Sunday, 27 January 2013

ग़ज़ल 6 7 ( सच जो कहने लगा हूँ मैं )

सच जो कहने लगा हूं मैं - लोक सेतिया "तनहा"

सच जो कहने लगा हूं मैं ,
सबको लगता बुरा हूं मैं।

अब है जंज़ीर पैरों में ,
पर कभी खुद चला हूं मैं।

बंद था घर का दरवाज़ा ,
जब कभी घर गया हूं मैं।

अब सुनाओ मुझे लोरी ,
रात भर का जगा हूं मैं।

अब नहीं लौटना मुझको ,
छोड़ कर सब चला हूं मैं।

आप मत उससे मिलवाना ,
ज़िंदगी से डरा हूं मैं।

सोच कर मैं ये हैरां हूं ,
कैसे "तनहा" जिया हूं मैं।

Friday, 25 January 2013

ग़ज़ल 1 4 7 ( हमें भी है जीना , नहीं रोज़ मरना ) - लोक सेतिया "तनहा"

हमें भी है जीना , नहीं रोज़ मरना - लोक सेतिया "तनहा"

हमें भी है जीना ,नहीं रोज़ मरना ,
ज़माना करे अब उसे जो है करना।

सियासत तुम्हारी मुबारिक तुम्हीं को ,
नहीं अब हमें हुक्मरानों से डरना।

लगे झूठ को सच बताने सभी अब ,
अगर सच कहेंगे सभी को अखरना।

किनारे उन्हीं के थी पतवार उनकी ,
हमें था वहां बस भंवर में उतरना।

बुझाते कभी प्यास पूरी किसी की ,
पिलाना अगर अब सभी जाम भरना।

लुभाना पिया को सभी चाहते हैं ,
है मालूम किसको हो कैसे संवरना।

हैं दुश्मन यहां सब नहीं दोस्त कोई ,
कभी भी यहां पर न "तनहा" ठहरना।  

Thursday, 24 January 2013

ग़ज़ल 1 2 7 ( दोस्त अपने हमें बुला न सके ) - लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त अपने हमें बुला न सके - लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त अपने हमें बुला न सके ,
हम भी गैरों के पास जा न सके।

प्यार तो प्यार है इबादत है ,
पर सभी ये सबक पढ़ा न सके।

जो कभी साथ साथ गाये थे ,
हम ख़ुशी के वो गीत गा न सके।

आप करते गये सितम पे सितम ,
हम लबों तक भी बात ला न सके।

कह रहा है हमें ज़माना भी ,
सीख जीने की तुम अदा न सके।

मत कभी रूठ कर चले जाना ,
हम  किसी को कभी मना न सके।

तुम हमें दे गये कसम "तनहा" ,
अश्क हम चाह कर बहा न सके।

ग़ज़ल 1 2 5 ( दोस्ती इस तरह निभाते हैं )

दोस्ती इस तरह निभाते हैं

दोस्ती इस तरह निभाते हैं ,
रूठ जाते कभी मनाते हैं।

रोज़  घर पर हमें बुलाते हैं ,
दर से अपने कभी उठाते हैं।

वो कहानी हुई पुरानी अब ,
इक नई दास्तां सुनाते हैं।

रात आते नज़र सितारे भी ,
और जुगनू भी टिमटिमाते हैं।

लोग मिलते नहीं कभी खुद से ,
आज तुम से तुम्हें मिलाते हैं।

मंज़िलें पास पास लगती हैं ,
बोझ मिलकर अगर उठाते हैं।

जब भी "तनहा" उदास होते हैं ,
दीप आशा के कुछ जलाते हैं।

Wednesday, 23 January 2013

ग़ज़ल 5 5 ( फूलों के उसे पैगाम दिये )

फूलों के उसे पैगाम दिये

फूलों के उसे पैग़ाम दिये  ,
जिसने थे ज़हर के जाम दिये।

हर ज़ख्म दिया अपनों ने मुझे ,
कुछ सुबह दिए कुछ शाम दिये।

सूली पे चढ़ा कर खुद हमको ,
हम पर ही सभी इल्ज़ाम दिये।

कल तक था हमारा दोस्त वही ,
ग़म सब जिसने ईनाम दिये।

पागल समझा ,दीवाना कहा ,
दुनिया ने यही कुछ नाम दिये।

हर दर्द दिया यारों ने हमें ,
कुछ ख़ास दिये , कुछ आम दिये।

हीरे थे कई ,   मोती थे कई ,
"तनहा" ने  सभी बेदाम दिये।

Sunday, 20 January 2013

ग़ज़ल 9 3 ( खूबसूरत अदाओं पे आता है प्यार ) - लोक सेतिया "तनहा"

 खूबसूरत अदाओं पे आता है प्यार - लोक सेतिया "तनहा"

खूबसूरत अदाओं पे आता है प्यार ,
महकी महकी फिज़ाओं पे आता है प्यार।

उनका दामन हवाओं में उड़ने लगा है ,
हमको ऐसी हवाओं पे आता है प्यार।

रात भर हम नहीं सो सके डर के मारे ,
उनको काली घटाओं पे आता है प्यार।

वक़्त आने पे सब छोड़ जाते हैं साथ ,
यूं तो सारे खुदाओं पे आता है प्यार।

उनको सिजदा करो, सर झुका के हज़ूर ,
ऐसे उनको दुआओं पे आता है प्यार।

देख लो ये कहां पर है लाई हयात ,
अब हमें इन कज़ाओं पे आता है प्यार। 

ग़ज़ल 1 0 0 ( अब हर किसी को अपना बताने लगे हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

अब हर किसी को अपना बताने लगे हैं - लोक सेतिया "तनहा"

अब हर किसी को अपना बताने लगे हैं ,
लेकिन हमीं से नज़रें चुराने लगे हैं।

अंदाज़ उनकी हर बात का अब नया है ,
लेकिन हमें मतलब समझ आने लगे हैं।

जब से कहानी अपनी सुनाई किसी को ,
सारे ज़माने वाले सताने लगे हैं।

हमने नहीं जाना अब किसी और घर में ,
बस आपके घर आए थे , जाने लगे हैं।

बेदाग़ कोई आता नज़र अब नहीं है ,
सब आईना औरों को दिखाने लगे हैं।

लिखवा लिया हमने बेवफा नाम ,जब से ,
"तनहा" हमें आकर आज़माने लगे है।

आज सोचा ( कविता ) 7 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

 आज सोचा ( कविता ) लोक सेतिया 

न सोचा कभी ,
न समझा ,
न कभी जाना ,
है बाकी रहा ,
अब तक ,
खुद को ही ,
मुझे पाना।

किसलिये जीता रहा ,
मैं किसलिये मरता रहा ,
खो गया जीवन कहीं ,
क्या उम्र भर करता रहा ,
डर है भला कैसा मुझे ,
किस बात से डरता रहा ,
दुनिया में अपना कौन है ,
तलाश क्या करता रहा ।

खुद को नहीं समझा कभी ,
क्यों काम ये करता रहा ,
खड़ा रहा नदी किनारे ,
गागर को नहीं भरता रहा ,
जीने से करना प्यार था ,
पर नहीं करता रहा।

अब तो सोच ले ज़रा ,
हर पल ही तू मरता रहा ,
दिया किसे दुनिया ने क्या ,
दुनिया की बातें दे भुला ,
चलना है खुद के साथ चल ,
बस साथ अब अपना निभा ,
खुद से कर कुछ प्यार अब ,
सब दर्द दिल के मिटा।

ऐसे है जीना अब तुझे ,
रहे तेरा दामन भरा ,
कहता यही है वक़्त भी ,
न लौट कर फिर आयेगा ,
पाना हो जो पा ले अभी ,
सब कुछ तुझे मिल जाएगा।

Friday, 18 January 2013

ग़ज़ल 1 2 6 ( बात पूछो न हम अदीबों की ) - लोक सेतिया "तनहा"

बात पूछो न हम अदीबों की - लोक सेतिया "तनहा"

बात पूछो न हम अदीबों की ,
खाक उड़ जाएगी उमीदों की।

मत चढ़ाना किसी को सूली पर ,
बस यही आरज़ू सलीबों की।

दौलतों से ख़ुशी नहीं मिलती ,
बात झूठी नहीं फकीरों की।

आ गये छोड़ कर पहाड़ों को ,
छांव देखी नहीं चिनारों की।

याद अब तक बहुत सताती है ,
दिलरुबा की हसीं अदाओं की।

बात मेरी भी आज कुछ सुन लो ,
फिर सज़ा दो मुझे गुनाहों की।

चल कहीं और अब चलें "तनहा" ,
जल रही है चिता वफ़ाओं की।  

Tuesday, 15 January 2013

ग़ज़ल 6 2 ( लब पे आई तो मुहब्बत आई ) - लोक सेतिया "तनहा"

लब पे आई तो मुहब्बत आई - लोक सेतिया "तनहा"

लब पे आई तो मुहब्बत आई ,
भूल कर भी न शिकायत आई।

बात कुछ ऐसी चली महफ़िल में ,
फिर हमें याद वो मूरत आई।

हम से बिछुड़ी जो अभी शाम ढले ,
रात भर याद वो सूरत आई।

कश्ती लहरों के हवाले कर दी ,
बेबसी में जो ये नौबत आई।

आसमां रंग बदल कर बोला ,
लो ज़मीं वालो कयामत आई।

Saturday, 12 January 2013

ग़ज़ल 9 4 ( आज खारों की बात याद आई ) - लोक सेतिया "तनहा"

आज खारों की बात याद आई  - लोक सेतिया "तनहा"

आज खारों की बात याद आई ,
जब बहारों की बात याद आई।

प्यास अपनी न बुझ सकी अभी तक ,
ये किनारों की बात याद आई।

आज जाने कहां वो खो गए हैं ,
जिन नज़ारों की बात याद आई।

साथ मिलके दुआ थे मांगते हम ,
उन मज़ारों की बात याद आई।

कुछ नहीं दर्द के सिवा मुहब्बत ,
ग़म के मारों की बात याद आई।

जब गुज़ारी थी जाग कर के रातें ,
चांद तारों की बात याद आई।

दूर रह कर भी पास पास होंगे ,
हमको यारों की बात याद आई।

आज देखा वतन का हाल "तनहा" ,
उनके नारों की बात याद आई। 

ग़ज़ल 9 2 ( किसी मेहरबां की इनायत के लिये ) - लोक सेतिया "तनहा"

किसी मेहरबां की इनायत के लिये - लोक सेतिया "तनहा"

किसी मेहरबां की इनायत के लिये  ,
हमें अब है जीना मुहब्बत के लिये।

दिखाओ खुदा का हमें कोई निशां ,
चलें साथ मिलके इबादत के लिये।

सुनाओ हमें आज अपना हाले-दिल ,
तेरे पास आए हैं उल्फत के लिये।

नहीं मिल सका आज उनसे कुछ हमें ,
तराशे थे बुत जो अकीदत के लिये।

नहीं पास कोई न कोई दूर है ,
यहां सब खड़े हैं तिजारत के लिये।

किसी को नहीं पार करते नाखुदा ,
कहां आ गए लोग राहत के लिये।

यहां क्या मिला है किसे कर के वफ़ा ,
कहां आ गए आप चाहत के लिये।

नहीं काम कोई भी "तनहा" का यहां ,
जहां ये बना है सियासत के लिये। 

ग़ज़ल 8 3 ( वो भी जीता रहा ज़िंदगी के बिना ) - लोक सेतिया "तनहा"

वो भी जीता रहा ज़िंदगी के बिना - लोक सेतिया "तनहा"

वो भी जीता रहा ज़िंदगी के बिना ,
हम भी जलते रहे रौशनी के बिना।

उनसे हम बात करते भला और क्या ,
कुछ भी आता नहीं आशिकी के बिना।

बात महफ़िल में होने लगी होश की ,
कुछ न आया मज़ा बेखुदी के बिना।

जब कभी हम मिलें , उस हसीं रात में ,
आ भी जाना वहां , तुम घड़ी के बिना।

एक दिन  सामने   दे दिखाई खुदा ,
यूं ही "तनहा" मगर बंदगी के बिना।

Thursday, 10 January 2013

ग़ज़ल 118 ( रुलाता सब जमाना है , हमें रोना नहीं आता ) - लोक सेतिया "तनहा"

 रुलाता सब ज़माना है , हमें रोना नहीं आता - लोक सेतिया "तनहा"

रुलाता सब ज़माना है , हमें रोना नहीं आता ,
हमें अश्कों से अपने दर्द सब धोना नहीं आता।

सिखा जाना कभी आकर दिलों को जीतते कैसे ,
हमें सब और है आता , यही टोना नहीं आता।

बढ़ाते जा रहे हैं सब कतारें खुद गुनाहों की ,
न बांधो पाप की गठड़ी अगर ढोना नहीं आता।

यहां पर आंधियां चलती बहुत ज़ालिम ज़माने की ,
तुम्हें लेकिन संभल कर खुद खड़े होना नहीं आता।

सभी कांटे हमें देना , उन्हीं को फूल दे देना ,
ख़ुशी का बीज जीवन में , जिन्हें बोना नहीं आता।

हमेशा मांगते रहते , मगर कैसे मिले कुछ भी ,
जिन्हें पाना तो आता है , मगर खोना नहीं आता।

चले आये हैं महफ़िल में , बिताने रात इक अपनी ,
अकेले रात भर "तनहा" हमें सोना नहीं आता।

Wednesday, 9 January 2013

ग़ज़ल 1 0 5 ( क्या बताएं हम खुदा क्या है ) - लोक सेतिया "तनहा"

क्या बताएं हम खुदा क्या है - लोक सेतिया "तनहा"

क्या बताएं हम ख़ुदा क्या है ,
मिल न पाये गर खता क्या है।

सुन लिया सारे ज़माने ने ,
अब छुपाने को बचा क्या है।

है बहुत मुश्किल समझ पाना ,
हुस्न वालों की हया क्या है।

सब लुटाया प्यार में लोगो ,
हम से अब पूछो वफ़ा क्या है।

मर्ज़ बढ़ता जा रहा हर दिन ,
चारागर इसकी दवा क्या है।

लग रहा सब कुछ यहां बदला ,
कुछ हुआ तो है , हुआ क्या है।

साथ जीना साथ मर जाना ,
और "तनहा" इल्तिजा क्या है। 

Tuesday, 8 January 2013

ग़ज़ल 1 1 3 ( इन अंधेरों को मिटाता कोई ) - लोक सेतिया "तनहा"

इन अंधेरों को मिटाता कोई - लोक सेतिया "तनहा"

इन अंधेरों को मिटाता कोई ,
अब चिरागों को जलाता कोई।

राह से भटके मुसाफिर सब हैं ,
रास्ता किसको बताता कोई।

कारवां कोई नज़र आ जाता ,
हमको मंज़िल से मिलाता कोई।

शब गुज़र जाती जिसे सुन कर के ,
इक कहानी तो सुनाता कोई।

की खता हमने , कभी तुमने की ,
अब गिले शिकवे भुलाता कोई।

क्यों झुका आंखें वहां जाते हम ,
दाग़ अपने जो मिटाता कोई।

मौत से "तनहा" कहां डरते हैं ,
ज़हर आकर खुद पिलाता कोई। 

ग़ज़ल 1 1 2 ( खो गया जब कभी किनारा है ) - लोक सेतिया "तनहा"

 खो गया जब कभी किनारा है - लोक सेतिया "तनहा"

खो गया जब कभी किनारा है ,
नाखुदा को नहीं पुकारा है।

इस जहां में सभी अकेले हैं ,
ज़िंदगी ने सभी को मारा है।

फिर सुनाओ हमें ग़ज़ल अपनी ,
आपने कल जिसे संवारा है।

कल तलक तो बड़ी मुहब्बत थी ,
आज क्यों कर लिया किनारा है।

मुश्किलों से कभी न घबराना ,
कर रही हर सुबह इशारा है।

उनसे कैसे ये हम कहें जाकर ,
बिन तुम्हारे नहीं गुज़ारा है।

डर नहीं अब रकीब का "तनहा" ,
प्यार का जब मिला सहारा है।

Monday, 7 January 2013

ग़ज़ल 172 ( तुम सिखाते रहे दोस्ती ) - लोक सेतिया "तनहा"

तुम सिखाते रहे दोस्ती - लोक सेतिया "तनहा"

तुम सिखाते रहे दोस्ती ,
लोग बनते गए अजनबी।

आज हमसे मिले आप जब ,
मिल गई तब हमें ज़िंदगी।

आपने क्या ये जादू किया ,
लूट दिल ले गई सादगी।

हाल ऐसा हमारा हुआ ,
दूर होकर हुए पास भी।

हम मिलेंगे कभी तो कहीं ,
देखनी बस है दुनिया वही।

तुम न होना कभी अब जुदा ,
हमसे वादा करो तुम यही।

आ भी जाओ खुला दर मेरा ,
इक यही बात "तनहा" कही।

Sunday, 6 January 2013

ग़ज़ल 7 8 ( सब के वादों का न ऐतबार करो ) - लोक सेतिया "तनहा"

सब के वादों का न एतबार करो - लोक सेतिया "तनहा"

सब के वादों का न एतबार करो ,
उनके आने का न इंतज़ार करो।

कुछ नहीं मिलता यहां वफ़ा करके ,
तुम खता ऐसी न बार बार करो।

उसने पूछा था बड़ी अदा से कभी ,
कह दिया हमने , हमें न प्यार करो।

धड़कनों पर ही न इख्तियार रहे ,
इतना तो दिल को न बेकरार करो।

भर के बाहों में उसे था चूम लिया ,
यूं तो ख़्वाबों को न गुनाहगार करो।

बेवफा अहले जहां हुआ "तनहा" ,
तुम वफाएं अब न बार बार करो। 

ग़ज़ल 3 9 ( हद से अब तो गुज़र गये हैं लोग ) - लोक सेतिया "तनहा"

 हद से अब तो गुज़र गये हैं लोग - लोक सेतिया "तनहा"

हद से अब तो गुज़र गये हैं लोग ,
जाने क्यूँ सच से डर गये  हैं लोग।

हमने ये भी तमाशा देखा है ,
पी के अमृत भी मर गये  हैं लोग।

शहर लगता है आज वीराना ,
कौन जाने किधर गये  हैं लोग।

फूल गुलशन में अब नहीं खिलते ,
ज़ुल्म कुछ ऐसा कर गये  हैं लोग।

ये मरुस्थल की मृगतृष्णा है ,
पानी पीने जिधर गये हैं लोग।

Saturday, 5 January 2013

अपराधी महिला जगत के ( कविता ) 7 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

 अपराधी महिला जगत के - लोक सेतिया "तनहा"

आप ,
हां आप भी ,
शामिल हैं ,
महिलाओं के विरुद्ध ,
बढ़ रहे अपराधों में ,
किसी न किसी तरह ।

आप जो ,
अपने ,
कारोबार के लिये  ,
प्रसाधनों के ,
प्रचार के लिये  ,
प्रदर्शित करते है ,
औरत को ,
बना कर ,
उपभोग की एक वस्तु ।
     
आपकी ,
ये विकृत मानसिकता ,
जाने कितने और लोगों को ,
करती है प्रभावित ,
एक बीमार सोच से।

जब भी ऐसे लोग करते हैं ,
व्यभिचार ,
किसी बेबस अबला से ,
होते हैं आप भी ,
उसके ज़िम्मेदार।

आपके टी वी सीरियल ,
फ़िल्में आपकी ,
जब समझते हैं  ,
औरतों के बदन को ,
मनोरंजन का माध्यम ,
पैसा बनाने ,
कामयाबी ,
हासिल करने के लिये  ,
लेते हैं सहारा बेहूदगी का ,
क्योंकि नहीं होती ,
आपके पास ,
अच्छी कहानी ,
और रचनात्मक सोच ,
समझ बैठे हैं फिल्म बनाने ,
सीरियल बनाने को ,
सिर्फ मुनाफा कमाने का कारोबार।

क्या परोस रहें हैं  ,
अपने समाज को ,
नहीं आपको ज़रा भी सरोकार।

आप हों अभिनेत्री ,
चाहे कोई माडल ,
कर रही हैं क्या आप भी ,
सोचा क्या कभी ,
थोड़ा सा धन कमाने को  ,
आप अपने को दिखा  रही हैं  ,
अर्धनग्न  ,
सभ्यता की सीमा को ,
पार करते हुए ,
आपको अपनी वेशभूषा ,
पसंद से ,
पहनने का पूरा हक है ,
मगर पर्दे पर ,
आप अकेली नहीं होती ,
आपके साथ सारी नारी जाति ,
का भी होता है सम्मान ,
जो बन सकता है अपमान ,
जब हर कोई देखता है ,
बुरी नज़र से ,
आपके नंगे बदन को ,
आपका धन या ,
अधिक धन ,
पाने का स्वार्थ ,
बन जाता है  ,
नारी जगत के लिए शर्म।

ऐसे दृश्य कर सकते हैं  ,
लोगों की ,
मानसिकता को विकृत ,
समाज की ,
हर महिला के लिये।

हद हो चुकी है ,
समाज के पतन की ,
चिंतन करें अब ,
कौन कौन है गुनहगार। 

Friday, 4 January 2013

ग़ज़ल 1 7 1 ( खुद को कितना तबाह कर बैठे ) - लोक सेतिया "तनहा"

खुद को कितना तबाह कर बैठे - लोक सेतिया "तनहा"

खुद को कितना तबाह कर बैठे ,
हम ये कैसा गुनाह कर बैठे।

कर रही ज़िंदगी यही शिकवा ,
क्यों उसे हम फनाह कर बैठे।

देखकर आपके सितम हम पर ,
आज दुश्मन भी आह कर बैठे।

उनके आने से जम गई महफ़िल ,
उस तरफ सब निगाह कर बैठे।

ग़ज़ल हमने उन्हें सुनाई थी ,
लोग सारे ही वाह कर बैठे।

दे रहा हर किसी को धोखा जो ,
तुम उसी की हो चाह कर बैठे।

राह चलता रहा वही "तनहा" ,
लोग सब और राह कर बैठे।