अगस्त 31, 2025

POST : 2006 ख़ून - ए - जिगर से तस्वीर बनाई है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    ख़ून - ए - जिगर से तस्वीर बनाई है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया  

जाने क्या था कोई ख़्वाब था कि हक़ीक़त था , मुझे दूर इक महलनुमा ईमारत दिखाई दे रही थी जिसकी रौशनी से आंखें चुंधिया रही थी । कदम बढ़ाने लगा तो कोई आवाज़ सुनाई दी सावधान वहां साधरण लोगों का प्रवेश वर्जित है । आपको पहले प्रशासन राजनीति बड़े बड़े धनवान उद्योगपति कारोबारी बनकर राह बनानी होगी तभी सत्ता की हवेली का द्वार आपके लिए खुलेगा ।  मैंने देखा कोई साया जैसा खड़ा था मुझे अपनी तरफ आने का इशारा कर रहा था , मैंने कहा आपने मुझे सावधान किया क्या उधर कोई खतरा है आप कौन हैं बताएं मुझे । उसने खुद को इंसानियत का फ़रिश्ता बताया और कहा कि आप हमेशा इंसानियत की बात लिखते हैं तो सोचा आपको निराशा होगी जब आगे बढ़ोगे तो उस हवेली के भीतर अंधकार ही अंधकार देख कर घबराओगे । देखना है तो मैं यहीं से दिखला देता हूं और उन्होंने मुझे दिखलाया उस जगह  रौशनी के पीछे अंधेरे छुपे हुए हैं । नकली चकाचौंध ने हवेली के निवासी लोगों को खुद उनकी असलियत छुपाने को ऐसा आवरण बनाया हुआ था जैसे आजकल आधुनिक मॉल इत्यादि में शानदार शीशे बाहर से नज़र आते हैं असल में आर पार कुछ देख नहीं सकते । चमकदार लिबास पहने हुए लोग बदरंग और भयानक चेहरे बदन किसी खूंखार जानवर से मेल खाता हुआ , इंसान का आवरण ओढ़े शैतान लगते हैं । उस फ़रिश्ते ने अपने हाथ उठाए तो हाथ में कोई दूरबीन जैसा यंत्र आ गया , उसने कहा की मैंने ऊंचे आसमानों से जाकर इक तस्वीर बनाई है देखोगे । दिखाएं कैसी है आग्रह किया तो उन्होंने इक छोटी सी चिप जैसी अपने झोले से निकाली और बताया आपके देश की पूरी तस्वीर है और ये समय अनुसार बदलती जाएगी जब जैसे जहां भी देख सकते हैं । मैंने कहा इतनी छोटी तस्वीर में भला क्या क्या दिखाई देगा , मुझे बताया कि उसको बढ़ा कर के जितना भी चाहो विस्तार कर सकते हैं । 
 
शुरुआत में किसी बड़ी लंबी ऊंची दीवार जैसी स्क्रीन पर तस्वीर दिखाई , पूरा देश धरती नीचे से ऊपर इक लकीर जैसी जाती हुई लग रही थी । डरना मत ये कोई रौशनी की लकीर नहीं है , ये इक सुरंग जैसी रचना है जिस का अंतिम सिरा ऊपर हवेली में रहने वालों से जुड़ा है , नीचे धरती से सामन्य जन से जिसकी कितनी करोड़ों शाखाएं जुड़ती हैं मिलकर बारीक नलियों से बड़े आकर की होती जाती हैं । क्या ऊपर से कुछ भोजन अनाज आदि नीचे आता है पूछने पर हंसने लगे , नहीं कुछ भी ऊपर से कभी नीचे नहीं आता है ये किसी पंप जैसा है जो नीचे से खींचता रहता है । आपको बड़ा कर के दिखाता हूं कहकर उन्होंने खुले आसमान को किसी पर्दे की तरह उपयोग कर जो दृश्य दिखलाना रौंगटे खड़े करने वाला था । सौ करोड़ जनता की रगों से लहू चूसा जा रहा था और कुछ राजनेता अधिकारी कर्मचारी धनवान लोग ख़ास समझे जाने वाले वीवीआईपी लोग जनता का लहू पीकर नशे में मस्ती में झूमते गाते दिखाई दिए । मैंने कहा नहीं मुझे लगता है आपसे कोई भूल हुई है हमारे देश में लोग शाकाहारी मांसाहारी होते हैं फलाहारी भी लेकिन खून कोई कैसे पी सकता है । उसने बताया यही सत्य है कुछ प्रतिशत लोग जिनके पास आवश्यकता से अधिक है तब भी उनकी और अधिक पाने की हवस मिटती ही नहीं जितना मिलता है और बढ़ती है वास्तव में नब्बे प्रतिशत का हिस्सा वही खाकर खुद को महान समझते हैं ।  
 
आपको कोई पुरानी कहानी याद आई , जब कोई पढ़ लिख कर बड़ा बनता है किसी ऊंचे ओहदे पर बैठता है तो उसको लोभी लालची झूठा फरेबी धोखेबाज़ नहीं दयालू ईमानदार होना चाहिए । जिनको अधिक धन प्राप्त हो दीन दुःखियों की सहायता पर समाज कल्याण पर खर्च करना चाहिए । इंसानों पर ही नहीं बल्कि पेड़ पौधे जीव जंतुओं नदियों कुदरत की हर चीज़ पर प्यार की भावना रखनी चाहिए । जिन्होंने बचपन में उस शिक्षा को पढ़कर परीक्षा में सही कर्म करने की शपथ उठाई ये सभी विधाता की शिक्षक की सीख से विपरीत आचरण कर देश की बदहाली का कारण बन गए हैं । अन्यथा देश की आज़ादी के 78 साल बाद कोई भी भूखा नहीं रहना चाहिए था । आदमी आदमी का लहू पीने लगा है हैवानियत पर उतारू है , कुछ लोग बीच में भी रहते हैं खुद उनका खून कोई पीता है किसी का वो पीते हैं चंद पैसों ने इंसान को शैतान बना डाला है । देवताओं और दैत्यों की वो कथाएं किसी ने दुनिया की सच्चाई अच्छाई बुराई को समझाने को बनाई थीं । मैं अकेला खड़ा उलझन में हूं कि क्या कोई सच में आया था या कोई वहम था मुझे दुविधा होने लगी है । 
 
  अतिवृष्टि वाली वनस्पति द्वारा आंशिक रूप से छिपा हुआ एक गुफा प्रवेश द्वार  जिसके पीछे अंधेरे में एक रास्ता जाता है | Premium AI-जनरेटेड इमेज

कोई टिप्पणी नहीं: