉफ्टवेयर ऐप्प्स वाली छूट जाती है बिखर जाती है। हम जानते हैं समझते नहीं पहचानना तो दूर की बात है। 

इक और सज्जन हैं सब जानते हैं समझाते हैं सबक सिखलाते हैं। बस अपनी बात से असहमत नहीं होने देते अन्यथा अंदाज़ बदल जाता है। कई संदेश कई वीडियो भेजते रहे अपने किसी गुरु के संबोधन वाले। मगर जब कोई गुरु अपने अनुयाइयों को अपने धर्म की अच्छी बातें समझाने उन पर अमल करने की सही दिशा दिखलाने की बात छोड़ इस पर उपदेश देने लगता है कि किसी और धर्म की क्या क्या बुराई है क्या खराब बात है कैसी शिक्षा देते हैं तब सोचना पड़ता है क्या आपके पास खुद अपने धर्म की अच्छाई बताने को कुछ नहीं जो उनकी बुराई बताकर अपने को अच्छा साबित करना पड़ रहा है। ऐसे बहुत लोग हैं जो व्यर्थ की सोशल मीडिया की बहस में आपसी नाते रिश्ते बर्बाद करने लगते हैं। 

मुझे हैरानी नहीं खेद हुआ जब देखा अपने करीबी किसी के बच्चे बड़े छोटे से वार्तालाप करने की मर्यादा की सीमा लांघ जाते हैं केवल किसी नेता के समर्थन या राजनीति की विचारधारा के मतभेद के कारण। उनका जन्म नहीं हुआ था जब से मैंने तमाम सरकारों नेताओं की आलोचना की है जनहित की खातिर मगर अपने देश की ऐतहासिक घटनाओं से अनजान ये चार किताबें पढ़ खुद को सब समझने जानने वाला कहते हैं। उनको बस वही मालूम है जो जोड़ तोड़ कर कुछ मतलबी लोगों ने अपने स्वार्थ की खातिर समझाया है। अब जब ऐसे लोगों की नफरतों का अंजाम सामने है तब भी क्या हम उनकी चालों को बांटने की राजनीति को समझ नहीं सकते। अब तो इन सब का अंत होना ही चाहिए। 
 

 

मार्च 01, 2020

POST: 1245 सामाजिक सरोकार एवं कलाजगत का संगम ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   सामाजिक सरोकार एवं कलाजगत का संगम ( आलेख ) 

   ( रौनक एंड जस्सी नाटक और पापुलेशन फाउंडेशन संस्था की बात )   डॉ लोक सेतिया 

कल शाम इन दोनों का संगम देखने का अवसर मिला दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में। जेआरडी टाटा से सामाजिक संस्था की शुरआत पचास साल पहले की गई थी जिस में रत्न टाटा आज की सभा के विशेष वक्ता और शामिल महमान थे। अभी दिल्ली के दंगों में मरने वाले लोगों और घायलों पीड़ितों की खातिर थोड़ा मौन रखकर दुआ मांगी गई देश की शांति की कामना के साथ। रत्न टाटा जी का उद्बोधन जैसा उम्मीद थी देश की शिक्षा गरीबी रोज़गार स्वास्थ्य की समस्याओं को लेकर था और उनके परिवारिक उद्योगपति टाटा संस्थान की देश जन सेवाओं की बात थी। इस सभा में कोई दो हज़ार लोग अधिकांश दिल्ली और देश के जाने माने ख़ास वर्ग से बुलाये गए थे। दो लोग डॉ रानी बांग और डॉ अभय बांग खास थे जिनको उल्लेखनीय सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। डॉ रानी बांग जी ने अपनी बात की शुरुआत ही दिल्ली दंगे पीड़ित लोगों के दर्द से की ये भी बताया कि जिस ग्रामीण महारष्ट्र के भाग से उन्होंने अपनी जनता के स्वास्थ्य और महिलाओं को सक्षम बनाने के कार्य से की थी वो ऐसी ही दशा से बदहाल था। यहां इक विसंगती पर्दे के पीछे छिपी भी वास्तव में सामने थी की आज़ादी के सतर साल बाद सरकार और समाजिक संगठनों संस्थाओं के तमाम दावों के बाद भी दूर दराज गांव जंगल जैसी हालत खुद देश की राजधानी दिल्ली में है। मगर शायद इस को सोचने समझने की कोशिश तो क्या ज़रूरत भी ये तमाम लोग नहीं समझते हैं कि हमने इतने साल में क्या हासिल किया क्या खोया है क्योंकि हम असलियत से नज़रें मिलाते हुए घबराते हैं कि जब दुनिया इतना आगे बढ़ चुकी है हम तथाकथित उच्च वर्ग अभिजात वर्ग उद्योगपति धनवान और शानदार ढंग से जीवन बिताने वाले आत्ममुग्ध हैं और अपने स्वार्थ अपनी शोहरत अपनी विलासिता को पाकर गर्व की बात करते हैं। गांधी जैसे लोग हमारे लिए वास्तविक ज़िंदगी में आचरण में कोई जगह नहीं रखते केवल देशभक्ति और आदर्शवादी भाषण देने को किसी मुखौटे की तरह हैं। बेशक डॉ रानी बांग और डॉ अभय बांग दोनों ने जीवन भर कड़ी लगन से सराहनीय कार्य किया है। मगर जब हम उनको आदर देते हुए तालियां बजाते हैं तो क्या हमने सोचा है अभी तक अपने लिए ही बहुत किया क्या अब भी वास्तविक कार्य उनकी राह पर चलकर करने की कोई भावना है। और नहीं है तो हम आडंबर करते हैं औरों से चाहते हैं अच्छे कार्य करें खुद विलासिता ऐशो आराम की चाहत को छोड़ नहीं सकते हैं। कहने का अर्थ ये है कि हम दोगले मापदंड अपनाने वाले लोगों का समाज हैं। रानी बांग के बाद डॉ अभय  बांग जी ने अपनी बात कहते हुए आज के समय की चर्चा आपत्काल लगाने के समय की घटना से की और बताया कि तब इंदिरा गांधी बेहद ताकतवर थी और सत्ता के मद में मनमानी करते हुए संविधान को नागरिक अधिकारों को कुचलती थी तब उनके वकील रहे नानी पालकीवाला ने उनके लिए वकील होने से अपना इस्तीफ़ा देते हुए उनको खत लिखा था। क्या आज कोई वकील इस समय वही सब करने वाले सत्ताधारी नेता से कह सकता है। 

    मैं सोचता हूं इस सभा के इस पहले इक घंटे के आयोजन को लेकर उस सभा में उपस्थित दो हज़ार लोगों में से बाद में क्या सोच भी रहे होंगे या फिर याद भी करेंगे या अधिकांश को बाद के दो घंटे के शानदार संगीत नाटिका का अवलोकन करने का मनोरंजन का आनंद का अनुभव ही महत्वपूर्ण लगता होगा। अब बाद के कला संगीत नाटक के शानदार आयोजन की चर्चा आगे करते हैं।

                  रौनक एंड जस्सी संगीत नृत्य नाटक ( बुक माय शो )

कहने को इश्क़ मुहब्बत प्यार ही लैला मजनू हीर रांझा रोमियो जूलियट जैसी कहानी पंजाब की ज़मीन से ताल्लुक रखती हुई। मगर जिस तरह से पंजाबी के उन गीतों को पिरोया गया है जो अब पंजाब ही नहीं भारत भर बल्कि विदेशी चाहने वालों की भी ज़ुबान से रूह तलक रचे बसे हुए हैं। शुरुआत की दमा दम मस्त कलंदर से और बेहद मधुर स्वर में नृत्य के साथ तालमेल बनाते कहानी की बुनावट को रचते हुए लोकगीतों का आनंद बढ़ाते हैं और दर्शकों को जोड़ने में सफल रहते हैं। नायक नायिका नायक के दोस्तों और नायक के सहायक मामाजी और नायिका की सहायिका दाई मां सभी का अभिनय किरदार को जीवंत बना देता है। दिल्ली से पहले मुंबई में धूम मचा चुका है। बेहद शानदार भव्य और दर्शनीय है ये संगीत नाटक हमेशा यादगार बनने के लिए उपयुक्त होगा।