जनवरी 24, 2020

POST : 1238 फिर इक रावण का सीता हरण ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     फिर इक रावण का सीता हरण ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

       राम और रावण दो किरदार हैं समय समय पर इंसान किरदार बदलता रहता है । उन के भीतर हमेशा से इक ऐसा इंसान छुपा हुआ था जो महिला को अपनी बनाकर छोड़ना अपना अधिकार समझता है । उसने कभी अच्छे होने का किरदार निभाना नहीं चाहा मगर कोई नहीं जानता वो देखने को असली चेहरा रखता है वास्तव में किसी और का मुखौटा है जैसे कठपुतली नाचती है ऊपर किसी के हाथ में पकड़े धागे के इशारे पर उसे भले होने का किरदार अनचाहे निभाना पड़ा है । अभिनेता की तरह निर्देशक की हर बात को स्वीकार करना उसकी नियति है । आखिर अब उसने जो चाहा करने की अनुमति मिल गई है और उसको नाच नचवाने वाले ने उसे नायक नहीं खलनायक बनाने की बात मान कर उसे खुली छूट दे दी है अपना किरदार खुद लिखने और दिल में छुपे सभी अरमान जी भर पूरे करने को डायलॉग क्या कथा तक अपनी इच्छा से लिखवाने की । कब से उसकी हसरत थी सीता रुपी जनता का हरण करने की और इस के लिए अब और इंतज़ार भी उसको नहीं करना तभी उसने शुरुआत ही उसी अध्याय से करने का निर्णय कर लिया है । जनता बेचारी हमेशा से कैद रही है सुरक्षा के नाम पर सत्ता की बनाई परिधि के भीतर । और हर युग में रावण को खुली छूट मिली होती है छलने को भेस बदलने से लेकर अहंकार पूर्वक नारी को हरने की राम से बदला लेने की खातिर । पुरुषों की कायरता ढकी रहती है हर हाल में रावण बनकर सीता हरण करने पर भी और राम होकर सीता से अग्नि परीक्षा लेने पर भी । अपनी पत्नी को असुक्षित अकेली छोड़ने की बात कोई नहीं पूछता महिला उद्धार की कथा सुन ताली बजाते हैं सभी । 

        कलयुग के समय भी कोई देश की जनता को छलने साधु बनकर मधुर भाषा और सुनहरे सपने दिखा सत्ता की वरमाला डलवा कर असली रंग ढंग में सामने आने लगा है । सेवक बनने की बात भूल सत्ता की लाठी चलाने लगा है । आधुनिक रावण अयोध्या को लंका बनाना चाहता है अपने हाथ से आग लगाकर दुनिया को नई रौशनी दिखाना चाहता है । अपनी नाभि में अमृत कलश समझता है जिस समर्थन को वास्तव में वही उसकी सत्ता की संजीवनी को सबसे बड़ा खतरा हैं ये विभीषण भी नहीं समझा पाएगा । अब विभीषण रावण के दर की चौखट नहीं लांघ पाएगा । आधुनिक युग की रामायण कोई बाल्मीकि नहीं लिखेगा कोई तुलसी नहीं लिख सकेगा । रावण का शासन है उसकी मर्ज़ी उसकी पसंद उसकी अनुमति लेकर भाड़े पर रखे सोशल मीडिया टीवी अख़बार मिलकर लाइव सीधा मंच से सब होता जो नहीं होना चाहिए उसे भी हो रहा दिखलाने को बेताब हैं । सीता से सवाल किया जाएगा उसने रावण को पहले क्यों नहीं पहचाना उसकी गलती है जो कलयुग में मर्यादा पुरषोत्तम की चाहत भी की । सीता को विरोध किस की अनुमति नहीं मिल सकती और सत्ता के अधिकारी की हर आज्ञा का पालन करना उसका फ़र्ज़ है ।


    मगर कुछ ऐसा हो गया है जिसकी कल्पना आधुनिक रावण ने नहीं की थी । देश की जनता रुपी सीता उठ खड़ी हुई है कायरता का त्याग कर साहस के साथ । सीता ने अपनी नारी शक्ति और हर महिला की वास्तविक ताकत को पहचान लिया है और रावण को चेतावनी दे रही है कि बिना अनुमति उसको अपहरण करने की बात तो दूर उसको छूना भी चाहा तो सती अपनी शक्ति से उसको भस्म कर देगी । अपनी सुरक्षा किसी लक्ष्मण की बनाई रेखा के भरोसे नहीं खुद अपने आत्मसम्मान और स्वाभिमान के दम पर लड़कर करने को तैयार है । किरदार बदले हुए खलनायक को कहीं भीतर डर लगने लगा है पुरुष होकर अपनी छाती का नाप बताने वाले को औरत से मात खाने हारने के अपमान झेलने का । इतने साल तक उसने महिला जगत से छल किया उसको लुभावने नारे और समानता के अधिकार देने की बात कहकर बहलाता रहा है सत्ता पाने को उनकी सुरक्षा शिक्षा और आगे बढ़ने के अवसर देने की करते हुए जबकि दिल से उसने नारी को कभी आदर देने की क्या महत्व समझने का भी काम किया नहीं । मगर फिर इक बार अहंकारी का अहंकार ज़िद पर अड़ा है औरत से टकराने की एतिहासिक गलती दोहरा रहा है । उसको खबर नहीं सीता हरण के बाद की कथा क्या होगी और उस से पिछली जो कहानी नहीं दिखाई गई अभी और अगले अध्याय में फ़्लैशबैक में समझाने का विचार है उस का क्या होगा । मंदोदरी और सीता दोनों साथ मिलकर उसकी दशा वो कर सकती हैं कि अयोध्या और लंका दोनों जगह उसको अपने किरदार निभाने में कठिनाई होगी क्योंकि राम बनना अब संभव नहीं और रावण होने की कीमत जान से प्यारी सत्ता हाथ से निकलना हो सकता है ।  




                                

जनवरी 22, 2020

POST : 1237 मिलिए इनसे जन्म सफल हो जाएगा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 मिलिए इनसे जन्म सफल हो जाएगा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     ( इस कथा को सुनने-पढ़ने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती और मुक्ति मिलती है )

ये वही लोग हैं जिन्होंने कभी अपने माता पिता की बात नहीं मानी शिक्षा हासिल की किसी तरह उपाधि पाने को जानकारी पाना समझना मकसद नहीं था। नौकरी व्यवसाय कारोबार में सफल होने को अच्छे बुरे की चिंता कभी की नहीं। अपने फायदा करने को चोरी हेराफेरी छल कपट सब किया बिना कोई अपराधबोध मन में लाये हुए। गीता कुरान बाईबल रामायण सब की बात सुनी समझी किसी की भी नहीं। नानक बुद्ध तुलसी कबीर सभी संतो के नाम रट लिए उनकी वाणी को नहीं जाना समझा। खुद को आईने में नहीं देखा और अपनी बढ़ाई खुद औरों से करते रहे दुनिया को बुरा कहते समझते बतलाते रहे। जीवन भर अपने स्वार्थ पूरे करने को मनचाहे कर्म करते रहे और अपने और अपने बच्चों को जैसे भी संभव हुआ दुनिया का सुख देने का काम करते रहे। आदर्श सच्चाई नैतिकता शब्दों को लेकर कभी भूले से भी विचार नहीं किया। देश समाज में जितना भी पतन होता रहे इसकी चिंता कभी नहीं की। पैसे कमाना साधन जमा करना मौज मस्ती करना यही बस मकसद बन गया और खूब हंसे नाचे झूमे आनंद लिया। पाप अपराध के साथ कभी लड़ना नहीं चाहा और उनसे बचने की जगह साथ निभाते रहे। धर्म को समझा नहीं जाना नहीं धर्म की रह चले नहीं बस धर्म धर्म का शोर करते रहे आडंबर करते रहे जीवन भर धार्मिक होने का। कभी कोई धर्मगुरु मिल गया तो शिष्य बन गए मगर कभी नहीं देखा कि जो खुद लोभी लालची है और और जमा करता है अकूत धन सम्पति जमा करता रहता है कोई रास्ता अच्छा बुरा छोड़ता नहीं दुनियादारी का उसके उपदेश कितने सार्थक हो सकते हैं। सबको त्याग की बात कहता खुद मोह माया में फंसा उलझा हुआ है। ये लोग जीवन भर मनमानी करते रहे हैं मगर देश समाज को कभी कुछ भी योगदान नहीं दिया बल्कि जो भी जैसे गलत खराब हुआ उस में ख़ामोशी से सहयोगी बने रहे हैं। 

   जो कोई भी समाज की सच्चाई की बात करता झूठ को झूठ कहने का साहस करता वो इन लोगों को नासमझ पागल लगता था। ये हमेशा ऐसे लोगों से दोस्ती करने से बचते रहे। देश के इतिहास और समाज की पुरानी मर्यादाओं की इनकी समझ सतही रही और महान लोगों की गहरी बातों को समझना ज़रूरी नहीं लगा इनको। जिन गांधी भगतसिंह सुभाष जैसे नेताओं ने मिलकर देश की खातिर सब कुछ न्यौछावर किया उनको भी ऐसे लोगों ने अपनी मर्ज़ी और साहूलियत से बांटने की कोशिश की। महान नेताओं की महानता उनकी सादगी उनका त्याग ऐसे लोगों को पसंद नहीं आया और जिस किसी ने आडंबर बड़े बड़े झूठे दावे भाषण ही देने का कार्य किया इनको वही अपना आदर्श लगा जो बात कुछ नहीं चाहत की करता हो मगर चाहता हो सब उसी को हासिल हो और उसके लिए सही गलत की भी परवाह नहीं करता हो। बस इनको ऐसा इक नेता मिल गया जिसने पहले सभी नेताओं को खराब और खुद को मसीहा घोषित करने को हर तरीका अपनाया आज़माया। पहली बार किसी ने ऐसा वातावरण देश में बना दिया कि देशभक्त होने का अर्थ उस नेता की महिमा का गुणगान करना हो गया। जो भी देशवासी उसकी विचारधारा से सहमत नहीं उसको देश भक्त नहीं होने का आरोप झेलना पड़ गया। 

ये वही ऊपर बताये लोग हैं जिन्होंने देश समाज की रत्ती भर परवाह नहीं की थी मगर अब इक नेता की जय जयकार कर खुद को सच्चे देशभक्त बताने लगे और जो हमेशा देश की समाज की बात करते रहे उनकी देशभक्ति पर सवाल करने लगे हैं। इनके दिमागों में भाषा में आचरण में नफरत भरी पड़ी है अपने ही देश के भाई बहनों दोस्तों से लड़ने लो तैयार हैं इक नेता की आलोचना करने पर। देश का संविधान देश का कानून और वास्तविक धार्मिक सदभावना मानवता की बात इनके लिए व्यर्थ है। देश के लिए सबसे अधिक खतरा इसी आवारा भीड़ का है जैसा व्यंग्यकार परसाई जी को डर था होता लग रहा है। जाने इस कहानी को राजा नंगा है कहानी से क्या नाता हो सकता है शायद ये उस का अगला अध्याय है। अब राजा की पोशाक हर पल शानदार बेहद कीमती है चमकती हुई भी है मगर देश की अर्थव्यवस्था की बदहाली को छिपाने ढकने में फिर भी नमाम है। नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात गुरुनानक ने भगवान को लेकर कहा था ये इक आदमी को भगवान बना बैठे उसी की नाम की माला जपने लगे हैं। इन्होने अपना जीवन सफल कर लिया है और ये भी पक्की बात है जिस दिन सत्ता नहीं रही इन लोगों ने कोई दूसरा और भगवान बना लेना है क्योंकि अब इनको कोई न कोई चाहिए ईबादत करने को। चाटुकारिता की सीमा गुज़र गई गुलामी में मज़ा आने लगा है। 
 
 

 

जनवरी 18, 2020

POST : 1236 विचारहीन शिक्षित लोग ( आंखों वाले अंधे ) डॉ लोक सेतिया

  विचारहीन शिक्षित लोग ( आंखों वाले अंधे ) डॉ लोक सेतिया 

             बस इसी इक बात से समझ लो सच क्या है , आप भगवान का गुणगान अल्लाह की इबादत वाहेगुरु या जीसस की महानता को भले किसी भी कथा कहानी आरती अदि से कहते हैं कोई आपसे सवाल नहीं करेगा कि जो अपने कहा लिखा दावा किया मुमकिन है भी या केवल कपोल कल्पना है विश्वास दिलाने को। मगर जैसे ही आप किसी बात को लेकर सवाल खड़े करते हैं कि ये सही नहीं हो सकता है या फिर जो भी कथा कहानी में बताया उचित नहीं कहला सकता आप कटघरे में खड़े कर दिए जाओगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों ने भगवान अल्लाह जीसस वाहेगुरु को जानने समझने की बात नहीं की केवल आंखें बंद कर अंधविश्वास किया है। अन्यथा ऊपर वाले को जो सबसे शक्तिशाली है ऐसे लोगों के सहारे की बचाव को ज़रूरत नहीं हो सकती है। 

     कुछ ऐसा ही इस समय किसी नेता या दल की सरकार के समर्थक कर रहे हैं। उनकी किसी बात की भी आलोचना को सहन नहीं करते और विरोध करने वाले को कटघरे में खड़े करने लगते हैं। उनको देश की गरीबी भूख बेरोज़गारी और अर्थव्यवस्था की बदहाली से सामाजिक सदभाव की चिंता नहीं है चिंता है किसी नेता की खुद को सबसे महान कहलाने की चाह की। हज़ार झूठ ऐसे लोगों को सच लगते हैं और देश के संविधान की भावना या जनता के जनमत की उपेक्षा को अनदेखा करना उनको आपत्तिजनक नहीं लगता है। आप इनकी तुलना उस व्यक्ति से कर सकते हैं जो उसी शाख को काट रहा होता है जिस पर बैठा हुआ है।  मगर ये उच्च शिक्षा हासिल कर विलासितापूर्ण जीवन जीते लोग सोशल मीडिया और एकतरफा शोर से इकतरफ़ा जानकारी लिए गांधी नहरू को दोष देते हैं। उनको लगता है जो लोग आजकल सत्ता पर हैं वही देशभक्त हैं और उनसे पहले सभी देश को लूटते रहे। उनको विश्वास ही नहीं है कि जिस नेहरू को लेकर अपशब्द उपयोग करते हैं उन्होंने अपनी जवानी के 3259 दिन नौ बार विदेशी शासकों के ख़िलाफ़ आंदोलन करते हुए जेल में बिताये हैं इतना ही नहीं ये भी नहीं मानते कि उनके पिता एक धनवान वकील थे जो अपने बेटे को विलायत में पढ़ाई करवा रहे थे जिनको ये तथाकथित आधुनिक पढ़े लिखे सड़क छाप कोई गरीब का बेटा समझते हैं। खुद ये लोग देश समाज की खातिर कुछ करने की बात पर जवाब देते हैं इस के लिए तमाम अन्य लोग हैं। मगर जिनको ये देशभक्त मानते हैं उनके संगठन के लोग आज़ादी से पहले विदेशी शासकों के लिए सूचना देने का काम किया करते थे। इतिहास में दर्ज है उनके माफ़ीनामे भी और ये भी कि उनका आज़ादी की लड़ाई में कोई भी योगदान नहीं था।

   इक बात और है जो ये आज के शासक नेहरू और पटेल को लेकर कहते हैं उनको शायद पता नहीं है कि उन्हीं पटेल जी ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया था और उस संगठन को लेकर क्या कहा था। सबसे अजीब बात ये है कि इनको ये भी नहीं मालूम कि नेहरू जी अटल जी के बारे क्या राय रखते थे और लोहिया से लेकर तमाम विपक्षी दल के लोग क्या कहते थे। कैसे नेहरू विपक्षी नेताओं का आदर ही नहीं देते थे बल्कि उनको संसद में देखने को कोशिश करने की खातिर अपने विरुद्ध चुनाव हारने के बाद अपने दल के किसी सांसद से जगह खाली करवाते थे। नेहरू जी के निधन पर अटल जी का संसद में भाषण इन को समझ नहीं आएगा क्योंकि इनको मानवीय संवेदनाओं से मतलब नहीं है। क्या आपको पता है अटल बिहारी बाजपेयी ने खुद स्वीकार किया था कि युवा अवस्था में उन्होंने अंग्रेजी हकूमत को सूचना दी थी उन देशभक्त आज़ादी के आंदोलन करने वालों के बारे में। क्योंकि तब उनको ये समझ नहीं थी कि सरकार के विरुद्ध आंदोलन करना अपराध नहीं देशभक्ति था।

                                 नहरू का पहला चुनाव अभियान

       जब उन्हें पता चला कि उनके बाद समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण पंजाब का दौरा करने वाले हैं , तो उन्होंने श्रोताओं से कहा , मैं आपको सलाह दूंगा कि आप जाकर उन्हें सुने। कई चीज़ों में मैं शायद उनसे सहमत न हूंगा। लेकिन वह एक शानदार व्यक्ति हैं। आज कोई कल्पना कर सकता है आज के सत्ताधारी नेता से ऐसी सलाह जनता को देने की बात संभव है।

       कितने लोग जेपी के आंदोलन के बारे जानते हैं शायद ये आधुनिक सोशल मीडिया से शिक्षित लोग तो नहीं। लोकतंत्र में विरोध करना नागरिक का अधिकार है ये बात अभी कल ही दिल्ली की तीस हज़ारी अदालत की इक न्यायधीश ने कही है पुलिस के तौर तरीके पर कटाक्ष करते हुए। जीपी ने भी 25 जून 1975 को भाषण में यही बात कही थी जिस सभा में उस दिन मैं भी शामिल था सुनने वालों में। अपनी क्लिनिक बंद कर रामलीला मैदान आया हुआ था। उन्होंने कहा था पुलिस जनता की सुरक्षा को है और सुरक्षबलों को संविधान की भावना का आदर करना है और शांतिपूर्वक धरना प्रदर्शन करने पर कोई लाठीचार्ज या गोली चलाने का आदेश नहीं मानना चाहिए। जो बात उस समय इंदिरा सरकार के वक़्त कही थी जो लोग उस आंदोलन में शामिल थे और बाद में सत्ता पर रहे आपात्काल के बाद अब खुद उनकी तरह नहीं उनसे भी अधिक निरंकुश लग रहे हैं।  

  लोग आज गुमराह हैं किसी के नफरत के प्रचार से सोशल मीडिया की बातों से। समय के साथ बहुत चीज़ें बदल जाती हैं सालों बाद आपको भविष्य की तरफ कदम बढ़ाना चाहिए न कि इतिहास की बीती बातों को लेकर बहस में उलझना चाहिए। कश्मीर को लेकर तब क्या क्यों किया ये चर्चा करना उसी तरह बेकार है जैसे अयोध्या में संविधान कानून को दरकिनार कर राम मंदिर बनवाने के नाम पर ढांचा गिराना ताकि अपनी राजनीति को सत्ता पाने की सीढ़ी बनाया जा सके। अभी आपको समझ नहीं आया उन लोगों को धर्म नहीं अपनी राजनीति से मकसद है। क्या आज सत्ताधारी नेताओं को देश की जनता से अपने कार्यों की बात करनी चाहिए या फिर वास्तविक समस्याओं को भूलकर अन्य विषयों में उलझाने का काम करना चाहिए। अच्छे दिन नहीं हैं गरीबी भूख और बेरोज़गारी की हालत और बिगड़ी है देश में आपसी भाईचारा और सदभावना को खतरा लगने लगा है। 1964 और 2014 के बीच पचास साल बहुत पानी गंगा जमुना में बहा है मगर कुछ लोगों को पचास साल पहले देश के सत्ताधारी नेता को दोष देने से फुर्सत नहीं है जबकि उनको विचार करना चाहिए कि इस नेता ने पांच साल से अधिक समय में देश को क्या दिया है , क्या नेहरू जी के शासन के 17 साल का तीसरा भाग क्या दसवां हिस्सा भी देश को आगे बढ़ाया है। जी नहीं मोदी जी की तुलना नेहरू जी से कभी नहीं की जा सकती क्योंकि अपने निधन के पचास साल बाद भी नहरू जी जो हैं शायद कोई और नहीं रह सकेगा।


                       

जनवरी 17, 2020

POST : 1235 जुर्म ए बग़ावत सज़ा ए अदावत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 जुर्म ए बग़ावत सज़ा ए अदावत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   ये गुनाह तो मुझसे भी हुआ है शायद , उन्होंने संदेश भेजा कभी इन सभी का कोई वीडियो बड़े सरकार की तारीफ़ का भी देखा सुना है। कितनी ज़िंदगी बिता दी मैंने भी हर सरकार की आलोचना करते हुए , ये हसरत ही रही कोई तो सरकार नेता हो जिनकी जी भर तारीफ़ करने को मन करे। अख़बार वाले संपादक टीवी वाले एंकर अपने मतलब को साधने को कलाकारी दिखलाते हैं हर नेता को खुश करने को ऐसे सलीके से बात कहते हैं जिस से लगता है जनता की नागरिक की तरफ हैं होते सरकार की ओर हैं। उनकी सलाह और भी दोस्तों चाहने वालों की राय का आदर करते हुए आज ये जुर्म बेलज़्ज़त भी करने चला हूं। शायद जिन लोगों ने मुझे व्हाट्सएप्प फेसबुक पर ब्लॉक किया हुआ है उनके भगवान की आलोचना के अपराध के कारण उनको खबर मिल जाए और मुझे अनब्लॉक करने की अनुकंपा करें। 

          पहला अध्याय ( नेता जी पर आलेख लिखना है ) 50 अंक का अनिवार्य सवाल। 

  नेताजी अच्छे दिन लाने वाले थे देश को खूबसूरत सपने दिखलाने वाले थे। चाय की चौपाल पे चर्चा करवाने वाले थे। सेवक बनकर गरीबों के दुःख दर्द मिटाने वाले थे। घायल थी जनता मरहम लगाने वाले थे मगर नहीं था मालूम कैसे दिन दिखलाने वाले थे दर्द को दवा बताने वाले थे घायल को ज़ख्म पर नमक छिड़कने वाले थे उसको तड़पा कर अट्टहास लगाने वाले थे। इक नया इतिहास रचाने वाले थे शहंशाह की तरह हर घड़ी पोशाक लिबास बदलने का कीर्तिमान स्थापित करने वाले थे।  देश को नई दिशा दिखलाने वाले थे हर घड़ी झूमने गाने वाले थे। रोज़ कोई नया मजमा लगाने वाले थे देश की जमापूंजी ऐशो-आराम पे उड़ाने वाले थे। कुछ नहीं नया बनाने वाले थे जो भी स्थापित था एक एक कर गिराने-मिटाने वाले थे। हम सबको चार्वाक ऋषि की बात का अर्थ समझाने वाले थे क़र्ज़ लेकर घी पीओ की मिसाल बनाने वाले थे। अर्थव्यवस्था को रसातल में पहुंचाने वाले थे , रिज़र्व बैंक से भी उलझने टकराने वाले थे। रिज़र्व बैंक का सुरक्षित धन हथियाने वाले थे अपने लिए उस को उड़ाने वाले थे। अंधे कुएं में गाड़ी चलाने का जादू दिखलाने वाले थे आग से आग बुझाने वाले थे जितना भी पानी था खुद पी जाने वाले थे। होश सबके उड़ाने वाले थे हर किसी को सज़ा देने को अपराधी बतलाने वाले थे अपनी अदालत लगाने वाले थे वकील गवाह न्यायधीश सब खुद बनकर फैसला सुनाने वाले थे। लोग ये ग़ज़ल दोहराने वाले थे , मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ है क्या मेरे हक में फैसला देगा। आदमी आदमी को क्या देगा।

         दूसरा अध्याय ( उनकी अदालत का निर्णय ) 50 अंक का सवाल अनावश्यक है।

ऊंचे सिंहासन पर बैठे न्यायधीश बन जनता को कटघरे में खड़ा कर आरोप लगा अपनी बेगुनाही साबित करने को कह रहे हैं। लोग कह रहे हैं ये सच है हमें अपने किये का फल मिल रहा है ऐसे व्यक्ति की झूठी बातों पर भरोसा किया और उसकी सरकार बनवा दी। अब वही हम पर इल्ज़ाम लगाता है और अपने गुनाहों का दोष हम पर लगाता है। जितने अपराधी हैं राजनीति में उनको गले लगाता है अपने दल में शामिल करता है और जिनको देश विरोधी कहता था सहयोगी बनाता है। जनता को उल्लू बनाता है। चार सौ करोड़ विदेशी दौरों पर खर्च कर इतराता है खुद को विश्व का महान राजनेता बतलाता है इतने पैसे से देश की भलाई करता तो बहुत किया जा सकता था मगर उसकी जेब से क्या जाता है। दोस्तों संग जश्न हर दिन मनाता है। अपनी संस्था के लोग बड़े बड़े पदों पर बिठाता है अपनी मनमानी करने को उचित अनुचित का भेद मिटाता है। इक पुरानी कहावत सच दोहराता है , अगर संतान काबिल है तो जमा करने की ज़रूरत क्या है खुद अपने आप कमाई कर लेगी और नाकाबिल है तो जमा किया हुआ बर्बाद कर उड़ा देगी। यही कर दिखाता है ,रिज़र्व बैंक जब ये समझाता है ये सुरक्षित धन बुरे समय काम आता है। मुझ जैसा शासक हो बुरा समय खुद ही बुलाता है मेरा आदेश है मुझे चाहिए किसी का क्या जाता है। जिसकी लाठी उसकी भैंस फैसला सुनाता है। भैंस के सामने बांसुरी बजाता है। 

                  तीसरा अध्याय ( अंतिम उत्तीर्ण होने को ) खरैती पास कॉपी-पेस्ट 

इक स्कूल के शिक्षक को नेता जी की बचपन की कापी रद्दी से मिल गई है। अगर मैं शासक बन गया। शीर्षक पर लेख लिखवाया गया था। तब उस बच्चे ने जो लिखा था लिखावट जैसी भी रही लेख पढ़कर अध्यापक ने नंबर शून्य दिए थे। शासक बन गया तो करना कुछ भी किसलिए है बस अपना गुणगान करवाना है उस पर खज़ाना खर्च करवाना है। अपनी सभी इच्छाएं पूरी करनी है जो मेरी बात नहीं मानेगा उसकी ऐसी की तैसी करनी है जिस टीचर ने मुझे गलती करने की सज़ा दी या भले घर के किसी बड़े ने शरारत करने पर डांट लगाई सभी को खूब मज़ा चखाना है। इक इक का हिसाब चुकाना है। बदमाश कहते हैं बदमाश क्या गुंडा बनकर सबक सिखाना है। 

वैधानिक चेतावनी :- ये इक काल्पनिक कथा की रचना है और इसका किसी की ज़िंदगी से कोई वास्ता नहीं है। किसी घटना से समानता हो ऐसा केवल इत्तेफ़ाक़ से हो सकता है । 


 


जनवरी 10, 2020

POST : 1234 अंधे कुआं में झूठ की नाव की आज़ादी ( ये किसे चाहिए ) डॉ लोक सेतिया

     अंधे कुआं में झूठ की नाव की आज़ादी ( ये किसे चाहिए ) 

                                            डॉ लोक सेतिया 

  आज देश की सबसे बड़ी अदालत के लिए परीक्षा की घड़ी है। उसको निर्णय देना है कि जिस कश्मीर राज्य की जनता को 158 दिनों से आधुनिक बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा गया है उस के संविधान से मिले मौलिक अधिकार की सुरक्षा को लेकर न्यायपालिका कितनी संवेदनशील है। पांच महीने से विपक्षी नेताओं को बंधक बना रखा गया है देश के विरोधी दल के सांसदों को कश्मीर जाने की अनुमति नहीं है मगर सरकार 15 विदेशी देशों के सांसदों को कश्मीर ले जाकर सब ठीक है दिखलाने की बात करती है। जो लोग विरोध या असहमति जताने को अपने ही देश के भाई बहनों को गद्दार या देश विरोधी कहने का कार्य करते हैं उनको समझना होगा कि उनकी निष्ठा किसी नेता या दल अथवा सरकार के लिए हो सकती है लेकिन देश और संविधान तथा लोकतंत्र के लिए नहीं है। लोकतंत्र में देश और संविधान सबसे महत्वपूर्ण है। उनको कभी पांच महीने अपने बुनियादी अधिकारों सुविधाओं से वंचित रहना पड़े तभी समझ आएगा। विडंबना की बात ये है कि ये लोग भूल गए हैं आपात्काल में जो हुआ उसको लोकतंत्र की हत्या बताने वाले खुद अघोषित आपात्काल जैसे हालत बनाए हुए हैं। 

   ये कैसी व्यवस्था है जिस में एक विश्वविद्यालय में पुलिस भीतर घुसकर छात्रों को मारती पीटती है और एक विश्वविद्यालय में नकाबपोश गुंडे जाकर मार पीट दहशत फैलते हैं तो पुलिस नहीं आती बचाने को और किसी भी नकाबपोश को पकड़ती नहीं न ही कोई एफआईआर दर्ज करती है। शिक्षा के मंदिरों की बदनाम करने को यही पुलिस मनघड़ंत कहानियां बनाती है किसी को देश विरोधी साबित करने को मगर अदालत में झूठी साबित हो जाती है। हमने 1975 से सभी दल की देश की और राज्यों की सरकारों को देखा है समझा है और उनकी असंवैधानिक बातों का खुलकर विरोध किया भी है मगर कभी जनहित की बात को अनुचित कहने का कार्य किसी ने नहीं किया जैसा आजकल तथाकथित भक्त लोग करते हैं। उनको समझना होगा ये वही देश है जिस के नागरिक अहिंसा के मार्ग पर चलकर विश्व की तब की सबसे ताकतवर हक़ूमत से लड़ कर देश को आज़ाद करवाते हैं। आपात्काल घोषित करने वाली नेता की ज़मानत ज़ब्त करवाते हैं और इक नया विकल्प तलाश कर जनता दल की सरकार बनवाते हैं। 

मगर इन चाटुकार लोगों को तो इसी भाजपा के नेता अटल बिहारी बाजपेयी जी की कही बात भी याद नहीं है। उन्होंने कहा था सरकारें बदलती रहती हैं नेता आते जाते रहेंगे मगर आपसी मतभेद या विरोध के बावजूद भी देश की एकता और संविधान की भावना को कायम रखना चाहिए और ऐसा नहीं कहना चाहिए कि पिछली सरकारों ने कुछ नहीं किया है। जो भी ऐसा कहता है वो देश के किसानों मज़दूरों और नगरिकों के पुरुषार्थ का अपमान करता है। शायद भाजपा को इस पर चिंतन करने की ज़रूरत है। वास्तविक देशभक्ति  किसी नेता दल की नहीं संविधान और न्याय की बात निडरता से कहना है। 

  सोशल मीडिया पर अंकुश लगाकर टीवी चैनल अख़बार को विज्ञापन से मालामाल कर खरीद कर आप अपनी महिमा का गुणगान करवा सकते हैं। अंधे कुएं में झूठ की नाव तेज़ दौड़ेगी मगर बाहर दुनिया आपसे सच बुलवाएगी। और भूलना नहीं सत्य कभी पराजित नहीं हो सकता है। 
 

 

दिसंबर 30, 2019

POST : 1233 तुम नहीं मालिक मेरी है ये दुनिया ( अध्यात्म ) डॉ लोक सेतिया

 तुम नहीं मालिक मेरी है ये दुनिया ( अध्यात्म ) डॉ लोक सेतिया 

        आपको समझना है धर्म क्या है और ईश्वर अल्लाह खुदा भगवान क्या है। चलो आज मिलकर उसी से पूछते हैं जिस ने दुनिया बनाई है। आपको बाहर नहीं नज़र आएगा अपने भीतर झांकना है। आंखें बंद करते हैं और सुनते हैं इक आवाज़ सुनाई दे रही है , अगर आपको सुनाई नहीं दे रही तो आपका विश्वास अभी पूर्ण नहीं है। आवाज़ आ रही है , ये जो सब धर्म धर्म का शोर है कौन कर रहा है धर्म वालों को खुद नहीं पता मैं कौन हूं। उनको ऊपरवाला इक सामान जैसा लगा जिसको बाज़ार में बेचकर इनको अपने स्वार्थ साधने हैं। इक बात बड़ी आसान है और सीधी भी कि मेरी मर्ज़ी से जन्म मृत्यु से लेकर सभी कुछ होता है निर्माण विनाश सब कोई और नहीं कर सकता है जो लोग मिट्टी के खिलौने बनाना जानते हैं खुद को निर्माता मानते हैं मगर उनकी बनाई रचना को पल भर में जो मिट्टी बना देता है उस का उनको पता ही नहीं है। इंसान विज्ञान लाख कोशिश कर ले जीवन का संचार कदापि नहीं कर सकता है। धर्म के नाम पर दंगे फसाद क़त्ल करने वाले सिर्फ गुनाहगार हो सकते हैं परमात्मा को समझने वाले नहीं। मैंने किसी इंसान को क्या पशु पक्षी पेड़ पौधे भी बनाने में कोई भेदभाव नहीं किया है और जो आदमी आदमी में अंतर करते हैं झगड़ा करवाते हैं उन्हें क्या समझ अच्छाई और सच्चाई किसे कहते हैं। रटते हैं ईश्वर सत्य है मगर सच बोलने का साहस नहीं और झूठ को सच साबित करते हैं। 

           अदालत में मुकदमा चल रहा था मंदिर मस्जिद के झगड़े को लेकर। हर कोई किसी को अपराधी मानता है अपने अपने खुदा ईश्वर का घर तबाह करने का और गर्व करते हैं खुद किसी की इबादतग़ाह को तोड़ने का। अदालत जाने किस किस को पक्ष बनाती है असली पक्षकार का कोई नाम तक नहीं जानता। मुझ ऊपरवाले से नहीं पूछते सच क्या है मुझे क्या चाहिए। भला मुझे इन सभी इमारतों की क्या ज़रूरत है और कब किस को मैंने अपना हितेषी या वकील घोषित किया है। मुझे कोई चढ़ावा कोई इबादत कोई दान कोई वस्तु इन से क्यों चाहिए जिनको सभी को खुद मैंने बनाया है और दिया है जो भी जिस के पास है। क्या मुझे नासमझ समझते हैं जो खुद हज़ार देकर एक मांगता हो उसी से जिसे दे दिया। ये तो विश्व की जनता है जो अपने अपने देश की सरकार से अपने दिए धन का छोटा सा हिस्सा भीख की तरह मांगती रहती है। इन धर्म वालों ने मुझे भी राजनेताओं की तरह ठग बनाने का काम किया है ये कहकर कि धार्मिक स्थल बनाने को या कोई आडंबर अनुष्ठान करने को पैसे सामन देकर मुझे खुश कर सकते हैं। अदालत किसी को नियम तोड़ने का दोषी घोषित करती है किसी को अपराधी या क़ातिल। मगर क्या किसी ने विचार किया कि मैं अपनी मर्ज़ी से जिसे भी जब चाहूं अपने पास बुला लेता अथवा उसका जीवन का अंत कर देता हूं। भगवान की मर्ज़ी है कहने के इलावा कोई कुछ नहीं कर सकता। किसी भी देश की किसी भी अदालत में कोई केस दायर नहीं हो सकता है। आंधी तूफ़ान भूकंप बाढ़ कितनी आपदाओं को मेरे नाम करते हैं फिर कोई तो मेरे ख़िलाफ़ एफआईआर लिखवाता कहीं। मगर ये सब होता इंसान की अपनी गलती से है। 

    विधाता एक ही है और एक ही हो सकता है फिर किसने नाम बदल कर अपने अपने भगवान देवी देवता घोषित कर लिए हैं। वास्तव में उनको ईश्वर को समझने जानने की चाहत नहीं थी उनको मेरे नाम का दुरूपयोग करना था अपने मकसद हासिल करने को। उनको लगता है कोई ऐसा नहीं है और होगा भी तो ऊपर बैठा आराम करता होगा उसे क्या करना कोई क्या कर रहा है। मगर कहते हैं ऊपरवाला जानता है सब देखता है अगर ये भरोसा करते तो फिर मुझे लेकर नफरत का धंधा नहीं करते। उपदेश देते हैं औरों को जिन बातों को लेकर खुद उन्हीं पर नहीं चलते हैं। धरती पर आये हैं कुछ लोग जिन्होंने चिंतन और मनन और अध्यन से समझना चाहा समझाना चाहा जैसे नानक जैसे विवेकानंद जैसे लोग या किसी भी धर्म की शुरुआत करने वाले गुरु मगर बाद में उन्हीं के अनुयाई चेले खुद को भगवान बताने लगे और सत्य की खोज ईश्वर की तलाश छोड़ मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरुद्वारा बनाने लगे। कोई बुत कोई मूर्ति कोई शब्द लिख उसको पूजा ईबादत का साधन बना लिया बिना समझे कि जिसने दुनिया बनाई कोई भी उसको नहीं बना सकता है। ये दुनिया बनाने वाले को बनाने वाले बन बैठे हैं मगर मुझ दुनिया बनाने वाले का कोई अंत नहीं है कोई ओर छोर नहीं शुरुआत नहीं जानते पर इनका जन्म इनका अंत मेरी इच्छा से है। 

अब आप समझना चाहते हैं आपको क्या करना है पूजा आरती ईबादत और कैसे मुझे खुश करना है। नहीं मुझे कोई अपना गुणगान नहीं करवाना है कोई चढ़ावा कोई उपहार कोई घर रहने को नहीं चाहिए। मैंने आप सभी को इंसान बनाया है आपको अच्छे कर्म करने हैं अच्छे इंसान बनकर जीना है। कोई आपसी भेदभाव बड़े छोटे का धर्म जाति का रंग का देश का नहीं रखना है। नफरत की जंग की  अहंकार की सब बातें छोड़कर प्यार से मिलजुलकर रहना और अपने पास अधिक जमा नहीं कर बांटकर खाना इक दूजे के सुःख दुःख को समझना इंसानियत का पालन करना यही आदेश है उपदेश है और मुझे पाने को खुश करने को यही रास्ता भी है। 
 

 

दिसंबर 29, 2019

POST : 1232 दान का चर्चा है कमाई पर पर्दा है ( कड़वी बात ) डॉ लोक सेतिया

  दान का चर्चा है कमाई पर पर्दा है ( कड़वी बात ) डॉ लोक सेतिया 

   कल की बात कोई सुनी सुनाई नहीं सामने देखी और खुलकर समझी समझाई बात है। इक बड़ा सा विज्ञापन लगा था किसी आयोजन का सत्ताधारी नेता का नाम फोटो मुख्य अतिथि के रूप में दे रखा था। जो लोग आयोजन कर रहे थे उनसे जाकर पहचान की अपना परिचय दिया। आप लेखक हैं पचास हिंदी अख़बार मैगज़ीन में चालीस साल से रचनाएं छपती हैं हमारे साथ जुड़ें आपका स्वागत है। मैंने कहा पहले आप मुझे समझ लें मैं भी आपको जान लेता हूं और तमाम वास्तविक घटनाओं की बात हुई। उनकी जानकारी पर कोई सवाल नहीं उठाना चाहता मगर फिर भी जब विषय आया सत्ताधारी नेताओं अधिकारियों के गुणगान का तो कहना पड़ा मुझे नहीं आता ये काम। उनको शायद इस की उम्मीद नहीं थी कि कोई ऐसा भी बेबाक सच कह सकता है , मैंने कहा आपने जिनको मुख्य अतिथि बनाया है उनको जो उपहार देने वाले हैं उनकी किस विशेषता को देखकर। समाज को देश को उन्होंने क्या दिया है बल्कि सत्ता पर रहते खूब ऐशो आराम से देश सेवा के नाम पर शान से रहते हैं। अपने उनके सचिव से जो मोलभाव किया है सांसद निधि से आपको धन मिलने का बाकायदा इक हिस्सा उनके दल को देने का वो भी बिना किसी रसीद या चेक द्वारा न देकर नकद दो नंबर से ही वास्तव में देश भर में चलते भ्र्ष्टाचार का ही उद्दाहरण है। मैंने उनको बताया कि कभी हमारे शहर के उपायुक्त ने तबादला होने पर खुद मुझे फोन किया घर बुलाया था और जाने पर कुछ हज़ार का इक चेक थमाया था सरकारी खाते से और ऐसा अन्य सौ लोगों को सहायता के नाम पर दे रहे थे बदले में उनको विदाई करते हुए सम्मानित और पुरुस्कृत करने की बात थी। मैंने उनको चेक लौटा दिया था और हमने विदाई में उनको स्मृति चिन्ह दिया था सदस्यों ने अपने पास से राशि खर्च कर के क्योंकि वो हमारे लेखक सदस्य थे संस्था के। 

      यहां कल की इक और बात याद आई है मोदी जी के इक अंध समर्थक ने लिखा मुझे भेजा व्हाट्सएप्प पर कि मोदी जी ने पिछले पांच साल में उनको मिले उपहार और इनाम की राशि दान कर दी है। साथ ये भी था पिछले सत्ताधारी दल वालों ने कितना दान किया था बताओ। उनकी जानकारी सोशल मीडिया से हासिल की हुई है न उन्होंने देश के पिछले इतिहास को पढ़ा न कभी समझने की कोशिश की है। पहली बात उनको धर्म की जानकारी बहुत होने का दावा है तो समझ लेना चाहिए दान देकर इश्तिहार देना दान नहीं नाम पाने को कारोबार कहलाता है जो तमाम लोग करते हैं। वास्तविक दान कहते हैं एक हाथ से दो और दूसरे को भी
पता नहीं चले ऐसा होना चाहिए। मगर इस परिभाषा को भी छोड़ देते हैं हालांकि आखिर में रहीम और गंगभाट का वार्तालाप फिर दोहराना होगा। मोदी जी को देश विदेश से जो भी उपहार मिले हैं कोई खैरात में नहीं मिले अगर उनकी काबलियत से मिलने होते तो राजनेता बनने से पहले ही मिल जाते। उनके हर ऐसे उपहार की कीमत देश ने चुकाई है उनको जिन्होंने भी उपहार दिए बहुत कीमत वसूली है जो हम आप नहीं जानते हैं। उनकी सारी शोहरत देश के ख़ज़ाने को खर्च नहीं बर्बाद कर के हासिल की गई है। इक बात आपको कोई नहीं बताएगा कि जब नेहरू जी देश के प्रधान मंत्री बने तो उन्होंने अपनी सब जायदाद देश को दे दी थी जिसकी कीमत का आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं क्योंकि जैसा सब जानते हैं उनके पिता और दादा इतने बड़े अमीर थे जो नेहरू को विदेश भेजा था शिक्षा पाने को। उनकी काबलियत और देश को आधुनिक बनाने ही नहीं देश में लोकतंत्र स्थापित करने में उनका योगदान ऐसा महान कार्य है जो आजकल के तथाकथित महान नेता करना तो क्या उसको सुरक्षित तक रखने को सक्षम नहीं हैं। मोदी जी ने खुद पर अपने नाम का शोर का डंका पीटने पर देश का पैसा बर्बाद किया है जिस का कोई हिसाब नहीं है। कोई नहीं बताएगा उनके खुद के रहन सहन सैर सपाटे पर कितना खर्च किया गया 375 करोड़ केवल विदेशी दौरों में किराए के विमान पर खर्च हुए ये साल पहले जानकारी मिली थी। देश में 75 शहरों में भाजपा के दफ़्तर बनाये गए हैं जिन पर कितना खर्च हुआ और वो पैसा किस ने कैसे दिया कोई नहीं जान सकता क्योंकि उन्होंने अपने लिए नियम कानून बदल दिए थे दल को विदेशी दान की बात गोपनीय रखने से। 

आप उसको देश सेवा नहीं कह सकते जिस में आप करते क्या हैं नहीं पता मगर आपको सरकारी खज़ाने से अपने धार्मिक दान देने की अनुमति है। गुजरात से दिल्ली आते हुए भी दावा किया गया था कुछ लाख जो बचत थी मोदी जी दान कर आये थे। और आने के महीने बाद नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर जाकर 2500 किलो चंदन की लकड़ी करोड़ रूपये की दान दे आये थे। आपको मालूम है धर्म आपको दान अपनी ईमानदारी की कमाई से करने की हिदायत देता है जो पैसा भारत सरकार के खज़ाने से खर्च हुआ मोदी जी उस दान को अपने नाम से संकल्प लेकर नहीं दे सकते थे और संकल्प कोई संस्था संगठन नहीं व्यक्ति करता है। आप को पता है मोदी जी के चुनाव आयोग को दिए ब्यौरे में कितना धन दौलत है उनके पास देख लेना। जिस ने 35 साल भीख मांग कर पेट भरा ऐसा बताया गया और वेतन भी दान दे देते हैं उनके पास पैसा कैसे जमा है कोई जादू की छड़ी या अलादीन का चिराग़ है तो उस से देश के करोड़ों लोगों की गरीबी मिटाते। आपको सच नहीं बताया जाता है फिर भी जिस पर रोज़ लाखों रूपये राजसी शान से जीने पर खर्च होते हैं उस जैसी देश सेवा और गरीबी कौन नहीं चाहता करना। ये सब माफ़ होता अगर देश की जनता को अच्छे दिन न भी मिलते ऐसे बदलाल खराब दिन तो नहीं भोगने पड़ते। कहने को बहुत है मगर जिनको नहीं समझना कितना विवरण दे कर भी कुछ हासिल नहीं होने वाला है। 

   रहीम इक नवाब से कवि थे मगर रईस थे और दान दिया करते थे दरबार में जो भी ज़रूरतमंद मांगने आता। उनकी दरबार के इक सदस्य कवि गंगभाट थे , उनहोंने ध्यान दिया कि दान देते समय रहीम अपनी नज़रें ऊपर नहीं रखते झुकाये रहते हैं। विचार किया और इक दोहा पढ़कर सवाल किया था। 

सिखिओ कहां नवाब जू ऐसी देनी देन , ज्यों ज्यों कर ऊंचों करें त्यों त्यों नीचे नैन। 

रहीम ने उनके दोहे का जवाब दोहा पढ़ कर दिया था। 

देनहार कोऊ और है देवत है दिन रैन , लोग भरम मोपे करें या ते नीचे नैन। 

बात मोदी की हो या किसी भी सत्ताधारी शासक की उनके इश्तिहार उनकी जिस बढ़ाई की चर्चा करते हैं कि मनोहर उपहार या मोदी योजना अदि बेहद अनुचित और धर्म नैतिकता के विरुद्ध है क्योंकि जो भी खर्च किया जाता है उनकी खुद की कमाई नहीं देश राज्य की आमदनी से किया जाता है। 
 

 

दिसंबर 28, 2019

POST : 1231 प्यास नहीं पीने को बहुत है ( आजकल का समाज ) डॉ लोक सेतिया

 प्यास नहीं पीने को बहुत है ( आजकल का समाज ) डॉ लोक सेतिया 

    हर साल की तरह इस साल भी विचार करने लगा बीत रहे साल क्या पाया क्या खो दिया और भले निभा नहीं सकूंगा अगले वर्ष का संकल्प क्या होना चाहिए। पहली बात समझ आई सोशल मीडिया फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर समाज की देश की गंभीर जागरूकता की बात करना। बचपन की सुनी बात याद आई कि आप हम या कोई भी बैल को तालाब पर ले जा सकता है मगर छी-छी कहने से पानी नहीं पिला सकते हैं। जिनको नहीं मालूम उनको बता देता हूं गांव में जानवरों को पानी के पास ले जाकर छी-छी बोलते हैं ताकि जानवर को इशारे से समझाया जा सके कि पानी पिओ। बात आजकल की है तो आजकल की तरह समझनी होगी , बाहर अंट शंट चाट पकोड़े जिसको गंद शंद कहते हैं चाव से खाते हैं पेट भरने से भी दिल नहीं भरता है और फिर कहते हैं थोड़ा ज़्यादा भर गया पेट आज अब कोई हज़्म करने को पाचक भी लेना होगा। यही हालत आजकल सभी लोगों की है अनाप-शनाप बोलते पढ़ते लिखते हैं व्यर्थ की बहस और अपने को जानकर साबित करने अन्य को मूर्ख अज्ञानी समझने की मानसिकता बन गई इसलिए भौंकते हैं सुनाई कुछ नहीं देता। ऐसे शोर में सार्थक संवाद संभव नहीं तभी सोचा है जिनको प्यास नहीं उनको पीने की बात कहना बंद यही अगले साल का संकल्प है। 

    मुझे सबसे अधिक प्यार जिन से है और जिनसे सच्चा प्यार मिला और जिनसे बहुत सीखा समझा जाना वो हैं मेरे दादाजी झंडारामजी और मां माया देवी जी। विशेष बात है दोनों को हमेशा अपने पर भरोसा रखते हुए देखा और जीवन की विषम समस्याओं में भी घबराते नहीं पाया। क्या लोग थे आज उनकी याद भी मुझे इक आशावादी एहसास देती है। जबकि उन दोनों का जीवन बेहद कठिन हालात में रहा होगा। दादजी दस साल के थे जब पिता का साया सर से उठ गया और मां को बचपन में कोई रोग माता का जैसा कहते हैं लगने से उनकी आवाज़ और सुनाई देने की शक्ति कम हो गई थी। उनकी शादी करने के बाद मायके के नाते रिश्ते नाम को साथ थे इक मामाजी और मामीजी को छोड़कर। हमारे घर अर्थात ससुराल में दादाजी की छोटी बहु का रुतबा किसी असहाय और खामोश गाय की तरह था। पिता जी अवश्व उनका ख्याल रखते थे मगर उन्होंने कभी नहीं समझना चाहा उनकी पत्नी को घर में समानता बराबरी का अधिकार नहीं मिलता है। शायद उनकी काबलियत जानकर भी काबिल समझना नहीं चाहते थे लोग। फिर भी मां को शायद ही कभी किसी से तकरार करते देखा उदास नहीं देखा हमेशा इक सहज मुस्कान उनके चेहरे पर रहती थी। मैंने इक बार उनकी आंखों में आंसू देखे थे मगर तब भी उन्होंने मुझे कारण नहीं बताया था। किसी की बुराई करते नहीं देखा उनको अपने बच्चों से शिकायत भी हंसते हुए लहज़े में करती थी , तुम्हें नहीं मिलती फुर्सत कि बहु ने मिलने आने नहीं दिया और हंस देती। अपनी दो बहुओं से कभी कोई तीखी बात जीवन भर नहीं की आज भी दोनों याद करती हैं उनके सासु मां बड़ी मधुर सवभाव की महिला थी। 

  मां 80 साल से अधिक जीवन जिया और बड़ी शान से रही हमेशा। सभी बच्चे दिल से चाहते थे और उनकी हर बात आदेश समझ प्यार से मानते थे। अपने व्यवहार से अपने घर को बिना आदेश देने की आदत घर की महारानी जैसा रुतबा पा लिया था। जबकि विवाह कर आई थी जैसे कोई वजूद ही नहीं था। मां चिट्ठी लिखती थी अर्थात पढ़ी लिखी थी और गाया करती थी इक भजन जो अपने आप में इक मिसाल था। मैंने याद कर उस भजन को लिखा हुआ है ब्लॉग पर , उस भजन जैसा कोई और भजन मैंने नहीं सुना आज तक। भगवन बनकर अभिमान न कर तेरा मान बढ़ाया भक्तों ने। तुझे भगवान बनाया है भक्तों ने। कोई ऐसे कह सकता है ईश्वर है इस बात पर अकड़ना मत तुझे मानते हैं हम तभी है ये ध्यान रखना। शायद सच्चा आस्तिक और भक्त जिसे पूर्ण विश्वास हो वही कह सकता है। कोई डर नहीं घबराहट नहीं जैसे अपने करीबी दोस्त बेहद अपने से प्यार से बात करते हैं। उनको धागे से कुरेशिये से कितनी तरह के रुमाल बनाने की बड़ी खूबसूरत कला आती थी जो कम महिलाओं को आती थी और इतने लाजवाब ढंग डिज़ाईन कि हर कोई कहता था चाची जी मुझे भी बना दो और सबकी चाची उनको बना देती थी महीने लगते थे। भोली थी और लोग भोलेपन को नासमझी समझने की भूल करते हैं मगर हम हैरान हो जाते थे जब जो पुरानी बात किसी को याद नहीं होती वो बताती थी ये उस दिन उस जगह उस तारीख़ की बात है। मिला जुला संयुक्त परिवार था और बारह भाई बहन की सबकी जन्म की तिथि बताती थी और बचपन की बातें भी। मेरा भरोसा है और दावा भी कि दुनिया में कोई भी ऐसा नहीं हो सकता जो ये कह सके कि मेरी मां ने कभी उसके या किसी के साथ कोई अनुचित व्यवहार किया हो। इस से बढ़कर तपस्या नहीं हो सकती कि भले आपके साथ किसी ने कैसा भी अच्छा बुरा किया हो अपने कभी मन में कोई भेदभाव की भावना नहीं रखी हो। 

दादाजी भी 90 साल से अधिक जीवन जिया और बड़ी शान से रहे किसी शहंशाह की तरह। उनकी विशेषता थी बच्चों को भी नाम के साथ जी कहकर बुलाते थे। आवाज़ ऊंची शायद ही कभी होती मगर बात का असर कमाल का हुआ करता था। घर की बैठक या गांव की डयोढ़ी में बैठे होते तो हर कोई पांव छूकर आदर से दादजी नमस्कार कहते हुए भीतर जाता , कोई महमान आये जो रोज़ की बात थी तो बिना खाना नहीं जाने देते थे। अपने दम पर और अपने उसूलों पर चलकर बहुत बनाया मगर हर किसी को बांटते रहते थे। जाने कितने करीबी क्या दूर दराज के नाते रिश्ते वाले आये और बोला दादाजी कोई कमाई का साधन नहीं और उनको नौकर चाकर नहीं भागीदार बनाते गए। बहुत बार लोग धोखा देकर भाग जाते तब भी कोई शिकन नहीं आती थी माथे पर बस कहते उसका नसीब था जो ले गया। तायाजी और पिताजी को आदेश था जो बेईमानी कर चले गए कभी मिलें तो कोई बात नहीं कहना न वापस मांगना। और दोनों भाईओं ने ये बात हमेशा याद रखी निभाई भी। दादजी स्कूल नहीं गए थे मगर उनको इक भाषा जिसको लंडे कहते हैं लिखनी आती थी और हिसाब चुटकिओं में गिन लेते थे। मगर उनको धार्मिक किताबों को सुनने का बेहद शौक था और सभी भाई बहनों में ये मुझे ही करना होता था जब बाकी खेल कूद में लगे होते मैं दादजी की इच्छा पूरी करने को बैठा रहता और उनको शायद सबसे अधिक प्यारा भी लगता था। 

  बात हुई थी प्यास की और आजकल किसी को भी अच्छी मुहब्बत की बातों की चाहत नहीं है। इक दौड़ है आपसी खुद को सबसे अच्छा साबित करने की। ये बात कोई नहीं जानता कि वास्तव में सम्पूर्ण कोई भी नहीं है और अपने आप को ऐसा समझना नासमझी की हद है। मुझे बहुत सीखना है समझना है और करना भी है। अभी तक कुछ भी नहीं कर पाया , अब सार्थक करने को समय भी कम ही है। बात खत्म नहीं हुई विराम देता हूं बाकी अगली पोस्ट पर। 
 

 

दिसंबर 26, 2019

POST : 1230 सोचिए क्या आप वापस जाना चाहते हैं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

  सोचिए क्या आप वापस जाना चाहते हैं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

  आजकल ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो धार्मिक कट्टरता के ख़िलाफ़ मानवीय  पक्ष की बात कहने पर अपशब्दों का उपयोग करते हैं और उनकी भाव भंगिमा हिंसक दिखाई देती है । जिनको लगता है कि भारत एक कट्टर हिंदू देश होना चाहिए और बाक़ी धर्म वालों को दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाना चाहिए जिन्हें इक डर और असुरक्षा की भावना से जीना चाहिए । ये बेहद खेद और चिंता की बात है कि पिछले कुछ सालों में इस मानसिकता को बढ़ावा मिला है और तमाम संकुचित सोच वाले लोगों की दबी छुपी आंकाक्षा उभर आई है । मगर हैरानी इस बात की है कि जिस हिंदू धर्म की ये बात कहते हैं उसको इन्होने न तो पढ़ा है और न ही समझा है । स्वामी विवेकानंद का नाम सुना है उन्होंने विदेश जाकर अपने धर्म और विचारधारा को जिस तरह समझाया और विदेशी लोगों को प्रभावित किया उस को नहीं पढ़ा न जानते हैं । आओ पहले उनकी बात को सुनते हैं जो बताते हैं कि हम उस विचारधारा हिंदुत्व से हैं जिसने हमेशा सभी अन्य धर्म के लोगों और उनकी बातों को अपनाया है । 


    क्या उनको बात से कोई असहमत हो सकता है । फिर भी जिनको लगता है उनको देश की हिंदुत्व की चिंता औरों से अधिक है और उनको किसी नेता की संकुचित मानसिकता पसंद है और बिना ये समझे कि देश और खुद उन्हीं के धर्म के लिए क्या उचित है जो किसी के अंधसमर्थक बने हैं जैसे कई लोग कभी किसी और के लिए यही समझते थे और   . . . . . .  इंडिया है और इंडिया  . . . . .  है कहते थे उनकी राह चलना चाहते हैं । उनको समझना होगा क्या विश्व आज सदिओं पुरानी गलतिओं को दोहरा सकता है और इसी तरह से अपने देश में किसी इक धर्म या वर्ग को स्थापित करने की बात कर सकता है । विश्व में कितने देशों में जो हिंदू सिख या अन्य धर्म वाले हैं उनको किनारे कर सकता है । क्या आप चाहते हैं बाकि देश भी इसी राह पर चल सके और उन देशों में रहने वाले हिंदू वापस देश आएं भले उनको यहां हासिल इक नफरत भरा समाज हो और कोई सुरक्षा देश की सरकार शिक्षा रोज़गार क्या शराफत से रहने को भी नहीं मुहैया करवाने को प्रतिबद्ध हो । जिस देश की राजनीति अपराधी सांसदों से भरी पड़ी हो और सत्ताधारी नेताओं को संगीन जुर्म करने पर सीबीआई तक बचाने का कार्य करती रही हो ये बाद देश की सबसे बड़ी अदालत को कहनी पड़ी है । अगर यही आपका हिंदू धर्म है जिस में भगवा धारण कर जो भी चाहे अपराध करने की छूट है तो आपको मुबारिक हो क्योंकि अपने ऐसे अपराधी नेताओं के खिलाफ कभी अपशब्द नहीं उपयोग किये मगर जो मानवता की बात कहते हैं उनको आप गाली देते हैं । नहीं देश को स्वामी विवेकानंद जी का हिंदू धर्म चाहिए उन का नहीं जिनको धर्म सत्ता की सीढ़ी लगता है ।

    आप विदेश जाते हैं कई जाकर बसना चाहते हैं मगर आपकी संकुचित विचारधारा हर देश अपनाये तो क्या आपका विदेश जाना संभव होगा और जाकर बसना तो दुश्वार ही हो जाएगा । इतना ही नहीं आपको अन्य देशों से कारोबार भी बंद करना होगा , न आपकी कोई वस्तु विदेश बिकेगी न आपको किसी देश से कुछ भी मिलेगा । ऐसे देश हैं जो चीन की तरह सब अपना बनाते हैं उनको फेसबुक गूगल या व्हाट्सएप्प की कोई ज़रूरत नहीं है उनके पास खुद अपने बनाये विकल्प हैं । अगर इस तरह धर्म या किसी अन्य आधार पर विश्व से अलग संकुचित मानसिकता से चले तो आपका जीवन कठिन हो जाएगा । आपके पास बहुत कुछ है जो भारत में नहीं बनता है यहां तक की जिस पटेल की मूर्ति की बात करते हैं इस आधुनिक युग में वो भी हम अपने देश में नहीं बना पाए न ही बुलेट ट्रैन खुद बनाने की बात करते हैं । सोचना आपके देश के जिस नेता की नीति को आप पसंद करते हैं उसको विश्व के पचास देशों की सैर करने की ज़रूरत क्या थी। अपने देश के गांव शहर को जाकर समझते देखते तो कुछ मकसद भी था। लेकिन वो क
ठिन था और जाते हैं तो भाषण देने को आम लोगों से कोई संवाद नहीं करते हैं । उनको चाहत है विश्व की शोहरत की जो देश के खज़ाने से धन बर्बाद कर मिलेगी नहीं क्योंकि सच्ची शोहरत वास्तविक आचरण से मिलती है । शोर विज्ञापन से कीमत चुकाकर कदापि नहीं ।
 
आज जिस राह पर देश की सरकार चल रही है क्या पश्चिम देशों अमेरिका जापान जाकर कुछ बात कर सकते हैं । हम नहीं समझ सके पिछले पांच साल में करीब चार सौ करोड़ मोदी जी ने विदेशी सैर सपाटे पर जो खर्च किये उन से देश की अर्थव्यवस्था का कोई भला नहीं हुआ क्योंकि उनकी हर विदेशी यात्रा विदेशी सरकारों की शर्तों पर होती रही है । बहुत कीमत चुकाई है देश की जनता ने इक व्यक्ति की नाम और शोहरत की चाहत की । सबसे पहली बात हमारे देश की पहचान , सत्यमेव जयते , सच ही ईश्वर है की रही है । क्या कोई इनकार कर सकता है कि कभी किसी भी नेता ने उच्च पद पर रहते इतने झूठ नहीं बोले होंगे । सच धर्म है और झूठ पाप है । आपको सोचना है आपको किधर खड़े होना है ।

दिसंबर 22, 2019

POST : 1229 सोने की चिड़िया की कहानी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     सोने की चिड़िया की कहानी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 पता नहीं कैसे पचास साल पुरानी सुनी कहानी याद आई है । अनपढ़ थे मेरे दादाजी मगर सब उनकी समझदारी का लोहा मानते थे । मैंने दादी नानी को नहीं देखा दादाजी से बहुत कुछ सीखा समझा है । तब उनकी बातों की गहराई कहां समझ आई थी उनकी मौत 1970 या 1971 में हुई थी जब मेरी आयु 20 की रही होगी । गीता रामायण सब उनको याद थे सुनते रहते थे और मैंने उनको बचपन में सब धार्मिक किताबों की कथा पढ़कर सुनाई है । मुझे उनसे बहुत प्यार मिला और समझ भी उनकी बातें तब नहीं अच्छी लगती थी कि धन दौलत नहीं इंसानियत भाईचारा और सादगी से मिलकर रहना वास्तविक जीवन का आधार है । भूमिका को छोड़ उनकी सुनाई कहानी बताता हूं । 

परिवार में नई बहुरानी लाने को उसको चुना गया जिसने घर को स्वर्ग बनाने और सभी की सेवा करने दासी बनकर रहने की मीठी मीठी बात से होने वाली सास का दिल जीत लिया जिसने घर भर को उसकी तारीफ कर इक सपना देखने को विवश कर दिया कि बस यही इक कमी है और नई बहुरानी के आने से सबकी हर मनोकामना पूरी हो जाएगी । आते ही घर की खज़ाने की चाबी अपने हाथ ले ली थी और समझाया था अभी तक सभी घर के लोग कहने को खुश रहते रहे हैं वास्तविक आनंद को जानते भी नहीं हैं । मधुर भाषा और सज धज नाज़ नखरे हर नई दुल्हन के शुरू शुरू में लुभाते हैं । हर कोई उसकी चिकनी चुपड़ी बातों में आकर उसी का गुणगान करने लगा था । चार दिन में उसने बढ़े बूढ़े सभी पुराने लोगों को साबित कर दिया था कि उन्होंने जो भी किया गलत था और जो करना था उनको पता ही नहीं था । मगर अब मैं आई हूं तो सब ठीक कर दूंगी । आधुनिकता के नाम पर बदलाव का नाम लेकर सब पहले का किया हुआ बर्बाद करने लगी थी मगर इक जादू था जो सबको नशे में रखता था सुंदर सपने वाली दुनिया दिखलाने का । उसकी बातों से लगता था सच उसने सब तरह की पढ़ाई की हुई है जबकि कोई नहीं जानता था उसने कब किस स्कूल कॉलेज से क्या किस अध्यापक से पढ़ा था । 

बड़ों की सेवा उनकी दासी बनकर रहने  की बात क्या होती है कोई भी उसे कह नहीं सकता था और उसने घर की सभी तरह की देखभाल अपने पीहर से ला ला कर अपनी पसंद के लोगों के हाथ सौंप दी थी । दो चार साल में वही घर की वास्तविक मालकिन बन गई थी और घर के असली मालिक बेबस होकर रह गए थे । पति-पत्नी का नाता क्या है उसको मालूम ही नहीं था । बस मनमानी करती गई और घर की हालत बिगड़ती गई थी । जो लगता था सीधी सादी भोली भाली है उसने अपने असली रंग दिखला कर सबको अपने आधीन कर लिया था और सब अपने अधिकार में लेती गई थी । हर कोई उसकी चाल में फंसकर घर के बाकी लोगों से लड़ने झगड़ने नफरत करने लगा क्योंकि उसने सभी को इक दूसरे की मनघड़ंत बातों से भेदभाव की दीवार खड़ी कर अलग अलग कर दिया था । जिस महल बनाने की बात करती थी उसकी कोई नींव ही नहीं थी आसमान में हवा में कोई जादू का नगर बसाने की झूठी बात से सभी को ठगने का कार्य कर दिया था । 
 
तमाम तरह से अपने गुणगान के चर्चे अपने खास लोगों को आर्थिक फायदा पहुंचा कर करवाने लगी थी । धीरे धीरे घर का सब बिकने लगा था हरा भरा घर किसी तपते रेगिस्तान में बदल गया था । उसकी हर योजना असफल होती रही मगर सबको भरोसा दिलाती रही अब बस सब ठीक होने वाला है कुछ दिन सहन करो , मगर खुद उसने अपने खुद पर बेतहाशा धन शौक पूरे करने पर बर्बाद करने में कोई सीमा नहीं बाकी रहने दी । हाल  ये हुआ कि पहले सब चैन से रहते थे अब हर कोई बेचैन है घबराया हुआ है । आपसी मेल जोल बचा नहीं भरोसा कोई किसी पर नहीं करता और हर कोई अकेला उसकी चालों का शिकार होकर परेशान है । खेल खलियान कारोबार सभी चौपट हो गए थे उसकी योजनाओं की विफ़लता को कोई अनुचित नहीं कह सकता था अन्यथा उसे भविष्य का दुश्मन घोषित किया जाता था ।

आसपास रहने वाले सभी पड़ोसियों को उस नई नवेली बहू ने कितने हथकंडे अपना कर कभी प्रलोभन का मायाजाल बिछाकर अपने समर्थन में खड़ा कर लिया और एक एक कर परिवार के अन्य सदस्यों से पूर्वजों तक को बदनाम और नासमझ साबित करने में झूठ की बातों को फैलाना शुरू कर दिया । जिस गली जिस बस्ती में सभी आपस में मिलकर रहते थे उसकी चालों से सभी आपसी विश्वास छोड़ कर शंका करने लगे । माहौल बदल कर आपसी भाईचारा खत्म हुआ और टकराव की बातें होने लगीं । उसकी कुछ खास लोगों की चतुराई से अधिकांश उसका गुणगान करने लगे और जब कोई उसकी कार्यशैली पर संशय करता तो उस से टकराव कर उसका जीना दुश्वार करने लगे । गांव गली से लेकर शहर से चलते चलते उसकी शोहरत महानगर तक पहुंच गई और अख़बार में आधुनिक नारी की मिसाल कहलाने लगी थी । सभी का हिस्सा अकेले ही खाकर खुद देवी का स्वरूप होने का ढोंग कर अपनी मनमानी कर महारानी कहलाने लगी थी । बहुरानी को महारानी बनाने वाले पछताते हैं उसको सर पर बिठाकर खुद तिगनी का नाच नाचने को मज़बूर हो जाते हैं ।    माफ़ करना दादाजी ने आगे की कहानी सुनाई थी मगर मुझे नींद आ गई थी । आप भी आजकल किसी नींद की खुमारी में लगते हो नहीं जानते कल क्या होने वाला है । भविष्य का कुछ पता नहीं है और कोई आपको जगाने वाला भी नहीं । घनी गहरे अंधेरे की रात है मगर कहते हैं हर रात का अंत होता है और सुबह होती है । चलो इक गीत सुनते हैं जाने माने शायर का है । 

मौत कभी भी मिल सकती है , 

लेकिन जीवन कल न मिलेगा ।

रात भर का है महमां अंधेरा , 

किस के रोके रुका है सवेरा । 

रात जितनी भी संगीन  होगी , 

सुबह उतनी ही रंगीन होगी । 

ग़म न कर गर  है बदल घनेरा , 

किस के रोके रुका है सवेरा । 

लब पे शिकवा न ला अश्क़ पी ले , 

जिस तरह भी हो कुछ देर जी ले । 

अब उखड़ने को है ग़म का डेरा , 

किस के रोके रुका है सवेरा ।

आ कोई मिलके तदबीर सोचें , 

सुख के सपनों की ताबीर सोचें । 

जो तेरा है वही ग़म है मेरा , 

किस के रोके रुका है सवेरा । 

आपको याद है फिल्म का नाम था , सोने की चिड़िया । 

 सोने की चिड़िया l सुनहरी गौरैया l रोहित धीर l गजनी का महमूद l


दिसंबर 14, 2019

POST : 1228 शासकों की मनमानी आज़ादी नहीं ( सच और सच ) डॉ लोक सेतिया

 शासकों की मनमानी आज़ादी नहीं  ( सच और सच ) डॉ लोक सेतिया 

 सरकार ऐलान जारी करती है देश की जनता को स्वीकार करना होता है ।  लोग परेशान हों या उनके लिए कितनी समस्याएं खड़ी हों सत्ताधारी नेताओं और सरकारी अधिकारियों की बला से । अभी फ़ास्ट टैग की ही बात ले लो जिस देश की आधी आबादी अनपढ़ है जिसको अभी आधुनिक ऑनलाइन या स्मार्ट फोन की सही जानकारी तो क्या अपनी सुरक्षा को लेकर समझ नहीं है और गरीब अशिक्षित नागरिक से उनके कार्ड या अन्य कागज़ कोई और ले कर उपयोग करता है क्या ये सब के लिए आसान होगा ।  कदापि नहीं मगर सरकार को अपनी साहूलियत और सुविधा देखनी है । आपको इतने दिन में ये अपनाना ही होगा । लगता ही नहीं कि किसी भी नेता या सरकार में शामिल दल को नागरिक परेशानी से कोई सरोकार हो । बस ये महत्वपूर्ण है और तय सीमा में लागू करना ही होगा । हर बार जब शासक को फरमान जारी करना अधिकार उपयोग करना हो तब कहते हैं इस को करना लाज़मी है । 

    मगर कभी भी जो कर्तव्य देश की सरकार को पूरे करने हैं उनको लेकर ऐसा नहीं होता है । क्या कभी घोषणा की गई कि इतने दिन बाद कोई गरीबी की रेखा से नीचे नहीं रहने दिया जाएगा । सरकार को ये उस से पहले करना ज़रूरी है । कोई बना घर नहीं रहेगा की बात छोडो कोई भूखा नहीं रहेगा ये भी कब होगा किसी सत्ताधारी को चिंता नहीं है । वीवीआईपी लोगों को स्वस्थ्य सेवा तुरंत ऐम्स जैसे अस्पताल में मिलती है मगर आम नागरिक कतार में खड़ा अधमरा होकर मौत का इंतज़ार करता है कब इस भेदभाव की व्यवस्था का अंत होगा क्या कोई दिन तय है । अर्थात देश की जनता को बुनियादी अधिकार मिलने को लेकर कोई भी सरकार कभी अपने कर्तव्य को निभाने को संकल्प नहीं निभाती है । सत्ता जनसेवा नहीं इक हथियार है डंडे से हांकने को नागरिक को गुलामों की तरह । 

    राजनेता सांसद विधायक बनकर देश की जनता के पैसे से करोड़ों रूपये पाने के हकदार बन जाते हैं और इनको कोई लज्जा शर्म नहीं आती ऐसा करते देश सेवा के नाम पर ऐशो आराम और लूट करते हुए । कोई बोलता नहीं ये अनुचित ढंग कब बंद होगा और सेवक कहलाने वाले कब देश की गरीब जनता पर बोझ नहीं बनेंगे । कोई भी राजनीतिक दल हो अपनी महत्वकांक्षा या वोटों की गंदी राजनीति की खातिर आम नागरिक को तमाम अन्य परेशानियों के बीच और परेशानी देने में संकोच नहीं करते हैं । 

संसद को इक अखाड़ा बना दिया गया है । 13 दिसंबर को संसद पर हमला हुआ था और सुरक्षाकर्मी मारे गए थे उनकी याद औपचारिक ढंग से कुछ क्षण करने के बाद जिस तरह संसद में सांसद विपक्षी नेता के ब्यान को लेकर हंगामा करते रहे अपने राजनीतिक मकसद की खातिर उसे ब्यान को आपत्तिजनक मान कर भी ज़रूरी नहीं समझा जा सकता है । वैसे भी ऐसे घटिया ब्यान खुद सत्ताधारी भी विपक्ष में रहते करते रहे हैं तब यही लोग ताली बजाया करते थे , आज भी बहुत नेता हैं जो सत्ताधारी दल में होते हुए अक्सर बेहद अनुचित और आपत्तिजनक भाषण ब्यान देते हैं मगर अपने दल के नेता की बात पर खामोश रहते हैं । जिन महिला सांसदों को महिलाओं के साथ अपराध पर आवाज़ उठानी चाहिए मगर नहीं कुछ भी बोलती सत्ता उनकी है इसलिए वही विपक्षी दल के नेता के ब्यान पर उत्तेजित हो जाती हैं । काश यही भाव महिलाओं के अधिकार उनके आरक्षण या उनसे भेदभाव को लेकर भी नज़र आता । मगर अपनी दलगत राजनीति से इतर उनको देश की वास्तविक चिंता कभी नहीं दिखाई देती है । 

 ये बेहद खेद की बात है कि देश की राजनीतिक व्यवस्था इतनी स्वार्थी और सत्ता के मोह में अंधी हो चुकी है कि शासन करने वाले नेताओं सत्ताधारी दल सरकारी अधिकारियों को नेताओं सांसदों विधायकों को देश सेवा की नहीं सत्ता की चाहत होती है और इनकी जनसेवा देशभक्ति सिर्फ कहने या दिखाने को है आडंबर है । वास्तविक जनता की भलाई या उनकी समस्याओं से किसी को कोई मतलब नहीं है । हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम ए गुलिस्तां क्या होगा । 

 

दिसंबर 09, 2019

POST : 1227 नारद जी सुन रहे आधुनिक गीता ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  नारद जी सुन रहे आधुनिक गीता ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

  अचानक आकाश मार्ग से विचरण करते हुए नारद मुनि जी को गीता गीता का शोर ऊंची ऊंची आवाज़ में सुनाई दिया । जिज्ञासा हुई फिर से गीता का ज्ञान देने कौन आया है धरती पर जाकर दर्शन करने चाहिएं । अपना पुराना रूप बदल इंसान बनकर उपदेश देने वाले के कक्ष में चले आये , नारद जी की ये आदत बदलती नहीं जब जिस जगह चाहा बिना सूचना दिए चले जाते हैं । दरवाज़े के बाहर पहुंचे तो भीतर से वार्तालाप सुनाई दे रहा है उत्सुकता हुई समझने की और चुपचाप खड़े होकर चर्चा का आनंद लेने लगे । कितने इश्तिहार बंटवा दिए हैं कितने स्वागत द्वार बनवाये हैं कितने ख़ास लोग शामिल होंगे सरकारी सहयोग से क्या क्या कुछ हासिल होगा । उनकी अपनी लिखी हुई घोषित गीता कितने ऊंचे दाम पर कौन कौन खरीदेगा और अभी तक किस सरकार ने कितनी गीता की किताबें उनकी ऊंची कीमत पर खरीदी हैं । नेताओं से सरकार से गठजोड़ से पिछले साल से कितना अधिक मुनाफा कारोबार में होने की संभावना है । अपने नाम को कितना अधिक आसमान से अधिक ऊपर विश्व भर में उपदेशक होने का सबसे बड़ा जानकर होने वाला घोषित किया जाना अभी बाकी है ।
 
 नारद जी को जिस बात की आशा थी गीता ज्ञान को लेकर इक शब्द भी सुनने को अभी तक नहीं मिला था । जनाब क्या मैं आपसे मिलने भीतर आ सकता हूं दरवाज़े से बाहर खड़े नारदजी ने पूछा तो अंदर आने की अनुमति मिल गई । जाकर जो भी आसन दिया गया नारदजी बैठ गए । बहुत चेले चपटे तमाम तरह की बातें अपने उन गुरूजी से करते रहे नारदजी को लग रहा था कोई कारोबार चल रहा है । नारदजी से पूछा गया आपको क्या कार्य है क्या शिष्य बनने की इच्छा से आये हैं या चरण छूने की अभिलाषा है । शाम को उपदेश से पहले आपका भी नाम घोषित किया जा सकता है अगर चाहते हैं तो तय राशि देकर नाम लिखवा सकते हैं । आपको मंच पर बुलाकर गुरूजी की फोटो के साथ सम्मान दिया जाएगा । नारदजी बोले भाई आपको ग़लतफ़हमी हुई है मेरे पास पैसे नहीं हैं कुछ भी खरीदने को । गीता के ज्ञान की कोई बात करते हैं तो सुनने की चाहत थी । 

    उपदेशक ने पास बुलाया और समझाया कि शाम को सभा में गीता का पाठ सुनाते हैं अवश्य आईयेगा । नारदजी ने कहा श्रीमान क्या थोड़ी बात करने को अभी समय है मुझे कुछ सवाल परेशान किये हुए हैं । हां ज़रूर पूछ सकते हैं आपके हर सवाल का उतर यहीं मिलेगा । नारदजी ने अपने झोले से ताज़ा अख़बार निकाला और खबरें पढ़कर सुनाने लगे । हत्या बलात्कार लूट दंगे फसाद और देश की राजनीति की गंदगी और शासकवर्ग के जनसेवा से भटकने और सत्ता का मनमाना दुरूपयोग करने को लेकर पूछा क्या आप लोगों को इस अधर्म को लेकर कोई चर्चा करते हैं ताकि सबको धर्म अधर्म का भेद समझाया जाये । उपदेशक जी कहने लगे नासमझ इंसान आप किस युग में रहते हैं भला किसी की शामत आई है जो इन सभी ताकतवर लोगों के बारे में ज़ुबान भी खोले । नारदजी ने सवाल किया तो क्या आपको गीता से कायरता का ज्ञान मिला है । जब अपने साधु  भेस धारण किया है और गीता का पाठ करते हैं तो किस बात का डर है कैसी चिंता है । क्या जीना है क्या मरना है क्या पाया है खोना क्या है । उपदेशक बोले भाई अभी जाओ शाम को आकर सभा में ध्यान पूर्वक सुनना फिर समझ जाओगे । ठीक है बोलकर नारदजी बाहर चले आये । 

शाम को नारदजी आठ बजे ही सभा स्थल चले आये जबकि उपदेशक ने बताया था आठ बजे मुझसे पहले छोटे गुरु उपदेश देते हैं मैं एक घंटा बाद नौ बजे आता हूं । ये अपने महत्व को समझने या समझाने का ढंग होगा मगर नारदजी आठ बजे ही सही समय पर चले आये । देखा इक बाज़ार लगा हुआ है हर सामान पर उपदेशक गुरूजी का नाम फोटो अंकित है और महंगे दाम बिकता है । दुकानदार से जाकर पूछा भाई यहां लोग गीता ज्ञान का सार समझने अर्थ जानने आते हैं और आप इस जगह व्यौपार करने आये हैं । धर्म की बात छोड़ अर्थ का मोह लिए हुए हैं । दुकानदार ने बताया कितने नासमझ हैं ये सारा धंधा उन्हीं का है पांच दिन के उपदेश की कीमत पांच लाख लेते हैं । शुद्ध कारोबार है इसमें धर्म की खोज मत करना , ये जो भी लोग खड़े हैं कतार लगाकर कोई धर्मात्मा नहीं हैं सब दो नंबर की आमदनी से कुछ दान देकर दानवीर और धर्मात्मा होने का तमगा खरीद ले जाते हैं । आपको गीता को समझना है तो इनकी हज़ार रूपये वाली ज़रूरी नहीं है बाज़ार से सौ दो सौ की खरीद पढ़ लेना । इधर कोई गीता पढ़ने सुनने नहीं आता है सबके मकसद कुछ और ही हैं । हैरान मत होना यहां किसी ने आपको नहीं पहचाना मगर मैंने आपको पहचान लिया है । नारद जी बोले क्या और कैसे मुझे पहचान लिया है । दुकानदार बोला कि आपके पास आते ही बिना आपके मुख खोले ही , नारायण -नारायण की ध्वनि सुनाई दी थी मुझे तभी समझ लिया था नारदजी हैं आप । ये उचित जगह नहीं है गीता को सुनने समझने के लिए आपको किसी और जगह जाना होगा । 

    तभी ऊपर से आते उपदेशक मिल गए तो नारदजी ने उनके सजाए बाज़ार को देख कर कहा था , आपने मुझे प्यार से बुलाया था चला आया मगर ये सब गीता से आपको समझ आया होगा मुझे नहीं समझना है ।उपदेशक जी नारद जी की बात को अनसुना कर मंच की तरफ बढ़ गए । समय के साथ धर्म उपदेशक इतना दूर निकल आये हैं देश से विदेश तक उनके संसथान हैं जिस में गीता नहीं जाने क्या क्या खरीदा जाता है बेचा जाता है सत्ता से गठजोड़ कर खोया है क्या पाया क्या है गणित ने अध्यात्म को भुला दिया है । 

iandkrsna | आधुनिक विद्वानों और राजनेताओं के लिए भगवद् गीता की व्याख्या  करना फैशन बन गया है. भगवान के परम व्यक्तित्व, कृष्ण, साक्षात प्रकट हुए और  ...



नवंबर 27, 2019

POST : 1226 कितने क़ातिल हैं सच के ( सत्येंद्र दुबे की बात ) डॉ लोक सेतिया

  कितने क़ातिल हैं सच के (  सत्येंद्र दुबे की बात )   डॉ लोक सेतिया 

जाँनिसार अख़्तर जी की ग़ज़ल से दो शेर उधार ले रहा हूं । आज 27 नवंबर सच की खातिर जान देने वाले एक आई ए एस अधिकारी का जन्म दिन भी है और उनका क़त्ल भी इसी दिन किया गया था । 

                   इन्कलाबों की घड़ी है , हर नहीं हां से बड़ी है ।

                 कितनी लाशों पे अभी तक , एक चादर सी पड़ी है । 

कल संविधान दिवस था और हर साल की तरह संसद में इक औपचारिकता रस्म की तरह निभाई गई । संविधान की भावना की बात छोड़ो उसकी अस्मत से खिलवाड़ करने वाले बड़ी बड़ी बातें बिना किसी लज्जा संकोच कह रहे थे । जबकि लोकतन्त्र की रूह तक परेशान थी उसको कितनी बात कत्ल किया और दफ़नाया जा चुका है और जैसे किसी रोगी को अस्पताल वाले अपनी कमाई की खातिर धड़कन बंद सांस नहीं चलती फिर भी वेंटीलेटर पर मुर्दा लाश की तरह ज़िंदा रखे हुए होते हैं ठीक उस तरह नेता सत्ता की खातिर करते रहे हैं । ये विडंबना की बात है कि हम लोग ऐसे वास्तविक ईमानदार देशभक्त और भ्र्ष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले अधिकारी को याद नहीं रखते और जिन लोगों ने अपना कर्तव्य नहीं निभाया उनको सच के क़ातिल होने की कोई सज़ा नहीं दिलवा सके हैं   । आज आपको उस आदर्श आईएस अधिकरी की वास्तविक जीवनी से अवगत करवाते हैं। 

                         सत्येंदर दुबे जी


             


                                   जन्म              2 7 नवंबर 1 9 7 3

                              कत्ल हुआ        2 7 नवंबर  2 0 0 3

 

सत्येंदर दुबे जी एक अधिकारी थे , इंडियन इंजिनीरिंग सर्विस ऑफिसर , प्रोजेक्ट डायरेक्टर नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया कोडरमा । उनको गया बिहार में जान से मार दिया गया था क़त्ल कर उनके ठीक जन्म दिन को ही तीस साल की आयु में ।

   हुआ ये था कि उन्होंने जब राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना में बहुत भ्र्ष्टाचार देखा और तमाम कोशिश करने के बाद भी रोकना संभव नहीं लगा तब उन्होंने एक सरकारी आला अधिकारी रहते एक गोपनीय पत्र पी एम ओ को भेजा विस्तृत जानकारी देते हुए । नियमानुसार उस खत को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी को ही पढ़ना था । मगर उस गोपनीय सूचना की बात को पी एम ओ से सड़क माफिया तक पहुंचाया गया और उन भ्र्ष्टाचारी लोगों ने सत्येंदर दुबे जी को क़त्ल कर दिया था । मगर कभी भी वास्तविक दोषी उन लोगों को कोई सज़ा नहीं मिली जिन्होंने उनके गोपनीय पत्र को माफिया तक पहुंचाया । और आज भी ये व्यवस्था उसी ढर्रे पर चलती है क्योंकि उसमें रत्ती भर भी बदलाव लाने की कोशिश ही नहीं हुई है ।  आखिर में इक शेर मेरी ग़ज़ल से लेकर सत्येंदर दुबे की आत्मा जो सवाल पूछती है कहना चाहता हूं ।

                                  तू कहीं मेरा ही क़ातिल तो नहीं ,

                                   मेरी अर्थी को उठाने वाले । 

 

एक ईमानदार IES अधिकारी : सत्येन्द्र दुबे || Biography of satyendra dubey ||  SUPERTOP - YouTube


नवंबर 25, 2019

POST : 1225 खज़ाना ले भागा खजांची बन ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   खज़ाना ले भागा खजांची बन ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   ये कहानी अलग है और बिल्कुल नई है इस का चौकीदार चोर है कथा से कोई संबंध नहीं है। इक परिवार के मुखिया चाचा और चाचा के भरोसे के भतीजे की आपसी बात है। घर की तमाम जायदाद के 54 दस्तावेज़ राजनीतिक दल के विधायकों की तरह अनमोल सत्ता की चाबी जैसे भतीजे की जेब में सुरक्षित रखने को चाचा ने सौंपे थे। मगर अचानक नीयत खराब होने से भतीजे ने उन दस्तावेज़ों को चुपके से किसी दुश्मन को ऊंची कीमत लेकर बेच दिया। चाचा को जब तक खबर होती दस्तावेज़ उपयोग कर दुश्मन की मालिकाना हक कानूनी ढंग से हासिल हो चुका था। कुछ खास लोग अपनी शिकायत पुलिस थाने नहीं लिखवाते हैं उनकी सीधी पहचान कमिश्नर तक होती है और उनका मुकदमा बड़ी अदालत छुट्टी के दिन भी सुनवाई करने को मंज़ूर करती रहती है। यहां भी वही बात है अदालत को सब खबर है फिर भी उसको संविधान न्याय से अधिक चिंता इस बात की है कि जिनके दस्तावेज़ चोरी हुए उन्होंने अर्ज़ी उस की नहीं बल्कि ये की थी कि जिस ने उन दस्तावेज़ों को देख कर किसी को सत्ता के ताले की चाबी सौंपी थी उस के आदेश को अनुचित घोषित कर निरस्त करना है। जबकि संबंधित अधिकारी के वकील अदालत को बता रहे हैं कि ये उनके मुवकिल का सरदर्द नहीं है कि जिन लोगों ने दस्तावेज़ हस्ताक्षर कर भतीजे को दिए थे उनकी सहमति उचित थी या नहीं थी। और अगर चाचा की जायदाद के कागज़ात किसी पावर ऑफ़ अटॉर्नी का अनुचित ढंग से उपयोग है तो ये चाचा भतीजे का आपसी मामला है। मगर अदालत को ऐसे दस्तावेज़ों से मिले अधिकार को लेकर कोई विचार नहीं करना चाहिए और अगर ये कोई धोखा है हेराफेरी है तो खुद वही अधिकारी इस पर उचित करवाई करने की आज़ाद है मगर कोई समय सीमा अदालत को तय नहीं करनी चाहिए। उधर हर कोई कीमती जायदाद की तरह अपने पास के सामान की सुरक्षा करने का काम कर रहा है ताकि दुश्मन कोई छीनाझपटी जैसी गुंडागर्दी या फिर कोई और ढंग नहीं अपना सके। जिनको सत्ता की चाबी मिली है जानते हैं उनकी ज़मीन पांव तले से निकल चुकी है मगर समय मिल जाये तो संभलने की उम्मीद रखते हैं या फिर चाबी वापस करने की ईमानदारी नहीं कर सकते क्योंकि नीयत खराब हो जाती है तो लाज शर्म की परवाह नहीं करते हैं। धड़कन सभी की बढ़ी हुई है सांसे फूलने लगी हैं जान अटकी हुई है और अदालत ने मामला और चौबीस घंटे को टाल दिया है।
    
   अदालत कहती है कोई उसको ये सुझाव नहीं दे सकता कि जो भी अनुचित कार्य किया जा चुका है उसको किस तरह से सुधारा जा सकता है। अदालत को अपने आदर की चिंता हमेशा रहती है और ज़रा सी बात अदालत की अवमानना की तलवार का शिकार हो सकती है इस डर से सभी सच बोलने की जगह खामोश रहना उचित समझते हैं। जान है तो जहान है कोई ओखली में सर नहीं डालना चाहता खासकर जब ऊपर सुनवाई की कोई उम्मीद ही नहीं हो। अदालत को पता चल चुका है कि आज जिन लोगों ने किसी को लिखित अपने अधिकार सौंपे थे इरादा बदल चुके हैं और कानून ये भी साफ है कि पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी देने वाला जब भी भरोसा नहीं रहे अपने दिए अधिकार वापस लेने का ऐलान कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो जिस ने भी भरोसा तोड़ा उसको भविष्य में कोई भी कार्य करने की इजाज़त नहीं होगी। मगर यहां दग़ाबाज़ भतीजा दस्तावेज़ के दम पर बयनामा कर चुका है और अभी जायदाद को उनके नाम कर सकता है जिनसे सौदेबाज़ी की है। ये इक अजब ढंग की मिसाल बन जाएगी अगर अदालत जानते समझते हुए किसी के अनुचित तरीके से दस्तावेज़ का गलत उपयोग करने वाले लोगों को रोकने को कठोर कदम नहीं उठती बल्कि उनका साथ देती है न्याय की साख को दांव पर लगाकर। वास्तविक अधिकारी लोग बंधक बन जाएंगे और जिसे खज़ाने की रखवाली को खजांची नियुक्त किया था दस्तावेज़ हथिया कर खुद को असली मालिक घोषित कर सकेगा। अर्थात खुद अदालत और कानून खज़ाने की हेराफेरी लूट या उस पर कब्ज़े को अनदेखा कर बंदरबांट की आधुनिक कथा लिख सकती है। और मुमकिन है भविष्य का इतिहास अदालत को गलत परंपरा कायम करने का मुजरिम करार देने की बात कहे।

नवंबर 21, 2019

POST : 1224 उड़ने की चाह में इरादे बदल जाते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       उड़ने की चाह में इरादे बदल जाते हैं ( ग़ज़ल ) 

                       डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

उड़ने की चाह में इरादे बदल जाते हैं 
पांव चलते हुए अचानक फिसल जाते हैं । 

अब मुहब्बत कहां , तिजारत सभी करते हैं 
अब तो क़िरदार रोज़ सारे बदल जाते हैं । 

ढूंढती हर शमां नहीं मिलते वो परवाने 
आग़ में प्यार की जलाते हैं जल जाते हैं । 

आस्मां पे नहीं ज़मीं पर नज़र रखते हैं 
राह फ़िसलन भरी कदम खुद संभल जाते हैं । 

फिर उसी मोड़ पर मुलाकात नहीं हो उनसे 
हम झुका कर नज़र उधर से निकल जाते हैं । 

दब गई राख में चिंगारी बनी जब शोला 
तेज़ आंधी चले महल तक भी जल जाते हैं । 

अब वहां कुछ नहीं न शीशा न साकी फिर भी 
देख कर मयक़दे को "तनहा" मचल जाते हैं ।