शिक्षा- नीति का सुधार जारी है ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया
ये सारा हंगामा व्यर्थ है शिक्षा मंत्रालय की आवश्यकता नहीं रही है जो पढ़ाई संविधान लोकतंत्र मौलिक अधिकार समानता इत्यादि को आधार बनाकर चलती रही थी उस से देश का कभी कल्याण नहीं होने वाला था। लोग नासमझ हैं नादान हैं उनको खबर तक नहीं हुई कब कैसे हमने शासन की बागडोर संभालते ही तर्कसंगत वैज्ञानिक पढ़ाई को कहीं गहराई में दफ़्न कर इक ऐसी शिक्षा प्रणाली की शुरुआत की है जिस में अधिकार या विरोध नहीं सत्ता से याचना या खैरात हासिल करने को उपलब्धि समझा जाता है। कभी सोचा है जितने भी लोग पहले शिक्षा हासिल कर सरकारी नौकरियां पाकर ऊंचे ऊंचे पदों पर पहुंचे हैं उन्होंने प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी से अदालत के न्यायधीश बन कर भी कुछ भी बदलाव व्यवस्था में नहीं किया बल्कि उसको और गंदा बनाकर खुद को महान घोषित किया है। सत्ता की मनमानी का समर्थन कर सही गलत की बात को दरकिनार कर खुद की खातिर कितना हासिल किया है । ऐसी शिक्षा जो आदमी को आदमी नहीं इक ख़ुदगर्ज़ विवेकहीन अधिकारी बनाती हो जिस में जनता का कल्याण कभी संभव ही नहीं हो उसको त्याग कर ऐसी व्यवस्था बनाने का प्रयास है जिस में लोगों को घना अंधकार भी ऐसा दिखाई दे जैसे सुनहरी किरणे नज़र आ रही हैं । जब पढ़ लिख कर लोग शिक्षा और स्वास्थ्य का ही नहीं तमाम उच्च शिक्षा का कारोबार व्यौपार करते हैं और पढ़ने वाले को समझदार चिंतनशील नहीं मतलबी और सिर्फ पैसे बनाने की मशीन बनाते हैं तब ऐसी पढ़ाई से देश समाज में बदलाव कभी नहीं हो सकता है । वो पुरानी शिक्षा व्यवस्था सड़ी गली लाईलाज रोग से ग्रस्त हो गई थी इसलिए उसका ख़ात्मा करना ही विकल्प बचा था । आपको बताते हैं जो शिक्षा हमने शुरू की है उसकी परिकल्पना और उद्देश्य क्या हैं और उस से आपको क्या हासिल हुआ है होने वाला है ।
हमने सरकार ने जैसा कि कहावत है पढ़ाते हैं सब को उलटी पढ़ाई का अर्थ जानते हुए उलटी पढ़ाई की शुरुआत की है । आपको सोशल मीडिया से मनगढ़ंत जानकारी हासिल कर दुनिया के सामने खुद अपना गुणगान करना सीखना चाहिए । यहां अवसर ही अवसर हैं आप सरकार की चाटुकारिता कर अनुकंपा से कितना कुछ हासिल करने के पात्र बन सकते हैं , पिछले कुछ सालों से सभी जगह सरकारी भर्तियों में यही मापदंड योग्यता का मानकर नियुक्तियां की जाती रही हैं । सत्तधारी दल के संचालक संगठन का सदस्य होना सबसे बड़ी योग्यता समझा जाता है । स्कूल कॉलेज की किताबी पढ़ाई से अधिकांश लोगों को कुछ भी हासिल नहीं होता है जबकि हमारी विचारधारा की धर्म और नफरत का प्रचार प्रसार करने की कला सीख कर आपको आसानी से मनचाहा वरदान मिल जाता है । टीवी चैनलों ने यही सबक सीखा है और मालामाल होते गए हैं , देश सेवा सामाजिक सरोकार की खोखली बातों से कभी किसी का पेट नहीं भरा है , सच जनहित की बात लिखने बोलने वाले या तो भूखे रहते हैं या फिर कभी झूठे आरोपों का सामना करने में असफ़ल हो जेल पुलिस थाने में कैदी बने फिरते हैं । आज़ादी से पहले की बात अलग थी अंग्रेजी शासन पर असर पड़ता था लेकिन आज की शासकीय प्रणाली किसी नियम कायदे किसी आदर्श नैतिकता की कायल नहीं है , मैं चाहे जो करूं मेरी मर्ज़ी ही उनका वास्तविक चरित्र है । जब नाचन लागी तो घूंघट काहे को समझते हुए लोकलाज को ताक पर रख दिया गया है । प्रधानमंत्री जी आपको रील बनाने से पकोड़े तलने की सलाह देते हैं जिस में किताबी शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं होती है ।
लेकिन फिर भी आपको कभी कभी शिक्षित होने का सर्टिफिकेट ज़रूरत पड़ती है और आप मोदी जी की तरह डिग्री दिखाने से इनकार नहीं कर सकते हैं । अनपढ़ हैं राजनीति गुंडागर्दी कर सकते हैं मगर जीवनसाथी चाहिए तो शिक्षित होने का प्रमाण ज़रूरी हो जाता है । लड़का या लड़की जो भी हो जीवनसाथी पढ़ा लिखा समझदार चाहता है सिर्फ झूठी बातें इधर उधर की बोलने से बात नहीं बनती है । लेकिन घबराने की आवश्यकता नहीं है आपको नकली डिग्रियां आसानी से मिल जाती हैं जिस पर सरकार कभी कोई रोक नहीं लगाती है सच तो ये है कि मालूम नहीं कितने लोग झूठी नकली डिग्रियां उपयोग कर कितने बड़े पदों पर कार्यरत हैं । नकली खाद्य पदार्थ से नकली समाज सेवा करने का धंधा भी आपको सब सुख सुविधाएं ही नहीं नाम शोहरत तक दिलवा सकता है । असली की आजकल कोई कीमत ही नहीं है नकली पर असली का लेबल लगा कर बेचने में सरकारी विभाग हमेशा सहयोग करते हैं । कुछ भी उनकी अनुमति बिना नहीं हो सकता है उनको सबकी खबर रहती है आपको तालमेल बिठाना आना चाहिए ।
सरकार ने स्कूल कॉलेज भले नहीं बनाये हों सैर सपाटे तमाशे रोज़ करती रहती है ताकि आपको समय बिताने को मनोरंजन की कोई कमी नहीं महसूस हो , लेकिन आपको पैसा चाहिए तो फिर आपको सरकारी योजनाओं से लेकर कितनी तरह से जारी लूट खसूट में शामिल होना चाहिए । आपने देखा ही है भगवान का मंदिर भी चोरी डकैती का स्थान बन सकता है , जहां चाह , वहां राह इसी को कहते हैं । अभी तो सिर्फ झांकी है आगे कितना कुछ बाकी है किसी भी विभाग मंत्रालय की कोई ज़रूरत ही नहीं है ये सभी दिखावे को हाथी के दांत जैसे हैं सरकार और शासन तंत्र के असली दांत खाने वाले हैं जो सिर्फ बजट ही नहीं खाते बल्कि जनता को काटने कच्चा चबाने को तैयार हैं । आओ आपको इक सबक सिखाते है कुछ पढ़ना लिखना समझाते हैं इक हास्य कविता से आपको आधुनिक चौपाइयां लिखना समझाते हैं।
वतन के घोटालों पर इक चौपाई लिखो ( हास्य-व्यंग्य कविता )
डॉ लोक सेतिया
वतन के घोटालों पर इक चौपाई लिखोआए पढ़ाने तुमको नई पढ़ाई लिखो ।
जो सुनी नहीं कभी हो , वही सुनाई लिखो
कहानी पुरानी मगर , नई बनाई लिखो ।
क़त्ल शराफ़त का हुआ , लिखो बधाई लिखो
निकले जब कभी अर्थी , उसे विदाई लिखो ।
सच लिखे जब भी कोई , कलम घिसाई लिखो
मोल विरोध करने का , बस दो पाई लिखो ।
बदलो शब्द रिश्वत का , बढ़ी कमाई लिखो
पाक करेगा दुश्मनी , उसको भाई लिखो ।
देखो गंदगी फैली , उसे सफाई लिखो
नहीं लगी दहलीज पर , कोई काई लिखो ।
पकड़ लो पांव उसी के , यही भलाई लिखो
जिसे बनाया था खुदा , नहीं कसाई लिखो ।

1 टिप्पणी:
बहुत धारदार आलेख है 👌👍👌👍
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