एहसासों के फूल ( कविता संग्रह ) डॉ लोक सेतिया
( पूरी किताब पढ़ सकते हैं )
1 औरत ( कविता )
तुमने देखा हैकभी उस शख्स को
हर इक एहसास लिये
2 चुभन ( कविता )
धरती नेअंकुरित किया
बड़े प्यार से उसे ,
किया प्रस्फुटित
अपना सीना चीर कर ,
बन गया धीरे धीरे
हरा भरा पौधा ,
उस नन्हें बीज से।
फसल पकने पर
ले गया काट कर ,
बन कर स्वामी
डाला था जिसने बीज ,
धरती में ,
और धरती को मिलीं
मात्र कुछ जडें
चुभती हुई सी।
अपनी कोख में
हर संतान को
पाला माँ ने ,
मगर मिला उन्हें सदा
पिता का ही नाम ,
जो समझता रहा खुद को
परिवार का मुखिया ,
घर का मालिक।
और हर माँ ,
सहती रही
कटी हुई जड़ों की ,
चुभन के दर्द को
जीवन पर्यन्त।
3 साया ( कविता )
पी लेता हूंयूं तो अक्सर
ज़िंदगी का
मैं ज़हर।
जाने क्यों
फिर भी कभी
भर आती हैं आंखें
और घुटने
लगता है दम।
रोकने से
तब रुकते नहीं
आंखों से आंसू
तनहाई में अक्सर।
मन करता है
जा कर पास तुम्हारे
चुप चाप बैठ कर
जी भर के रो लेने को।
सोचता हूं
मैं कभी कभी
अकेले में ये भी
जिसकी तलाश है मुझे
तुम वही हो कि नहीं।
भीगी पलकों के
हम दोनों के शायद
इस नाते को कभी
मैं नहीं कोई भी
नाम दे पाया।
तुम्हें भी
याद आता है कभी
छत के कोने में देर रात तक
राह तकता हुआ
गुमसुम सा
खड़ा कोई साया।
4 कैद ( कविता )
कब से जाने बंद हूंएक कैद में मैं
छटपटा रहा हूँ
रिहाई के लिये।
रोक लेता है हर बार मुझे
एक अनजाना सा डर
लगता है कि जैसे
इक सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये।
मगर जीने के लिए
निकलना ही होगा
कभी न कभी किसी तरह
अपनी कैद से मुझको।
कर पाता नहीं
लाख चाह कर भी
बाहर निकलने का
कोई भी मैं जतन ।
देखता रहता हूं
मैं केवल सपने
कि आएगा कभी मसीहा
कोई मुझे मुक्त कराने ,
खुद अपनी ही कैद से।
5 उमंग यौवन की ( कविता )
ये मस्तीये अल्हड़पन
ये झूम के चलना
ये हर पल गुनगुनाना
ये सतरंगी सपने बुनना
ये हवाओं संग उड़ना
ये भीनी भीनी खुशबु
ये बहारों का मौसम
ये सब है तुम्हारा आज
ओर है सारा जहाँ तुम्हारा।
जी भर के जी लो
आज तुम इनको
कुछ ऐसे कि
याद रह जाए उम्र भर
इनका मधुर एहसास।
यौवन में
कदम रखता हुआ
अठाहरवां साल है ये।
6 अलविदा ( कविता )
तुम जा रहे हो आजछुड़ा कर मुझसे हाथ
भुला कर उम्र भर
साथ देने का वादा
जब मिल गया है
तुम्हें किनारा ।
चलो अच्छा हुआ
मिल गया तुम्हें
कोई तो ऐसा
जो कर सके
पूरे तुम्हारे सपने।
चाहा तो मैंने भी
यही था सदा
मगर कर न पाया कभी
मुझे और क्या चाहिये
तुम्हारी ख़ुशी से बढ़कर।
मैं जूझता रहा
तेज़ हवओं से
लड़ता रहा तूफानों से
नहीं डरा कभी
किसी भी भंवर से।
समझा था मैंने सदा तुम्हें
अपनी मंज़िल भी
किनारा भी
मैं खड़ा हूं वहीं उसी कश्ती पर
थामे पतवार बन के माझी।
और देख रहा हूं तुम्हें
आंसू लिये पलकों पर अपनी
कदम - कदम दूर जाते हुए
हाथ हिलाते हुए।
7 मन की बात ( कविता )
देख कर किसी कोबढ़ गई दिल की धड़कन
समा गया कोई
मन की गहराईओं में
किसी की मधुर कल्पनाओं में
खोए रहे रात दिन
जागते रहे किसी की यादों में
रात - रात भर करते रहे
सपनों में उनसे मुलाकातें।
चाहा कि बना लें उन्हें
साथी उम्र भर के लिए
हर बार रह गया मगर
फासला कुछ क़दमों का
हमारे बीच।
उनकी नज़रें
करती रहीं इंतज़ार
खामोश सवाल के जवाब का
पर हम साहस न कर सके
प्यार का इज़हार करने का कभी।
समझ नहीं सके वो भी
हमारी नज़रों की भाषा को
और लबों पे ला न पाए
दिल की बात कभी हम।
8 नाट्यशाला ( कविता )
मैंने देखे हैंकितने ही
नाटक जीवन में
महान लेखकों की
कहानियों पर
महान कलाकारों के
अभिनय के।
मगर नहीं देख पाऊंगा मैं
वो विचित्र नाटक
जो खेला जाएगा
मेरे मरने के बाद
मेरे अपने घर के आँगन में।
देखना आप सब
उसे ध्यान से
मुझे जीने नहीं दिया जिन्होंने कभी
जो मारते रहे हैं बार बार मुझे
और मांगते रहे मेरे लिये
मौत की हैं दुआएं।
कर रहे होंगे बहुत विलाप
नज़र आ रहे होंगे बेहद दुखी
वास्तव में मन ही मन
होंगे प्रसन्न।
कमाल का अभिनय
आएगा तुम्हें नज़र
बन जाएगा मेरा घर
एक नाट्यशाला।
9 है अधूरी कहानी ( कविता )
ज़िंदगी नहीं हैकागज़ पे लिखी
पर्दे पर दिखाई गई
कोई पटकथा।
जिसे ले जाता है
मनचाहे अंत तक
लिखने वाला लेखक
भटकने नहीं देता
कहानी के पात्रों को।
बचाये रखता है
अपने पात्रों के
वास्तविक चरित्र को
संबल बन कर।
छोड़ दिया है शायद
अकेला और बेसहारा
विधाता ने
जीवन में हर पात्र को।
भटक जाती है ज़िंदगी
धूप - छावं में
अनजान पथ पर चलते हुए
बार बार।
जाने कब कहाँ कैसे
भटक जाते हैं सभी पात्र
सही मार्ग से जीवन में।
सभी करते रह जाते हैं प्रयास
कहानी को उचित परिणिति तक
ले जाने का
मगर आज तक
पहुंचा नहीं पाया कोई भी
पूर्णता तक उसको।
रह गयी है अधूरी
सब के जीवन की
वास्तविक कहानी
त्रिशंकु बन कर रह गये हैं
जीवन में तमाम लोग।
1 0 मां के आंसू ( कविता )
कौन समझेगा तेरी उदासीतेरा यहाँ कोई नहीं है
उलझनें हैं साथ तेरे
कैसे उन्हें सुलझा सकोगी।
ज़िंदगी दी जिन्हें तूने
वो भी न हो सके जब तेरे
बेरहम दुनिया को तुम कैसे
अपना बना सकोगी।
सीने में अपने दर्द सभी
कब तलक छिपा सकोगी
तुम्हें किस बात ने रुलाया आज
मां
तुम कैसे बता सकोगी।
1 1 मुझे लिखना है ( कविता )
कोई नहीं पास तो क्याबाकी नहीं आस तो क्या।
टूटा हर सपना तो क्या
कोई नहीं अपना तो क्या।
धुंधली है तस्वीर तो क्या
रूठी है तकदीर तो क्या।
छूट गये हैं मेले तो क्या
हम रह गये अकेले तो क्या।
बिखरा हर अरमान तो क्या
नहीं मिला भगवान तो क्या।
ऊँची हर इक दीवार तो क्या
नहीं किसी को प्यार तो क्या।
हैं कठिन राहें तो क्या
दर्द भरी हैं आहें तो क्या।
सीखा नहीं कारोबार तो क्या
दुनिया है इक बाज़ार तो क्या।
जीवन इक संग्राम तो क्या
नहीं पल भर आराम तो क्या।
मैं लिखूंगा नयी इक कविता
प्यार की और विश्वास की।
लिखनी है कहानी मुझको
दोस्ती की और अपनेपन की।
अब मुझे है जाना वहां
सब कुछ मिल सके जहाँ।
बस खुशियाँ ही खुशियाँ हों
खिलखिलाती मुस्कानें हों।
फूल ही फूल खिले हों
हों हर तरफ बहारें ही बहारें।
वो सब खुद लिखना है मुझे
नहीं लिखा जो मेरे नसीब में।
1 2 कोरा कागज़ ( कविता )
जानता हूं मैंचाहते हो पढ़ना
मेरे मन की
पुस्तक को
जब भी आते हो
मेरे पास तुम।
बैठ कर सामने मेरे
तकते रहते हो
चेहरा मेरा
कनखियों से
चुपचाप।
जान कर भी
बन जाता हूं अनजान मैं
क्योंकि समझता हूँ मैं
जो चाहते हो पढ़ना तुम
नहीं लिखा है
वो मेरे चेहरे पर।
तुम्हें क्या मालूम
क्यों खाली है अभी तक
किताब मेरे मन की।
मिटा दिया है किसी ने
जो भी लिखा था उस पर।
1 3 मैं रहूंगा हमेशा ( कविता )
जिवित रहूंगा मैंअपने लेखन में
हमेशा।
मौत भी
नहीं मिटा सकेगी
दुनिया से
मेरा अस्तित्व।
जब भी चाहो
मिलना तुम मुझसे
और चाहो
मेरे करीब होने का
करना एहसास तुम
पढ़ लेना
फिर से एक बार मुझे।
होगा हर बार
तुम्हें आभास
मेरे पास होने का
मरते नहीं हैं विचार कभी भी।
1 4 वो जहां ( कविता )
देखी है हमने तोबस एक ही दुनिया
हर कोई है स्वार्थी जहां
नहीं है कोई भी
अपना किसी का।
माँ-बाप भाई-बहन
दोस्त-रिश्तेदार
करते हैं प्रतिदिन
रिश्तों का बस व्यौपार।
कुछ दे कर कुछ पाना भी है
है यही अब रिश्तों का आधार।
तुम जाने किस जहां की
करते हो बातें
लगता है मुझे जैसे
देखा है शायद
तुमने कोई स्वप्न
और खो गये हो तुम।
1 5 दो आंसू ( कविता )
हर बार मुझेमिलते हैं दो आंसू
छलकने देता नहीं
उन्हें पलकों से।
क्योंकि
वही हैं मेरी
उम्र भर की
वफाओं का सिला।
मेरे चाहने वालों ने
दिया है
यही ईनाम
बार बार मुझको।
मैं जानता हूं
मेरे जीवन का
मूल्य नहीं है
बढ़कर दो आंसुओं से।
और किसी दिन
मुझे मिल जायेगी
अपनी ज़िंदगी की कीमत।
जब इसी तरह कोई
पलकों पर संभाल कर
रोक लेगा अपने आंसुओं को
बहने नहीं देगा पलकों से
दो आंसू।
16 सिसकियां ( कविता )
वो सुनता हैहमेशा
सभी की फ़रियाद
नहीं लौटा कभी कोई
दर से उसके खाली हाथ।
शोर बहुत था
उसकी बंदगी करने वालों का वहां
तभी शायद
सुन पाया नहीं
मेरी सिसकियों की
आवाज़ को आज खुदा।
1 7 शून्यालाप ( कविता )
अंतिम पहर जीवन कासमाप्त हुआ अब बनवास
त्याग कर बंधन सारे
चल देना है अनायास
राह नहीं कुछ चाह नहीं
समाप्त हुआ वार्तालाप।
विलीन हो रही आस्था
टूट रहा हर विश्वास
तम ने निगल लिया सूरज
जाने कैसा है अभिशाप।
शब्द स्तुति के सब बिसरे
छूट गया प्रभु का साथ।
मनाया उम्र भर तुमको
माने न तुम कभी मगर
खो जाना एक शून्य में
बनाना है शून्य को वास।
अब खोजना नहीं किसी को
न आराधना की है आस
करना है समाप्त अब
खुद से खुद का भी साथ।
1 8 थकान ( कविता )
जीवन भर चलता रहाकठिन पत्थरीली राहों पर
मुझे रोक नहीं सके
बदलते हुए मौसम भी।
पर मिट नहीं सका
फासला
जन्म और मृत्यु के बीच का।
चलते चलते थक गया जब कभी
और खोने लगा धैर्य
मेरी नज़रें ढूंढती रहीं
किसी को जो चलता
कुछ कदम तक साथ साथ मेरे।
और प्यार भरे बोलों से
भुला देता सारी थकान
जाने कहां अंत होगा
धरती - आकाश से लंबे
इस सफर का
और कब मिलेगा मुझे आराम।
1 9 जाने कब मिलोगी तुम ( कविता )
दूर बहुत दूरआती है मुझे नज़र
हंसती मुस्कुराती हुई।
छू लूं उसे प्यार से
सोचता हूं मैं
किसी दिन ले ले मुझे
अपनी बाहों में वो।
कब से मैं उसकी तरफ
बढ़ाता रहा हूं कदम
मगर लगता है जैसे
बढ़ता ही जा रहा है
फासला
हम दोनों के बीच।
एक तरफा
चाहत है शायद
उसने चाहा नहीं मुझे कभी भी
मैंने उसे देखा है
प्यार से मिलते सभी से
रूठी हुई है क्यों मुझ से ही।
लगाया नहीं
मुझे कभी गले
तड़प रहा हूं उसके लिए मैं ,
क्यों भाग रही है मुझसे
दूर और दूर ज़िंदगी।
2 0 नयी कविता ( कविता )
दुनिया के लोगअपने भी बेगाने भी
आते रहते हैं जाते रहते हैं।
पल पल हर दिन
घटती रहती हैं घटनाएं
निरंतर घूमता रहता है
समय का पहिया।
किसे क्या पसंद है क्या नापसंद
इस बात से होता नहीं
किसी को सरोकार।
कभी बन के दर्शक
देखते हैं तमाशा
कभी स्वयं
बन जाते हैं तमाशा भी
तमाशाई भी।
हर दिन इस कोलाहल में
शामिल रहता हूं
मैं भी चाहे अनचाहे
हर सांझ चाहता हूं
भुला दूं वो सब बातें
अच्छी बुरी दिन भर की।
सो जाता हूं
बिस्तर पर अकेला
रात भर
बदलता रहता हूँ करवटें।
ऐसे में लगता है मुझे
हर रात जैसे
सो गया है
कोई मेरे करीब आ कर।
प्यार से थपथपा रहा है मुझे
पल पल रहता है
इक मधुर सा एहसास
किसी के पास होने का।
बीत जाती है
हर रात यूं ही
देखते हुए नये स्वप्न।
आ जाती है नयी सुबह
हर रात के बाद
भोर के उजाले में
ढूंढता हूं मैं उसे
जो था रात भर पास मेरे।
और मिल जाती है
हर सुबह मुझे
तकिये के नीचे
इक नयी कविता।
2 1 सीता का पश्चाताप ( कविता )
मुझे स्वयं बनना थाएक आदर्श
नारी जाति के लिये।
प्राप्त कर सकती थी
मैं स्वयं अपनी स्वाधीनता
अधिकार अपने।
कर नहीं पाता
कभी भी रावण
मेरा हरण।
मैं स्वयं कर देती
सर्वनाश उस पापी का
मानती हूँ आज मैं
हो गई थी मुझसे भयानक भूल।
पहचाननी थी
मुझे अपनी शक्ति
मुझे नहीं करनी थी चाहत
सोने का हिरण पाने की।
मेरे अन्याय सहने से
नारी जगत को मिला
एक गलत सन्देश।
काश तुलसीदास
लिखे फिर एक नई रामायण
और एक आदर्श बना परस्तुत करे
मेरे चरित्र को
उस युग की भूल का
प्राश्चित हो इस कलयुग में।
2 2 नेपथ्य ( कविता )
किसी लेखक नेभूख से तड़पते हुए
दरिद्रता भरे
जीवन पर लिखी थी
जो कहानी।
तुम कर रहे हो
अभिनय
उस कहानी के
नायक की भूमिका का।
जो दर्द भरे बोल
निकले थे
एक खाली पेट से
बोल रहे हो तुम
उन बोलों को
भरपेट मनपसंद भोजन खा कर।
और चाहते हो
करना कल्पना उस नायक के ,
दर्द के एहसास की।
चाहे कर लो
कितना भी जतन
ला नहीं पाओगे वो आंसू
जो स्वता ही निकल आते हैं ,
हर गरीब के बेबसी में।
नहीं मिल सकते कहीं से
बिकते नहीं हैं
दुनिया के बाज़ार में।
तुम बेच सकते हो बार बार
झूठे आंसू दिखावे के
है कमाल का अभिनय तुम्हारा
महान कलाकार हो तुम।
आवाज़ तुम्हारी रुलाती है
भाती है दर्शकों को
मिल जायेंगी तुम्हें
तालियाँ दर्शकों की
और ढेर सारी दौलत भी।
मगर
कहानी का लेखक
कहानी के नायक की तरह
जीता रहेगा गरीबी का
दुःख भरा जीवन हमेशा।
उसकी कहानी से हो नहीं पायेगा
न्याय कभी भी।
2 3 अधूरी प्यास ( कविता )
युगों युगों से नारी कोछलता रहा है पुरुष
सिक्कों की झंकार से
कभी कीमती उपहार से
सोने चांदी के गहनों से
कभी मधुर वाणी के वार से।
सौंपती रही नारी हर बार ,
तन मन अपना कर विश्वास
नारी को प्रसन्न करना
नहीं था सदा पुरुष की चाहत।
अक्सर किया गया ऐसा
अपना वर्चस्व स्थापित करने को
अपना आधिपत्य
कायम रखने के लिये।
मुझे पाने के लिये
तुमने भी किया वही सब
हासिल करने के लिये
देने के लिये नहीं
मैंने सर्वस्व समर्पित कर दिया तुम्हें।
तुम नहीं कर सके ,
खुद को अर्पित कभी भी मुझे
जब भी दिया कुछ तुमने
करवाया उपकार करने का भी
एहसास मुझको और मुझसे
पाते रहे सब कुछ मान कर अपना अधिकार।
समझा जिसको प्यार का बंधन
और जन्म जन्म का रिश्ता
वो बन गया है एक बोझ आज
मिट गई मेरी पहचान
खो गया है मेरा अस्तित्व।
अब छटपटा रही हूँ मैं
पिंजरे में बंद परिंदे सी
एक मृगतृष्णा था शायद
तुम्हारा प्यार मेरे लिये
है अधूरी प्यास
नारी का जीवन शायद।
2 4 झूठी सुंदरता ( कविता )
खूबसूरत बदनझील सी गहरी आँखें
मरमरी से होंट
उन्नत उरोज
नागिन से काले बाल
मदमस्त अदाएं
उस पर सोलह श्रृंगार।
सभी को
कर रहे थे दीवाना
लग रहा था धरा पर जैसे
उतर आई है अप्सरा कोई।
तभी सुनाई दिया
उसका कर्कश स्वर
नफरत भरे उसके बोल
और लगने लगी
बेहद बदसूरत वो।
था सब कुछ उसके पास
मगर नहीं था
कुछ भी उसके पास।
25 लिखे खत तुम्हारे नाम दोस्त ( कविता )
लिखता रहा नाम तुम्हारेहर दिन मैं खत
अकेला था जब भी
और उदास था मेरा मन
जब नहीं था कोई
जो सुनता मेरी बात
मैं लिखता रहा
बेनाम खत तुम्हारे नाम।
जानता नहीं
नाम पता तुम्हारा
मालूम नहीं
रहते हो किस नगर की
किस गली में तुम दोस्त।
मगर सभी सुख दुःख अपने
खुशियां और परेशानियां
लिखता रहा सदा तुम्हीं को
तलाश भी करता रहा तुम्हें।
फिर आज दिल ने चाहा
तुमसे बात करना
और मैं लिख रहा हूं
फिर ये खत नाम तुम्हारे।
सोचता हूं शायद तुम भी
करते हो ऐसा ही मेरी तरह
लिखते हो मेरे लिए खत
तुम भी यही सोच कर।
कि मिलेंगे हम अवश्य
कभी न कभी तो जीवन में
और पहचान लेंगे
इक दूजे को।
तुम तब पढ़ लेना मेरे ये
सभी खत नाम तुम्हारे
और मुझे दे देना इनके
वो जवाब जो लिखते हो
तुम भी हर दिन सिर्फ मेरे लिये
मेरे दोस्त।
2 6 बस बहुत हो चुका ( कविता )
कोईतथाकथित ईश्वर
धर्म गुरु
कोई पूजास्थल
अब नहीं करेंगे
निर्णय
सही और गलत का।
स्वर्ग या मोक्ष
की चाह
नर्क की सज़ा
का डर
कर नहीं सकेंगे
विवश मुझे।
अब चलना होगा
सही मार्ग पर मुझे
छोड़ सब बातें
धर्मों की।
समाज के दोहरे मापदंड
हित अहित
मान अपमान की चिंता
रोक नहीं पाएंगे
मुझे अब कभी।
बस बहुत हो चुका
जी सकूंगा कब तक
आडंबर के सहारे।
मुझे चलना होगा
उस राह पर
जिस पर चलना चाहे
मेरा मन मेरी आत्मा
फिर चाहे जो भी हो।
कोई अन्तर्द्वंद कोई ग्लानि
कोई पश्चाताप
सत्य और झूठ का
पुण्य और पाप का
अच्छाई और बुराई का
नहीं अब रहा बाकी।
तय करेगा
केवल मेरा विवेक
और चलना है अब मुझे
उसी मार्ग पर
जिसे सही मानता हूं मैं
मन से आत्मा से।
2 7 मुझ बिन ( कविता )
कब होता है किसी केहोने का एहसास
समझ आता है
न होने का एहसास।
जब नहीं होता है कोई पास
लगता है तब
कि था कितना करीब
जब मिला करते थे रोज़
होती न थी कभी बातचीत भी
कहते हैं अब मिले हो तुम
कितनी मुद्दत के बाद।
कल पूछा था उसने
क्या छोड़ दिया लिखना
बीत गये बहुत दिन
पढ़े हुए कहानी कोई।
ढूंढते रहे थे उस दिन
मुशायरे में तुम्हें
सुन लेते कोई ग़ज़ल
फिर तुमसे नई पुरानी।
लिखता रहा जब तक
नहीं कहा था कभी उसने
उसे लगता है अच्छा
मुझे पढ़ना
सुनाया करता था जब मैं
सुनना चाहता था कहां कोई।
न होना मेरा लग रहा है
बेहतर मेरे होने से
आज कोई देखता ही नहीं मुझे
मेरे बाद होंगी शायद बातें मेरी
कोई किसी दिन कहेगा किसी से
कभी होता था यहां
मुझ सा भी कोई इंसान।
2 8 मैं नहीं था ऐसा कभी ( कविता )
आज लिख रहा हैरंगबिरंगे फूलों से
रौशनी की किरणों से
हमारी कहानी कोई।
उसे क्या मालूम
पाए हैं हमने तो कांटे
जीवन भर।
छाया रहा
हमारी ज़िंदगी पर
सदा इक घना अंधेरा है
पल पल जीवन का
गुज़रा है इस तरह
सर्द रातें खुले गगन में
काटे कोई जिस तरह।
कभी किया नहीं
हमने ज़िक्र तक किसी से
अपने दुःख दर्द
अपनी परेशानियों का।
हर सफलता हर ख़ुशी
रही बहुत दूर हम से
मगर दुनिया वालेन कहते रहे
हमें मुक्कदर का सिकंदर।
बना रहा हमारा चित्र
है चित्रकार जो मिला ही नहीं
कभी हमें जीते जी।
ये मेरी जीवन कथा ये चित्र
दोनों हैं किसी की
सुंदर कल्पनाएं
नहीं है इनमें कोई सच्चाई।
हां देखा हो शायद
ऐसा सपना कभी मैंने
किसी दिन अपना दिल
बहलाने को।
2 9 दुर्घटना ( कविता )
जब घटी थीदुर्घटना मेरे साथ
दोनों ही खड़ी थी
तब मेरे ही पास।
उन्हें इतना करीब से
देखा था मैंने पहली बार
डरा नहीं था नियति को
कर लिया था स्वीकार।
मगर तभी ख़ामोशी से
प्यार और अपनेपन से
अपनी आगोश में
भर लिया था
मुझे ज़िंदगी ने।
मुझे कहना चाहती हो जैसे
तुम्हें बहुत चाहती हूं मैं।
और लौट गई थी मौत
चुप चाप हार कर ज़िंदगी से
तब मुझे हुआ था एहसास
कितना कम है फासला
मौत और ज़िंदगी के बीच।
3 0 आस्था ( कविता )
सुलझे न जब मुझसेकोई उलझन
निराशा से भर जाये
जब कभी जीवन
नहीं रहता
खुद पर है जब विश्वास
मन में जगा लेता
इक तेरी ही आस।
नहीं बस में कुछ भी मेरे
सोचता हूं है सब हाथ में तेरे
ये मानता हूं और इस भरोसे
बेफिक्र हो जाता हूं
मुश्किलों से अपनी
न घबराता हूं।
लेकिन कभी मन में
करता हूं विचार
कितना सही है
आस्तिक होने का आधार
शायद है कुछ अधूरी
तुझ पे मेरी आस्था
फिर भी दिखा देती है
अंधेरे में कोई रास्ता।
3 1 बंधन मुक्त ( कविता )
खोने के लिए जबकुछ नहीं बचा
सता रहा है फिर डर
किस बात का।
रही नहीं जब तमन्ना
कुछ भी पाने की
होना है जब मुक्त
सभी बंधनों से
घबराता है फिर क्यों मन।
अपने ही बुने
सारे बंधनों को छोड़
जीवन के अंतिम छोर पर
करना है जतन बचे हुए पल
इस तरह से जीने का
मिल पाए जिसमें मुझे भी आनंद
खुली हवा में सांस लेने का।
3 2 हां किया प्यार मैंने ( कविता )
किया तो होगातुमने भी कभी न कभी
किसी न किसी से प्यार।
धड़कता होगा
तुम्हारा दिल भी
देख कर किसी को।
मुमकिन है
कर दिया हो तुमने
इज़हार मोहब्बत का
अथवा हो सकता है
रख ली हो
दिल की बात दिल में
समाज के डर से
या इनकार के डर से।
मगर मैं जानती हूं
ऐसा हुआ होगा
ज़रूर जीवन में एक बार
स्वाभाविक है ये
सभी को हो ही जाता है
एहसास प्यार का।
आज जब मैंने कर लिया
प्यार का एहसास
और कर दिया परिणय निवेदन
करना चाहा स्वयं को समर्पित।
उसे जिसे चाहा मेरे मन ने
तो क्यों मान लिया गया
एक अपराध उसे।
क्यों दे दिया गया
मेरे प्यार की
पावन भावना को
चरित्र हीनता का नाम।
क्या इसलिये
कि देना नहीं चाहता
पुरुष समाज नारी को कभी भी
अधिकार चुनने का।
पहल करने का अधिकार नहीं है
औरत को
हर पुरुष चाहता है
नारी से मूक स्वीकृति
अथवा अधिक से अधिक
इनकार वह भी शायद
क्षमा याचना के साथ।
3 3 भाग्य लिखने वाले ( कविता )
विधाता हो तुमलिखते हो
सभी का भाग्य
जानता नहीं कोई
क्या लिख दिया तुमने
किसलिए
किस के भाग्य में।
सब को होगी तमन्ना
अपना भाग्य जानने की
मुझे नहीं जानना
क्या क्यों लिखा तुमने
मेरे नसीब में
लेकिन
कहना है तुमसे यही।
भूल गये लिखना
वही शब्द क्यों
करना था प्रारम्भ जिस से
लिखना नसीबा मेरा।
तुम चाहे जो भी
लिखो किसी के भाग्य में
याद रखना
हमेशा ही एक शब्द लिखना
प्यार मुहब्बत स्नेह प्रेम।
मर्ज़ी है तुम्हारी दे दो चाहे
जीवन की सारी खुशियां
या उम्र भर केवल तड़पना
मगर लिख देना सभी के भाग्य में
अवश्य यही एक शब्द
प्यार प्यार सिर्फ प्यार।
3 4 आत्म मंथन ( कविता )
जाने कैसा था वो जहांजाने कैसे थे वो लोग
बेगाने लगते थे अपने
अपनों में था बेगानापन।
हर पल चाहत पाने की
कदम कदम खोने का डर
आकांक्षाओं आपेक्षाओं का
लगा रहता था हरदम मेला
लेकिन भीड़ में रह कर भी
हर कोई होता था अकेला।
झूठ छल फरेब मुझको
हर तरफ आता था नज़र
औरों से लगता था कभी
कभी खुद से लगता था डर।
किसी मृगतृष्णा के पीछे
शायद सभी थे भाग रहे
भटकते रहते दिन भर को
रातों को सब थे जाग रहे।
अब जब खुद को पाया है
चैन तब रूह को आया है
नहीं कोई भी मदहोशी है
छाई बस इक ख़ामोशी है।
छोड़ उस झूठे जहां को
अब हूं अपने ही संग मैं
अब नहीं कर पाएगा कभी
मुझे मुझ से अलग कोई
सब कुछ मिल गया मुझे
पा लिया है खुद को आज।
3 5 मतभेद ( कविता )
आज स्पष्टहो गई तस्वीर
जब मेरे विचारों की
ताज़ी हवा से
छट गई सारी धुंध
मिट गई हर दुविधा
हो गया अंतर्द्वंद का अंत।
जान लिया
कि जाते हैं बदल
सही और गलत के
सारे मापदंड अब दुनिया में।
मगर मुझे चलना है
उसी राह पर
जिसे सही मानता हूं मैं
लोग चलते रहें
उन राहों पर
सही मानते हों वो जिन्हें।
काश जान लें सभी
विचारों के मतभेद के
इस अर्थ को और हो जाए अंत
टकराव का दुनिया वालों का
हर किसी से।
मतभेद
हो सकता है सभी का
औरों से ही नहीं
कभी कभी
खुद अपने आप से भी।
3 6 तुम्हारी नज़रें ( कविता )
जानते नहींपहचानते नहीं
जुबां से कह न सके
तुमने माना भी नहीं।
अजनबी बन गये हो तुम
मुझे भी मालूम न था
लेकिन
मेरे बचपन के दोस्त
छिप सकी न ये बात
तुम्हारी उन नज़रों से
जो पहचानती थी मुझे।
तुम अब तक
नहीं सिखा सके
उन्हें बदल जाना
तभी तो पड़ गया आज
तुम्हें
मुझसे नज़रें चुराना।
3 7 मेरे खत ( कविता )
मेरे बाद मिलेंगे तुम्हेंमेरे ये खत मेज़ की दराज से
शायद हो जाओ पढ़ कर हैरान
मत होना लेकिन परेशान।
लिखे हैं किसके नाम
सोचोगे बार बार तुम
मैं था सदा से सिर्फ तुम्हारा
पाओगे यही हर बार तुम।
हर खत को पढ़कर तुम तब
सुध बुध अपनी खोवोगे
करोगे मन ही मन मंथन
और जी भर के रोवोगे।
मैंने तुमको जीवन प्रयन्त
किया है टूट के प्यार
कर नहीं सका कभी भी
चाह कर भी मैं इज़हार।
कर लेना तुम विश्वास तब
मेरे इस प्यार का तुम
किया उम्र भर जो मैंने
उस इंतज़ार का तुम।
3 8 स्वीकार करने अपने गुनाह ( नज़्म )
स्वीकार करने हैंसभी अपने गुनाह
तलाश करता हूं
ऐसी इक इबादतगाह।
मेरी ज़ुबां से सुने
मेरी ही दास्तां
बन कर के पादरी
जहां पर खुद खुदा।
मंज़ूर है मुझको
हर इक कज़ा
मांग लूंगा मैं अपने
सब जुर्मों की सज़ा।
पूछना है लेकिन
इक सवाल भी मुझे
मिलता क्या है
हमें रुला के तुझे।
तेरे ही बंदे
क्यों इतने परेशान हैं
हम सभी देख कर हैरान हैं
मंदिर सब तेरे बने आलीशान हैं
फिर किसलिये बेघर इतने इंसान हैं।
बना कर ये दुनिया
कहां खो गया है
देख खोल कर आंखें
क्या सो गया है।
3 9 ठंडी ठंडी छांव ( कविता )
घर के आंगन का वृक्ष हूं मैंमेरी जड़ें गहराई तक फैली हैं
अपनी माटी में
प्यार से सालों साल सींचा है
माली ने पाला है जतन से
घर को देता हूं छाया मैं।
आये हो घर में तुम अभी अभी
बैठो मेरी शीतल शीतल छांव में
खिले हैं फूल कितने मुझ पर
निहारो उनको प्यार से
तोड़ना मत मसलना नहीं
मेरी शाखों पत्तों कलियों को
लगेंगे फल जब इन पर
घर के लिये तुम्हारे लिये
करो उसका अभी इंतज़ार।
काटना मत मुझे कभी भी
जड़ों से मेरी
जी नहीं सकूंगा
इस ज़मीन को छोड़ कर
मैं कोई मनीप्लांट नहीं
जिसे ले जाओ चुरा कर
और सजा लो किसी नये गमले में।
देखो मुझ पर बना है घौसला
उस नन्हें परिंदे का
उड़ना है उसे भी खुले गगन में
अपने स्वार्थ के पिंजरे में
बंद न करना उसको
रहने दो आज़ाद उसको भी घर में
बंद पिंजरे में उसका चहचहाना
चहचहाना नहीं रह जायेगा
समझ नहीं पाओगे तुम दर्द उसका।
जब भी थक कर कभी
आकर बैठोगे मेरी ठंडी ठंडी छांव में
माँ की लोरी जैसी सुनोगे
इन परिंदों के चहचहाने की आवाज़ों को
और यहां चलती मदमाती हवा में
आ जाएगी तुम्हें मीठी मीठी नींद।
4 0 झूठा है दर्पण ( कविता )
किया सम्मानितसरकार ने
साहित्यकार को
और दे दी गई
इक स्वर्ण जड़ित
कलम भी
सम्मान राशि के साथ।
रुक जाता
लिखते लिखते
उनका हाथ
जब भी चाहते लिखना वो
जनता के दुःख दर्द की
कोई बात।
शायद इसलिये
या फिर अनजाने में ही
मुझे भेज दी
उन्होंने वही कलम
शुभकामना के साथ।
देखा भीतर से
जब कलम को
लगे कांपने मेरे भी हाथ
आया नज़र
स्याही की जगह लहू
डरा गई मुझको ये बात।
ऐसी ही कलमें
आजकल लिख रहीं हैं
नित नया नया इतिहास।
गरीबों के खून के छींटे
आ रहे नज़र उनके दामन पर
जो करते तो हैं देशसेवा की बातें
कर रहे हर दिन
जनता का धन बर्बाद।
आयोजित करते
आडम्बरों के समारोह
प्रतिदिन शान दिखाने
दिल बहलाने को
नहीं कर पाते वो लोग कभी
गरीबों के दुःख दर्द का
कोई एहसास।
करते जिन की हैं बातें
उन भूखे नंगों का
कर रहे ये कैसा उपहास।
कौन दिखाये दर्पण उनको
कौन लगाये उन पर कोई आरोप
जब शामिल हैं इनमें
समाज को आईना दिखाने वाले।
अपनी सूरत
देखें कैसे दर्पण में
और कैसे सब को दिखायें
सरकारी सम्मानों का
क्या है सच
वो हमें कैसे खुद बतायें।
4 1 उस पार जाना ( कविता )
ले चल मुझे उस पारमेरे माझी
पूछा नहीं कभी भी मैंने
है कहां मेरे सपनों का जहां।
तलाश करने अपनी दुनिया
जाना है उस पार मुझे
मैं नहीं डरता भंवर से
तूफ़ान से।
दिया नहीं कभी
किसी ने मेरा साथ
मगर तुम माझी हो मेरे
लगा दो पार नैया मेरी
या डुबो दो भंवर में।
तोड़ो मत मेरा दिल
ये कह कर
कि उस पार कुछ नहीं है।
कह दो मेरे माझी
झूठा है ये बहाना
मुझे अब भी
है उस पार जाना।
4 2 कहानी ज़ख़्मों की ( कविता )
बार बार लिखता रहाहर बार मिटाता रहा
कहानी अपने जीवन की।
अच्छा है यही
रह जाये अनकही
सदा कहानी मेरे जीवन की।
हो न जाये कोई उदास
सुनकर मेरी कहानी
जीवन में सभी को होती है
किसी न किसी से कोई आस।
सुनकर मेरी दास्तां
टूट न जाये
कहीं किसी की कोई उम्मीद।
कैसे खड़ा करूँ कटघरे में
सभी अपनों को बेगानों को
कैसे कह दूं मिल सका नहीं
कोई भी इस पूरी दुनिया में मुझे।
कैसे कर लूँ मैं स्वीकार
कैसे जीते जी मान लूँ
अपनी तलाश की
मैं अभी भी हार।
सुनाऊँ अपनी कहानी
मिल जाये अगर कहीं अपना कोई
आंसुओं से भिगो दूँ उसका दामन
रोये वो भी साथ मेरे देर तक।
हो जाये मेरे हर दुःख दर्द
और अकेलेपन का अंत।
मगर लिखी जाती नहीं
उस फूल की कहानी
जिसको मसल डाला
खुद माली ने।
कहानी उस पत्थर की
लगाते रहे जिसको
ठोकर सभी लोग।
नहीं लिखी जाती
उन सपनों की कहानी
बिखरते रहे हर सुबह जो
उन रातों की कहानी
जिनमें हुई न कभी चांदनी।
उन सुबहों की क्या लिखूं कहानी ,
मिटा पाया न जिनका सूरज
मेरे जीवन से अँधेरा।
काँटों के दर्द भरे शब्दों से
मुझे नहीं लिखनी है
किसी किताब के पन्ने पर
अपने ज़ख्मों की कहानी।
4 3 काश ( कविता )
चले जाते हैं हम लोगमंदिर मस्जिद गुरुद्वारे गिरजा घर।
करते हैं पूजा अर्चना
सुन लेते हैं बातें धर्मों की
झुका कर अपना सर।
और मान लेते हैं
कि खुश हो गया है ईश्वर
हमारे स्तुतिगान से।
मगर कभी जब कहीं
कोई देता है दिखाई हमें
दुःख में निराशा में
घबरा कर आंसू बहाता हुआ।
तब हम चुरा लेते हैं नज़रें
और गुज़र जाते हैं
कुछ दूर हटकर।
हमारी आस्था हमारा धर्म
जगा नहीं पाता हमारे मन में
मानवता के दर्द के एहसास को।
काश
कह पाता ईश्वर तब हमें
व्यर्थ है हमारा उसके दर पे आना।
4 4 विवशता ( कविता )
खाली है मेरा भी दामनतुम्हारे आंचल की तरह
कुछ भी नहीं पास मेरे
तुम्हें देने को।
तुम्हारी तरह है मुझे भी
तलाश एक हमदर्द की
मेरे मन में भी है बाकी
कोई अधूरी प्यास।
ढूंढती हैं
तुम्हारी नज़रें जो मुझ में
कहने को लरजते हैं
तुम्हारे होंट बार बार
समझता हूँ लेकिन
समझना नहीं चाहता मैं
प्यार भरी नज़रों की
तुम्हारी उस भाषा को।
छुप सकती नहीं
मन की कोमल भावनाएं
जानते हैं हम दोनों।
मत आना मेरे करीब तुम
भरे हुए हैं
अनगिनत कांटे
दामन में मेरे
हैं नाज़ुक उंगलियां तुम्हारी
कहीं चुभ न जाए
शूल कोई उनको।
किसी को देने को कोई फूल
लाल पीला या गुलाबी
नहीं पास मेरे।
कभी नहीं मिल पाएंगे
हम तोड़ कर
दुनिया के सारे बंधनों को।
बस आंखों ही आंखों में
करते रहें बात हम
ख़ामोशी से यूं ही करें
हर दिन मुलाक़ात हम।
4 5 मृगतृष्णा ( कविता )
हम चले जाते हैं उनके पासनिराशा और परेशानी में
सोचकर कि वे कर सकते हैं
जो हो नहीं पाता है
कभी भी हमसे।
वे जानते हैं वो सब
नहीं जो भी हमें मालूम
तब वे बताते हैं हमें
कुछ दिन महीने वर्ष
रख लो थोड़ा सा धैर्य
सब अच्छा है उसके बाद।
हमें मिल जाती है
झूठी सी आशा इक
इक तसल्ली सी
सोचकर कि आने वाले हैं
दिन अच्छे हमारे।
कट जाती है उम्र इसी तरह
झेलते दुःख परेशानियां
और जी लेते हैं हम
आने वाले अच्छे दिनों की
झूठी उम्मीद के सहारे।
टूटने लगता है जब धैर्य
डगमगाने लगता है विश्वास
फिर चले जाते हैं
हम बार बार उन्हीं के पास।
ले आते हैं वही झूठा दिलासा
और नहीं कुछ भी उनके पास
उनका यही तो है कारोबार
झूठी उम्मीदों
दिलासों का।
शायद होती है
इस की ज़रूरत हमें
जीने के लिये जब
निराशा भरे जीवन में
नहीं नज़र आती
कोई भी आशा की किरण
जो जगा सके ज़रा सी आशा
झूठी ही सही।
सच साबित होती नहीं बेशक
उनकी भविष्यवाणियां कभी भी
तब भी चाहते हैं
बनाए रखें उन पर।
अपना विश्वास
ऐसा है ज़रूरी उनके लिए भी
शायद उससे अधिक हमारे लिये
जीने की आशा के लिए।
4 6 हमारा अपना ताज ( कविता )
मुमताज क्या चाहती थीकिसे पता उसे क्या मिला
ताज बनने से।
बनवा दिया
एक राजा ने एक महल
संगेमरमर का
अपनी प्रेमिका की याद में
और कह दिया दुनिया ने
मुहब्बत की निशानी उसे।
तुम नहीं बनवा सकोगे
ताजमहल कोई
मेरी याद में मेरे बाद
मगर जानती हूं मैं।
तुम चाहते हो बनाना
एक छोटा सा घर
मेरे लिये
जिसमें रह सकें
हम दोनों प्यार से।
अपना बसेरा बनाने के लिये
हमारी पसंद का कहीं पर
हर वर्ष बचाते हो थोड़े थोड़े पैसे
अपनी सीमित आमदनी में से।
किसी ताज महल से
कम खूबसूरत नहीं होगा
हमारा प्यारा सा वो घर।
मुमताज से कम
खुशकिस्मत नहीं हूं मैं
प्यार तुम्हारा कम नहीं है
किसी शाहंशाह से।
4 7 रास्ते ( कविता )
मंज़िल की जिन्हें चाह थीमिल गई
उनको मंज़िल।
मैं वो रास्ता हूं
गुज़रते रहे जिससे हो कर
दुनिया के सभी लोग।
तलाश में अपनी अपनी
मंज़िल की
मैं रुका हुआ हूं
इंतज़ार में प्यार की।
रुकता नहीं
मेरे साथ कोई भी
कुचल कर
गुज़र जाते हैं सब
मंज़िल की तरफ आगे।
सबको भाती हैं
मंज़िलें
बेमतलब लगते हैं रास्ते।
क्या मिल पाती तुम्हें मंज़िलें
न होते जो रास्ते।
रास्तों को पहचान लो
उनका दर्द
कभी तो जान लो।
4 8 ऐसा भी कोई तो हो ( कविता )
अपना ले जो मुझेमैं जैसा भी हूं।
हर दिन मुझको
न करवाए एहसास
मेरी कमियों का बार बार।
सोने चांदी से नहीं
धन दौलत से नहीं
प्यार हो जिसको इंसान से
इंसानियत से।
जिसको आता ही न हो
मेरी ही तरह
दुनिया का लेन-देन का
कोई कारोबार।
थाम कर जो
फिर छोड़ जाए न कभी साथ
रिश्ते-नातों को
जो समझे न इक व्योपार
जिसको आता हो बहाना आंसू
हर किसी के दुःख दर्द में।
नफरत न हो जिसे अश्क बहाने से
जिसमें बाकी हों
मानवता की संवेदनाएं
जन्म जन्म से ढूंढ रहा हूं
उसी को मैं।
4 9 कोई ( कविता )
कोई है धड़कन दिल कीकोई राहों की है धूल।
कोई शाख से टूटा पत्ता
कोई डाली पे खिला फूल।
कोई आंसू मोती जैसा
कोई हो जैसे कि पानी।
कोई आज के दौर की चर्चा
कोई भूली हुई कहानी।
कोई कविता ग़ज़ल हो जैसे
कोई बीते कल का अखबार।
कोई कहीं पर डूबी नैया
कोई माझी संग पतवार।
कोई सूना आंगन मन का
कोई है दिल का अरमान।
कोई अपने घर को भूला
कोई घर घर का महमान।
कोई नहीं कभी बिकता है
कोई बताता अपना दाम।
कोई है आगाज़ किसी का
कोई किसी का है अंजाम।
5 0 मेरी जान , मेरे दोस्त ( कविता )
अक्सर आता है मुझे यादपहला दिन कालेज का
झाड़ियों के पीछे
पत्थरों पर बैठे हुए थे
हम दोनों कालेज के लान में।
रैगिंग से हो कर परेशान
कितने उदास थे हम
कितने अकेले अकेले
पहले ही दिन कुछ ही पल में
हम हो गये थे कितने करीब।
अठारह बरस है अपनी उम्र
आज भी लगता है कभी ऐसे
कितनी यादें हैं अपनी
जो भुलाई नहीं जाती
भूलना चाहते भी नहीं थे
हम कभी।
पहली बार मुझे
मिला था दोस्त ऐसा
जो जानता था
पहचानता था
मुझे वास्तव में।
बीत गये वो दिन कब जाने
छूट गया वो
शहर उसका बाज़ार
गलियां उसकी।
बरसात में भीगते हुए
हमारा कुछ तलाश करना
बाज़ार से तुम्हारे लिये
खो गई सपनों जैसी
प्यारी दुनिया हमारी।
मगर भूले नहीं हम
कभी वो सपने
जो सजाए थे मिलकर कभी
अचानक तुम चले गए वहां
जहां से आता नहीं लौटकर कोई।
मुझे नहीं मिला
फिर कोई दोस्त तुम सा
खाली है मेरे जीवन में
इक जगह
रहते हो अब भी तुम वहां।
आज भी सोचता हूँ
जाकर ढूंढू
उन्हीं रास्तों पर तुम्हें जहां
चलते रहे दोनों यूं ही शामों को
अब कहां मिलते हैं
इस दुनिया में तुझसे दोस्त।
अब क्या है इस शहर में
इस दुनिया में
बिना तेरे मेरी जान मेरे दोस्त।
( ये कविता मेरे दोस्त डॉ बी डी शर्मा , बीडी के नाम )
5 1 मेरी खबर ( कविता )
पहचाना नहीं आज तुमने मुझेतुम्हें फुर्सत नहीं थी मिलने की
करनी थी मुझको जो बातें तुमसे
रहेंगी उम्र भर सब अब अधूरी।
मगर शायद वर्षों बाद पढ़ कर
सुबह का तुम अखबार
या सुन कर किसी से समाचार
आओगे घर मेरे तुम भी एक बार
ढूंढ कर मेरा ठिकाना।
मुमकिन है सोचो तब तुम
कोई तो दे जाता मैं तुम्हें निशानी
काश दोहराते पुरानी हम यादें
सुनते-सुनाते जुबां से अपनी
नई हम कहानी।
मिला है जो
जवाब तुमसे अभी
वही खुद अपने से
मिलेगा तुम्हें कभी
नहीं मिल सकूंगा मैं।
होगी शायद
तुमको भी निराशा
होगी खत्म तुम्हारी भी
मुझसे मिलने की
हर आशा।
ये सब जीते जी
नहीं कर सकूंगा मैं
जो किया है तुमने
वो नहीं दोहराऊंगा मैं।
होगा ऐसा इसलिये
मेरे दोस्त उस दिन
क्योंकि मैं अलविदा
कह चुका हूंगा दुनिया को।
और आये होगे
तुम मेरे घर पर
पढ़कर या सुनकर
मेरे मरने की खबर।
5 2 खुदा से बात ( कविता )
कहते हैं लोगदुनिया में अच्छा-बुरा
जो भी होता है
सब होता है तेरी ही मर्ज़ी से।
अन्याय अत्याचार
धर्म तक का होता है
इस दुनिया में कारोबार।
तेरी मर्ज़ी है इनमें
मैं कर नहीं सकता
कभी भी स्वीकार।
सिर्फ इसलिए कि याद रखें
भूल न जाएं तुझको
देते हो सबको परेशानियां
दुःख दर्द समझते हैं
दुनिया के कुछ लोग।
ऐसा तो करते हैं
कुछ इंसान
कर नहीं सकता
खुद भगवान।
खुदा नहीं हो सकता
अपने बनाए इंसानों से
इतना बेदर्द
निभाता होगा अपना हर फ़र्ज़।
लगता है
कर दिया है बेबस तुझको
अपने ही बनाए इंसानों ने
जैसे माता पिता
हैं यहां बेबस संतानों से।
अपने लिए सभी
करते तुझ से प्रार्थना
मैं विनती कर रहा हूँ
पर तेरे लिए।
बचा लो इश्वर
अपनी ही शान
फिर से बनाओ अपना ये जहान
होगा हम सब पर एहसान।
अब फिर बनाओ दुनिया इक ऐसी
चाहते हो तुम खुद जैसी
अच्छा प्यारा खूबसूरत
बनाओ इक ऐसा फिर से जहां।
जिसमें न हो दुःख दर्द कोई
मिलती हों सबको खुशियां।
अन्याय अत्याचार का
जिसमें न हो निशां
ऐ खुदा अब बनाना
इक ऐसी नई दुनिया।
5 3 फूल पत्थर के ( कविता )
साहित्य मेंबड़ा है उनका नाम
गरीबों के हमदर्द हैं
कुछ ऐसी बनी हुई
उनकी है पहचान।
गरीब बेबस शोषित लोग
उनकी रचनाओं के
होते हैं किरदार
मानवता के दर्द की संवेदना
छलकती नज़र आती है
उनके शब्दों से।
मिले हैं दूर से कई बार उनसे ,
उनके लिए
बजाई हैं तालियां
आज गये हम उनके घर
उनसे करने को मुलाक़ात।
देखा जाकर वहां
नया एक चेहरा उनका
उनके घर के कई काम करता है
किसी गरीब का बच्चा छोटा सा।
खड़ा था सहमा हुआ
उनके सामने कह रहा था
हाथ जोड़ रोते हुए
मेरा नहीं है कसूर
कर दो मुझे माफ़।
लेकिन रुक नहीं रहे थे
उनके नफरत भरे बोल
घायल कर रहे थे
उनके अपशब्द एक मासूम को
और मुझे भी
जो सुन रहा था हैरान हो कर।
डरने लगा था मन मेरा
देख उनके चेहरे पर
क्रूरता के भाव
उतर गया था जैसे उनका मुखौटा।
वो खुद लगने लगे थे
खलनायक
अपनी ही लिखी कहानी के।
लौट आया था मैं उलटे पांव
वे वो नहीं थे जिनसे मिलने की
थी मुझे तमन्ना।
आजकल बिकते हैं बाज़ार में
कुछ खूबसूरत फूल
पत्थर के बने हुए भी
लगते हैं हरदम ताज़ा
पास जाकर छूने से लगता है पता।
नहीं फूलों सी कोमलता का
उनमें कोई एहसास।
मुरझाते नहीं
मगर होते हैं संवेदना रहित
खुशबू नहीं बांटते
पत्थर के फूल कभी।
5 4 वो साहित्य कहां है ( कविता )
कब का मिट चुका लुट चुकाजिसको चाहते हैं ढूंढना हम सब।
उजड़ा उजड़ा सा है चमन
मुरझाये हुए हैं फूल सभी
रुका हुआ
प्रदूषित जल तालाब का
कुम्हलाए हुए
कंवल के सभी फूल।
हवाओं में है अजब सी घुटन
बेचैन हो रहा हमारा तन मन
हो रहा है जैसे मातम कोई।
कहां गई
खुशियों की महफिलें।
कहां भूल आये सभी सदभावना
क्यों खो गई संवेदनाएं हमारी
आता नहीं अब कहीं नज़र
होता था कभी जो अपनी पहचान।
सुगंध थी जिसमें फूलों की
महक थी जो बहारों की
नदी का वो बहता पानी
समुन्दर सी गहराई लिये
प्यार का सबक पढ़ाने वाला
मानवता की राह दिखाने वाला।
नई रौशनी लाने वाला
अंधेरे सभी मिटाने वाला
आशा फिर से जगाने वाला
पढ़ने वाला पढ़ाने वाला
साहित्य वो है कहां।
5 5 किया था वादा तुमने कृष्ण ( कविता )
उसका अंत करने को
लेते हो तुम जन्म
गीता में कहा था तुमने
हे कृष्ण।
आज हमें हर तरफ
आ रहे हैं नज़र
कितने ही कंस हैं
तुम्हारी जन्म भूमि पर।
हम हर वर्ष मनाते हैं
जन्माष्टमी का त्यौहार
रख कर दिल में उम्मीद
कि आओगे तुम
निभाने अपना वादा
कर दोगे अंत इन सब का।
क्या भूल गये
अपना किया वादा तुम
अच्छा होता
न करते तुम ऐसा वादा।
दिया होता गीता में
सब को ये सन्देश
कि हम सब को
स्वयं बनना होगा कृष्ण।
पाप और अधर्म का
अंत करने के लिये
तब शायद न ले पाते
नित नये नये कंस जन्म
इस धरती पर हे कृष्ण।
5 6 दर्द का नाता ( कविता )
सुन कर कहानी एक अजनबी कीअथवा पढ़कर किसी लेखक की
कोई कहानी
एक काल्पनिक पात्र के दुःख में
छलक आते हैं
हमारी भी पलकों पर आंसू।
क्योंकि याद आ जाती है सुनकर हमें
अपने जीवन के
उन दुखों परेशानियों की
जो हम नहीं कह पाये कभी किसी से
न ही किसी ने समझा
जिसको बिन बताये ही।
छिपा कर रखते हैं हम
अपने जिन ज़ख्मों को
उभर आती है इक टीस सी उनकी
देख कर दूसरों के ज़ख्मों को।
सुन कर किसी की दास्तां को
दर्द की तड़प बना देती है
हर किसी को हमारा अपना
सबसे करीबी होता है नाता
इंसान से इंसान के दर्द का।
5 7 अभ्यस्त ( कविता )
परेशान थी उसकी नज़रेंव्याकुल थी देखने को
मेरी टूटती हुई सांसें।
मैं समझ रहा था
बेचैनी उसकी
देख रहा था
उसकी बढ़ती हुई घबराहट।
वक़्त गुज़रता जा रहा था
और उसके साथ साथ
बदल रहा था हर पल
उसके चेहरे का रंग।
मुझे दिया था भर कर
अपने हाथों से उसने
जब विष का भरा प्याला
और पी लिया था
चुपचाप मैंने सारा ज़हर।
उसके साथ साथ मैं भी
कर रहा था इंतज़ार मौत का
पूछा था सवाल उसने
न जाने किस से
मुझसे अथवा खुद अपने आप से
नहीं क्यों हो रहा है
उसके दिये ज़हर का
कोई भी असर मुझपर।
समझ गया था मैं लेकिन
किस तरह समझाता उसे
उम्र भर करता रहा हूं
प्रतिदिन विषपान मैं
दुनिया वालों की
सभी अपनों बेगानों की
बातों का जिन में भरा होता था
नफरत के ज़हर का।
अभ्यस्त हो चुका हूं
विषपान का कब से
तभी कोई भी ज़हर अब मुझ पर
नहीं करता है कुछ भी असर।
5 8 आंगन ( कविता )
ऊंचीं ऊंची दीवारें हैं घेरे हुए मुझेबंद है हर रास्ता मेरे लिये
धूप आंधी सर्दी गर्मी बरसात
सब कुछ सहना पड़ता है मुझे।
खिड़कियां दरवाज़े हैं सब के लिये
मेरे लिये है खुला आसमान
देख सकता हूं उतनी ही दुनिया
जितनी नज़र आती है
ऊंची ऊंची दीवारों में से
दिखाई देते आकाश से।
खुलते हैं दरवाज़े और खिड़कियां
हवा के लिये रौशनी के लिये
सभी कमरों के मुझ में ही आकर
जब भी किसी को पड़ती है कोई ज़रूरत।
रात के अंधेरे में तपती लू में
आंधी में तूफान में
बंद हो जाती है हर इक खिड़की
नहीं खुलता कोई भी दरवाज़ा।
सब सहना होता है मुझको अकेले में
सहना पड़ता है सभी कुछ चुप चाप
मैं आंगन हूं इस घर का
मैं हर किसी के लिये हूं हमेशा
नहीं मगर कोई भी मेरे लिये कभी भी।
5 9 सबक ( कविता )
जीवन का तुम्हारेकुछ बुरा वक़्त हूं
आया हूं मगर
नहीं रहूंगा हमेशा
चला जाऊंगा मैं जब
लौट आयेगा अच्छा वक़्त।
मुझे देख कर तुम
घबराना मत कभी
सीखना सबक मुझसे
आ जायेगा तुमको
पहचानना अपने पराये को।
भूल मत जाना मुझे
मेरे जाने के बाद भी
याद रखना हमेशा
निभाया साथ किसने
छोड़ गया कौन इस हाल में।
खोना मत कभी उनको
हैं जो आज तुम्हारे साथ
गये चले जो छोड़कर
मत करना उनका इंतज़ार
कभी आयें जो वापस
फिर नहीं करना ऐतबार।
6 0 रिश्तों की डोरी ( कविता )
कभी देखा हैधागे जब उलझ जाते हैं
बहुत कठिन हो जाता है
उनको बचाकर अलग करना
ज़रा सा खींचा कोई धागा
टूट जाता है पल भर में
इक थोड़ा सा खींचने भर से।
जीवन में रिश्ते नाते सभी
रहते हैं इक साथ ऐसे ही
हम सभी के अपने ही हाथों में
खोना नहीं चाहते हैं किसी को भी
मगर ज़रा सी भूल से हो जाता है
अक्सर ऐसा भी हम सभी से।
कोई इक रिश्ता उलझ जाता है
अपने किसी दूसरे रिश्ते से अचानक
नहीं आता सभी को ये काम
हर रिश्ते नाते को बचाकर रखना।
मिलना जाकर किसी दिन इक बुनकर से
देखना उसको बुनते हुए धागों से
कितने रंग वाले कैसे कैसे होते हैं
सब को अपनी जगह पर रखता
सब को उतना ही कसता जितना ज़रूरी
सभी में रखता है थोड़ी थोड़ी सी दूरी।
कोई धागा नहीं उलझने देता वो
टूटने नहीं देता इक भी धागा
और कभी कोई टूट भी जाता है
थोड़ा अधिक खींचने से अचानक
तब उसको अलग रखता दूसरे धागों से।
गांठ नहीं लगता है कभी बुनकर
प्यार से उसी धागे के दोनों सिरे
फिर से मिला देता उनको कैसे
कभी टूटा ही नहीं था वो जैसे।
दोस्तो सीखना सभी बुनकर से
प्यार मुहब्बत दोस्ती वाले सब रिश्ते
कैसे रखने हैं सभी हमने संभाल कर।
और उस से बुनना है अपना जीवन
किसी खूबसूरत चादर की तरह
जिस में मिलकर हर धागा देता है
बहुत ही सुंदर शक्ल।
61 फिर से इक बार ( कविता )
हमारी आंखों परबंधी हुई थी कोई पट्टी।
और हम कोल्हू के बैल बन कर
रात दिन चलते गये चलते गये
पहुंचे नहीं कहीं भी
थे चले जहां से रहे बस वहीं ही।
सोच रहे हैं अब
उतार फैंकें इस पट्टी को
और चल पड़ें
नई राह बनाने को जीवन की।
ताकि बर्बाद न होने पायें
बाकी बचे पल जीवन के।
शायद अभी भी
अवसर है हमारे पास
कुछ फूल खिलाने का कुछ दीप जलाने का
कोई साज़ बजाने का कोई गीत गुनगुनाने का।
6 2 कलमकार की चाहत ( कविता )
63 मैं साकी भी , मैं सागर भी ( कविता )
6 4 हम सभी लोग ( कविता )
बड़े पदों को पा लिया
ऊंची पायदान पर हैं
मात खाते हर बार
कर रहे हैं बिना किसी तरह से
बोलकर सोचते हैं वही हैं
उन्हीं से चाहते हैं पाना
फिर भी सब को लगते हैं
मुजरिम हैं
कोई नहीं करता तब भी यकीन
भीतर पीतल और बाहर है
65 नहीं आता हमें ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
लगाना दिल नहीं आता हमें ,
दुखाना दिल नहीं आता हमें।
मिलाना हाथ आता है मगर ,
मिलाना दिल नहीं आता हमें।
उन्हें आता नहीं हम पर यकीं ,
दिखाना दिल नहीं आता हमें।
हमें सब को मनाना आ गया ,
मनाना दिल नहीं आता हमें।
तुम्हारा दिल तुम्हारे पास है ,
चुराना दिल नहीं आता हमें।
बहुत चाहा नहीं माना कभी ,
रिझाना दिल नहीं आता हमें।
जिसे देना था "तनहा" दे दिया ,
बचाना दिल नहीं आता हमें।
66 नसीब में जो नहीं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया
67 ज़िंदगी से मिलो मर जाने से पहले ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
68 खुदा से शिकायत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया
नज़्म / छंदबद्ध कविताएं - भाग 2
जश्न ए आज़ादी हर साल मनाते रहे ( कविता )
जश्ने आज़ादी हर साल मनाते रहे ,शहीदों की हर कसम हम भुलाते रहे।
याद नहीं रहे भगत सिंह और गांधी ,
फूल उनकी समाधी पे बस चढ़ाते रहे।
दम घुटने लगा पर न समझे यही ,
काट कर पेड़ क्यों शहर बसाते रहे।
लिखा फाइलों में न दिखाई दिया ,
लोग भूखे हैं सब नेता झुठलाते रहे।
दाग़दार हैं इधर भी और उधर भी ,
आइनों पर सभी दोष लगाते रहे।
आज सोचें ज़रा क्योंकर ऐसे हुआ ,
बाड़ बनकर रहे खेत भी खाते रहे।
यह न सोचा कभी आज़ादी किसलिए ,
ले के अधिकार सब फ़र्ज़ भुलाते रहे।
मांगते सब रहे रोटी , रहने को घर ,
पांचतारा वो लोग होटल बनाते रहे।
खूबसूरत जहाँ से है हमारा वतन ,
वो सुनाते रहे लोग भी गाते रहे।
देश की राजनीति पर वक़्त के दोहे : -
नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीखशासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख।
मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर।
तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग।
दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल।
झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार।
नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग।
चमत्कार का आजकल अदभुत है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार।
आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता यह अपना ईमान।
पढ़ कर रोज़ खबर कोई ( बेचैनी )
पढ़ कर रोज़ खबर कोई ,मन फिर हो जाता है उदास।
कब अन्याय का होगा अंत ,
न्याय की होगी पूरी आस।
कब ये थमेंगी गर्म हवाएं ,
आएगा जाने कब मधुमास।
कब होंगे सब लोग समान ,
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास।
चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें ,
फिर वो न आए हमारे पास।
सरकारों को बदल देखा ,
हमको न कोई आई रास।
जिसपर भी विश्वास किया ,
उसने ही तोड़ा है विश्वास।
बन गए चोरों और ठगों के ,
सत्ता के गलियारे दास।
कैसी आई ये आज़ादी ,
जनता काट रही बनवास।
पल दो पल में मुर्झाऊंगा ( कविता )
पल दो पल में मुर्झाऊंगा ,शाख से टूट के क्या पाउँगा।
आज सजा हूँ गुलदस्ते में ,
कल गलियों में बिखर जाऊंगा।
उतरूंगा जो तेरे जूड़े से ,
बासी फूल ही कहलाऊंगा।
गूंथा जाऊंगा जब माला में ,
ज़ख्म हज़ारों ही खाऊंगा।
मेरे खिलने का मौसम है ,
लेकिन तोड़ लिया जाऊंगा।
चुन के मुझे ले जायेगा माली ,
डाली को याद बहुत आऊंगा।
खुद पे ही एतबार कर लो ( नज़्म )
खुद पे ही एतबार कर लो ,ज़िंदगी का तुम दीदार कर लो।
जो मंज़िल की चाह है तुम्हें ,
मुश्किलों से भी प्यार कर लो।
बेहतर है ये किनारे बैठने से ,
डूब जाओ या कि पार कर लो।
बदल सकते हो हवा का रुख ,
हौसला तुम एक बार कर लो।
कौन अपना है कौन बेगाना ,
प्यार से मिले जो प्यार कर लो।
तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम ( नज़्म )
तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम ,यही सोच के चल पड़े थे हम।
न पतवार थी न कोई माझी ,
हौसलों से हुए बड़े थे हम।
वक़्त आया जो फैसले का ,
खुद अपने से भी लड़े थे हम।
ज़माने की आग से पक गए ,
वरना कच्चे घड़े थे हम।
झुक गए तेरी मुहब्बत में ,
तबीयत से सरचड़े थे हम।
मोम की तरह पिघल गए ,
कभी फौलाद से कड़े थे हम।
फरियाद कातिल से न करेंगे ,
इसी बात पे अड़े थे हम।
शीशे सा नाज़ुक घर भी है ( नज़्म )
शीशे सा नाज़ुक घर भी है ,कुछ तूफानों का डर भी है।
जीने की चाहत है लेकिन ,
पीना ग़म का सागर भी है।
इंसानों की खबर न कोई ,
शहर का ऐसा मंज़र भी है।
यूँ तो है खामोश किनारा ,
लहर गई टकरा कर भी है।
ढूंढ के उसको लाओ कहीं से,
खोया सहर में दिनकर भी है।
लब पे आई तो मुहब्बत आई ( नज़्म )
लब पे आई तो मुहब्बत आई ,भूल कर भी न शिकायत आई।
बात कुछ ऐसी चली महफ़िल में ,
फिर हमें याद वो मूरत आई।
हम से बिछड़ी जो अभी शाम ढले ,
रात भर याद वो सूरत आई।
कश्ती लहरों के हवाले कर दी ,
बेबसी में जो ये नौबत आई।
आसमां रंग बदल कर बोला ,
लो ज़मीं वालो कयामत आई।
याद तुम्हें करता है कोई ( नज़्म )
लफ्ज़े-मुहब्बत अपनी जुबां पर ,
लाने से डरता है कोई।
दुनिया में इक वो ही हसीं है ,
इस का दम भरता है कोई।
सूखे फूल चढा कर कैसी ,
ये पूजा करता है कोई।
खुद से तन्हाई में बातें ,
दीवाना करता है कोई।
वादा करके भी वो न आया ,
यूँ भी ज़फा करता है कोई।
वो दर्द कहानी बन गया ( नज़्म )
वो दर्द कहानी बन गया ,इक याद पुरानी बन गया।
पत्र जो वापस मिला मुझे ,
वो उसकी निशानी बन गया।
उसकी महफ़िल में जाना ही ,
मेरी नादानी बन गया।
लबों तक बात आ न सकी ,
पलकों का पानी बन गया।
उनका पूछना हाल मेरा ,
इक मेहरबानी बन गया।
है शहर में बस धुआं धुंआ ( नज़्म )
है शहर में बस धुआं धुआं ,न रौशनी का कोई निशां।
ये पूछती है नज़र नज़र ,
है आदमी का कोई निशां।
समझ सके जो यहाँ है कौन ,
ज़रा सी इक बच्ची की जबां।
कहीं भी दिल लगता ही नहीं ,
जो कोई जाये भी तो कहाँ।
सुनाएँ कैसे किसी को हम ,
इक उजड़े दिल की ये दास्ताँ।
बात दिल में थी जो बता न सके ( नज़्म )
बात दिल में थी जो बता न सके ,आपबीती उन्हें सुना न सके।
हमने कोशिश हज़ार की लेकिन ,
बेकरारी ए दिल छिपा न सके।
बातें करते रहे ज़माने की ,
बात अपनी जुबां पे ला न सके।
चाह कर भी घटा सी जुल्फों को ,
उनके चेहरे से हम हटा न सके।
हमने पूछा जो बेरुखी का सबब ,
वो बहाना कोई बना न सके।
जाने वाले ने देखा मुड़ मुड़ कर ,
हम मगर उसको रोक पा न सके।
अब हमें दिल की बात कहने दो ( नज़्म )
अब हमें दिल की बात कहने दो ,हो जो मुमकिन तो अश्क बहने दो।
सब चले जाएंगे कभी न कभी ,
कोई मेहमान अभी तो रहने दो।
वक़्त इसका इलाज कर देगा ,
दिल को अब तो ये दर्द सहने दो।
ख़त्म कर दो खामोशियों को आज ,
कहना है जो लबों को कहने दो।
रोक पाई न इश्क को दुनिया ,
ये तो दरिया है इसको बहने दो।
देखो खुद बन के तुम तमाशाई ,
हिलती दीवार घर की ढहने दो।
खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं ( नज़्म )
खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं ,फायदा ज़हर भी कर जाते हैं।
सीख जाते हैं भुलाना उनको ,
बन के जो गैर गुज़र जाते हैं।
ख्वाब तो ख्वाब हैं उनका क्या है ,
नींद जो टूटी बिखर जाते हैं।
एक तिनके का सहारा पा कर ,
डूबने वाले भी तर जाते हैं।
इस से पहले कि उन्हें पहचाने ,
वो जो करना था ,वो कर जाते हैं।
फूल यादों पे चढ़ाओ उनकी ,
जीते जी लोग जो मर जाते हैं।
वक़्त के साथ जो चलते हैं संवर जाते हैं ( नज़्म )
वक़्त के साथ जो चलते हैं संवर जाते हैं ,जो पिछड़ जाते हैं वो लोग बिखर जाते हैं।
जिनको मिलता ही नहीं कोई जीने का सबब ,
मौत से पहले ही अफ़सोस वो मर जाते हैं।
मुश्किलों को कभी आसान नहीं कर सकते ,
उलझनों से ,वो सभी लोग , जो डर जाते हैं।
जो नहीं मिलता कभी जा के किनारों पे हमें ,
वो उन्हें मिलता है जो बीच भंवर जाते हैं।
हम समझते हैं जिन्हें अपना वो गैरों की तरह ,
पेश आते हैं तो हम जीते जी मर जाते हैं।
गैर अच्छे जो मुसीबत में हमारी आकर ,
दोस्तों जैसा कोई काम तो कर जाते हैं।
आएगा कोई हमारा भी मसीहा बन कर ,
आस में, उम्र तो क्या ,युग भी गुज़र जाते हैं।
अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग ( नज़्म )
अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग ,आईने से यूँ परेशान हैं लोग।
बोलने का जो मैं करता हूँ गुनाह ,
तो सज़ा दे के पशेमान हैं लोग।
जिन से मिलने की तमन्ना थी उन्हें ,
उन को ही देख के हैरान हैं लोग।
अपनी ही जान के वो खुद हैं दुश्मन ,
मैं जिधर देखूं मेरी जान हैं लोग।
आदमीयत को भुलाये बैठे ,
बदले अपने सभी ईमान हैं लोग।
शान ओ शौकत है वो उनकी झूठी ,
बन गए शहर की जो जान हैं लोग।
मुझको मरने भी नहीं देते हैं ,
किस कदर मुझ पे दयावान है लोग।
बड़े लोग ( नज़्म )
बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं ,कहते हैं कुछ ,
समझ आता है और ,
आ मत जाना ,
इनकी बातों में ,
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।
इन्हें पहचान लो ,
ठीक से आज ,
कल तुम्हें ये ,
नहीं पहचानेंगे,
किधर जाएं ये ,
खबर क्या है ,
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।
दुश्मनी से ,
बुरी दोस्ती इनकी ,
आ गए हैं ,
तो खुदा खैर करे,
ये वो हैं जो ,
क़त्ल करने के बाद ,
कब्र पे आ के रोते होते हैं।
दीप जलता ही रहा ( गीत )
आंधियां चलती रहीं ,दीप जलता ही रहा।
ज़िंदगी के फासले कम कभी हो न सके
दर्द तो मिलते रहे हम मगर रो न सके
ग़म से पैमाना भरा जब न खाली हो सका
वो समंदर बन गया बस उछलता ही रहा।
आंधियां चलती ........................
पूछते सब से रहे आपका हम तो पता
है हमारा ख्वाब कोई तो देता ये बता
छोड़ कर हम कारवां आ गए खुद ही यहां
इक सफ़र था ज़िंदगी जो कि चलता ही रहा।
आंधियां चलती ...........................
जब किसी ने साथ छोड़ा ,नहीं कुछ भी कहा
शुक्रिया आपका आपने जो भी दिया
जब भी वो देता रहा जाम भर भर के हमें
जाम हाथों से मेरे बस फिसलता ही रहा।
आंधियां चलती ............................
पास हमको लोग सारे बुलाते तो रहे
और हम रस्मे वफा कुछ निभाते तो रहे
दिल हमारा तोड़ डाला किसी ने जब भी
आंसुओं का एक सागर निकलता ही रहा।
आंधियां चलती रहीं ,दीप जलता ही रहा।
( मेरे दोस्त जवाहर लाल ठक्क्र जी ने मिसरा दिया था गीत का। )
गीत प्यार का गुनगुनाऊं ( गीत )
गीत प्यार का गुनगुनाऊं कैसे।लोग पूछते हैं तुम्हारी बातें
याद कौन रखता हमारी बातें
आसमां पे तुमने बसाया है घर
मैं तुम्हें ज़मीं पर बुलाऊं कैसे।
गीत प्यार का ......................
खुद से खुद को जब दूर करना चाहा
और ग़म से घबरा के मरना चाहा
मौत ने मुझे किस तरह ठुकराया
आज वो कहानी सुनाऊं कैसे।
गीत प्यार का ........................
छोड़ कर मुझे लोग धीरे धीरे
चल दिए कहीं और धीरे धीरे
साथ साथ चलने के वादे भूले
रूठ कर चले जब मनाऊं कैसे।
गीत प्यार का .....................
कब वफ़ा निभाई यहां दुनिया ने
हर रस्म उठाई यहां दुनिया ने
जिस्म भी हुआ और दिल भी घायल
ज़ख्म आज सारे दिखाऊं कैसे।
गीत प्यार का गुनगुनाऊं कैसे।
बिके हैं सरे-बाजार ( नज़्म )
जो भूला लोकतंत्र आचार ,हुई सत्ता की जय जयकार।
चुना था जिनको हमने ,वही ,
बिके हैं आज सरे-बाज़ार।
लुटा कर सब कुछ भी अपना ,
बचा ली है उसने सरकार।
टांक तो रक्खे हैं लेबल ,
मूल्य सारे ही गए हैं हार।
देखिए उनकी कटु-मुस्कान ,
नहीं लगते अच्छे आसार।
आदमी बेज़ुबान लगते हैं ( नज़्म )
कहने को तो बयान लगते हैं ,खाली लेकिन म्यान लगते हैं।
वोट जिनको समझ रहे हैं आप ,
आदमी बेजुबान लगते हैं।
हैं वो लाशें निगाह बानों की ,
आपको पायदान लगते हैं।
ख़ुदकुशी करके जो शहीद हुए ,
देश के वो किसान लगते हैं।
लोग आजिज़ हैं इस कदर लेकिन ,
बेखबर साहिबान लगते हैं।
बात शर्मो-हया की है ( नज़्म )
बेदिली से दुआ की है ,
तुमने भारी खता की है।
मारकर यूं ज़मीर अपना ,
खुद से तुमने जफ़ा की है।
बढ़ गया है मरज़ कुछ और ,
ये भी कैसी दवा की है।
तुम सज़ा दो गुनाहों की ,
हमने ये इल्तिज़ा की है।
बिक गये चन्द सिक्कों में ,
बात शर्मो-हया की है।
मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे ( नज़्म )
मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे ,मौत दे मुझको मगर ऐसी सज़ा न दे।
उम्र भर चलता रहा हूं शोलों पे मैं ,
न बुझा इनको ,मगर अब तू हवा न दे।
जो सरे आम बिके नीलाम हो कभी ,
सोने चांदी से तुले ऐसी वफ़ा न दे।
आ न पाऊंगा यूं तो तिरे करीब मैं ,
मुझको तूं इतनी बुलंदी से सदा न दे।
दामन अपना तू कांटों से बचा के चल ,
और फूलों को कोई शिकवा गिला न दे।
किस तरह तुझ को सुनाऊं दास्ताने ग़म ,
डरता हूं मैं ये कहीं तुझको रुला न दे।
ज़िंदगी हमसे रहेगी तब तलक खफा ,
जब तलक मौत हमें आकर सुला न दे।
मिरा दिल वो बातें भुलाने लगा है ( नज़्म )
मिरा दिल वो बातें भुलाने लगा है ,सुकूं सा मुझे अब तो आने लगा है।
कोई फूल तन्हा ज़रा देर खिलकर ,
बहारों में मुरझाया जाने लगा है।
उसे भूल जाऊं ये कसमें दिलाकर ,
गया ,जो वो फिर याद आने लगा है।
ख्यालों में ,ख़्वाबों में रह-रह के हमको ,
तुम्हारा तस्व्वुर सताने लगा है।
कभी हमने-तुमने जो गाया था मिलकर ,
वही गीत दिल गुनगुनाने लगा है।
हादिसे दिल पे आते रहे ( नज़्म )
हादिसे दिल पे आते रहे ,दास्तां हम सुनाते रहे।
बेगुनाही भी थी इक खता ,
हम सज़ा जिसकी पाते रहे।
मौत हमसे रही दूर ही ,
लाख हम ज़हर खाते रहे।
हमने सपने संजोए थे जो ,
ज़िंदगी भर रुलाते रहे।
तंग आकर करूं ख़ुदकुशी ,
लोग इतना सताते रहे।
दिल बहल जाये ,कुछ ,इसलिये ,
शायरी में लगाते रहे।
मरने से डर रहे हो ( नज़्म )
मरने से डर रहे हो ,क्यों रोज़ मर रहे हो।
अपने ही हाथों क्यों तुम ,
काट अपना सर रहे हो।
क्यों कैद में किसी की ,
खुद को ही धर रहे हो।
किस बहरे शहर से तुम ,
फ़रियाद कर रहे हो।
कातिल से ले के खुद ही ,
विषपान कर रहे हो।
पत्थर के आगे दिल क्यों ,
लेकर गुज़र रहे हो।
गर्दिश में मुझे यूं छोड़ के जाने वाले ( नज़्म )
गर्दिश में मुझे यूं छोड़ के जाने वालेले ,छोड़ गए तुझको भी ज़माने वाले।
मुझको भी आया अब तो आंसू पीना ,
तेरा अहसां है मुझको रुलाने वाले।
होने वाले वो कब हैं किसी के यारो ,
बाज़ार मुहब्बत का ये सजाने वाले।
हो कर बेज़ार ये आखिर क्यों रोते हैं ,
खुद कर के सितम यूं हमको सताने वाले।
यूं तो रह जाते न हम सब "तनहा"
जो न रूठे होते वो हमको मनाने वाले।
ज़ुल्म भी हंस के खुद ही सहते हैं ( नज़्म )
ज़ुल्म भी हंस के खुद ही सहते हैं ,आप कैसे जहां में रहते हैं।
कत्ल करते हैं वो जिसे चाहा ,
इसको जम्हूरियत वो कहते हैं।
प्यार की बात आप करते हैं ,
अश्क अपने तभी तो बहते हैं।
ख़्वाब मेरे हैं टूटते ऐसे ,
रेत के ज्यों घरोंदे ढहते हैं।
हम नहीं अब तलक समझ पाए ,
दुश्मनों को ही दोस्त कहते हैं।
बस यही कारोबार करते हैं ( नज़्म )
बस यही कारोबार करते हैं ,हमसे इतना वो प्यार करते हैं।
कर न पाया जो कोई दुश्मन भी ,
वो सितम हम पे यार करते हैं।
नज़र आते हैं और भी नादां ,
वो कुछ इस तरह वार करते हैं।
खुद ही कातिल को हम बुला आये ,
यही हम बार बार करते हैं।
इस ज़माने में कौन है अपना ,
बस यूं ही इंतज़ार करते हैं।
इश्क़ का हो इज़हार , बहुत मुश्किल है ( नज़्म )
इश्क का हो इज़हार ,बहुत मुश्किल है ,दुहरी इस की धार ,बहुत मुश्किल है।
जीत न पाया दिल के खेल में कोई ,
जीत के भी है हार ,बहुत मुश्किल है।
हो न अगर दीदार तो घबराये दिल ,
होने पर दीदार बहुत मुश्किल है।
इस को खेल न तुम बच्चों का जानो ,
दुनिया वालो प्यार बहुत मुश्किल है।
इश्क का दुश्मन है ये ज़माना लेकिन ,
कोई नहीं है यार ,बहुत मुश्किल है।
तूने किसी का दिल तोड़ा है बेदर्दी ,
टुकड़े हुए हैं हज़ार ,बहुत मुश्किल है।
प्यार तो अफसाना है एक नज़र का ,
होता है एक ही बार ,बहुत मुश्किल है।
देर से आने की है उनकी आदत ,
हम हैं इधर बेज़ार ,बहुत मुश्किल है।
कहते हैं वो तुम बिन मर जाएंगे ,
जां देना ,सरकार ,बहुत मुश्किल है।
तुम मिरे ग़म में शामिल नहीं हो ( नज़्म )
तुम मिरे ग़म में शामिल नहीं हो ,इक तुम्हीं मुझ को हासिल नहीं हो।
जान कुर्बान की जिस ने तुम पर ,
कैसे तुम उसके कातिल नहीं हो।
जो कहे आईना ,मान लेंगे ,
तुम मुहब्बत के काबिल नहीं हो।
जान पाओगे तुम खुद को क्योंकर ,
खुद ही अपने मुक़ाबिल नहीं हो।
दिल पे गुज़रती है जो बेरुखी से ,
उस से तुम भी तो गाफ़िल नहीं हो।
बेमुरव्वत हो ऊपर से लेकिन ,
सच कहो साहिबे-दिल नहीं हो।
तुम ज़रा अपने दिल से ये पूछो ,
मेरी कश्ती के साहिल नहीं हो।
देख कर तुमको ये सोचता हूं ,
क्या तुम्ही मेरी मंज़िल नहीं हो।
हवाओं को महका दो ( नज़्म )
हवाओं को महका दो ,फज़ाओं को बतला दो।
बरसती रहें शब भर ,
घटाओं को समझा दो।
उठा कर के घूंघट को ,
ज़रा सा तो सरका दो।
तुम्हें देखता रहता ,
ये दर्पण भी हटवा दो।
खुली छोड़ कर जुल्फें ,
हमें आज बहका दो।
हमें तुम कभी "तनहा" ,
किसी से तो मिलवा दो।
हक़ तो जीने का नहीं है कोई ( नज़्म )
हक़ तो जीने का नहीं है कोई ,फिर भी जीता ही कहीं है कोई।
आह भरना भी जहां होता गुनाह ,
रोया जा-के वहीं है कोई।
मौत की मिलके दुआएं मांगें ,
अब इलाज इसका नहीं है कोई।
आएगा वो मेरी मैयत पे ज़रूर ,
कब कहीं आता युं हीं है कोई।
किसको ढूंढे है नज़र , सहरा में ,
मिलता कब "तनहा" कहीं है कोई।
कागज़ के फूल सजाने के ( नज़्म )
कागज़ के फूल सजाने के ,अंदाज़ न सीखे ज़माने के।
आये वो ,रस्म निभा के चले ,
अरमान जिन्हें थे बुलाने के।
बेबात ही हम से हैं वो खफा ,
उन के हैं ढंग सताने के।
मसरूफ थे या वादा भूले ,
अच्छे हैं बहाने , न आने के।
पत्थर दिल के ये आज सभी ,
बन बैठे खुदा बुतखाने के।
ग़म हमारे कोई भुला जाये ( नज़्म )
ग़म हमारे कोई भुला जाये ,मुस्कुराना हमें सिखा जाये।
कोई अपना हमें बना जाये ,
दिल हमारा किसी पे आ जाये।
ज़िंदगी खुद ही एक दिन चल कर ,
ग़म के मारों से मिलने आ जाये।
मुस्कुराते हैं फूल कांटों में ,
राज़ इसका कोई बता जाये।
रह के दिन भर मेरे ख्यालों में ,
रात सपनों में कोई आ जाये।
ख्यालों में रह रह के आये जाये कोई ( नज़्म )
ख्यालों में रह रह के आये जाये कोई ,तसव्वुर में आ आ के मुस्काये कोई।
सराहूं मैं किस्मत को ,जो पास मेरे ,
कभी खुद से घबरा के आ जाये कोई।
वो भूली सी , बिसरी हुई सी कहानी ,
हमें याद आये , जो दोहराये कोई।
ठहर जाए जैसे समां खुशनुमां सा ,
मेरे पास आ कर ठहर जाये कोई।
किसी गुलसितां में खिलें फूल जैसे ,
खबर हमको ऐसी सुना जाये कोई।
सब पराये हैं ज़िंदगी ( नज़्म )
देख आये हैं ज़िंदगी ,सब पराये हैं ज़िंदगी ।
किसी ने पुकारा नहीं ,
बिन बुलाये हैं ज़िंदगी ।
खिज़ा के मौसम में हम ,
फूल लाये हैं ज़िंदगी ।
अपने क्या बेगाने तक ,
आज़माये हैं ज़िंदगी ।
दर्द वाले नग्में हमने ,
गुनगुनाये हैं ज़िंदगी।
आंखें ( नज़्म )
बादलों सी बरसती हैं आंखें ,बेसबब छलकती हैं आंखें।
गांव का घर छूट गया जो ,
देखने को तरसती हैं आंखें।
जुबां से नहीं जब कहा जाता ,
बात तब भी करती हैं आंखें।
मौसम पहाड़ों का होता जैसे ,
ऐसे कभी बदलती हैं आंखें।
नज़र के सामने आ जाये जब ,
बिन काजल संवरती हैं आंखें।
गज़ब ढाती हैं हम पर जब ,
और भी तब चमकती हैं आंखें।

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