हमारे वक़्त की अनुगूंज ( व्यंग्य रचनाएं ) डॉ लोक सेतिया
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1 स्वर्ग लोक में उल्टा पुल्टा ( तरकश )
स्वागत की तैयारियां चल रही हैं। हर तरफ शानदार दृष्य सजावट का , राहों पर रंग बिरंगे फूल बिछे हैं।ऐसा यहां कभी कभी ही होता है , कई कई सालों बाद जब स्वर्ग लोक में किसी ऐसी आत्मा ने आना होता है जो ईश्वर को बेहद प्रिय हो। सभी देवी देवता , तमाम स्वर्गवासी उपस्थित रहते हैं ऐसी आत्मा के स्वागत करने के लिये। सभी हाथों में पुष्प लिये खड़े हैं , आने वाली आत्मा पर वर्षा करने के लिये। तभी आकाशवाणी होती है , स्वागत को तैयार रहें , भारत भूमि से एक महान व्यंग्कार की आत्मा का आगमन होने वाला है। ईश्वर के दूत जसपाल भट्टी जी को लाते हैं पालकी पर बिठा कर और ईश्वर के दरबार में सम्मान सहित आसन पर बिठा देते हैं। ईश्वर प्रकट होते हैं और जसपाल भट्टी के पास जाकर कहते हैं , प्रिय पुत्र जसपाल भट्टी आपका यहां बहुत बहुत स्वागत है। जसपाल भट्टी का चेहरा सदा की तरह गंभीर नज़र आ रहा है , जैसे कुछ सोच विचार कर रहे हों। थोड़ी देर में भट्टी जी बोलते हैं , आपके दूत कह रहे थे आपने मुझे बुलाया है स्वर्गलोक में , क्या यही स्वर्गलोक है। ईश्वर बोले आप अब स्वर्गलोक में ही हैं। भट्टी जी ने पूछा ये सब सजावट , स्वागत द्वार।
ईश्वर बोले आपके लिये ये सारा स्वागत है पुत्र। भट्टी कहने लगे आपकी माया मुझे समझ नहीं आई , क्या आप मेरी उल्टा पुल्टा बातों का मुझे जवाब दे सकेंगे। ईश्वर बोले आप जो भी चाहो बेझिझक पूछ सकते हैं।
जसपाल भट्टी कहने लगे मुझे तो लग रहा था आपके दूत भूल से मुझे वहीं धरती पर ले आये हैं , जहां मुख्य मंत्री प्रधान मंत्री अथवा किसी विदेशी महमान के आने पर देश की गरीबी और बदहाली को छिपाने को मार्गों को सजा दिया जाता है , और उनके मार्ग से गुज़रते ही सारी सजावट हटा ली जाती है। लेकिन क्षमा करें मैं राजनेता नहीं हूं जो उस सजावट के पीछे का सच नहीं देखना चाहते। मैंने तो यहां आते हुए पूरा दृष्य ध्यान से देखा है , आपके इस स्वर्गलोक का हाल भी मुझे कुछ अच्छा नहीं दिखाई दिया। और मैं सोच रहा हूं कि हम धरती वाले बेकार आपसे उम्मीद लगाये बैठे हैं कि वहां सब ठीक करोगे , जब आप अपने इस लोक का ही ध्यान नहीं रख रहे तो उस लोक की क्या फ़िक्र आपको होगी।
भट्टी जी बात सुनकर प्रभु उदास हो गये , बोले आपने सही कहा है पुत्र। मैं कब से परेशान हूं कि कैसे यहां सब सही किया जाये। बस इसी काम के लिये तुम्हें समय से पहले ही बुलवा लिया है। कुछ दिन पहले तुमने जब विनती की थी कि अब तुमसे देश की दुर्दशा और देखी नहीं जाती क्योंकि अब नेताओं को शर्म नहीं आती जब उनके घोटालों का पर्दाफाश होता है। उनपर व्यंग्य करने से भी कुछ हासिल नहीं होता और तुम वो देखना नहीं चाहते अब। इसलिए आपकी उस विनती को सुन आपकी इच्छा पूर्ण करने के लिये ही आपको स्वर्गलोक में बुलवाना उचित समझा। शायद तुम यहां भी कुछ उल्टा पुल्टा , कोई फलॉप शो , कोई मुर्ख सभा का गठन कर स्वर्गलोक के वासियों , देवताओं , देवियों को समझा पाओ कि उनको करना कुछ था और वे कर कुछ और ही रहे हैं।
स्वागत सभा के बाद ईश्वर भट्टी जी को अपने कक्ष में लेकर आये और बताया कि मैंने तो दुनिया को ढंग से सुचारू रूप से चलाने का पूरा प्रबंध किया था। हर देवी देवता को उनका विभाग सौंप दिया था पूरी तरह ताकि वो विश्व का कल्याण करें। मगर इन सभी ने वही किया जो नेता लोग किया करते हैं , जनता के कल्याण की राशि का उपयोग अपने खास लोगों को खुश करने को इस्तेमाल करना। उसी प्रकार सब देवी देवता भी अपनी कृपा दीन दुखियों पर न कर के अपना अपना धर्मस्थल बनाने वालों पर करने लगे जिसकी सज़ा आम लोग बिना अपराध किये भोग रहे हैं। जसपाल भट्टी बोले क्या आपने यहां कैग जैसी कोई संस्था नहीं बनाई हुई जो इनके कार्यों की बही खातों की नियमित जांच करती और अगर कोई अनियमितता हो तो आपको सूचित करती। ईश्वर बोले नहीं मुझे अपने सभी देवी देवताओं पर विश्वास था इसलिये किसी निगरानी कि व्यवस्था ही नहीं करना ज़रूरी लगा। हां नारद जी एक बार कह रहे थे कि चित्रगुप्त जी के हिसाब की जांच की जानी चाहये , क्योंकि उनको लगता है कि धरती पर अब कर्मों का फल उल्टा मिलने लगा है। पाप करने वाले फल फूल रहे हैं और धर्म पर चलने वाले दुखी हैं। जसपाल भट्टी जी का सुझाव मानकर ईश्वर ने स्वर्गलोक में कैग जैसी इक संस्था का गठन कर के जसपाल भट्टी जी को उसका कार्यभार सौंप दिया है। बहुत जल्द स्वर्गलोक में सब उल्टा पुल्टा होने की संभावना है।
2 डेमोक्रेसी का सपना ( व्यंग्य )
कल रत मेरे सपने में वो आ गई जिसे मैं चाहता रहा हमेशा से। मैं जिसका दीवाना था। मेरे इतना करीब कि मैं छू सकता था उसे। मगर फिर वही पुरानी आदत कि मैं उसे कभी दिल की बात कह भी नहीं सका न अपना हाथ बढ़ा कर उसका दामन भी थाम न सका। नाम सुना था बहुत उसका मगर कभी नज़र आई नहीं थी कहीं वो। जैसे हर कुंवारे की कल्पना होती है ,कुछ उसी तरह हमारे मन में डेमोक्रसी की मोहिनी सूरत का ख्वाब पलता रहा। इसलिये जब विश्वस्त सूत्रों ने सूचना दी कि आ रही है वो , तो हम खुशी से फूले नहीं समाये और उसका स्वागत करने को तैयार हो कर बैठ गये। कहीं दूर से शोर सुनाई दे रहा था उसकी जय जयकार हो रही थी ,और हम अपने घर से निकल कर सड़क पर चले आये। देखा हर कोई उसको फूलों की माला पहनाने को बेताब है। सब यही समझ रहे थे कि वो हमारे घर की शोभा बढ़ाने को आ रही है। तभी पता चला कि वो राजनेता की हवेली में प्रवेश कर गई और हवेली का द्वार बंद कर दिया गया उसकी सुरक्षा की बात कह कर। आम जनता बैठी रह गई उसकी सूरत को एक नज़र देखने की आस लगाये , और वो किसी बड़े घर की दुल्हन की तरह छिप गई हवेली के पर्दों के पीछे जाकर। सबने यही सोच अपना दिल बहला लिया कि जिसमें उसकी ख़ुशी हम भी उसी में खुश हैं। अब सभी के मन की मुराद वो कैसे पूरी करती , अबला की तरह।अचानक रात को हम राजनेता की हवेली के पीछे से गुज़र रहे थे कि हमें अंदर से रोने सुबकने की आवाज़ें सुनाई दी। हमने जाकर खिड़की से दरार में से भीतर झांका तो हमें अंदर का नज़ारा दिखाई दे ही गया। अंदर नयी दुल्हन सी सजी संवरी डेमोक्रेसी इक कमरे में कैद थी और मुझे कोई बचाओ की गुहार लगा रही थी। मगर उसकी आवाज़ दब कर रह जाती थी हवेली के उस कमरे में ही। हमने भी सोच लिया कि चाहे जो भी हो आज हम डेमोक्रसी का हाल जान कर रहेंगे और भीतर जाकर मिलेंगे उससे। किसी तरह हम हवेली की दीवार को फांद कर पहुंच ही गये अपनी महबूबा के पास। राजसिंघासन जैसी सजी सेज पर सजी धजी बैठी डेमोक्रसी को देखा तो लगा हमारा सपना साकार हो गया है। हमने पूछा उससे कि इस शाही चमक दमक , इतने बनाव श्रृगांर के बावजूद भी तुम्हारे चेहरे पर उदासी क्यों दिखाई दे रही है हमें। इस भरी जवानी में किस बात की चिंता है तुम्हें , यहां हर कोई तो तुम्हारा चाहने वाला है। तुम्हारे लुभावने रूप की चर्चा है हर तरफ। नेता अफसर सब पल पल तुम्हारा नाम जपते हैं , तुहारी चाहत का दम भरते हैं। जनता में तुम्हारी सुंदरता की ऐसी छवि बनी हुई है कि तुम्हें पाना चाहती है अपना सब कुछ लुटा कर भी। तुमसे प्यार है देश की सारी जनता को , ऐसा लगता है कि तुम्हें कोई वरदान मिला हुआ है चिरयौवन का जो आज़ादी के छिहासठ साल बाद भी तुम्हारी सलोना रूप मोह रहा है सभी को।
मेरी बात सुनते ही आंसुओं से भर आई डेमोक्रसी को आंखें। कहने लगी ये सारा मेकअप है मेरे असली चेहरे को सब से छुपाने के लिये। मेरे चेहरे का रंग तो पीला पड़ चुका है और रो रो कर मेरी आंखों के नीचे काले धब्बे पड़ गये हैं। भ्रष्टाचार रूपी कैंसर मेरे फेफड़ों को खाये जा रहा है और मेरा दम तो खुली हवा में भी घुटने लगा है आजकल। मेरे पूरे बदन पर निशान हैं राजनीति से मिले अनगिनित ज़ख्मों के जो छुपे हुए हैं इस चमकीले खूबसूरत लिबास के भीतर। मेरी आत्मा लहुलूहान हो चुकी है , कब से सत्ता की हवेली में कुछ लोगों का दिल बहलाने को नाचकर। जैसे दहेज के लोभी ससुराल वाले अपनी दुल्हन को सताते हैं उसके परिवार वालों से धन ऐंठने के लिये , वैसा ही अत्याचार हो रहा हर दिन मुझ पर। ये सब नेता अफसर मेरे साथ अनाचार करते रहते हैं और बेचारी जनता किसी बेबस बाप की तरह चुपचाप सब देख कर भी कुछ नहीं कर पा रही है। जनता को समझ नहीं आ रहा कि अपनी इस राजदुलारी को कैसे बचाये।
मैंने कहा डेमोक्रसी अब ज़माना बदल चुका है , अब बहू पे अत्याचार करने वालों को बेटी के माता पिता सबक सिखा देते हैं। दुल्हन को जलाने वालों के विरुद्ध धरने परदर्शन किये जाते हैं। महिलाओं की रक्षा के लिये बहुत कड़े कानून लागू हो चुके हैं। तुम अपनी व्यथा अपना दुःख अपने माता पिता रूपी जनता को सुनाओ , आखिर कब तक भीतर ही भीतर घुटती रहोगी। डेमोक्रसी बोली तुम भी जानते हो दुनिया चाहे जितनी भी बदल चुकी हो महिलाओं की दशा नहीं बदली है आज तक। इसीलिये तुम्हें आज अपने पास बुलाया है ताकि तुम मेरी बात सुन कर सब को बताओ बाहर जाकर। मेरे साथ होते अत्याचार कि एफ आई आर दर्ज करवाओ , किसी तरह से मुझे इंसाफ दिलाओ। तभी हवेली के बाहर से डेमोक्रसी की जय जयकार के नारों की आवाज़ें सुनाई देने लगी थी , शायद रात खत्म होने को थी। अचानक मेरी नींद खुल गई और मेरा सपना टूट गया था। मेरे घर के बहार वोट मांगने वालों का शोर सुनाई दे रहा था।
3 सत्ताशास्त्र ( व्यंग्य )
किसी ज़माने में जो शिक्षा राज्य के राजकुमारों को दी जाती थी ताकि वो जब राजा बनें तो शासन करने के तौर तरीके ठीक से जानते हों। वही बातें इस किताब में विस्तार से समझाई गई हैं। यह पुस्तक एक अति गोपनीय दस्तावेज़ है , विकिलीक्स की तरह मैं बड़ा जोखिम लेकर इस में लिखी हुई सभी राज़ की बातें आपको बताने जा रहा हूं। मैंने इस पुस्तक की जानकारी किसी सरकारी वेबसाईट से हैक नहीं की है , वास्तव में इसके बारे में सरकारी उच्च पदों पर बैठे लोगों तक को कुछ भी पता नहीं है। इस पुस्तक की गिनी चुनी प्रतियां ही उपलब्ध हैं और इसके प्रकाशन या फोटोप्रति बनाने तक पर देश में प्रतिबंध है। जब भी कोई प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री बनता है तब शपथ लेने के बाद उसको ये पुस्तक सीलबंद मिलती है ताकि उसको शासन करने के गुर पता चल सकें। और जब वो पदमुक्त हो जाता है तब वो इस पुस्तक को सीलबंद कर के रख जाता है अपने बाद आने वाले नये शासक को देने के लिये। इस पुस्तक की सुरक्षा का कड़ा प्रबंध रखा जाता रहा है हमेशा से , आम जनता का इस पुस्तक के बारे जानने का प्रयास तक बहुत संगीन अपराध है। आप तक इस पुस्तक की जानकारी पहुंचाने का वास्तविक श्रेय उस चोर को जाता है जिसने अपने मौसेरे भाई , सत्ताधारी शासक के पास से इस पुस्तक को चुराने का साहसपूर्ण कार्य कर दिखाया है। क्योंकि वह चोर खुद अंगूठा छाप है और खुद पढ़ने में असमर्थ है इसलिये ये किताब मुझे दे गया है , इस ताकीद के साथ कि इसको ठीक प्रकार से पढ़ कर समझ कर उसको सत्ता के सभी गुर सिखला दूं। अब आगे उस पुस्तक की हर बात जस की तस।आज से आप शासन की बागडोर संभाल रहे हैं अर्थात आप शासक बन गये हैं , अब इस बात को पल भर को भी भुलाना नहीं है कि आज से आप राजा हैं और बाक़ी सब आपकी प्रजा। याद रखना है कि प्रजा को प्रजा ही बनाए रखना है कभी भी उसको अपनी बराबरी पर नहीं आने देना है अन्यथा आप राजा या शासक नहीं रह सकते हैं एक दिन को भी। आपका सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण कार्य है सदा राजा बन कर शासन करना। आपके लिये तमाम अधिकार आवश्यक हैं सरकार चलाने के लिये और सभी कर्तव्य आप बाकी लोगों के लिये छोड़ दें। जनता को , प्रशासन के अधिकारियों को , मंत्रियों , सचिवों और अपने सब सहायकों को बताते रहें कि उनका कर्त्तव्य है आपके हर आदेश का पालन करना। लेकिन आप खुद जो भी चाहें कर सकते हैं , कोई भी सीमारेखा आपके लिये नहीं है। कभी भी अगर कोई नियम कोई कानून कोई संविधान का प्रावधान आपकी राह में बाधा बने तो उसको तुरंत बदल डालें जनहित का नाम देकर।
अब आपको किसी भी धर्म के लिये नहीं सोचना है , आज से सत्ता ही आपका धर्म है ईमान है भगवान है। पाप और पुण्य बाकी धर्म वालों के वास्ते हैं , आपका हर इक कर्म राज्य के हित में आवश्यक है। आपको नैतिक अनैतिक की चिंता को छोड़ हर प्रकार से मनमानी करनी है , अन्यथा शासन प्राप्त करने की क्या ज़रूरत थी। आपने चुनाव जीतने के लिये जो जो वादे जनता से किये थे उनको सदा याद रखना है और ये भी देखना है कि वो कभी भी पूरे नहीं हों। अगर शासक जनता की समस्याएं हल करने लगे और जनता को उसके सभी अधिकार देने लगे तो वो शासक नहीं रह जाएंगे बल्कि सेवक बन कर रह जाएंगे। लेकिन आपको भूल कर भी सेवक नहीं बनना है , आपको शासक बन कर राज करना है राजा बन कर , चाहे देश में लोकतंत्र हो। मगर आप जनता के सेवक हैं ऐसा प्रचार करना ज़रूरी है लोकशाही के नाम पर राजशाही कायम रखने के लिये।
आप शासक जनता को कुछ भी देने के लिये नहीं बने हैं , आपको बार बार नये नये कर लगाने हैं अपने सरकारी खज़ाने को भर कर उसका उपयोग अपने लिये , अपने परिवार वालों के लिये , अपने प्रशासन के लोगों के लिये सभी सुःख सुविधायें उपलब्ध करवाने बेरहमी से करना है। जनता तक अपने बजट का बहुत छोटा सा भाग पहुंचने देना है ऊंठ के मुंह में जीरे के समान। लेकिन ऐसा करने को बहुत ही महान कल्याणकारी कदम घोषित करते रहना ज़रूरी है। आपको ऐसे हालात बनाने हैं कि जनता आपके सामने भिखारी की तरह भीख मांगने को मज़बूर रहे।
राज्य का प्रशासन , पुलिस ,न्यायपालिका आम जनता को इंसाफ देने के लिये नहीं बनाये गये हैं। इनको कभी भी ऐसा करने नहीं देना है। इन सब को अपने इशारों पर चलाने का काम करना है , इसलिये इन्हें भी अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते रहने की अघोषित छूट देनी है और ज़रूरत पड़ने पर इनको बलि का बकरा बना कर अपनी खाल बचानी है। अपने अफसरों , मंत्रियों के अपकर्मों की जानकारी सबूत समेत अपने पास छुपा कर रखनी है ताकि इनमें से कोई अगर कभी आपकी राह में रुकावट डालने का कार्य करे तो उससे निपटने का काम बखूबी लिया जा सके। अब जब सत्ता आपके हाथ आ गई है तो ये कभी विचार नहीं करना है कि कभी आपको कुर्सी से हटना भी है या कोई आपको हटा सकता है। आपको यही मान लेना है कि अब कुर्सी आपकी अपनी विरासत बन गई है और आपने न केवल जीवन भर इस पर काबिज़ रहना है बल्कि आपके मरने के बाद भी इसको अपने बेटे , पत्नी या दामाद के लिये आरक्षित करने का कार्य करना है। हर सुबह आपने अपना एक आदर्श वाक्य दोहराते रहना है कि राजा कभी भी गलत नहीं होता है। आप जो भी कर रहे हैं वही सही है। यकीन माने सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और देश का हर प्रधानमंत्री इस पुस्तक की हर बात पर पूरी तरह से अमल करते हैं करते रहे हैं और आगे भी करते ही रहेंगे।
4 बाल की खाल ( व्यंग्य )
आखिर शर्मा जी का आप्रेशन हो ही गया। पांच साल से पेट दर्द का इलाज कराते कराते शर्मा जी जितना तंग आ चुके थे उससे ज़्यादा डॉ सिंह कोई आराम नहीं है की शिकायत सुनते सुनते। इसलिये उन्होंने ये आखिरी कोशिश करने का फैसला किया था कि पेट को चीर कर ही देखा जाये। अभी तक किसी भी टैस्ट से कुछ नहीं मिला था , शायद आप्रेशन से ही किसी रोग का पता चल सके। डॉ सिंह जब वार्ड का राउंड लेने आये तब शर्मा जी को होश आ चुका था , आते ही मुस्कुरा कर बोले लो शर्मा जी आपकी परेशानी का अंत हो गया है। आपकी आंतड़ियों में रुकावट थी उसको पूरी तरह दूर कर दिया है। बस अब किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी। अब आप बिलकुल ठीक हैं , केवल दो तीन दिन तक कुछ भी खाना नहीं है , ग्लुकोज़ से ही खुराक देंगे। डॉ सिंह वापस जाने लगे तो शर्मा जी ने पूछ ही लिया डॉक्टर साहिब अब फिर से तो दर्द नहीं होगा कभी ! "नहीं अब कभी नहीं होगा वो दर्द लेकिन आपको एक बात का ख्याल रखना होगा खाना खाते समय कि खाने में बाल नहीं हों "। शर्मा जी को उनकी बात समझ नहीं आई इसलिये सवाल किया डॉ साहिब क्या मतलब। डॉ सिंह बोले , देखो शर्मा जी आपके पेट से बालों का गुच्छा निकला है उसी से सारी गड़बड़ थी , अब वो रुकावट फिर से नहीं हो इसके लिये एतिहात बरतनी होगी कि खाने के साथ बाल न खाओ। अच्छा ये बताओ शर्मा जी क्या श्रीमती शर्मा के बाल काफी लंबे हैं। "हां लंबे तो हैं "शर्मा जी ने जवाब दिया। डॉ सिंह बोले तब तो उनकी कटिंग करवा दो , आजकल फैशन भी है छोटे बालों का , न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। हंसते हुए डॉ साहिब तो सलाह दे गये लेकिन शर्मा को एक नई चिंता दे गये। अब तक शर्मा जी को पत्नी से ये शिकायत रहती थी कि वो खाने में मिर्च मसाले ज़्यादा डालती हैं और शायद दर्द का यही कारण है। मगर ऐसा तो कभी नहीं सोचा था शर्मा जी ने कि जिस नागिन सी चोटी पर वो फ़िदा थे वो इस कदर खतरनाक भी हो सकती है। कितनी बार उन्होंने रोटी से बाल निकाल कर फैंक दिये थे और बस इतना ही कहा था श्रीमती जी बालों को बांध कर रखा करो , यूं खुला न छोड़ा करो। वो भी मुस्कुरा भर देती थी , मगर उनसे बाल कटवाने को कहना एक बड़ी समस्या थी। वो कितनी बार घने लंबे और रेशमी बालों की प्रतियोगिताओं में प्रथम आ चुकी थी और अगर उनको अपने पति और बालों में से किसी एक को चुनना पड़े तो शायद वो अपने बालों को ही चुनेंगी , शर्मा जी को लगता था।फिर भी सहस बटोर कर शर्मा जी ने डॉ सिंह की कही बात अपनी पत्नी से कह ही दी जब वो मिलने को आई। एक बार तो थोड़ा परेशान और हैरान हुई वो फिर कुछ देर खामोश रहने के बाद सोचते हुए कहने लगी ये सब डॉ सिंह कि मिसेज़ कि चाल लगती है। दो बार मुझसे प्रतियोगिता में मुझसे पीछे रही है तो ऐसे मेरा पत्ता साफ करवाना चाहती है। शर्मा जी को लगा कहीं वो बात का बतंगड़ न बना दे इसलिए समझा कर कहने लगे भला डॉ सिंह ऐसा क्यों करने लगे , वो जाने माने सर्जन हैं , कभी भी कोई गलत काम नहीं कर सकते। ऐसे उनपर शक करना गलत है और बालों का गुच्छा निकला है ये वो नर्स भी जानती है जो तुम्हारी सहेली है और आप्रेशन में डॉ सिंह के साथ ही थी। लेकिन श्रीमती शर्मा कब मानने वाली थी , कहने लगी आप बताओ डॉ सिंह को क्या मालूम कि वो मेरे बाल हैं। शादी से पहले आप माता जी के हाथ की रोटी खाते रहे हैं उनके भी तो हो सकते हैं। फिर भी आपको मुझे ही दोष देना है तो लो आज से मैं रोटी नहीं बनाया करूंगी , आप घर के लिये एक नौकरानी का प्रबंध कर दो , ये कह श्रीमती जी ने गेंद उनके पाले में डाल दी थी।
शर्मा जी को आने वाले तूफान का एहसास होने लगा था , मगर ये सोच कर चुप हो गये थे कि अस्पताल से छुट्टी के बाद इसका कोई हल खोजेंगे। और बहुत विचार करने के बाद शर्मा जी को लगा कि श्रीमती जी को समझने से सरल काम है नौकरानी रख लेना। ऐसे थोड़ा प्रयास करने पर पांच सौ रूपये महीना पर एक नौकरानी मिल ही गई थी , मगर जब पहले ही दिन जब छमियां उलझे और बिखरे बाल लिये आई तो शर्मा जी से रहा नहीं गया और कह दिया ,छमियां ज़रा अपने बालों की ठीक से चोटी बना कर आया करो। लेकिन छमियां तो गर्ज ही पड़ी , साहब हमको ऐसी वैसी न समझियो हां … । वह तो श्रीमती जी ने बात संभाल ली वर्ना शर्मा जी तो घबरा गये थे कि जाने समझ बैठी छमियां। इसलिये शर्मा जी ने ये समस्या हल करने का काम श्रीमती जी को ही सौंप दिया था। अगले दिन श्रीमती शर्मा ने एक पुरानी साड़ी देकर और सौ रूपये पगार बढ़ा कर छमियां को मना ही लिया था उसके बाल कटवाने के लिये। मगर जब छमियां ने अपने बाल कटवाने पर पगार बढ़ने की बात कही तो उसका मर्द बिदक ही गया , तू वहां काम करना जा रही है कि साहब से शादी करने , बोल क्या सारी उम्र वहां रहना है तुझे। छोड़ दो दिन की पगार और मत जाना कल से काम पर उनके घर। लगता है उनका मगज़ ही खराब है , छमियां ने भी इसी में अपनी भलाई समझी थी।
दो महीने बीत गये लेकिन ऐसी किसी नौकरानी का प्रबंध नहीं हो सका जिसके बाल गिरने का खतरा न हो। इस बीच शर्मा जी के पुराने मित्र मल्होत्रा साहब घर आये तो उनको अपना दुखड़ा सुना ही दिया शर्मा जी ने। बस इतनी सी बात पर परेशान हो , मल्होत्रा जी बोले थे , याद है जब हम दोनों साथ रहते थे तब मैं सब्ज़ी बनाया करता था और तुम रोटी बनाते थे। अब मुझे भी रोटी बनाना आ गया है , तुम्हें भी थोड़ी प्रैक्टिस करने से फिर से रोटी बनाना आ जायेगा। सुन कर शर्मा जी कुछ दुविधा में पड़ गये तो मल्होत्रा जी कहने लगे यार क्या सोचने लग गये। मैं बताऊं आपको मैंने खाना बनाना किसलिये शुरू किया था , मैंने एक सर्वेक्षण की बात पढ़ी थी अख़बार में कि जिनकी पत्नियां मज़ेदार खाना खिलाती हैं उनको बहुत सारी बिमारियां होने का खतरा होने और जल्दी मरने की संभावना अधिक होती है। फिर तुम्हारी समस्या का तो सब से बेहतररीन हल ही यही है। गंजे होने का ये फायदा तुम्हें अब समझ आयेगा , जब बाल ही नहीं तो गिरेंगे कैसे। दोनों ने ठहाका लगाया था। मल्होत्रा जी के तर्क अचूक थे और शर्मा जी को अपनी समस्या का समाधान मिल गया था।
5 नेता जी की नैतिकता ( व्यंग्य )
नेता जी को सदा चिंता रहती है नैतिक मूल्यों की। वे जो करते हैं केवल नैतिकता के आधार पर ही करते हैं। और उनके हर इक कदम से नैतिकता और भी मज़बूत होती है , बेशक उनका वो कदम कुर्सी पाने के लिये अपने दल को छोड़ दूसरे दल में जाना ही क्यों न हो। रिश्व्त लेना उनके उसूल के खिलाफ है , मगर भेंट स्वीकार करने से नैतिक मूल्यों की कोई हानि नहीं होती है ये उनका मानना रहा है। जो भी लोग नेता जी के पास आते हैं अपना कोई काम करवाने के लिये , नेता जी के सचिव उनको समझा देते हैं कि नकद पैसों की रिश्वत नेता जी अनैतिक कार्य मानते हैं इसलिये कुछ भी काम करवाने के लिये छुप कर रिश्व्त देने की जगह आप खुले आम कोई महंगा उपहार अथवा भेंट दें। इस बार सत्ता में आने के बाद जिन लोगों ने बड़े बड़े काम करवाने थे उनहोंने नेता जी को सोने के मुकुट , चांदी की गदा , सोने की तलवार जैसी कीमती चीज़ें उपहार में दी हैं और उन सब के काम हो चुके हैं। ये सब कीमती उपहार नेता जी की बैठक की शोभा बड़ा रहे हैं। ये फिक्स डिपॉज़िट हैं नेता जी के जो आयकर से भी मुक्त हैं , नेता जी को जिस दिन ज़रूरत होगी इनको बाज़ार में बेच देंगे। सोने चांदी का दाम कभी कम नहीं होता है , नेता जी को खूब पता है।एक हादसा हो गया है। नेता जी के घर से वो सारा कीमती सामान चोरी हो गया है। नेता जी बेहद दुःखी हैं , उन्हें लग रहा है जैसे उनकी सारी की सारी नैतिकता की पूंजी कोई लूट कर ले गया हो। नेता जी ने पुलिस वालों को दो दिन का समय दिया है चोर का पता लगाने और चोरी का माल बरामद करने के लिये। खबर है कि नेता जी के घर से पचास लाख कीमत के उपहार चोरी हो गये हैं। चोरों को कीमत पता चली तो वे बहुत खुश हुए। मगर जब वे सारा सामान बाज़ार में बेचने गये तो उनके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई है। सोना चांदी का सामान खरीदने वालों ने जब परखा तो पाया कि सब का सब नकली है। बाहर सोने की पॉलिश है और अंदर पीतल ही पीतल है , चांदी की जगह कोई बहुत सस्ती धातु है सफेद रंग की। इसलिये चोरों ने खुद सारा सामान थानेदार जी से भाईचारा निभाने के लिये जाकर उनके हवाले कर दिया है ताकि वो नेता जी को खुश कर नौकरी में तरक्की हासिल कर सकें और अपनी पुलिस की बदनामी से बच सकें। थानेदार जी ने पूरा सामान नेता जी के हवाले कर दिया और कहा चोरों से गलती हो गई थी जो अपने ही भाई के घर घुस आये थे , जब पता चला तो गलती को सुधारने के लिये खुद ही चोरी का माल वापस कर गये हैं। आप भी उनको माफ़ कर दें और चोरों को छोड़ने की इजाज़त दे दें। ये सुनते ही नेता जी नाराज़ हो गये और बोले कि जो उनको ठगे भला उसको कैसे छोड़ा जा सकता है। जब नेता जी नहीं माने और चोरों को सज़ा देने की ज़िद पर अड़ गये तो थानेदार जी ने पूरी असलियत उनको बता ही दी। कहा नेता जी ये सारा सामान ही नकली है और इसकी कीमत कुछ भी नहीं है। आपको ठगा उन लोगों ने है जो आपको ये सब उपहार दे कर अपने काम करवा गये हैं , इन चोरों को तो ईनाम मिलना चाहिये आपको अपने लोगों की असलियत बताने के लिये। नेता जी उदास हो कर कह उठे कि उनके साथ लोग वही करते रहे जो कहा जाता है कि हम नेता लोग किया करते हैं। नेता जी बोले सच बताना कहीं तुम पुलिस वालों ने तो असली को नकली नहीं बना दिया। थानेदार बोले हज़ूर पुलिस वाले राजनेताओं कि तरह बेईमान नहीं हुए अभी तक भी कि जिस पेड़ की छांव में बैठें उसकी ही जड़ों को काटने का काम करें। नेता जी सोच में पड़ गये कि अब क्या किया जाये।
तभी विरोधी दल के नेता का फोन आया चोरी की घटना पर अफ़सोस जताने के लिये। वे नेता जी के भरोसे के मित्र हैं इसलिये नेता जी ने सारा मामला उनको बता कर पूछा आप ही मेरे मार्गदर्शक रहे हो , आप की बात मान कर ही आज मैं इस जगह पहुंचा हूं। आप ही बतायें उनके साथ क्या किया जाये जो मेरे साथ इतना बड़ा छल कर गये , सब को जानता हूं , सब को फायदा पहुंचाया है। उन विरोधी दल के नेता जी का कहना था कि इस बात का किसी से ज़िक्र नहीं करें कि सब नकली है। ये राज़ राज़ ही रहने दें कि कोई आपको मूर्ख बना अपने काम करवा गया है। जैसे लोग आपको मूर्ख बना खुश कर अपना मतलब हल करते रहे हैं वैसे ही अब आप भी करें। सच पूछो तो ये सामान नौटंकी वालों का है , भला इस युग में मुकुट , गदा , तलवार कोई उपयोग करता है। आप भी इसको किसी और को देकर अपना काम निकलवा सकते हैं। अगर आपको सच में ताज पहनना है तो ये सब आप ले जाकर मुख्यमंत्री जी को उनके जन्म दिन पर दे आयें और बदले में मंत्री पद पक्का समझें। सभी समाचार पत्रों में खबर छपी है कि नेता जी राजधानी जा कर मुख्यमंत्री जी को सोने की तलवार सोने का मुकुट और चांदी कि गदा भेंट कर आये हैं। नेता जी ने बयान दिया है कि उनको जो भी उपहार मिलते हैं जनता से वे उसे अपने पास नहीं रखते है बल्कि पार्टी को ही दे देते हैं। उनकी नैतिकता ऐसे उपहार अपने पास रखने की अनुमति नहीं देती है। उनको मंत्री बना दिया गया है और उनका कहना है कि वे सदा की तरह नैतिक मूल्यों पर आधारित राजनीति ही करते रहेंगे।
6 उत्पति डॉक्टर की ( व्यंग्य )
पृथ्वी का भ्रमण कर नारद जी ब्रह्मलोक वापस आये तो बहुत उदास लग रहे थे। ब्रह्मा जी ने उनको आदर सहित आसन देकर पूछा "आपको सफर में किसी प्रकार की कोई परेशानी तो नहीं हुई। लगता है बेहद थक गये हैं अब कुछ पल आराम कर लें , फिर बताएं आकर कि क्या समाचार खोज कर लाये हैं मृत्युलोक से"। नारद जी बोले ब्रह्मा जी मैं थका हुआ नहीं हूं , किसी बात से परेशान हो गया हूं और उदास भी। मैं सीधा आपके पास आया हूं एक प्रश्न का जवाब पूछने और जब तक मुझे अपने सवाल का उत्तर नहीं मिल जाता मैं न आराम कर सकता हूं न ही मुझे चैन ही आ सकता है। वैसे तो पृथ्वी लोक में कुछ भी सही नहीं है , राजा बेईमान है , अफसर भ्रष्ट हैं , आतंकवाद है , चोरी - लूट , ठगी - धोखा , हत्या - बलात्कार जैसी तमाम बातें हैं जो बुराई की हर सीमा को लांग चुके हैं। धर्म के नाम पर अधर्म का कारोबार फल फूल रहा है , संत महात्मा कहलाने वाले तक व्यभिचारी हैं , लोभ लालच , मोह माया के जाल में फंसे हुए हैं। मगर एक ऐसे प्राणी को मैंने देखा जिसको वहां डॉक्टर कह कर बुलाया जाता है , और मैं समझ नहीं पा रहा कि आपने उस जीव की उत्पत्ति किस प्रयोजन से की है। वो जीव तो बहुत सारे दुःखों का कारण लगता है। सब उसको भगवान का दूसरा रूप कहते हैं जबकि वो मरीज़ों को दुःखी देख कर भी दुःखी नहीं होता बल्कि उनको रोगी देख कर खुश होता है , उनका ईलाज करता है मगर उनको बेरहमी से लूट भी रहा है। कई बार ईलाज में लापरवाही बरतता है और खराब अंग की जगह ठीक अंग को ही काट देता है। अब बड़े बड़े अस्प्तालों में इंसान के भीतर के अंगों की चोरी तक होती है और इंसानियत को भुला कर उनका कारोबार होता है। एक और नई समस्या उसने पैदा कर दी है , कन्या के भ्रूण को जन्म लेने से पहले ही कोख में ही मार दिया जाता है। इतनी अच्छी शिक्षा पाने के बाद भी उसको न उचित अनुचित का अंतर समझ आता है न ही मानव धर्म। मुझे लगता है आपसे बहुत बड़ी भूल हो गई है उस जीव की उत्पत्ति करके। नारद जी की बात सुनकर ब्रह्मा जी बोले , मुनीवर आपकी बातें सच हैं , लेकिन उस डॉक्टर नाम के जीव को बनाना भी बहुत आवश्यक हो गया था। उसे कब कैसे और किसलिये बनाया गया मैं आपको विस्तार पूर्वक बताता हूं , तभी आपकी चिंता का निदान हो पाएगा।एक बार एक नगर में बहुत सारे लोग रहते थे , उनमें से एक व्यक्ति बहुत भोला और मासूम था , उसका मस्तिष्क अविकसित था , और वो मंद बुद्धि था कुछ कारणों से। सब नगर वासी उसको पगला पगला कह कर तंग किया करते थे। बच्चे उसपर पत्थर फैंकते , बड़े उसको अपमानित किया करते। इसके बावजूद भी वो सब के सामने हाथ जोड़ता और हर किसी का कहना मानता , जो भी कोई काम करने को कहता वो उसे चुपचाप कर दिया करता। लोग उसे डांटते फटकारते व अपने से नीचा समझते। अपने काम करवाने के बाद भी उसको बदले में कुछ भी नहीं दिया करते। कोई नहीं देखता कि वो भूखा है तो उसको दो रोटी ही दे दे। वो भूखा प्यासा रहता और अकेले में कभी खुद ही हंस लेता कभी खुद ही रो भी लेता। वहां किसी को उसकी ख़ुशी उसके दर्द से कोई सरोकार नहीं था। उन लोगों को उसमें एक इंसान नहीं दिखाई देता था , अपने अपने स्वार्थ सभी को नज़र आते थे। वक़्त आने पर वो सभी लोग मृत्यु को प्राप्त होने के बाद यमराज के सामने लाये गये। चित्रगुप्त जी ने देखा उनका सभी का बहुत बड़ा अपराध था एक अकेले भोले मनुष्य पर उम्र भर करते रहना बिना किसी भी कारण के। जबकि वो मनुष्य उनके अत्याचार सह कर भी उनको आदर और सम्मान देता रहा था। उसपर ज़ुल्म करने का उनको न कोई अधिकार ही था न ही कोई कारण ही। धर्मराज जी ने अपने सलाहकारों से ये विचार करने को कहा कि ऐसे बेरहम लोगों को क्या सज़ा दी जानी चाहिये। उनकी राय थी कि इन सब को जानवर बना दिया जाये और उस को जिसपर ये अत्याचार करते रहे कसाई बना दिया जाये। मगर ये सुन कर वो मनुष्य बोला कि क्या ऐसा करने से मुझे इंसाफ मिल जायेगा। मैं तो हमेशा सभी का आदर करता रहा हूं , जबकि मेरे कसाई बनने पर मुझे सब नफरत किया करेंगे। और मैं तो पूरी उम्र तड़पता रहा इनके अत्याचार सहते हुए जबकि इस तरह इनको केवल एक ही बार कष्ट सहना होगा। आप देखें अपने इंसाफ के तराज़ू की तरफ क्या दोनों पलड़े बराबर होते हैं। धर्मराज जी ने देखा उनके इंसाफ के तराज़ू के पलड़े एक समान नहीं लग रहे हैं। जब उनको नहीं समझ आया कि कैसे उसको सही मायने में इंसाफ दिया जा सकता है तब उन्होंने विष्णु जी और महेश जी से चर्चा की तब फैसला किया गया कि डॉक्टर नाम से उस जीव की उत्पत्ति करना ही एक मात्र समाधान है , उनके अपराधों की सज़ा देने के लिये।
इस प्रकार उसको न्याय देने के लिये अगले जन्म में एक ऐसे जीव के रूप में पृथ्वी लोक पर उसको भेजा गया जो जो इन सब अपने पिछले जन्म के अत्याचारियों को दुःख दे और इनके दुःखों को देख कर वो भी राहत का अनुभव करे। इनके कष्टों की बिलकुल परवाह नहीं करे और इनसे ईलाज की मनमानी कीमत वसूल करे और चैन से रहे। ये कोठी कार और हर तरह के ऐशो-आराम हासिल करने में व धन दौलत जमा करने में ही लगा रहे। इसके बावजूद भी ये सब इसको आदर देते रहें और कहते रहें कि आप ईश्वर का दूसरा रूप हैं। इस तरह अपने पूर्व जन्म में हुए सभी अत्याचारों का बदला लेने के लिए इसको डॉक्टर बनाया गया और इस पर जो लोग पूर्व जन्म में अत्याचार करते रहे उन सब को इसका मरीज़ बनाया गया। इस प्रकार दोनों अपने पिछले जन्म का हिसाब बराबर कर सकते हैं। अब ये इनके साथ कोई सहानुभूति नहीं रखता है और कई बार तो रोगी रोग से नहीं मरता बल्कि इसके ईलाज से ही मर जाता है। ब्रह्मा जी बोले मुनिवर इस तरह न्याय व्यवस्था को नया आयाम देने का कार्य किया गया था इस जीव की उत्पत्ति करके। आप व्यर्थ की चिंता त्याग दें , बिना प्रयोजन पृथ्वी का कोई भी जीव नहीं बना है। ब्रह्मा जी से डॉक्टर की उत्पत्ति की ये कथा सुनते ही नारद जी की उदासी दूर हो गई थी। जो भी प्राणी इस कथा को ध्यान पूर्वक सुनेगा उसको जीवन में कभी किसी डॉक्टर के पास जाना नहीं पड़ेगा। वो ईलाज से नहीं , रोग से ही मर सकेगा।
7 चुनाव अध्यक्ष का ( व्यंग्य )
हम शांति पूर्वक घर के अंदर बैठे हुए थे कि तभी बाहर से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें आने लगी। श्रीमती जी देखने गई कि इतनी आवाज़ें किसलिये हो रही हैं। और तुरंत घबरा कर वापस भीतर आ गई और कहने लगी कुछ ख्याल भी है कि बाहर क्या हो रहा है। हमने पूछा ये इतना शोर क्यों है , लगता है गली से बाहर का कोई कुत्ता आया होगा , और अपनी गली के सारे कुत्ते उस पर भौंकने लगे होंगे। श्रीमती जी बोली आप बाहर निकल कर तो देखो यहां अपने घर के सामने वाले पार्क में सारे शहर के कुत्ते जमा हो गये हैं और वे एक दूसरे पर नहीं भौंक रहे , जो आदमी उनको भगाने का प्रयास करे उसको काटने को आते हैं। अपना टौमी भी उनके बीच चला गया है , ऐसे आवारा कुत्तों में शामिल हो कर वो भी आवारा न बन जाये , उसको बुला लो। घर से बाहर निकल कर हमने जब अपने टौमी को आवाज़ दी तो पार्क में जमा हुए सभी कुत्ते हमारी तरफ मुंह करके भौंकने लगे। जब हमने देखा कि हमारा टौमी भी उनमें शामिल ही नहीं बल्कि हम पर भौंकने में सब से आगे भी है तो हम घबरा गये। तब हमें कुत्तों के डॉक्टर की बात याद आई कि अगर कभी टौमी कोई अजीब हरकत करे तो तुरंत उसको सूचित करें। हमने तभी उनसे फोन पर विनती की शीघ्र आने की और वे आ गये। आते ही सीधे वे उन कुत्तों की भीड़ में चले गये और उनको देख कर कोई कुत्ता भी नहीं भौंका सब के सब खामोश हो गये। जैसे बच्चे चुप हो जाते हैं अध्यापक को देखकर। हम दूर से देख कर हैरान थे और वे एक एक कर हर कुत्ते को पास बुलाते और उसके साथ कुछ बातें करते इशारों ही इशारों में। हम कुछ भी समझ नहीं पा रहे थे मगर लग रहा था उनको मालूम हो गया है क्या माजरा है। थोड़ी देर बाद डॉक्टर साहब ने आकर बताया कि चिंता की कोई बात नहीं है , आपका टौमी और बाकी सभी कुत्ते तंदरुस्त हैं। आज उनकी एक विशेष सभा है। हमने उनकी फीस दी और उनसे पूछा कि ये कैसी सभा है , ऐसा तो पहले नहीं देखा कभी भी हमने। उन्होंने बताया कि वे कुत्तों की भाषा को समझते हैं और हमें बता सकते हैं कि आज क्या क्या हो रहा है इस सभा में। वे कुत्तों से बातें करते रहे हैं और आज उन सब ने बताया है कि यहां आज शहर के कुत्तों ने अपना प्रधान चुनना है।डॉक्टर साहब ने बताया हमें जो जो भी बातें आपस में कर रहे थे सब कुत्ते। कई कुत्ते चाहते हैं प्रधान बनना और वो अपना अपना दावा पेश कर रहे हैं। आप विश्वास रखें उनमें कोई लड़ाई नहीं हो रही है , हर कोई अपनी बात रख रहा है और सब की बात सुनी जा रही है। जिसको भी ज़्यादातर सदस्य पसंद करेंगे वही प्रधान घोषित कर दिया जायेगा , प्रयास है कि चुनाव सभी की सहमति से ही हो। कोई वोट नहीं , बूथ कैप्चरिंग नहीं ,जात पाति , रिश्ते नातों का कोई दबाव नहीं , न ही कोई प्रलोभन , सब खुले आम पूरे लोकतांत्रिक ढंग से हो रहा है। जो बातें उन्होंने देख कर बताई वो वास्तव में दमदार हैं ज़रा आप भी सुनिये।
सब से पहले शहर के प्रधान का कुत्ता बोला कि उसको ही प्रधान बनाया जाना चाहिये। जब तुम सभी के मालिकों ने मेरे मालिक को अपना प्रधान चुना है तो तुम सब को वही करना चाहिये , शहर के प्रधान का कुत्ता होने से मेरा हक बनता है प्रधानगी करने का। इस पर कई सदस्यों ने सवाल उठाया कि शहर वाले तो हमेशा प्रधान चुनने में गलती कर जाते हैं और जिसको समझते हैं काम करेगा वो किसी काम का नहीं होता है। प्रधान बनने के बाद सारे वादे भूल जाता है और कुर्सी को छोड़ने को तैयार नहीं होता चाहे लोग न भी चाहते हों। प्रधान का कुत्ता बोला कि मैं ऐसा नहीं करूंगा , जब भी कहोगे हट जाउंगा , मैं कुत्ता हूं आदमी जैसा नहीं बन सकता। तब एक सदस्य ने सवाल उठाया कि तुमने अपना धर्म नहीं निभाया था , जब तुम्हारे मालिक के घर में चोरी हुई थी तब तुम भौंके ही नहीं। प्रधान के कुत्ते ने कहा ये सच है कि मैं नहीं भौंका था लेकिन तुम नहीं जानते कि ऐसा इसलिये हुआ कि प्रधान के घर से जो माल चोरी गया वो माल भी चोरी का था और उसको जो चुराने वाले थे वो भी प्रधान के मौसेरे भाई ही थे। इस पर पुलिस वाले का कुत्ता खड़ा हो कर बोला हम सभी को अपनी सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिये , आजकल चोर चोरी से पहले कुत्ते को जान से मारने का काम करने लगे हैं , हमें पुलिस से रिश्ता बनाना चाहिये ताकि वो हमारी सुरक्षा कर सके। तब एक सदस्य ने कहा क्या हम पुलिस पर यकीन कर सकते हैं ,पुलिस खुद चोरों से मिली रहती है। जान बूझकर चोरों को नहीं पकड़ती है , उनसे रिश्व्त लेकर चोरी करने देती है। तब पुलिस के कुत्ते को क्रोध आ गया और वो बोला था , और तुम खुद क्या करते हो। तुम्हारा मालिक जनहित का पैरोकार बना फिरता है और सब से फायदा उठाता रहता है ये क्या मुझसे छुपा हुआ है। इस बीच शहर के बड़े अधिकारी का कुत्ता खड़ा हो गया और बोला आप सभी ख़ामोशी से ज़रा मेरी बात सुनें। जब सब चुप हो गये तो वो पार्क के बीच में बने चबूतरे पर खड़ा हो लीडरों की भाषा में बातें करने लगा। कहने लगा मैं ये नहीं कहता कि मुझे अपना प्रधान बनाओ , मगर जिसको भी बनाया जाये उसको पता होना चाहिये कि हम सब को क्या क्या परेशानियां हैं। हमारी तकलीफों को कौन समझता है , हम केवल चोरों से घर की रखवाली ही नहीं करते हैं , अपने अपने मालिक के शौक और उनका रुतबा बढ़ाने के लिये भी हमारा इस्तेमाल किया जाता है। मालकिन के साथ कार में , उसकी गोदी में , उसके साथ खिलौना बन कर पार्टियों में जाकर हमें कितनी घुटन होती है , और कितना दुःख होता है सब के सामने उसके इशारों पर तमाशा बन कर। हम क्या उसके पति हैं। इसके इलावा हम में बहुत सदस्य ऐसे भी हैं जिनके मालिक न भरपेट खाना देते हैं न ही रहने को पूरी जगह ही। हम बेबस जंजीर में जकड़े कुछ भी नहीं कर पाते। हमें जब मालिक बचाव के टीके न लगवायें और हम बीमार हो जायें , तब खुद ही हमें गोली मार देते हैं ये क्या उचित है। आपको पता है कितने मालिक अपने कुत्तों से पीछा छुड़ाने के लिये उसको दूर किसी जंगल में छोड़ आते हैं भेड़ियों के खाने के लिये। और भी बहुत सारी बातें हैं जिनसे हम अनजान ही रहते हैं। मेरे को यूं भी फुर्सत नहीं है कि प्रधान बन कर ये सब काम करूं , आप किसी को भी अपना प्रधान चुनो मगर वो ऐसा हो जो ये बातें जनता हो समझता हो और इनका समाधान कर सके। सभी कुत्ते तब एक साथ बोले थे कि वो आपके बिना दूसरा कोई हो ही नहीं सकता है। और आला अधिकारी के कुत्ते को प्रधान चुन लिया गया , उसको फूलमाला पहना दी गई।
8 कविता की बात ( हास-परिहास )
हमने पहले से ही तय कर लिया था कि अगर कभी भी हम प्यार करेंगे तो सिर्फ कविता से करेंगे। जब हम कवि हैं तो हमारी कविता भी होनी चाहिये कोई , जिसे दिलोजान से प्यार करें उम्र भर हम। मगर हमारे नसीब में लिखा ही नहीं था किसी कविता नाम की लड़की से कभी मुलाकात करना। फिर भी ये शब्द हमें अपना सा लगता था और हम हमेशा यही सोचा करते थे कि अगर हमें कोई कविता नहीं मिलेगी तब हम जो भी मिलेगी विवाह के बाद उसका नाम कविता रख लेंगे। अफसोस न कोई कविता नाम वाली मिली न हमने कभी इश्क़ किया। समझा जाता है कि इश्क़ में आशिक को अच्छी कविता लिखना खुद ब खुद आ जाता है। लेकिन जब हमारे विवाह की बात चली तो और हमें बताया गया कि कन्या का नाम कविता है तो हमने देखे बिना ही हामी भर दी। अब जिसका नाम कविता है उसे देखने की क्या ज़रूरत , सोच लिया उम्र भर कविता को ही देखेंगे , कविता ही पढ़ा करेंगे , लिखते तो पहले से ही हैं। शादी का शुभ महूर्त निकालते समय पंडित जी कहने लगे कि कविता नाम तुम पर बहुत भारी पड़ सकता है इसे बदलना ही उचित है , हमने कहा कि ऐसा है तो ग़ज़ल नाम रख देते हैं , मगर ये भी उनको नहीं जचा तो हमने कह दिया कि फिर हमारा नाम बदल कर कविता के हिसाब से रख दो। ये सुन कर हंस दिये सभी कि भला ऐसा कहीं होता है , लेकिन हमने कविता को कविता ही रहने देने की ज़िद ठान ली और नाम को नहीं बदलने दिया। इस तरह हमने अपनी ख़ुशी से शादी कर ली कविता नाम की लड़की के साथ। और बहुत जल्द हमें कविता कविता में ज़मीन आसमान का अंतर नज़र आने लगा , साथ ही इस बात का अर्थ भी समझ आने लगा कि एक म्यान में दो तलवारें कभी नहीं समा सकती। पर अब हमें तो तमाम उम्र दोनों कविताओं को साथ रखना ही था।इधर जब से हमें बुलावा आया है कवि सम्मलेन में कविता सुनाने का तब फिर से खुद के कवि होने का यकीन होने लगा है , अन्यथा श्रीमती जी की बातों को मान हमने भी सोच लिया था कि हम जो लिखते हैं वो बेकार की तुकबंदी के सिवा कुछ भी नहीं है। यूं भी पत्नी होने के नाते हमारी कविताओं को बिना पढ़े , बिना सुने ही रद्द करने का उनका विशेषाधिकार है। जब सुहागरात को ही हमने उनको अपनी कविता सुनाई थी जो उनके नाम लिखी थी हमने तभी उन्होंने तय कर लिया था कि कैसा बर्ताव अपनी सौतन से करना है। बस वही पहली और आखिरी बार हमारी कविता सुनी थी श्रीमती जी ने। बहुत कोशिश की मगर कविता जी को कविता कभी पसंद नहीं आ सकी। हमने उनकी तारीफ में भी लिखी कविता , मगर उनको वो तारीफ भी फीकी ही लगी , हम हार गये इस प्रयास में आखिर। एक बार यूं ही भूले से कह बैठे कि आग लगा सकती है ये कविता तो वे बोलीं देखेंगी किसी दिन चूल्हे में डालकर। तब से हमने उनको अपनी कविताओं से और अपनी कविताओं को उनसे फासले पर रखना लाज़मी समझा है। अब उनको भी तसल्ली है कि बच गई हैं मेरी कवितायें सुनने से। हमें इस बात का अफ़सोस रहता था कि हमारे फन की कद्र नहीं जानती हैं। जब कभी घर आ कर बताते कि दोस्तों ने कविता सुन बड़ी दाद दी , तब उनका कहना होता कि ज़रूर उनको कुछ मतलब होगा , तभी खुश करना चाहते हैं आपको।श्रीमती जी को यकीन ही नहीं बल्कि उनका दावा है कि जो वो मानती हैं या कहती हैं वही सब से बड़ा सत्य है और बाकी सब कुछ मिथ्या है। एक दिन जब बाहर से घर आये तो देखा कि जिन कागज़ों पर हमारी कवितायें लिखी हुई हैं वो नीचे फर्श पर बिखरी पड़ी हैं। पूछने पर जवाब मिला कि तुमने ही बोला था घर की साफ सफाई के लिये , इसलिये कबाड़ी को बुलाया था फालतू का सामान बेचने के लिये। सब खरीद कर ले गया लेकिन इन स्याही से लिखे कागज़ों को उसने अखबार की रद्दी के भाव भी लेने से इनकार कर दिया। देख लो इन कविताओं को ढाई रुपये किलो भी नहीं खरीदा उसने। हमने शुक्र मनाया कि बाल बाल बच गये और अपनी कविताओं को समेट कर अलमारी में रख ताला लगा दिया। लेकिन जब से हमने अपनी रचनायें पत्र पत्रिकाओं में भेजना शुरू किया और वो छपने लगी तब से श्रीमती जी के तेवर थोड़ा नर्म होने लगे थे। जब पहली बार किसी कवि सम्मेलन का बुलावा आया तो श्रीमती जी कहने लगी वहां सफेद कुर्ता पायजामा पहन कर मत जाओ , लोग सुना है अंडे टमाटर साथ लाते हैं फैंकने को। मगर हम नहीं माने थे , और जब सही सलामत घर वापस आये तो अपना कुर्ता उतार कर उनके हाथ में पकड़ा कर कहा कि देख लो कोई दाग़ नहीं लगने दिया इसपर हमने। श्रीमती जी आदत से मज़बूर कुर्ते की जेब को टटोलने लगी , और उसमें से एक लिफाफा निकाल बोली ये क्या है। हमने कहा , याद आया ये कवि सम्मेलन के आयोजकों ने दिया था ये कह कर कि सम्मान पूर्वक दे रहे हैं। श्रीमती बोली कि इसमें है क्या , हमने कहा कि हमने देखा नहीं आप ही देख लो क्या डाला हुआ है। उन्होंने देखा तो ढाई सौ रुपये निकले , मगर श्रीमती जी ये मानने को हर्गिज़ तैयार नहीं कि जिस रद्दी को कबाड़ी ढाई रुपये किलो भी लेने को नहीं माना था उसके दो पन्नों को पढ़ कर सुनाने पर कोई ढाई सौ रुपये दे देगा। हमने कहा ये आपके लिये हैं तो खुश होकर पैसे रखने के बाद भी उनका मानना है कि ये खुद हमने अपनी जेब में रखे होंगे उनको खुश करने के लिये। और जैसा सदा वे समझती हैं जो वो मानती हैं वही सच है। हम तो बस मन ही मन सोचते रह जाते हैं कि काश कविता जी कभी कविता का मोल समझ पाती। ये इक कविता की बात है और दूजी कविता का दर्द भी।
9 बड़ा जूता , ज़्यादा पालिश ( तरकश )
हमने बड़े अधिकारी से कहा " विभाग आपका बहुत ही बदनाम है। भ्रष्टाचार खुलेआम
है , बिना रिश्वत होता नहीं किसी का भी काम है। " अधिकारी बोले साफ साफ
कहो आपका कैसा काम है , हर काम का फिक्स दाम है। सच पूछो तो इसमें ही आराम
है , जो भी है सरेआम है। हमको तो काम ही काम है , क्या बतायें सुबह है कि
शाम है। पैसे का ही खेल सारा है। कर्मचारियों में कायम भाईचारा है। हर दिन
का यही किस्सा है। बराबर सभी का हिस्सा है। लेने और देने वाले जब राज़ी हैं।
आप किस बात के क़ाज़ी हैं। बेबुनियाद आपके इल्ज़ाम हैं। मुफ्त में कर रहे
बदनाम हैं। नासमझ बीस पचास ले लेते हैं। ईमान को सस्ते में बेच देते हैं।
हम कभी न ऐसा करते हैं। जब बिकते हैं अपना घर भरते हैं। वे ईमानदार कहलाते
हैं , जो खुद भी खाते हैं और दूसरों को भी खिलाते हैं। हर दिन सब के काम
आते हैं। जो भी देता है उसका ही हुक्म बजाते हैं। कुछ नोट मिल जाते हैं ,
सब चेहरे खिल जाते हैं। और नहीं दुनिया में कोई नाता है। सब जगह झूठा बही
खाता है। चंद सिक्कों में बेड़ा पार है। नौ नकद न तेरह उधार है। तेल है तेल
की धार है , आजकल का ये सच्चा प्यार है। आप तो बेवजह घबराते हैं , न खुद
खाते हैं न हमें खिलाते हैं। खाली बातें ही बनाते हैं। बातों से कभी पेट
भरता है , तुम क्या जानो पापी पेट क्या करता है। भ्रष्टाचार भी इक तपस्या
है , ये नहीं कोई समस्या है। यह हर रोग की दवा है। तुम भी उधर चलो जिधर की
हवा है। समझदारी से राह आसान हो जाती है , कुछ नोटों से गहरी पहचान हो जाती
है। वरना यहां किसे कौन जानता है , जब भाई की भाई तक नहीं मानता है। सौ दो
सौ लेने वाले रंगे हाथ पकड़े जाते है। वही रिश्वतखोर कहलाते हैं। लाखों
खाने वाले नहीं हाथ आते हैं। करोड़ों खाने वाले सब छूट जाते हैं। "
" रुपया दो रुपया भीख मांगना शर्म की बात होती है। चंदा मांगने वालों
की और ही बात होती है। तब बस देने वालों की औकात होती है। कमीशन और दलाली
बाज़ार के बड़े शो रूम वाला खेल है। भीख सड़क किनारे लगी सेल है। नेताओं को
एंटीसिपेटरी बेल है , रहने को रेस्ट हाउस कहने को जेल है। भ्रष्टाचार तो
दिलों का मेल है। इसकी बनी न कोई नकेल है। आप भी प्यार मुहब्बत को चलने
दीजिये , जलने वालों को जलने दीजिये। चाहने वाले कहां घबराते हैं , राह नई
रोज़ बनाते हैं। देश में कितने घोटाले हुए , कितने चेहरे काले हुए। कभी
दलाली कभी हवाले हुए। सब के सब बरी होते रहे , आप तब चैन से सोते रहे। जाने
कब सीधी राह पे आओगे , बहती गंगा में नहाओगे। अब भी नहीं समझे तो पछताओगे ,
प्यासे आये थे प्यासे ही जाओगे। "सुनकर उनका प्रवचन हम तो घबरा गये , जाने कहां हैं हम लोग आ गये। दिन में भी लग रही रात है। हां ये इक्कीसवीं सदी की बात है। अधिकारी से बचकर जो बाहर को आये। बड़े बाबू से थे जा टकराये। वो मुस्कुरा कर बोले तो उनसे मिल आये , होंठ लगता है सिल आये। कहना जो हमारा मान जाते , सस्ते में ही छूट जाते। मामला जितना ऊपर जाता है , रिश्वत का भाव बढ़ता जाता है। बड़ा जूता अधिक पालिश खाता है। अब आपका काम करने से सब कर्मचारी डर गये हैं। समझो रिश्वत के दाम चढ़ गये हैं। ईमानदारी की बात करना छोड़ दीजिये , भ्रष्टाचार से नाता जोड़ लीजिये। काम आपका हो जायेगा। वहीं कोई सरकारी साधु भजन गा रहा था " जो खोयेगा वही पायेगा। "
10 जो बिक गये , वही खरीदार हैं ( तरकश )
कहानी एक वफादार कुत्ते की है। अपने गरीब मालिक की रूखी सूखी रोटी खा कर भी वो खुश रहता। कभी भी गली की गंदगी खाना उसने स्वीकार नहीं किया। वो जानता था कि मालिक खुद आधे पेट खा कर भी उसको भरपेट खिलाता है। इसलिये वो सोचता था कि मुझे भी मालिक के प्रति वफादार रहना चाहिये , उसके सुख़ दुःख को समझना चाहिये। वो दिन रात मालिक के घर और खेत खलियान की रखवाली करता। अचानक कुछ लोग मालिक के घर महमान बन कर आये और उसके कुत्ते की वफादारी को देख उससे कुत्ते को खरीदने की बात करने लगे। गरीब मालिक अपने कुत्ते को घर का सदस्य ही मानता था इसलिये तैयार नहीं हुआ किसी भी कीमत पर उसको बेचने के लिये। तब उन्होंने कुत्ते को लालच दे कर कहा कि तुम इस झौपड़ी को छोड़ हमारे आलीशान महल में चल कर तो देखो। मगर वफादार कुत्ते ने भी उनके साथ जाने से इनकार कर दिया। ऐसे में उन्होंने दूसरी चाल चलने का इरादा कर लिया और कुत्ते से कहा कि तुम रहते तो यहीं रहो , बस कभी कभी ख़ास अवसर पर जब हम बुलायें तब आ जाया करना। हम भी तुम्हें खिला पिला कर दिखाना चाहते हैं कि तुम हमें कितने अच्छे लगते हो। बस यही राजनीति की चाल थी , वे यदा कदा आते और कुत्ते को घुमाने को ले जाते। कभी कोई बोटी डाल देते तो कभी हड्डी दे देते चबाने को। धीरे धीरे कुत्ता उनकी आने की राह तकने लगा , और उनके आते ही दुम हिलाने लगा। इस तरह अब उसको मालिक की रूखी सूखी रोटी अच्छी नहीं लगने लगी और धीरे धीरे उसकी वफादारी मालिक के प्रति न रह कर चोरों के साथ हो गई। जब महमान बन कर आये नेता ही चोर बन उसका घर लूटने लगे तो बेखबर ही रहा। अपने कुत्ते की वफादारी पर भरोसा करता रहा जबकि वो अब चोरों का साथी बन चुका था।आजकल किसी गरीब की झौपड़ी की रखवाली कोई कुत्ता नहीं करता है। अब सभी अच्छी नस्ल के कुत्ते कोठी बंगले में रहते हैं कार में घूमते हैं। मालकिन की गोद में बैठ कर इतराते हैं , और सड़क पर चलते इंसानों को देख सोचते हैं कि इनकी हालत कितनी बदतर है। हम इनसे लाख दर्जा अच्छे हैं। इन दिनों कुत्तों का काम घरों की रखवाली करना नहीं है , इस काम के लिये तो स्कियोरिटी गार्ड रखे जाते हैं। कुत्ते तो दुम हिलाने और शान बढ़ाने के काम आते हैं। जो आवारा किस्म के गली गली नज़र आते हैं वे भी सिर्फ भौंकने का ही काम करते हैं , काटते नहीं हैं। जो रोटी का टुकड़ा डाल दे उसपर तो भौंकते भी नहीं , जिसके हाथ में डंडा हो उसके तो पास तक नहीं फटकते।
चुनाव के दिन चल रहे हैं , ऐसे में एक नेता जी अखबार के दफ्तर में पधारे हैं , अखबार का मालिक खुश हो स्वागत कर कहता है धनभाग हमारे जो आपने यहां स्वयं आकर दर्शन दिये। मगर नेता जी इस बात से प्रभावित हुए बिना बोले , साफ साफ कहो क्या इरादा है। अब ये नहीं चल सकता कि खायें भी और गुर्रायें भी। संपादक जी वहीं बैठे थे , पूछा नेता जी भला ऐसा कभी हो सकता है। हम क्या जानते नहीं कि आपने कितनी सुविधायें हमें दी हैं हर साहूलियत पाई है आपकी बदौलत। आप को नाराज़ करके तो हमें नर्क भी नसीब नहीं होगा और आपको खुश रख कर ही तो हमें स्वर्ग मिलता रहा है। आप बतायें अगर कोई भूल हमसे हो गई हो तो क्षमा मांगते हैं और उसको सुधार सकते हैं। नेता जी का मिज़ाज़ कुछ नर्म हुआ और वो कहने लगे कि कल आपके एक पत्रकार ने हमारी चुनाव हारने की बात लिखी है स्टोरी में , क्या आपको इतना भी नहीं पता। संपादक जी ने बताया कि अभी नया नया रखा है , उसको पहले ही समझा दिया है कि नौकरी करनी है तो अखबार की नीतियों का ध्यान रखना होगा। आप बिल्कुल चिंता न करें भविष्य में ऐसी गल्ती नहीं होगी। अखबार मालिक ने पत्रकार को बुलाकर हिदायत दे दी है कि आज से नेता जी का पी आर ओ खुद स्टोरी लिख कर दे जाया करेगा और उसको ही अपने नाम से छापते रहना जब तक चुनाव नहीं हो जाते। सरकारी विज्ञापन कुत्तों के सामने फैंके रोटी के टुकड़े हैं ये बात पत्रकार जान गया था।
सच कहते हैं कि पैसों की हवस ने इंसान को जानवर बना दिया है। जब नौकरी ही चोरों की करते हों तब भौंके तो किस पर भौंके। भूख से मरने वालों की खबर जब खूब तर माल खाने वाला लिखेगा तो उसमें दर्द वाली बात कैसे होगी , उनके लिये ऐसी खबर यूं ही किसी छोटी सी जगह छपने को होगी जो बच गई कवर स्टोरी के शेष भाग के नीचे रह जाता है। कभी वफादारी की मिसाल समझे जाते थे ये जो अब चोरों के मौसेरे भाई बने हुए हैं। जनता के घर की रखवाली करने का फ़र्ज़ भुला कर उसको लूटने वालों से भाईचारा बना लिया है अपने लिये विशेषाधिकार हासिल करने को। जब मुंह में हड्डी का टुकड़ा हो तब कुत्ता भौंके भी किस तरह। अपना ज़मीर बेचने वालों ने जागीरें खड़ी कर ली हैं इन दिनों। जो कोई नहीं बिका उसी को बाकी बिके लोग मूर्ख बता उपहास करते हैं ये पूछ कर कि तुमने बिकने से इनकार किया है या कोई मिला ही नहीं कीमत लगाने वाला क्या खबर। वो मानते हैं कि हर कोई किसी न किसी कीमत पर बिक ही जाता है। तुम नहीं बिके तभी कुछ भी नहीं तुम्हारे पास , खुद को बेच लो ऊंचे से ऊंचा दाम लेकर ताकि जब तुम्हारी जेब भरी हो तिजोरी की तरह , तब तुम औरों की कीमत लगा कर खरीदार बन सको और ये समझ खुश हो सको कि सब बिकाऊ हैं तुम्हारी ही तरह।
11 चिराग़ अलादीन का ( हास-परिहास )
हो सकता है कि वास्तव में अलादीन नाम का कोई शख्स इस दुनिया में कभी हुआ ही नहीं हो न ही कोई अलादीन का चिराग ही रहा हो। ये दोनों मुमकिन है किसी लेखक की कल्पना ही हों। लेकिन किसी कहानी का ये फलसफा इस कदर लोकप्रिय हो गया कि सब ने यकीन कर लिया कि कहीं न कहीं ऐसा कोई चिराग़ ज़रूर है। और सब यही चाहने लगे कि उनको ही मिल जाये ये चिराग़ अलादीन का। अलादीन का चिराग़ सब कुछ कर सकता है , और जिसके भी पास हो उसकी हर आज्ञा का पालन भी करता है , कोई वेतन भी नहीं मांगता। नेता चुनाव से पहले बड़े बड़े वादे करते हैं , मगर जब सत्ता मिल जाती है तब सरकार का हर मंत्री यही बात कहता है कि हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है न ही अलादीन का चिराग़ है कोई जो पलक झपकते ही सब कर सके। सरकार जनता को सब्र रखने का पाठ पढ़ा रही है कितने सालों से , अनपढ़ जनता है कि मानती ही नहीं। अलादीन का चिराग़ जिसे मिल जाये वो बिना पंख उड़ सकता है , पल झपकते जहां जाना चाहे जा सकता है , जो पाना चाहे पा सकता है। मैंने ऐसे चिराग़ को लेकर गहरा चिंतन किया है तब मुझे पता चला है इसका एक दूसरा विकल्प भी है। जो शायद उस चिराग़ से बेहतर ढंग से काम करता है। इससे भी अच्छी बात ये है कि बड़ी इराफात में उपलब्ध भी है , इतना कि विश्व की आधी आबादी को मिल सकता ही नहीं बल्कि मिल ही जाता है। अपने इस देश में तो सुनते हैं कि इसका अनुपात और भी अधिक है , अर्थात अलादीन के चिराग़ अधिक हैं और जिनको इसकी ज़रूरत है उनकी संख्या कम है।अगर ये सरल सी बात आपकी समझ में नहीं आई तो शायद आप खुद एक चिराग़ अलादीन का हो सकते हैं। अगर आप शादीशुदा पुरुष हैं तो समझ लो आप अपनी पत्नी को मिल चुके ऐसे ही एक चिराग़ ही हैं। महिलाओं की सब से बड़ी , बल्कि प्रमुख समस्या ही पति नाम का अलादीन का चिराग़ तलाश करना होता है। उनको सदा से यही समझाया जाता है कि शादी हो गई तो समझ लो जन्नत का रास्ता खुल गया है। अब जिस किसी ने भी आपसे विवाह रचाया है वो बना ही आपके इशारों पर नृत्य करने के लिये है। उसका फ़र्ज़ है आपकी हर मांग को पूरा करना। शादी में पत्नी की मांग भरने का निहितार्थ कुछ ऐसा ही होता है। सुहागन होने का भी यही प्रमाण है कि उसकी मांग हमेशा भरी होनी चाहिये। हर पत्नी को ये अधिकार सात फेरों के साथ ही ऐसे मिलता है कि जल्द ही वो इसे छीन लेने का हक बन लेती है। पति हो या चिराग़ हो अलादीन का , उससे कुछ भी मांगते समय ये नहीं सोचना पड़ता कि कोई काम संभव है अथवा असंभव। ये दोनों होते ही " जो हुक्म मेरे आका " कहने के लिये हैं। अंग्रेजी का एक लेखक तो यहां तक कहता है कि पत्नी को खुश करने को जो भी करना पड़े करना चाहिये। उसकी इच्छा पूरी करने के लिये उधार लो चाहे क़र्ज़ या फिर चोरी ही करो सब किया जाना उचित है। जीवन का कल्याण तभी संभव है।
एक अन्य दार्शनिक कहते है कि दुनिया में लूट , चोरी , ठगी , भ्रष्टाचार इन सब कि जड़ अलादीन के चिराग़ रूपी पति को मज़बूरी ही होती है। महनत और ईमानदारी से हर पति रोटी कपड़ा तो कमा सकता है , मगर गाड़ी बंगला सोना चांदी नहीं ला सकता। इसलिये अपने आका रूपी पत्नी का हुक्म बजा लाने की मज़बूरी उसे ये सब करने को विवश कर देती है। जब भी ये कहा जाता है कि हर सफल पुरुष के पीछे किसी महिला का हाथ होता है , तब इसका मतलब यही होता है कि क्योंकि उसकी पत्नी पल पल उसे ये एहसास करवाती रही कि तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया तभी उसको तरक्की करने को सब करना पड़ा। इतिहास गवाही देता है कि पत्नी के ताने से कवि तुलसीदास पैदा हो जाते हैं। हर इक पत्नी को मौलिक अधिकार है अपने पति को बुद्धू समझने का। घर से बाहर भले पूरी दुनिया उसे काबिल या समझदार कहे पत्नी के लिये पति निरा मूर्ख ही होता है जो बदकिस्मती से उसके पल्ले पड़ गया है। लाख प्रयास करने के बावजूद भी किसी महिला को समझदार पति नहीं मिलता और ये बात हर पत्नी हमेशा अपने पति को कहती रहती है शिकायत के रूप में। ऐसे में पति इतना ही कह सकते हैं कि अगर समझदार होते तो क्या तुम्हीं से शादी करते। कुछ लोग जो शादी के जाल में नहीं फंसते , नहीं जानते कि वो कितने खुशनसीब हैं जो उम्र भर आज़ाद रहे। कई बार उनके मन में भी शादी का लड्डू खाने की बात आ ही जाती है। ज्ञानीजन तभी शादी को ऐसा लड्डू बताते हैं जिसको खा कर भी पछताते हैं और बिना खाये भी। बहुत सारे लोग खुद बेशक शादी करके पछताते हों , दूसरों को करने को प्रेरित किया करते हैं। शायद उनको मज़ा आता है अपने जैसे सितम औरों पर भी होता देख कर। हर कहानी में हर इक अलादीन के चिराग़ को आखिर में आज़ादी मिल ही जाया करती है , लेकिन पत्नी को शादी में मिला चिराग़ का ये जिन्न उम्र भर का कैदी होता है। इसलिये अक्सर शादी को उम्र कैद भी कह दिया जाता है।
12 नेता पति हैं , पत्नी है जनता ( तरकश )
ये सबक पढ़ाना बहुत ज़रूरी है। तुम औरत हो जनता हो , मैं पुरुष हूं राजनेता
हूं। तुमने विवाह किया है , अब तुम पति के बराबर नहीं हो सकती हो , पति
तुम्हारा भगवान है , वो देवता है तुम्हारा और तुम उसकी दासी हो पुजारन हो।
जनता तुमने हमें सांसद चुना है , विधायक चुना है , ये करके तुमने अपने आप
को हमें समर्पित कर दिया है। अब हम शासक हैं और हमने तुम पर शासन करना है।
यही लोकतंत्र है। मगर तुम्हें हमेशा मर्यादा में रह कर ही बात करनी है। तुम
घर की मालकिन हो मैं जब ऐसा कहूं तो तुम खुश भले होना मगर ये मत भूलना कि
तुम्हें ये अधिकार तब तक ही हासिल रहेगा जब तक मेरी इच्छा हो। अब तुमने
पत्नी धर्म निभाना है और मैं तुमको जिस हाल में भी रखूं , उसी में खुश रहना
है। मेरी लंबी उम्र की कामना करना कर्तव्य है तुम्हारा ,मेरे लिये व्रत
रखना और मुझे खिला कर बाकी बचा हुआ खाना ही सदा से भाग्य रहा है तुम्हारा।
जनता रूपी पत्नी को बोलने का कोई अधिकार नहीं होता , जो उसके चुने
प्रतिनिधि कहें वही उसकी आवाज़ है। हर पत्नी का धर्म है पति की आज्ञा का
पालन करना , पति का विरोध घोर अपराध है। जनता को सांसदों और विधायकों का
भूल कर भी विरोध नहीं करना चाहिये। पति का विरोध कर के कोई पत्नी घर में
क्या रह सकती है। बेघर होकर दर दर की ठोकरें खाती है उम्र भर , नेताओं का
विरोध करना भी लोकतंत्र का विरोध माना जायेगा। पति बिन पत्नी का कल्याण
नहीं हो सकता न ही नेताओं के बिना लोकतंत्र का भला हो सकता है।
हम नेता इतने भी तानाशाह नहीं हैं कि जनता को कुछ बोलने का
हक ही नहीं दें। जनता नेताओं को भ्रष्ट कहे मगर उसी तरह जैसे पत्नी अपने
पति को जुआरी और शराबी कहती है। मगर न किसी पत्नी को शराब बंदी लागू करने
का अधिकार मिल सकता है न ही जनता को भ्रष्टाचार को रोकने का कोई उपाय करने
का ही हक दिया जा सकता है। जब कोई पत्नी पति को शराब पीने से रोकती है तब
उसको मारने पीटने पर विवश हो जाता है पति भी। ये दमन नहीं न ही अत्याचार ही
है , ये पति का अपने विशेषाधिकार कायम रखना है। जब जनता सरकार को चुनौती
देती है तब विरोध करने वालों पर लाठियां भांजना , गोली चलाना सरकार की
मज़बूरी हो जाती है। सत्ता को चुनौती मत दो , अपने पति को विवश मत करो ताकत
का उपयोग करने के लिये। अपनी भड़ास निकालनी है तो गली मोहल्ले में , आस पड़ोस
में यूं ही कभी चर्चा करती रहो , मगर जब कोई उकसाये कुछ भी करने को तब ये
भी बताती रहो कि भले जैसा भी हैं मेरा पति मेरा देवता है। वोट डालने और
वरमाला पहनाने के बाद फिर कुछ नहीं हो सकता , जिसको चुना उसकी जय बोलनी ही
होगी। जनता जैसे लोगों को चुनती है उसको वैसी ही सरकार मिलती है , जो बीजा
था वही मिलना ही था। हर औरत को अपना नारी धर्म और जनता को लोकतंत्र की
मर्यादा हमेशा याद रखनी चाहिये। जब भूल जाते हैं तब वही होता है जो आजकल हर
तरफ हो रहा है। नेताओं की जय में जनता का और पति सेवा में पत्नी का
वास्तविक सुख है। इतिहास गवाह है इस बात का।राम को जब बनवास मिलता है तब सीता जी को पत्नी धर्म निभाना पढ़ता है पति के सुख़ दुख़ में उसका साथ निभा कर हर दशा में। लेकिन जब राम जी की बारी आती है तब उनकी मर्यादा राज्य का शासक होने का फ़र्ज़ निभाना ही याद रखती है और ये भूल जाती है कि उनको भी अपनी पत्नी का साथ हर सुख़ में हर दुख़ में निभाना भी उतना ही महत्व रखता है। राम राजा हैं , शासक हैं उनको राज करना है इसलिये वे अपनी पत्नी सीता को चुपचाप वन में छोड़ आने का आदेश दे सकते हैं। यही सबक हर शासक को याद रहता है , कुर्सी के लिये सत्ता के लिये सभी का त्याग करने का। क्या सीता जी ने कोई प्रश्न खड़ा किया था अपने प्रिय राम जी के निर्णय को लेकर। नहीं , क्योंकि पति भगवान है , परमात्मा है जिसकी पूजा की जाती है , उसपर संदेह नहीं किया जा सकता। राम राजा हैं , उनको जब यज्ञ करने को पत्नी की ज़रूरत हो तब वो सोने से सीता जी की प्रतिमा बनवा काम चला सकते हैं। क्या कोई पत्नी कर सकती है ऐसा कि पति की जगह उसकी मूर्ति रख कर कोई अनुष्ठान संपन्न कर ले। जनता भी नेताओं के बुत उनके जीते जी नहीं बना सकती है , उसे जैसे भी हो उनकी प्रतीक्षा करनी होती है , जो भी आदेश हो उनका उसे पालन करना ही पड़ता है। औरतों को मर्दों के बराबर अधिकार की बातें करते सदियां गुज़र गई हैं , कितने और युग गुज़र जायेंगे तब भी कुछ भी नहीं बदलेगा। पति पति ही रहेगा और पत्नी पत्नी। जनता हमेशा जनता ही रहेगी , उसको झूठा ख्वाब नहीं देखना चाहिये स्वयं को देश का मालिक समझने का। भ्रम में जी रही हैं वो महिलायें जो मान बैठी हैं कि उनको बराबरी के सभी अधिकार मिल गये हैं। औरत के अपने पैरों पर खड़ा हो जाने और मर्दों की तरह हर काम करने के बावजूद भी उनकी दशा वही है। आज भी परिवार की मुखिया वो नहीं है , उसको पति के घर में रहना होता है और सब पुरुषवादी नियमों का पालन करना ही होता है। जनता को भी शासक की बराबरी का सपना कभी नहीं देखना चाहिये , वर्ना अंजाम बुरा होता है। नेता कहते रहते हैं जनता ही देश की मालिक है , पति भी कहते रहते हैं पत्नी को कि तुम्हीं घर की मालिक हो , लेकिन समझते दोनों ही खुद को ही मालिक हैं। जनता को झूठे वादों से तो पत्नी को दिखावे की मुहब्बत से छला जाता रहा है और छलते ही रहेंगे दोनों दोनों को। ये घर चलने के लिये और देश पर शासन करने के लिये एक मृगतृष्णा की तरह लुभाती रहती है। देश की जनता का भाग्य भी औरत के समान ही है , जो भी जैसा भी मिला हो उसी से निबाह करना पड़ता है। कब तक अच्छे पति की तलाश में कुंवारी बैठी रहे , अच्छे नेताओं की तलाश में जनता को अभी कई जन्म और तपस्या करनी होगी। इस कलयुग में नायक जन्म नहीं ले सकते , खलनायक ही आज के युग के नायक हैं।
13 अंदाज़ देशभक्ति के ( तरकश )
कुछ लोग गहन विचार-विमर्श कर रहे हैं। देशभक्ति की बात हो रही है। कोई सवाल उछालता है , ये क्या चीज़ है , सुना है बड़े काम आती है आजकल। एक नवयुवक बताता है मनोजकुमार की फिल्म का गीत गाना देशभक्ति का काम है , मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती। जो जितना ऊंचे स्वर में गाता है वो उतना ही महान देश भक्त समझा जाता है। वैसे और भी गीत हैं , कुछ सरकारी विज्ञापन भी हैं , मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा एवं कम-आन इंडिया , दिखा दो। ये भी देशप्रेम को प्रदर्शित करने का ही काम करते हैं। क्रिकेट का खेल देखते हुए तिरंगा लहराना और अपने चेहरे या वस्त्रों को तिरंगे के रंगों में रंगना भी देशप्रेम का प्रमाण है। छबीस जनवरी या पंद्रह अगस्त को दूरदर्शन का सीधा प्रसारण देखते हुए गप शप करना हो , चाहे छुट्टी का मज़ा लेते हुए पिकनिक मनाना ये भी देशभक्ति का ही अंग हैं। देशभक्ति ही वो सलोगन है जो प्रतियोगिता में जीत दिलवा सकता है। ये वो फार्मूला है जो हमेशा हिट रहता है , सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेने वाली सुंदरियां तक अपने जवाबों में इसकी मिलावट करके अच्छे अंक बटोर सकती हैं। इसलिये वे देश से अनपढ़ता और गरीबी को मिटाने के उदेश्य की बात करती हैं। मगर जब प्रतियोगिता में जीत जाती हैं तब इन सब को भूल कर बड़ी बड़ी कंपनियों के विज्ञापन करने और चमक दमक वाले कार्यक्रम करती हैं देशभक्ति समझ कर। देशभक्ति वो विषय है जिसपर कुछ खास दिनों में लिखता है लेखक , छापते हैं अखबार वाले और पत्रिका वाले। अध्यापक को भी ये विषय पढ़ाना होता है छात्रों को ताकि परीक्षा में अच्छे अंक मिल सकें। इस सबक को समझना ज़रूरी है न ही समझाना ही। रटने का सबक है , तोते की तरह हम सब रटते रहते हैं। कुछ अन्य लोगों के लिये ये एक रंगारंग कार्यक्रम की जैसी है वे देशभक्ति के नाम पर कितने ही आयोजन आयोजित किया करते हैं। कभी किसी दौड़ का नाम , कभी मानव श्रृंखला बनाकर प्रदर्शित की जाती है देशभक्ति। पहले कभी देशभक्ति के मुशायरे और कवि सम्मलेन भी आयोजित किये जाते थे मगर आजकल उनका चलन बाकी नहीं रह गया। अब देशभक्ति पर पॉप संगीत के कार्यक्रम सफल होते हैं। आई लव माई इंडिया गाते हुए नाचना इस युग की वास्तविक देशभक्ति समझी जाती है। इस नज़र से देखो तो युवा पीढ़ी देशभक्ति से भरी पड़ी है।इन दिनों कई तरह की देशभक्ति दिखाई देती है। आधे घंटे का सीरियल जिसमें दो कमर्शियल ब्रेक हों , और तीन घंटे की फिल्म भी जिसको कई कंपनियां मिल कर प्रयोजित करें। टीवी के हर चैनेल में देशभक्ति का तड़का ज़रूरी है , उदेश्य भले पैसा बनाना ही हो , बात देश प्रेम की ही करनी होती है। सब चैनेल अपने को बाकी से बड़ा देशभक्त साबित करने का प्रयास करते हैं। इन टीवी सीरियल और फिल्मों के नाम और विज्ञापन लुभावने तो होते हैं मगर देखने पर इनका प्रभाव दूसरा ही नज़र आता है। दर्शक सोचते हैं कि देशभक्ति कोई समझदारी का काम नहीं है। बस एक बेवकूफी है , पागलपन है। क्या मिला देशभक्तों को जान गवांने से , क्या काम आई उनकी कुर्बानी। न देश को कुछ मिला न जनता को। बस मुट्ठी भर लोगों ने सब की आज़ादी को , लोकतंत्र को ढाल बना अपनी कैद में कर लिया। आजकल ज़रा दूसरी तरह की देशभक्ति होती है , आंदोलन होते हैं , दंगा फसाद करवाते हैं , तोड़ फोड़ की जाती है। जनता को मूर्ख बना सत्ता हासिल करने को समझौते किये जाते हैं। चुनाव जीत सरकार बनाते ही सब भूल कर वही दुहराते हैं जिसका विरोध किया था। शासक बन ऐश करते हैं , झंडा फहराते हैं ,सलामी लेते हैं , देशभक्त कहलाते हैं। अफ्सर लोगों के लिये देशभक्ति ऐसा ब्यान है जिसे कभी भी किसी भी अवसर पर दिया जा सकता है। जनता के धन से खुद हर सुख सुविधा का उपयोग करते हुए गरीबों की हालत से दुखी होने की बातें करना और गरीबी मिटाने को कागज़ी योजनायें बना उनको कभी सफल नहीं होने देना , देश के विकास के झूठे आंकड़े बनाना देशभक्ति है। सत्ताधारी नेता की चाटुकारिता , मंत्री के आदेश पर हर अनुचित कार्य करना , पद का दुरूपयोग करना भी देशभक्ति है।
नेताओं के लिये देशभक्ति ऐसा नशा है जिसको अपने भाषणों द्वारा जनता को पिला मदहोश कर उससे मनचाहा वरदान पा सकते हैं। देश को लूट कर खाने वाले नेता डंके की चोट पर देश के लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का दावा करते हैं। चुनाव करीब आते ही नेताओं पर देशभक्ति का ज्वर चढ़ जाता है। हर नेता नई रौशनी लाना चाहता है , सत्ता मिलते ही फिर अंधेरों का सौदागर बन जाता है। एक बार कुर्सी मिल जाये तो हर नेता उसे अपनी बपौती समझने लगता है। देशभक्ति इनके लिये कारोबार है , कभी गल्ती से देशभक्ति के नाम पर कोई जेलयात्रा कर आया हो तो वो ही नहीं उसका परिवार भी मुआवज़ा पाने का हकदार बन जाता है। कुछ लोगों की देशभक्ति जनता पर चढ़ा हुआ ऐसा कर्ज़ है जिसका भुगतान करते करते उसकी कमर टूट चुकी है , तब भी वो चुकता नहीं हो रहा , कुछ लोगों के वारिसों को उसका ब्याज ही मिला है , असल बाकी है।
14 सबक ईमानदारी का ( तरकश )
सबक पढ़ाने का अपना ही मज़ा है , पढ़ाने को खुद अमल करके नहीं दिखाना होता। स्कूलों में तो ऐसा भी होता है कि अध्यापक वो विषय भी पढ़ा रहे होते हैं जिसके बारे वे कुछ भी नहीं जानते। अध्यापकों को इसमें कोई परेशानी नहीं होती , कम ही होता है कि कोई छात्र समझ सके कि जो पढ़ाया जा रहा है वो सही है अथवा गलत। आजकल राजनीति में भी धर्म की तरह उपदेशक नज़र आने लगे हैं , सब को ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं। कोई नहीं पूछता आपने कब पढ़ा है , आप खुद हर बात पर मुकर जाते हैं। उनका झूठ झूठ नहीं होता उनके पास तर्क होते हैं , कोई नहीं मानता अगर तो कुतर्क भी देने में रत्ती भर संकोच नहीं किया जाता। उनके अनुसार उन्हें छोड़ सब के सब भ्रष्ट हैं , उन्हें कोई कारण नहीं बताना होता , जब कह दिया तो मानना ही पड़ेगा आपको। अपने सर पर ईमानदारी का ताज और सीने पर तमगा लगाये घूमते हैं रात दिन। शायद आपको यकीन नहीं आये कि मैंने सरकारी असप्ताल में डेंटिस्ट को इमरजेंसी में ड्यूटी करते देखा है , कारण ये नहीं कि डॉक्टर नहीं होता , बल्कि इसलिये कि उसने खुद कमाई करने को सिफारिश से ये करवाया था।सरकार का हर मंत्री भाषण देता है जनता को कायदे कानून का पालन करने के , लेकिन खुद पर कभी कोई नियम लागू नहीं करते। सरकार जो भी करती है उसी में जनता की भलाई है , ये सबक जनता क्यों भूल जाती है। सरकार टैक्स लगाये , दाम बढ़ाये तो समझना चाहिये कि ऐसा करना ज़रूरी होता है। चुपचाप मान जाना चाहिये , विरोध नहीं करना चाहिये। मान लेना चाहिये कि जब हमने ही चुना है तो अपनी गल्ती की सज़ा भी कबूल करनी ही होगी। सरकार आपको किफायत करने का पाठ पढ़ाने के साथ साथ खुद जनता का धन बर्बाद कर सकती है। जनता को रोटी पानी नहीं मिले पैसे की कमी के कारण तो कोई बात नहीं , सरकार की हर दिन की मीटिंग में सजावट पर , जलपान पर पैसा पानी की तरह बहाया जाना अनुचित नहीं होता। जनता को बताया जाता है रोज़ इतने रुपये कमाते हो तो गरीब नहीं हो , खुद उतने में रहने की बात भला सरकार कैसे सोच सकती है। जनता जनता है सरकार सरकार है। सरकार बनते ही हर दल को चंदा जमा करना ज़रूरी लगता है आने वाले कई सालों तक का चुनाव खर्च का प्रबंध करने के लिये। और ऐसा होते देर नहीं लगती , पर जब जनता की सुविधाओं के खर्च का सवाल आता है तब वे नहीं जानते कि धन आये तो कहां से आये।
सरकार चाहती है कि पुलिस और प्रशासन उसकी मर्ज़ी से काम करे न कि उचित अनुचित को देख कर निर्णय ले। जो किसी सत्ताधारी नेता की राह में अड़चन डाले उसको पद से हटाना सरकार का अधिकार है चाहे नियम ऐसा करने की इजाज़त देता हो चाहे न देता हो। जनता ने इनको जनसेवा के लिये थोड़ा वोट डाला था , इनसे संविधान और न्यायपालिका का सम्मान करने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिये। ये सब तो बने ही नेताओं द्वारा खिलवाड़ करने के लिये हैं। पहले एक दल के नेता कर रहे थे अब दूसरे दल के , बस यही बदलाव बहुत है। हम लोग अब तक किसी पुराने युग में जी रहे हैं जो सत्ता के दुरूपयोग को कुर्सी के मोह को , शासन के अंधे अहंकार को एक रोग मानते हैं। नेता लोग ईमानदारी को सब से बड़ा रोग समझते हैं , वे खुद को इससे जितना भी मुमकिन हो दूर ही रखते हैं। जनता को ईमानदारी की राह पर चलने का पाठ पढ़ाया जाता है ताकि खुद सरकार जो चाहे कर सके। अर्थशास्त्र का सूत्र है एक देगा तभी दूसरे को मिलेगा , ये तभी तक सब कुछ कर सकते जब तक लोग इनके बराबर नहीं बन सकते। जनता को जनता का धन भी खैरात की तरह देने का नाम है लोकतंत्र में सरकार चलाना। लोगों का , इनको छोड़ बाकी सब का ईमानदार बनना आवश्यक है , इनके शासन करने के लिये। जैसे साधू लोग अपने अनुयायिओं को त्याग का उपदेश देते हैं , लेकिन चाहते हैं उनका चढ़ावा बढ़ता ही रहे। ये दोनों बातें एक दूसरे की पूरक हैं , इसको विरोधाभास नहीं समझना चाहिये। बस इतनी सी बात है।

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