जुलाई 25, 2018

POST : 850 सिंघासन पर अंधेरों का डेरा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     सिंघासन पर अंधेरों का डेरा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   उसने ठान ली है मेरे को ही चुनना होगा।  मेरे गले में वरमाला नहीं डालोगी तो ज़िंदा नहीं बचोगी। बहुत बहाने बनाये अभी वक़्त तो आने दो। पर उसको डर लग रहा है तुम मेरे साथ खुश नहीं हो लगता है तेरे चेहरे की उदासी से खुश्क लबों से जर्द हुए गालों के रंग से। जब तुम पर आशिक़ हुआ तो गुलाबी था चेहरा खिलखिलाती हंसी थी , वादा किया था लाऊंगा अच्छे दिन , तुम मानती क्यों नहीं यही तो होते हैं अच्छे दिन। मेरे सिवा कौन है जिसे तेरी चिंता है , बस मैं ही मैं हूं ध्यान से देखो। किसकी मज़ाल है तेरा सपना भी देखे। मेरा प्यार ऐसा ही है पुराने ढंग वाला मेरी गुलामी को अपना भाग्य समझोगी तभी जी सकोगी। गली में इक बच्चा खिलौने से खेल रहा था , मैंने कहा ये मुझे पसंद है मुझे दे दो मुझे चाहिए जो मुझे पसंद हो। जब उसने नहीं दिया तो छीन लेना चाहा और छीन नहीं पाया तो तोड़ डाला। मेरा नहीं तो उसके पास भी नहीं , किस मां के पास जाकर रोएगा। है किसी की मज़ाल जो मुझे रोके टोके। तुम समझ जाओ चाह कर भी कुछ भी कर पाओगी। पिंजरे को अपना स्वर्ग मान लो और मेरी कैद में ख़ुशी से रहो , चह चहाओ ताकि सब को लगे मेरे साथ रहकर तुम खुश हो बहुत। आज़ाद होने की बात भूल कर मन में नहीं लाना , पिंजरे से प्यार करोगी तो अच्छा लगेगा। सोने का बनाया है पिंजरा मैंने , देख लो कितने टीवी चैनल वाले मीडिया वाले खुश हैं और मेरी खिलाई हरी हरी मिर्च खाने के बाद दिन भर मेरा ही नाम जपते हैं। जो मुझको हो पसंद वही बात कहते हैं खुश रहते हैं। 
 
                     मुंह पर पट्टी बंधी है बोल नहीं सकती सुन सकती है देख रही है। जिस को अपना घर बताता है उसी को आग लगाने की तैयारी चल रही है। सत्ता की देवी का आशिक़ है सरफिरा है , दिल आ गया है तो अपहरण कर कैद में जकड़ रखा है। प्यार से बहाने से बुला लाया था मगर अब वापस नहीं जाने देता। घुट घुट कर मरना होगा साफ कहता है मगर चुप भी रहना होगा , हर ज़ुल्म सहना होगा। लगता है इक्कीसवीं सदी नहीं उन्नीसवीं सदी वापस आ गई है। ताकत से जंग लड़कर अपहरण कर किसी को अपनी  दासी बना सकते हैं। महिलाओं को बराबरी के अधिकार क्या सुरक्षा भी हासिल नहीं और जो मर्ज़ी आरोप लगाकर सूली चढ़ा देते हैं। ये कैसे नियम बना लिए अपनी सुविधा से कोई और करता था तो लुटेरा अपराधी मगर खुद करें तो देश की सेवा। घनी अंधेरी रात को दिन घोषित कर रहे हो , किस किस पर झूठे आरोप धर रहे हो। इतिहास बनाने की चाहत अधूरी रही तो इतिहास को ही बदल रहे हो , अपनी मर्ज़ी की कहानियां घड़ रहे हो। वादा हर दिन हर सुबह करते हो हर शाम मुकर रहे हो। मदर इंडिया फिल्म को देख देख मचल रहे हो , नरगिस पर और मासूमों पर सितम पे सितम कर रहे हो। नया बनाना नहीं आता पुराने को भी बर्बाद कर रहे हो। नया ज़माना फिल्म का गीत सुनो फिर सोचो क्या होना चाहिए था तुम क्या कर रहे हो। 



कितने दिन आंखे तरसेंगी , 
कितने दिन यूं दिल तरसेंगे , 
इक दिन तो बदल बरसेंगे।
ऐ मेरे प्यासे दिल , 
आज नहीं तो कल महकेगी खुशियों की महफ़िल ।
नया ज़माना आएगा , नया ज़माना आएगा ।

ज़िंदगी पर सब का एक सा हक हो , 
सब तसलीम करेंगे , 
सारी खुशियां सारे दर्द बराबर हम तकसीम करंगे ।
नया ज़माना आएगा , नया ज़माना आएगा ।

सूने सूने से मुरझाये से हैं क्यों उमीदों के चेहरे , 
कांटों के सर पर ही बांधे जाएंगे फूलों के सेहरे ।
नया ज़माना आएगा , नया ज़माना आएगा ।

नया ज़माना फिल्म की कहानी :-

मुझे याद है आपको भूल गई तो दोबारा याद दिलवाना ज़रूरी है। उपन्यास लिखता है नायक जो इक गरीब है मगर धोखे से अपने नाम से छपवा कर गरीबों का दुःख दर्द समझने की शोहरत हासिल कर लेता है इक उद्योगपति धनवान। नायिका खुश हो जो गीत गाती नज़र आती है वास्तव में गरीब नायक के लिखे को उसके पिता ने अपने नाम से छपवा लिया है। धोखेबाज़ और चालाक चालबाज़ लोग यही किया करते हैं , भले और ईमानदार होने की नकाब लगाकर छल कपट धोखा सब करते हैं। फ़िल्मी कहानियों में आखिर में खलनायक नायिका को पाने को दंगा फसाद गोली चलाने से घर को आग के हवाले करने तक सब करता है मगर हार खलनायक की तय होती है। नायक सच की राह चलते हैं उनको हार का डर नहीं होता न जीत कर अहंकारी बनते हैं। बहुत फ़िल्में फिर से बनाई गई हैं , मदर इंडिया और नया ज़माना फिर से बनाये कोई। हां गुरुदत्त की प्यासा और कागज़ के फूल भी। क्योंकि सवाल बाकी हैं :-

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां हैं ? कागज़ के फूल हैं इस ज़माने में । 

पाबंदी लगा देना फिर से , ये भी इतिहास है किसी गीत पर पाबंदी लगाई गई थी। कहां हैं जिनको नाज़ है हिन्द पर देखें क्या नाज़ करोगे इस पर जिस में अभी भी असमानता है भूख है अन्याय है अत्याचार है। 
 
 Ayega Naya Zamana - Ahsan Masih - CARAVS Song - YouTube

जुलाई 24, 2018

POST : 849 अदब वालों की बातें ( लिखने वालों की बात ) आलेख - डॉ लोक सेतिया

      अदब वालों की बातें ( लिखने वालों की बात )  आलेख 

                                      डॉ लोक सेतिया 

     पिछले सप्ताह इक लिखने वाले दोस्त का फोन आया , अमुक दिन उस समय पर आपके शहर में आना है , आप जो भी लिखने वाले हैं उनको बुला लेना। मैंने कहा कुछ कारण है , कारण क्या है उनको बता भी दिया , इसलिए मैं और लोगों को नहीं बुला सकता मगर आप ने कहा है मुझे मिलना है तो मुझे बता दो किस जगह आपका आयोजन है मैं मिलने ज़रूर आऊंगा। उस शाम तक उनके फोन की इंतज़ार रही , उसके बाद निगाहें घर की चौखट पर लगी रहीं मगर नहीं आने वाले नहीं आये। समझ गया मगर अभी भी नासमझ ही रहना चाहता हूं। यही होता है बार बार , हर किसी को अपना रुतबा बढ़ाना होता है मिलने की चाहत नहीं होती है। जो उनको चाहिए मिलता नहीं तो बात खत्म , मगर अदब की बात करते हैं बेअदबी कहना उचित नहीं होगा। आज फिर बीस पच्चीस साल पहले की बात याद आई , इक देश भर में प्रख्यात लिखने वाले से उनके घर जो कि किताबों के प्रकाशन का पता भी था , अपनी किताब छपवाने को गया। जाने कैसे तब मेरे पास पैसे थे जेब में पांच दस हज़ार जो तब काफी थे किताब छपवाने को। उनका पहला सवाल था आप कार से आये होंगे तो कार पार्किंग की जगह लगाई है या नहीं। मैंने बताया मेरे पास कार नहीं है मैं 225 किलोमीटर दूर बस से आया और बस स्टॉप से रिक्शा लेकर आया हूं। गर्मी के दिन दोपहर की बात थी मगर उन्होंने मुझे प्यास लगी थी मगर पानी भी नहीं पूछा। तब मैंने लिखा था मैं बे-कार नहीं हूं जब खुद कार खरीद ली थी उनकी बात से नहीं। मगर मैंने उनसे निवेदन किया था आप मेरा लिखा पढ़ कर राय दो मुझे किताब छपवानी चाहिए अथवा नहीं। वो बोले भाई हिंदी की किताब पढ़ता कौन है , ये तो आपको खुद पैसे खर्च कर छपवा कर दोस्तों में बांटनी है अपने लेखक होने का प्रमाण हासिल करने को। समझा कि नहीं छपवानी चाहिए और लौट आया था , उन्होंने किताब छापने का दाम बता दिया था। सलाह मांगी थी इसलिए उन्होंने एक ही राय दी थी कि किसी एक विधा में लिखा करो। आप व्यंग्य भी लिखते हो , ग़ज़ल भी , कविता - नज़्म भी , कहानी भी लिखते हो , साथ में आलेख भी सम सामयिक विषयों पर , ऐसा उचित नहीं। मगर उनकी सलाह मानना मेरे लिए कठिन ही नहीं असंभव भी था। शायद नहीं करना चाहिए था जो किया , इक नज़्म लिखी थी और उनके भेज भी दी थी। 

      बैठे थे उनके घर में उनसे मगर अनजान थे , उठ गये महफ़िल से वो ऐसे कद्रदान थे। 

सालों बाद उनसे बात हुई किसी विषय पर उनको पता चला मैं भी उन दिनों गुड़गांव में हूं तो घर आने को कहा। कहा आपके घर आया था जब दिल्ली में रहते थे आप मगर उनको भूल गई मुलाकात मुझे याद रही। उसके बाद समझ लिया था बड़े नाम वालों से मिलने से बचना ही अच्छा होगा। उसके बाद इसी तरह के कड़वे अनुभव मिलते ही रहे हैं। लोग मुझे उपयोग करते रहे अपनी ज़रूरत पूरी कर भूल जाते रहे। कितनी बार किसी शहर से मेरे शहर आने पर मुझे बताया कि आपके शहर में किसी सभा में कविता पाठ करने आना है आप भी आ जाना बिना आयोजकों के बुलावे भी। मेरे घर अधिकार समझ आने वाले घर की तरह रह कर अपना कार्य करवाने वाले जब भी उनके शहर गया तो घर पर चलने की बात नहीं की। आपको मूर्खता लग सकती है कि उनके काम में लेखन में सहयोग देने का काम भी महमाननवाज़ी भी और जाते जाते उनकी पसंद की कोई चीज़ अपनी जेब से खरीद कर देने का काम बार बार करता रहा ख़ुशी ख़ुशी। बीस साल के रिश्ते का हासिल उन्होंने खुद ही अपने कार्यक्रम में बुलाकर अपमानित करने का काम किया ये कहकर कि आज केवल उन्हीं को बोलना है जो हिंदी दिवस पर कोई रचना लिखकर लाये हैं , आप ग़ज़ल नहीं पढ़ सकते। मगर फिर किसी के समझाने पर कहा चलो आप बाहर से आये हैं सुना सकते हैं मगर समय सीमा है। लोग घंटा घंटा आलेख पढ़ रहे थे मगर सीमा की बात मेरे लिए कही गई। अदब इसी को कहते हैं। 
 
            इक सरकारी अधिकारी शहर से तबादला होने पर जाने लगे तो मुझे घर बुलाया और इक चेक दिया ताकि उनके जाने के बाद उनको महमान की तरह बुलाने को आयोजन किया जाये उनको सम्मानित किया जाये। नहीं लिया था चेक उनको वापस कर दिया था क्योंकि वो रेड क्रॉस का पैसे का गलत उपयोग हो रहा था। अगर आप मूल्यों की बात सच की नैतिकता की बात लिखते हैं मगर खुद जीवन में पालन नहीं करते तो लिखने का मकसद क्या है। एक संस्था ने मुझे कवि सम्मेलन आयोजित करने में सहयोग मांगा तो एक लेखक को बता दिया सब की तरह कि एक हज़ार की राशि हर कवि को संस्था देगी। मगर वो कहने लगे मैं टेक्सी या कार से आने जाने का किराया और दिलवा सकता हूं कोशिश कर के। मगर मुझ से ये होता नहीं और मना किया तो कहने लगे आप उनसे ठेका तय कर लो या मुझसे बात करवा दो मुझे आता है ये करना।  क्षमा मांग ली थी क्योंकि मुझे ऐसा करने में सभी लिखने वालों का अपमान लगा था। बुलाने वाला जो देना चाहता है वो सम्मान है और आपको राशि थोड़ी लगती है आप इनकार करें आपका हक है , मगर सदबाज़ी नहीं। मैं इक ठेकेदार दादा जी का पोता और ठेकेदार पिता जी का बेटा होने के बावजूद भी ठेकेदारी के गुण नहीं सीख सका। अब लेखक बनकर वापस जाना संभव नहीं है। घटनाएं बहुत हैं मगर निष्कर्ष वही है हर कोई खुद को दूसरे से बड़ा समझता है या दिखाना चाहता है। आखिर में इक शेर मेरी ग़ज़ल का मतला भी है :-

                      पूछा उन्हें जाना किधर चाहते हैं ,

                        कहने लगे बनना खबर चाहते हैं। 


 


जुलाई 23, 2018

POST : 848 मुझे मिल गया उसका पता ( झूठी बात ) डॉ लोक सेतिया

      मुझे मिल गया उसका पता ( झूठी बात ) डॉ लोक सेतिया 

     ईश्वर खुदा यीसुमसीह वाहेगुरु आप सभी तलाश करते रहे। मगर खुद उसने मुझे तलाश कर लिया है। आप कहोगे फिर झूठी बात क्यों लिखा है शीर्षक। उसी ने कहा है किसी को मत कहना यहां तक कि खुद उसे भी ऐसे नहीं प्यार के किसी नाम से संबोधित करूं। अब उसकी बात नहीं मानूंगा तो किसकी मानूंगा। वैसे भी सच्ची बात लिखता तो कोई यकीन नहीं करता क्योंकि आदत हो गई है झूठी बात सुन कर उसे सच समझने की। अब मुझे कहीं नहीं जाना मंदिर मस्जिद गिरजा घर न गुरूद्वारे। वो है ही नहीं उन सब जगहों से उसको कब का निकाल दिया गया है। सुनो इक ग़ज़ल :-

                            कहां तेरी हक़ीकत जानते हम हैं ,
                            बिना समझे तुझे पर पूजते हम हैं।

                           नहीं फरियाद करनी , तुम सज़ा दे दो ,
                            किया है जुर्म हमने , मानते हम हैं।

                            तमाशा बन गई अब ज़िंदगी अपनी ,
                            खड़े चुपचाप उसको देखते हम हैं।

                            कहां हम हैं , कहां अपना जहां सारा ,
                            यही इक बात हरदम सोचते हम हैं।

                            मुहब्बत खुशियों से ही नहीं करते ,
                            मिले जो दर्द उनको चाहते हम हैं।

                           यही सबको शिकायत इक रही हमसे ,
                           किसी से भी नहीं कुछ मांगते हम हैं।

                           वो सारे दोस्त "तनहा"खो गये कैसे ,
                           ये अपने आप से अब पूछते हम हैं।


                     समझना है कि उसका पता ठिकाना है कहां।

                               ढूंढते हैं मुझे , मैं जहां  नहीं हूं  ,
                               जानते हैं सभी , मैं कहां नहीं हूं ।
  
                              सर झुकाते सभी लोग जिस जगह हैं ,
                              और कोई वहां , मैं वहां नहीं हूं ।

                              मैं बसा था कभी , आपके ही दिल में ,
                              खुद निकाला मुझे , अब वहां नहीं हूं ।
 
                             दे रहा मैं सदा , हर घड़ी सभी को ,
                            दिल की आवाज़ हूं ,  मैं दहां  नहीं हूं ।

                             गर नहीं आपको , ऐतबार मुझ पर ,
                            तुम नहीं मानते , मैं भी हां  नहीं हूं ।

                              आज़माते मुझे आप लोग हैं क्यों ,
                              मैं कभी आपका इम्तिहां  नहीं हूं ।

                             लोग "तनहा" मुझे देख लें कभी भी ,
                             बस नज़र चाहिए मैं निहां  नहीं  हूं।

लोग गलत पते पर चिट्ठियां डालते रहे और उसके नाम पर इमारतें बनाने वाले बाहर उस का नाम लिख कर वास्तव में भीतर खुद उसकी जगह लेते रहे। डाकिया बेचारा आपकी चिट्ठी उसी गलत पते पर देता रहा और वो सारी डाक को सरकार के बाबुओं की तरह रद्दी की टोकरी में डालते रहे। मैंने उसके बारे क्या क्या नहीं लिखा , पढ़कर उसको मेरे पास आना ही पड़ा। बताना पड़ा जो जो भी गलत हो रहा है उसमें मेरा कोई हस्ताक्षेप नहीं है। बेबस हो गया है , मगर मुझे समझा दिया है मुझे इधर उधर कहीं भी भटकना नहीं है। उसने वादा किया है हर पल मेरे साथ रहने का। मैंने भी उसको कह दिया कि आपकी हर बात स्वीकार है केवल एक बात को छोड़कर , वो ये कि मुझे लिखने में कोई दखल पसंद नहीं है। भले आपको अच्छा नहीं लगता तो मत पढ़ना , जो पढ़ते हैं उन्हीं पर कब कोई असर हुआ है। देखिये आपको मेरे पास नहीं आना उसका पता ठिकाना जानने को , आपको इशारे इशारे से समझा देता हूं। आपके बेहद करीब है वो बस पहचान लो कोई है जिसमें आपको भगवान अल्ला यीसू वाहेगुरु नज़र आता है , ध्यान से देखना उस इंसान को प्यार करना खुश रखना। घर से बाहर भी हो सकता है या आपके घर ही में। आपका कोई दोस्त या भाई पिता या माता या पत्नी कोई भी हो सकता है। हर किसी में उसी को देखना तो सब अच्छे लगने लगेंगे। मिलेगा खुद आपके पास आएगा किसी दिन इंतज़ार करना आखिरी सांस तक। मिले तो उससे बिछुड़ना नहीं कभी किसी भी कारण से।

 

POST : 847 मेरी आत्मकथा की लघुकथा ( दास्तां ) डॉ लोक सेतिया

      मेरी आत्मकथा की लघुकथा ( दास्तां ) डॉ लोक सेतिया 

     कोई चीज़ नहीं मांगता , जो भी मिल जाये उसी में खुश हो जाता। किसी खिलौने की मिठाई की ज़िद नहीं करता। जैसे कहता हूं वैसा ही मानता भी है। मगर पिता जी को अच्छा नहीं लगता क्योंकि जैसा वो चाहते बेटा वैसा है नहीं। धन दौलत ज़मीन का हिस्सा नहीं मांगता , अपनी परेशानी बताता भी नहीं और चुप चाप हालात से समझौता कर लेता है। थोड़ा भावुक है और ज़रा सी बात पर उदास हो जाता है। बहुत समझाया तुम किसी काबिल नहीं हो बाकी सब के बच्चे समझदार हैं दुनियादारी समझते हैं पर समझे तब ना। जाओ अपना घर अलग बना लो कहा तो उदास हुआ मगर मान गया। क्या दिया क्या नहीं कोई सवाल भी नहीं। कहते हैं मां भी खिलाती पिलाती है जब बच्चा रोता है। इसको कुछ नहीं चाहिए पिता जी को भी लगता रहा। मैं जो चाहता था किसी के पास था ही नहीं कोई देता भी कैसे मुझे थोड़ा सा भी प्यार। यही तलाश करता रहा जो किसी और दुनिया में मिलता होगा इस जहां में तो कहीं नहीं मिला। जिसको मिला उलझन में पड़ गया वही , छोड़ने की कोई वजह नहीं समझ आई और रखने की कोई ज़रूरत भी नहीं। दोस्तों को जब ज़रूरत हुई इस्तेमाल किया खिलौना जान कर बाद में भूल गये किस जगह रखा था खिलौना। सब के लिए अनचाहे बंधन की तरह साथ रहा मैं। सब को गिला है सभी को शिकायत भी है कि जो उनको चाहिए नहीं दिया मैंने। मुझे कुछ नहीं चाहिए था कोई शिकायत नहीं है , पर सोचता हूं कभी कोई तो होता जिस के दिल में मुझे थोड़ी सी जगह मिल जाती इक कोने में। इतनी सी दास्तां है मेरी जिसे किस को सुनाऊं यही सोचता हूं। कौन समझेगा। 
 

 

जुलाई 22, 2018

POST : 846 अब तो कोई मज़हब ( गोपालदास नीरज के नाम ) डॉ लोक सेतिया

अब तो कोई मज़हब ( गोपालदास नीरज के नाम ) डॉ लोक सेतिया 


                                    कुछ तो सीखो मुझसे यारो 

    जितना कम सामान रहेगा , उतना सफर आसान रहेगा। जितनी भारी गठड़ी होगी , उतना तू हैरान  रहेगा। उस से मिलना नामुमकिन है , जब तक खुद का ध्यान रहेगा। हाथ मिले और दिल न मिले , ऐसे में नुकसान रहेगा। जब तक मंदिर और मस्जिद हैं , मुश्किल में इंसान रहेगा। नीरज तो कल यहां न होगा , उसका गीत विधान रहेगा। 

     आज शायद इस से बेहतर कोई संदेश नहीं हो सकता है। हर मिसरा ही नहीं हर इक शब्द तक कल भी सार्थक था आज भी सार्थक है और सदियों बाद भी सार्थक रहेगा। उन्हीं के शब्दों में , इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में , तुमको सदियां लग जाएंगी हमें भुलाने में। नीरज जी तो याद रहेंगे मगर क्या उनके गीतों का संदेश भी याद रखेंगे हम लोग। चलो इस बहाने आज समझते हैं धर्म को और देशभक्ति को भी , इधर बड़ी बहस होती है कौन असली देशभक्त है कौन नकली। धर्म भी शामिल कर लेते हैं देश से मुहब्बत से बड़ा धर्म क्या हो सकता है। 
 
             देश क्या है , ज़मीन नहीं होता देश , देश है देश के सवा सौ करोड़ लोग। अगर आप देश से प्यार करते हैं तो सभी देशवासियों से मुहब्बत करते होंगे , नहीं करते तो देश से नहीं प्यार कुछ और है। ये कैसे हो सकता है कि हमारे ही देश में करोड़ों लोग भूखे हों और कुछ लोग खाना बर्बाद करते हों। वास्तव में जैसा गांधी जी ने और हर धर्म में बताया गया है कुदरत ने सभी की ज़रूरत को बहुत कुछ दिया है लेकिन किसी की हवस पूरी करने को नहीं दिया है काफी। हमारी हवस मिटती ही नहीं चाहे जितना जमा हो जाये। आप जिनको बेहद रईस समझते हैं वास्तव में धर्म उनको सब से दरिद्र बताता है , जिस के पास बहुत कुछ पास है मगर फिर भी और अधिक पाने की चाहत है। इस नज़र से देखोगे तो समझोगे वास्तविकता क्या है , देश प्रेम और सच्चा धर्म यही है। जो नेता हर दिन खुद अपनी शानो-शौकत पर लाखों करोड़ों खर्च करते हैं और साथ में देश जनता की सेवा का दम भी भरते हैं वो देश समाज जनता को देते कुछ भी नहीं बल्कि देश पर खुद इक बोझ की तरह हैं। यही तमाम धार्मिक स्थलों की बात है जिनको बताया जाता है लाखों का चढ़ावा आता है और धन सम्पति हीरे जवाहरात सोने चांदी के अंबार लगे हैं अगर यही धन दौलत भूखों की भूख और रोगियों के उपचार या शिक्षा या गरीबों की सहायता में खर्च नहीं किया जाता तो उसको धर्म नहीं कह सकते हैं। बात सरकार अमीर उद्योगपतिओं और धनवानों की नहीं है और न ही करोड़ों की आमदनी से थोड़ा भाग अपनी शोहरत को दान देने वाले जाने माने लोगों की ही है। आप हम ज़रूरत से अधिक आय होने पर अपनी ख्वाहिशें बढ़ाते जाते हैं और जितनी भारी गठड़ी होगी उतना तू हैरान रहेगा , नीरज जी की बात को नहीं समझते हैं। अपने आस पास बहुत लोग हैं जिनको जीने को थोड़ा चाहिए , किसी धार्मिक स्थल पर चढ़ावा देने या मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरुद्वारा बनाने को दान देने से कहीं अच्छा ये इंसानियत का धर्म अपनाना होगा। आप केवल मनोरंजन पर या अपने सपने पूरे करने पर जितना धन खर्च करते हैं अपनी ख़ुशी की खातिर वही क्या देश को अर्पित कर सकते हैं। मतलब देश के लोगों की सहायता करने से आप को वास्तविक ख़ुशी और सच्चा धर्म का कार्य कर सकते हैं। अधिक नहीं अगर जैसा कुछ धर्मों में दशांश बिना किसी को बताये ज़रूरतमंद लोगों को दे सकते हैं बेशक जितना भी थोड़ा हिस्सा आप मन से तय कर लें पांच फीसदी भी अगर दस नहीं मगर देश की भलाई को कुछ योगदान आप भी हम सभी दे सकते हैं। गोपालदास नीरज जी को इस से बड़ी श्रद्धांजलि कोई नहीं दी जा सकती है।



POST : 845 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 6 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 6

                                   डॉ लोक सेतिया 

 इस से पहले कि शुक्रवार की कहानी की बात की जाये , आपसे इक सवाल करना चाहता हूं। जवाब अपने मन में सोच लो फिर समझना मुझे क्या क्यों लगा। मान लो आप या मैं अथवा कोई भी और किसी दोस्त या अनजान व्यक्ति के निधन के बाद अनाथ हो गये किसी बच्चे को पालन पोषण के लिए लाते हैं तो अगर वो इक छोटी सी बच्ची है आपके बेटे के बराबर की और उसे बेटी की बड़ा करते हैं तो आपकी नज़र में आपका बेटा और अपनाई हुई बेटी भाई बहन जैसे लगते होंगे या जवान होने पर उन को विवाह के बंधन में बांध कर पति पत्नी बनाना चाहोगे और वो भी लड़की से बिना पूछे। इतना ही नहीं अगर उस बेटे को मालूम हो कि लड़की किसी और से मुहब्बत करती है तब भी नाटकीय ढंग से मां के गंभीर बिमारी की अवस्था में अंतिम इच्छा को मानकर उस से दिखावे को ही सही विवाह कर लोगे। मगर जब वो मां भी बिल्कुल ठीक हो जाती हैं तो ये जानकर कि उन दोनों में पति पत्नी का संबंध नहीं है फिर से इक मांग सामने रख सकती हैं कि मुझे पोता या पोती चाहिए और जब तक नहीं होता मैं एक समय उपवास रखूंगी। यहां भी अपनी पहली गलती को और बढ़ाते हुए अपने पर किये उपकार के बदला चुकाने को लड़की सोचती है कि जिस से मुहब्बत करती है और बाद में दिखावे की शादी को छोड़ जिसकी पत्नी वास्तव में बनना चाहती है उस से संतान पाकर मां की ये इच्छा भी पूरी करे। स्टुडिओ के दर्शक से लेकर एंकर तक इस सामाजिक संबंध की बात करते क्या सोचते भी नहीं। ये आम बात नहीं है आज की बिगड़ती सामाजिक व्यवस्था को दर्शाती है जिस में खून के रिश्ते को छोड़ बाकी सब लड़कियां कुछ भी समझी जा सकती हैं बहन नहीं। विरोधाभास की बात नहीं है कि हरियाणा में जाट समुदाय में गांव के गोत्र में विवाह नहीं करना उचित समझते। अपने पिता माता और नानी के गोत्र के साथ गांव में जिस गोत्र को महत्व देते हैं उसके लड़के लड़की भाई बहन समान समझते हैं। इसे आप कठिन समझते हैं आधुनिक युग में तो सही है मगर एक घर में साथ साथ पले बढ़े बच्चे दोस्त या भाई बहन की तरह ही आपस में नाता स्वाभाविक समझते हैं। गांव में अभी भी गांव की लड़की को इसी निगाह से देखना पसंद किया जाता है। 
 
                     शायद अब कहानी आप समझ गये होंगे दोहराना नहीं ज़रूरी है। जब लड़की अपने आशिक से शरीरिक संबंध की बात करती है तो वो इसे बेहद आपत्तिजनक मान कर इनकार कर रिश्ता तोड़ने की बात करता है। अपनी जगह वो शत प्रतिशत सही है , विवाह को इक खेल तमाशा बना देना हमारे समाज में बेहद अनुचित है। शादी कर जिस के साथ रहती है उस को छोड़ अपने आशिक के बच्चे की मां बनना तो ममता शब्द को भी अपमानित करना है। मगर जब प्रेमी नहीं मानता तब जिस से दिखावे की शादी की थी उसी से गले में मंगलसूत्र पहनने की बात कर पति पत्नी बनकर संतान पैदा करने की बात करती है। मगर अब हैरानी की बात है कि लड़का बताता है वो तो हमेशा उसी को चाहता था मगर कह नहीं पाया लेकिन मां को शायद समझ आ गया था तभी उसने गंभीर बिमारी में ये वचन मांगा था। लो जी ये सुखद अंत है। मगर इस से आप समाज को कोई भी अच्छा संदेश कदापि नहीं दे सकते हैं। ये क्या हो गया है कहानीकार को टीवी चैनल वालों को और ऐसी कहानी देख कर तालियां बजाने वालों को। इस से अधिक कुछ भी कहना संभव ही नहीं है। खेदजनक बात है , मार्गदर्शन नहीं राह से भटकाती हैं ये कथा कहानियां। 

 

POST : 844 विश्वास नहीं है पर बहुमत है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      विश्वास नहीं है पर बहुमत है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   सवाल गंदुम जवाब अदरक। बात कुछ पूछी आपने बात ही बदल दी। तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान ए शायर को , ये एतिहात ज़रूरी है इस बहर के लिए। मेरे पास मां है के फ़िल्मी जुमले की तरह मेरे पास संख्या बल है। ये इतिहास भी कमाल दिखाता है , कभी संख्या बल नहीं था फिर भी वाजपेयी जी दिल जीत गये थे। उनकी हार में जीत थी विरोधी भी अफ़सोस कर रहे थे कि एक अच्छे आदमी का ये बुरा अंजाम क्यों हुआ। मैंने कुछ ऐसे भी गरीब देखे हैं जिनके पास दौलत के सिवा कुछ नहीं होता , आपके पास सांसद हैं जनता का विश्वास नहीं है सब जानते हैं। झूठ का शोर कितनी देर तक काम आएगा। इक बात है कहावत नहीं है नियम है कि लोकराज लोकलाज से चलता है , आपने किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया है , सवालों को हवा में उड़ा दिया है। धुआं बनाके हवा में उड़ा दिया मुझको , मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझको। खड़ा हूं हाथ में रोटी के चार हर्फ़ लिए , सवाल है कि किताबों ने क्या दिया मुझको। आपने शिक्षित युवा के साथ मज़ाक किया है पकोड़े बेचने की सलाह के सिवा आपके पास कोई उपाय नहीं और जो मज़दूर हैं किसान हैं उनके लिए आपकी आंखों में नमी भी नहीं है। एक खलनायक की कटु मुस्कान पर , हो गए दर्शक फ़िदा अच्छा लगा। आईने में देखना अच्छा लगा , अपना अपना चौखटा अच्छा लगा। अपनी सूरत पे फ़िदा होते हैं , लोग खुद अपने खुदा होते हैं। चार साल में क्या इस मानसिकता से चार सौ साल में भी देश को अच्छे दिन नहीं हासिल हो सकते हैं। आपके लिए चुनावी जुमला था जनता के लिए इक सपना था जिसको आपने ही चूर चूर कर दिया। सबका साथ सबका विकास का नारा बदलकर जो हमारे साथ केवल उन्हीं का होगा विकास बना दिया है। विपक्ष छोटा बच्चा लगता है आपको , मगर इक बच्चा जब कहता है राजा नंगा है तो बहुमत का झूठ टिकता नहीं है। सच घटे या बढ़े तो सच न रहे , झूठ की कोई इन्तिहा ही नहीं। ऐसी सरकार से बड़ी सज़ा ही नहीं , जुर्म जनता का क्या है पता ही नहीं। 
                   ( शायर से क्षमा याचना के साथ बदलाव किया है ) ।
 
       विपक्ष के किसी भी नेता की बात का जवाब मिला ही नहीं। राहुल जी आंख से आंख नहीं मिलाने की बात जब कह रहे थे आप हंस रहे थे मगर जब जवाब दिया तो वही घटिया डायलॉग खुद को गरीब वंचित बताने का मगर उपहास की तरह। ये वास्तव में क्रूर मज़ाक था गरीब और शोषित लोगों के साथ , 22 साल से सत्ता पर बैठा नेता ( इसमें गुजराज भी शामिल है ) खुद को अभी भी कुचला हुआ बताता है मगर सब को कुचलना चाहता है। भगवान को छोड़ो खुद अपनी आत्मा का सामना करोगे तो खुद पर रहम नहीं हंसी आएगी। मगर आपको शायद देश की संसद सिनेमा हाल की तरह लगती है तालियां शोर और मुनाफा कमाना। जो लोग देशभक्त होते हैं या हुए हैं उन्होंने अपना सभी कुछ देश को दिया था जान भी आज़ादी के लिए मगर कोई मुनाफा नहीं चाहते थे। आपको कितना चाहिए , कोई हिसाब है खुद पर कितना धन खर्च किया। कितना पैसा विदेशी यात्राओं पर बेकार बर्बाद किया , कितना धन अपनी झूठी शान बढ़ाने पर सरकारी विज्ञापनों पर लुटाया मीडिया वालों को। बेशक विकास हुआ है आपके दल के आलीशान दफ्तर दिल्ली से लेकर सभी राज्यों में बन गये हैं , बिल्कुल ठीक जैसे कांग्रेस को कहते हो सत्तर साल में जो नहीं किया आपने चार साल में खड़ा कर लिया अपने दल के लिए ही। जनता के लिए घर केवल कागज़ों पर कागज़ की नाव की तरह। कागज़ी नाव से बच्चे खेलते है बारिश में , ये जो बहाव है सैलाब आया हुआ है उस में कागज़ की कश्ती नहीं काम आएगी। ग़ज़ल अच्छी है पर मौसम बदला हुआ है। किसी को बिना अनुभव देखे रक्षा सौदे का भागीदार बनाना खतरनाक है। आपने उच्च शिक्षा संस्थान का तमगा दे दिया उसको जो वास्तव में ज़मीन पर बना तक नहीं मगर आपको लाज नहीं आती ऐसा करते खेद ही जताया होता। फ़हरुख अब्दुल्ला की नसीहत बुरी नहीं है दिलों को जीतने की , ताकत से भयभीत करना नफरत की आग से देश को भस्म करना समझदारी नहीं है। किसी दल से देश को मुक्त नहीं करवाना है ये लोकतंत्र है , ये अनुचित मानसिकता को बदलना ज़रूरी है कि हम ही हम हैं। हमीं हम हैं तो क्या हम हैं , तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो। राजनीति विचारों की जंग है कोई दुश्मनी नहीं हैं। जिस दिन केवल आर एस एस नहीं देश के सभी लोग अपने लगने लगें उस दिन जो दिल की आरज़ू है महान लोगों में नाम शामिल करवाने की खुद ब खुद हो जायेगा। शोहरत जुर्म होती है अगर जिस पल उसकी तम्मना की जाती है , ये बिना चाहे मिलती है जब आप काबिल हो जाते हैं। याद रखना गांधी जी किसी पद पर नहीं रहे , सुभाष भक्त सिंह कोई सत्ता पर नहीं बैठे मगर जनता ही नहीं दुनिया में आदर है नाम है। 

 

जुलाई 21, 2018

POST : 843 भगवान बचाये ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

          भगवान बचाये ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

     समझ नहीं आता किस किस से बचना है , भगवान किस को किस किस से बचाता फिरे भगवान तो खुद बचता फिरता है । भगवान के नाम पर क्या क्या नहीं कर रहा कौन कौन । चलो सब से पहले टीवी वालों की बात करते हैं । बाज़ार की दुकान बना दिया है एकाध को छोड़कर सभी ने । भविष्य बांचने से लेकर शनि मंगल तक सब पर इनका इख्तियार है मगर खुद इनको मज़ाल है किसी ग्रह की कोपदृष्टि लग सके । विश्वास है या नहीं बिकता है जो भी बेचना है , ठगी मत कहो लालच मत कहो समाज सेवा है नेता लोगों की तरह । मगर प्राइम टाइम में देश की खबरें नहीं वास्तविकता को छुपाने को नया खेल तमाशा दिखलाते हैं । कोई पैसे की खातिर इतना भी गिर सकता है कि अपने वास्तविक धर्म को ही भुला दे । मगर खुद को लोकतंत्र के रक्षक और सच के झंडाबरदार बताने वाले सच को खुद कत्ल करते हैं हर दिन बार बार और लोकतंत्र तथा संविधान की उपेक्षा व अनादर करने वाले सत्ताधारी नेताओं को महिममंडित करते हैं । विशेषाधिकार और सरकारी विज्ञापनों द्वारा देश और जनता के धन की लूट में बड़ा हिस्सा पाने को । सब को आईना दिखाने वाले अपने को कभी नहीं देखते अन्यथा देश का आज तक का सबसे बड़ा घोटाला यही विज्ञापनों की लूट है । जिस धन से देश और जनता की कोई भलाई नहीं होती और कुछ ख़ास लोगों की तिजोरी भरती हो उसी को घोटाला कहते हैं । देश समाज की चिंता के दावे और देश भक्त होने का इनका दावा किस की मज़ाल है जो सवाल करे ये सब क्या है । टीवी सीरियल हों या विज्ञापन महिलाओं के लिए इनकी मानसिकता छुपाये नहीं छुपती है । मगर शायद इनको ये नहीं पता कि जैसे सरकारों और नेताओं से जनता निराश हो जाती है उसी तरह टीवी से लोगों का मोहभंग ही नहीं हो रहा बल्कि उन पर भरोसा खत्म हो रहा है । ये जो पब्लिक है वो सब जानती है । 
 
      मगर इन से बचना कठिन नहीं है टीवी का रमोर्ट आपके हाथ है खुद बच सकते हैं । मगर जो लोग गली गली धर्म और देशभक्ति के नारे लगाते हुए भीड़ बनकर जिसे भी चाहे जान से मार दें या हड्डी पसली तोड़ दें और देश में इक भय और दहशत का माहौल बना रहे हैं ताकि लोग उनसे भयभीत होकर उनके खिलाफ विरोध की बात नहीं कर सकें उनसे देश की सबसे बड़ी अदालत परेशान होकर नया और सख्त कानून लाने का आदेश देती है । लेकिन कानून बनाएगा कौन जब सत्ताधारी नेता ऐसे अपराध के दोषियों को सम्मानित कर देश के कानून और संविधान का उपहास कर रहे हैं । मगर आप इन की आलोचना नहीं करना अन्यथा इनके पास खुद के देशभक्त होने का तमगा भी है और आपको देश के दुश्मन बताकर देश से बाहर जाने को कहने का अधिकार भी । अदालत कनून संविधान से बड़ा इनके लिए कोई राजनेता या दल है । मगर ये तब खामोश रहते हैं जब अहिंसा के पुजारी और देश के बापू गांधी के हत्यारे का मंदिर कोई बनाकर देश और समाज को संदेश देता है कि हमारी वास्तविकता क्या है । जिस से असहमत हों उसकी हत्या को उचित ठहरा सकते हैं । 
 
        जिस पाठशाला से ऐसी शिक्षा मिलती हो उस को क्या नाम देना चाहिए मुझे नहीं पता हैं देश की सेवा तो हर्गिज़ नहीं कहा जा सकता है । तर्क से अपनी बात का कायल किया जा सकता है मगर जब कुतर्क ही तर्क बन जाये तो केवल उलझन उतपन्न होती है । उलझन यही है , आरोप उनके , अदालत उनकी खुद की चौराहे पर उनका इंसाफ भी मनमर्ज़ी का । अपील नहीं दलील नहीं कोई रहम नहीं सफाई नहीं , सामने महिला हो या बच्चा या कोई अपाहिज अथवा अस्सी साल का कोई बूढ़ा इनकी कोई इंसानियत नहीं है धर्म की बात क्या करें । मकसद आपस में लड़वा कर अपना राजनितिक मकसद हासिल करना । सत्ता देश की एकता और भलाई से बड़ी हो गई है तो इरादे नेक कैसे हो सकते हैं । भगवान देश को बचा लो इंसानों की कीमत नहीं है मगर देश का महत्व है इस से सभी सहमत होंगे ही । टीवी चैनल की अदालत में सच खड़ा आवाज़ दे रहा भगवान मुझे इनसे बचाओ मेरा क़त्ल रोज़ होता है देख कर भी कोई देखना नहीं चाहता । 
 
   Sach Shayari In Hindi - Amar Ujala Kavya - 'सच' पर ये 10 बेहतरीन शेर...

जुलाई 19, 2018

POST : 842 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग-5 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग-5 

                                           डॉ लोक सेतिया 

  कल की कहानी ने भी निराश किया और आज की कहानी ने भी। अच्छा लिखना काफी नहीं है सच्चा लिखना पहली शर्त है सार्थक लेखन की। आप दर्शकों को भटका रहे हैं , दस मिंट की कहानी के बाद सवाल करते हैं वो क्या करेगा या करेगी और क्या करना उचित होगा क्या अनुचित। लोग दो तरह से राय देते हैं , पहले ज़मीर और नैतिक मूल्यों की बात , और दूसरे साहूलियत और सुविधा के हिसाब से अनुचित को उचित ठहराते हैं। और अंत में आप अनुचित किये हुए को उचित साबित कर कहानी का सुखद अंत करते हैं मगर उसी के साथ सभी आदर्शों विचारों को कत्ल कर देते हैं। अगर यही कहानी सुनानी है तो फिर ऐसी कहानी कोई मार्गदर्शन नहीं कर सकती , राह दिखलानी थी मगर ये रास्ते से भटका देती है। माफ़ करें जो भी लिखने वाले हैं मगर ऐसा करना क्या इसलिए उचित है कि आपको समाज की वास्तविकता नहीं दर्शानी और केवल पैसा बनाना है। 

कल बुधवार 18 जुलाई की कहानी की बात :-

कोई पत्नी अपनी चाहत पूरी नहीं होने पर अपने पति की आमदनी कम होने के कारण अपशब्द बोलकर घायल करती रह सकती है। अंत में केवल तलाक की नौबत आने और तलाक के कागज़ फाड़ देने के बाद गलती मान लेना काफी है वो भी जब पति भविष्य में उसकी हर ख्वाहिश पूरी करने का वादा करे। इतना आसान है हर किसी का आमदनी बढ़ा लेना , फिर तो हर कोई अंबानी सलमान खान अमिताभ बच्चन या अक्षय कुमार बन जाता। उधर पुरुष भी पत्नी से नफरत और अपमान मिलने के बाद किसी महिला सहयोगी से साथ पाकर पत्नी को छोड़ उसके साथ विवाह की बात सोचता है जिसके विवाहित होने का पता ही नहीं। फिर जब वो भी इनकार कर देती है क्योंकि अपने अपाहिज पति को नहीं छोड़ना चाहती और केवल साथ चाहती है खुश रहने को। इतना काफी नहीं है घर वापस आने पर अपने दोस्त की अपनी पत्नी से बातें सुनता है जो उसे तलाक लेने के बाद अपनाने की बात कहता है और बताता है उसके पास वो सब है जो वो अपने पति से चाहती है। मगर जब वो उसको छूना चाहता है तो थप्पड़ मार कर बताती है कि उसे सब अपने पति से चाहिए किसी और से नहीं। माना पति के साथ ईमानदार है मगर वास्तविक प्यार कभी अपमानित नहीं करता है , जहां आदर नहीं वहां प्यार भी नहीं हो सकता। कहानी का संदेश कुछ भी नहीं। 

आज बृहस्पतिवार की कहानी की बात :-

गुरु अपना ईमान बेच देता है अपनी संस्था चलाने की खातिर और किसी गरीब को छोड़ अमीर के बेटे को आगे बढ़ाने का काम करता है। बाप की दौलत से ऊपर पहुंच वही अपने गुरु को आईना दिखाता है मगर खुद भी उसी की राह पर चलकर सौदेबाज़ी करता है। जो बोया वही काटना पड़ता है मगर अंत में आत्मग्लानि के चार डायलॉग बोलने से कुछ भी वास्तव में सही नहीं होता है जैसा दर्शकों को समझने को कहा जा रहा है। आज भी कम काबिल ऊंचे पायदान पर खड़ा है और अपने से अधिक काबिल को अवसर देने का काम कर कहना चाहता ही नहीं कह रहा है कि मैं तो हमेशा से उसे बढ़ावा देना चाहता था ये गुरु जी आपकी गलती है जो नहीं बढ़ सका। लेकिन गुरु को बिकने का दोषी समझने वाला खुद आज उसी व्यवस्था को दोहरा रहा है। 
शायद बाद में दर्शक सोचते होंगे इन सब बातों से सार क्या निकला। कभी जीवन में ऐसा दोराहा आये तो उनको किस तरफ जाना चाहिए किस तरफ नहीं। यहां तो कोई अंतर ही नहीं है , दोराहा घूम कर फिर इक दोराहे पर ला खड़ा करता है।


POST : 841 हर सवाल का जवाब है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       हर सवाल का जवाब है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    जो अब तक होता रहा अब नहीं होगा। नहीं नहीं बिल्कुल नहीं। हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं। आप लोग कभी नहीं सुधर सकते जब हम नहीं सुधरे तो आपको ख़ाक सुधारेंगे। मगर हमारे पर हर समस्या का समाधान भी है। समस्या पैदा भी हम खुद करते हैं और हल भी हम ही कर सकते हैं। गब्बर सिंह से कम मत समझना। भीड़ के हिंसक होने का उपाय है कि भीड़ जमा ही नहीं होने दी जाये। हम भी खुली सभा में नहीं अपना भाषण बंद हालों में दिया करेंगे या किसी टीवी स्टुडिओ में सीधा प्रसारण या फिर रेडिओ पर। सोशल मीडिया से जितना फायदा उठाना था उठा लिया , अब हमारे लिए घाटे का सौदा है।  रोक लगानी तो है अगर अदालत कोई अड़चन नहीं खड़ी करे। नशा करने की आदत बढ़ती जा रही है और इस कारोबार में मुनाफा भी बहुत है , क्यों नहीं शराब सिगरेट की तरह बाकी नशे का भी लाइसेंस जारी किया जाये। जनता नशे में हो तो कुछ नहीं मांगती है कोई अधिकार नहीं रोटी नहीं घर नहीं कारोबार नौकरी नहीं। सरकार को नशे को बढ़ावा देना चाहिए , नशा करने वाले नशे के लिए पैसा खुद हासिल करना जानते हैं।  उनको बस नशा मिलना चाहिए। लोग छुप कर बुरे काम करते हैं , उनको सभी गंदे काम करने की सुविधा उपलब्ध करवाई जाये तो अपराध क्यों करेंगे। इशारा समझ लो। सरकारी कोठों पर सब मिल सकता है , पाकीज़गी की बात करना बेकार है। कलयुग की बात है कलयुग में आप बुराई को मिटा नहीं सकते , कलयुग को कलयुग रहने दो। कुछ परिभाषाएं बदली जा सकती हैं , झूठ बोलना कोई बुरी बात नहीं है।  जब बोलने वाला और सुनने वाला दोनों को पता हो झूठ बोल रहे झूठ कह रहे हैं तो वही सच है। मेरे भाषण की हर बात ऐसा ही सच है। किसी को उस पर विश्वास नहीं हुआ मगर किसी ने शक ज़ाहिर नहीं किया , मन ही मन हंसते रहे लोग। आजकल सब को इक ही बात की ज़रूरत है मनोरंजन की। सब यही कर रहे हैं , कितने डरावने वीडिओ देखते हैं और लुत्फ़ उठाते हैं और औरों को भी भेजते हैं। कोई हादिसा सामने होता है आप और कुछ नहीं करते बस वीडिओ बनाकर वायरल करते हैं अपना नाम रौशन करते हैं। हम संवेदना की बात क्यों करें संवेदना की कीमत क्या है संवेदनहीनता बिकती है। सर्वोच्च अदालत समझ चुकी है हम सभ्य समाज नहीं हैं। बाकी संसार की इक्कीसवीं सदी होगी हम सदियों पुराने युग में रहते हैं जिस में ताकतवर कमज़ोर को खाता है। हमने बाकी सभी को बेहद कमज़ोर कर दिया है , लोकतंत्र को लोकतान्त्रिक संस्थाओं को , अब जल्द विरोध करने वाला कोई नहीं बचेगा। बचे शरण जो होय। हमारी शरण में आने पर दाग़ी बेदाग़ हो जाते हैं , गंगा भले और मैली हुई है हम पापियों के पाप धोते धोते , पाप को पुण्य बना दिया है। हर गुनाह की इजाज़त है। किसी शायर की बात समझी है जिसने कहा था :-

                                इक फ़ुरसते गुनाह दी वो भी चार दिन ,

                                     देखे हैं हौंसले परवरदिगार के।

वैसे तो हमने देश को बर्बाद किया है , इल्ज़ाम किसी पुरानी सरकार पर जाए तो अच्छा। गीतकार से क्षमा चाहता हूं शब्दों की हेरा फेरी के लिए। हेरा फेरी कितनी अच्छी है इसी से समझ लो इस नाम की हर फिल्म सुपर हिट रहती है। जिस गीत में हेरा फेरी शब्द आया वही पॉपुलर हुआ है। समझ लो लोग क्या चाहते हैं।

जुलाई 18, 2018

POST : 840 ईश्वर मैं नास्तिक बन गया ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया

  ईश्वर मैं नास्तिक बन गया ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया 

  हो नहीं हो की बहस से क्या हासिल। बस जितनी ईबादत करनी थी हो चुकी। इस उलझन से बाहर निकल आया हूं। होने नहीं होने से मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता। की नहीं जाती अब तेरी पूजा अर्चना ईबादत परस्तिश। आज सोचा तो विचार करने लगा तुम क्या कर रहे हो। शहर शहर गांव गांव गली गली अपना ठिकाना बनवाते फिरते हो और जिनको इंसान बनाया उनका हाल कभी पूछा भी नहीं। मैंने बहुत पहले कहा था। 

        हाल पूछे आकर हमारा जो खुद , एक ऐसा भी कोई खुदा चाहिए।

     जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए , ज़हर कोई न कोई दवा चाहिए। 

 तुम आये ही नहीं कभी , मैं ही जाता रहा तुझे मिलने तुझसे शिकायत करने तुझसे हाल ए दिल कहने। ये इश्क़ एकतरफा था , तुमने कभी इज़हार ए इश्क़ किया ही नहीं। मुझे प्यार करते तो क्या इतने दर्द देते इतनी परेशानियां इतनी सज़ाएं किस गुनाह की। नहीं मेरी भूल थी तुम खुश होते अगर मैं रात दिन तुम्हारा नाम रटता तुझे सुबह शाम मनाता आरती करता और अगर पास नहीं थी दौलत तो किसी भी तरह जमा करता औरों से छल कपट कर और तेरे को उसका कुछ हिस्सा देता रहता। तब दुनियादारी को समझ मैं भी अमीर कहलाता। गरीबों का कोई भगवान है ही नहीं। आलिशान भवन कितने और दौलत के अंबार और छप्पन भोग तेरे लिए हैं ऐसे में बेघर भूखों की चिंता क्यों करते। तेरे नाम पर क्या क्या नहीं होता अन्याय मगर तुम खामोश तमाशा देखते रहते हो। मरने के बाद क्या न्याय करोगे कौन जाने , देख लेंगे जब कभी सामने आया वो बही खाता वो धर्मराज की अदालत। चलो अपनी दुनिया का हाल सुन तो लो। चाहे कुछ भी मत करना। 
 
           ताकत धन दौलत शोहरत जिसे जितनी मिलती है उतना ही लोभी लालची और अहंकारी बन जाते हैं। जिस को जितना जनता सर पर बिठाती है वो उतना ही निरंकुश बन जाता है। कहते हैं अपने सिवा किसी को नहीं रहने देना , यही उनका लोकतंत्र है। सर्वोच्च न्यायालय केवल सलाह दे सकता है , सलाह मानता कौन है। उपदेश देने वाले हैं सभी पालन करने वाला कोई हो तो मूर्ख अज्ञानी कहलाता है। भीड़ बनकर जो मर्ज़ी करो भगवान भी तमाशाई है सरकार भी तमाशाई ही नहीं सहयोगी है। इसी भरोसे तो बढ़ रहा है भीड़ के न्याय का चलन। वह रे भक्त वह रे भगवान , क्या बढ़ रही है तेरी शान , हो गया कितना बदनाम। जानता हूं ये सब किसी सभा में कहूंगा तो क्या होगा , भीड़ मुझे नास्तिक होने की सज़ा देगी। जिसे वो मानते हैं सब को मानना होगा अन्यथा इस जहां को छोड़ना होगा। जितनी सत्ता की हद बढ़ती गई उतना अभिमान अपने पर बढ़ता गया और अपना हर काम महान लगने लगा। 
 
              माफ़ करना धर्म की किताबों को पढ़कर उकता गया हूं। आदमी को भाग्यवादी ही नहीं कायर बनाती हैं। अन्याय अत्याचार से खुद नहीं लड़ते भगवान के भरोसे रहते हैं , लोग पूजा आरती करते रहे और लूटने वाला सब लूट कर ले गया। इतना अंबार क्यों जमा कर लिया तुमने जिस को बचाने भी नहीं आ सकता। हम गीता का संदेश पढ़ते रहे , यदा यदा .....   आया नहीं कोई कृष्ण इस कलयुग में। अभी भी नहीं समझा तो क्या मरने के बाद मेरी लाश समझेगी वास्तविकता तेरी। भीड़ की भेड़चाल से घबरा कर भी तेरा नाम नहीं लूंगा। कोई मतभेद नहीं है हमारे बीच , जितनी निभ गई बहुत है , इक पंजाबी ग़ज़ल है , क्या कहते हो जितना साथ रहा काफी नहीं। अब अपने अपने रास्ते जाएं हम दोनों। ये ज़रूरी तो नहीं तुम मुझे प्यार करो , ये भी तो बंदिश नहीं कि मैं तेरे प्यार की खैरात मांगू। मुझे तो सरकार से भी हक चाहिएं अधिकार पूर्वक भीख या खैरात नहीं। मेरी ग़ज़ल सुनोगे , पिछली सरकार के वक़्त की कही हुई है जो आज भी सही है।

हक़ नहीं खैरात देने लगे ,
इक नई सौगात देने लगे।

इश्क़ करना आपको आ गया ,
अब वही जज़्बात देने लगे।

रौशनी का नाम देकर हमें ,
फिर अंधेरी रात देने लगे।

और भी ज़ालिम यहां पर हुए ,
आप सबको मात देने लगे।

बादलों को तरसती रेत को ,
धूप की बरसात देने लगे।

तोड़कर कसमें सभी प्यार की ,
एक झूठी बात देने लगे।

जानते सब लोग "तनहा" यहां ,
किलिये ये दात देने लगे।



जुलाई 17, 2018

POST : 839 या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो( आलेख ) 

                                      डॉ लोक सेतिया 

  कहो भी क्या कहना है , अब बोलते क्यों नहीं।  नानी मर गई है क्या। ये हाल चाल पूछना है ये हालत खराब करना। माफ़ करना आपकी अदालत में आना बहुत बड़ी भूल थी। जाने आजकल की महफिलों को ये क्या हुआ है। शोर तो है वाह जनाब माशाआलहा का मगर आवाज़ है कि दबी दबी सी लगती है। दिन का उजाला है फिर भी दिखाई कुछ भी नहीं देता है। कितने आफ़ताब धरती पर चमकते हुए हैं पर अंधियारा है कि मिटने को राज़ी ही नहीं। सब ज्ञानी हैं सभी कुछ की जानकारी है राजनीति से लेकर धर्म तक और देश भक्ति से लेकर समाजसेवा तक हर किसी को खबर है। खबर नहीं फिर भी कौन हैं हम क्या हैं , किधर को जाना चाहते थे और आ गए किस जगह हैं। ज़ुबान है कि बोलती नहीं है , आंखें हैं लेकिन दिखाई कुछ भी नहीं देता है , कानों में शोर कितना है मगर सुनाई कुछ नहीं देता है। हाथ भी हैं मगर उन्हें कानों को ढकने तक की कोशिश करना बेकार है। बिना किसी हथकड़ी बंध गये हैं , ताली बजाने के इलावा हिलते भी नहीं हैं। आप कहते हो बताओ सब बढ़िया तो है। दिल भी क्या बुरा है दुश्मन ए जां पर फ़िदा है , इश्क़ की दास्तान है। ऐसे में कोई ग़ालिब नहीं दाग़ नहीं मीर तकी मीर नहीं। ग़ज़ल की बात कौन करे , दर्द को समझता है कौन , जाने ये किस तरह की शायरी है। हज़ारों सुनने वाले हैं सुनाने वालों को सलीका नहीं हो तो सुनने वालों को शऊर कैसे आये। मजमा लगाने जैसी बात है दिल से दिल में उतरने वाली कोई बात नहीं है। गद्य पद्य दोनों की दशा एक जैसी है। शोहरत तो बहुत है , दौलत भी बहुत है , नज़ाकत की बात खो गई है। ग़ज़ल गाई किसी ने तो ग़ज़ल छुपकर खड़ी थी ख़ामोशी से रो गई है। शायर को पता भी नहीं चला वो अपना दामन अश्कों से भिगो गई है। अजीब सी घुटन लग रही है ये कैसी बरसात हो गई है। अपने अश्कों में मेरी दुनिया डुबो गई है। मुंशी जी आपकी कहानी खो गई है मूंगा से पूछा यहां क्यों खड़ी है , भूल गई कहना था , तेरा लहू पीऊँगी। न उठूंगी। मुंशी ने पूछा कब तक पड़ी रहोगी। नहीं बोली जो कहना था , तेरा लहू पीकर जाऊंगी। गरीब की हाय लगती नहीं आजकल। नमक का दरोगा , दो बैलों की कथा। प्रेमचंद कोई नहीं है कहानियां कितनी बदनसीब हैं। परसाई श्रीलाल शुक्ल ये सभी व्यंग्यकार लिखते रहे मगर बदला क्या जो मेरे लिखने से बदलेगा। नींद क्यों रात भर नहीं आती। 
 
            यूं हसरतों के दाग़ मुहब्बत में धो लिए , खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिए। घर से चले थे हम तो ख़ुशी ( अच्छे दिन ) की तलाश में , ग़म राह में खड़े थे ( बदहाली ) वही साथ हो लिए। होटों को सी चुके तो ज़माने ने ये कहा , ये चुप सी क्यों लगी है अजी कुछ तो बोलिए। अब समझे आप सरकार ने सवाल किया है बोलते क्यों नहीं। आमदनी दुगनी हुई कि नहीं। इधर कुआं उधर खाई। जो बोलने को सिखाया छमिया बोल गई तो लोग पूछते हैं दिखा दोगुनी कमाई कहां छुपाई है। धान की फसल बर्बाद हुई तो जिस सीताफल की बात करती हो साथ की सभी महिलायें जो था वो भी लुटा बैठी हैं। ये गणित बहुत कठिन है अलजब्रा मुझे समझ नहीं आता किसी ने फेसबुक पर पोस्ट पर लिखा। थोड़ा इंतज़ार करो अभी जिओ का उत्कृष्ट संस्थान खुलेगा तो पढ़ाई करना , जो पहले पढ़ा लिखा सब फज़ूल था। आजकल यही अच्छा है हर किसी के पास स्मार्ट फोन है जो मर्ज़ी करो।  मगर रुकना आज सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है नफरत फ़ैलाने वालों पर कठोर कानून बनाओ। अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारो , सबसे अधिक नफरत किस ने फैलाई है। हम अच्छे बाकी सब बुरे यही उनका प्यार का सबक है। जो हमें अच्छा नहीं मानते देश की भलाई नहीं चाहते। किसी का विरोध अपराध ही नहीं क्या क्या नहीं हो गया। चुप रहो इस शहर में रहना है सच कहना है तो कोई और जगह तलाश करो। मैं ग़म को ख़ुशी कैसे कह दूं , जो कहते हैं उनको कहने दो। या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो। 
 

 

जुलाई 15, 2018

POST : 838 वो आये घर हमारे खुदा की कुदरत है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  वो आये घर हमारे खुदा की कुदरत है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

    वो आये घर हमारे खुदा की कुदरत है , हम कभी उनको कभी अपने घर को देखते हैं। 

 स्वागत है आपका मेरे शहर में महोदय। जब कोई घर आता है तो हंस कर अभिवादन करते हैं। ऐसे में अपने दुःख दर्द की बात नहीं करते। आंसू आने लगें तो छुपा लेते हैं रोक लेने चाहियें फिर भी छलकने लगें तो कहना चाहिए आंसू ख़ुशी के हैं। आंसू का कोई रंग नहीं होता जाति धर्म नहीं होता आंसू ही हैं जो सुख दुःख दोनों समय काम आते है। आज देश के राष्ट्रपति आ रहे हैं कई दिन से खबर पढ़ते रहे है क्या क्या प्रबंध किये जा रहे हैं। आज सुबह सैर पर गया तो देखा सड़कें धुली धुली हैं , फॉयर बिर्गेड की गाड़ियां खड़ी हैं कई तैयार और पुलिस की जिप्सियां वाहन दौड़ते फिर रहे हैं। अनाज मंडी के पीछे किसान विश्राम भवन की बंद दिखाई देने वाला गेट खुला हुआ है साफ सफाई की जा रही है चार पांच गाड़ियां पोर्च में खड़ी हैं जिन पर वीआईपी का लेबल चिपका हुआ है। मुझे भी कोई ऐतराज़ नहीं है आपकी शानो शौकत पर , आपके घर रौशनियां हों मगर हर गरीब के घर भी इक छोटा सा दिया भी जलता रहना चाहिए। सबको अपने हिस्से का आसमान मिले। मुझे नहीं लगता असली किसान उस भवन में आराम करना तो क्या कभी अंदर भी जा सके होंगे।  मगर सरकारी लोग किसान से लेकर कुछ भी होने का लाभ उठा सकते हैं।  उनकी मर्ज़ी।   
 
                          अभी कुछ शेर दुष्यंत कुमार के याद करते है। 
 
आपके क़ालीन देखेंगे किसी दिन , इस समय तो पांव कीचड़ में सने हैं। 
 
जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में , हम नहीं हैं आदमी , हम झुनझुने हैं।
 
हरियाणा की सरकार चाहती है हम निराशा की बातें छोड़ आशावादी बातें करें। उनके आये दिन आयोजित तमाशों को देख कर आनंद लें खुश होकर ताली बजाएं। यथार्थ की बात करना निराशा नहीं होता है , अंधेरा है जब तक नहीं स्वीकार करोगे दिया कैसे जलाओगे। 
 
मत कहो आकाश में कुहरा घना है , ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। 
 
दोस्तो ! अब मंच पर सुविधा नहीं है , आजकल नेपथ्य में सम्भावना है। 
 
आजकल सवाल करना जुर्म है। आपकी देशभक्ति कटघरे में खड़ी कर देते हैं। हम इतना तो कह सकते हैं दुष्यंत की तरह। 
 
इस अंधेरे में दिया रखना था , तू उजाले में ही बाल आया है। 
 
हमने सोचा था जवाब आएगा , एक बेहूदा सवाल आया है।
 
बस दो शेर और दुष्यंत कुमार के सुनाकर फिर अपनी बात कहता हूं। नहीं कहूंगा तो खुद अपना ज़मीर मुझे मुजरिम ठहराएगा। घबरा गया सच लिखने से , डर गया डराने से। फिर ज़िंदा क्यों है। 
 
ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल लोगो , कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो। 
 
किसी भी कौम की तारीख़ के उजाले में , तुम्हारे दिन हैं किसी रात की नकल लोगो। 

आज सब चाक चौबंद है राष्ट्रपति जी और उनकी धर्म पत्नी जी को आना है। हमेशा सब चाक चौबंद क्यों नहीं रहता। ऐसा लगता है जैसे आज ही हर बात हो सकती है सब उपाय करने चाहिएं। क्यों सब उपाय हमेशा नहीं हों कि केवल किसी वीवीआईपी के आने पर महीनों सब ठीक करना पड़े वो भी अगले दिन फिर से खराब होने देने के लिए। जब कोई किसी बड़े पद पर होता है तो अजीब अजीब ख्वाहिशें दिल की पूरी करता है , कोई सेना के लड़ाकू विमान की सैर करता है कोई समंदर में युद्धपोत पर जाता है। जब जंग हो क्या उनको करना है ये सब , रहीसाना शौक हैं जो देश का कितना धन खर्च कर पूरे किये जाते हैं। इनका अर्थ कुछ भी नहीं। मगर ये तमाम लोग गरीबी की बात ही नहीं करते बल्कि दावा करते हैं खुद इन्होने गरीबी देखी है। देखी थी माना मगर क्या आज गरीबी का दर्द याद है , वो भूख वो बेबसी वो मौत से बदतर जीना। अगर याद है तो आप राष्ट्रपति हों प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री या संसद विधायक या किसी भी बड़े पद पर आसीन लोग , किस तरह इतने संवेदनाहीन हो जाते हैं कि करोड़ों लोगों की भूख मिटा सकता है इतना खाते हैं और उससे ज़्यादा उड़ाते हैं। ये देश के गरीबों की रोटी से खेलने वाले कौन हैं , क्या देश सेवक हैं , देशभक्त हैं।




जुलाई 14, 2018

POST : 837 आदमी का मशीन हो जाना ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया

    आदमी का मशीन हो जाना ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया 

          कितना आगे बढ़ गया अब देखो इंसान। मैं अभी तक किसी और ही दुनिया में था। ऐसा तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था। हम अपने माता पिता को उनके चले जाने के बाद सालों तक भुला नहीं पाते हैं। कभी कभी तो अजनबी लोग भी इतने अच्छे लगते हैं कि उनकी मौत की खबर पर यकीन नहीं होता है। कल ही तो देखा था भला आज कैसे हो गया ये सब। माना हादिसे होते हैं तो हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते कुदरत भी क्या क्या कहर ढाती है। दुर्घटना में बाढ़ में बिजली गिरने से मौत कब कैसे आती कोई कुछ नहीं कर सकता है। हर दिन शोकसभा में सुनते हैं ऊपर वाले की मर्ज़ी है क्या कर सकते हैं। दुआ मांगते हैं आत्मा को सद्गति दे ऊपर वाला और उसके प्रियजनों को दुःख सहने की शक्ति दे। सच कहूं अभी भी लिखने का साहस नहीं हो रहा है या फिर अभी भी यकीन नहीं हो रहा जो हुआ सच वही हुआ जो मुझे दिखाई दिया। नहीं भला ऐसे कैसे हो सकता है। या फिर कोई वास्तव में इतना ज्ञानी हो सकता है जो भगवान कृष्ण के अर्जुन को गीता के सन्देश की बात को समझ गया हो। मरना है सब को और इस सच्चाई को स्वीकार करना ही पड़ता है। फिर खुद उसी ने शोकसभा आयोजित क्यों की और सब को सूचना भी दी। और लोग माना शोक प्रकट करने जाते हैं केवल नाम को ही मगर जिसका अपना नहीं रहा उसका दुःख अपना ही होता है हज़ार लोग बांटने को आएं संवेदना व्यक्त करें वास्तव में कम नहीं होता है। मगर कोई अपने माता पिता के आकस्मिक निधन को ऐसे स्वाभाविक घटना की तरह समझ इस तरह से बातें कर सकता है जैसी कुछ हुआ ही नहीं हो मेरे लिए समझना कठिन है। मेरी खुद की आयु साठ साल है , क्या मतलब उसकी अस्सी साल से अधिक होगी और कितना जीना चाहिए। पास बैठा कोई दूसरा साथ दे रहा था ये अच्छा है दो तीन दिन आई सी यू में रहा नहीं तो महीनों बिस्तर पर पड़े रहना बहुत खराब मौत होती है उसके बाद। आपस में बातें कर रहे थे कोई रोग नहीं था कोई परेशानी नहीं थी घर से निकले भले चंगे और अचानक ये असंभव सी बात हो गई। बहुत आराम से रहते थे पेंशन मिलती थी पचास हज़ार से अधिक हर महीने और इस आयु में खाना पीना क्या होता है दाल सब्ज़ी , रोग भी कैसे होते हैं तेज़ाब बनना या गैस या कब्ज़। 
 
               छोड़ यार अपनी बात बताओ किस किस देश में सैर की। और उसके बाद आधा घंटा तक विदेशों की बात होती रही। होटल की खाने पीने की और वहां के तौर तरीकों की। किसी पार्टी में जाकर जैसे चर्चा करते हैं। मुझे मौत से डर नहीं लगता मगर ये मौत मुझे डरावनी लगी।  क्योंकि अधिकतर लोग जीना चाहते ही नहीं या जीना जानते ही नहीं मगर शायद बहुत थोड़े लोग होंगे जो सच में हर हाल में ज़िंदा रहते हैं। ऐसे व्यक्ति का निधन विचलित करता है , उसे जीना था जीना जनता था जीता भी था और जीना चाहता भी था। नहीं उसे इस तरह नहीं जाना था , ये नहीं सोचा था उसने। उसकी ज़िंदगी में कितनी अनहोनी घटनाएं घटी फिर भी वो ज़िंदादिल ज़िंदगी से हारा नहीं कभी। हम तो कायर लोग हैं जो जीना जानते ही नहीं और मौत से भी डरते हैं इसलिए जीते हुए भी मरते हैं। मैंने बहुत कम लोग अपने सामने ऐसे देखे हैं जिनके चेहरे पर शिकन नहीं दिखाई देती बेशक उनके भीतर कितने समंदर गहराई में दर्द वाले दबे रहते हैं। मैं तीस साल से जनता रहा हूं उनको अपने शहर में आकर आते जाते , फिर बसते हुए , और अब पता चला वो चले गए थे इस शहर से किसी और शहर , जहां से और और आगे चले गये हैं किसी दूसरी दुनिया में। जो मर गया उसे क्या फर्क पड़ता है कोई उसके जाने से दुखी है या नहीं।  सुनते रहे हैं कुछ लोग वसीयत मिलने पर खुश होते हैं , मगर यहां तो सब पहले दे दिया था उन्होंने। आदमी में और मशीन में एक ही अंतर है कि मशीन को सुख दुःख का एहसास नहीं होता है। आदमी की रगों में लहू बहता है जो लाल रंग का होता है , कहावत सुनी थी उसका लहू सफ़ेद हो गया है। शायद कुछ ऐसा ही लगा मुझे। 
 

 

जुलाई 12, 2018

POST : 836 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 4 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग -4 

                                   डॉ लोक सेतिया 

  आज की कहानी वास्तव में बेहद कठिन मोड़ की बात थी। इक पिता जो छोटी सी नौकरी में बेहद ईमानदारी से काम करता है , जिस जगह काम करता है जो मालिक था वो अब नहीं है और उसका बेटा उसे नौकरी से हटा नहीं सकता क्योंकि मरने से पहले उसे पिता ने ऐसा कहा था। ऐसे में जब वो अपने आज के मालिक से क़र्ज़ मांगता है तो खरी खोटी सुना मना कर देता है। मगर तभी शाम को उसे दस लाख रूपये बैंक में जमा करवाने को देकर भेजता है लेकिन बैंक पहुंचने पर बैंक बंद हो गया होता है। विवशता में इतनी बड़ी रकम उसे घर में रखनी पड़ती है , सुबह होने पर पता चलता है कि रात को घर में चोरी हो गई है। मालिक उसे पुलिस थाने ले जाता है और उसी पर शक जताता है कि तभी पुलिस का हवालदार इक चोर को पकड़ कर लाता है उसी बैग के साथ। मगर बैग में कोई पैसा नहीं होता और चोर स्वीकार करता है कि हां मैंने चोरी की है मगर इस बैग में कुछ भी नहीं था। पुलिस मानती है कि वो चोर से चोरी की राशि बरामद कर ही लेंगे , मगर घर आने पर उसे पता चलता है कि चोर की चोरी से पहले उनकी अपनी औलाद ने ही पैसे चुरा लिये थे अपनी अपनी ज़रूरत को पूरा करने की खातिर। इस बात की चिंता किये बगैर कि उनके ऐसा करने से पिता पर क्या क्या मुसीबत आ सकती है। अभी कहानी को यहीं रोक कर स्टुडिओ में बैठे लोगों की बातें करते हैं। 
 
     बेटे बेटी ने चोरी की बहुत लोग इसे उनकी मज़बूरी ही नहीं बता रहे थे बल्कि पिता को ही कटघरे में खड़ा कर कह रहे थे वो अच्छा पिता नहीं साबित हुआ क्योंकि बच्चों की ज़रूरत पूरी नहीं कर सकता था। अब उनकी मज़बूरी या ज़रूरत भी जानना ज़रूरी है। बेटी की ससुराल वालों की मांग और बेटे को नौकरी मिलने के लिए लाखों रूपये की ज़रूरत। अर्थात जो पिता संतान की उचित या अनुचित किसी भी तरह की मांग को पूरी नहीं कर सकता है उसकी ईमानदारी किस काम की। ये बेहद खेद की बात है जो ऐसे शो में भाग लेने वाले तथाकथित आधुनिक समाज के लोग ईमानदारी और नैतिकता को अनावश्यक समझते हैं। जब एंकर ने पूछा कि क्या पिता को अपने बच्चों की चोरी की बात पुलिस को बता देनी चाहिए तो ज़्यादातर लोग नहीं चाहते थे।  उनकी चोरी और गुनाह ही नहीं अपने ही पिता से धोखा करने को बच्चों की भूल बता बचाने की बात कर रहे थे। ये सब देखकर समझ सकते हैं अगर पकड़े जाने का डर नहीं हो तो इनमें से अधिकतर कोई भी अपराध कर सकते हैं। शायद उनको नहीं समझ आया हो कि जो लोग उनकी जान पहचान के हैं उनकी राय सुनकर और उनकी सोच जानकर उन पर भरोसा नहीं करेंगे अगर कोई ऐसी घटना घट जाये। 
 
        सोशल मीडिया पर आकर कुछ भी बोलने और समझाने की आदत का ये भी साइड इफ़ेक्ट है। जब कुछ भी कहना हो किसी घटना को लेकर या कोई राय देनी हो जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। थोड़ा संयम रखना सीखना चाहिए। अन्यथा बाद में पछताना पड़ता है। यही हुआ इस कहानी के आखिर में। पिता अपने बच्चों को पकड़वाने की जगह खुद पर चोरी का इल्ज़ाम ले कर बेगुनाह को बचा खुद हवालात में बंद हो जाता है। बेटा अपनी नौकरी पाकर खुश है और बेटी ससुराल जाने की बात से खुश है , अपने पिता की बात उनको मूर्खता लगती है। मगर जिस मालिक को सभी स्टुडिओ में बैठे दर्शक बुरा भला कह रहे थे , वही जब पता चलता है की वो इंसान चोर नहीं बल्कि उस के बच्चों ने चोरी की है तो उसे आकर छुड़वाता भी है और ये भी कहता है कि जब तक आप नहीं कहोगे आपके बच्चों पर कोई करवाई नहीं करेगा। उसे अपने पिता की कही बात अब समझ आती है और वो उनको आदर देता है बड़ों की तरह और अगले दिन से काम पर आने को कहता है। ये कहानी का सुखद अंत है मगर सवाल बाकी छोड़ जाती है ये कहानी भी , मुजरिम उस कहानी के पात्र नहीं हैं , वास्तव में हमारा समाज कटघरे में खड़ा है। क्या हम खुद वास्तविक जीवन में ईमानदार इंसान की कदर करते हैं ? शायद नहीं !!


POST : 835 अल्लाह की मर्ज़ी है ( की मैं झूठ बोलिया ) डॉ लोक सेतिया

   अल्लाह की मर्ज़ी है ( की मैं झूठ बोलिया ) डॉ लोक सेतिया 

सच्चे फांसी चढ़दे वेखे झूठा मौज मनाय , लोकी कहंदे रब दी माया मैं कहंदा अन्याय। 
ओ की मैं झूठ बोलिया , की मैं कुफर तोलिया। कोइना भाई कोइना। 
 
     पंजाबी बोलियां कहते हैं इसे। आज कुछ इसी अंदाज़ में सवाल जवाब। सवाल भी आपके ही हैं और जवाब भी अपने ही हैं। उनसे सवाल क्या , और उनके जवाब क्या , कब कौन कर रहा क्या व्यौपार मत लिखो। बेदर्द शासकों को यूं अवतार मत लिखो। झूठे बयान देती ये सरकार मत लिखो। उनके फरेब की बात सौ बार मत लिखो। उनके गुनाह सब माफ़ , बदकार मत लिखो। आईन देश का क्यों गया हार मत लिखो। 

पहला सवाल :-

आपने वादे बहुत किये देश की जनता के साथ , वास्तविकता में हुआ कुछ भी नहीं। क्या आप स्वीकार करते हैं आपने जो जो कहा सब झूठ साबित हुआ। आपने कहा था मेरा कोई कसूर कोई कमी निकले तो मुझे सज़ा देना। अब आप खुद बता दो क्या सज़ा मिलनी चाहिए आपके अपराधों की। 

जवाब हाज़िर है :-

मैंने कोई गलती नहीं की , कोई गुनहगार नहीं हूं मैं , मैंने तो कोई कमी नहीं छोड़ी। जिस खुदा पर भरोसा था कि वो मेरी हर इच्छा को पूरी करेगा। जैसे ऊंचे सिंघासन पर बिठाना। उसी पर छोड़ा था सब को अच्छे दिन दिखाना ज़रूर बेशक दूर से ही। शायद उसने दिखलाये भी होंगे मगर जब दिखा रहा तब लोग नहीं देख रहे थे। लोगों का ध्यान इधर उधर बहुत रहता है। कोई मंदिर कोई भगवान का दर नहीं बचा जिस चौखट पर झुकाया नहीं जाकर सर अपना। सब जानते हैं जो भी करता है वही करता है , उसने किसकी झोली भरी किसकी खाली रही ये उसी की मर्ज़ी है। अल्लाह जो करता है मंज़ूर करना पड़ता है , मेरे चाहने से क्या हो सकता है। 

दूसरा सवाल :-

आप अपनी नाकामी को ऐसे ढक नहीं सकते हैं। आपको अपने भगवान राम दोषी लगते हैं।  भगवान को राजनीति में लाना उचित नहीं है। अपने वादे आपको पूरे करने थे राम जी की मर्ज़ी नहीं आती आड़े इस में। 

जवाब हाज़िर है :-

आपने राम और रहीम को मिला दिया है जो सही नहीं है। राम जी ने अपने भक्तों की भलाई करनी थी , अल्लाह ने अपने बंदों की भलाई करनी थी। और जो हर किसी को मानते हैं उनकी तरफ कोई नहीं देखता है। सबसे पहले आपकी आस्था एक में होनी चाहिए। हर किसी की चौखट पर जाने वाले खली हाथ रहते हैं। 

तीसरा सवाल :- 

संविधन देश को देश की सरकार को धर्म निरपेक्षता का सबक पढ़ाता है। आपको अपना काम करना है कोई खुदा कोई अल्लाह कोई यीशु मसीह कोई वाहेगुरु आपको रोकने नहीं आया होगा। राजधर्म को छोड़ आपने सब धर्मों की चिंता की , अपना वास्तविक धर्म निभाया ही नहीं। 

जवाब हाज़िर है :-

मुझे दोष देते हो अपना काम खुद नहीं करना ज़रूरी समझा और भगवान भरोसे सब कुछ छोड़ दिया। मगर देश आजतक भगवान भरोसे ही चलता रहा है , मैंने मेरी सरकार ने भी वही किया जो पहले की सभी सरकारों ने किया है।  बड़ा गर्क देश का। जनता भी तो सब हरि इच्छा पर छोड़ती है। किसे क्यों चुनती है कभी सोचती ही नहीं। हम नेताओं के वादे सुनती है और लालच में आ जाती है। अगर खुद अपने बीच से अच्छे सच्चे और ईमानदार लोगों को चुन कर भेजती तो अपने आप सब ठीक हो जाता। आप बताओ 125 करोड़ की आबादी में क्या 543 लोग ऐसे नहीं हैं जिनको कोई वेतन सुविधा नहीं चाहिए देश की सेवा करने के बदले। खुद कांटों को बोती है स्वार्थी नेताओं को वोट देकर। 

अंतिम सवाल :-

आपको क्या लगता है देश में वास्तविक लोकतंत्र कैसे मज़बूत हो सकता है। कोई मसीहा तो आकर कुछ नहीं करेगा। भविष्य क्या है और कैसे बदल सकता है। 

जवाब हाज़िर है :-

वोट देना काफी नहीं है लोकतंत्र को समझना होगा। राजनेता कभी मसीहा नहीं बन सकते हैं।  उनका मकसद सत्ता होता है। पांच साल इंतज़ार नहीं किया करती ज़िंदा कौमें याद रखना। जो सरकार मनमानी करती हो और सत्ता मिलते ही आम जनता की बातों को महत्व नहीं देती हो उसका विरोध करना चाहिए। मगर यहां जो बात सबसे महत्वपूर्ण है विरोध किसी भी नेता या सरकार की इजाज़त लेकर नहीं हो सकता है। अधिकार पाने को संघर्ष करना पड़ता है हर राज्य हर मुल्क की जनता को। कोई भी थाली में रखकर परोस कर आपको हक नहीं देता है।


जुलाई 11, 2018

POST : 834 एक नाक़ाबिलेगौर शोहरत ( बेसिर पैर की ) डॉ लोक सेतिया

  एक नाक़ाबिलेगौर शोहरत  ( बेसिर पैर की ) डॉ लोक सेतिया 

     अमर्त्य सेन के नाम से दुनिया वाकिफ है , मगर भारत देश में बहुत थोड़े लोग जो अख़बार टीवी और शिक्षा अर्थशास्त्र से या फिर लेखन से जुड़े हैं परिचित हैं। अन्यथा आप किसी से पूछो तो जवाब मिलेगा नहीं जानते या फिर नाम सुना तो है कोई मीडिया से जुड़ा होगा। उनकी किताब आई है " एन अनसर्टेन ग्लोरी "  उस इंग्लिश नाम का उर्दू में अनुवाद है।  मगर ऐसा खुद उनकी बात हरगिज़ नहीं है क्योंकि उनकी शोहरत दुनिया मानती है। इंडिया जो भारत है उसकी सरकार जिनको देश में रहते नहीं पहचानती है उनको जब नोबेल  पुरुस्कार मिलता है तब सम्मानित करती है संसद में बुलाकर भी। मगर जिस कारण उनको नोबेल पुरुस्कार मिला उस अर्थशास्त्र की बात नहीं मानती है। अपनी इस नई किताब में उनका कहना है कि 2014 में इंडिया जो भारत है ने उल्टी दिशा में इक लंबी छलांग लगाई है। उधर इक उच्च अधिकारी वित्त मंत्रालय में हैं हंसमुख आधिया उनका कहना है कि जी एस टी की नाकामी की वजह इनफ़ोसिस का बनाया सॉफ्टवेयर है जो ठीक काम नहीं कर रहा है। हम इस सब को यहीं छोड़ देते हैं ये सियासत की बातें हैं अपनी समझ से बाहर हैं। दुनिया के दस्तूर निराले हैं नाम शोहरत वालों के पीछे दौड़ती है मगर जो वो कहते हैं सुनती ज़रूर है मानती कभी नहीं है। 
 
                इक पुलिस वाला आया कागज़ों का पुलिंदा लेकर , दूर किसी शहर में कब से कोई मुकदमा चल रहा है और आपकी लिखावट पाई गई है , आपको वहां की अदालत में जाकर गवाही देनी है। मुझे कुछ समझ नहीं आया कि माजरा क्या है , मगर अदालती नोटिस है जाना तो होगा ही। अदालत जाने पर मालूम हुआ कि बहुत पहले इक रचना भेजी थी , मैंने ख़ुदकुशी नहीं की , मेरा कत्ल किया गया है। सच के कत्ल होने की बात थी मगर उस में अदालत पुलिस कहां से आ गये। पता चला कि डाकिया जब डाक को छांट रहा था इक लिफाफा खुल गया और उसने पढ़ भी लिया। उसने समझदारी दिखाते हुए जिनको भेजी गई थी रचना उनके बारे ये समझा कि किसी ने ख़ुदकुशी से पहले उनको दोषी बताया है। पुलिस ने करवाई की और उनको पकड़ लिया , इतना ही नहीं कागज़ों पर आदान प्रदान करते उस नाम के व्यक्ति की मौत की पुष्टि और जाने क्या क्या कर दिया। मैंने कहा न्यायधीश महोदय ऐसा कोई कत्ल वास्तव में नहीं हुआ और ये केवल इक व्यंग्य कहानी है सच के हो रहे कत्ल के बारे में। न्यायधीश बोले तुमसे जो सवाल पूछे जाएं उनके जवाब देने हैं। सच को कत्ल किया गया , तुम मानते हो। ये लोग भी सच को कत्ल करते हैं , आपको ये भी लगता है। लिखावट आपकी है इस से मुकर नहीं सकते। अभी तो आप सरकारी गवाह हैं आपको आने जाने का खर्चा भी मिलेगा , अगर बचाव पक्ष को बेगुनाह बताया तो तुम्हें भी उन्हीं में शामिल किया जा सकता है। भोजन अवकाश में पुलिस वाला समझाने लगा जैसा हम चाहते हैं वही बयान दो इस में तुम्हारी भलाई है। ये बड़े लोग हैं और टीवी मीडिया सब इस खबर को कवर कर रहे हैं। तुम्हारा नाम हो जायेगा और मश्हूर हो जाओगे। आप क्या सलाह देते हो सरकार और नेताओं की तरह झूठी शोहरत हासिल कर लूं। अपनी आत्मा अपने ज़मीर को मार कर खुद की खुदी को बेच कर ख़ास लोगों में शामिल कर इस मुकदमें पर टीवी अख़बार में बहस का हिस्सा बन धन दौलत जमा करने लग जाऊं इनकी तरह से। नहीं होगा मुझसे। अदालत को सब सच सच बताया और सबूत भी दिया कि ये रचना कई जगह छप चुकी है बहुत पहले ही और मेरे ब्लॉग पर भी लिखी हुई है। मुकदमा झूठा है बताना संभव नहीं था इसलिए अदालत ने निर्णय दे दिया है साक्ष्य नहीं मिलने और अभी तक सच की लाश बरामद नहीं हो पाने से सबूतों के आभाव में बरी किया जाता है।