Thursday, 7 March 2013

खामोशी का आलम ( कविता ) 8 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कुछ भी नहीं है पास ,
पाना चाहता भी नहीं ,
अब कुछ भी ,
नहीं है अपना ,
दुनिया भर में कोई ,
अकेला भी नहीं हूं मैं ,
खोने का नहीं ग़म भी बाकी ,
पाने की तम्मना अब नहीं है ,
न चाहत है जीने की मुझको ,
नहीं मांगनी दुआ भी मौत की ,
कोई शिकवा गिला नहीं लेकिन ,
किसी से नहीं अपनापन कोई ,
अकेला हूं न महफ़िल है ,
न राह कोई न कोई भी मंज़िल है ,
नहीं भूला मुझे कुछ भी ,
नहीं याद अपनी कहानी भी मुझको ,
कहीं कोई नहीं है अपना खुदा ,
नहीं रहता मैं दुनिया में भी ,
किसी से प्यार नहीं दिल में ,
नहीं मन में नफरत का निशां ,
सभी एहसास मर चुके जब ,
समाप्त हर संवेदना हुई जैसे ,
खामोशी का है आलम ,
नहीं कुछ भी अब मुझे कहना है ,
मत पूछना कोई कुछ मुझसे ,
कहूं क्या ,
बचा क्या है कहने को ! !

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