जुलाई 19, 2026

POST : 2086 संविधान की खोज ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

       संविधान की खोज ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया  

कुछ दिनों से लोग उसकी चर्चा करने लगे हैं , कोई कुछ कहता है कोई कुछ और कहता है , ऐसे में किसी ने सवाल किया संविधान की हालत समझने से पहले ये तो पता चले कि वो आजकल है किस जगह किस की देखभाल में। संसद भवन से सर्वोच्च न्यायालय तक उसकी मूल भावना को देखने को मूलप्रति ढूंढने पर दिखाई नहीं दे रही है । क्या किसी ने गायब कर दिया है या छुपा दिया है अथवा किसी गहरे गढ्ढे में दफ़न कर दिया है , शोधकर्ता को आशंका है कि किसी किताब  को निरंतर बंद रखने और कभी खोल कर अधिक समय तक नहीं पढ़ने पर उसकी लिखावट से कागज़ तक जीर्ण - शीर्ण अथवा क्षरण होने या दीमक कीड़ों द्वारा खाया जाना एवं कबाड़ होना मुमकिन है। लेकिन किसी महापंडित ने बतलाया है कि संविधान की झूठी शपथ राजनेताओं ने इतनी बार उठाई है कि झूठी क़सम का बोझ बढ़ने से उसका दम घुट गया है। संविधान की चिंता उस पर चलने की उसका पालन करने की परवाह कभी भी किसी भी राजनैतिक दल ने नहीं की और सभी सरकारी प्रशासन कार्यपालिका न्यायपालिका ने उसके साथ मनमानी की है जैसे किसी बेबस अबला की आबरू को लूटते है तमाम वहशी लोग। कुछ लोग जगह जगह गुहार लगाते फिरते थे संविधान की सुरक्षा की लेकिन उनकी भी चिंता संविधान से पहले खुद अपने को लेकर रहती थी , इसलिए सोशल मीडिया पर शोर मचाना ही उनको ज़रूरी लगता था। जीवंत संविधान की शायद किसी को आवश्यकता ही नहीं महसूस हुई कभी। 
 
मैंने इंसाफ़ की गंगा को लेकर इक ग़ज़ल कही थी जो ब्लॉग मेरी किताब यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है और कितनी जगह प्रकाशित हुई थी कई साल पहले। 8 सितंबर 1998 की डायरी पर लिखी हुई आज भी रखी है। मैंने उस ग़ज़ल में इक शेर लिखा था जिस में संविधान को लेकर आशंका व्यक्त की थी कि जिन इमारतों पर तिरंगा फ़हराता है उन में भी शायद वो सुरक्षित नहीं है। मुझे मेरे गुरूजी ने आर पी महरिष जी ने शेर को शामिल नहीं करने अथवा फिर बदल कर झंडा शब्द करने का सुझाव दिया था और मैंने उनका आदेश मान लिया था। आज वो ज़िंदा नहीं हैं वर्ना शायद आज उनको भी लगता की शेर को रखना उचित था और झंडा नहीं तिरंगा शब्द उपयोग करना भी अनुचित नहीं था ।शायद तब ऐसी आशंका अधिकांश लोगों को नहीं थी जबकि आज सभी देख समझ रहे हैं कि देश के संविधान की वास्तविक भावनाओं से खिलवाड़ करना हर शासक की आदत बन गई है । 
 
संविधान ग़ुम  कर दिया गया है या उसका नामो - निशान मिटाकर उसकी दुहाई दी जा रही है पर उसकी तलाश कोई नहीं करना चाहता । सभी ने सत्ता और पैसे की ख़ातिर संविधान को अपनी मर्ज़ी से परिभाषित किया है , कौन कौन उसका गुनहगार है सूचि बड़ी लंबी है । जैसे कोई किसी का क़त्ल करने के बाद उसकी शोकसभा में संवेदना व्यक्त करता हो ऐसा ही शासक वर्ग करते हैं। अदालत दफ़्तर से सरकारी सभी संसथानों में रोज़ संविधान से विपरीत आचरण किया जाता है सिर्फ कहने को पालना की बार शपथ लेते समय की जाती है । कुछ दोहे पढ़ते हैं उस के बाद न्याय व्यवस्था पर मेरी ग़ज़ल सुनते हैं । 
 

देश के वर्तमान हालात पर वक़्त के दोहे : - 

( डॉ लोक सेतिया )  

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख ।

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर ।

तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग ।

दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल ।

झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार ।

नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग ।

चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार ।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान।  
 
अंधे - बहरे शहर में ये बातें बेमोल 
कौन सुनेगा अब यहां तनहा तेरे बोल । 
 

 
   

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