Thursday, 24 January 2013

दोस्त अपने हमें बुला न सके ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त अपने हमें बुला न सके ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त अपने हमें बुला न सके
हम भी गैरों के पास जा न सके।

प्यार तो प्यार है इबादत है
पर सभी ये सबक पढ़ा न सके।

जो कभी साथ साथ गाये थे
हम ख़ुशी के वो गीत गा न सके।

आप करते गये सितम पे सितम
हम लबों तक भी बात ला न सके।

कह रहा है हमें ज़माना भी
सीख जीने की तुम अदा न सके।

मत कभी रूठ कर चले जाना
हम  किसी को कभी मना न सके।

तुम हमें दे गये कसम "तनहा"
अश्क हम चाह कर बहा न सके।

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