Tuesday, 12 May 2020

सिक्कों के बाज़ार में इंसान का मोल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 सिक्कों के बाज़ार में इंसान का मोल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    कुछ समझ नहीं आता कहां से शुरू करूं , किसी समय मुझे मेरे पिता जी ने भी पैसे की कीमत इसी तरह समझाई थी। तब सौ रूपये की कीमत बहुत होती थी मुझे कहा था जेब में सौ रूपये हों तो बोतल का नशा होता है। मगर मैं परले दर्जे का मूर्ख पिता जी का समझाया पाठ कभी नहीं सीखा। तभी न मेरी जेब में कभी पैसा रहा और न कभी शराब का नशा क्या होता है मुझे पता चला। देखा है कई लोगों को पैसा आया तो शराब भी पीना भी सीख लिया और लगता है कि उनकी पत्नी भी सोने चांदी की झंकार से शराबी पति को भी बहुत आदर देती हैं भले शराब पीकर वो क्या से क्या हो जाता है। खैर बात आज की है शाम या रात आठ बजे टीवी पर मोदी जी बार बार समझा रहे थे। बीस लाख करोड़ करीब करीब जीडीपी का कितना हिस्सा होता है , साल 2020 में बीस लाख करोड़ किस बजट का कितना भाग होता है। सच बीस लाख करोड़ शब्द कहते हुए उनके चेहरे पर चमक दिखाई देती थी। उनके आने से जो आ जाती है चेहरे पर रौनक वो समझते हैं बीमार का हाल अच्छा है। तो हमारे चारागर को ईलाज समझ आ गया था कोरोना कोरोना का रोना छोड़ ये हिसाब लगाओ बीस लाख करोड़ में कितने ज़ीरो लगते हैं और 130 करोड़ के हिस्से में कितना पैसा आएगा। नहीं कोई जुमला नहीं ये सच है आपके बैंक खाते में नहीं मगर आपके ही नाम पर इनकी बंदरबांट होगी। 

कहते हैं हर बात का कहने का सही वक़्त होता है मुझे तो ये जले कटे पर नमक छिड़कना लगा शायद किसी को पसंद आई हो ये बात। जाने कितनी फिल्मों के डायलॉग याद आने लगे , सबसे मशहूर डायलॉग कितनी फिल्मों में अमीर बाप गरीब लड़के को खाली चेक देकर कहता इस में जितनी चाहे कीमत भर लो अपनी मगर मेरी बेटी को छोड़ दो। दामिनी फिल्म में एडवोकेट चड्ढा बताता है उसका मुवकिल पांच लाख दे रहा है इक लड़की की कीमत इतनी कम नहीं है। नायक कहता है इसे भड़वागिरी कहते है कानून की दलाली से इज़्ज़त की नीलामी तक पहुंच गए। खैर पैसा बोलता है तो अंदाज़ यही होता है अमेरिका पाकिस्तान को ही नहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन तक को हड़काता है सहायता देने को बंद करने की धमकी या कारनामा। ये कोई ताकत नहीं कमज़ोरी होती है। राज्य सभा की सीट कहते हैं कीमत देनी पड़ती है अमीरों की बात है। हम लोग कभी अपनी जान की कीमत नहीं लगवाते हैं और सरकार भी आम आदमी की जान की कोई कीमत नहीं समझती है। जाने किस फिल्म की बात है नायक खलनायक का पैसों से भरा बैग खोलकर नोटों की बारिश कर देता है और उस खलनायक के सभी साथी नोट झपटने में लग जाते हैं। 

राजनीति का सच यही है सभी किसी न किसी दाम पर बिकने को तैयार हैं। टीवी चैनल मीडिया वाले तो शर्मसार भी नहीं होते ज़मीर बेचने को कोई अच्छा सा नाम दे देते हैं। सभी जानते हैं पैसा सबसे अधिक वैश्या के पास होता है ये भी सच है कि राजनीती और वैश्यावृति इक जैसे धंधे बताये गए हैं। कितनी फिल्मों में यही देखा भी है मगर मुझे पाकीज़ा फिल्म की मीनाकुमारी की बात अलग लगती है। जिसने उसको पाला पोसा जब पता चलता है रईस नवाब साहब अपनी बेटी को छीनने आने वाले हैं तो लखनऊ चली जाती है उसे लेकर। मगर उसे जन्म देने वाली मां भी मीनाकुमारी का ही निभाया किरदार है जो जीते जी खुद कब्रिस्तान चली जाती है। लखनऊ में जाकर शानदार बंगला गुलाबी महल खरीद कर मीना कुमारी की परवरिश करने वाली बाई बड़े धनवानों के सामने उसका मुजरा नाचना गाना करवाती है , साहिब जान लखनऊ की शान बन जाती है। 

   मोदी जी के बाद टीवी पर बारी थी नितिन गडकरी जी टीवी पर साक्षात्कार दे रहे थे , यकीन मानिये कोई दर्द का चिंता का भाव नहीं दिखाई दिया। क्या मुस्कान है जान कुर्बान करने के काबिल। शायर का कहना याद आया , क्या बात है कि अमीरों के घर मौत का दिन भी लगता है त्यौहार सा। मगर ये कोई बड़े छोटे लोगों की मौत का मातम नहीं है मातम होना चाहिए था कोरोना का और आपने कोरोना से हार मान ली उसे साथ लेकर जीना मरना है। सुना था कफ़न में जेब नहीं होती और सिकंदर भी जब दुनिया से गया दोनों हाथ खाली थे। ये किस अवसर की बात करने लगे आप हद है। मुझे आज भी याद है इक दोस्त जो मेरी तरह डॉक्टर भी है और लेखन भी करते हैं मुझे फोन पर अपनी पहचान इस तरह से बता रहे थे , मेरे नर्सिंग होम में कितने बिस्तर हैं एक्स - रे भी तीन है और जाने क्या क्या। मगर मुझे उनकी किताब मैगज़ीन बिकवानी नहीं आती थी ये साफ मना किया तो बुरा मान गए। नहीं मुझे नहीं आता किसी से भी चंदा मांगना ये आदत है इसी पर तकरार करने लगे। मेरी हैसियत जो भी है खैरात नहीं चाहिए किसी भी नाम से। मैंने बहुत ऐसे गरीब लोग देखे हैं जिनके पास पैसे के सिवा कुछ भी नहीं। मगर मेरा पागलपन देखिये मैंने अपनी नयी ग़ज़ल उन्हीं की बात पर कहकर उन्हीं को भेजी भी थी। ग़ज़ल कहते हैं समझ गए होंगे। ग़ज़ल ये है :-

 

कैसे कैसे नसीब देखे हैं  ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कैसे कैसे नसीब देखे हैं ,
पैसे वाले गरीब देखे हैं।

हैं फ़िदा खुद ही अपनी सूरत पर ,
हम ने चेहरे अजीब देखे हैं।

दोस्तों की न बात कुछ पूछो ,
दोस्त अक्सर रकीब देखे हैं।

जिंदगी को तलाशने वाले ,
मौत ही के करीब देखे हैं।

तोलते लोग जिनको दौलत से ,
ऐसे भी कम-नसीब देखे हैं।

राह दुनिया को जो दिखाते हैं ,
हम ने विरले अदीब देखे हैं।

खुद जलाते रहे जो घर तनहा ,
ऐसे कुछ बदनसीब देखे हैं। 

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