Tuesday, 15 January 2013

लब पे आई तो मुहब्बत आई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

लब पे आई तो मुहब्बत आई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

लब पे आई तो मुहब्बत आई
भूल कर भी न शिकायत आई।

बात कुछ ऐसी चली महफ़िल में
फिर हमें याद वो मूरत आई।

हम से बिछुड़ी जो अभी शाम ढले
रात भर याद वो सूरत आई।

कश्ती लहरों के हवाले कर दी
बेबसी में जो ये नौबत आई।

आसमां रंग बदल कर बोला
लो ज़मीं वालो कयामत आई।

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