मई 19, 2014

POST : 443 दर्द-ए-ग़ज़ल ( एक खत ग़ज़ल का ) { तीरे-नज़र } डा लोक सेतिया

 दर्द-ए-ग़ज़ल ( एक खत ग़ज़ल का ) { तीरे-नज़र } डा लोक सेतिया

मुझे चाहने वालो , मेरा सलाम। तुम मुझे बेहद चाहते हो , मेरे दीवाने हैं दुनिया भर में तमाम लोग। मुझे नाज़ है उन सब पर जिनको इश्क़ है मुझसे। मगर जाने क्यों ये कुछ नासमझ लोग मेरे साथ इक खिलवाड़ करने लगे हैं। और कहते हैं कि मेरे चाहने वाले हैं। मैं बेहद नाज़ुक हूं , मेरी सुंदरता मेरे स्वभाव की कोमलता , हर बात कहने के मेरे अपने सलीके और सभी को लुभाने वाले मेरे अंदाज़-ए-बयां में है। मेरे रंग रूप को जैसे चाहो वैसे बदलोगे तो मेरी सारी कशिश ही समाप्त हो जायेगी। मेरे साथ इस तरह छेड़खानी करने वाले मेरा नाम ही बदनाम कर देंगे। मैं तो उन शायरों की विरासत हूं जिन्होंने पूरी उम्र साधना करके मुझे सजाया , संवारा और निखारा है। मगर आजकल तो मुझे जाने समझे बिना ही हर कोई दावा करने लगा है कि मैं उसी की हूं। इनमें से कितने तो इतना भी नहीं जानते कि मेरा नाम ग़ज़ल क्यों रखा गया है , वे क्या मुझे समझेंगे और कैसे मुझे अपना बनायेंगे। हमेशा से मैं सभी का दर्द बयां करने का माध्यम रही हूं , मगर आज मुझे कोई नहीं नज़र आता जो मेरे दिल का दर्द दुनिया को बता सके। मैं किसके पास जाऊं इंसाफ मांगने , है कोई मुंसिफ जो उनको सज़ा दे सकता हो जो खेल रहे हैं मेरी अस्मत के साथ बार बार। मुझे क़त्ल करने वाले , मुझे खून के आंसू रुलाने वाले खुद को शायर बता रहे हैं। ये देख मुझ पर क्या बीतती है कौन समझेगा। इस खत से पहले भी मैंने कुछ खत लिखे थे उन शायरों के नाम जिन्होंने मुझसे मुहब्बत ही नहीं की , जो तमाम उम्र मेरी इबादत करते रहे।ग़ालिब , दाग़ , जिगर जैसे मुझे दिलो जान से चाहने वाले लोग। उन लोगों ने कभी भी मेरी नफासत को दरकिनार नहीं किया , मेरी खुशबू को मेरे मिजाज़ को हमेशा बचाये रखा। वो जानते थे बेहद नाज़ुक हूं मैं , छूने भर से मुरझा सकती हूं , उन्होंने मेरा एहसास अपनी रग रग में , अपनी हर सांस में भर लिया था। काश मुझे चाहने वाले वो शायर आज फिर से आ जायें और मैं खुद को उनकी आगोश में छिपा लूं।

                        ये खत भेजा है ग़ज़ल ने मुझे , मेरे नाम अपने सभी चाहने वालों के नाम। इस पर कोई नाम नहीं लिखा हुआ है , ये सभी ग़ज़ल को चाहने वालों के नाम है इक संदेश। पढ़कर परेशान हो गया हूं मैं , करूं तो क्या करूं , ग़ज़ल के इस दर्द को जाकर किसको समझाऊं और किस तरह। आज के लिखने वाले तो बड़े ही बेदर्द हो गये हैं।
"ग़म ज़माने के लिखते रहे उम्र भर , खुद जो एहसास-ए-ग़म से भी अनजान थे"।
हमसे कई बार भूल हो जाती है , जिसको फूल सा कोमल मान लेते हैं वो पत्थर सा कठोर होता है। आशिक़ भी प्यार में जब प्रेमिका को ग़ज़ल नाम दे बैठते हैं तो बाद में पछताते हैं जब उनकी कविता का रूप पहले सा नहीं रहता।

        "खुद ग़ज़ल हैं वो हमारे दिल की , क्या भला और सुनायें उनको"।

ग़ज़लकार ये अनर्थ कर बैठते हैं , अपनी महबूबा को ग़ज़ल नाम देना अर्थात उसको महफ़िल के हवाले कर देना। हर कोई उसकी तारीफ करे और उसको चाहने लगे ये देख कर खुद जलन होने लगती है। हर कोई समझता है उसी का अधिकार है ग़ज़ल पर बाकी तो कहने को ग़ज़ल कह रहे हैं। ग़ज़ल इक खूबसूरत ख़्वाब है। शायर हर बार सोचता है कि आज जो ग़ज़ल सुनाने जा रहा है वो लाजवाब है , मगर मुशायरे में सुनाने के बाद फिर सोचता है अगली ग़ज़ल ऐसी शानदार लिखेगा कि सब वाह वाह कर उठेंगे। ग़ज़ल का अंदाज़ कहां सभी को आता है , तभी तो कहा था ग़ालिब ने कि , है ग़ालिब का अंदाज़-ए-बयां और।

                 मैंने भी अपने दिल में ग़ज़ल की इक दिलकश सी तस्वीर बना राखी थी। आज जब मेरे सामने आई तो देख कर हैरान हो गया हूं , मैंने पूछा था ग़ज़ल से ये क्या हाल बना रखा है तुमने प्रिय। सुन कर रोने लगी थी अपनी दुर्दशा पर। बोली , देख लो छापने वाले ने मेरी कैसे दुर्गति की है , इससे तो बेहतर होता बिना छापे लिखने वाले को वापस ही भेज देता। इस तरह छपा देख कर मुझे लिखने वाले के दिल पर क्या बीत रही है ये वही जानता है या मैं समझती हूं। उस पर ये प्रकाशक मानता होगा कि उसने कोई उपकार किया है छाप कर। उसके लिये ग़ज़ल में या कुछ और छापने में कोई अंतर नहीं है , उसको किसी तरह जगह भरनी है , कुछ भी परोसना है पढ़ने वालों को। ग़ज़ल कहने लगी आजकल ग़ज़ल संध्या के नाम पर तमाशा किया जाता है , गाने वाले ऐसे गाते हैं कि वो सहम कर रह जाती है। ये गायक इतना भी नहीं जानते कि मुहब्बत या इबादत और बात है और किसी को ज़बरदस्ती अपना बनाना दूसरी बात। इक दर्द ये भी है ग़ज़ल का कि सभाओं में उसके शेरों को गलत ढंग से सुनाया जाता है बिना उसका अर्थ जाने , तालियां बटोरने के लिये। शायरी का ये क़त्ल उससे देखा नहीं जाता। बड़ा ही अनाचार होने लगा आजकल ग़ज़ल के साथ , उसपर हो रहे ज़ुल्म की शिकायत मैं जाकर किस से करूं। कौन उसको बचाये उनसे जो ग़ज़ल की आबरू तार तार करने पर तुले हैं। ग़ज़ल को बचा लो , कहीं बेमौत न मर जाये ग़ज़ल। कर सको तो ग़ज़ल के इस दर्द को आप भी दिल की गहराई से महसूस करो। आपकी पलकों पर अगर दो आंसू आ जायें ग़ज़ल का दर्द सुनकर तो समझना कि आप भी शामिल हैं ग़ज़ल के चाहने वालों में। 
 

 

मई 16, 2014

POST : 442 आशिक़ी का जुनून है ( अनकही ) डॉ लोक सेतिया

        आशिक़ी का जुनून है   ( अनकही ) डॉ लोक सेतिया

       किसी दिन हम अपनी कहानी लिखेंगे ,  हम अपनी प्यास को तब पानी लिखेंगे । 

जब किसी को आस पास कहीं से भी प्यार नहीं मिलता तब वो अपनेपन को तरसता है और जब भी कोई दो बोल प्यार के बोलता है तब उसी का होकर रह जाता है और रहना चाहता है जीवन भर को लेकिन उम्र भर समझ नहीं पाता कि सपनों की बातें वास्तविक जीवन में हक़ीक़त नहीं बनती हैं । घड़ी दो घड़ी पल दो पल या कुछ दिन साल महीने का साथ सभी निभाते हैं और अचानक किसी मोड़ से राहें अलग अलग हो जाती हैं । कुछ लोग नासमझ नादान होते हैं और अपनी नादानियों से प्यार करते हैं बचपन से लेकर बड़े होने तक खोये रहते हैं पुरानी यादों में जो ख़्वाब ही थे वास्तविकता कभी नहीं बने ये बात ऐसे लोग मानते ही नहीं । बस जहां जो भी प्यार से मिला उसी के हो जाते हैं और दिल में बसाते हैं उनको दिल से निकालते नहीं कभी भी भले समझाते हैं अनुभव कि कोई किसी का हमेशा को होता नहीं है यही दुनिया का चलन है । जिनको चाहा दिल में जगह दी उनको पराया समझना उनको नहीं आता कभी भी । कोई दोस्त कोई अन्य किसी रिश्ते से जुड़ जाता है ये सिलसिला चलता रहता है ज़माने की तरह कोई दूसरा मिल गया तो पहले जितने संगी साथी थे उनको छोड़ना आदत नहीं होती कुछ लोगों की । कितने सालों बाद फिर से अचानक पुराने लोग मिल जाएं तो यूं लगता है कभी जुदाई आई ही नहीं , दुनिया को गिले शिकवे शिकायत याद रहते कुछ विरले ही लोग होते हैं जिनको सिर्फ दोस्ती प्यार अपनापन और जिस जिस ने जैसे जितना साथ निभाया बस वही रहता है याद । 

मन की बातें कभी किसी से कहना नहीं आता हर किसी को वक़्त की धारा संग बहना नहीं आता । भूले से कभी दिल में कुछ आये भी तो दिल को समझा लेते हैं सब को दर्द की दौलत भी कहां नसीब होती है । ज़िंदगी के सफ़र में ग़म ही तो साथ निभाते हैं खुशियां कब रहती है हमेशा टिककर । क्या हुआ जो दिल बार बार टूटता रहा ये तजुर्बा भी कोई थोड़ा तो नहीं जिस ने दामन छुड़ाया उसको नहीं मना सके पर कभी हाथ पकड़ कर  छोड़ा तो नहीं । किसी भी किताब पर किसी पन्ने पर इक अपना ही नाम नहीं लिखा रहता पलटते हैं ज़िंदगी की किताब के पन्ने तो हर पन्ने पर कोई नया कभी फिर से वही पुराना कोई नाम शक़्ल सूरत बदल दिखाई देता है । हर अध्याय कुछ और कहानी कहता है कोई सामने नहीं होता फिर भी बंद कमरे में रहता है कोई तो है जो शायद इस दुनिया में नहीं है तब भी अपने दुःख दर्द समझता है पीड़ा को सहता है । कभी नहीं सोचा न कभी जाना ज़माना पागलपन दीवानगी कहता है । सपनों का खूबसूरत महल ज़ेहन में रहता है कभी नहीं ढहता है कौन परायों को अपना समझता है चले आओ या मुझे बुला लो बार बार कहता है । कभी कोई खिड़की कभी कोई दरीचा कभी छत का कोई कोना कभी बारिश कभी तपती गर्मी कभी यूं ही किसी शाम किसी के साथ कितनी यादें जुड़ी को सीने में सबसे छुपाए रखते हैं । जिनको नहीं वापस लौटना उनकी आस लगाए रखते हैं शाम की सैर वो बहता पानी दो किनारे लंबे होते साये हमेशा याद रखते हैं । 

कभी अपनी मुहब्बत की रुसवाई नहीं करते सितम करने वाले को हरजाई नहीं कहते । सब की अपनी कोई मज़बूरी थी बस और कोई नहीं दूरी थी । कुछ ख़त लिखे थे कुछ मिले थे सभी को हमेशा को जाने कब कहां रख दिया कि ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे किसी को खुद को भी नहीं । अपने देखा है एकांकी नाटक जिस में बस इक किरदार सामने रहता है बाक़ी सभी कल्पना से निर्मित होते हैं दर्शक को अनुभव होता है कितने और हैं मगर सब काल्पनिक होता है । ऐसे ही कुछ लोग जिनको कोई नहीं मिलता कोई बात तक नहीं करता कोई देखता नहीं किस तरह अकेलेपन को झेलता है कोई शख़्स अपने लिए इक ख्याली दुनिया बसा कर जीते हैं दुनिया को पता ही नहीं चलता कि उनकी कहानी में कोई भी वास्तविक किरदार नहीं रहा सपनों में जीने की आदत क्यों कैसे किसी को पड़ जाती है क्या पता शायद ज़िंदा रहने को कोई और तरीका उनको सूझता नहीं है तो खुद से अपने आप से बातें करते हैं , कभी झगड़ते हैं खुदी से कभी खुद को मना लेते हैं । हर रस्म निभा लेते हैं ख्वाबों को सजा लेते हैं । जिन का कोई वजूद नहीं कुछ होते हैं उनसे नाता बना लेते हैं निभा लेते हैं तन्हाई में उन बातों से खुद को बहला लेते हैं मुहब्बत से मुहब्बत का कहां सब लोग सिला देते हैं ।
 
 

     

    

मई 15, 2014

POST : 441 जब चले जायेंगे मेले के दुकानदार ( तरकश ) डा लोक सेतिया

जब चले जायेंगे मेले के दुकानदार  ( तरकश ) डा लोक सेतिया

          मेला कुछ दिन का ही होता है , जब कहीं मेला लगा हो तब वहां बहुत चहल पहल होती है , भीड़ होती है , शोर-शराबा होता है। मगर जब मेला खत्म हो जाता है तब वहां का मंज़र ही और होता है। मेले में सब कुछ मिलता है , खेल-तमाशा भी होता है और खाने-पीने से लेकर सभी तरह का सामान भी बिकता है। मेले में सामान बेचने वाले दुकानदार भी अपनी तरह के ही होते हैं। पीतल पर सोने की पालिश किये गहने मेले में असली सोने के गहनों से भी सुंदर दिखाई देते हैं। मेले भी कई तरह के होते हैं , कभी गांव में हर साल लगता था मेला। मेला नाम की फिल्म भी बनी थी शायद दो बार , बहुत सारी फिल्मों की कहानी मेले से ही शुरु होती रही है।  मेले में दो भाईयों का बिछुड़ना , ये कीतनी बार देखा है फिल्मों में। मेला देखने का शौक बच्चों से लेकर बूढ़ों तक हमेशा होता ही है। माशूक़ा महबूब से मिलने मेले में जाती है और आशिक़  से मेले से चांदी का छल्ला दिलवाने को कहती है , कहानी में। ये और बात है कि इधर प्यार  मॉल में कितनी मंज़िल ऊपर  चढ़ता है महंगे उपहार की खरीदारी से लेकर फ़िल्म देखने खाने पीने पर महीने भर की कमाई खर्च करवाता है।

      राजधानी दिल्ली में तो प्रगति मैदान इक जगह ही मेलों के लिये है , जहां हर दिन कोई न कोई मेला लगा ही रहता है। करीब दो महीने से देश में भी इक मेला लगा हुआ है , चुनाव का , लोकतंत्र का मेला। इसमें भी बहुत कारोबारी करोबार करते नज़र आ रहे हैं। नेता , राजनैतिक दल ही नहीं टीवी चैनेल से लेकर अखबार वाले तक सब का धंधा चोखा चल रहा है।  कई तो इतना कमा जाएंगे कि फिर बहुत दिन आराम से बैठ कर खाते रहेंगे। सबकी दुकानें सजी हुई हैं , दिन-रात उनका माल बिक रहा है मुंह मांगे दाम पर। कोई मोल भाव की बात नहीं करता , उनके पास फुर्सत कहां है इसके लिये। लेना हो तो लो वर्ना आगे बढ़ो , भीड़ मत करो ऐसा कहते हैं। बस खत्म होने को है ये मेला , देश की जनता मस्त रही बहुत दिन इस मेले में। अब देखते हैं कि मेले के बाद क्या मिलता है देश को आम जनता को। आपने कभी तो देखा होगा उस जगह का नज़ारा जहां लगा हुआ था कोई मेला दो दिन पहले , वहां लगता है जैसे कोई तबाही हुई हो।  अभी तलक देश की जनता को भी वही मिलता रहा है , इस बार क्या होगा , देखना है। अच्छे दिन ढूंढते ढूंढते थक गए और मिले भी तो बदहाली के दिन नसीब की बात है। तब राज़ खुला अच्छे दिन जुमला था सच में कोई अच्छे दिन मिलते नहीं जनता को अच्छे दिन उन्हीं के होते हैं जिनकी सत्ता सरकार होती है।

                     मेले से लोग जिस वस्तु को सस्ता समझ खरीद लाते हैं , जब वो दो ही दिन में बेकार हो जाती है तब समझ आता है कि महंगा रोये एक बार सस्ता रोये बार बार। मेले से खरीदे सामान की कोई गारंटी नहीं होती है न ही उसको बदला या वापस किया जा सकता है। कभी कभी शहर के बाज़ार में भी सेल लगती है भारी छूट पर बाकी बचे सामान की , तब उसपर भी मेले वाले बाज़ार के नियम लागू होते हैं। मेला कोई भी हो हर दुकानदार मुनाफे में रहता है। चुनाव के मेले में भी सब नेता , सभी दल फायदे में ही रहते हैं , चाहे सत्ता मिली हो चाहे गई हो हाथ से। इतने साल घोटालों में लूट की ये सज़ा कुछ भी नहीं। लेकिन चुनाव के इस मेले से आम लोग अपना बहुमूल्य वोट देकर जो जो वादे , उम्मीदें लेकर आये हैं वो सच साबित हों इसकी कोई गारंटी नहीं है। न ही आपकी पूंजी , आपका वोट आपको फिर वापस मिल सकता है , जिसको दिया वो पांच वर्ष तक उसी का ही है। चुनाव जीत कर नेता बाकी सब भूल कर सत्ता की दौड़ में शामिल हो जाते हैं , कल जो विरोधी थे आज सहयोगी बन जाते हैं। बहुमत की चिंता , सब को खुश रखने की बात , किसको क्या क्या मिले ये ही मकसद बन जाता है। सत्ता और शासन का चरित्र कुर्सी का चरित्र ही होता है , कुर्सी वहीं रहती है , उसपर बैठने वाले बदलते रहते हैं। जब लोग कुर्सी पर आसीन व्यक्ति को सलाम करते हैं तो वे वास्तव में कुर्सी को ही सलाम कर रहे होते हैं।

                   सवाल यही है , कि पहले की तरह इस बार भी क्या सत्ताधारी दल का नाम और कुर्सियों पर बैठने वाले नेताओं के नाम ही बदलेंगे या सच में कुछ बदलाव भी देखने को मिलेगा। क्या शासन का तौर-तरीका भी बदलेगा , या अब भी नेता शासक बन कर दाता और जनता याचक बनी रहेगी। क्या जनता मालिक की तरह अपना अधिकार पा सकेगी , क्या आज़ादी के सतसथ वर्ष बाद कुछ बदलेगा।  क्या सच अच्छे दिन आयेंगे। क्या वो हालत नहीं रहेगी कि जनता की थाली मात्र चंद रूपये की और सत्ताधारी लोगों की हज़ारों रूपये की। क्या योजना आयोग का शौचालय लाखों का और जनता को खुले मैदान में या किसी रेल की पटड़ी किनारे जाने का अंतर नहीं रहेगा। क्या जो जो नेता चुनाव में जनता की समस्यायें हल करने , उसको न्याय देने , सुरक्षा देने की बातें भाषण में कह रहे थे वे अपनी बात याद रखेंगे , या सब भुला कर खुद अपने लिये सुख सुविधा , सुरक्षा - अधिकार पाने पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे। क्या इस गरीब देश का राष्ट्रपति सैंकड़ों कमरों वाले आलीशान महल में रहेगा जिसपर प्रतिदिन बीस लाख रूपये रख रखाव पर खर्च होते हैं।  और उससे गरीबों के हमदर्द होने की आपेक्षा करना फज़ूल होगा। क्या देश के प्रधानमंत्री के निवास का बिजली का बिल लाख रूपये महीना ही रहेगा और वो सरकारी खर्चों में कटौती की बात भी किया करेगा। क्या सांसदों-विधायकों का शाही खर्च जारी रहेगा , जनता के पैसे को यूं ही बर्बाद किया जाता रहेगा। देश का सब से बड़ा घोटाला जिसका आज तक कभी किसी ने ज़िक्र तक नहीं किया और जो हमेशा से चल रहा है , वो सरकारी विज्ञापनों का अपने प्रचार और मीडिया को प्रभावित करने का कार्य बंद होगा कभी। अभी कितनी उम्र ये मीडिया वाले इन बैसाखियों का सहारा पाकर ही चल सकेंगे। इस देश की जनता कब तक ये अनचाहा बोझ ढोती रहेगी। नेता-अफ्सर कब तक सफ़ेद हाथी बने रहेंगे। इनका राजा महाराजा की तरह रहना क्या अमानवीय अपराध नहीं है उस देश में जिसमें आधी आबादी को दो वक़्त रोटी तो क्या पीने को साफ पानी तक मिलता नहीं। जब करोड़ों बच्चे शिक्षा से वंचित हैं , जब जनता को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा तक नहीं मिलती है तब ये बातें करते हैं , देश की आर्थिक शक्ति की।  क्या ये देश कुछ मुठी भर लोगों की जागीर है , गरीब-अमीर में कितना अंतर हो ये कभी तो तय करना होगा , अगर वास्तव में सभी नागरिकों को समानता का हक देना है।

               चुनाव का मेला भले निपट गया हो , ऐसे कई प्रश्नों की धूल अभी बाकी है।  इसको क्या अभी भी अनदेखा किया जा सकता है। मेले के उजड़ जाने के बाद वहां भी बहुत कुछ ऐसा ही होता है जिसको कोई मुड़ कर नहीं देखता। मगर जब तक इन कठिन सवालों का हल नहीं खोजते , अच्छे दिन कैसे आयेंगे। फिर पांच साल बाद मेला लगाया वही दुकानदार देशभक्ति और धर्म की दुकान सजाकर दोबारा अपना कारोबार कर खूब कमाई कर गए लोग हाथ मलते रह गए। चुनावी मेला भी गांव के मेले जैसा होता है भीड़ और शोर में खो जाते हैं लोग और अपनी जेबें खाली कर ले आते हैं बनवटी नकली सामान की तरह मतलबी लोगों की कोई सरकार। मेले के खत्म होते ही बाकी रह जाता है ऐसा मंज़र जिसकी कल्पना नहीं की होती है। 

मई 12, 2014

POST : 440 इश्क़ में रात दिन आह भरते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 इश्क़ में रात दिन आह भरते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इश्क़ में रात दिन आह भरते रहे
वो अभी आएंगे राह तकते रहे ।

सबकी नज़रें उधर देखती रह गईं
हम झुकी उस नज़र पर ही मरते रहे ।

चुप रहे हम नहीं कुछ भी बोले कभी
बात करते रहे खुद मुकरते रहे ।

पांव जलते गये , खार चुभते रहे
राह से इश्क़ की हम गुज़रते रहे ।

आपसे कर सके  हम न फरियाद तक
ज़ख्म खाते गये , अश्क़ झरते रहे ।

किसलिये देखते हम भला आईना
देखकर आपको हम संवरते रहे ।

तोड़ दीवार दुनिया की मिलने गये
फिर भी इल्ज़ाम "तनहा" कि डरते रहे ।
 

 

मई 04, 2014

POST : 439 इक हमदर्द अपना , इक हमराज़ अपना ( कहानी ) डा लोक सेतिया

        इक हमदर्द अपना  ,  इक हमराज़ अपना  ( कहानी )

                               डा लोक सेतिया

       संदीप आज फिर बहुत उदास है , अकेला है। कितनी बार उसको यही मिलता है , बार बार संदीप किसी से दोस्ती करता है , और बार बार उसको दोस्त कोई नया ज़ख्म दे जाते हैँ। काश आज उर्मिला होती उसका दर्द बांटने को। जब भी परेशान होता है संदीप , उसे याद आ जाती है उर्मिला की वो कसम खुदखुशी न करने की। कभी कभी सोचता है संदीप कि क्या सच में वो इसीलिये जी रहा है या ये इक बहाना है खुदखुशी न करने का। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मरने से डरता है , उसके पास जीने का कोई भी मकसद ही नहीं है , वो बस इसलिये ज़िंदा है क्योंकि ख़ुदकुशी करने का साहस ही नहीं कर पा रहा। उर्मिला की वो कसम केवल इक बहाना है। संदीप को याद है वो दिन जब वो अपनी ज़िंदगी से बेहद निराश हो चुका था और ख़ुदकुशी करने ही वाला था कि उसकी खिड़की के बाहर से किसी ने आवाज़ दी थी उसका नाम लेकर और कहा था कि उसे इक ज़रूरी बात करनी है थोड़ी देर को अपने कमरे का दरवाज़ा खोल दो। बिना कुछ भी समझे संदीप ने आपने कमरे का दरवाज़ा खोल दिया था। उर्मिला बदहवास सी भीतर चली आई थी। आकर बोली थी मुझे जानते तो होगे तुम्हारे घर की साईड वाली गली में ही रहती हूँ मैँ। हां देखा है आपको अक्सर इधर से गुज़रते हुए , संदीप ने कहा था , बतायें क्या बात करना चाहती हैं मुझसे।

                उर्मिला ने कहा था क्या आप मेरे साथ फवारे वाले पार्क तक चल सकते हैं , यहां बात करना उचित नहीं होगा। संदीप आपसे निवेदन है कि बस थोड़ी देर मेरे साथ चलकर मेरी बात सुन लो , उसके बाद चाहे जो मर्ज़ी आप कर सकते हैं , मुझे मालूम है आप आज ख़ुदकुशी कर रहे थे। संदीप ये सुन कर चकित रह गया था , बोला था कि आपको कैसे पता चला और आप मेरा नाम भी जानती हैं , मुझे तो आपके बारे कुछ भी पता नहीं है। मेरा नाम उर्मिला है , अब बाकी बातेँ  अगर कहीं बाहर चल कर करें तो अच्छा होगा। और वो दोनों कुछ दूरी पर उस पार्क में चले आये थे। पार्क के सबसे पीछे वाले कोने में जहां सीढ़ियां बनी हुई थी , जाकर बैठ गये थे दोनों। संदीप पूछता उस से पहले ही उर्मिला बोली थी , संदीप जी आपको हैरानी होगी कि मुझे आपके बारे बहुत कुछ पता है। मेरा कमरा आपकी खिड़की के ठीक सामने है और इस तंग गली जो हमारे दोनों घरों के बीच है के बाहर से मैंने कितनी बार आपकी बातेँ सुनी हैं , जब भी आपके दोस्त आपको बिना किसी कारण के बुरा भला कहते रहे और आप चुप चाप सुनते रहे तब मेरी पलकें भीगती रही हैं। ये दर्द मुझे भी मिला है उम्र भर , तभी मैंने आपके दर्द को हमेशा अपना समझा है। जानती हूँ आपको किसी सच्चे दोस्त की तलाश है और ये भी जानती हूँ कि चाह कर भी मैँ वो नहीं बन सकती। मगर मैं चाहती हूँ की हम दोनों इक दूजे के हमदर्द और हमराज़ बन कर , आपस के दुःख - दर्द बांटा करें। मैंने ये पहले भी कई बार कहना चाहा है मगर कभी कह नहीं पाई , आज खिड़की से देखा आपको छत से रस्सी टांगते हुए और ख़ुदकुशी करने की कोशिश करते हुए , तब लगा ये शायद आखिरी अवसर है इक पहल करने का। मैं आज अपना हाथ बढ़ा रही हूं , क्या मेरा हाथ थामोगे मेरे हमदर्द और हमराज़ बनोगे हमेशा के लिये। आपको हो न हो मुझे आप पर पूरा यकीन है कि अगर कोई मेरा राज़दार और हमदर्द बन सकता है तो वो केवल आप ही हैं दूसरा कोई शायद ही मिले जीवन में। संदीप ने खामोशी से थाम लिया था वो हाथ जो उर्मिला ने उसकी तरफ बढ़ाया था। शायद इसकी ज़रूरत आज संदीप को भी बहुत थी। तब उर्मिला ने कहा था कि आज आपको मुझे ये वादा करना ही होगा कि भले कितनी ही मुश्किलें आयें , कितनी परेशानियां हों जीवन में , आप कभी हार नहीं मानोगे जीवन से। मुझे जब भी कोई मुश्किल होगी मैं आपको ज़रूर बताया करूंगी और आप भी मुझसे कभी कोई परेशानी नहीं छिपाओगे। और तब से संदीप और उर्मिला इक ऐसे नाते में बन्ध गये जिसका कोई नाम नहीं था। हां उसके बाद संदीप की खिड़की हमेशा खुली रहती थी , और जब भी दोनों को कोई बात करनी होती दोनों उसी पार्क के कोने में जाकर बैठ जाते और बातें किया करते। संदीप की तरह ही उर्मिला को भी हर किसी से नफरत ही मिली थी बिना किसी कारण। मगर जब से उर्मिला इस बेदर्द दुनिया से चली गई हमेशा के लिये तब से संदीप को उसकी कमी हर पल खलती है। अब उसको जीना और भी कठिन लगने लगा है , उसका अपना तो कोई कभी भी था ही नहीं। मगर इक हमदर्द और हमराज़ तो था , जो काफी था किसी भी हालात में ज़िंदा रहने के लिये।

POST : 438 भीख की महिमा ( तरकश ) डा लोक सेतिया

     भीख की महिमा ( तरकश ) डा लोक सेतिया

      ये बात सभी धर्म के ग्रंथ एक समान कहते हैं कि जिसके पास धन दौलत , सुख सुविधा सब कुछ है मगर उसको तब भी और अधिक पाने की लालसा रहती है वो सब से दरिद्र है । आप जिनको बहुत महान समझते हैं वे भी क्या ऐसे ही नहीं हैं । उनको अपने काम से सब मिलता है , नाम-पैसा-शोहरत , फिर भी उनकी दौलत की हवस है कि मिटती ही नहीं । विज्ञापन देने का काम करते हैं , पीतल को सोना बताते हैं , अपनी पैसे की हवस पूरी करने को । हम तब भी उनको भगवान बता रहे हैं । ईश्वर तो सब को सब कुछ देता है , कभी मांगता नहीं , उसको कुछ भी नहीं चाहिये ।  इन कलयुगी भगवानों को जितना भी मिल जाये इनको थोड़ा लगता है । ये जब समाज सेवा भी किया करते हैं तो खुद अपनी जेब से कौड़ी ख़र्च नहीं किया करते , यहां भी इनके चाहने वाले उल्लू बनते हैं । उल्लू मत बनाना कह कर खुद उल्लू सीधा कर लेते हैं अपना । देश के नेता हों या प्रशासन के अधिकारी ये सारे भी इसी कतार में शामिल हैं । देश की गरीब जनता इनकी दाता है और ये लाखों करोड़ों की संपत्ति पास होने के बाद भी उसके भिखारी । ये लोग भीख भी मांग कर नहीं मिले तो छीन कर ले लिया करते हैं , इनको भीख पाकर भी देने वाले को दुआ देना नहीं आता । हर भिखारी मानता है कि भीख लेना उसके हक है , भीख लेकर ख़ाने में उनको कोई शर्म नहीं आती । वेतन जितना भी हो रिश्वत की भीख बिना उनका पेट भरता ही नहीं । ये भीख मज़बूरी में पेट की आग बुझाने को नहीं लेते , कोठी कार , फार्महाउस बनाने को लेते हैं । ये जो भीख लेते हैं उसको भीख न कह कर कुछ और नाम दे देते हैं ।

          भीख भी हर किसी को नहीं मिला करती , उसी को मिलती है जिसे भीख मांगने का हुनर आता हो । ये गुर जिसने भी सीख लिया वो कहीं भी चला जाये अपना जुगाड़ कर ही लेता है । भीख और भ्र्ष्टाचार दोनों की समान राशि है , बताते हैं कि रिश्वत की शुरुआत ऐसे ही हुई थी । पहले पहले अफ्सर - बाबू किसी का कोई काम करने के बाद ईनाम मांगा करते थे , धीरे धीरे ये उनकी आदत बन गई और वह काम करने से पहले दाम तय करने लगे जो बाद में छीन कर लिया जाने पर भ्र्ष्टाचार कहलाने लगा । आज देश में सब से बड़ा कारोबार यही है , तमाम बड़े लोग किसी न किसी रूप में भीख पा रहे हैं ।  जिनको हम समझते हैं देश के सब से अमीर लोग हैं उनको भी सरकारी सबसिडी की भीख चहिये नहीं तो वो रहीस रह नहीं सकते । जाँनिसार अख़्तर जी का इक शेर है ऐसे लोगों के नाम , 
 

"शर्म आती है कि उस शहर में हैं हम कि जहाँ , 

न मिले भीख तो लाखों का गुज़ारा ही न हो "। 

 
आजकल भीख मांगने वाले भी सम्मान के पात्र समझे जाते हैं , जिसे देखो वही इस धंधे में शामिल होना चाहता है । भीख नोटों की ही नहीं होती , वोटों की भी मांगी जाती है , वोट जनता का एकमात्र अधिकार है वो भी नेता खैरात में देने को कहते हैं , वोट पाने के हकदार बन कर नहीं । कई साल से देश की सरकार तक समर्थन की भीख से ही चल रही है । देश की मलिक जनता को जीने की बुनियादी सुविधाओं की भी भीख मांगनी पड़ रही है , मगर नेता-अफ्सर सभी को नहीं देते , अपनों अपनों को देना पसंद करते हैं । अफ्सर मंत्री से मलाईदार पोस्टिंग की भीख मांगता है तो मंत्री जी मुख्य मंत्री जी से विभाग की । हर राज्य का मुख्य मंत्री केंद्र की सरकार के सामने कटोरा लिये खड़ा रहता है । राजनीति और प्रशासन जिंदा ही भीख के लेन देन पर है । विश्व बैंक और आई एम एफ के सामने कितनी सरकारें भिखारी बन ख़ड़ी रहती हैं । इनको भीख किसी दूसरे नाम से मिलती है जो देखने में भीख नहीं लगती । मगर जिस तरह गिड़गिड़ा कर ये भीख मांगते हैं उस से सड़क के भिखारी तक शर्मसार हो जाएं । सच तो ये है कि सड़क वाले भिखारी भीख अधिकार से और शान से मांगते हैं , उनको पता है लोग भीख अपने स्वार्थ के लिये देते हैं , बदले में पुण्य मिलेगा ये सोच कर ।

          बड़े बड़े शहरों में रोक लगा दी गई है सड़क पर भीख मांगने पर , जो पुलिस वाले खुद सड़क पर खड़े होकर भीख लिया करते वो आजकल जुर्माना करते हैं उन पर जो भीख दे रहा होता है ।  भिखारी पर नहीं होता जुर्माना । मतलब यही है कि भीख मांगना नहीं देना अपराध है । देश की तमाम जनता इस कानून के कटघरे में खड़ी नज़र आती है , इस युग में किसी पर दया करना कोई छोटा अपराध नहीं है । कहते थे दाता एक राम है भिखारी सारी दुनिया , आजकल बदल गया है ये भीख देना भीख लेना केवल सरकार का एकाधिकार क्षेत्र है नेताओं अधिकारियों सरकारी विभागों को छोड़ कोई खैरात मांग भी नहीं सकता दे भी नहीं सकता , जिनका गुज़र बसर भिक्षा से होता है उनको कोई और रास्ता नहीं मिले तो राजनीति उनका आख़िरी ठिकाना है ।  

सबसे ज़्यादा भिखारियों वाले 6 देश | Earth

अप्रैल 20, 2014

POST : 437 बिन बरसी बदली ( कहानी ) डा लोक सेतिया

       बिन बरसी बदली ( कहानी ) डा लोक सेतिया

        चालीस वर्ष बाद बस में अचानक मुलाकात हो गई राकेश और सुनीता की। कॉलेज में साथ साथ पढ़ते रहे थे , उम्र चाहे बढ़ गई हो तब भी पहचान ही लिया था सुनीता ने राकेश को जो दूसरी तरफ बैठा था। और उठकर उसके पास जाकर कहा था , हेलो राकेश कैसे हो। राकेश भी पहचान गया था सुनीता को , बोला था अरे आप सुनीता जी , नमस्कार , मैं अच्छा हूं आप कैसी हैं। इतने साल हो गये , अचानक आपको मिलकर बहुत ख़ुशी हो रही है। मुझे भी आपको देख कर बहुत ही अच्छा लग रहा है , क्या आप भी दिल्ली जा रहे हैं , सुनीता ने पूछा था। हां दिल्ली में बेटा जॉब करता है , उसके पास जा रहा हूं , रहता अभी भी अपने शहर में ही हूं , राकेश ने बताया था। फिर पूछा था कि आप क्या दिल्ली में रहती हैं आजकल। नहीं , सुनीता बोली थी , मेरी शादी तो राजस्थान में हुई थी और वहीं रहती हूं , छोटी बहन रहती है दिल्ली में , उसके पास जा रही हूं। सुनीता ने कहा था , आप उधर आकर बैठ जाओ मेरे साथ की सीट खाली है , साथ साथ बैठ कर बातें करेंगे। और राकेश सुनीता के साथ जाकर बैठ गया था। कॉलेज की बातें , फिर अपनी अपनी ज़िंदगी की बातें , अपने परिवार की जीवन साथी की बच्चों की बातें इक दूजे से पूछने बताने लगे थे। आपस में मोबाइल फोन नंबर लिये -दिये गये ताकि आगे भी बात होती रहे। यूं ही बात चली तो पता चला कि दोनों ही फेसबुक पर भी हैं , फोन पर ही राकेश ने सुनीता को अपनी प्रोफाइल दिखाई थी और फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भी भेज दी थी। सुनीता ने बताया था कि वो फेसबुक पर कभी कभी ही रहती है , और उसने पूछा था राकेश क्या आप मुझे अपना ईमेल दे सकते हैं। क्यों नहीं , राकेश ने कहा था , और ऐसे दोनों ने अपना अपना ईमेल दे दिया था। कुछ घंटे कैसे बीत गये थे दोनों को पता तक नहीं चला था , दिल्ली पहुंच कर जब अलग होने लगे तब सुनीता ने पूछा था कि क्या वो ईमेल पर आपस की बातें आगे भी करते रहेंगे। राकेश का जवाब था कि बेशक वो मेल कर सकती हैं और राकेश ज़रूर जवाब दिया करेगा। सुनीता ने ये वादा भी लिया था कि दोनों की दोस्ती की बात इक दूजे तक ही रहेगी।

                राकेश को कुछ दिन बाद सुनीता का भेजा मेल मिला था। सुनीता ने लिखा था , शायद ये बात आपको पहले भी कॉलेज के ज़माने में महसूस हुई हो कि मैं आपको बेहद पसंद करती थी। मगर तब आप लड़के होकर भी नहीं कह सकते थे ये बात तो मैं एक लड़की अगर कहती तो आवारा समझी जाती। फिर भी एक बार मैंने आपकी किताब में एक पत्र रखा था , आपसे किताब मांगी थी और अगले पीरियड में पत्र रख कर वापस भी कर दी थी। मगर उसके बाद इक डर सा था कि कहीं कोई दूसरा न पढ़ ले , तभी कॉलेज का समय समाप्त होते ही फिर आपसे किताब मांग ली थी इक दिन को। सच कहूं वो पत्र मैंने कभी फाड़ा नहीं था , दिल पर लिखा हुआ है आज तक , मालूम नहीं ये बात अब बताना उचित है या अनुचित , मगर इक सवाल हमेशा मेरे मन में रहता रहा है कि अगर मैंने तब वो पत्र आपको पढ़ने दिया होता तो क्या आज मेरी ज़िंदगी कुछ अलग होती और शायद आपकी भी। क्या ये हम दोनों के लिये सही होता। ऐसा बिल्कुल नहीं कि मुझे कोई शिकायत हो अपने जीवन से या किसी से भी , पर यूं ही सोचती हूं कि तुम साथ होते तो क्या होता। खाली समय में जाने कितनी बार ये सवाल मैंने खुद से किया है। पता नहीं आपको याद भी है या नहीं कि एक बार वार्षिक समारोह में मंच पर हमने साथ साथ गीत गाया था। तब जब उसकी फोटो देखी थी तब वो एक ही थी और मैंने आपको कहा था कि ये मुझे लेने दो और आप ने ली हुई वापस कर दी थी मेरे लिये। मेरे पास हमेशा वो फोटो रही है और वो गीत हमेशा गुनगुनाती रहती हूं मैं। राकेश मैंने उस पत्र में लिखा था तुम मेरे सपनों के राजकुमार हो , मरे मन में रहते हो , मुझे नहीं पता कि उसको प्यार कहते हैं या मात्र आकर्षण , मगर वो भावना मैं और किसी को लेकर महसूस की नहीं थी कभी। मैंने आपसे वादा लिया था आपस की बात किसी को नहीं बताने का रास्ते में बस के सफर में तो केवल यही बात बताने के लिये जो जाने क्यों मुझे बतानी भी ज़रूरी थी और पूछनी भी कि आप क्या सोचते हैं इसको लेकर।

               राकेश ने बार बार पढ़ा था सुनीता की मेल का इक इक शब्द बता रहा था कि उसने जो भी लिखा है सच्चे मन से और साहसपूर्वक लिखा है। राकेश ने सुनीता को रिप्लाई किया था ये लिख कर। मुझे नहीं मालूम कि आपको अब ये सारी बातें मुझे कहनी चाहियें अथवा नहीं , हां इतना जानता हूं कि जो आपने अपने दिल में अनुभव किया उसमें कुछ भी न तो अनुचित था न ही असव्भाविक। अपने मन पर अपनी सोच पर , पसंद नापसंद पर किसी का बस नहीं होता है। इतना ज़रूर मैं भी आपकी ही तरह सच और इमानदारी से बताना चाहता हूं कि मुझे उस दिन आपसे मिलकर बहुत ही अच्छा लगा था और आज ये आपकी बातें पढ़कर भी इक ख़ुशी अनुभव कर रहा हूं। ख़ुशी इस बात की है कि शायद जीवन में पहली बार मुझे ये एहसास हुआ है कि कोई है जो दुनिया में मुझे भी पसंद करता है , चाहता है। नहीं मुझे भी किसी से ज़रा भी शिकवा शिकायत नहीं है , मगर ये भी हकीकत है कि मुझे इस  दुनिया में कभी भी तिरिस्कार और नफरत के सिवा कुछ भी मिला नहीं किसी से। सच कहूं तो मैंने खुद ही कभी सोचा ही नहीं कि मैं भी किसी के प्यार के काबिल हूं। मुझसे हर किसी को शिकायत ही रही है , मैं हमेशा इस अपराधबोध को लेकर जिया हूं कि मुझे जो भी सभी के लिये करना चाहिये वो चाह कर भी मैं कर सका नहीं जीवन भर। इसलिये मुझे यही लगता है कि ये अच्छा ही हुआ जो तुमने वो पत्र मुझसे वापस ले लिया था मेरे पढ़ने से पहले ही। वरना जो भावना आज चालीस वर्ष बाद भी आपके मन में मेरे प्रति बाकी है वो शायद नहीं रह पाती। मैं आपको कुछ भी दे नहीं पाता ठीक उसी तरह जैसे अन्य किसी को नहीं दे सका हूं। शायद किसी को नहीं मालूम कि मैं खुद इक तपते हुए रेगिस्तान की तरह हूं , जो खुद इक बूंद को तरसता रहा उम्र भर वो भला किसी की प्यास कैसे बुझा सकता था। सुनीता आपकी भावना मेरे लिये किसी बदली से कम नहीं है। इसलिये ये अच्छा हुआ जो मैंने आपका वो पत्र नहीं पढ़ा , आपकी ये मेल भी डिलीट कर दूंगा जैसा आपने लिखा है , मगर ये सब अब मेरे भी मन में कहीं रहेगा हमेशा। मैं आपको ये सब लिखने पर क्या कहूं , मैं नहीं समझ पा रहा। धन्यवाद या मेहरबानी जैसे शब्द काफी नहीं हैं। हम जब तक हैं अच्छे दोस्त बन कर ज़रूर रह सकते हैं। मुझे आपको जवाब की प्रतीक्षा रहेगी , काश मैं आपको कोई ख़ुशी दे सकूं मित्र बन कर ही।

                 सुनीता का संक्षिप्त सा जवाब मेल भेजने के थोड़ी देर बाद ही आ गया था , लगता है जैसे उसको इंतज़ार था राकेश की मेल का और पढ़ते ही रिप्लाई कर दिया था।  लिखा था , हो सकता है कि मुझे आपसे कुछ भी हासिल नहीं होता जैसा आपने लिखा है , कारण चाहे जो भी हों। मगर मुझे अफ़सोस है तो इस बात का कि मैं वो बदली हूं जो शायद आपकी प्यास बुझा सकती थी। जो कभी बरस ही नहीं पाई।
                               

अप्रैल 17, 2014

POST : 436 तेरे वादे पे ऐतबार किया ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

      तेरे वादे पे ऐतबार किया ( हास-परिहास)  डा लोक सेतिया 

         आप मानो चाहे न मानो , सच तो सच है। पुरुष जब वादा निभाने की घड़ी आये तब पीछे हट जाते हैं और महिला अपनी जान तक गवा बैठती है। फिर भी आशिक कवियों ने , ग़ज़लकारों ने , अपनी प्रेमिका -माशूका पर वादा न निभाने के इल्ज़ाम बिना जाने समझे लगाये हैं। चलो आपको इक सच्ची बात बताते हैं। कोलकत्ता शहर में एक दम्पति ने तय किया कि साथ जीते रहे हैं चलो अब साथ-साथ मरते हैं। अपने प्यार की कसमें खाई और दोनों ने डूबने के लिये गंगा नदी में छलांग लगा दी। लेकिन तब भी दोनों साथ-साथ मर नहीं सके। पति महोदय मरने से डर गये और तैर कर बाहर निकल आये किनारे पर अपनी पत्नी को मझधार में अकेला छोड़ कर। पत्नी को तैरना नहीं आता था इसलिये उसको डूब कर जान गवानी पड़ी। ग़ज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया। जो अभी अभी खाई कसम न निभा सका उसकी सात जन्म साथ निभाने की कसम पर कौन यकीन करे। अनुभवी महिलायें हमेशा हर महिला को यही सीख देती हैं कि पुरुषों पर कभी भरोसा मत करना। ये अनुभव उनको ज़रूर किसी पुरुष की बेवफाई ने दिया होगा। पुरुष चांद तारे तोड़ लाने के वादे करते हैं और एक नई साड़ी तक नहीं ला देते मांगने पर। बावजूद इसके औरतों को अपने पति के बारे उम्र भर ये अंधविश्वास बना रहता है कि मेरे ये वैसे नहीं हैं। पति हर दिन देर से आने का कोई बहाना बनाता है और पत्नी मान लेती है। इक फिल्म की नायिका गीत गाती है , कभी हमारी मुहब्बत का इम्तिहान न लो , फिर आगे कहती है , मैं अगर जान भी दे दूं तो ऐतबार नहीं , कि तुझ से बढ़ के मुझे ज़िंदगी से प्यार नहीं। पति भी जानते हैं मीठी-मीठी बातों से बहलाना अपनी पत्नी को , जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे , तुम दिन को अगर रात कहो रात , रात कहेंगे। मैंने भी यही गीत सुनाया था पहली रात को उनको , मगर सच तो ये है कि उन्हें हमेशा मुझसे शिकायत भी रही है कि बहुत मनमानी करता हूं। कोई न कोई कारण तो ज़रूर होगा उनकी शिकायत का , मगर हम भी जानते हैं उनको बातों से बहला लेना।

                           ये खबर पढ़कर एक पत्नी पीड़ित कहने लगे ये कमाल का फार्मूला है , न कोई क़त्ल का इल्ज़ाम न ही ख़ुदकुशी को विवश करने की तोहमत। उल्टा सभी उसके साथ सहानुभूति जता रहे होंगे , कैसे जियेगा बेचारा अकेला।  इसी बात पर कोई अपना दिल दे बैठे इनको और चार दिन में दूसरी मिल जाये फिर से साथ-साथ जीने-मरने की कसम खाने को क्या पता। वे भी सोचने लगे कि अपनी पत्नी को तैयार कर लेंगे एक साथ मरने को। उनको लगता है ये ख्याल उनको पहले आ जाता तो कभी का उस मुसीबत से छुटकारा पा लिया होता। सोचते सोचते उनको लगा किसे मालूम यही तरीका पहले भी कुछ लोग आज़मा चुके हों , चुपचाप खुद तैर कर बाहर निकल घर चले जाते हों और बाद में पत्नी की लाश पर आंसू बहाते हों। किसी को पता तक नहीं चल पाया हो कि उनकी पत्नी ने ख़ुदकुशी उन पर ऐतबार कर के ही की थी। इक आधुनिक प्रेम कथा और भी है आज के नये युग की। दो प्रेमियों को जब समाज और परिवार ने विवाह नहीं करने दिया तब उन्होंने भी साथ-साथ ख़ुदकुशी करने का निर्णय लिया और बाज़ार से ज़हर लाकर खा लिया।   बेफिक्र होकर सो गये , सोचा ये नींद कभी नहीं खुलेगी। मगर आजकल बाज़ार में ज़हर तक नकली मिलता है , यही हुआ और वे बच गये। ऐसे मैं प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को समझाया कि अपनी तकदीर में ही नहीं है साथ-साथ जीना-मरना। अब हमें अपनी ज़िद छोड़ तकदीर का फैसला मान लेना चाहिये , अपना अपना घर अलग-अलग बसा लेना चाहिये घर वालों की बात मानकर। अब दोनों प्रेमी खुश हैं अपने अपने घर में , और उनके परिवार वाले भी। क्या खबर नकली ज़हर लाना प्रेमी की चालाकी रही हो। जिसने भी साथ-साथ जीने-मरने की कसमें खाने का चलन शुरू किया होगा वो बहुत दूर की सोचने वाला रहा होगा। मेरे एक मित्र को तो वो गीत पसंद था , उतना ही उपकार समझ कोई जितना साथ निभा दे। जन्म-मरण का मेल है सपना ये सपना बिसरा दे। कोई न संग मरे , मन रे तू काहे न धीर धरे।

                  अब महिलायें उतनी भी सीधी नहीं रह गई हैं , अब वे इस बात का ध्यान रखेंगी कि उनका पति उनको चालाकी से तो नहीं डुबो रहा है। अगर पति को तैरना आता है तो साथ-साथ डूबने की बात मूर्ख बनाने के सिवा और क्या है। अब ऐसे में समझदार महिला अपने पति को पहले आप कह कर तसल्ली कर कर सकती हैं।

अप्रैल 14, 2014

POST : 435 मेरी भी किताब बिकवा दो ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

    मेरी भी किताब बिकवा दो ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

तिथि उनतीस नवंबर सन दोहज़ारदो , अख़बार दैनिक भास्कर। मेरा पुराना व्यंग्य जो तब छपा था ये उसका नया संस्करण है। इक शोर सा मचा हुआ है , किन्हीं दो लोगों ने किताबें लिखी हैं अपने सरदार मनमोहन सिंह जी को निशाना बनाते हुए। सच पूछो तो कुछ भी नया नहीं है , कोई राज़ की बात नहीं है कि पिछले दस साल से विश्व का सब से बड़ा लोकतंत्र चयन से नहीं मनोनयन से चल रहा है। मुझे जाँनिसार अख़्तर जी की इक ग़ज़ल का मतला याद आ रहा है। "वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं , जो इश्क में तालिब नहीं मतलूब रहे हैं "।
 
                         (मतलूब का अर्थ होता है मनोनीत ) । 
 
कहने का अभिप्राय ये कि ऐसा सदा से होता रहा है कई जगह , मगर लोकतंत्र में भी जनता नहीं चुने बल्कि कोई और उसपर अपनी मर्ज़ी का शासक थोपे ऐसा कहीं और शायद ही होता हो अपने देश को छोड़कर। तो सवाल उन दो किताबों का है जिनको लिखने वाले अपने देश के प्रधानमंत्री के साथ शासन में सरकारी उच्च पदों पर रहने के बाद सेवा निवृत होने के बाद उनका काला चिट्ठा खोलने का दावा कर रहे हैं। क्या वे सच्चे देशभक्त हैं , ईमानदार हैं। सोचना तो पड़ेगा , अगर उनको अपने कर्तव्य की राष्ट्र के प्रति निष्ठा की परवाह होती तो वे आज तक चुप नहीं बैठे रहते। देश को लूटने वालों के हमराज़ नहीं बने रहते , जब तक अपनी नौकरी का सवाल था। अब जिनको नौकरी देश हित से बड़ी लगती हो , उनका किताब लिखने का मकसद भी कुछ और भी हो सकता है। चलो मान लो वे जो भी बता रहे हैं सही है तब क्या वो भी चुप रहने के अपराधी नहीं हैं। मगर यहां मनमोहन सिंह जी की चूक यही है कि उनको ये मालूम नहीं था कि हर चीज़ की तरह इसका भी उपाय है जो वे कर नहीं सके। उनको हरियाणा वालों से सबक लेना चाहिये था। क्या आपको मालूम है कि यहां कोई भी कैबिनिट सचिव पिछले नौ साल में सेवा निवृत नहीं हुआ है। सब को आगे कार्यकाल बढ़ा कर बनाये रखा गया है शासन में अपना सहयोगी। यकीन करें ये दोनों महानुभव भी अगर नौकरी में रहते तो किताब लिखने को फुर्सत ही नहीं मिलती। तभी कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर। अब उनकी किताबों की चर्चा देश विदेश में होगी और उससे उनको क्या क्या हासिल होगा ये तो आने वाला वक़्त ही बतायेगा , मगर मैं आपको वो पुरानी बात ग्यारह साल बाद फिर से सुनाता हूं। अब वो व्यंग्य।

              मुझे भी अपनी किताब बेचनी है। अब मुझे ये भी पता चल गया है कि किताब कैसे बेची जा सकती है। बस एक सिफारिश का पत्र  यू.जी.सी. चेयरमैन का किसी तरह लिखवाना है। जैसा १६ अक्टूबर २००२ को यूजीसी के अध्यक्ष अरुण निगवेकर ने लिखा है सभी विश्व विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थाओं को , प्रधानमंत्री जी की जीवनी की पुस्तक खरीदने की सलाह देते हुए। "जननायक " किताब की कीमत अगर चार हज़ार रुपये हो सकती है तो मुझ जैसे इक जनलेखक की किताब चालीस रुपये में बिक ही सकती है। कुछ छूट भी दे दूंगा अगर कोई सौ किताबें एक साथ खरीद ले। मुनाफा न सही छपाई का खर्च तो निकल ही आएगा। मुफ्त में मित्रों को उपहार में देने से तो अच्छा है।समस्या यही है कि यूजीसी वाले मुझे नहीं जानते , मैं उनको जनता हूं ये काफी नहीं। मगर अभी पूरी तरह कहां जानते हैं लोग उसको।  अभी तक सुना था वो अनुदान देते हैं , किताबें भी बिकवाते हैं अब पता चला है। इक सत्ताधारी मुझे समझा रहे थे कि ये ज़रूरी होता है , बिना प्रचार के कुछ नहीं बिकता , साबुन तेल से इंसान तक सब को बाज़ार में बिकने को तरीके अपनाने ही पड़ते हैं। अब प्रधानमंत्री जी के प्रचार के लिये क्या इस देश के गरीब चार हज़ार भी खर्च नहीं कर सकते। आखिर कल यही तो इतिहास में शामिल किया जायेगा। उधर पुस्तकालय वालों का कहना है कि उनको कोई एक दो प्रति थोड़ा खरीदनी होगी , थोक में खरीदनी होती है। यूजीसी कहेगी तो प्रकाशक से छूट या कमीशन कौन मांग सकता है। मुझे मेरी बेटी ने बताया कि दूसरी कक्षा में पास होने के लिये उसकी अध्यापिका ने भी सभी छात्रों को एक किताब खरीदने को विवश किया था। मैंने जब स्कूल के अध्यापक से पूछा कि आप कैसे किसी किताब को ज़रूरी बताते हैं तो उनका कहना था कि जो प्रकाशक उनसे मिलता है आकर उसी की किताब को ही अच्छा बता सकते हैं जो मिला ही नहीं आकर उसकी किताब को किसलिये सही बतायें। उनकी बात में दम है , मुझे भी किसी तरह यूजीसी के चेयरमैन से जानपहचान करनी ही चाहिये। क्या खबर वे भी यही सोचते हों कि मैं उनको मिलने आऊं तभी तो वे मेरी किताब की सिफारिश करें। शायद वो इसी इंतज़ार में हों कि मैं मिलूं तो वे पत्र जारी करें।

                                सोचते सोचते उन नेता जी की याद आई जिनकी सुना है राजधानी तक पहचान है। लगा कि वे फोन कर देंगे तो बात बन सकती है। मगर नेता जी को पता ही नहीं था कि यूजीसी किस बला का नाम है। वे आठवीं पास हैं , कभी सुना ही नहीं था कि ये किस चिड़िया का नाम है। फिर ध्यान मग्न हो कुछ सोचने लगे , अचानक नेता जी को कोई उपाय सूझा जो वो मुझे पकड़ कर अपने निजि कक्ष में ले गये। मुझे कहने लगे तुम चिंता मत करो , तुम जितनी किताबें छपवाना चाहो छपवा लो , मैं सारी की सारी खरीद लूंगा। अगर मैं भी उनका एक काम कर दूं। वे चाहते हैं कि मैं उनकी जीवनी लिखूं जिसमें उनको नेहरू -गांधी से भी महान बताऊं। मैं अजीब मुश्किल में फंस गया हूं , इधर कुआं है उधर खाई। घर पर आया तो देखा श्रीमती जी ने रद्दी वाले को सारी किताबें बेच दी हैं तोल कर , पूरे चालीस किलो रद्दी निकली मेरी अलमारी से आज शाम को।

अप्रैल 13, 2014

POST : 434 डर्टी पिक्चर से डर्टी मांईड तक ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

  डर्टी पिक्चर से डर्टी मांईड तक ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

पिछले वर्ष सब से अधिक पुरुस्कार जिस फिल्म को मिले , उसका नाम है डर्टी पिक्चर। फिल्मकारों को ये बात कभी की समझ आ चुकी है की जिस शब्द को हिंदी में कहना खराब लगता है उसे अंग्रेजी में बड़े आराम से कह सकते हैं। और अकसर वही बात लोगों को इतनी पसंद आती है कि हिट हो जाती है। अगर इस फिल्म का नाम हिंदी में होता , गंदी तस्वीर , तो अंजाम शायद कुछ दूसरा होता। वास्तव में कोई तस्वीर गंदी नहीं होती , गंदी देखने वाले की नज़र होती है , सोच ही है जो अच्छी या बुरी होती है। इसलिए जब डर्टी पिक्चर की बात की जाये तब ये समझ लिया जाये कि डर्टी पिक्चर नहीं बल्कि डर्टी माईंड लोग होते हैं। गंदी सोच वाले ही गंदी तस्वीरें देखते हैं। सबसे अधिक गंदगी आदमी के दिमाग में होती है। देखने में भोली सूरत , बातचीत में मधुरता लेकिन मन में राम बचाये क्या क्या रहता है। एक महिला मित्र ने अपने किसी पुरुष मित्र का नाम लिखा था अपनी पोस्ट पर ये बताते हुए कि जनाब का कहना है कि वे फेसबुक पर महिलाओं को तकने ही आते हैं। अब उनको ऐसा करना चाहिए था या नहीं ये वही जाने। तो बात ये है कि टीवी पर डर्टी पिक्चर का प्रसारण किया जाना था ,  कई दिन से चैनेल वाले प्रचार कर रहे थे , विज्ञापन दे रहे थे। बहुत लोग चाह कर भी सिनेमा हाल में इस फिल्म को देखने नहीं जा सके थे , उनको बेसब्री से उस दिन का इंतज़ार था। ठीक उसी दिन सरकार ने डर्टी पिक्चर को प्राईम टाईम पर दिखाने पर रोक लगा दी। अब देखने वालों को इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता था लेकिन सरकार को कौन समझाता कि उस समय दिखाने को चैनेल को कितने करोड़ के विज्ञापन मिलते हैं जबकि देर रात को बेहद कम।

                      मुझे एक बहुत पुरानी बात याद आ गई , तब समाज का सवभाव , चाल-चलन और ही होता था। उस ज़माने में धार्मिक फिल्म बेहद सफल होती थी। जाने क्या सोच कर किसी ने अपनी फिल्म का नाम रख दिया , तीन देवियां। लोग चले गये उसका पहला ही शो देखने यही मानकर कि देवी देवताओं पर बनी होगी फिल्म। नतीजा ये हुआ कि जब पता चला कि कहानी कुछ और ही है तो निराश हो लोग मध्यांतर में ही वापस चले गये थे। लोगों को मनचाही बात न दिखाई दे तो फिल फ्लॉप हो जाती है। इसलिये डर्टी पिक्चर नाम रख कर साफ सुथरी फिल्म बनाते तो वही नतीजा होना था। तभी डर्टी पिक्चर से डर्टी सीन हटाये भी नहीं जा सकते थे वर्ना डर्टी माईंड वाले निराश हो जाते और फिल्म भी फ्लॉप हो जाती। वास्तव में अगर सरकार को लोगों पर ऐतबार होता कि वो समझदार हैं डर्टी पिक्चर को नहीं देखना पसंद करेंगे तो उसको रोक नहीं लगानी पड़ती। सरकार के पास कारण भी हैं जनता पर भरोसा न करने के। जनता खुद ही डर्टी नेताओं को वोट देकर जिता देती है और उसके बाद शोर मचाती है कि संसद में दाग़ी नेता बैठे हैं। जनता के बार बार यही गलती दोहराने से ही लोकतंत्र की पावन नदी किसी गंदे नाले में बदल चुकी है। सच कहा जाये तो टीवी पर सब साफ सुथरा नहीं दिखाया जाता , बस उनको आवरण पहना देते हैं कोई चमकता हुआ। हर वस्तु के विज्ञापन में बेमतलब की नंगी तस्वीरें , अश्लीलता ही नहीं विकृत सोच की कहानियों वाले सीरियल , समाचार के नाम पर बेहूदा स्टोरी , कोई अनावश्यक बहस , टी आर पी के लिये , हर चैनेल लगता है मानसिक दिवालियापन का शिकार हो चुका है। सही गलत , उचित अनुचित की कोई चिंता नहीं , पैसा बनाना एक मात्र ध्येय बन चुका है। और ये तो युगों से माना जाता रहा है कि सोना अगर गंदगी में भी पड़ा दिखाई दे तो उसको उठा लो। बस टीवी चैनेल वाले और फिल्म वाले आजकल यही करने लगे हैं , उनको लत लग गई है गंदगी से पैसा निकाल अमीर बनने की। स्लमडॉग मिलीयेनर की गंदगी अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार दिला देती है।

                गंदगी दो प्रकार की होती है , एक जो साफ नज़र आती है कि ये गंदगी है और दूसरी वो जो देखने में गंदगी नहीं लगती मगर होती वो भी गंदगी ही है। ऐसी गंदगी अधिक बुरी है , वो विचारों को सोच को , मानसिकता को गंदा  कर रही होती है। हर दिन सुबह  उठते ही और देर रात तक तमाम चैनेल वाले लोगों को अन्धविश्वास की खाई में धकेलने का ही काम करते हैं। लोगों की धार्मिक भावनाओं को अपने कारोबार के लिये दुरूपयोग करना उचित नहीं कहा जा सकता। जिनको समाज को स्वच्छ बनाना चाहिये वही उसको प्रदूषित कर रहे विकृत विचार परोस कर। खेद की बात है कि बड़े बड़े नाम वाले अदाकार , खिलाड़ी , अपने और अधिक अमीर बनने की हवस में इस काम में शामिल हो कर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। शायद उनको तलाश रहती है कि कैसे और अधिक ये कार्य वे अंजाम दे सकें। सरकार के हर सफाई अभियान का नतीजा एक समान रहता है। गंदगी के ढेर बढ़ते ही जा रहे हैं , गंदगी बेचने का कारोबार भी करोड़ों का खेल है ये कुछ दिन पहले इक टीवी शो में भी बताया गया था। मगर तब इस सोच की विचारों की , मानसिकता की गंदगी की कोई बात नहीं की गई थी , ये उनका निजि मामला जो है। इस पर सब खामोश हैं जो रात दिन जाने क्या क्या शोर मचाते रहते हैं।  

अप्रैल 11, 2014

POST : 433 एक नेता को तुमने खुदा कह दिया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

एक नेता को तुमने खुदा कह दिया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

एक नेता को तुमने खुदा कह दिया
इस तरह दर्द को इक दवा कह दिया ।

ग़म इसी बात का दिल से जाता नहीं
बेवफ़ा ने , हमें बेवफ़ा कह दिया ।

हम सभी के लिये मौत सौगात है
पर सभी ने इसे हादिसा कह दिया ।

दिल का शीशा हुआ चूर जब एक दिन  
जिसने तोड़ा उसे दिलरुबा कह दिया ।

खुद सफीना डुबोई थी उसने , जिसे
हर किसी ने यहां नाखुदा कह दिया ।

नाम तक का मेरे , ज़िक्र करना नहीं
सिल गई इक जुबां आज क्या कह दिया ।

तुम तड़पते रहो आ रहा है मज़ा
और "तनहा" इसे इक अदा कह दिया । 
 

 

अप्रैल 10, 2014

POST : 432 गब्बर सिंह का दर्द ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     गब्बर सिंह का दर्द ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

         गब्बर सिंह परेशान है , वह चुनाव कैसे हार गया। रामगढ़ वालों से उसको वोट क्यों नहीं दिये। उसने रामगढ़ के लिये क्या क्या नहीं किया , इतना विकास किया , तरह तरह के हथकंडे अपनाये , साम -दाम , दंड-भेद , सब-कुछ आज़माया , फिर भी कुछ भी काम न आया। सारे रामगढ़ में उसके भेदिये फैले हुए हैं , वो सब जीत पक्की बता रहे थे। ये अच्छा नहीं किया रामगढ़ की जनता ने , गब्बर सिंह के नाम को डुबो कर रख दिया। अब किस तरह राजधानी में बैठे लोग उसकी दहशत के कायल होंगे। गब्बर सिंह वो डायलॉग याद कर रहा है जो उसने अपने विरोधी के हाथ-पैर तुड़वाने के बाद बोले थे। निकल गई सारी हेकड़ी। मगर अब बात उल्टी हो गई है , गब्बर सिंह को मन ही मन डर लग रहा है कि कहीं रामगढ़ वालों को अपनी ताकत का पता चल गया तो उसका वहां रहना दुश्वार हो जायेगा। गब्बर सिंह ने सब कुछ तो किया था चुनाव में।

                जय और वीरू को ठाकुर से दोगुना पैसे देकर अपने साथ मिला लिया था। दोनों मिलकर उसका प्रचार कर रहे थे , बसंती भी गब्बर सिंह के लिये नाचती थी और वोट मांगती थी। उसके ठुमके देखने वाले भी खूब जमा होते थे हर दिन चुनावी सभाओं में। खुद ठाकुर भाग गया था उसका इलाका छोड़ कर और दूसरे प्रदेश से चुनाव लड़ रहा था। गब्बर सिंह को पूरा यकीन था बाकी सभी की ज़मानत तक ज़ब्त हो जायेगी , मगर खुद उसकी ही ज़मानत बच नहीं सकी थी। गब्बर सिंह को समझ आ गया था कि उसका दोस्त सांभा ठीक ही कहता था कि लोकतंत्र और चुनाव की बात करना खतरे से खाली नहीं है। जंगलराज में तानाशाही ही सही मार्ग है शासन करने का। वीरू ने तो शराब के नशे में एक सभा में ये ऐलान भी कर दिया था कि अगर उसको तानाशाह बना दो तो रामगढ़ की सारी गंदगी ही दूर कर सकता है। तब खुद गब्बर सिंह ने उसको समझाया था कि चुनावी राजनीति में ऐसी सच्ची बात अपनी ज़ुबान पर नहीं लाया करते। जानते तो रामगढ़ वासी भी हैं कि गब्बर का लोकतंत्र तानाशाही से भी खराब होगा।

               हारने के बाद हारने के कारण खोजने का काम हो रहा है। गब्बर सिंह अपने दल के कार्यकर्ताओं से पूछ रहा है कि क्यों उन लोगों ने सही काम नहीं किया चुनाव में , उन्हें शराब , पैसा , गोला -बारूद सभी कुछ तो उपलब्ध करवाया था।  कहां उनका उपयोग नहीं किया गया , क्या चूक हुई है। गब्बर को लगता है जय-वीरू से गठबंधन करना भी उसको नुकसान दे गया है। वो दोनों गब्बर की जीत से अधिक ध्यान खुद अपने लिये राजनीति में जगह बनाने पर देते रहे हैं। चोर-डाकू जब अपराध जगत को छोड़ कर राजनीति में प्रवेश करते हैं तो उनकी ईमानदारी ख़त्म हो जाती है और कुछ भी कर सकते हैं। अब भविष्य में गब्बर को जय-वीरू पर नहीं अपनी बंदूक पर ही भरोसा करना चाहिए।

              गब्बर सिंह ने कब से अपना दल बना लिया था , लोकतंत्र लूट दल नाम से। अपना पहनावा बदल कर कब से शासन कर रहा था। देश भर में ज़मीन जायदाद , विदेश में बैंक खातों में करोड़ों का काला धन जमा कर चुका है। सत्ता में था तो लोग खुद बिना मांगे ही दे जाते थे , लूटने की ज़रूरत ही नहीं थी , मगर लगता रहता था कि दिन-दहाड़े लूटने का अपना ही मज़ा था। लेकिन वो सब कब का छूट गया है , मान लिया था कि अब तो उसका , उसके बाद उसके ही परिवार का शासन ही चलता रहेगा। अचानक गब्बर आकाश से ज़मीन पर आ गिरा है , संभलना कठिन हो रहा है। लगता है डाकू रहना ही ठीक था , अपने गिरोह के साथियों का ऐतबार तो था , यहां राजनीति में किसी पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता। जाने कौन किधर से कैसा वार कर दे , आज का गब्बर डर रहा है , कहीं राजनीति के माहिर खिलाड़ी उसको ही न लूट लें।

अप्रैल 06, 2014

POST : 431 गुण नेता के ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

         गुण नेता के ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

कौन है जो सफेद झूठ भी बोलता है और सत्यवादी होने का दम भी भरता है। जो हर दिन भ्रष्टाचार करने के साथ साथ ईमानदारी पर भाषण दे सकता है। किसी को खुद अपने हाथ से क़त्ल करने के बाद उसकी लाश पर आंसू बहा सकता है। जिसके कंधे पर चढ़ कर ऊपर पहुंचा उसी को लात मार सकता है। अपने दुश्मनों से हंस हंस कर गले मिल सकता है और जिसको दोस्त बताता है उसी की पीठ में छुरा घोंप सकता है। देश को लूट कर रसातल में धकेलता हुआ भी देशभक्त कहलाता है। जो पानी को आग लगा सकता है , अमृत को विष बना सकता है। जिसको देख चोर डाकू लुटेरे भी थर थर कांपने लगते हैं। जिसका कोई दीन नहीं ईमान नहीं फिर भी हर धर्म की सभा में जिसका सम्मान किया जाता है। जिसके भीतर नफरत क्रोध अहंकार कूट कूट कर भरा होता है मगर उसके चेहरे पर मुस्कान रहती है बोल चाल में शराफत छलकती है। जो तमाम अपकर्म , काले कारनामे करता है फिर भी हमेशा चकाचक सफेद वस्त्रों में बेदाग़ नज़र आता है। जिसका आदर्श वाक्य है , बाप बड़ा न भईया , सब से बड़ा रुपया। जो खुद को हर विषय का जानकार बताता है जबकि उसको अपने स्वार्थ को छोड़ कुछ भी समझ नहीं आता है। खुद को महान समझता है और अपने घोटालों को देश सेवा और विकास बताता है। इंसान होने के बावजूद जिसमें इंसानियत का कोई नाम तक नहीं है। जो बाकी लोगों को कानून का पालन करने को कहता है मगर खुद किसी नियम कायदे कानून को कभी नहीं मानता। लोकतंत्र की आड़ में जो तानाशाही कायम कर अपने परिवार के हित को साधता रहता है लोक हित घोषित करता हुआ। करोड़ों का गोलमाल करने के बाद भी जो निर्दोष साबित हो साफ बरी हो जाता है और इसको न्याय की जीत कहता है। वो जब साम्प्रदायिक सद्भाव कायम रखने को भाषण देता है तब दंगा-फसाद करवा सकता है। जो दावा करता है कि उसको कुर्सी का कोई मोह नहीं है मगर पद हासिल करने को किसी भी हद तक जा सकता है। कुर्सी बिना जल बिन मछली सा तड़पता है और उसे पाने को सब हथकंडे अपनाता है। जिसको पापों से इस देश की धरती दबी हुई है फिर भी उससे मुक्ति का कोई रास्ता नज़र नहीं आता है। जिसकी कोई विचारधारा नहीं है सत्ता पाना ही एकमात्र ध्येय है जिसका। जो खुद को भाग्य विधाता और जनता को मूर्ख समझता है। गिरगिट की तरह जिसको रंग बदलना आता है। जो चोर से भाईचारा निभाता है बचाने का रास्ता बता कर और साहूकार के घर जाकर वादा करता है चोर को पकड़वाने और सज़ा दिलाने का। अर्थात जिसमें ये सभी अवगुण भरे पड़े हैं तब भी सर्वगुणसम्पन कहलाता है। वह नेता है।

                  नेता केवल नेता होता है , वह न किसी का भाई होता है न किसी का बेटा न ही बाप। वो न किसी का शुभचिंतक है न ही किसी का मित्र।  आदमी होने के बावजूद जो बिच्छू के समान सवभाव वाला हो वही नेता बनता है। वो व्यक्ति दुनिया का सब से खुशनसीब है जिसको कभी किसी नेता से मिलने की ज़रूरत नहीं पड़ी हो। भगवान भी पछता रहा होगा नेता को बनाकर , मगर अब उसपर भगवान का भी कोई बस नहीं चलता है। जो अपने मतलब के बिना अपने बनाने वाले को भी पहचानने से इनकार कर सकता है , ज़रूरत के समय बाप को गधा और गधे को भी बाप बताने वाला ही नेता होता है। इस पहचान को कभी भुलाना नहीं , बचना कहीं आपके आस पास कोई ऐसा खतरनाक प्राणी तो नहीं रहता।  

अप्रैल 04, 2014

POST : 430 शायर दुष्यंत कुमार की याद ( बात सच बोलने की है ) डॉ लोक सेतिया

     शायर दुष्यंत कुमार की याद ( बात सच बोलने की है )

                                         डॉ लोक सेतिया 

सुना होगा आपने भी नाम उस शायर का ,
जिसने अपने देश के , देशवासियों के दुःख दर्द को पूरी शिद्दत से महसूस किया।
वही जिस दुष्यंत कुमार के शेर आप सभी सुनते रहते , सुनाते रहते हर दिन।
 देश में जब भी परिवर्तन की बात होगी दुष्यंत ही याद आयेंगे।

 42 वर्ष हो चुके हैं दुष्यंत को स्वर्गवास हुए मगर वो ज़िंदा है आज भी , विचार कभी मरा नहीं करते हैं। कितने लिखने वालों ने कितनी कितनी किताबें लिख डालीं , मगर जो काम दुष्यंत की 5 2 ग़ज़लों ने लिया वो शायद ही दूसरा कोई कर पाया।

काश आज लिखने वाला , हर इक लिखने वाला अपने आप से सवाल करे कि मैं क्या लिख रहा हूं , क्यों लिख रहा हूं। कभी कभी आता है अवसर कुछ कर दिखाने का अपने वतन की खातिर , अपनी ही खातिर।
अभी साल बाकी है मगर सत्ताधारी दल को इससे भी पहले आगामी चुनाव जीतने की चिंता है। क्या इसको देश हित की राजनीति कहते हैं कि सत्ता हासिल करना मकसद है , सत्ता पाकर देश की जनता से किये वादे निभाना याद नहीं। इक साल दो साल तीन साल और अब चार साल पूरे होने का जश्न। क्या अर्थ है। पांच साल को चुनाव हुआ तो पांच साल होने की खास बात क्या है। अगले साल 2 0 1 9  का चुनाव वो अवसर है , या ऐसा कहना चाहिये कि क्या हम इसको इक अवसर बना सकते हैं। जब हम विचार कर सकते हैं इतने साल बाद हमारा लोकतंत्र कितना परिपक्व हुआ है। दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें अभी भी प्रसांगिक हैं।
 सबसे पहले दुष्यंत की ग़ज़ल उसके शेर दोहराते हैं , शायद कुछ रौशनी दिखला सकें हमें। शुरुआत उनकी पहली ग़ज़ल से :-

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए ,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।
यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है ,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।
न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे ,
ये लोग कितने मुनासिब हैं , इस सफ़र के लिए।
खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही ,
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए।
वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता ,
मैँ बेकरार हूं आवाज़ में असर के लिए।
तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर को ,
ये अहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए।
जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले ,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।

( काश हम सब इसी एक ग़ज़ल को समझ लें , 
और हर दिन याद रखें अपने पूर्वजों के सपनों को )

अब कुछ और शेर दुष्यंत की ग़ज़लों से :-

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।
कई फाके बिताकर मर गया जो उसके बारे में ,
वो सब कहते हैं अब , ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा।
कैसी मशालें लेके चले तीरगी में आप ,
जो रौशनी थी वो भी सलामत नहीं रही।

( क्या ये उनके लिए भी नहीं जो उजाला करने की बातें करने को आये थे और 
        जो उम्मीद थी वो भी खत्म की )

ये रौशनी है हक़ीकत में एक छल लोगो ,
कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो।
किसी भी कौम की तारीख के उजाले में ,
तुम्हारे दिन हैं किसी रात की नकल लोगो।
वे कह रहे हैं गज़लगो नहीं रहे शायर ,
मैं सुन रहा हूँ हरेक सिम्त से ग़ज़ल लोगो।

( दुष्यंत के ये शेर जो अब सुनाने लगा बेहद ज़रूरी हैं याद रखना  )

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए ,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी।
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर , हर गली में , हर नगर हर गाँव में ,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं ,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही ,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।

( मित्रो इस आग को अब अपने अपने सीनों में जलाना ज़रूरी है )

खामोश रह के तुमने हमारे सवाल पर ,
कर दी है शहर भर में मनादी तो लीजिए।
फिरता है कैसे कैसे सवालों के साथ वो ,
उस आदमी की जामातलाशी तो लीजिए।
हाथ में अंगारों को लिये सोच रहा था ,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।
रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया ,
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो।
कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता ,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए ,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।
मुझमें रहते करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है ,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है।
सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर ,
झोले में उसके पास कोई संविधान है।
उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप ,
वो आदमी नया है मगर सावधान है।
वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से ,
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है।

( चलो अब और आगे चलते हैं इस ग़ज़ल को पढ़ते हैं )

होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिए ,
इस परकटे परिन्द की कोशिश तो देखिए।
गूँगे निकल पड़े हैं ज़ुबाँ की तलाश में ,
सरकार के खिलाफ ये साज़िश तो देखिए।
उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें ,
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए।

( साये में धूप की आखिरी दो ग़ज़लें पूरी पढ़नी ज़रूरी हैं )

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार ,
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार।
आप बचकर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं ,
रहगुज़र घेरे हुए मुरदे खड़े हैं बेशुमार।
रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख्याल आया हमें ,
इस तरफ आती तो हम भी देखते फ़स्ले-बहार।
मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं ,
बोलना भी है मना , सच बोलना तो दरकिनार।
इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं ,
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।
हालते इनसान पर बरहम न हों अहले वतन ,
वो कहीं से ज़िंदगी भी माँग लाएँगे उधार।
रौनके जन्नत ज़रा भी मुझको रास आई नहीं ,
मैं जहन्नुम में बहुत खुश था मेरे परवरदिगार।
दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर ,
हर हथेली खून से तर और ज़्यादा बेकरार।

( चलिये इस अंतिम ग़ज़ल को भी पढ़ लें )

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं ,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं।
मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ ,
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं।
तेरी ज़ुबान हैं झूठी जम्हूरियत की तरह ,
तू एक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं।
तुम्हीं से प्यार जताएं तुम्हीं को खा जायें ,
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं।
तुझे कसम है खुदी को बहुत हलाक न कर ,
तू इस मशीन का पुर्ज़ा है , तू मशीन नहीं।
बहुत मशहूर है आयें ज़रूर आप यहाँ ,
ये मुल्क देखने के लायक तो है हसीन नहीं।
ज़रा-सा तौर-तरीकों में हेर फेर करो।
तुम्हारे हाथ में कालर हो आस्तीन नहीं।

( साये में धूप से साभार ) 
 

 

अप्रैल 01, 2014

POST : 429 मूर्ख शिरोमणी ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

       मूर्ख शिरोमणी ( हास-परिहास )  डा लोक सेतिया

      पहली अप्रैल का शुभ दिन लिखने वालों का ख़ास अवसर होता है , उम्र भर मूर्खता करते हैं उस पर गर्व करते हैं ।  समझदार लोगों ने ही मतलब की खातिर समाज को बर्बाद किया है नासमझ मुर्ख लोग नाहक परेशान रहते हैं ।  आजकल मौसम भी यही है , चुनाव होते रहते हैं । नेता जनता को मूर्ख बनाते बनाते हैरान हैं कि लोग जाने कैसे समझदार हो गये । मगर सच तो ये है अपनी तमाम समझदारी के बावजूद हर बार की तरह अब की बार भी मूर्ख जनता ही बनेगी । फिर उन्हीं दागदारों को जब चुनेगी । कभी होता था विरोधी को भी जो कहना होता था बड़ी शालीनता से कहते थे । अब कीचड़ की होली खेलने का लुत्फ़ उठा रहे हैं नेता लोग । बशीर बद्र जी का शेर है   " दुश्मनी जम कर करो ,लेकिन ये गुंजाइश रहे , जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों "।

       ऐसा लगता है नेताओं में लाज शर्म नाम की चीज़ नहीं होती , तभी कल तक जिसको क्या क्या अपशब्द कहते थे उसको गले लगा रहे हैं । मगर आज इनकी बात नहीं करना चाहता , अपनी बात पे आता हूं , पहली अप्रैल का दिन है ये समझदारी वाली बातें करना शोभा नहीं देता । कहने को ये दुनिया है ही मूर्ख लोगों की , जिधर भी नज़र डालो मूर्खों की मूर्खता दिखाई देती है । फिर भी हर कोई खुद को बाकी दुनिया से अधिक समझदार ही मानता है । मनोविज्ञान वाले इसको सामान्य बात कहते हैं , वो मानते हैं अधिक समझदारी की बात दिमागी तौर पर बीमार लोग करते हैं । जिस किसी ने घोषणा की हो कि मूर्ख दोस्त से अकलमंद दुश्मन अच्छा होता है , उसका मुमकिन है अकलमंदों से पाला ही न पड़ा हो , वरना अक़लमंदो से भला दोस्ती करना संभव है । आज तक आपने दो अक़लमंदो की दोस्ती नहीं देखी होगी , दस मूर्खों की ज़रूर देखी होगी । मूर्खों के बिना अपनी दुनिया बनाने की कल्पना दुनिया को बनाने वाले ने भी नहीं की होगी । मुझे तो अक्सर उसकी समझदारी पर हैरानी होती है ये कैसी दुनिया बनाई उसने , क्या क्या नहीं बना डाला दुनिया वालों के लिये , फिर भी लोग खुश नहीं उससे । अभी तक मूर्खों को अपनी अहमियत का पता नहीं चला , ये उनके कारण ही है कि अकलमंद खुद को अकलमंद साबित कर सकते हैं । ठीक उसी तरह जैसे काले रंग के सामने सफेद रंग की चमक और अधिक लगती है । साल के 3 6 4 दिन खुद बेवकूफ बनने के बाद पहली अप्रैल को दूसरों को मूर्ख बनाने का प्रयास भी अकलमंद लोग ही किया करते हैं । सब मूर्खों को इनसे सावधान रहना चाहिये आज , आज भी पहली अप्रैल है ।

             जब भी खबर पढ़ते कि फलां शहर में महामूर्ख सम्मलेन हुआ बड़ी धूमधाम से और किसी को मूर्ख शिरोमणि का ताज पहनाया गया तब मुझ जैसे मूर्ख मायूस हो कर रह जाते । कुछ मित्र जो रात दिन शहर की चिंता में ही दुबले हुए रहते हैं वो भी पूछते यार अपने नगर में मूर्खों की क्या कमी है कि यहां ऐसा नहीं किया जाता । लगता है यहां वाले बुद्धिजीवी साहित्य से और समाज की विसंगतियों से सरोकार नहीं रखते । ऐसे बात कहने वाले तमाम लोग थे लेकिन जो ऐसा आयोजन करवाये वो कोई भी नहीं । इसलिए मैंने सुबह उठते ही ठान लिया ये बीड़ा उठाने को , जब जागे तभी सवेरा । सोचा ये मूर्खता भी कोई दूसरा क्यों करे मैं खुद क्यों नहीं । शाम को ही ऐसी सभा बुलाने का तय कर ही लिया , मुझे अपनी मूर्खता साबित करने किसी के पास नहीं जाना था , शहर के काफी लोग पहले से ही मुझे मुर्ख मानते ही हैं । उम्मीद थी कोई ये सवाल नहीं खड़ा करेगा कि मुझे मूर्खों की सभा बुलाने का क्या अधिकार है। एक मित्र को फोन किया तो वो बोले यार कुछ दिन पहले तय करना चाहिये था , तब ही मज़ा आता , इस साल रहने दो अगले साल का अभी से तय कर लेते हैं । ये उनका तरीका था मुझे अप्रैल फूल बनाने का क्योंकि उनको मेरी बात कुछ ऐसी ही लगी थी । मगर मैं गंभीर था सभा बुलाने को लेकर । मैंने सोचा कि पहले से तय करना मूर्खों का काम नहीं हो सकता , ये तो अकल वाली बात हो गई ।

       एक अन्य मित्र जो पुलिस अधिकारी थे मान गये , उनका सुझाव था कि सब लोग खुद सभा में अपनी अपनी मूर्खतायें सुनायें ।  तो मैंने उनकी बात मान कुछ लोगों को आमन्त्रित किया कि आयें और खुद बतायें कि हां मैंने भी की हैं मूर्खतायें । कई लोग बोले आज फुर्सत नहीं है फिर कभी । मूर्खता में कोई कमी न रहे इसलिये मैंने सांध्य दैनिक में सब मूर्खों को खुला निमंत्रण का विज्ञापन भी छपवा दिया । साथ में इक नियम भी बता दिया कि शुल्क भी देना होगा मेंबर बनने का , ताकि गलती से अकलमंद लोग मूर्खों का तमाशा देखने को नहीं चले आयें । अकलमंद होने का ये भी नियम है कि किसी काम में समय भले लग जाये पैसे नहीं खर्च होने चाहियें । मन में इक डर ये भी था कि ऐसा न हो कि हम अकेले ही वहां पहुंचे दूसरा कोई भी नहीं आये , तभी कुछ चाहने वालों को विनती कर दी मूर्खों की लाज रखना । थोड़ा देरी से ही सही कुछ लोग आये और सब ने अपनी अपनी मूर्खताओं को बयान किया । सब मान गये कि जो आज के युग में नगरपालिका को सफाई की बात के लिये पत्र लिखे , अफ्सरों को कर्त्तव्य निभाने को , डॉक्टर्स को मानवता की बात , दुकानदारों को लूट जमाखोरी बंद करने की , जनस्वास्थ्य विभाग से साफ पानी की , वो महामूर्ख ही तो है । ये भी सबने माना कि पुलिस अधिकारी अगर संवेदनशीलता की बात करता है , जनता और पुलिस की दोस्ती की बात करता है , कविता लिखता है तो वो भी कम मूर्ख नहीं है । दो घंटे तक यही बातें होती रही और पूरी कोशिश थी कि समझदारी वाली कोई बात नहीं होने पाये । सब एकमत थे कि आज देश और समाज को मूर्खों की बहुत ज़रूरत है । वक़्त बहुत मज़े से कटा , लेकिन इस बात का अफसोस बाकी रहा कि जो हमेशा दावा किया करते हैं कि वो मूर्ख शिरोमणि हैं वो आये ही नहीं । उनको यकीन नहीं आया कि कोई ऐसी सभा बुला सकता है । बस इसी डर से वो अपने घर से बाहर ही नहीं निकले कि कोई उनको मूर्ख बनाना चाहता है । काश कि वो आते और मूर्ख शिरोमणि का ख़िताब पाते । लेकिन चाहे नहीं आये ख़िताब पर उनका दावा तब भी बरकरार है । भला मुझे भी कहां इनकार है ।

         ये वास्तविक घटना है और जहां तक मेरी जानकारी है एक अप्रैल का वही पहला और अभी तक का अंतिम आयोजन था मेरे नगर में । समझदार लोगों के इस शहर में मूर्ख भी होंगे ही अन्यथा चालाक और समझदार कैसे चैन से रहते बगैर औरों को मूर्ख साबित किये अपनी समझदारी का सिक्का नहीं जमा सकते हैं । मूर्ख शिरोमणि का ताज अभी भी मेरे पास सुरक्षित है और मैं चाहता हूं कोई खुद आकर अपना अधिकार जतलाए और मुझसे ताज ले जाए । ऑफर अभी भी उपलब्ध है कोई भी लाभ उठाना चाहे तो सभा का आयोजन कर मूर्ख  शिरोमणि का ताज अपने सर पर सजा सकता है । 
 
 April Fools' Day 2024: 1 अप्रैल को क्यों मनाया जाता है मूर्ख दिवस, जानिए  इतिहास और महत्व | Moneycontrol Hindi

मार्च 31, 2014

POST : 428 अनुमति लेना ज़रूरी है ( ब्लॉग की पोस्ट शेयर करने को )

    अनुमति लेना ज़रूरी है ( ब्लॉग की पोस्ट शेयर करने को )

अब किसी का नाम लेना सही नहीं है। और ऐसे लोग हैं भी बहुत कम , अधिकतर लोग जो साहित्य सेवा से जुड़े हैं वे ऐसा नहीं करते। मगर अभी इन दिनों किसी ने मुझे कमेंटस के स्थान पर ये सूचित किया कि हमने आपकी इस रचना को अपनी जगह पर लिख दिया है। वे ये भी लिखते हैं कि मुझे सूचित करना ज़रूरी समझते हैं। मगर उनको मालूम होना चाहिये कि मैंने अपने ब्लॉग पर सपष्ट निर्देश दे रखा है कि मेरी बिना अनुमति किसी रचना या पोस्ट को उपयोग नहीं कर सकते। क्या आप किसी की कोई चीज़ बिना उसकी अनुमति उपयोग कर सकते हैं और करने के बाद सूचित करते हैं कि मुझे पसंद आई थी उठा ली थी। बुरा नहीं माने मैं इसको बेहद आपतिजनक कार्य मानता हूं। आप साहित्य का साथ अनाचार को साहित्य कर्म या साहित्य सेवा कदापि न कहें। बहुत बार फेसबुक पर भी मेरी रचना किसी ने अपनी पोस्ट पर लिखी , मना करने पर कहते हैं कि लिंक से लोग नहीं पढ़ते इसलिये उन्होंने ये किया मेरे लिये कि और लोग पढ़ सकें। भाई आपको मेरी चिंता नहीं करनी है , न ही इस बात की कि लोग पढ़ते हैं या नहीं। मुझे किसी को विवश नहीं करना पढ़ने को। जो चाहे पढ़ सकता है और नहीं पढ़ना चाहता तो वो भी हर किसी का अधिकार है। आप किसी के अधिकार में हस्ताक्षेप क्यों करना चाहते हैं। जो भी ये सब किया करते हैं , जो कर चुके उसको अपनी जगह से मिटा दें और दोबारा ऐसा नहीं किया करें। मुझे इतनी ईमानदारी और नैतिकता की आपेक्षा हर उस व्यक्ति से है जिसको साहित्य से कोई सरोकार है।

मार्च 30, 2014

POST : 427 इक पतित नारी की जीवन गाथा ( सत्य कहानी ) डा लोक सेतिया

 इक पतित नारी की जीवन गाथा ( सत्य कहानी ) डा लोक सेतिया

        बहुत साल पहले की घटना है , इक पत्रिका में किसी महिला की आपबीती प्रकाशित हुई थी। तब उम्र नहीं थी गहराई से उसको लेकर सोचने की , मगर मैं उस नारी की व्यथा को कभी भुला नहीं सका। जब फेसबुक पर मित्रता के नाम पर अशलीलता का फैला हुआ जाल देखा तब उसको अपनी कल्पना के माध्यम से इक लघुकथा का रूप दिया। आज कुछ कुछ उसी तरह की कहानी लिखने जा रहा हूं जो मुझे लगता है कि बहुत लोग जो फेसबुक पर हैं उनको खुद से जुड़ी लग सकती है। शायद जितना मैं लिख सकता उससे कहीं बढ़कर। चलो भूमिका को छोड़ आपको इक नारी की पीड़ा की उसकी बेबसी की उसके गंदगी में कीचड़ में फसने से रसातल में गिरने की कहानी सुनाता हूं। और उसका अंत जो हुआ वो भी , जो शायद होना ही था , होता ही है , लेकिन जो ऐसा करते हैं वो ये शायद ही सोचते हैं कि किसी दिन उनका बनाया जाल ही खुद उनको फंसा सकता है।

             नीता इक अध्यापिका थी , रौशन शर्मा की बेटी को टयूशन पढ़ाने उसके घर जाया करती थी। उसके घर की आर्थिक दशा उसको ऐसा करने को विवश करती थी। एक दिन जब नीता गई टयूशन पढ़ाने तब घर पर उनकी बेटी और पत्नी नहीं थी और रौशन अकेला था। नीता को रोक लिया था उसने ये बता कर कि बेटी अभी आने वाली है मां के साथ बाज़ार तक गई है। और उस दिन रौशन ने ज़ोर ज़बरदस्ती करके नीता की अस्मत लूट ली थी। अपना सर्वस्व लुटा कर जब नीता बिलख रही थी तब रौशन ने उसको बहुत सारे पैसे जितने शायद वो टयूशन से वर्ष भर में लेती थी देकर कहा था लो मेरी तरफ से कोई उपहार ले लेना। और ये बात किसी से मत कहना वरना तुम्हारी ही बदनामी होगी। नीता ने लिखा था तब अपना नाम बदल कर पत्रिका को कि तब उसको समझ नहीं आ रहा था कि अपनी अस्मत लुटने पर रोये या पहली बार इतने पैसे पाकर खुश हो। रौशन को आता था महिलाओं को चिकनी चुपड़ी बातों से बहलाना। उसने जब अपनी बात का असर होता देखा नीता पर तो कहने लगा मुझसे भूल हो गई है तुम्हारे हुस्न का जादू चल गया था मुझ पर और मैं तुमसे सच में प्यार करता हूं। लेकिन मुझे तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिये थी , कसम खाता हूं अब कभी नहीं करूंगा ऐसा दोबारा। लेकिन अगर तुम चाहोगी तो मैं तुमको जो भी चाहिये देता रहूंगा। तुम ये बात मन से निकल दो कि हमने कुछ गलत किया है , जिस बात से हमको ख़ुशी मिलती हो और किसी का कोई बुरा नहीं उसमें बुराई नहीं है। आखिर अपना तन मन हमारा है , हम जो पसंद हो करें , किसी को बताने की कोई ज़रूरत नहीं , इस तरह रौशन ने नीता को मना लिया था कि इस घटना का ज़िक्र किसी से नहीं करेगी। मगर अभी तक वो कश-म-कश में उलझी थी कि क्या करे क्या नहीं , इसलिये उसने अब किसी के घर जाकर टयूशन पढ़ाना ही बंद कर दिया था। जिनको पढ़ना हो वो उसके घर आ सकते हैं , रौशन चाहता था नीता को अपने जाल में फंसाये रखना इसलिये उसने भी बेटी को नीता के घर टयूशन पर भेजना शुरू कर दिया। नीता चाह कर भी उस घटना को भुला नहीं पा रही थी। मगर फिर उसने अपनी आर्थिक मज़बूरी से विवश हो कर एक दिन रौशन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। रौशन उसके घर आता अपनी वासना पूरी करता और नीता को बहुत से पैसे देता। मगर क्योंकि नीता अपने घर पर हमेशा अकेली नहीं मिलती थी इसलिये उसने नीता को अपनी ही एक जगह उपलब्ध करवा दी थी टयूशन का काम करने को। यूं सब को यही मालूम था कि किराये पर ली है जबकि किराया उसको अपना बदन सौंप कर ही चुकाना होता था।

                  वक़्त बीतता गया और नीता ने खुद को बदल लिया था समय के साथ। अब वो दिखाने को टयूशन का काम करती थी मगर वास्तव में उसी को अपना कारोबार बना लिया था , हर किसी से शारीरिक संबंध बनाना और पैसे लेना। रौशन की बेटी जवानी की दहलीज पर थी और नीता के घर अभी भी नियमित आती जाती थी। नीता उसको कई प्रकार से सहयोग किया करती , उसको परीक्षा में नकल करवाना , उसकी बुरी आदतों को पूरा करने को जब तब पैसे देना। रौशन की बेटी को नीता बहुत प्यारी लगती थी , क्योंकि वो उसको जो चाहती वो करने में सहायता देती रहती थी। शायद कहीं अनजाने में वो अपने साथ उसके पिता द्वारा किये अपकर्म का बदला ले रही थी उसकी बेटी को उसी राह जाते देख कर। अक्सर जब कोई नीता के पास आता तब वो रौशन की बेटी को कुछ अशलील तस्वीरें देखने को , कुछ ऐसे पत्रिकाएं पढ़ने को देकर साथ के कमरे में चली जाती अपना कारोबार करने। तब वो छुप कर दरवाज़े की दरार से नीता को सब करते देखती कितनी बार। और ऐसे में उसने एक दिन नीता को ये बता दिया था कि क्या मुझे ये सब सिखा सकती हैं। और इस तरह रौशन की बेटी ही नहीं और लड़कियों को भी नीता ने उसी जाल में फंसा लिया जिसमें खुद मज़बूरी में फंस गई थी।

                रौशन नहीं जनता था कि जिस रास्ते पर उसने नीता को डाला था आज उसकी जवान बेटी उसी राह पर भटक रही है। ऐसे में इक दिन रौशन ने नीता को होटल में आने को कहा तो उसने पूछा क्या मेरी बजाय कोई नई जवान लड़की अगर हो तो आपको क्या चाहिये मैं या वो। और रौशन ने कहा था कि अगर कोई नई और जवान मिल जाये तो अधिक पसंद है। जब होटल के कमरे में नीता अपने साथ उसी की बेटी को लेकर पहुंची तब उसको होश ही उड़ गये। बहुत नाराज़ हुआ वो नीता को बदचलन बताया , नीता ने वही बात दोहराई जो कभी रौशन से उसको कही थी। किसी को भी अपना बदन अपनी मर्ज़ी से किसी को भी ख़ुशी से सौंपने में बुराई नहीं है। जो तुमने किया और मुझे सिखाया वही तुम्हारी बेटी ने भी सीख लिया है , अब तुम लाख चाहो जो हो चुका उसको बदल नहीं सकते। रौशन ने नीता को और अपनी बेटी को वहां से जाने को कह दिया था और ये विनती की थी कि ये सब किसी को नहीं बताना , मैं समझ गया मुझे अपने कर्मों का फल ही मिला है। वो चली आई थी , अगली सुबह होटल के कमरे से रौशन की लाश मिली थी।  उसने ख़ुदकुशी कर ली थी। सुसाईड नोट छोड़ गया था कि अपनी मौत का वो खुद जिम्मेदार है।

मार्च 27, 2014

POST : 426 भगवान का पेटेंट ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

      भगवान का पेटेंट ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

      अभी पिछली पोस्ट पर मैंने भगवान नहीं आदमी को इंसान बनाने की बात कही थी । इक महिला मित्र ने उसको तुरंत हटा दिया अपनी टाइम लाईन से । ऐसा नहीं कि उनको मेरी बात अनुचित लगी , उनका कहना था कि कोई भगवान नाराज़ हो जाएगा । ये कितनी हैरानी की बात है कि हम ये सोच रहे कि सच बोलने से भगवान नाराज़ हो सकता है । आपको बता दूं मैं जिस धर्म को जानता हूं उसका आदर्श वाक्य ही यही है सत्य ही ईश्वर है । बहुत सारे सिख भाई नहीं जानते कि जब वो सात सिरी अकाल बोलते हैं तो उसका अर्थ क्या है । सत्य ही ईश्वर है , यही उसका अर्थ है । जो बोले सो निहाल सत सिरी अकाल का अर्थ है कि जो कोई भी ऐसा बोलता है कि सत्य ही ईश्वर है भगवान उस पर कृपा करते हैं । मैंने ये पहले भी ज़िक्र किया है बार बार कि मेरी माँ इक भजन गाती रहती थी । भगवन बन कर तूं मान न कर तेरा मान बढ़ाया भक्तों ने , तुझे भगवान बनाया भक्तों ने । मेरा विचार है ये वही कह सकता है जो ईश्वर को अपना और खुद को उसका मानता हो । मुझे माँ जैसा निश्छल सवभाव , किसी के प्रति कोई दुर्भावना न रखना , किसी से कभी कटु वचन नहीं कहना और हमेशा मुस्कुराते रहना विरला ही कभी दिखाई देता है । मेरी धर्म पत्नी अक्सर जब भी सास बहू की बात आती है किसी से चर्चा में तब यही बोलती है कि उनको तो सासू माँ ने कभी एक बार भी कोई बात गुस्से या नाराज़गी से नहीं की थी । ये तो केवल परिभाषा थी , अब विषय की बात । व्यंग्य है भगवान का पेटेंट ।

         खबर छपी थी कि पेटेंट कानून पास हो गया । अमेरिका वाले नीम का हल्दी का तुलसी का और जाने किस किस की खोज का पेटेंट पहले ही करवाये बैठे हैं । खेती के बीज तक उनके नाम पर पेटेंट हैं और दवायें भी । अब इनका उपयोग उनको रायल्टी चुका कर ही कर सकते हैं । कल ऐसा भी मुमकिन है कि कोई खुद को भगवान घोषित कर दे ये पेटेंट करवा कि ये दुनिया उसी की बनाई हुई है । दूर की कौड़ी लगती है आपको , पर सब कुछ मुमकिन है । देखा नहीं टीवी पर कोई करोड़ों कमा रहा है अपने तथाकथित भक्तों को यही बतला कर कि आप पर अमुक देवी देवता की कृपा क्यों नहीं हो पा रही और कैसे होगी । बहुत आसान सी बातें बताता है जो कोई भी कर सकता है । जलेबी खाना क्या कठिन है , रोज़ खा सकते अगर शुगर नहीं हो । सोचो कोई भगवान बन कर सभी से हवा में सांस लेने , सूरज की रौशनी , पीने का पानी , धरती पर कदम रखने तक की रायल्टी वसूल सकता है अगर उसके नाम पेटेंट हो जाये कि वही ईश्वर है । ये फज़ूल बात है कि ये उसने बनाया था कि नहीं । ऐसे तो हज़ारों साल से अपने देश के घर घर में देसी घरेलू इलाज दादी मां के बताये नुस्खे से होता ही है । हमारे आयुर्वेद के विद्वानों ने कोई रायल्टी मांगे बिना ये जानकारी हर खास-आम तक पहुंचा दी । अब इनकी रायल्टी उसी को मिलेगी जिसने इनका पेटेंट करवा लिया अपने नाम । हम अब भी सोचते ही रहे तो कोई अमेरिका वाला पेटेंट करवा लेगा भगवान को खोजने का अपने नाम पर । तब सब मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरुद्वारा उनका अधिकार क्षेत्र में आ जायेगा , उनको अपनी आमदनी से रायल्टी के रूप में हिस्सा देना होगा । तब हम क्या करेंगे ।  क्या वही दोहरायेंगे जो डंकल प्रस्ताव पर किया था । कुछ दिन विरोध सभायें कर भाषण देने के बाद खुद ही हस्ताक्षर कर हथियार डाल देंगे अमरीका वालों के दबाव में । जो वामपंथी कसमें खाते थे कभी गैट समझौते को न मानने की , खुद शामिल थे उस सरकार को समर्थन करने वालों में जिसने उसको स्वीकार किया । चुपचाप मोहर लगा दी संसद में । ये अब कोई मुद्दा ही नहीं रह गया , किसी भी दल को नहीं लगता कि इसको उठा कर कोई सरकार बनाई या गिराई जा सकती है या इसको उठाने से वोट मिल सकते हैं । जो ये नहीं कर सके वो विषय वो मुद्दा नेताओं को फज़ूल लगता है ।

       मैंने कहा था कि अगर कोई ईश्वर होने का पेटेंट करवा ले , मगर हम भारत वासी खुद को भगवान हरगिज़ नहीं कह सकते ।  भले है बहुत जो भगवान कहलाते हैं , मीडिया ने बना दिया अपने मकसद से , कुछ ताकत शोहरत मिलते ही खुदा बन जाते हैं इंसान नहीं रहते । मगर भगवान हैं ये नहीं कहते क्योंकि भगवान से उनको भी डर लगता है । मगर इतना तो हम कर ही सकते हैं कि ये पेटेंट अपने नाम करवा लिया जाये कि भगवान को हमने ही खोजा था । ये झूठ भी नहीं है , हम साबित कर सकते हैं । हमारे साधू संत , सन्यासी , ऋषि मुनि , देवी देवता तक वर्षों बन बन भटकते रहे , तपस्या करते रहे पर्मात्मा को पाने को । इस अपने देश में करोड़ों देव वास किया करते थे , तो बहुमत भी अपना ही साबित किया जा सकता है । अब वो सब किधर गये ये सवाल मत पूछना , कलयुग में राक्षस ही मिलते हैं उनके रूप में । लेकिन जब हमने खोजा था भगवान को तो इसका पेटेंट अपने नाम होना ही चाहिये । अब आप सोचोगे कि ऐसा करने से क्या हासिल होगा । तो समझ लो जब भगवान पर अपना पेटेंट होगा तब उसकी बनाई हर चीज़ पर अपना अधिाकर खुद ही हो जायेगा । तब उनको पता चलेगा जिन्होंने हमसे गैट समझौते पर हस्ताक्षर लिये थे । हवा पानी चांद सूरज , रौशनी अंधेरा सब की यहां तक कि बरसात की रायल्टी देनी होगी , इंद्र से लेकर सभी देवता अपने ही हैं । तब पता चलेगा उनको भी कि पेटेंट करवाना क्या होता है । 
 
 The God Patent

मार्च 25, 2014

POST : 425 भगवान के लिए अब तो इंसान बनाएं ( आलेख ) डा लोक सेतिया

 भगवान के लिए अब तो इंसान बनाएं ( आलेख ) डा लोक सेतिया

सब से पहले सभी धर्मों के अनुयाईयों से निवेदन कि कृपया इसको सही परिपेक्ष्य में समझें। मेरा किसी देवी देवता धर्म गुरु के प्रति , किसी की आस्था के प्रति रत्ती भर भी विरोध नहीं है। सच कहूं तो जो भी सभी धर्म सिखाते हैं मैंने उसी को समझने का प्रयास ही किया है। कल इक मित्र की वाल पर उनके किसी मित्र की पोस्ट को पढ़ा। जिसमें बताया गया था कि वे अपने धर्मस्थल की यात्रा पर गये और उनके साथ कोई घटना घटी और उनको सहायता की ज़रूरत आन पड़ी। उनके पास किसी का दिया एक कार्ड था और जब सम्पर्क किया तो जिन का निकला वो भी तब वहीं उस धर्मस्थल की यात्रा पर थी। इसको उन्होंने अपने ईष्ट देव की अनुकंपा बताया हुआ था। मैंने इसको उनकी इंसानियत समझा जिन्होंने उनकी सहायता की। मैंने सोचा क्या सभी देवी देवताओं को इसी तरह गुणगान कर ही भगवान नहीं बनाया गया है। और यहां सबसे पहला प्रश्न यही मन में आया कि वहां कितने ही लोग थे क्या उनमें कोई भी सहायता नहीं करता अगर उनकी जान पहचान का कोई नहीं मिल पाता। क्या ये तो और भी विडंबना की बात नहीं होती कि इतने धार्मिक लोगों में सच्चा धर्म किसी को याद नहीं होता। मगर सच तो यही है , शायद ही कोई असहाय को सहारा देने को तत्पर रहता है। मैंने देखा कि हम जिस धर्म ग्रंथ की पूजा करते हैं उसकी शिक्षा को मानते क्या समझते तक नहीं। हैरानी है ऐसे में हम सोचते हैं ईश्वर प्रसन्न हो जाता होगा सर झुकाने से और चढ़ावा चढ़ाने से। जिसको दाता कहते उसको भिखारी समझते हैं क्या हम , सोचना चाहिए। शायद अब इस बात को समझना होगा कि इंसान की इंसानियत बड़ी है किसी भी इष्ट देव देवता गुरु खुदा से। यकीन करें अगर हम अब भगवान बनाना छोड़ इंसान को इंसान बनाने का प्रयास करें तो न कोई भूखा रहेगा न कोई बेसहारा। वही पुराना गाना , इंसान का इंसान से हो भाईचारा , यही पैगाम हमारा। मैं देखता हूं फेसबुक पर हर कोई अपने अपने देव की तस्वीर को टैग कर जय जयकार करता रहता है। मुझे नहीं लगता ऐसा करने से किसी का कोई कल्याण होता होगा। काश लोग अपने धर्म का डंका पीटने की जगह उसका पालन कर कोई सार्थक काम कर रहे होते औरों की सहायता करने का। तब ऐसे एक कहानी नहीं होती कभी कभी , हर जगह कोई इंसान इंसानियत निभा रहा होता। शायद भगवान की किसी को ज़रूरत ही नहीं होती। किसी शायर का शेर है , अब कोई धर्म ऐसा भी चलाया जाये , जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाये। 

 

मार्च 20, 2014

POST : 424 अपनी महबूबा पर कवि की कविता ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

अपनी महबूबा पर कवि की कविता ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      

कवि की महबूबा ने कवि से
इक दिन कहा मनुहार से
कोई कविता मुझ पर लिखो
बोली पहली बार बड़े प्यार से ।

कवि उलझन में पड़ गया
सोचने लगा आज मर गया
कल तुमको सुनाऊंगा ये
वादा करके वापस घर गया ।

जब दोनों अगले दिन मिले
भूले सभी के सब थे गिले
इक बस वही तमम्ना थी
सुन प्रेमी की कविता दिल खिले ।

बोला कवि सुन मेरी सनम
आती है बहुत ही तुमको शर्म
आधी सुनाऊंगा मैं कविता तुझे
बाकी समझ लेना खा मेरी कसम ।

तब सुनाई कवि ने कविता नई
लिखे थे जिसमें हसीं के गुण कई
सुकोमल सुमधुर सुंदर बदन
ढूंढू तुम में हमेशा गुण यही ।

सुन कर सपनों में खो गई
तन मन से कवि की हो गई
कोई है मेरा भी इतना दीवाना
धरती से उड़ आकाश को वो गई ।

इक कसक रही सुनाई अधूरी
सोचा खुद पढ़ लूंगी कभी पूरी
चुपके से चुरा लाई वो डायरी
हो गया जब पढ़ना बहुत ज़रूरी ।

आगे कवि ने था लिखा प्रेमिका
जो चाहता वो ही सुनाने को लिखा
तुझमें नहीं कभी आता नज़र वो
रहता यही हरदम मैं तुममें ढूंढता ।

इक दिन चुरा कर ले जाओगी
कसम को मेरी तुम भुलाओगी
नहीं तुम्हारा खुद पर बस चलता
सच जान कर फिर पछताओगी ।

तुम क्या हो अब ये जान लो
सूरत को अपनी ज़रा पहचान लो
न चाल है न कोई सलीका हुस्न का
सच तो है इक कर्कश जाल हो ।

पर क्या करता था लिखना ज़रूरी
श्रोता होती है कवि की मज़बूरी
बस यही इक मुश्किल थी मेरी
वर्ना भाती है सबको तुमसे दूरी । 




मार्च 17, 2014

POST : 423 बेघर हैं इस घर के मालिक ( तरकश ) डा लोक सेतिया

      बेघर हैं इस घर के मालिक ( तरकश ) डा लोक सेतिया

     बहुत बड़ा ही ये मकान , कहते हैं ये भारत देश है। माना जाता है देश की सवा सौ करोड़ जनता खुद इसकी मालिक है , मगर उनको इसकी खबर ही नहीं कि ये देश उनका है। इस जनता में वे करोड़ों लोग भी हैं जो सड़कों -फुटपाथों को अपना ठिकाना बना ज़िंदगी बसर कर रहे हैं। इस देश रूपी भव्य मकान पर आज़ादी के बाद से कुछ राजनेताओं ने कब्ज़ा जमा रखा है। वे रात दिन जनसेवा की बात कर शासन के नाम पर इस घर को लूट रहे हैं बेरहमी से। इन नेताओं के कई गुट बने हुए है जिनको ये अपना दल कहते हैं , हर इक गुट का दावा है कि इस आलीशान मकान का कोई न कोई हिस्सा उसी का है। कोई किसी खिड़की को अपनी विरासत समझता है कोई दरवाज़े को अपनी मलकियत बताता है। किसी का अधिकार आंगन पर है , किसी ने छत को निजी जगह समझ लिया है। खिड़की को पकड़े कोई जब चाहे उसको बंद कर देता है और हवा रौशनी तक को नहीं आने देना चाहता तो कभी जब चाहे तब उसको खुला छोड़ देता है चाहे आंधी तूफान से तबाही मच जाये।कोई किवाड़ को पकड़े हुआ है जो चाहता है कि वही लोग भीतर जा सकें जो हर दम उसकी जय जयकार किया करें। किसी गुट ने मुख्य हाल पर अपना अधिपत्य जमा रखा है बाकी गुटों ने किसी न किसी कमरे को हथिया लिया है। इस मकान की हर चौखट पर , एक एक ईंट पर किसी न किसी का नाजायज़ कब्ज़ा है। सब की नज़र माल गोदाम और रसोई घर पर रहती है , हर कोई अधिक से अधिक खा जाना चाहता है। पूरे मकान में दरारें ही दरारें हैं भ्रष्टाचार की , जिधर भी नज़र जाती है प्रशासन की मनमानी कामचोरी का जाला दिखाई देता है। लगता है किसी को भी इसकी साफ सफाई की बिल्कुल भी चिंता नहीं है। अभी इक नया गुट इनमें आ मिला है जो हाथ में झाड़ू पकड़े हुए था और सफाई की बात कहने के वादे पर इस मकान में घुसा था लेकिन दो दिन में ही उसकी वास्तविकता सामने आ गई है उसको बाकी सभी से अधिक जगह पर अपना अधिपत्य चाहिये। जाने ये कैसी सफाई करना चाहते हैं कि खुद ही गंदगी को बढ़ाने का काम करने लगे हैं।

    कहते हैं कि इस मकान का सब से खूबसूरत जो कक्ष है उसी में सत्ता रूपी सुंदरी वास करती है। ये तमाम नेता उसी के दीवाने हैं , सब रंगरलियां मनाना चाहते है उस सुंदरी के साथ। नेताओं के लिये इस से बढ़कर कोई भी सुख नहीं है , स्वर्ग का सुख इस के सामने कुछ भी नहीं है उनके लिये। सत्ता रूपी सुंदरी को हासिल करने को ये नेता कुछ भी कर सकते हैं। लाज शर्म , ईमानदारी नैतिकता सब को त्याग सकते हैं सत्ता सुंदरी के लिये। एक बार उसको अपने बाहुपाश में जकड़ लेने का सपना सब नेता उम्र भर देखता है। नेताओं को किसी मोक्ष की कामना नहीं होती कभी , जान जा रही हो तब भी इनको सत्ता सुंदरी को छोड़ और कुछ याद नहीं होता। हर नेता जल बिन मछली की तरह तड़पता रहता है उसी के लिये। इस मकान में जो सभा भवन है उसको हम्माम कहते हैं जहां पर सभी नग्न होते हैं। इसलिये उस सभा में किसी को कुछ भी करते रत्ती भर भी शर्म का एहसास नहीं होता है।

                     हर पांच वर्ष बाद और कभी उससे पहले भी चुनाव रूपी इक मेला लगता है। लोकतंत्र नाम का इक खेल खेला जाता है। नेता एक दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं , इक दूजे पर कालिख पोत कर होली खेलने का मज़ा लेते हैं। तब थोड़े दिन तक सड़क - फुटपाथ पर रहने वाली जनता को खुश करने , उसको मूर्ख बना फिर से अपने अपने जाल में फसाने के प्रयास सभी गुट के नेता करते हैं। इस समय नेता गुट को भी त्याग देते हैं जब उनको लगता है कि सत्ता सुंदरी विरोधी गुट में शामिल होने से उसको वरमाला पहना सकती है। जनता को हर बार नये नये सपने दिखाये जाते हैं , रोटी कपड़ा घर , विकास की बातें , उसको जीते जी स्वर्ग दिखलाने तक का दावा या वादा किया जाता है। हर बार जनता इनकी बातों के जाल में फंस जाती है वोट दे देती है इनको विश्वास करके। सत्ता के सिंहासन पर बैठते ही नेता सारे वादे सारी कसमें भूल जाते हैं और कुर्सी मिलते ही जनता रूपी द्रोपदी का चीर हरण होता है भरे दरबार में। वहां तब सब धृतराष्ट्र बन जाते हैं। और ऐसे में कोई कृष्ण भी नहीं आता है उसकी लाज बचाने को। जनता की चीख पुकार इस मकान की दीवारों में दब कर रह जाती है।

              देश की आज़ादी के बाद से यही होता आया है , नेता इस देश रूपी जिस मकान में रहते हैं उसी की नींव को खोखला करने का काम करने को देश सेवा बता रहे हैं। ये नेता और प्रशासन के लोग जिस डाल पर बैठे हैं उसी को ही काटने का कार्य कर रहे हैं। तब भी खुद को बहुत अकलमंद समझते है ये सब। इसी मकान में तमाम जयचंद , मीर जाफर , विभीषण जैसे लोग भी रहते हैं जो बाहर वालों से मिलकर घर की ईंट से ईंट बजाने को व्याकुल हैं। कायदे कानून , जनता के हक़ सब इनकी मर्ज़ी पर हैं , जनता के हित पूरे करने में कोई काम नहीं आता और नेताओं का हित साधने में सब तत्पर रहते हैं। देखा जाये तो देश का कानून भी मकान के असली मालिक का कोई अधिकार नहीं समझता है , सारे कायदे कानून उनके हितों की रक्षा के लिये हैं जिनका कब्ज़ा होता है मकान पर। बस एक बार किरायेदार बन कर घुस गये तो फिर निकलने का नाम ही नहीं लेते। मालिक को किराया तक देना ज़रूरी नहीं है , केवल झूठा वादा करते हैं कि चुनाव के बाद पूरा किराया भी देते रहेंगे और मकान की देखभाल भी बराबर करेंगे। लेकिन चुनाव बीत जाने के बाद न वो याद रहता है जो कर्ज़ चुकाना है देश की मालिक जनता का न ही उसकी हालत को सुधारने का कोई प्रयास ही किया जाता है। हर बार हालत और भी खराब हो जाती है।
  

मार्च 15, 2014

POST : 422 ज़िंदा मुर्दा ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

          ज़िंदा मुर्दा ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

एक सरकारी अस्प्ताल में एक डॉक्टर और एक नर्स को निलम्बित कर दिया गया । क्योंकि उन्होंने इक ज़िंदा आदमी को मरा हुआ घोषित कर दिया था । बुद्धिजीवी लोग तो हमेशा से ये कहते रहे हैं कि जो व्यक्ति सब कुछ देख कर भी अपने स्वार्थ के लिये या डर के मारे चुप रहता है और बुराई का विरोध नहीं करता वो जीवित होते हुए भी मरा हुआ ही है । अब उनकी बात को सच मान लें तो देश में बहुमत ऐसे ही लोगों का है जो जीते जी मर चुके हैं । राजनीति में जिनको हाशिये पर धकेल दिया जाता है उन नेताओं की किसी को खबर नहीं होती कि कभी जिसकी जय - जयकार किया करते थे वो हैं भी कि स्वर्ग सिधार चुके हैं । राजनेताओं को सब से बड़ी इच्छा यही होती है कि उनको मौत सत्ता में रहते हुए कुर्सी पर ही आये ताकि उनका मातम पूरी शान से मनाया जाये ।

         हम ये खबर बहुत बार बहुत कलाकारों के बारे पढ़ चुके हैं कि अपने युग का कोई महान अभिनेता अपने जीवन के अंतिम समय गुमनामी और मुफलिसी में दिन काटता रहा । ऐसे में उन डॉक्टर और नर्स को कोई लावारिस अगर मरा हुआ लगा तो इसमें हंगामा बरपाने जैसी कोई बात नहीं थी । ज़िंदा होना ही ज़िंदगी नहीं होता । शायरी में ये आम सी बात है , आशिक प्रेमिका की बेवफाई से खुद को मरा हुआ बताते हैं । ज़िंदा हूं इस तरह कि ग़म-ए-ज़िंदगी नहीं , जलता हुआ दिया हूं मगर रौशनी नहीं । अगर रूठी हुई प्रेमिका मान जाये तो फिर से जान में जान आ जाती है । हमने तो सुना है जीना मरना बस इक सपने की तरह है , आत्मा अजर अमर है वो केवल शरीर रूपी वस्त्र बदल लेती है । वे दोनों शायद यही कामना कर रहे थे कि इसको नया शरीर मिल जाये । असल में किसी नर्स को किसी को मृत घोषित करने का अधिकार नहीं होता । शायद उसका दोष ये था कि वो मरीज़ को इतनी ज़रा सी बात नहीं समझा पाई कि जब डॉक्टर साहब कह रहे हैं कि तुम ज़िंदा नहीं हो तो तुमको उनकी बात मान खुद ही मर जाना चाहिये । अक्सर मरीज़ नर्स की प्यार से कही बात मान लिया करते हैं ।

                  यूं ऐसे भी बहुत सारे लोग हैं जिनको उनके अपनों ने ही मृत साबित कर दिया उनके नाम की जायदाद की वसीयत अपने नाम करवा कर बेचने के लिये । आजकल बैंक वाले ये प्रमाणपत्र लाने को कहते है कि मैं जीवित हूं , तभी पैंशन मिलती है । खुद डॉक्टरों को अपना पंजीकरण का नवीनीकरण ऐसा प्रमाणपत्र देकर करवाना होता है पांच वर्ष बाद । मैंने एक चाय की दुकान वाले को भी कितने लोगों को मरा हुआ घोषित करते देखा । कमाल का ढंग था उसका , उसकी ये आदत थी कि जो कोई चाय पी कर अपना बकाया नहीं चुका रहा हो बहुत दिनों से , सब के सामने उसके हिसाब के पन्ने पर लिख देता ये मर गया है । जब उसको पता चलता तब शर्मसार हो कर वो खुद पैसे दे जाया करता । लेकिन ये तीस साल पुराने युग में होता था , आजकल तो लोग शहर भर से कर्ज़ा लेकर रफूचक्कर हो जाते हैं । लोग सोचते शायद कर्ज़ों से तंग आ उसने ख़ुदकुशी कर ली है जबकि वो दूर किसी शहर में ठाठ बाठ से शान से जी रहा होता है ।
 
 ये मौत का फलसफा बड़ा ही अजीब है । कोई मरने की दुआ मांगता है लेकिन मौत नहीं आती तो कोई जानता है अब नहीं बच सकता मगर जीना चाहता है । किसी शायर ने तो कहा भी है ' मांगने से जो मौत मिल जाती कौन जीता इस ज़माने में ' । सच ये भी है कि लोग मौत के डर से जी ही नहीं रहे , रोज़ ही मरते हैं । चचा ग़ालिब भी कह गये हैं ' मौत का एक दिन मुईयन है , नींद क्यों रात भर नहीं आती ' । एक और शायर ये कहता है  ' मौत है एक लफ्ज़-ए-बेमानी , जिसको मारा हयात ने मारा ' । शायर दुष्यंत कुमार कहते हैं  ' आप बचकर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं , रहगुज़र घेरे हुए मुर्दे खड़े हैं बेशुमार ।  
 
 दुष्यंत कुमार 🌻 पूरी ग़ज़ल पढ़ें। 👇 अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार  घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार आप बच कर चल सकें ऐसी