हुक्मरान डर गया ( कविता ) डॉ लोक सेतिया
आवाज़ आत्मा की शख़्स जो दफन कर गया
आता तो नज़र ज़िंदा दरअसल है वो मर गया ।
झूठी थी उसकी बातें दिन भी थे अंधेरी रातें
आया जो वक़्त अपनी हर बात से मुकर गया।
हमने जिसे बिठाया था तख़्त ओ ताज पर वही
ज़ालिम हमारे जिस्म को ज़ख्मों से है भर गया ।
कहता था मैं गरीब हूं अवसर की मुझे है तलाश
सामान घर का बेच कब जाने चला किधर गया।
ख़ैरात मांगना हमेशा सीखा था उसने सिर्फ यही
जो लूट कर शहर को हद से भी आगे गुज़र गया ।
सपने बड़े दिखाए हक़ीक़त नहीं दिखला पाया वो
ठगों चोरों का साथी बन खज़ाना उनका भर गया ।
उस पर नशा चढ़ा है सत्ता का इतना ज़्यादा देखो
अपने बनाने वाले को ही पहचानने से भी मुकर गया ।
करने लगा है प्यार देश के दुश्मनों से हद से बढ़कर
शर्मो हया को छोड़कर क्या क्या नहीं वह कर गया ।
कोतवाल कर जोड़ कर खड़ा है चोरों की सभा में अब
सुन कर कहानी सच्ची देखो कोई हुक्मरान है डर गया।
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