Monday, 11 March 2013

कहीं दिल के है पास लगता है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कहीं दिल के है पास लगता है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कहीं दिल के है पास लगता है
ये दिल फिर क्यों उदास लगता है।

बहुत प्यासा , उसे पिला देना
समुन्दर की वो प्यास लगता है।

अंधेरी रात जब भी आती है
वही मुखड़ा उजास लगता है।

जिसे ख़बरों में आ गया रहना
ज़माने भर को ख़ास लगता है।

न तो चन्दरमुखी , न है पारो
अकेला देवदास लगता है।

उसे तोड़ा बहुत ज़माने ने
नहीं टूटी है आस लगता है।

हुये जब दूर चार दिन "तनहा" 
हमें इक दिन भी मास लगता है। 

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