काश मिलता एक अपना ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
काश मिलता एक अपना
इक यही बाक़ी है सपना ।
फूल - कांटे एक दोनों
क्यों किसी में फ़र्क रखना ।
अब तो सागर की तरह तुम
सीख लो चुपचाप बहना ।
उठ के महफ़िल से चले हम
भूल जाना , याद करना ।
हम वो प्यासे लोग जिनको
सूख जाता , देख झरना ।
हम , नहीं परवाह करते
कुछ नहीं अब और कहना ।
छोड़ दो ' तनहा ' ये बातें
रोज़ जीना , रोज़ मरना ।

1 टिप्पणी:
Wahh फूल काँटें क्या किसी मे 👌👍
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