जुलाई 25, 2026

POST : 2091 काश मिलता एक अपना ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

         काश मिलता एक अपना ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया  

काश मिलता एक अपना 
इक यही बाक़ी है सपना । 
 
फूल - कांटे एक दोनों 
क्यों किसी में फ़र्क रखना । 
 
अब तो सागर की तरह तुम 
सीख लो चुपचाप बहना । 
 
उठ के महफ़िल से चले हम 
भूल जाना , याद करना । 
 
हम वो प्यासे लोग जिनको 
सूख जाता  , देख झरना ।
 
हम , नहीं परवाह करते 
कुछ नहीं अब और कहना । 
 
छोड़ दो ' तनहा '  ये बातें 
रोज़ जीना ,  रोज़ मरना ।  
 

 
 
 

1 टिप्पणी:

Sanjaytanha ने कहा…

Wahh फूल काँटें क्या किसी मे 👌👍