जून 29, 2016

POST : 512 नया फैशन सरकार का ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      नया फैशन सरकार का ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                 सरकार का नया विज्ञापन आया है। ईमानदार सरकार का। अब ईमानदारी की सभी की अपनी परिभाषा होती है। मेरे शहर में बड़े अधिकारी की ईमानदारी यही है कि वो जिन से घूस लेता है उनको हर गलत काम खुल कर करने देता है। आप कितनी शिकायत करते रहो वो अपने कान बंद रखता है और आंखें भी। उसको किसी का अवैध कब्ज़ा नज़र आता ही नहीं न ही नियम तोड़ना , आप सड़क पर कब्ज़ा करें या फुटपाथ को रोक गंदगी फैलाते रहें आपको सब की अनुमति है। एक पुलिस अफ्सर नशा मुक्ति की बातें करता है और यह भी जानता है खुद उसका विभाग ही नशे का कारोबार करवा रहा है। जब किसी बस्ती के लोग शिकायत करते हैं और अफ्सर अपने अधीन अधिकारी को धंधा बंद कराने को कहता है और अधिकारी आदत के अनुसार कुछ नहीं करता तब अफ्सर को दिखाना होता है कि वह ईमानदार है। मगर जो पुलिस को बाकयदा हिस्सा देकर नशे का कारोबार करते हैं उनके प्रति अफ्सर भी ईमानदार होते हैं और जब ऐसे नशे की दुकान की शिकायत होती है तब खुद पुलिस के लोग खड़े होकर दूसरी जगह नई दुकान , या खोखा बनवा कारोबार चलाने वाले को अपनी ईमानदारी का सबूत देते हैं। नशे की लत से जब किसी की जान चली जाती है तब पुलिस का सभी अधिकारी खुद दखल देते हैं ताकि उस मौत को स्वाभाविक मृत्यु घोषित किया जा सके , ऐसे में सब चोर चोर मौसेरे भाई बन जाते हैं और डॉक्टर भी हार्ट अटैक से मौत होना घोषित कर देते हैं। सभी ईमानदार हैं , जिसकी खाते हैं उसकी बजाते हैं।

            इक अभिनेता ने इक राज्य में शराब बंदी पर बयान दिया कि वह उस राज्य में नहीं जाया करेंगे। उनका मानना है इस से अवैध ढंग से शराब बेचने वालों का धंधा चलता है और पीने वालों को अच्छी शराब नहीं मिलती है। बात तो ईमानदारी की है , यही होता है , देखा गया है। लेकिन बात सरकार की ईमानदार होने के विज्ञापन की हो रही थी। इक प्रधानमंत्री हुए हैं जिनके नाम के साथ भी ईमानदारी का तमगा लगा हुआ था , उनके काल में इतने घोटाले हुए इतना भ्र्ष्टाचार हुआ फिर भी उनका तमगा कायम रहा। जबकि वास्तव में जब एक कलर्क भी रिश्वत लेता है तब देने वाले को सरकार भ्रष्ट नज़र आती है। किस की चुनरी में दाग नहीं लगा , सभी कहते हैं लागा चुनरी में दाग छुपाऊं कैसे। अब तो लोग कहते हैं दाग अच्छे हैं। मगर जाने क्यों इस सरकार को चकाचक सफेद पोशाक पहनने का महंगा शौक चर्राया है जो ये विज्ञापन बनवा लिया है। मुझे भी कभी सफ़ेद पैंट - शर्ट पहनने का शौक हुआ करता था और जब भी पहनी बरसात हो जाती थी और कहीं न कहीं से कोई छींटा दागदार कर देता था। अब बरसात का मौसम भी आने को है , खुदा सरकारी पोशाक की लाज रखना। मगर चिंता की कोई बात नहीं है , हर फैशन दो दिन बाद बदल जाता है। मुमकिन है सरकार भी अभी से अगले विज्ञापन को लेकर चर्चा करने लगी हो। क्योंकि हर कुछ दिन बाद सरकार को लगता है उसका विज्ञापन अब ऐतबार के काबिल नहीं रहा और उसको बदल देती है। ये नया फैशन भी सरकार का जल्द ही बदलेगा उम्मीद तो यही है।
                                    नर्म आवाज़ भली बातें मुहज़ब लहज़े
                                    पहली बारिश में ही ये रंग उतर जाते हैं।

                                           ( किसी शायर का शेर है )

जून 13, 2016

POST : 511 ये किन लोगों की बात है ( मानवाधिकारों की बात ) डॉ लोक सेतिया

 ये किन लोगों की बात है ( मानवाधिकारों की बात ) डॉ लोक सेतिया

                 आज जैसे मेरे अंदर सोया हुआ कोई फिर से जाग गया । बहुत दिन से अखबारों में चर्चा थी 
 31 मई को फतेहाबाद में मानव अधिकार आयोग की सभा आयोजित होनी है । सोचा चलो चल कर देखते हैं शायद कुछ विशेष मिल जाये जो सार्थक हो । पता चला कि सैमीनार आलीशान बैंकट हाल में होना है क्योंकि सरकारी सभी इमारतों के हाल वातानुकूलित नहीं है , और बड़े बड़े लोग आने हैं भाषण देने को । जब मैं वहां पहुंचा तो देखा प्रवेश के मुख्य द्वार पर बैठे पुलिस वाले आम लोगों को दूसरे रास्ते से भेज रहे हैं । मैंने पूछा क्या सभा उधर हो रही है , तो बताया गया कि नहीं सभा तो यहीं ही है मगर , मैंने कहा , क्या ये दरवाज़ा ख़ास लोगों के प्रवेश के लिये सुरक्षित है । तब इक पुलिस वाले ने इशारा किया दूसरे को कि मुझे यहीं से अंदर जाने दे , और मैं भीतर चला गया । हाल भरा हुआ था और अधिकतर सरकारी लोग , पंचायतों के सदस्य , और तमाम बड़े तबके के लोग या संस्थाओं से जुड़े लोग ही नज़र आ रहे थे । जिन गरीबों मज़दूरों , घरों में दुकानों में काम करने वाले बच्चों को कोई अधिकार नहीं मिलता , उन में से कोई भी वहां नहीं दिखाई दिया मुझे । देखते ही किसी शानदार पार्टी का आयोजन जैसा प्रतीत हो रहा था । सभा शुरू हुई तो बात मानवाधिकारों की हालत पर चिंता की नहीं थी , संचालक अधिकारी लोगों की महिमा का गुणगान करने लगा था । मुझे इक मुल्तानी कहावत याद आई , तू मैनू महता आख मैं तैनूं महता अखेसां । उसके बाद आयोग के लोग बताते रहे कि दो तीन साल में ही हरियाणा का मानव आयोग एक कमरे से शुरू होकर आज एक पूरे भवन में काम कर रहा है । बिलकुल सरकारी विकास के आंकड़ों की तरह , जिसमें ये बात पीछे रह जाती है कि जिस मकसद से संस्था गठित हुई वो कितना पूरा हुआ या नहीं हुआ । बस कुछ सेवानिवृत लोगों को रोज़गार मिल गया , यही अधिकतर अर्ध सरकारी संस्थाओं में होता है जहां करोड़ों का बजट किसी तरह उपयोग किया जाता है , साहित्य अकादमी भी ऐसी ही एक जगह है ।

                  भाषण होते रहे और अधिकतर मानवाधिकारों के हनन की बात से इत्तर की ही बातें हुई । लगता ही नहीं कोई समस्या भी है किसी को मानवाधिकार नहीं मिलने की । अच्छा हुआ कोई पीड़ित खुद नहीं आया वहां वरना निराश ही होता , जो कुछ लोग थोड़ी समस्याएं लेकर गये उनको भी पुराने सरकारी ढंग से स्थानीय अफ्सरों से मिलने की राय दी गई । और जिनकी शिकायत उन्हीं को हल निकालने की बात कह कर समस्या का उपहास किया गया जैसे । तीन चार घंटे चले कार्यक्रम में कहीं भी चिंता या मानवाधिकारों की बदहाली पर अफसोस जैसा कुछ नहीं था , मानों कोई दिल बहलाने को मनोरंजन का आयोजन हो । बार बार संवेदना शब्द का उच्चारण भले हुआ , संवेदना किसी में कहीं नज़र नहीं  आई । वास्तव में ये सभी वो लोग थे जिनको कभी जीवन में अनुभव ही नहीं हुआ होगा कि जब कोई आपको इंसान ही नहीं समझे तब क्या होता है । पता चला ये आयोग राज्य के बड़े सचिव मुख्य सचिव स्तर के अधिकारियों को सेवानिवृत होने के बाद भी पहले की ही तरह सरकारी सुख सुविधा पाते रहने को इक साधन की तरह उपयोग किया जाता है । जो सरकार सत्ता की अनुकंपा से ऐसा रुतबा पाते हैं उन्हीं से अपेक्षा रखना कि नागरिक को सरकार और अधिकारी वर्ग से वास्तविक मानवाधिकार दिलवाने का कर्तव्य निभाएं इक मृगतृष्णा जैसा है । न्यायधीश तक सेवा काल खत्म होने के बाद अपने लिए सब कुछ पाने को इसका उपयोग करते हैं । शायद ही किसी को वास्तविक मकसद की कोई परवाह है । अंधी पीसती है कुत्ते खाते हैं की कहावत सच लगती है , शिक्षित लोग देश समाज की नहीं अपनी चिंता करते हैं और उनको अपने सिवा कोई नज़र आता नहीं है । ये जो लिखा उस दिन सामने देखा वास्तविकता है मानवाधिकार क्या हैं शायद अभी हमारे देश में किसी ने समझा ही नहीं है । आडंबर करना हमारी आदत बन गई है जो कभी हमारे समाज की परंपरा नहीं रही है । 
 

 

जून 12, 2016

POST : 510 फिर से इक बार ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    फिर से इक बार ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

हमारी आंखों पर
बंधी हुई थी कोई पट्टी ।

और हम कोल्हू के बैल बन कर
रात दिन चलते गये चलते गये
पहुंचे नहीं कहीं भी
थे चले जहां से रहे बस वहीं ही ।

सोच रहे हैं अब
उतार फैंकें इस पट्टी को
और चल पड़ें
नई राह बनाने को जीवन की ।

ताकि बर्बाद न होने पायें
बाकी बचे पल जीवन के ।

शायद अभी भी
अवसर है हमारे पास

कुछ फूल खिलाने का
कुछ दीप जलाने का

कोई साज़ बजाने का 
कोई गीत गुनगुनाने का । 
 

 

जून 09, 2016

POST : 509 रास्ता अंधे सबको दिखा रहे ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    रास्ता अंधे सबको दिखा रहे ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                बहुत शोर करते हैं वो जब भी उनको लगता है कोई उन्हें मनमानी नहीं करने देता। बस तभी उनको विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की याद आती है। किसी और को भी आज़ादी है कुछ कहने की ये नहीं सोचते वो कभी भी। टीवी और सिनेमा का जितना दुरूपयोग इसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किया जा रहा है उतना शायद ही सही मकसद से हुआ हो। क्या ये भी अभिव्यक्ति की आज़ादी ही है कि जब आपकी फिल्म को जैसा आपने बनाया उसी तरह अनुमति नहीं मिलने पर आप निजि आरोप लगाने लग जाओ अथवा बिना जाने समझे किसी का समर्थन करने लगो। इक अभिनेता का ब्यान देखा जिसमें उनका कहना था , मुझे इस बारे जानकारी तो नहीं है मगर सिनेमा पर कोई बंदिश नहीं होनी चाहिए। अर्थात इनको सब करने की छूट होनी चाहिए , वास्तव में यही तो है , इनसे कोई नहीं पूछता आपने क्या किया। सही या गलत। क्या दिखा रहे हैं मनोरंजन के नाम पर। महिलाओं के प्रति बढ़ती दूषित मानसिकता का प्रमुख कारण आप हैं। फिल्म ही नहीं समाज में कहीं भी किसी भी मंच पर आप औरत को मात्र इक वस्तु की तरह देखते हैं दिखाना चाहते हैं। कभी फुर्सत मिले तो सोचना आपने कैसे आदर्श प्रस्तुत किये हैं। ज़रा पुरानी फिल्मों को देखना जिन में समाज की समस्याओं पर सार्थक कहानियों की फ़िल्में बनी थीं , और फिर देखना आज की बनी फिल्में और उनका संगीत। शायद समझ आये आप कितना नीचे गिर चुके हैं। जब सफलता और बॉक्स ऑफिस सफलता ही एक मात्र ध्येय हो तब और क्या हो सकता है। फिल्म उद्योग धनवान हुआ होगा पैसे से मगर विचारों से नहीं , शायद कंगाल हो चुका है।

          वास्तव में सब कुछ पाने की भूख ने इनको विवेकशून्य कर दिया है और सही या गलत की समझ ही बाकी नहीं रही है इनको। इनको फिल्मों में अभिनय ही नहीं करना विज्ञापन भी करने हैं पैसे के लिए और विज्ञापन झूठे हैं या लोगों को नुकसान देते हैं , अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं या भर्मित करते हैं , इनको क्या मतलब। इस के बावजूद ये महान लोग हैं , कुछ भी बेचते हैं वो भी जो नहीं बिकता तो अच्छा था। अब तो इनको राजनिति भी करनी है भले राजनिति की समझ भी नहीं हो। इनको तो सांसद बनना है ताकि इक तमगे की तरह नाम के साथ ये शब्द भी जुड़ सके।

                                   रास्ता अंधे सबको दिखा रहे ,
                                   इक नया कीर्तिमान हैं बना रहे।

                                   सुन रहे बहरे बड़े ध्यान से ,
                                   गीत मधुर गूंगे जब हैं गा रहे।
                                   

जून 08, 2016

POST : 508 पापी पेट का सवाल है बाबा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    पापी पेट का सवाल है बाबा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                इक विज्ञापन देख रहा हूं कुछ दिन से टीवी पर , कुछ बच्चे आते हैं इक बूढ़े आदमी के घर , देखते ही वो कहता है , कल ही बोल दिया था मैं इस बार ईद पर ईदी नहीं दे पाऊंगा। बच्चे अपनी अपनी गुल्लक साथ लाये होते हैं , कहते हैं इस बार ईदी वो देंगे , मगर आपको नहीं घर को। तब फ़िल्मी अभिनेता शाहरुख़ खान आते हैं और घर को पेंट करने सजाने का काम करते हैं। इस विज्ञापन में बहुत कुछ छिपा है , लगता है लोग बड़े संवेदनशील हैं किसी की हालत देख खुद चले आये हैं सहायता को। मगर पता चलता है उनको इंसान की भूख की बदहाली की चिंता नहीं है , चिंता  है घर की सजावट की रंग रोगन की। क्योंकि वही दिखाई देता है सभी को , आदमी के दुःख कहां देखता है कोई। सरकारी विज्ञापन भी इस से अलग नहीं हैं। गरीबों की रोटी की खातिर रोटी पर और टैक्स बढ़ा देती है। जो भी काम करती है मुनाफे का ही करती है , हर बार उसका खज़ाना और भर जाता है। जब कोई व्यापार करता है तब वो कुछ भी अपने पास से देता नहीं है , जितनी कीमत की वस्तु होती है उस से अधिक ही वसूल करता है , तभी उसका मुनाफा कभी कम नहीं होता। शायद बाबा रामदेव भी यही कहते हैं , वो जो भी कमाई करते हैं समाज सेवा के लिए ही करते हैं। ये समाज सेवा और धर्म शब्द हज़ारों साल से छलते आ रहे हैं लोगों को। भगवान के मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे अगर बांटते तो कब के खाली हो जाते उनके कोष , मगर उनकी दौलत है कि बढ़ती ही जाती है। मतलब साफ़ है छीनते अधिक हैं बांटते कम ही हैं। देने वाला कौन है ? सभी तो खुद और जमा करना चाहते हैं , चाहे जनहित की बात करती सरकार हो या दया धर्म की बात करते खुदा को बेचने वाले लोग। राजनेताओं और सरकारी लोगों के ठाठ बाठ गरीब देश की जनता के दम पर हैं तो इन धर्म के कारोबारियों की ऐश भी उन्हीं से ही है। सभी को आपके दुःख दर्द को बेचना है अपने धंधे की खातिर।

       मधरी दीक्षित जी के पति डॉक्टर हैं और उनको पता होगा कि किसी टॉनिक से आपका बच्चा बिमार होने से बच नहीं सकता है और विज्ञापन जिस टॉनिक का करती हैं खुद अपने बच्चों को शायद ही खिलाना चाहती हों। मगर उनको अभिनय से नहीं तो किसी तरह से आमदनी करनी है और जब कोई किसी को सलाह अपने मतलब को देता है तो केवल अपने हित की बात सोचता है। बच्चन जी को परेशानी हो तो क्या उस तेल की मालिश करवाते हैं जिसका विज्ञापन किया करते हैं। विज्ञापन करने वाले पैसे लेकर झूठ बोलते हैं जैसे अदालत में झूठी गवाही देने वाले हर बार अपराध के समय उस जगह उपस्थित होते हैं। कसम खाकर झूठ बोलना पाप नहीं कमाई का साधन है और धंधे का कोई धर्म नहीं होता धंधा खुद सबसे बड़ा धर्म है कहने वाले समझाते हैं कि ईमान नाम की चीज़ कभी हुआ करती थी आजकल पैसा सबका भगवान है। करोड़ों की आमदनी वालों को उचित अनुचित की बात की परवाह नहीं होती है उनकी तिजोरी भरनी चाहिए।

मई 22, 2016

POST : 507 हैं कहां ऐसे भले लोग ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        हैं कहां ऐसे भले लोग ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          समझ नहीं आता सच क्या है बनावट क्या है। अभी देखा इक टीवी शो में भाई भाई से बेइंतेहा प्यार करते हैं , बहन से दोस्तों से माता पिता से। देखते हैं किसी की दुःख भरी दास्तान सुन कर  सभी भावुक हो जाते हैं , आंखें हमारी भी नम हो जाती हैं। मगर यही सब अपने आस पास जीवन में नहीं दिखाई देता , किसी को किसी से कोई मतलब ही नहीं है। हमें क्या बस यही नज़र आता हर किसी की निगाह में। नतीजे घोषित हुए और हर प्रथम द्वितीय रहने वाले लड़के लड़की का यही बयान था कि डॉक्टर शिक्षक आई ए एस , आई पी एस बन देश की सेवा करना चाहते हैं। उम्र भर यही सुनता आया हूं और फिर तलाश करता रहा कि वो कहां गये जिनका ऐसा ईरादा था। नेता भी देखे सभी दलों के बड़ी बड़ी बातें करते हुए मगर जब सत्ता मिली तब केवल अपनी सत्ता को स्थापित रखने या विस्तार देने की ही बात करते रहे या फिर आये दिन नये नये तमाशे जनता को बहलाने को दिखाते रहे। कुछ भी बदलना किसी की प्राथमिकता नहीं था। आज तक किसी भी नेता को ये बात अनुचित नहीं लगी कि जिस देश के करोड़ों लोग भूख और बदहाली के शिकार हों उस देश के जनप्रतिनिधि को खुद पर इतना धन खर्च करना किसी संगीन अपराध से कम नहीं है। ये कैसा लोकतंत्र है जिसमें लोक को तंत्र खाये जा रहा है। ऐसे देश का राष्ट्रपति इक ऐसे महल में रहे जिसके सैंकड़ों कमरे हों और उस के रख रखाव पर करोड़ों रूपये मासिक अथवा लाखों रूपये हर दिन खर्च किये जाते हों , जितने पैसे से हज़ारों भूखे लोगों का पेट भर सकता हो। अर्थशास्त्र के अनुसार जब एक को इतना अधिक मिलता है तब लाखों करोड़ों से किसी तरह छीन कर ही मिलता है। आज जितने भी तथाकथित बड़े लोग महानायक समझे जाते हैं वो केवल अपनी मेहनत से नहीं बल्कि तमाम हथकंडे अपना कर और किसी भी तरह सफल होकर केवल अपने लिये और अधिक पाने की कोशिश से शिखर पर पहुंचे हैं , और खुद उनको भी नहीं पता कि कितने इसलिये पीछे या वंचित रह गये क्योंकि उनको कुछ भी नहीं मिला तभी हमें ज़रूरत से अधिक मिला है।  और ये तकदीर की बात नहीं है , सभी को समानता के अधिकार नहीं मिलने की बात है। जब ऐसे धनवान लोग आडंबर करते हैं गरीबों की सहायता का तब ये इक क्रूर मज़ाक होता है गरीबों के साथ। हम ये सब अपने मुनाफे के लिये नहीं समाज सेवा के लिये कर रहे हैं , ऐसा दावा करने वालों की हवस कभी पूरी नहीं होती , उनको सभी कुछ बेचना है जो भी बिक सके।

                   धर्म के नाम पर संचय क्या धर्म यही सिखाता है , आपके मंदिर मठ आश्रम दौलतों के अम्बार जमा करते हैं जबकि लोग दाने दाने को तरसते हैं , बेघर हैं बेइलाज मरते हैं। ऐसे धर्म ऐसे भगवान किस काम के। शिक्षा के मंदिर कहलाने वाले शिक्षा को बेच रहे हैं तो उनसे कोई उम्मीद कैसे की जा सकती है , चिक्तित्स्या के नाम पर भी यही होने लगा है , क्या शिक्षा और उपचार केवल धनवानों के लिये है। जब सरकार इन बातों की अनदेखी करे तब देश की भलाई कैसे हो सकती है। इक अंग्रेज़ी कहानी " हाउ मच लैंड ए मैन नीड्स " याद आती है , गांधी जी ने भी कहा था देश में सभी की ज़रूरत पूरी करने को बहुत है मगर किसी की हवस को पूरी करने को काफी नहीं है। बस कुछ लोगों की हवस कभी नहीं मिटती तभी बाकी लोग भूखे प्यासे हैं। आपने देवता और दैत्यों की कथायें सुनी होंगी मगर इनकी परिभाषा शायद ही समझी हो। जो अपने पास जितना है औरों को बांटते हैं वो देवता कहलाते हैं , और जो बाकी लोगों से उनका सभी कुछ छीन लेना चाहते हैं वो दैत्य कहलाते हैं। विश्व में अधुक्त्र दानव ही शासन करते रहे हैं , देवताओं को कभी शासन की चाह ही नहीं होती है। राजनीति में सज्जन पुरुष बेहद कम हुए हैं और वो कभी शासन की गद्दी पर नहीं आसीन हुए हैं।

मई 08, 2016

POST : 506 मुझे सज़ा दे दो ( मंथन ) ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    मुझे सज़ा दे दो ( मंथन ) कविता    डॉ लोक सेतिया

कब से खड़ा हूं कटघरे में
सुन रहा हूं इल्ज़ाम सभी के
सर झुकाये खड़ा हुआ हूं 

नहीं है कोई भी जवाब देने  को
मानता हूं नहीं पूरे कर पाया
सभी अपनों के अरमानों को 

हो नहीं सका कभी भी जीवन में सफल
टूट गये सभी ख्वाब मेरे ।

कभी कभी सुनता हूं
किसी को हर कदम
किसी ने दिया प्रोत्साहन ,
कुछ भी करने को देकर बढ़ावा
किया भरोसा उसकी काबलियत पर ।

लगता है तब मुझे कि
शायद कोई तो कभी
 
मुझे भी कह देता प्यार से
बेशक सारी दुनिया
तुमको समझती है
नासमझ और नाकाबिल
 
मुझे विश्वास है तुम्हारी लगन
और कभी हार नहीं मानने की आदत पर ।

बस इतना ही मिल जाता
तो शायद मैं कभी भी
नहीं होता नाकामयाब ।

कैसे समझाता किसी को
किसलिये हमेशा रहा
डरा सहमा उम्र भर 

मेरा आत्मविश्वास
बचपन से ही कभी
उठ नहीं सका ऊपर 

खुद को समझता रहा मैं
अवांछित हर दिन हर जगह हमेशा ।

इक ऐसा पौधा
जो शायद उग आया
अनचाहे किसी वीरान जगह पर
जहां कोई नहीं था
देखभाल करने वाला
बचाने वाला आंधी तूफान से ।

हर कोई कुचलता रहा
रौंदता रहा मुझे
बेदर्दी से कदमों तले
कोई बाड़ नहीं थी मुझे बचाने को ।

बेरहम ज़माने की ठोकरों से
बार बार उजड़ता रहा
फिर फिर पनपता ही रहा
अपनी बाकी जड़ों से
और बहुत बौना बन कर रह गया
इक पौधा जिस पर थे सूखे पत्ते ही ।

कभी ऐसा भी हुआ
जिनको मुझ से
कोई सरोकार ही नहीं
किसी तरह का
उनकी नज़रों में भी
मुझे नज़र आती रही हिकारत ।

छिपी मीठी बातों में भी
किसलिये लोग अकारण ही
किया करते हैं मुझ जैसों को प्रताड़ित
जाने क्या मिलता उनको
औरों का दिल दुखा कर हमेशा ।

चाहता था मैं भी सफल होना
सभी की उम्मीदों पर
खरा साबित होना 

शायद ज़रूर हो जाता कामयाब
जीवन में अगर कोई एक होता जो
मुझे समझता मुझे परोत्साहित करता ।

मेरा यकीन करता
और मैं कर सकता
हर वो काम जो
कभी नहीं कर पाया आज तक ।

मगर आज मुझे नहीं देनी
कोई भी सफाई
अपनी बेगुनाही की
खड़ा हूं बना मुजरिम
सभी की अदालत में
कटघरे में सर झुकाये ।

मांगता हूं सज़ा
अपने सभी किये अनकिये
अपराधों की खुद ही 

मुझे सज़ा दो जो भी चाहो मुझे मंज़ूर है
आपकी हर सज़ा मगर बस अब
अंतिम पहर है जीवन का 

बंद कर दो और आरोप लगाना
गुनहगार हूं मैं मुझे नहीं मालूम
क्या अपराध है मेरा
शायद जीना । 
 

 

अप्रैल 26, 2016

POST : 505 नेताजी क्यों रोये ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          नेताजी क्यों रोये (  तरकश ) डॉ लोक सेतिया

              ये क्या हुआ , कैसे हुआ , कब हुआ , ये ना पूछो । बस उनकी पलकें भरी सभा में छलक आईं । नेता जी परेशान हो  गये देखकर , कहना ही पड़ा आपकी आंखों में आंसू नहीं देख सकते । जल्द ही कोई समाधान आपकी समस्या का खोजेंगे मिल बैठ कर । 7 7  वर्षों से जनता रो रही उनको कभी कुछ नहीं हुआ , उनको रोता देखा तो परेशान हो गये । उस न्याय की देवी से इतना लगाव , बेबस डेमोक्रेसी की भी कभी सुध लेते आप जैसे नेता तो देश की जनता बदहाल नहीं होती । उनके आंसू खुद पौंछना चाहते हैं अपने हाथ से , अपने दामन से नेता जी । टुकड़े हैं मेरे दिल के ऐ यार तेरे आंसू , देखे नहीं जाते हैं दिलदार तेरे आंसू । आप क्यों रोये जो हमने दास्तां अपनी सुनाई । तेरी आंख के आंसू पी जाऊं ऐसी मेरी तकदीर कहां , तेरे ग़म में तुझको बहलाऊँ ऐसी मेरी तकदीर कहां । ये सब देख कर हमसे भी रहा नहीं गया , पता लगाना ही पड़ा वो रोये तो क्योंकर रोये । जानकर वास्तव में दुःख हुआ । औरों को न्याय देने वालों को खुद किसी से उम्र भर न्याय नहीं मिला , और उस पर मज़बूरी ये कि कोई अदालत भी नहीं जहां जाकर फरियाद करते । जिसे आप समझ रहे थे कि काम के बोझ से परेशान हैं वो तो अपनी इकलौती पत्नी से पीड़ित निकले हर पति की तरह । बेबसी तो बहुत है न्याय देने वाले भी अन्याय सहते हैं ख़ामोशी से उम्र भर । बहुत कीमत होती है बड़े लोगों के आंसूओं की वो भी टीवी कैमरे के सामने । उसपर घर जाने पर पत्नी ने फिर ताना दिया , क्या ज़रा सी बात पर रोतेरहते हो पुरुष होकर भी । कितनी बार समझाया है कुछ तो समझो , पूरी उम्र समझती रह जाती हैं हम पत्नियां । बिना बात हमदर्दी मिल गई आपको , जानती हूं जो बोझ है आप पर , जो चिंता है । आपको क्या पता अन्याय क्या होता है , देश की गरीब जनता से पूछो कौन अन्याय करता है कौन न्याय । अपनी आंखों पर बंधी काली पट्टी खोलो तो नज़र आये सच क्या है । इस देश के नेताओं और सरकारी  अधिकारियों  को ही भरोसा है आप पर कि वो जो भी करते रहें आप उनको बचाते रहेंगे हर अदालत में , कितने घोटाले कितनी लूट , कितना भेदभाव इन्हीं की कृपा से होता रहा हो रहा और होता ही रहेगा , कौन चाहता रोकना ।

       देश की जनता हर दिन रोती है खून के आंसू , किसी नेता को , किसी सरकार को दिखाई नहीं देते उसके बहते आंसू , आपकी आंख गीली हुई तो लगा जैसे पूरा देश ही बह जायेगा इस सैलाब में । जो खुद ही अपना रोना रोने लगे , सभी अधिकार हर सुख सुविधा पाकर , उसको दूसरों का दर्द ख़ाक पता चलेगा । बताओ कितने प्रतिशत लोग हैं जिनको वो सभी कुछ हासिल है जो आपको मिला है । आम लोगों के आंसू खुद कभी देख नहीं सके या देखना चाहे ही नहीं , काश इस बात पर रोते कि आपको जिनके आंसू पौंछने , वो नहीं पौंछ सके । इक आक्रोश होता तब आपकी बात में बेबसी नहीं । बुरा नहीं मानो मैं इनको मगरमच्छ वाले दिखावे के आंसू समझती हूं जो आप अपनी नाकामी को छुपाने को बहा रहे थे । क्या आपके आंसुओं को देख हम भूल जायें कि विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र में न्याय का मात्र तमाशा होता है न्याय किया नहीं जाता । आप किस के सामने रो रहे थे , जो बार बार अपनी सुविधा से क़ानून बदलते हैं अपने स्वार्थ के लिये । संविधान और न्याय के प्रति इन सभी दलों के नेताओं का रवैया एक जैसा है , खुद को क़ानून और संविधान से बड़ा मानते हैं । काश इसको लेकर भी कभी आपको आंसू आते और वो चाहते उनको पौंछना । दो तरह के आंसू होते हैं , एक जो खुद के दुःख दर्द में आते वो बस पानी होते हैं और दूसरे जो किसी और का दुःख दर्द देख कर आते वो मोती होते हैं । देश की गरीब जनता की भूख निराशा बदहाली और पल पल सत्ता की बेपरवाही का ज़ुल्म सहने से जो आंसू बहते रहते हैं उनको किसी नेता ने समझा ना ही आपने जिनका कर्तव्य ही यही था ।  शोर मचा हुआ आपके रोने का , आपने जाने कितनो को रुलाया है , कोई नहीं सोचता , आप क्यों रोये ये चिंता हर किसी को सता रही है । मुझे मालूम है आप क्यों रोये , मगर क्या करूं किसी को बता भी नहीं सकती , मैंने आपकी राज़दार होने की शपथ ली हुई है , और सभी भूल सकते हैं मैं अपनी शपथ कभी नहीं भुला सकती ।
 
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अप्रैल 17, 2016

POST : 504 तुझसे कि खुद अपने आप से ( गुज़ारिश ) डॉ लोक सेतिया

गुज़ारिश तुझसे कि अपने आप से ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सारी उम्र यही होता रहा
मुझे क्या पता
कौन करता रहा ।

हर कदम निराशा हताशा
इक जंग किसी तरह जीने को ।

जाने ये क्या है
मेरी नाकामी मेरी काबलियत की कमी
अथवा मेरी बदनसीबी ।

ज़िंदगी में कभी भी
कुछ भी जो चाहा मैंने
मिला नहीं मुझे ।

प्यार नहीं पैसा नहीं
नाम नहीं शोहरत नहीं ।

इक उम्मीद फिर भी
जगाता रहा मैं किसी न किसी तरह
कि एक दिन सब बदलेगा
बदलना है मुझे ।

बहुत किया विश्वास
मांगी हर दिन दुआ भी
करता रहा प्रार्थना परमात्मा से ।

नहीं सुनी जाने क्यों
तुमने मेरी कभी फरियाद
नहीं हुआ मुझ पर कभी दयालु तू ।

माना नहीं जीता कभी मैं
मगर मानी नहीं कभी हार भी
बिना तकदीर के सहारे भी जिया हूं मैं ।

शायद मुझे छोड़ देनी चाहिए
अब जीने की हर इक उम्मीद
मगर नहीं टूटी अभी भी मेरी आशा ।

मेरी कहानी में
बेशक नहीं होगा कोई सबक
जंग जीतने का
लेकिन मेरी जंग कभी
थमी नहीं होगी जीते जी ।

कोई आगाज़ नहीं था मेरा
कुछ भी नहीं रहा बीच में
विस्तार या ऊंचाई
फिर भी इक अंत
ज़रूर होगा मेरा जानता हूं ।

शायद कोई नहीं जानता
जीने के लिये कैसे खुद को और सभी को
छलता रहा हूं मैं
जो नहीं वो होने का आडंबर करके ।

अगर तू है विधाता कहीं पर कोई
तो तू समझता होगा
मेरी हर परेशानी
जो मेरे सिवा नहीं समझा कोई भी दुनिया में ।

ये मेरी शिकायत है या प्रार्थना
तुझ से है या फिर
खुद अपने आप से
नहीं मालूम मुझे
क्या मालूम है तुझे ऐ खुदा । 
 

 

अप्रैल 16, 2016

POST : 503 अभी बाकी यही इक काम करना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       अभी बाकी यही इक काम करना है ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अभी बाकी यही इक काम करना है
हमें तकदीर को फिर से बदलना है ।

चहक कर सब परिंदे कह रहे सुन लो
उन्हें हर आस्मां छूकर उरतना है ।

यही इक बात सीखी आज तक हमने
न कह कर बात से अपनी मुकरना है ।

न भाता आईना उनको कभी लेकिन
उन्हें सज धज के घर से भी निकलना है ।

हमारी प्यास बेशक बुझ नहीं पाई
हमें बन कर घटा इक दिन बरसना है ।

उसी से ज़िंदगी का रास्ता पूछा
कि जिसके हाथ से बेमौत मरना है ।

नई दुनिया बसाओ खुद कहीं "तनहा"
हुआ मुश्किल यहां पल भर ठहरना है । 
 

 

अप्रैल 11, 2016

POST : 502 भगवान की भी सुनो ( इक विचार ) डॉ लोक सेतिया

      भगवान की भी सुनो ( इक विचार ) डॉ लोक सेतिया

         इक मंदिर में हादसा हो गया , आग लगी और लोग जल कर मर गये , कितने ही तड़प रहे दर्द से । क्या भगवान की यही मर्ज़ी थी । यही सवाल किया उसकी मूर्ति के सामने जाकर , क्या तुम थे वहां मंदिर में या कहीं और मस्ती कर रहे थे अपने परिवार और देवी देवताओं संग । क्या तुम बचा नहीं सकते थे अपने पास आये भक्तों को । क्या तुमने उनको खुद कोई सज़ा दी उनके पापों की ऐसे अपने ही मंदिर में । देखा भगवान की मूर्ति भी आंसू बहा रही है । मैंने कहा अब पछताने से क्या फायदा , पहले ही ये सब नहीं होने देना था । इक आवाज़ सुनाई दी , बस करो मुझे और परेशान न करो मैं पहले ही बहुत दुखी हूं । तुम लोग हर बात के लिए मुझे ही दोषी ठहराते हो , खुद क्यों नहीं सोचते क्या सही क्या गलत । जब खुद मंदिर का प्रशासन देखने वाले जो नहीं किया जा सकता वो करते हैं तो ये होना ही था , क्या भगवान ने कभी ऐसा कहा है कि नियम कायदे का पालन नहीं करो । अब जिस जगह ऐसे कायदे कानून की अनदेखी होती हो उस जगह कभी भगवान हो सकता है । लोग बेकार भटक रहे हैं इधर उधर , भला भगवान को उन सभी जगहों से क्या लेना देना जहां धन संम्पति की , सोने चांदी की , हीरे जवाहरात की , चढ़ावे की बात की जाती हो । मेरा कोई बाज़ार नहीं है , बिकता नहीं हूं मैं । तुम जहां खोजते वहां नहीं हूं मैं । देखना चाहते हो तो कहां नहीं हूं मैं । बस जहां समझते , वहां नहीं हूं मैं । भगवान की पलकें भीगी हुई थीं उसका दर्द कौन समझता है दुनिया में ।

 

अप्रैल 08, 2016

POST : 501 कहां तेरी हक़ीक़त जानते हम हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कहां तेरी हक़ीक़त जानते हम हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कहां तेरी हक़ीकत जानते हम हैं
बिना समझे तुझे पर पूजते हम हैं ।

नहीं फरियाद करनी , तुम सज़ा दे दो
किया है जुर्म हमने , मानते हम हैं ।

तमाशा बन गई अब ज़िंदगी अपनी
खड़े चुपचाप उसको देखते हम हैं ।

कहां हम हैं , कहां अपना जहां सारा
यही इक बात हरदम सोचते हम हैं ।

मुहब्बत खुशियों से ही नहीं करते
मिले जो दर्द उनको चाहते हम हैं ।

यही सबको शिकायत इक रही हमसे 
किसी से भी नहीं कुछ मांगते हम हैं ।

वो सारे दोस्त "तनहा"खो गये कैसे ,
ये अपने आप से अब पूछते हम हैं । 
 


 

अप्रैल 03, 2016

POST : 500 आया बुलावा भगवान का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

           आया बुलावा भगवान  का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

संपादक जी के घर की कॉलबेल बजी , दरवाज़ा खोला तो देखा सामने बजरंग बली जी खड़े हैं । संपादक जी ने पूछा हनुमान जी आप , लगता है गलती से यहां आ गये हैं , मैं तो सभी धर्मों का आदर करने वाला हूं , मगर किसी देवी देवता का उपासक नहीं हूं । मैं अपने आप को सेकुलर मानता हूं और चाहता भी हूं कि मुझे सेकुलर ही समझा जाये । हनुमान जी बोले , महोदय मैं तो आपके लिये प्रभु श्री राम का संदेश लाया हूं  , आपको बुलाया है मिलने को । भगवान का बुलावा अर्थात मौत , सोचने लगे संपादक जी , तो बजरंग बली जी ने समझाया कि वो बुलावा नहीं , मैं तो आपको श्री राम के साक्षात दर्शन को ले जाना चाहता हूं और सकुशल वापस भी छोड़ जांऊगा । प्रभु को आपसे कुछ ख़ास बात करनी है , वो खुद भी आ सकते थे मगर इसलिए नहीं आये ताकि आपकी सेकुलर होने की छवि पर कोई प्रभाव नहीं पड़े । संपादक जी सोचने लगे बेशक वो सेकुलर ही हैं और सभी धर्मों को समान समझते हैं , मगर किसी धर्म के ईश्वर का साक्षात्कार छापने वाले पहले पत्रकार वो हो सकते हैं , ऐसा अवसर कभी छोड़ नहीं सकते । इसलिए अवसर को गंवाना नहीं चाहते और बजरंग बली जी से जल्द ले चलने को कह दिया । कागज़ कलम साथ लिये चल दिये हनुमान जी के साथ , हनुमान जी ने उनको अपनी हथेली पर बिठाया और उड़ कर सीधे राम दरबार में जा पहुंचे ।

        संपादक जी ने देखा कोई सुरक्षा जांच नहीं , कोई परिचय पत्र नहीं , अपॉइंटमेंट नहीं , जो भी चाहे आ सकता खुले दरबार में अपनी बात कहने को । कोई प्रशासन का अधिकारी नहीं रोक सकता , कुछ बताने की ज़रूरत नहीं पहले से कि कोई शिकायत है या कुछ मांगना है या कोई अन्य काम है । पहुंचते ही श्री राम संपादक जी के अभिवादन का जवाब देते हुए कहने लगे , आपका हार्दिक स्वागत है , आपको यहां आने का कष्ट देना पड़ा कुछ बात ही ऐसी थी । आप जनता तक सभी की बात पहुंचाते हो , शायद हमारी भी लोगों को समझा सको , वर्ना हमें नहीं लगता हमारी बात लोग समझना भी चाहते हैं । संपादक जी को लगा शायद भगवान पूरे पेज का विज्ञापन अख़बार में देना चाहते हैं , अपनी बात का प्रचार करने को । संपादक जी बोले भगवान आपकी सेवा का अवसर पाकर हमें ख़ुशी होगी , हमारी विज्ञापन की दरें और भी कम हो गई हैं , हमारी प्रसार संख्या करोड़ों में है देश भर में , सभी सरकारी विभाग हमें विज्ञापन देते हैं । श्री राम बोले महोदय आप गलत समझ रहे हैं , हमने कोई विज्ञापन नहीं देना है न ही कोई शुल्क ही आपको मिल सकेगा , हमें पता चला आप जनता की बात लिखते हैं अपने कॉलम में और पाठकों की बात में भी , हम चाहते आप हमारी भी बात लोगों तक पहुंचा दो , जनहित की बात समझ कर । संपादक जी भांप गये कि भगवान का इंटरव्यू छपना है , कागज़ कलम लेकर बोले आपसे कुछ सवाल करूंगा जिनके जवाब आप देना ताकि आपकी बात ठीक से समझी जा सके । श्री राम बोले ठीक है ।

                संपादक जी बोले मेरा पहला सवाल अयोध्या में आपके मंदिर को लेकर है , क्या आपको उसके अभी तक नहीं बन पाने से दुःख है या बन जाने से ख़ुशी होगी । श्री राम बोले यही बात तो उनको कहनी है , मुझे किसी ईमारत में कैद नहीं होना है , हम तो अपने भक्तों के मन में बसते हैं । हमारे परम भक्त हनुमान ने अपना सीना चीर कर दिखा दिया था , आपने रामायण नहीं भी पढ़ी हो तो टीवी सीरियल तो देखा ही होगा । मैं तो कण कण में बसता हूं कोई देखना चाहे अगर तो , मेरा मंदिर तो कभी हर घर में हुआ करता था , लोग सुबह शाम राम राम किया करते थे , अब जब कोई भी किसी मर्यादा का पालन नहीं करता तब मेरे भव्य मंदिर बनाने से मुझे क्या प्रसन्नता हो सकती है । भगवान उदास हो गये अपनी बात करते करते । संपादक जी बोले आपको नहीं पता लोगों ने अपने वस्त्रों पर आपका नाम लिखवा रखा है , पत्थरों पर आपका नाम लिख रहे हैं । राम बोले मुझे सब पता है , आह भर कर कहने लगे , मेरे नाम की चादर ओढ़ने से , मेरे नाम की माला जपने से कोई मुझे नहीं पा सकता है । मैं तो तुम सभी के अंदर रहता हूं , मुझे और किसी जगह मत खोजो , जिसको अपने भीतर नहीं मिलता उसको बाहर भी नहीं मिलेगा कोई भी ईश्वर । आप सभी तक मेरा ये संदेश पहुंचा सको तो बहुत अच्छा होगा । लोग अपने घरों में गलियों में , गांव में शहर में मेरे रहने लायक थोड़ी जगह बनायें , अपने आस पास सभी दीन दुखियों की सहायता करें , मैं उन्हीं में रहता हूं । पत्थरों में नहीं बसता हूं मैं । कम से कम मेरे नाम पर , मेरे नाम पर मंदिर बनाने की बात पर कोई राजनीति नहीं करें । मैंने कभी राज-पाठ का लोभ नहीं किया था , हमेशा जनता की भावनाओं का आदर ही किया , तभी इक धोबी के झूठे आरोप पर अपनी पत्नी देवी सीता का त्याग कर दिया । कोई ऐसा नहीं कह सके कि नियम क़ानून राज परिवार पर लागू नहीं होते । अब तो राम राज्य की बात करने वाले खुद शाही ठाठ से राजा बनकर रहते हैं जब लोग गरीबी और भूख से तड़पते हैं । क्या ये मेरे अनुयायी हो सकते हैं ?

         संपादक जी बोले भगवान आपकी बात शत प्रतिशत सही है , जब आपको लगता है यहां कितना बुरा हाल है तो फिर से अवतार लेकर सभी पापियों रावणों से लोगों को निजात क्यों नहीं दिला देते । श्री राम बोले संपादक जी रावण तो महापंडित था , ज्ञानी दुश्मन अच्छा होता है मूर्ख दोस्तों से । और ये खुद को मेरे भक्त कहने वाले कितने समझदार हैं तुमसे छिपा नहीं है । समझदार दुश्मन लाख अच्छा होता है नासमझ दोस्तों से । अचानक संपादक जी की नींद खुल गई और वो अपने सपने के बारे सोचने लग गए , कि राम की बात को कहां जगह दें अख़बार में । संपादकीय में या पाठकों की बात में । सेकुलर इमेज की चिंता के साथ कट्टर-पंथियों के नाराज़ होने का भी डर है । " मानो या ना मानो " शीर्षक कॉलम में ही छापना सही होगा । ये रचना करीब नौ साल पहले की लिखी हुई है सही समय पर हर रचना प्रकाशित हो ऐसा होता नहीं है फिर भी कुछ बातें पुरानी भुलाने से भूलती नहीं या भुलाई नहीं जा सकती हैं । 

 
 देश के प्रसिद्ध और दिव्य मंदिर, जहां साक्षात होते हैं भगवान सूर्य के दर्शन  | Famous And Divine Temples Of The Country, Where Lord Surya Is Visible -  Oneindia Hindi

मार्च 31, 2016

POST : 499 संकल्प ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

            संकल्प ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

जीवन में जाने कितनी बार
किया तो है पहले भी संकल्प
खुद को बदलने का संवरने का
मगर शायद कुछ अधूरे मन से
तभी जब भी आया इम्तिहान
नहीं पूरा कर सका में अपना संकल्प ।

फिर से इक बार कर रहा हूं वही संकल्प
नहीं घबराना असफलताओं से
नहीं डरना ज़िंदगी की मुश्किलों से
छुड़ा कर निराशाओं से अपना दामन
साहसपूर्वक बढ़ाना है इक इक कदम
अपनी मंज़िल की तरफ बार बार ।

नतीजा चाहे कुछ भी हो मुझे करना है
फिर से प्रयास पूरी लगन से निष्ठा से
कोई रुकावट नहीं रोक सकती रास्ता
मुझे करना ही है पार इस बार उस नदी को
और ढूंढनी ही है मंज़िल प्यार की यहीं
इसी जन्म में इसी दुनिया में इक दिन । 
 

 

मार्च 28, 2016

POST : 498 वजूद की तलाश में ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

वजूद की तलाश में ( कविता ) - डॉ लोक सेतिया

जाने कहां खो गया हूं मैं
खोजना चाहता हूं अपने आप को
वापस चला जाता हूं
ज़िंदगी की पुरानी यादों में
समझना चाहता हूं दोबारा
किस मोड़ से कैसे मुड़ गया था
रास्ता ज़िंदगी की राह का कभी ।

शायद चाहता हूं जानना
कि क्या होता अगर तब मैंने
चुनी होती कोई और ही राह चलने को
तब कहां होता मैं आज और क्या होता
मेरा वर्तमान भी और भविष्य भी ।

लेकिन समझ आता है तभी मुझे
ये सच कि कोई कभी भी
लिखी हुई किताब को दोबारा पढ़कर
बदल नहीं सकता है लिखी हुई
इबारत को
गुज़रे हुए पलों को ।

हो सकता है
मेरी ज़िंदगी की किताब में
बीते हुए ज़माने की ही तरह
पहले से ही लिखा हुआ हो मेरा
आने वाला कल भी भविष्य भी
शुरुआत से अंत के बीच
न जाने कब से भटकता रहा हूं
और भटकना है जाने कब तलक
अपने खोये हुए वजूद की तलाश में
मुझे । 
 

 

मार्च 26, 2016

POST : 497 मेरा विवेक जगाता है मुझे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मेरा विवेक जगाता है मुझे ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

आज इक बार फिर
इक कहानी पढ़ते पढ़ते
सोच रहा था
मुझे भी उस कहानी के
किसी पात्र की तरह
अच्छा
बहुत अच्छा बनना है ।

सभी मुझे समझते हैं
मैं बहुत अच्छा हूं
सच्चा हूं
मगर खुद अपनी नज़र में
मुझ में कमियां ही कमियां हैं
सोचता रहता हूं
मैं क्यों नहीं बन पाया वैसा
जैसा बनना चाहिए था मुझे ।

शायद इस दुनिया में अच्छा
सच्चा बनकर जीना
मुश्किल ही नहीं
असंभव काम भी है
और मैंने किया है उम्र भर
असंभव को संभव करने का प्रयास ।

मुझे किसी ने पढ़ाया नहीं
सच्चाई और उसूलों का पाठ
बल्कि हर कोई समझाता रहा
दुनियादारी को सीखने की ज़रूरत ।

बस मेरा किताबें पढ़ने का शौक
अच्छी फिल्मों को देखने का जुनून
मुझे समझाता रहा सही और गलत
अच्छे और बुरे का अंतर करना
और मुझ में मेरा ज़मीर
ज़िंदा रहा हर हाल में ।

जो काम शायद किसी गुरु की शिक्षा
किसी प्रचारक के उपदेश नहीं कर सके
मेरे विवेक ने खुद किया हर दिन
वही काम मार्गदर्शन देने का मुझे
इसलिए हमेशा की तरह फिर
आज भी मैंने किया है निर्णय
तमाम कठिनाईयों के बावजूद
अकेले उसी राह पर चलते रहने का । 
 

 

मार्च 24, 2016

POST : 496 आज मनाई होली इस तरह ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

आज मनाई होली इस तरह  ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सुबह से शाम हो गई है
सोच रहा हूं मैं होली के दिन
क्या ऐसे ही होती है होली
जैसे आज मनाई है मैंने ।

कभी वो भी बचपन की होली थी
जब बक्से से निकाल के देती थी
मां हमें चमचमाती हुई पुरानी
स्टील और पीतल की सुंदर पिचकारी ।

और घोलते थे रंग कितने ही मिला पानी में
भरने को दिन भर जाने कितनी बार
खेलते थे बड़ों छोटों के साथ मस्ती में
मन में भरी रहती थी जाने कैसी उमंग ।

फिर होते गये हम बड़े और समझदार
बदलता गया ढंग हर त्यौहार मनाने का
सोच समझ कर जब लगे खेलने होली
नहीं रही मन की उमंग और होता गया
हर बरस पहले से फीका कुछ हर त्यौहार ।

आज चुप चाप बंद कमरे में अकेले ही
खेली दिन भर हमने भी ऐसे कुछ होली
जैसे किसी अनजान इक घर में हो खामोश
पिया बिना नई नवेली दुल्हन की डोली ।

फेसबुक पर कितनी रंग की तस्वीरें
कितने सन्देश कितने लाईक कमेंट्स
मगर दिल नहीं बहला लाख बहलाने से
किसी को नहीं भिगोया न हम ही भीगे
ये कैसे दोस्त सच्चे और झूठे जाने कैसे
नहीं आई घर बुलाने कोई भी टोली हमजोली ।

की बातें फोन पर सभी से कितनी दिन भर
ली और दी हर किसी को होली की बधाई
बने पकवान भी कुछ मंगवाये बाज़ार से
लगी फिर भी फीकी हर तरह की मिठाई ।

लेकिन हम सभी को यही बतायेंगे कल
बहुत अच्छी हमने ये होली है मनाई
नहीं जानते कैसे क्या क्यों बदला है
मगर खुशियां होली की हो गई हैं पराई । 
 

 

मार्च 20, 2016

POST : 495 खुश्क हैं आंखें जुबां खामोश है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खुश्क हैं आंखें जुबां खामोश है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खुश्क हैं आंखें जुबां खामोश है
इश्क़ की हर दास्तां खामोश है ।

बस तुम्हीं करते रहे रौशन जहां
तुम नहीं , सारा जहां खामोश है ।

क्या बताएं क्या हुआ सबको यहां
चुप ज़मीं है आस्मां खामोश है ।

झूमता आता नज़र था रात दिन
आज पूरा कारवां खामोश है ।

तू हमारे वक़्त की आवाज़ है
किसलिए तूं जाने-जां खामोश है । 
 

 

मार्च 09, 2016

POST : 494 मत कहो आकाश में कोहरा घना है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  मत कहो आकाश में कोहरा घना है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

समरथ को नहीं दोष गुसाईं , पैसा हर कमी को ढक देता है , ये बात इक बार फिर से सच साबित हो गई है। हज़ार एकड़ भूमि की फसल को तहस नहस कर देना , कितने पेड़ पौधों को काट देना , नदी किनारे बालू पर निर्माण करना किसी भव्य कार्यक्रम के आयोजन के लिए। किसी नियम की चिंता नहीं , कोई औपचारकता निभाना ज़रूरी नहीं , केवल किसी एक विभाग से किसी तरह इक मंज़ूरी का कागज़ हासिल कर बाकी सभी कुछ भुला देना। आपको कौन रोक सकता था जब आपके  करोड़ों अनुयाई हैं , अरबों का कारोबार फैला हुआ है विश्व भर में , और सत्ताधारी लोग आपके समर्थक हैं। आधुनिक भगवान ऐसे ही पर्यावरण को बचाते हैं। कभी भगवान भी गलत हो सकते हैं , जो उनमें कमी बताये वो पापी है। भगवान प्रेस वार्ता करते हैं दावा करते हैं कि वो तो महान कार्य कर रहे हैं , उनका उपकार मानना चाहिए। मगर क्या करें हमें सावन के अंधों की तरह हर तरफ हरियाली दिखाई देती ही नहीं। कितनी बुरी बात है कलयुगी भगवान को अदालत में जाना पड़ा है और विभाग ने उन पर पांच करोड़ का हर्ज़ाना भरने का हुक्म सुना दिया है , साथ ही पांच लाख जुर्माना उस सरकारी विभाग को भी अदालत ने लगाया जिसने ये सब होने दिया। इक फिल्म क्या बनी ओह माय गॉड , लोग अदालत घसीट ले गए उनको भी जो गुरु ही नहीं जाने क्या क्या कहलाते हैं। मगर देख लो हर गलत काम सही हो गया पैसे से , तभी तो धनवान और ताकत वाले जो मन चाहे करते हैं। ये राशि क्या है उनके लिए , ऐसे आयोजन से उनको इससे कई गुणा फायदा होना है। साबित हो गया पैसा ही सब कुछ है , अगर पैसा नहीं होता तो शायद ये भगवान भी बेबस हो जाते जब उनका आयोजन रोक दिया जाता। जहां तक छवि खराब होने या बदनामी की बात है तो जो प्रचार इस बात से मिला वो भी कम नहीं है। लेकिन अहंकार में डूबे इस संत का कहना है कि हम जुर्माना नहीं भरेंगे चाहे जेल जाना पड़े। वास्तव में ऐसे आयोजन को रद्द किया जाना चाहिए ताकि सबको समझ आये कि कायदे क़ानून सब के लिए हैं। मगर जब देश का प्रधानमंत्री ऐसे आयोजन में शामिल होता है तब समझ आता है कि बड़े लोग वी वी आई पी लोग देश के क़ानून से ऊपर हैं !

                             इस कदर कोई बड़ा हो हमें मंज़ूर नहीं
                             कोई बन्दों में खुदा हो हमें मंज़ूर नहीं।
                             रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर
                             चांद बस्ती में उगा हो हमें मंज़ूर नहीं।
                             मुस्कुराते हुए कलियों का मसलते जाना
                             आपकी एक अदा हो हमें मंज़ूर नहीं। 

         कभी इक कथा में ज़िक्र आया था कि इक गुरु और उसके शिष्य जब धर्मराज के सामने पेश हुए तो गुरु को जितनी सज़ा अपकर्मों की मिली अनुयायियों को उससे कई गुणा दी गई , जब पूछा गया किसलिए तो उत्तर मिला कि आप सभी ने जानते समझते हुए उनका साथ दिया जबकि गुरु की शिक्षा थी झूठ का विरोध करें चाहे वो कोई भी हो। आपने गुरु की दी शिक्षा को ही भुला दिया गुरु की जय जयकार करने में। सब से विचत्र बात ये है कि इस देश में नियम क़ानून का पालन नहीं करने या अनुचित कार्य करने पर किसी को कभी नुकसान नहीं होता है। बिजली चुराने पर लगा जुर्माना जितनी राशि की बिजली चोरी की उस से तो कम ही होता है , और बदनाम भी नहीं होते ऐसा कह कर कि सभी करते हैं। क़ानून से डरना और नियमों का पालन करना कमज़ोर लोगों का काम है। बड़े बड़े लोग इनकी परवाह किये बिना आगे बढ़ते जाते हैं , हर कायदे क़ानून को पांवों तले रौंद कर। सरकारी विभाग भी क़ानून लागू करने में नहीं क़ानून तोड़ने से हर बात पर जुर्माना राशि वसूल करने में यकीन रखते हैं। फलां नियम तोड़ने पर इतना जुर्माना , बस पैसे भर कर अवैध को वैध करार करा सकते हैं। इक समझदार बता रहे हैं बड़े लोग कभी जुर्माना भरते नहीं हैं , पांच करोड़ जुर्माना वसूल हो पाये ये ज़रूरी नहीं है , उनके पास विकल्प खुला है जुर्माने के खिलाफ अपील करने का। मगर कोई विभाग उनके जुर्माना नहीं अदा करने पर सख्त कदम नहीं उठा सकता है। इन महान लोगों का आचरण जो भी सभी को मान्य होता है , लोक कल्याण जनहित जैसे शब्दों की आड़ में सभी कुछ छुप जाता है।

           सच सच सभी सच का शोर करते हैं , पूरा सच कोई बताता नहीं , कोई सुनना भी नहीं चाहता, पढ़ना भी कहां चाहते सब लोग , ऐसे में संपादक और प्रकाशक छापने से परहेज़ करें तो गलत क्या है। न जाने कब कैसे कहां किसी का अपना मतलब अपनी सोच अपनी आस्था बीच में आ जाये और विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी को दरकिनार कर दे। देखिये हम किसी की व्यक्तिगत आलोचना को नहीं छापते , बेशक आपकी बात कितनी खरी हो और कितनी ज़रूरी सच को सच साबित करने के लिए। तभी दुष्यंत कुमार कह गये हैं " मत कहो आकाश में कोहरा घना है , ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है "। ऐसी हर घटना चर्चा में रहती कुछ दिन को , फिर कोई नया किस्सा कोई फ़साना सुनाई देता है और पिछली बात खो जाती इतिहास बनकर। कोई कभी सोचेगा कि जो भी अनुचित करने लगा हो उसको नहीं करने दिया जायेगा तभी गलत होना बंद होगा , अन्यथा कभी कुछ नहीं बदलेगा और धनवान हमेशा मनमानी करते रहेंगे। काश ऐसे आयोजन को सख्ती से रोकने का साहस कोई करता ताकि औरों को ये सन्देश जाता कि कानून से ऊपर कोई भी नहीं है। ऐसे तो हर कायदे कानून को इक मज़ाक बना दिया जाता है जैसे चंद सिक्कों में बिकता है हर नियम भी। अब किस किस की बात करें , फिर अंत में दुष्यंत कुमार के शेर अर्ज़ हैं।

                         " अब किसी को भी नज़र आती नहीं दरार ,
                           घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार।
                           इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके - जुर्म हैं ,
                           आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार "।

फ़रवरी 14, 2016

POST : 493 प्यार के दिवस पर मेरा खत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 प्यार के दिवस पर मेरा खत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

नहीं लिख सका आज तलक
किसी को भी मैं कभी
कोई प्रेम पत्र 
किसी की ज़ुल्फों पर
गोरे गालों पर ।

किसी हसीना पर नहीं
तो किसी भोली सी लड़की पर ही
आ ही सकता था
अपना भी दिल सादगी को देख कर भी ।

कोई तो मिल ही जाती
देखता रहता जिसके सपने मैं भी
मुझे भी लग सकती थी कोई फूलों जैसी ।

चांद जैसी सुंदर
कोई समा सकती थी
मेरी भी बाहों में आकर चुपके से ।

लिख सकता था
कोई प्रेम कविता कोई ग़ज़ल किसी पर
किसी के इश्क़ में मैं भी
भुला सकता था सारे जहां को ।

लेकिन नहीं कर सकता था
मैं ऐसा कुछ भी , क्योंकि
मुझे लगता रहा कुछ और
इस से कहीं अधिक ज़रूरी
मेरे सोचने को समझने को
और परेशान होने को हर दिन ।

देश की गरीबी , भूख , शोषण
अन्याय और भेदभाव
समाज का नकली चेहरा
और झूठ का व्योपार होता हुआ ।

जो नहीं हैं वही कहलाने की
हर किसी की चाहत होना
जिधर देखो सभी डूबे हुए
बस अपने स्वार्थ पूरे करने में ।

लोकतंत्र के नाम पर
जनता को छला जाना बार बार
देश में बढ़ता
अमीरी और गरीबी के बीच का अंतर ।

शिक्षा स्वास्थ्य सेवा
समाज सेवा हर किसी का हाल
जैसे हर जगह बिछा हुआ हो
कोई न कोई जाल ।

इन सभी ने रहने नहीं दिया
मुझे कभी चैन से
कैसे लिखता तुम्हें
प्रेम पत्र ये बताओ तुम्हीं मुझे ।

या हो सके तो पूछना उनसे
जो करते हैं ये दावा
कि उनको है मुहब्बत
तुम में से किसी न किसी से
क्या उनको मुहब्बत है
अपने देश से समाज से ।

इंसानों से इंसानियत से
किया है कभी प्यार
है उनके दिल में दर्द
औरों के लिये कोई तड़प
बिना ऐसे एहसास
भला हो सकती है मुहब्बत ।



फ़रवरी 05, 2016

POST : 492 ट्विटर , फेसबुक और व्हट्सऐप वाली सरकार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      ट्विटर , फेसबुक और व्हट्सऐप वाली सरकार ( व्यंग्य ) 

                                     डॉ लोक सेतिया

किसी बच्चे ने पत्र लिखा प्रधानमंत्री जी को और उसकी समस्या का समाधान किया गया ये बात टीवी के समाचार चैनेल पर विस्तार से दिखाई गई । क्या वास्तव में इसको खबर कहते हैं ? चलो खबर वालों से पूछते हैं खबर की परिभाषा क्या है ? परिभाषा ये है कि खबर वो सूचना है जो कोई जनता तक पहुंचने नहीं दे रहा , पत्रकार का फर्ज़ है उसको खोजना , उसका पता लगाना और उसकी वास्तविकता को सभी को बताना । मगर जिस बात का नेता अफ्सर या अन्य लोग खुद डंका पीट रहे हों उसको खबर कैसे कह सकते हैं , अगर ध्यान दो तो आजकल यही छापा जा रहा अख़बारों में और दिखाया जा रहा सभी टीवी चैनेल्स पर । जिनको याद ही नहीं खबर की परिभाषा वो पत्रकारिता और विचारों की अभिव्यक्ति की सवतंत्रता की बातें करते हैं ।
 
   " रास्ता अंधे सब को दिखा रहे
    वो नया कीर्तिमान हैं बना रहे। "

  ऐसी कुछ और भी खबरें हैं , इक महिला रेल मंत्री को ट्विटर पर अपने बच्चे के भूखे होने की बात बताती है रेल में यात्रा करते समय और रेल मंत्री आदेश देते हैं और अगले ही स्टेशन पर अधिकारी दूध लेकर उपस्थित होते हैं । मगर कोई ये नहीं सोचता कि खुद इक मां को पहले ही क्या याद नहीं था कि उसके बच्चे को सफर में भूख लगेगी तो दूध की ज़रूरत पड़ेगी । चलो ऐसा भी किसी से भी हो सकता है । मगर इस खबर से क्या हम उस दर्दनाक घटना को भूल सकते हैं जब कोई यात्री बीच सफर दुर्घटना का शिकार हो जाता है और ट्रैन की चैन खींचने पर ट्रैन नहीं रूकती न ही स्टेशन के कर्मचारी ध्यान देते हैं और किसी यात्री के शरीर के टुकड़े होने के बाद भी और भी रेल गाड़ियां उसको कुचलती गुज़र जाती हैं ।

         शासक यही किया करते हैं , दान के , धर्म के चर्चे हर जगह प्रचारित किये जाते हैं और जहां कर्तव्य नहीं निभाया उसकी कभी बात नहीं की जाती । कोई अपनी समस्या मंत्री जी को व्हाट्सऐप पर बताता है और मंत्री जी सहायता करें ये अच्छी बात है , मगर जिनके पास मंत्री जी का नंबर नहीं हो उनका क्या ? क्या देश में सभी को सभी मंत्रियों के फोन नंबर मालूम हैं । वास्तव में हर दिन जिनसे जनता का वास्ता पड़ता है उन सरकारी अधिकारियों  के फोन कभी मिलते ही नहीं , बहुत दफ्तरों में फोन करो तो बात सुनने की जगह फैक्स से जोड़ देते हैं । जिसको फैक्स नहीं करना हो बात करनी हो वो क्या करें । और जब किसी अधिकारी के दफ्तर का फोन मिल भी जाये तो कौन हैं क्या काम है पूछने के बाद साहब मीटिंग में हैं या अभी आये नहीं ऐसा बताया जाता है ।  एक सौ पच्चीस करोड़ लोगों के देश में कितने लोग हैं जिनको आधुनिक संचार साधनों से अपनी समस्या प्रशासन तक पहुंचानी आती होगी । जब नेता और प्रशासन घोषणा  करता है ऐसी किसी योजना की तब सोचना  होगा क्या ये सभी के लिए सम्भव है । अधिकांश फोन मिलते ही नहीं घंटी बजती है संपर्क टूट जाता है कोई कितनी बार नंबर मिलाता रहे आजकल ये होने लगा है । 
 
 मुझे जनहित के पत्र अख़बारों में , नेतओं को , मंत्रियों को , सभी दलों की सरकारों को लिखते 45 साल हो गए हैं और इस बीच बहुत कुछ बदला है , गंगा यमुना से कितना पानी बह चुका है मगर इन तथाकथित जनता के सेवकों का रवैया नहीं बदला है । उनको आज भी कोई कर्तव्य की याद दिलाये तो बुरा लगता है , ये सभी चाहते हैं लोग उनसे अधिकार नहीं सहायता की भीख मांगे , हर दिन उनका यही दावा होता है कि देखो हमने लोगों की भलाई के लिए क्या कुछ नहीं किया । ये कभी नहीं बताते जो कुछ करना चाहिए था मगर नहीं किया गया उसका क्या हुआ ।

                                          हक नहीं खैरात देने लगे 
                                          इक नई सौगात देने लगे ।
 
 क्या भारत 26 मई से वॉट्सऐप, फ़ेसबुक और ट्विटर पर प्रतिबंध लगाएगा? संभावना  कम, लेकिन मामला पेचीदा है

जनवरी 17, 2016

POST : 491 जल्दी ही आयेंगे खुद भगवान फेसबुक पर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  जल्दी ही आयेंगे खुद भगवान फेसबुक पर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 आखिर परम पिता परमात्मा को अपनी दुनिया की याद आ ही गई , और नारद जी को फिर से धरती लोक का हाल जानने को भेजा। लेकिन नारद जी ने जो विवरण प्रस्तुत किया उसने भगवान को भी चौंका दिया। इतना अधिक है संसार में फिर भी आधी आबादी भूखी नंगी और बेघर बदहाल है। उस पर ये भी की दुनिया के लोग ऐसा मानते हैं कि ये सभी भगवान की मर्ज़ी से ही है। परमात्मा ने पूछा नारद जी जिनके पास ज़रूरत से अधिक है वो  दूसरों की सहायता क्यों नहीं करते। नारद जी बोले अगर आपके पास हो तो क्या आप दूसरों को बांटना चाहोगे , भगवान बोले बिल्कुल मुझे खुद के लिए क्या चाहिए। नारद जी बोले क्या वास्तव में कुछ नहीं चाहिए अपने लिए , भगवान ने जवाब दिया भला मुझे कुछ भी किसलिए चाहिए , मुझे तो अपनी बनाई दुनिया में रहने वालों की चिंता है कि उनको जो ज़रूरी वो मिल सके। नारद जी ने एक सूचि दी प्रभु को जिसमें तमाम मंदिरों मस्जिदों गिरिजाघरों गुरुद्वारों की जगह, धन  संपत्ति सोने हीरे जवाहारात की कीमत और आय का विवरण था। और पूछा क्या आपको नहीं पता दुनिया में सब से बड़ा जमाखोर खुद आप ही हैं।  ईश्वर दंग रह गये कि ये कैसे हुआ , उन्होंने तो किसी को भी ऐसा करने को नहीं कहा है कभी। किसी भी धर्म में विशाल धर्मस्थल बनवाने की बात नहीं लिखी गई आज तक। हर साधु संत ने संचय नहीं करने का ही उपदेश दिया है और धर्म का अर्थ दीन दुखियों की सहायता करना बताया है।  फिर ये कैसे हो गया और क्यों अभी तक मुझे किसी ने ये सूचना नहीं दी कि मेरे नाम पर इतना अनुचित हो रहा है दुनिया में। नारद जी बोले कौन बताता आपको , जब आपके सभी देवता और देवियां खुद अपना गुणगान करवा प्रसन्न होती हैं चाहे उनका गुणगान लोग श्रद्धा से नहीं दिखावे को आडंबर की तरह करते हों। जब खुद आप भी उनसे अपनी महिमा सुन सुन गद गद होते हैं तब उनको क्या सन्देश मिलेगा। नारद जी की सच्ची और कड़वी बातें सुन भगवान बेचैन हो गए।

           कुछ भी समझ नहीं आया कैसे सब गलत को ठीक किया जा सकता है। परमात्मा ने तुरंत सभी साधु सन्यासी देवताओं देवियों और अवतारों की आपात बैठक बुलाई है। सभी उपस्थित हो गए हैं और नारद जी ने सारी बातें फिर से दोहराई हैं ताकि सभी समझ सकें और सुझाव दे सकें। एक पुराने अवतार ने प्रस्ताव पेश किया है कि खुद भगवान को नया अवतार लेकर संदेश देना होगा कि कोई मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरुद्वारा नहीं बनाओ बल्कि सभी कुछ गरीबों में बांट दो यही वास्तविक धर्म है। मगर जब ऐसा अवतार लेने की बात हुई तो कोई भी तैयार नहीं हुआ क्योंकि सभी को समझ आ गया था कि अब लोगों को धर्म का पालन नहीं करना होता , उनको धार्मिक होने का दिखावा भर करना होता है। सोशल मीडिया में देख कर लगता है मानो सभी इंसान और इंसानियत की कदर करते हैं जब कि वास्तव में ऐसा मात्र औरों को दिखावे को किया जाता है। अभी तो लोग और भव्य मंदिर धर्मस्थल आदि बनवाने की बातें करते हैं और जो विरोध करता हो उसको नास्तिक कह कर प्रताड़ित किया जाता है , अब कोई अवतार जाकर कहेगा कि सभी मंदिर मस्जिद गिरिजाघर और गुरूद्वारे अपनी जगह और धन सम्पति दीन दुखियों को बांट दें तो जो धर्म ने नाम पर हलवा पूरी खाते हैं वो भगवान के सन्देश को ही धर्म विरुद्ध बताने लगेंगे।  ईश्वर को मालूम है जब भी कोई नानक कोई यीशु कोई साईं बाबा सच्ची बात कहता है उसको कितने कष्ट भोगने पड़ते हैं जीवन में। जब नहीं रहता तभी लोग उसकी बात समझते हैं लेकिन तब भी उनकी दिखाई राह पर नहीं चलते , मात्र उनकी मूर्ति स्थापित कर उनको भगवान घोषित कर देते हैं। बहुत चिंतन करने के बाद परमात्मा ने पुछा क्या मुझे फिर से अवतार लेना चाहिए और अगर लेना है तो कब कहां कैसे। नारद मुनि ने ये कहकर सभी को दुविधा में डाल दिया है कि अब दुनिया में धर्म नाम के कारोबार से फिर इक जंग उसी तरह की जानी ज़रूरी है जैसे समुंद्र मंथन में आमने सामने हुई थी देवों और दैत्यों के बीच , मगर इस बार नतीजा वही हो ये मुमकिन नहीं क्योंकि भगवान से उनका पलड़ा भारी है जो भगवान को बेचते हैं। और उनकी सहायता सरकारें और राजनेता भी करते हैं , धर्म अब आस्था का विषय नहीं रह गया अपितु अपना अपना स्वार्थ सिद्ध करने का साधन भी बन चुका है। लगता है भगवान को खुद को भगवान साबित करना होगा जाकर दुनिया में चाहे इसके लिये सोशल मीडिया , टीवी चैनेल फेसबुक व्हट्सऐप ट्विटर का सहारा लेना पड़े। जल्दी ही फेसबुक पर भगवान का नया अकाउंट खुलने वाला है , ध्यान रखना आप लोग रिक्वेस्ट भेजना भूल मत जाना।

दिसंबर 26, 2015

POST : 490 अंधेर नगरी चौपट राजा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

       अंधेर नगरी चौपट राजा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    कुछ समझ नहीं आता हम किस तरफ जाना चाहते हैं। देश का राष्ट्रीय चरित्र क्या है। क्या सरकार का काम कानून का शासन कायम करना है अथवा अपनी सुविधा के अनुसार नियम कायदे कानून बदलना। जनहित का नाम लेकर लूट का कारोबार कब तलक चलेगा। बहुत पहले की बात है मेरे शहर फतेहाबाद में दुकानों की बोली होनी थी , लोग खरीदने को  आये हुए थे , मगर तभी मुख्यमंत्री से मिलकर कुछ लोगों ने वो मार्किट की जगह अपनी बिरादरी की धर्मशाला बनाने को देने को कहा था और बोली रद हो गई थी। ये तब मुख्यमंत्री भी जानते थे की नियमानुसार कमर्सियल जगह नहीं दी जा सकती। मगर कानून को ठेंगा दिखाने का काम हर नेता हर सरकार करती रही है। कम्युनिटी सेंटर की जगह किसी विभाग को देना कैसे सही हो सकता है , जब सरकार ,नेता प्रशासन खुद ही कानून का पालन नहीं होने देना चाहते , न्यायलय कहता रहे आप रिहायशी कोठियों में कारोबार होने देते हैं , तब कुछ भी सही भला कैसे हो सकता है।

         हरियाणा में पिछली सरकार ने सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा किये बैठे लोगों को ज़मीन का मालिकाना हक दे दिया था , अंधा बांटे रेवड़ियां की तरह। अब नई सरकार ने ऐलान किया है जो कई सालों से किराये पर बैठे हैं उनको दुकानों की मलकियत दे दी जाएगी। शायद आपको लगे की ऐसा गरीबों की भलाई करना होगा , जो वास्तव में नहीं है। इतने सालों में दुकान जाने कितने लोगों से कितने लोगों में बदलती रही और कभी एक ही के नाम पर चलती रही कागज़ों में और धंधा कोई और ही करता रहा , जाने कितने लोग पगड़ी का पैसा लेकर जाते रहे और बहुत लोग हैं जिनको उन दुकानों की ज़रूरत ही नहीं काम करने को , उनकी खुद की कितनी ही दुकानें हैं , असलियत कुछ और ही है। नेता लोग रिश्वत खाकर ये सारे काम करते हैं रिश्वत देने वालों को फायदा पहुंचाने के लिए।

                  कौन देखता है वास्तव में किसको ज़रूरत है सहायता की और सरकार किन लोगों की सहायता करती है , बस इक कहावत है चोरी का माल हो तो बांसों के गज होते हैं। मेरे इक भाई जो ठेकेदारी करते थे कहते थे की सरकार और माँ से जितना ले सको लेना उचित है , सरकारी घी मुफ्त मिलता हो तो पास बर्तन नहीं भी हो औंगौछे में डलवा लेते हैं , चाहे रिस जाये फिर भी जो चिकनाई बच जाएगी वही सही। ऐसे हो हो रहा है और जिनके पास है उनको ही और और मिलता जाता है , जिनके पास कुछ नहीं वो हमेशा खाली हाथ रहते हैं। ये देख कर लगता है गरीबों की गरीबी तब तक नहीं मिटेगी जब तक उनको सरकारी गोदामों में कोई रास्ता तलाश करना नहीं आता। अंधेर नगरी चौपट राजा , टके सेर भाजी टके सेर खाजा। 

 

नवंबर 01, 2015

POST : 489 ज़िंदगी चाहती है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      ज़िन्दगी चाहती है ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

चाहती है ज़िंदगी
अभी शायद
और बहुत कुछ दिखाना
तभी चलते चलते
थोड़ा सा थामकर
कहती है बार-बार
सोचो देखो समझो
क्या है हासिल
और हर विपति मुझे
कुछ और ताकत
देकर जाती है हमेशा ।

मालूम होता है तभी
कौन कैसा है अपना-पराया
जो नहीं जान सकते थे
बर्सों में भी हम
ज़िंदगी का कठिन दौर
दिखा देता है ,
समझा देता है
चंद ही दिनों में ।

नहीं सोचता हूं मैं
जीना है कब तलक
न कोई डर है मौत का
मगर चाहता हूं
समझना अपने जीवन की
सार्थकता
नियति ने जो भी तय
किया होगा मेरा किरदार
मुझे निभाना है उसे
निष्ठा से इमानदारी से ।
 

 

सितंबर 13, 2015

POST : 488 हिंदी है माथे की बिंदी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       हिंदी है माथे की बिंदी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   हिंदी दिवस मनाने वाले हैं , पुराना राग सुनाने वाले हैं , हलवा-पूरी खाने वाले हैं , श्राद्ध पक्ष बताने वाले हैं , जाने किस किस को समझाने वाले हैं , रूठने और मनाने वाले हैं , अपना खेल दिखाने वाले हैं , हंस हंस कर रुलाने वाले हैं , रो रो कर भी हंसाने वाले हैं , रेवड़ियां खरीद कर लाने वाले हैं , दूर से सबको दिखाने वाले हैं , खुद ही सारी खाने वाले हैं , रहते अंग्रेजी शहर में साल भर घर अब वापस आने वाले हैं , हिंदी को बहलाने वाले हैं।

    छोटा हमें बतायेंगे वो , अपना रौब जमायेंगे वो , नई किताबें लायेंगे वो , फिर सम्मान-पुरुस्कार पायेंगे वो , हिंदी हिंदी इक रोज़ गायेंगे वो , भाषा को बचायेंगे वो , महत्व मात्र भाषा का औरों को समझायेंगे वो , खुद नहीं अपनायेंगे वो , व्यथा अपनी सुनायेंगे वो , नहीं यहां रह पायेंगे वो , बस आयेंगे और जायेंगे वो।
किताब हम भी कोई छपवाते , समीक्षा मित्रों से लिखवाते , बार-बार विमोचन करवाते , काश राजधानी को जाते , किसी प्रकाशक को भी मनाते , बिना मोल जब कोई न छपता कीमत देकर खुद छपवाते , तब जुगाड़ कोई भिड़वाते , खबर अख़बारों में छपवाते , कोई पुरुस्कार झटक कर लाते , खुद ही उसका मोल चुकाते , और फिर पाकर के इतराते।

    कुछ दिन की हैं बातें सारी , खत्म नहीं होती कभी ये बीमारी , कल उनकी आज अपनी बारी , हम खेलेंगे अपनी बारी , कुर्सी जब मिल गई सरकारी , थे जो कल तलक दरबारी , वही बने हैं आज अधिकारी , है पैसे की मारा मारी , बना है लेखक भी व्योपारी। मिल कर जीजा मिल कर साला , लाएंगे इक नया उजाला , तुमने अब तक हमको पाला , अब हमने तुमको संभाला , लगा हुआ था घर पर ताला , साफ होगा अब सारा जाला , तुम भी इसको पढ़ लो खाला , भैंस बराबर आखर काला , देख के मछली जाल है डाला , बहता है बरसाती नाला। गीत विदेशी भाषा के जो गायें , फिर उन्हीं को मुख्य-अतिथि बनायें , जो दे जायें सब खा जायें , लिख-लिखवा कर जो ले आयें , उसको पढ़ते नहीं घबरायें , सबको भाषण से बहलाएं , शब्द अंग्रेजी के दोहरायें , जब समझ हिंदी को न पायें , जिनको हमने पाल अब तक वही हमीं पर गुर्रायें , उनकी बातें समझ न पाएं , फिर भी ताली खूब बजायें , जो खुद सभा में देर से आयें , समय बहुमूल्य हमको बतायें , पहले आयें -पहले पायें।

              हर वर्ष वही तमाशा , न अधिक तोला न कम माशा , जाने है ये कैसी आशा , जो लगती जैसे निराशा , हिंदी का पेट है खाली लिखने से नहीं मिलती रोटी , उनको लगती है बताशा , हैं जो चौसर के खिलाड़ी  , जीत लेते वो हर पासा। अपने भी हालात अब बदलें , हिंदी के दिन रात अब बदलें , दुनिया बदली हम भी बदलें कभी दिल के जज़्बात अब बदलें , खाली बातों से नहीं कुछ हासिल अपनी हर इक बात अब बदलें , गीत भी अपना हो धुन भी अपनी , कुछ अपनी आवाज़ अब बदलें।

                बिन माँ-बाप की बेटी है हिंदी , अंग्रेजी संग ब्याह रचाया , बनी रही इक अबला नारी , पति को परमेश्वर जो बनाया , हाथ जोड़ खड़ी है रहती , कुछ भी फिर भी हाथ न आया , भीख ही मिलती बस कहने को , नहीं कभी अधिकार को पाया , नहीं सरस्वती मां की कद्र कोई भी , कहने को है दीप जलाया , घर दफ्तर में लक्ष्मी की पूजा करना , सभी को यही है भाया , सरस्वती पुत्र दर दर खाते ठोकर , कैसी है प्रभु की माया , चलो वही तस्वीर सजायें , इक दिन हिंदी का है आया , लेकिन अब इसको भूल न जाना , किस खातिर है ये दिन मनाया। फिर से सबका गुरूर हो हिंदी , चाहत का सिंधूर हो हिंदी , परचम बने आंचल हिंदी का अब , हिंदी चमके बनकर देश के माथे की बिंदी।

अगस्त 18, 2015

POST : 487 मुझे जन्म देने से पहले , माँ ! ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

 मुझे जन्म देने से पहले , माँ ! ( आलेख )  डॉ लोक सेतिया 

     यही अच्छा है कि मुझे अभी मार डालो , अपनी कोख में ही कर दो मेरे जीवन का अंत , अगर पाल-पोस कर बड़ी होने पर सालों बाद मार ही देना है , इस अपराध के लिये कि मैं अपनी इच्छा से जीना चाहती हूं , जिसको पसंद करती उसी से विवाह कर खुश रहना चाहती हूं , जाति - मज़हब की सीमा को नहीं मानती। अगर तब कानून से नहीं डरना , न ही इंसानियत की परवाह करनी है तो अभी भी क्यों संकोच करते हैं। कल अगर अपने झूठे मान सम्मान और अहंकार के लिये मुझे सूली चढ़ाना है तो मुझ पर उपकार कर दो , मुझे जन्म ही न लेने दो। आपके इस दकियानूसी समाज का यही चलन रहा तो हम बेटियां खुद ईश्वर से प्रार्थना करेंगी कि हमें नहीं जन्म दे ऐसे समाज में। जो समाज हैवानियत का नंगा नाच करने पर शर्मसार नहीं होता बल्कि शान से सिर उठाकर चलता है , उसमें बेटी बन जन्म लेना तिल तिल करके मरना है। उस समाज में बेटी , बहन , बहु क्या माँ तक का कोई स्थान नहीं हो सकता , उसे तो नारीविहीन होना चाहिए ताकि उसका अंत हो सके। जब बेटियां जन्म ही नहीं लेंगी तो वो समाज कब तक बचा रहेगा। मुझे ऐसे समाज से कुछ प्रश्न पूछने हैं।

    जिस धर्म , जिस इतिहास की आप बातें करते हैं , जिनपर कहते हैं गर्व है , क्या उसमें किसी ने प्यार नहीं किया था , प्रेम विवाह नहीं होते रहे , कन्या ने अपने वर चुनने के अधिकार का उपयोग नहीं किया था। किस किस को मिटाना चाहोगे , मीरा को , राधा को , कबीर के दोहों को , रहीम के दोहों को किताबों से नहीं जन जन के दिल से कैसे मिटा पाओगे। इक ताजमहल को ही नहीं और  तमाम प्रेम के स्मारकों को ध्वस्त करना होगा , कितने ही धर्म-स्थल को तोड़ना होगा , प्यार का नामो निशां मिटाना है अगर। खुद मिट जाओगे , नहीं मिटा सकोगे।

                आज मुझे हर समाज की , दुनिया भर की महिलाओं से इक बात कहनी है , जो माँ बनना चाहती हैं , बनने जा रही हैं। क्या आज जिसे अपनी कोख में पाल कर सृजन की अनूठी प्रसन्नता को हासिल करने का सौभाग्य प्राप्त कर रही हैं , कल अपने ही हाथों से झूठे रीति रिवाज़ों के नाम पर उसका अंत करना चाहेंगी।
ईश्वर ने तुम्हें मातृत्व का सुख इसलिए नहीं दिया कि तुम जब चाहो अपने ही अंश को मिटा दो। माँ बनना आसान नहीं है ममता का फ़र्ज़ निभाना होगा जीवन प्रयन्त।  बेटी को जन्म देना चाहती हैं तो संकल्प लें उसकी रक्षा करने का। माँ के नाते को समझे बिना माँ बनने की भूल नहीं करना। मेरी ही नहीं हर बेटी की हर माँ से यही विनती है , वो बेटियां जो जन्म ले चुकी हैं और वो भी जो अभी जन्म नहीं ले पाई। 

 

अगस्त 16, 2015

POST : 486 सुनो मेरी कहानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

               सुनो मेरी कहानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

मैंने कुछ भी नहीं जोड़ा न ही कुछ कम किया , उस बेचारी डेमोक्रेसी नाम की महिला की बात सच सच लिख दी। क्या लिखता कौन दोषी है कौन निर्दोष , ये पढ़ने वालों पर छोड़ दिया , मुझे समझ नहीं आया इसको क्या शीर्षक दूं , इसलिये बिना किसी शीर्षक ही कहानी लिख दी। पढ़ते ही वो गंभीर हो गये , कहने लगे समस्या बहुत विकट है , तुम नहीं जानते बिना शीर्षक की कहानी का क्या हाल होता है। शीर्षक ही तो पढ़ने को मज़बूर करता है। बिना शीर्षक की कहानी तो कटी हुई पतंग की तरह है , छीना झपटी में ही फट जाती है , किसी के भी हाथ नहीं लगती।  या जिसके हाथ लगे वही मनमानी कर लेता है उसके साथ। ऐसी पतंग से कोई सहानुभूति नहीं जताता , क्या तुम चाहते हो तुम्हारी कहानी की ऐसी दशा हो देश की जनता जैसी। नहीं चाहते तो जाओ कहीं से कोई लुभावना सा शीर्षक तलाश करो जो बाज़ार में बिक सकता हो , फिर उसको कई गुणा दाम पर बेचो। ठीक वैसे जैसे मोदी जी का स्लोगन , अच्छे दिन आने वाले हैं , ऐसा भाया जनता को कि उनको जितना मांगते थे उससे भी बढ़कर बहुमत मिल गया।  ये सबक अरविन्द केजरीवाल को भी समझ आया और नतीजा देख लो , कहां उनको उम्मीद थी इतनी सफलता की। जब तक खुद अपनी कीमत बड़ा चढ़ा कर नहीं बताओगे , कोई इक धेला भी नहीं देगा। तुम जानते हो लोग अपनी आत्मकथा औरों से लिखवाते हैं , सभी को कहां लिखना आता है , ऐसे लेखक अपनी कीमत पहले वसूल लेते हैं दोगुनी , क्योंकि उनका नाम तो होता नहीं लिखने वाले के रूप में। अपने दुखों को बेचना तो बड़े बड़े लेखकों का काम रहा है , ऐसी मनघड़ंत कहानियां पुरुस्कार अर्जित किया करती हैं। इस तुम्हारी कहानी में न कहीं कोई नायक है न ही कोई खलनायक ही , कोई नाटकीयता भी नहीं , कोई सस्पेंस भी नहीं।  कोई प्रेम प्रसंग नहीं , न ही अवैध संबंध की ही बात। सब किरदार जैसे आस पास देखे हुए से लगते हैं , लोग , पाठक-दर्शक तो जो नहीं होता वही तलाश करते हैं। देख लो इन दिनों फिल्मों में नायक वो वो करते हैं जो नहीं किया जाना चाहिए , फिर भी लोग वाह-वाह करते हैं। अब तो खलनायक ही लोगों को अधिक भाते हैं। हर कहानी में ये सभी मसाले होने ज़रूरी हैं , वरना कहानी नीरस हो जाती है। लोग फिल्म देखते हैं या कहानी पढ़ते हैं तो रोमांच के लिए , न कि किसी विषय पर चिंतन करने को।  ये काम सभी औरों के लिए छोड़ चुके हैं , यार छोड़ , मस्त रह , मौज मना , ये सोच बना ली गई है।

          बिना मिर्च मसाले का फीका खाना तो लोग मज़बूरी में डॉक्टर के कहने पर भी नहीं खाते आजकल , तुमने कभी होटल रेस्टोरेंट का खाना खाया है , बड़े बड़े पांचतारा होटल का खाना न भी खाया हो , फिल्मों में , टीवी सीरियल में तो देखा होगा। कितना सुंदर लगता है , सजा कर परोसा जाता है , किसकी मज़ाल है जो उसको अस्वादिष्ट बता दे। कोई बताये तो लोग कहते उसको मालूम ही नहीं कांटिनेंटल खाना किसे कहते हैं। तुम्हारी कहानी कोई स्कूल की किताब में शामिल थोड़ा है जो पढ़नी ही होगी , कोई मुख्यमंत्री भी नहीं रिश्तेदार कि उसके प्रभाव से प्रकाशक तगड़ी रॉयल्टी देकर भी छापना चाहे। कहानी का नाम ही ऐसा रखो कि लगे कि ऊंचे दर्जे की कहानी है , अक्सर लोग जो कहानी समझ नहीं पाते उसको ऐसी समझते हैं। इक और बात जान लो , जिन कहानियों का प्रचार किया जाता है सच्ची घटना या किसी के जीवन पर है , उनमें सबसे ज़्यादा झूठ होता है। झूठ को कल्पना से मिला कर उसको बेचने के काबिल बनाया जाता है , कहानी का स्वरूप समय के साथ बदलता रहता है , अपनी इस कहानी को आधुनिक रूप दे दो , अच्छे अच्छे डॉयलॉग शामिल करो , खुद न लिख सको तो डॉयलॉग राइटर से लिखवा लो , या चाहो तो फिल्मों से टीवी सीरियल से अथवा पुरानी किताबों से चोरी कर लो , कोई नहीं रोकने वाला। जहां कहानी दुःख दर्द से बोझिल होती लगती है , वहां साथ में थोड़ा हास्य रस का समावेश कर दो , जैसे अभिनेता चुटकुले सुना देते हैं हंसाने को। शृंगार रस की कोई बात ही नहीं कहानी में , जैसे भी हो कोई दृश्य ऐसा हो कि पाठक - दर्शक फ़ड़फ़ड़ा उठें। कहानी में सभी की रूचि का ध्यान रखना है , आगे क्या होगा ये प्रश्न मत छोड़ो , अंत ऐसा हो कि  लोग वाह वाह कह उठें। ऐसा अंत सभी गलतियों को छुपा लेता है। अब बाकी रह जाता है किताब को या कहानी को आकर्षक ढंग से पेश करना , तो ये काम तुम संपादकों पर छोड़ दो , वे कहानी में से निकाल कर कुछ खूबसूरत शब्द ऐसे मोटे मोटे अक्षरों में छापेंगे कि  देखने वाला पढ़ने को उत्सुक हो जाये। जैसी मैंने समझाया वैसी कहानी लिखो तभी उसको अख़बार , पत्रिका , प्रकाशक छापेंगे।  लगता है मेरी कहानी अनकही अनसुनी ही रहेगी।

अगस्त 13, 2015

POST : 485 सब लूटने - सब बेचने की आज़ादी ( विडंबना ) डॉ लोक सेतिया

    सब लूटने - सब बेचने की आज़ादी  ( विडंबना ) डॉ लोक सेतिया

      जाने क्यों मुझे लगा कि फेसबुक पर "बात महिला जगत की" पेज पर महिलाओं की बात लिखनी है तो कुछ पत्रिकाएं जो विशेषकर महिलाओं की कहलाती हैं को पढ़ना उपयोगी हो सकता है। और मैं अखबार - पत्रिकाएं बेचने वाले से ऐसी पत्रिकाएं खरीद लाया। जब पढ़ा उनको तो पता चला कि औरत को न तो खुद को कैसे ज़िंदा रखे इसकी चिंता है आज जब सुनते हैं छोटी छोटी बच्चियां तक वहशी लोगों की हवस का शिकार हो रही प्रतिदिन , न ही उसको और कोई गंभीर समस्या। पत्रिकाओं से पता चला कि आज की औरत की सब से बड़ी समस्या है कैसे उनका रंग गोरा हो सकता है , कैसे वो स्लिम हो सकती हैं , कैसे उनको नया फैशन अपनाना है , उनको मेहंदी कैसे लगानी हाथों पर , कौन सा इत्र , कौन सा दुर्गन्ध नाशक इस्तेमाल करना है , कैसे घर को कीमती चीज़ों से सजाना है। कहीं नहीं लगा कि उसको भूख की गरीबी की , खुद पर हो रहे अन्याय - अत्याचार की भी कोई समस्या है। अधिक नहीं तो 60 से 7 0 प्रतिशत महिलाओं की , जो खेतों में - घरों में दिन रत काम करती रहती , जो मज़दूरी करती हैं , जो सड़कों - गलियों से कूड़ा एकत्र कर बेच कर अपना और अपने बच्चों का पेट भरती हैं , जो हर जगह प्रताड़ित की जाती रहती हैं , डरी सहमी रहती हैं , उनकी एक भी बात मुझे नहीं मिली पढ़ने को।  लगा जो समाज मैं देखता हूँ आस पास वो तो यहां कहीं है ही नहीं , न जाने ये कहां की महिलाओं की बात है। मगर उन्हीं को दोष देना उचित नहीं है , यहां धर्म वालों को लोगों को धर्म क्या है , उस पर कैसे चलना है , नहीं सिखाना , उनको धर्म को बेचना है ताकि वो नाम शोहरत और दौलत कमा सकें।  कोई शिक्षा का कारोबार करता है , कोई स्वास्थ्य सेवाओं को बेचने में लगा है , मीडिया-पत्रकारिता की बात और सच्चाई की बात करने वाले , सच को नहीं तलाश करते वो सच का लेबल लगा कुछ भी बेच रहे हैं। पैसा कमाना ही एकमात्र उद्देश्य बन गया है सभी का। समाजसेवा तक एन जी ओ बना कर की जाती है ताकि सरकार से देश विदेश से चंदा लेकर जैसे मर्ज़ी उपयोग कर सकें। अब कोई आपकी पहचान का अफ्सर या विधायक - सांसद  बन गया तो उस से सरकारी धन अपने लिये पाने का ये आसान रास्ता है , इन जी ओ बना लो ! खास बात है सभी शीशे के घर में रहते हैं , कौन दूसरे को गलत बता सकता है। ये जो नेता उपदेश देते हैं आपको त्याग करने का औरों के लिये , आप सब्सिडी नहीं लो तो किसी और को देंगे , उनसे कोई पूछे तो कि देश में सब से बड़े परजीवी कौन हैं , आप नेता लोग जिनको इस गरीब देश से सभी कुछ चाहिए। जाते हैं गांधी जी की समाधि पर फूल अर्पित करने , की चिंता सब से दरिद्र की , भाषण देते हैं देशभक्त शहीदों का नाम लेकर , क्या यही सपना था उनका कि आप शासक बन राजसी शान से रहो और यहां हज़ारों लोग गरीबी से तंग आकर ख़ुदकुशी करते रहें। 

       क्या कहोगे कि ख़ुदकुशी का गरीबी से कोई ताल्लुक नहीं , चलो नरेंदर मोदी जी की सरकार के पहले साल के ये आंकड़े देखते हैं  , जिन लोगों ने आत्महत्या की उनकी आमदनी क्या थी , देखें :-

91820 जिनकी वार्षिक आय एक लाख से कम थी।

35405 जिनकी वार्षिक आय एक लाख से पांच लाख तक थी।

3656 जिनकी वार्षिक आय पांच लाख से दस लाख तक थी।

785 जिनकी वार्षिक आय दस लाख से अधिक थी।

       ( अब भूख से मरने वालों की गिनती तो कोई करता ही नहीं , 
               उसको तो किसी रोग से मरना बताते हैं )

      पंद्रह अगस्त को आज़ादी का जश्न कौन लोग मनाते हैं , कितने गरीब शोषित , गलियों में भीख मांगते बच्चे , रोज़ काम की तलाश में भटकने वाले युवा , और भी बदनसीब हैं जिनको अभी आज़ादी का अर्थ तक नहीं मालूम।

अगस्त 04, 2015

POST : 484 महिला जगत के लिये , पैगाम-ए-ग़ज़ल ( शायर मजाज़ लखनवी से डॉ लोक सेतिया "तनहा" तक )

            महिला जगत के लिये , पैगाम-ए-ग़ज़ल 

     ( शायर  मजाज़ लखनवी से डॉ  लोक सेतिया "तनहा" तक )

                        मजाज़ लखनवी जी  की  ग़ज़ल :- 

                    हिजाबे फ़ितना परवर अब हटा लेती तो अच्छा था ,
                  खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था।

                   तेरी नीची नज़र खुद तेरी अस्मत की मुहाफ़िज़ है ,
                   तू इस नश्तर की तेज़ी आज़मा लेती तो अच्छा था।

                    तेरा ये ज़र्द रुख ये खुश्क लब ये वहम ये वहशत ,
                    तू अपने सर से ये बादल हटा लेती तो अच्छा था।

                     दिले मजरूह को मजरूहतर करने से क्या हासिल ,
                     तू आंसू पौंछकर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था।

                     तेरे माथे का टीका मर्द की किस्मत का तारा है ,
                     अगर तू साज़े बेदारी उठा लेती तो अच्छा था।  

                       ( साज़े - बेदारी = बदलाव का औज़ार )

                      तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन ,
                      तू इस आंचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था ।





   ये शायद गुस्ताखी है कि ऐसे शायर के इतने लाजवाब कलाम के बाद ये नाचीज़ अपनी नई लिखी ताज़ा ग़ज़ल सुनाये।  मगर ऐसा इसलिये कर रहा हूं कि मुझे भी वही पैगाम आज फिर से दोहराना है , अपने अंदाज़ में।  पढ़िये शायद आपको कुछ पसंद आये :::::::

                         ग़ज़ल डॉ लोक सेतिया "तनहा"

                      ज़माने को बदलना है , नई दुनिया बसाना है ,
                      उठा कर हाथ अपने , चांद तारे तोड़ लाना है ।

                      कभी महलों की चाहत में भटकती भी रही हूं  मैं ,
                      नहीं पर चैन महलों में वो कैसा आशियाना है ।

                      मुझे मालूम है तुम क्यों बड़ी तारीफ करते हो ,
                      नहीं कुछ मुझको देना और सब मुझसे चुराना है ।

                     इसे क्या ज़िंदगी समझूं , डरी सहमी सदा रहती ,
                     भुला कर दर्द सब बस अब ख़ुशी के गीत गाना है ।

                      मुझे लड़ना पड़ेगा इन हवाओं से ज़माने की ,
                       बुझे सारे उम्मीदों के चिरागों को जलाना है ।

                     नहीं कोई सहारा चाहिए मुझको , सुनो लोगो ,
                    ज़माना क्या कहेगा सोचना , अब भूल जाना है ।

                      नहीं मेरी मुहब्बत में बनाना ताज तुम कोई ,
                  लिखो "तनहा" नया कोई , हुआ किस्सा पुराना है ।

                                ( डॉ लोक सेतिया "तनहा" )