सत्तासुंदरी का चीरहरण ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया
सभा आयोग की है , चर्चा महाभियोग की है , राजनीति को लग चुके गंभीर लाईलाज रोग की है । मुखिया को इक ऐसा वरदान उपहार में दिया गया जिस से उस के सौ नहीं करोड़ नहीं असंख्य अपराध करने पर भी कोई सज़ा की तो बात ही क्या कोई मुकदमा तक दर्ज नहीं किया जा सकेगा । ऐसा अभयदान मिलना कोई छोटी बात नहीं थी लेकिन जब ये साबित हो गया कि आयोग में कोई आधुनिक दुर्योधन सत्तासुंदरी का चीरहरण निरंतर कर रहा था और सभी मंच पर आसीन सदस्य ख़ामोशी से तमाशाई बन जो होता है होने दो को चतिरार्थ करते रहे , लेकिन अपनी असहमति दर्ज भी ऐसे करते रहे जैसे कोई महसूस करता है कि उनका इस से कुछ लेना देना नहीं है , अकेला इक व्यक्ति लाभार्थी है । खुल कर कहते तो रासलीला में उनको शामिल ही नहीं किया गया वो दोनों तरसते ही रहे । रोकने की चेष्टा उन्होंने की ही नहीं का मतलब वही जानते है क्योंकि सब गैरकानूनी ढंग से हो रहा समझ कर भी उनको अपने कर्तव्य निभाने की आवश्यकता नहीं महसूस हुई कभी । जब बात खुली तब उनको अपना बचाव याद आया देश की व्यवस्था को बर्बाद होते देख कर बचाना उनको महत्वपूर्ण नहीं लगा था । कुछ लोग जिनको हमेशा किसी धर्म को बचाने की चिंता रहती थी उनको धर्म अधर्म से कोई मतलब नहीं रहा है उनको यकीन हो गया कि सिर्फ आयोग के मुखिया ही इकलौते ऐसे शख़्स हैं जिनके कारण उनका कायम शासन कायम है , ऐसे में उनको देश का सबसे बड़ा पुरस्कार भारत रत्न देना कोई विशेष बड़ी बात नहीं है ।
कब से सत्तासुंदरी का नृत्य देखने का आनंद उनको मिलता रहा था केवल उसी आयोग की अनुकंपा से ही बाक़ी जितना भी प्रयास किया गया धन दौलत प्रचार इत्यादि सब किसी काम नहीं आता बिना उनकी मर्ज़ी से चुनावी राजनीति का गणित साधना असंभव ही होता । धार्मिक कथाओं कहानियों पर इधर कितनी फ़िल्में टीवी सीरियल बनाये जा रहे हैं लेकिन कोई नहीं जानता था कि आज भी कोई आधुनिक युग की महाभारत कथा की पटकथा लिख ही नहीं रहा बल्कि दुर्योधन का अवतार बन कर जीवंत किरदार निभा रहा है वो भी ऐसे कि कोई कृष्ण नहीं प्रकट हो सके बचाने को । आधुनिक शासन में शकुनी से लेकर सभी सभासद धृतराष्ट्र के पुत्रमोह का समर्थन खुल कर कर रहे थे किसी को भी कुछ भी अनुचित प्रतीत नहीं होता था क्योंकि सभी अपने अपने स्वार्थों और घर परिवार के मोहजाल में उलझे हुए अपनी मौज में निरपेक्ष भाव से सहभागी थे । आधुनिक युग की रामायण वास्तव में महाभारतकालीन कथा का नवीन संस्करण है , जनता रुपी सीता का अपहरण खुद जिस ने किया है उसने राजा राम का रूप वेशभूषा धारण कर अयोध्या ही नहीं सब दुनिया को भ्र्मजाल में फंसा लिया है ।
कोई संतान नहीं है लव कुश जैसी जो सभी को राजा राम की वास्तविक कथा सुनाते , नकली संताने कितनी हैं जिनको अपने आका का झूठा गुणगान करना पसंद है ताकि उनको सत्ता की रेवड़ियां मिलती रहें । आधुनिक अधर्म कथा का कोई अंत कभी नहीं होने वाला है बल्कि जाने कितने नये अध्याय आगे शामिल होने को तैयार हैं । लोग कुछ भी कहते नहीं हैं भले भगवान के मंदिर से ही लुटेरे चोरी कर शान से भगवान भक्त कहलाते रहें । आयोग ने सर्वसम्मति से इक गीत को स्वीकृति प्रदान की है जिसे सभी कर्मचारियों को वितरित किया गया है समझने और पालन करने को तभी उनका भविष्य सुरक्षित रहेगा । देश में करोड़ों लोगों को भले घना अंधकार नसीब होता रहे उनके लिए चकाचौंध रौशनी मिलने का इंतज़ाम किया जाता रहेगा ।
चुप नहीं रहते तो यूं कहा करो ( हास्य - कविता )
सी लो लबों को और चुप रहा करो
ज़ुल्म भी हंसते हंसते सब सहा करो ।
चोर को साहूकार कहना सीखो भी
अब ख़िज़ाओं को बहार कहा करो ।
ये ज़माना झूठे लोगों का है ज़माना
हमको तुम सब पर ऐतबार कहा करो ।
देश के रहनुमाओं का यकीन करो
इश्तिहार पढ़कर सरकार कहा करो ।
उनकी हसरत मसीहा लोग समझें
क़ातिल पर आता है प्यार कहा करो ।
जिनके तख्त ओ ताज़ हुक़ूमत हो
बड़े अच्छे उनके सब यार कहा करो ।
आप अपने ही घर में रहकर खुद को
हम यहां पर हैं किराएदार कहा करो ।
ज़िंदगी और मौत दोनों का यकीन नहीं
जनाबेआली हम ख़ाकसार कहा करो ।
सितमगर है सितम की फ़ितरत भी है
ज़ख़्म देता है दिया उपहार कहा करो ।

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