जश्न मनाओ फ़रमान है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया
जान है तो जहान है देश में आया हुआ तूफ़ान है
सभी को खाना लाज़मी आज ख्याली पकवान है
नाचती है ज़मीन भी झूमता हुआ इक आसमान है
सत्ता के मन भाता बहुत खुशियों का समूहगान है
राजा विक्रम सिंह ने भी जारी किया फ़रमान था
भेस बदल कर निकला देखने मुआयना करने गया
ढोल नगाड़े बज रहे थे हर तरफ़ दिखावे की ख़ुशी
इक मोची अपनी चप्पल सी रहा भीगी आंखे लिए
राजा क्रोध में उसके पास गया क्यों रो रहे बताओ
शाही फ़रमान के उलंघन की मिलेगी सज़ा को पाओ
मोची बोला मेरी बेटी है बहुत बीमार पैसे नहीं पास
सज़ा दो है मंज़ूर झूठी ख़ुशी नहीं मना सकता हज़ूर
सामने था सच जिसको दुनिया से छुपाया था आपने
झौंपड़ी जलाई कितनी थी जब महल बनाया आपने
आपके जलाये दीप जितने कुछ देर में बुझ ही जाएंगे
आपकी कैसी ख़ुशी जनता को हर दिन सताया आपने
कहानी में राजा को हुआ भूल का अपनी एहसास था
आपने लेकिन दिया भगवान राम को दूसरा बनवास था
आपने हर तरफ़ चलाई है गर्म हवाएं कहकर के मधुमास
पछताते हैं नकली चमक दमक देख किया था विश्वास
आपका जवाब नहीं मगर जनता पूछती इक सवाल है
कुछ लोगों की रईसी अधिकांश जनता हुई बदहाल है
आपकी राजनीति सबको लगती करती बड़ा कमाल है
सत्ता की मनमानी हमेशा चलती रहती बेढंगी चाल है
जूतों में बंटती दाल है ( कविता )
अब तो ऐसा हाल है जूतों में बंटती दाल है
मर गए लोग भूख से सड़ा गोदामों में माल है ।
बारिश के बस आंकड़े सूखा हर इक ताल है
लोकतंत्र की बन रही नित नई मिसाल है ।
भाषणों से पेट भरते उम्मीद की बुझी मशाल है
मंत्री के जो मन भाए वो बकरा हलाल है ।
कालिख उनके चेहरे की कहलाती गुलाल है
जनता की धोती छोटी है बड़ा सरकारी रुमाल है ।
झूठ सिंहासन पर बैठा सच खड़ा फटेहाल है
जो न हल होगा कभी गरीबी ऐसा सवाल है ।
मर गए लोग भूख से सड़ा गोदामों में माल है ।
बारिश के बस आंकड़े सूखा हर इक ताल है
लोकतंत्र की बन रही नित नई मिसाल है ।
भाषणों से पेट भरते उम्मीद की बुझी मशाल है
मंत्री के जो मन भाए वो बकरा हलाल है ।
कालिख उनके चेहरे की कहलाती गुलाल है
जनता की धोती छोटी है बड़ा सरकारी रुमाल है ।
झूठ सिंहासन पर बैठा सच खड़ा फटेहाल है
जो न हल होगा कभी गरीबी ऐसा सवाल है ।
घोटालों का देश है मत कहो कंगाल है
सब जहां बेदर्द हैं बस वही अस्पताल है ।
कल जहां था पर्वत आज इक पाताल है
देश में हर कबाड़ी हो चुका मालामाल है ।
बबूल बो कर खाते आम हो रहा कमाल है
शीशे के घर वाला रहा पत्थर उछाल है ।
चोर काम कर रहे पुलिस की हड़ताल है
हास्य व्यंग्य हो गया दर्द से बेहाल है ।
जीने का तो कभी मरने का सवाल है
ढूंढता जवाब अपने खो गया सवाल है ।

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