किसे आज जीना , किसे रोज़ मरना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
किसे आज जीना , किसे रोज़ मरनायही काम आता सियासत को करना ।
नहीं आप को गर है बेमौत मरना
पड़ेगा सभी हुक्मरानों से डरना ।
नहीं आप को गर है बेमौत मरना
पड़ेगा सभी हुक्मरानों से डरना ।
अगर झूठ उनके बुरे लग रहे हैं
न बोलो कभी सच है उनको अखरना ।
किनारे उन्हीं के हैं पतवार जिन की
न बोलो कभी सच है उनको अखरना ।
किनारे उन्हीं के हैं पतवार जिन की
उसी को डुबोते , जिसे पार करना ।
भला प्यास सत्ता की बुझती कभी है
बहाकर लहू जाम उनको है भरना ।
लुभाती सभी को हैं उनकी अदाएं
लुभाती सभी को हैं उनकी अदाएं
बहुत खूब उनका है सजना संवरना ।
बड़ी बेरहम अब सियासत है ' तनहा '
बड़ी बेरहम अब सियासत है ' तनहा '
न उनकी गली से कभी तुम गुज़रना ।
1 टिप्पणी:
उसी को डुबोते जिसे पार👌👍
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