गुज़ारिश तुझसे कि अपने आप से ( कविता ) डॉ लोक सेतिया
सारी उम्र यही होता रहामुझे क्या पता
कौन करता रहा।
हर कदम निराशा हताशा
इक जंग किसी तरह जीने को।
जाने ये क्या है
मेरी नाकामी मेरी काबलियत की कमी
अथवा मेरी बदनसीबी।
ज़िंदगी में कभी भी
कुछ भी जो चाहा मैंने
मिला नहीं मुझे।
प्यार नहीं पैसा नहीं
नाम नहीं शोहरत नहीं।
इक उम्मीद फिर भी
जगाता रहा मैं किसी न किसी तरह
कि एक दिन सब बदलेगा
बदलना है मुझे।
बहुत किया विश्वास
मांगी हर दिन दुआ भी
करता रहा प्रार्थना परमात्मा से।
नहीं सुनी जाने क्यों
तुमने मेरी कभी फरियाद
नहीं हुआ मुझ पर कभी दयालु तू।
माना नहीं जीता कभी मैं
मगर मानी नहीं कभी हार भी
बिना तकदीर के सहारे भी जिया हूं मैं।
शायद मुझे छोड़ देनी चाहिए
अब जीने की हर इक उम्मीद
मगर नहीं टूटी अभी भी मेरी आशा।
मेरी कहानी में
बेशक नहीं होगा कोई सबक
जंग जीतने का
लेकिन मेरी जंग कभी
थमी नहीं होगी जीते जी।
कोई आगाज़ नहीं था मेरा
कुछ भी नहीं रहा बीच में
विस्तार या ऊंचाई
फिर भी इक अंत
ज़रूर होगा मेरा जानता हूं।
शायद कोई नहीं जानता
जीने के लिये कैसे खुद को और सभी को
छलता रहा हूं मैं
जो नहीं वो होने का आडंबर करके।
अगर तू है विधाता कहीं पर कोई
तो तू समझता होगा
मेरी हर परेशानी
जो मेरे सिवा नहीं समझा कोई भी दुनिया में।
ये मेरी शिकायत है या प्रार्थना
तुझ से है या फिर
खुद अपने आप से
नहीं मालूम मुझे
क्या मालूम है तुझे ऐ खुदा।
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