Sunday, 27 January 2013

सच जो कहने लगा हूं मैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सच जो कहने लगा हूं मैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सच जो कहने लगा हूं मैं
सबको लगता बुरा हूं मैं।

अब है जंज़ीर पैरों में
पर कभी खुद चला हूं मैं।

बंद था घर का दरवाज़ा
जब कभी घर गया हूं मैं।

अब सुनाओ मुझे लोरी
रात भर का जगा हूं मैं।

अब नहीं लौटना मुझको
छोड़ कर सब चला हूं मैं।

आप मत उससे मिलवाना
ज़िंदगी से डरा हूं मैं।

सोच कर मैं ये हैरां हूं
कैसे "तनहा" जिया हूं मैं।

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