अक्टूबर 28, 2022

POST : 1603 खैरात ने रुसवा किया ( जज़्बात ) डॉ लोक सेतिया

       खैरात ने रुसवा किया ( जज़्बात ) डॉ लोक सेतिया 

किसी और जहां की तलाश है हमको , इस जहान की चाहत नहीं रखते । गांव की गलियां बड़ी भाती हैं हम शहर में रहने की ख़्वाहिश नहीं करते । अपनी मुफ़लिसी की कभी शिकायत नहीं रही हम ज़माने की तरह रास्ते में हमसफ़र नहीं बदलते । हमको तमाशा पसंद नहीं है मंज़ूर उनको भी मखमल में टाट का पैबंद नहीं है । हमने हक़ भी मांगे नहीं फरियाद कर के खुश थे दुनिया सबकी आबाद कर के । बड़े बड़े शहरों की ऊंची ऊंची इमारतें किसी मुसाफिर को ठहरने को जगह नहीं देती हैं सर्द हवाओं में तपती लू और बारिश में पल भर को भी सायबान का साया नहीं देती हैं । कुछ भी किसी का अपना नहीं है सब कड़वा सच है कोई खूबसूरत सपना नहीं है । बच कर निकलने की कोई सूरत नहीं दिखाई देती है नर्क कितने हैं बस इक जन्नत नहीं दिखाई देती है ऊंचे मीनार हैं गहराई नहीं दिखाई देती है , रुसवा हैं लोग मगर उनको खुद की रुसवाई नहीं दिखाई देती है पहाड़ तनकर खड़े हैं नीचे उनके कितनी गहरी है खाई नहीं दिखाई देती है । अजब सी भूलभुलैया में खो गया हूं मैं कहीं से कोई आवाज़ नहीं देता मुझको , जाना किधर है किधर से था आया इसी उलझन में खड़ा हूं खामोश ग़ुज़रा वक़्त नया आज नहीं देता मुझको । हक़ीक़त को ढक दिया गया है छुपा दिया है घना कोहरा है जिसको शानदार आकाश बताया जाने लगा है । मेरा दिल इस अजनबी भीड़ में घबराने लगा है , मुझको गांव अपना याद आने लगा है । हर शख़्स यही सोच कर पछताने लगा है । तुम फ़कीरी को कहां लेकर आ गए टाट के पैबंद अपनी शान थे मखमली लिबास पहन कर घबरा गए हैं । बहुत कुछ और कहना है ग़ज़ल से काम लिया है । 

हक़ नहीं खैरात देने लगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 
हक़ नहीं खैरात देने लगे
इक नई सौगात देने लगे ।

इश्क़ करना आपको आ गया
अब वही जज़्बात देने लगे ।

रौशनी का नाम देकर हमें
फिर अंधेरी रात देने लगे ।

और भी ज़ालिम यहां पर हुए
आप सबको मात देने लगे ।

बादलों को तरसती रेत को
धूप की बरसात देने लगे ।

तोड़कर कसमें सभी प्यार की
एक झूठी बात देने लगे ।

जानते सब लोग "तनहा" यहां
किलिये ये दात देने लगे ।
 
 गरीब देश गरीब क्यों हैं? कारण और बदलाव की उम्मीद
  

अक्टूबर 24, 2022

POST : 1602 ओ रौशनी वालो ( अंधकार की आवाज़ ) डॉ लोक सेतिया

    ओ रौशनी वालो ( अंधकार की आवाज़ ) 

                                 डॉ लोक सेतिया 

उजाला उस जगह करना चाहिए जिस जगह अंधेरा हो , रौशन सड़कों महलों बाज़ारों को चकाचौंध रौशनी से सजाना बाहरी दिखावा करने से भीतर का अंधकार मिटता नहीं बल्कि और अधिक बढ़ाता ही है । जब काली अंधेरी अमावस की रात को दिये जलाकर अंधेरा मिटाया गया होगा तब उसकी अहमियत रही होगी । आज जब चारों तरफ जगमगाहट है सजावट को दिये जलाना अंतर्मन के अंधकार को कम नहीं करता है । कोई बतला रहा था भगवान राम की इक ऐसी मूर्ति बना रहे हैं जो हर दिशा से एक जैसी नज़र आएगी । कण कण में भगवान दिखाई देने की बात कोई नहीं करता आजकल । राजा राम पत्नी सीता संग बनवास से वापस लौटे थे और अयोध्या वासियों ने स्वागत करने को दीप उत्सव मनाया था , अब शासक तो राजाओं से बढ़कर शाही शान-ओ-शौकत से  चकाचौंध चुंधयाती रौशनी में रहते हैं जनता को बनवास मिला हुआ है जिसका कोई अंत दिखाई नहीं देता उन के जीवन में उजाला कब होगा उस दिन वास्तव रामराज और दीपोत्स्व का त्यौहार मनाया जाना चाहिए । जिस देश की अधिकांश जनता भूख गरीबी शोषण अन्याय अत्याचार और असमानता के वातावरण में रहने को अभिशप्त हो वहां त्यौहार का उल्लास केवल धनवान और सुवधा साधन सम्पन्न वर्ग को हो सकता है वो भी तभी अगर उनको आम इंसानों के दुःख दर्द परेशानियों से कोई सरोकार नहीं हो । ऐसे में शासक वर्ग का देश का खज़ाना आडंबर पर बेतहाशा बेदर्दी से खर्च करना लोकतंत्र और संविधान के ख़िलाफ़ गुनाह ही समझा जाना चाहिए । अधिक विस्तार से कहना व्यर्थ है अपनी पहली कविता दोहराता हूं । मन की बेचैनी अभी भी कायम है ।  

  बेचैनी ( नज़्म )  

पढ़ कर रोज़ खबर कोई
मन फिर हो जाता है उदास।

कब अन्याय का होगा अंत
न्याय की होगी पूरी आस।

कब ये थमेंगी गर्म हवाएं
आएगा जाने कब मधुमास।

कब होंगे सब लोग समान
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास।

चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें
फिर वो न आए हमारे पास।

सरकारों को बदल देखा
हमको न कोई आई रास।

जिसपर भी विश्वास किया
उसने ही तोड़ा है विश्वास।

बन गए चोरों और ठगों के
सत्ता के गलियारे दास।

कैसी आई ये आज़ादी
जनता काट रही बनवास।
 

Awaaz - Hindi poetry | Quotes, Poetry

अक्टूबर 11, 2022

POST : 1601 इक ख़्वाब जो हक़ीक़त नहीं बन सका ( ज़िंदगी की मज़बूरी ) डॉ लोक सेतिया

    इक ख़्वाब जो हक़ीक़त नहीं बन सका ( ज़िंदगी की मज़बूरी ) 

                                  डॉ लोक सेतिया 

कितनी बार यही सपना दिखाई देता है सुबह होते भूल जाता है या नहीं मालूम भुलाना पड़ता है । कभी कभी सोचता हूं शायद हौसला किया होता तो भले कुछ भी हुआ होता दिल में ये मलाल नहीं रहता कि काश । सपना यही आज रात आया कि बचपन में ही मैं सभी रिश्तों नातों की परवाह छोड़ अनचाही कैद से कितने ज़ुल्मों की ऊंची दिवारों से आज़ाद होकर भाग रहा हूं अजनबी राहों पर अनजानी मंज़िल की तरफ । अक्सर लोग बनी बनाई राहों पर चाहे-अनचाहे चलते जाते हैं घबराते हैं अपनी अलग राह बनाकर चलने के जोखिम से और ज़िंदगी भर पछताते हैं काश साहस किया होता ।  मैंने ज़िंदगी को हक़ीक़त में नहीं जिया है ज़िंदा रहा हूं सपनों के सहारे आपको पागलपन लगता है मेरे लिए किसी जन्नत के ख़्वाब जैसा हसीन हमेशा सच होने की उम्मीद ।  दो कविताओं में यही बात कहनी चाही है मैंने ।
 

 सपनों में जीना ( कविता ) 

देखता रहा
जीवन के सपने
जीने के लिये 
शीतल हवाओं के
सपने देखे
तपती झुलसाती लू में ।

फूलों और बहारों के
सपने देखे
कांटों से छलनी था
जब बदन
मुस्कुराता रहा
सपनों में
रुलाती रही ज़िंदगी ।

भूख से तड़पते हुए
सपने देखे
जी भर खाने के
प्यार सम्मान के
सपने देखे
जब मिला
तिरस्कार और ठोकरें ।

महल बनाया सपनों में
जब नहीं रहा बाकी
झोपड़ी का भी निशां 
राम राज्य का देखा सपना
जब आये नज़र
हर तरफ ही रावण ।

आतंक और दहशत में रह के
देखे प्यार इंसानियत
भाई चारे के ख़्वाब
लगा कर पंख उड़ा गगन में
जब नहीं चल पा रहा था
पांव के छालों से ।

भेदभाव की ऊंची दीवारों में
देखे सदभाव समानता के सपने
आशा के सपने
संजोए निराशा में
अमृत समझ पीता रहा विष
मुझे है इंतज़ार बसंत का
समाप्त नहीं हो रहा
पतझड़ का मौसम ।

मुझे समझाने लगे हैं सभी
छोड़ सपने देखा करूं वास्तविकता
सब की तरह कर लूं स्वीकार
जो भी जैसा भी है ये समाज
कहते हैं सब लोग
नहीं बदलेगा कुछ भी
मेरे चाहने से ।

बढ़ता ही रहेगा अंतर ,
बड़े छोटे ,
अमीर गरीब के बीच ,
और बढ़ती जाएंगी ,
दिवारें नफरत की ,
दूभर हो जाएगा जीना भी ,
नहीं बचा सकता कोई भी ,
जब सब क़त्ल ,
कर रहे इंसानियत का ।

मगर मैं नहीं समझना चाहता ,
यथार्थ की सारी ये बातें ,
चाहता हूं देखता रहूं ,
सदा प्यार भरी ,
मधुर कल्पनाओं के सपने ,
क्योंकि यही है मेरे लिये ,
जीने का सहारा और विश्वास ।

सच हुए सपने ( कविता ) 

सपने तो सपने होते हैं
देखते हैं सभी सपने
मैंने भी देखे थे कुछ
प्यार वाले सपने।

कोई अपना हो
हमराज़ भी हो
हमसफ़र भी हो
हमज़ुबां भी हो
चाहे पास हो
चाहे कहीं दूर हो
हो मगर दिल के
बहत ही करीब
जिसको पाकर
संवर जाये मेरा
बिगड़ा हुआ नसीब ।

सब दुनिया वाले
यही कहते थे
किस दुनिया में
रहता हूं मैं अब तक
और किस दुनिया को
ढूंढता फिरता हूं
ऐसी दुनिया जहां
कोई स्वार्थ न हो
कोई बंधन न हो
और हो सच्चा प्यार
अपनापन  भरोसा
अटूट विश्वास इक दूजे पर ।

मगर मेरा विश्वास
मेरा सपना सच किया है
तुमने ऐ दोस्त ऐ हमदम
जी उठा हूं जैसे फिर से
निकल कर जीवन की निराशाओं से
तैर रहा आशाओं के समंदर में ।

तुम्हारा हाथ थाम कर
मिलेगी अब ज़रूर
उस पार मेरी मंज़िल
इक सपनों का होगा
महल वहीं कहीं
जहां होगा अपना हर कोई
मुहब्बत वाला इक घर
जिसकी खिड़की दरवाज़े
दीवारें और छत भी
बने होंगे प्यार से
स्वर्ग सा सुंदर होगा
अपना छोटा सा आशियाना ।
 
 
 रात के इन सपनों का हकीकत में क्या होता है मतलब! – News18 हिंदी
 

सितंबर 27, 2022

POST : 1600 अंधकार की निशानियां हैं , ये चकाचौंध रौशनियां ( इंसानियत के खण्डर ) डॉ लोक सेतिया

अंधकार की निशानियां हैं , ये चकाचौंध रौशनियां  ( इंसानियत के खण्डर )

                                   डॉ लोक सेतिया 

किसी की भावनाओं को आहत नहीं करना चाहता केवल अपनी सोच को व्यक्त करना चाहता हूं । तमाम लोग किसी शहर की रंग बिरंगी रौशनियां देख का आनंद और रोमांच का अनुभव करते हैं । कभी किसी जगह किसी दिन ख़ास अवसर पर सजावट और रौशनी का भव्य आयोजन किया जाता है । मुझे न जाने क्यों ये सब देख कर अलग तरह का एहसास होता है । सोचता हूं इन सब चमक दमक से देश समाज की बदहाली अंधकार क्या छुप गया है या शायद और भी अधिक दिखाई देता है । कुछ लोग बहुत सारा धन साधन कुछ पलों की इक दिखावे की ख़ुशी पर खर्च करते हैं पानी की तरह पैसा बहाते हैं वास्तव में बर्बाद करते हैं जबकि उनके हमारे आस पास गरीबी भूख बेबसी का जीवन जीते हैं करोड़ों लोग । इतना अंतर अमीर और गरीब का कोई विधाता की देन नहीं है बल्कि ये हमारी सामाजिक और सरकारी अमानवीय व्यवस्था के कारण होता रहा है हो रहा है और हम होने देना चाहते हैं । मेरी बात निराशाजनक लग सकती है जबकि निराशाजनक पहलू ये है कि हम अधिकांश से अधिक अथवा आवश्यकता से ज़्यादा पाकर खुद को भाग्यशाली और उन लोगों से बड़ा या बेहतर समझते हैं जिनको दो वक़्त रोटी भी नसीब नहीं है । लेकिन इस के बावजूद हम मानवता की देश दुनिया के कल्याण की बातें करते हैं और खुद को सभ्य मानते हैं । ये अजीब मंज़र है कोई नंगे बदन है भूख से बिलखता है जीने की बुनियादी सुविधाओं से वंचित है तो कुछ हैं जिनकी चाहतें हसरतें ख़्वाहिशें बढ़ती जाती हैं ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेती । धर्म की बात करें तो हर धर्म बताता है वास्तविक धर्म दीन दुःखियों की सहायता करना है संचय करना और व्यर्थ के आडंबर पर बर्बाद करना धर्म नहीं होता है , सबसे महत्वपूर्ण बात जिन के पास सब कुछ है लेकिन तब भी उनको और अधिक हासिल करने की चाहत है वो सबसे दरिद्र लोग होते हैं । 
 
पुरानी ऐतहासिक इमारतों को देखने लोग आते हैं और आचम्भित होते हैं शासकों के शानदार ठाठ बाठ और शाही तौर तरीके की निशानियां देख कर । मुझे वहां जाना अच्छा नहीं लगता है जाना होता है कभी किसी कारण तो देख कर सोचता हूं उन राजाओं ने शासकों ने इतना पैसा केवल अपनी विलासिता पर खर्च किया तो कितने आम नागरिक से कर वसूल कर और क्या उसी से देश राज्य समाज को ख़ुशहाल नहीं बनाया जा सकता था । ऐतहासिक स्थलों पर ये रईसी देख कर , और हाथी घोड़े पालकी की सवारी का लुत्फ़ उठाकर क्या समझते हैं कि हम शहंशाहों की तरह है जबकि वास्तव में हमको आधुनिक लोकतंत्र में सोचना कुछ और चाहिए वो ये कि ऐसा करना देश समाज राज्य के साथ अनुचित आचरण करना था और है । अन्यथा किताबों में ग्रंथों में नीति निर्धारक कथाओं में राजा को जनता का पालक और रक्षक नहीं बताया गया होता । जिन कार्यों का हमको विरोध करना चाहिए उन्हीं का गुणगान करते हैं इसी से समझ आता है कि हमको गुलामी दास्ता और आज़ादी का अंतर नहीं मालूम या उनके अर्थ नहीं समझते हैं । कितना अजीब विरोधाभास है हम महानगरीय जीवन जीना चाहते हैं शानदार बड़े बड़े राजमार्ग पर तेज़ गति से वाहन चलाना चाहते हैं लेकिन खण्डर जंगल को देखना चाहते हैं खेल तमाशा समझ कर । हमको जो बताया जाता है वो किसी सत्ताधारी द्वारा लिखवाया इतिहास का एक पक्ष है और उसका वास्तविक पहलू शायद कभी सामने नहीं आता है । उसको समझना ज़रूरी है इन सब बातों पर चिंतन विमर्श कर खुले दिमाग से । लेकिन हम नहीं करते ऐसा कभी भी क्योंकि ये हमें चिंतित और परेशान उदास कर सकते हैं जबकि हम ख़ुशी और आनंद की तलाश करते हैं चिंताओं से भागते हैं चिंतन से घबराते हैं । 
 
मृगतृष्णा की बात होती है , मुझे लगता है हमारा समाज और लोग उसी का शिकार हैं । चमकती हुई रेत को पानी समझ कर दौड़ रहे हैं उम्र भर भागते रहते हैं और आखिर प्यासे ही मर जाते हैं । कहीं ये किसी का अभिशाप तो नहीं जो हम सोचते हैं कोई वरदान मिला है । लिखने को बहुत है समझने को इतना काफी है। 
 

 

सितंबर 13, 2022

POST : 1599 हर ख़ुशी हमारे लिए ( राज़ की बात नहीं ) डॉ लोक सेतिया

     हर ख़ुशी हमारे लिए ( राज़ की बात नहीं ) डॉ लोक सेतिया  

राज़ की बात नहीं थी खुद हम ही नादान और नासमझ थे जो इतनी सी बात समझने में सालों लग गए कि जिनको हमारी ख़ुशी हमारी पसंद से कोई मतलब नहीं था सिर्फ अपनी ख़ुशी चाहते थे बदले में मुझे क्या किसी को भी खुश देखना नहीं चाहते थे उनकी चाहत में दुःखी होने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए । चलो देर ही से सही ये नुस्खा समझ आया तो सही । अश्कों से रिश्ता निभाता रहा बिना बात मुस्कराया तो सही । ख़ुशी कब से खड़ी हुई थी उसको बुला कर खुद अपने दिल में बिठाया तो सही । दुनिया से जो प्यार कभी मिलता नहीं वही अपने आप से पाया तो सही । हम अकेले नहीं खुद साथ हैं अपने ज़माने को कर के दिखाया तो सही । ग़मों से दामन छुड़ाया भी नहीं खुशी को गले से लगाया तो सही । चमन कुछ उदास था मुद्दत से बहारों का मौसम आया तो सही । कोई सूरज कोई चांद नहीं दिखाई देता इक छोटा जुगनू टिमटिमाया तो सही । निराशा के घने बदल छाए हुए थे पर आशा का दीपक जलाया तो सही । तकदीर ने लिखी नफ़रतें ही नफ़रतें साहस से लकीरों को मिटाया तो सही । दर्द के गीत कितने मधुर लगते थे ख़ुशी का नग़्मा महफ़िल को सुनाया तो सही ।
 
भूल हुई जो हमने बेदिल बेरहम दुनिया वालों से जीने की इजाज़त मांगी , मरने की सज़ाएं देने वाले भला किसी को अपनी ज़िंदगी पर इख़्तियार देते हैं । हमको हंसता मुस्कराता देख पूछते हैं माजरा क्या है कैसे ऐसे हालात में खुश रहते हो , रोने की आदत नहीं फिर भी कभी आंखें नम हों तो ज़माना उस पर भी तंज कसता है । हमदर्द ज़माना नहीं है किसी के लिए भी । चतुराई चालाकी चालबाज़ी झूठ का आडंबर नहीं सीखा हमने कभी जिन्होंने इन सभी को आज़माया बहुत कुछ छीना चुराया आखिर उनका अंजाम भी सामने नज़र आया इक दिन उनको खाली हाथ पाया । सच से नज़रें चुराने वाला हमेशा है पछताया दुनिया वालो ने जाने क्यों झूठ का परचम लहराया । हमने कभी नहीं दोस्तों को परखा न कभी आज़माया फिर भी अफ़सोस नहीं है भरोसा किया और धोखा खाया । ऐतबार पर ऐतबार करते हैं ये ख़ता है तो हो हम तो खताएं बार बार करते हैं । आखिर इक बात कहनी है अपनों-बेगानों सभी से , बस और कुछ नहीं चाहता किसी से भी ।
 

         जीने के मुझे पहले अधिकार दे दो , मरने की फिर सज़ाएं सौ बार दे दो।  

 

 
           

सितंबर 12, 2022

POST : 1598 एहसासों के फूल ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान

   एहसासों के फूल  ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान 

                           रचनाकार कवि : डॉ लोक सेतिया  

गत वर्ष मुझे डॉ सेतिया ने फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी शीर्षक से अपनी पहली किताब भेजी थी , जिसकी भूमिकासमझाने इक हस्ती आई से मुझे एक पंक्ति अभी तक नहीं भूली है । वह कहते हैं :- लिखना मेरा जूनून है , मेरी ज़रूरत भी है और मैंने इसको इबादत की तरह समझा है । इसी वर्ष उनकी तीन किताबों का सुंदर ढंग से छपकर आना वाकई उनके जूनून को दर्शाता है , उन्हें बधाई । और उनकी जुनूनी इबादत को सलाम । 
 
उनके ताज़ा कविता संग्रह ' एहसासों के फूल ' में लगभग 75 छंदबद्ध कविताएं एवं मुक्तछंद रचनाएं संग्रहीत  हैं जो सहज सीधी ज़बान में बदलती अनुभूतियों और एहसासों को ईमानदारी से अभिव्यक्त करने में सक्षम हैं । उनमें कोई शब्दाडंबर नहीं , कोई गूढ़ दर्शन की बोझिल बातें नहीं लेकिन सब में ठोस ज़िंदगी की तरल बातें हैं , जो उनके 71 वर्ष के जीवन अनुभव से निचुड़ी हुई आई हैं । 
 
 
प्रेम अनुभूतियाँ ज़िंदगी की सबसे तरलतम और सघनतम , उदास किंतु सुखद , और सृजन की अपार संभावनाओं से परिपूर्ण अनमोल अनुभूतियाँ होती हैं । ऐसी कविताएं सिरहाने के नीचे रखी जाती हैं , युवावस्था में  , और प्रौढ़ावस्था में हृदय की तहों के नीचे या स्मृतियों में । ऐसी कुछ कविताएं और ग़ज़लें हैं : वो दर्द कहानी बन गया , जाने कब मिलोगी तुम , मन की बात , उमंग यौवन की , मेरे ख़त , मेरी खबर आदि ।    
 
 
कवि केवल प्रेमिका की याद से उपजी उदासी को ही नहीं उकेरता बल्कि वृद्धावस्था में हर उस मां की उदासी को भी शिद्दत से महसूस करता है जो युवा संतान की उपेक्षा सहती है । यह ऐसा है जैसे कोई किसान युवा हुई फसलें काट लेता है और पीछे कटी हुई जड़ों का दर्द ही टीसता रह जाता है  , माँ के आंसू ऐसी ही कविता है । 
 
 
कवि का जीवन संघर्षों में और संघर्षशील मनुष्य के जीवट और आत्मविश्वास में पूरा विश्वास है । वह एक कविता में लिखता है : जीवन इक संग्राम तो क्या \ नहीं पल भर आराम तो क्या । ' थकान ' में कहता है : जीवन भर चलता रहा \ कठिन पत्थरीली राहों पर \ पर मुझे रोक नहीं सके \ बदलते मौसम भी । 
 
 
कवि नये ज़माने की नयी नारी का उद्यघोष सीता के पश्चाताप की आवाज़ में करता है , मुझे नहीं करनी थी चाहत \ सोने का हिरण पाने की ,  और एक अन्य कविता 'औरत ' में जो संग्रह की पहली कविता है वह उसकी आवाज़ यूं बनता है : " तुमने देखा है \ केवल बदन मेरा \ प्यास बुझाने को अपनी हवस की \ बांट दिया है तुमने टुकड़ों में मुझे \ और उसे दे रहे हो चाहत का नाम । एक और खूबसूरत कविता है ' हमारा अपना ताज ' पति-पत्नी का अपना प्यार का छोटा सा बसेरा । 
 
 
सामाजिक सरोकारों की कविताओं में ' काश ' शीर्षक से कविता मुझे बहुत अच्छी लगी जिसमें कवि सच्ची धर्मनिरपेक्षता सर्व धर्म समभाव का पक्षधर तो बनता है लेकिन उससे बढ़कर वह समूची मानवता के दर्द के एहसास को प्रमुखता देता है न कि मंदिर मस्जिद जाने को । कवि प्राकृतिक परिवेश का प्रेमी है और पर्यावरण संरक्षण में विश्वास रखता है । ' ठंडी ठंडी छाँव ' वृक्ष कहता है : काटना मत मुझे कभी भी \ जड़ों से मेरी \ जी नहीं सकूंगा \ अपनी ज़मीन को छोड़कर  , मैं कोई मनी प्लांट नहीं हूं । मानि वह प्राकृतिक उत्पाद के बाज़ारवाद का भी आलोचक है । 
 
 
साहित्य में कागज़ के फूल सजाने वाले कई लोग पत्थर के फूल भी बन कर नफरती बोल बोलकर बाल श्रमिकों का कैसे दिल दुखाते हैं , ये पीड़ा एहसासों के फूल खिलाने वाले डॉ सेतिया जी बखूबी समझते हैं । उनकी दृष्टि में वो साहित्य कहीं गुम हो गया है जो सद्भावना और संवेदना से खुशियों की महफ़िलें सजाता था ।  अब तो घुटन में उन्हें इस तालाब का जल प्रदूषित लगता है और सब फूल कुम्हलाए हुए । 
 
 
समाज में फैली इन दुष्प्रवृतियों से दुःखी हो कर वह कृष्ण को उनका वायदा याद दिलाते हैं जो उन्होंने अधर्म  जाने पर नया अवतार ले कर आने को कहा था । यहां उनका संस्कृति प्रेम झलकता है ।  इस प्रकार कविता दर कविता सेतिया जी जीवन यात्रा की अच्छी बुरी अनुभूतियों की सशक्त अभिव्यक्ति करते चलते हैं । हां कहीं कहीं उनकी घिसी-पिटी उपमाएं अखरती भी हैं , यथा , फूल ही फूल खिले हों \ हों हर तरफ बहारें ही बहारें ।  फिर भी बहुत ताज़गी है उनकी कविताओं में शिल्प तथा सादी ज़बान में।  उनके लिए साधुवाद की कामना करता हूं ।  
 
  अमृत लाल मदान 
अध्यक्ष , साहित्य सभा 
कैथल ( हरियाणा ) 136027 
मोबाइल नंबर - 94662-39164 

उपरोक्त पुस्तक समीक्षा आदरणीय मदान जी ने 11सितंबर 2022 आर के एस डी ( पी जी ) कॉलेज में विमोचन करते समय पढ़ कर सुनाई । मुझे याद नहीं उनसे कभी पहले आमने सामने मुलाक़ात हुई या कोई वार्तालाप हुई हो । शायद कोई बेहद संवेदशील साहित्य सृजक ही ऐसा कर सकता है केवल पुस्तक को पढ़ कर रचनाकार की मन की भावनाओं को समझ कर इतनी सही सार्थक समीक्षा करना । मुझे अपनी रचनाओं की इस से बढ़कर कोई कीमत नहीं मिल सकती है । अमृत लाल मदान जी का धन्यवाद शब्दों में नहीं किया जा सकता है । 

(   पाठक वर्ग की सुविधा के लिए ' एहसासों के फूल ' कविता संग्रह की पुस्तक व्हाट्सएप्प नंबर 
8447540078 पर संदेश भेज मंगवा सकते हैं । जल्दी ही अमेज़न पर भी उपलब्ध करवा दी जाएगी। )
 

 

सितंबर 06, 2022

POST : 1597 कौन समझेगा कहानी मेरी ( कही-अनकही ) डॉ लोक सेतिया

   कौन समझेगा कहानी मेरी ( कही-अनकही ) डॉ लोक सेतिया 

शब्द नहीं एहसास हैं , मैंने अपनी दास्तां सुनाने को कुछ फ़िल्मी गीत कुछ और बातें उधार ली हैं । मेरे अल्फ़ाज़ जाने कैसे कहां गुम हो गए हैं । मैं कौन हूं कहां हूं देखता कोई नहीं , रहता हूं जिस बस्ती में मुझे जानता कोई नहीं । बंद हूं इक कैद में ज़िंदगी की चाह में , कफ़स के परिंदों को उड़ने को छोड़ता कोई नहीं । कभी बेवजह हंसता अश्क बहाता कभी जाने क्यों , इस दुनिया की भीड़ में मेरी तरफ देखता कोई नहीं । दोस्त खुद का नहीं , दोस्ती का घर बना लिया , दुश्मन बहुत मेरे यहां , मुझे मांगने पर मगर मारता कोई नहीं । ये इक नज़्म है जिसकी कोई बहर नहीं मिली कोई मीटर काफ़िया नहीं मिल सका लाख कोशिश करने पर भी । जिस डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखी हुई थी खो गई आज ढूंढी तो नहीं दिखाई दी । उसी तरह जैसे इधर उधर घर बाहर ज़माने भर के अपने बेगाने लोगों में प्यार की चाहत की इक ओस जैसी बूंद भी मेरे लिए कभी नहीं थी । इक दोस्त अजीब लगता था उसकी बातें अच्छी लगती थीं मगर समझ नहीं आती थीं शायद अब थोड़ा थोड़ा समझने लगा हूं । याद आया उस की तबीयत खऱाब थी मिलने गया तो उसकी पत्नी ने जैसे इक शिकायत की थी बोली थी भाई साहब देखना आपका दोस्त इस तस्वीर बनाकर क्या समझाना चाहता है । बड़ी सी पेंटिंग दीवार पर टांगी हुई थी निजी कक्ष में जिस में कोई बदन पर कांटेदार तारों से बंधा हुआ था । शायद सबकी नज़र नहीं जाती थी वहां जहां इक छोटा सा दिल का निशान बना हुआ था । कॉलेज के समय से ही उसको ऐसे पेड़ों की पेंटिंग बनानी पसंद थी जिस की शाखाओं पर कोई पत्ता तक नहीं होता था सूखे ठूंठ जैसे दरख़्त की तस्वीर बनाता रहता था । उस ने अपने घर में गमलों में पौधे लगा रखे थे जिन में फूलदार कम और कंटीले कैक्टस अधिक थे । मुझे घर बनाने पर कुछ कैक्टस गमले में उपहार दे गया था कोई कुछ भी समझे मैं जानता हूं उसके दामन में मेरे लिए एक भी शूल नहीं था फूल खिलाना चाहता था शायद मगर साथ साथ कांटे भी होंगे गुलाब में छुपे हुए इस वास्तविकता को समझाना भी चाहता था । 
 
 उम्र बीत गई तब जाकर समझा खुद अपने आपको सबकी बात को । ये दुनिया किसी प्यासे जलते तपते रेगिस्तान की तरह है और हम लोग प्यासे हैं प्यार अपनापन और चैन सुकून की तलाश में दौड़ते रहते हैं ।  यही मृगतृष्णा जीवन का अभिप्राय है चमकती हुई रेत को पानी समझ भागते भागते आखिर प्यासे ही मर जाना है । मुझे फ़िल्में देखना बेहद पसंद रहा है , लोग अपने आनंद मनोरंजन के लिए सिनेमा देखते हैं मुझे जैसे किरदार भाते हैं आस-पास नहीं मिलते फ़िल्म देखता तब दिखाई देते हैं । पागलपन ही सही मुझे प्यार रहा है ऐसे किरदारों से अथाह मुहब्बत की है , आनंद फिल्म में एक दोस्त मिल जाता है जिसको बिना जाने पहचाने किसी नाम से पुकारने पर जवाब में उसी तरह का किरदार सामने खड़ा दिखाई देता है । आनंद किसी मुरारीलाल को नहीं जानता फिर भी कभी किसी से मिलने बात करने की चाहत हो तो इस नाम से आवाज़ देकर पुकारता है राजेश खन्ना को जॉनी वाकर गुरु बन जयचंद नाम से जवाब देता है । मुझ जैसे लोग कितने होंगे जिनको उनका मुरारीलाल जयचंद आनंद को मिले कितने दोस्तों की तरह वास्तव में मिलते नहीं हैं । 
 
लेकिन आजकल की फ़िल्में टीवी सीरियल की कहानियों में दोस्ती मुहब्बत हमदर्दी वाले किरदार नहीं होते हैं , दिखाई देते हैं चालाक चालबाज़ हिंसा को बढ़ावा देने वाले ख़लनायक वाले किरदार । खलनायक आजकल नायक से अधिक पसंद किए जाने लगे हैं , हमको सिनेमा टीवी अखबार से टीवी समाचार चैनल तक डराने लगे हैं । सपने सुहाने अब नहीं दिखाई देते भयानक ख़्वाब आधी रात को जगाने लगे हैं । फूलों की बात क्या बताएं इधर बाज़ार में ऊंचे दाम बिकते हैं । मैंने फूलों की बात जब भी किसी से की लगा सब को प्लास्टिक या पत्थर के फूल पसंद हैं गुलदान में सजाकर रखने को । मेरे खिलाए फूल भरी बहार में क्यों मुरझा जाते हैं मैं नहीं जानता कोई राज़ होगा छुपा इस में मुमकिन है । चलते चलते इक पुरानी ग़ज़ल सुनाता हूं ।
 

फूलों के जिसे पैगाम दिये ( ग़ज़ल ) 

फूलों के जिसे पैग़ाम दिये
उसने हमें ज़हर के जाम दिये ।

मेरे अपनों ने ज़ख़्म मुझे 
हर सुबह दिए हर  शाम दिये ।

सूली पे चढ़ा कर खुद हमको
हम पर ही सभी इल्ज़ाम दिये ।

कल तक था हमारा दोस्त वही
ग़म सब जिसने ईनाम दिये ।

पागल समझा , दीवाना कहा
दुनिया ने यही कुछ नाम दिये ।

हर दर्द दिया , यारों ने हमें
कुछ ख़ास दिये , कुछ आम दिये ।

हीरे थे कई , मोती थे कई
" तनहा " ने  सभी बेदाम दिये ।
 


 

सितंबर 05, 2022

POST : 1596 सोशल मीडिया की पढ़ाई , शिक्षक दिवस है भाई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   सोशल मीडिया की पढ़ाई , शिक्षक दिवस है भाई ( हास-परिहास ) 

                          डॉ लोक सेतिया 

इक फिल्म तक से संदेश पाया था , तीन महा मूर्खों की कहानी थी थ्री इडियट्स , ज्ञान की गंगा बहती है जिधर से मिले बटोर लो । अब करोड़पति का झांसा देने वाले आगाह करते हैं पहले टटोल लो । सुबह हो गई नानू अपना अपना फेसबुक , व्हाट्सएप्प खोल लो । दोस्तो मैंने सोशल मीडिया फेसबुक को जाना परखा और आज़माया है लौट कर बुद्धू बनकर हर समझदार घर वापस आया है । उलटी पढ़ाई पढ़ने पढ़ाने में इस आधुनिक युग ने उम्र गंवाई है , बाप नहीं कोई किसी का न कोई भाई है बिना बात की यहां लड़ाई है । किसी को वास्तविकता बिल्कुल समझ नहीं आई है फिर भी हर किसी ने अध्यापक उपदेशक बनने की कसम खाई है । सबक कितने हैं कोई हिसाब नहीं कोई कलम दवात नहीं कोई किताब नहीं दोस्ती क्या दुश्मनी किसको कहते हैं समझना चाहो तो इस से बेहतर कोई किताब नहीं । झूठ धोखा है इक तिलिस्म है ग़म नहीं कोई यही इक ग़म है जो नहीं नज़र आए बस वही कम है । खुशियां हैं और बड़ा मातम है क्या कहें बस ज़ुल्म ओ सितम है लबों पर मुस्कुराहट भी आंख भी नम है । पढोगे लिखी इक नई नज़्म है :-

झूठे ख़्वाब ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

जीवन भर महसूस होता रहा

अकेलापन लेकिन समझा यही  

मुझे चाहते हैं सभी लोग यहां ।

हादिसे नहीं इत्तेफ़ाक़ नहीं कोई 

छोड़ जाते हैं तोड़ जाते नाते सब 

अचानक बदल रास्ता कब कहां ।

कौन साथ कौन बिछुड़ा खबर नहीं

भीड़ भरे बाज़ार में ढूंढें कैसे भला 

धूल ही धूल कदमों के नहीं निशां ।

सबने ज़मीन से नाता तोड़ लिया 

और सपनों का बनाया इक आस्मां 

आंख खुली तो थे गायब दोनों जहां । 

कौन देगा सच के सच होने की गवाही 

झूठ का सिक्का चलता आजकल भाई

सभी पढ़ाते हैं यही पढ़ाई बधाई भाई । 



सितंबर 01, 2022

POST : 1595 मेरी रचनाओं को लेकर खट्टी-मीठी यादें ( दिल से दिल तक ) डॉ लोक सेतिया

     मेरी रचनाओं को लेकर खट्टी-मीठी यादें ( दिल से दिल तक ) 

                         डॉ लोक सेतिया 

अक्सर लेखक किताब छपवाते समय इनका उल्लेख किया करते हैं मैंने ऐसा नहीं किया क्योंकि आपसी निजी व्यक्तिगत बातों का उपयोग पाठक को पुस्तक पढ़ने को विवश करने को इस्तेमाल करना मुझे स्वीकार नहीं है । कितनी बार कोई किताब मिलती तो उस पर समीक्षा लिखवाई शुरुआत में दिखाई देती थी । पाठक को पढ़ कर राय बनाने से पहले प्रभावित करना सही नहीं लगता है । आज सैर करते करते याद आई इक घटना साथ चलते दोस्त की कही बात से , उनका कहना था राज्य के शासक को शुभारंभ करने को फुर्सत नहीं मिली कब से । मेरी व्यंग्य की किताब की पहली रचना  ' स्वर्ग लोक में उल्टा-पुल्टा ' की याद आई । मैंने जसपाल भट्टी जी के निधन के बाद उनको श्रद्धांजली देने को लिखी थी और उनकी धर्मपत्नी को भेजी थी डाक द्वारा । संक्षिप्त सा जवाब मिला था उन्होंने कहा था ये सबसे अच्छा ढंग है श्रद्धा-सुमन अर्पित करने का । 
 
     कुछ साल पहले के पी सक्सेना जी को इक रचना भेजी थी और उनका पोस्टकार्ड पर हरे रंग की स्याही से लिखा खत मिला था ,  ' हम सार्थक व्यंग्य लिखने वालों की बिरादरी बहुत कम है ' बनाए रखना । शब्द अंकित हैं अंतर्मन पर । कोई 600 से अधिक व्यंग्य रचनाएं प्रकाशित हुई हैं सभी अख़बारों पत्रिकाओं में । इक अखबार के संपादक जी ने फोन पर बात कर अनुबंध करने को कहा था मानदेय बढ़ा कर देने का प्रलोभन भी था , शर्त थी सबसे पहले हर रचना उनको भेजनी होगी और स्वीकृत नहीं होने पर कहीं और भेज सकते हैं । बंधनमुक्त रहना मेरी आदत है क्षमायाचना कर आग्रह स्वीकार करने में असमर्थता प्रगट कर दी थी । 
 
   लखनऊ की इक पत्रिका का पत्र मिला था कीमत घर की कहानी को लेकर नाराज़गी जताई थी , जब हमने स्वीकृत कर ली थी आपको किसी अन्य जगह नहीं भिजवानी चाहिए थी । मैंने जवाब दिया था मैं अपनी रचनाएं अलग अलग अख़बार पत्रिकाओं को एक साथ भेजा करता हूं किसी से कोई सहमति या लिखित अनुबंध नहीं किया और सवतंत्र लेखन करता हूं । साथ साथ भेजी रचना कोई पहले कोई बाद में पब्लिश करते रहते हैं अधिकांश लिखने वाले को मानदेय भी नाम भर को देते हैं इसलिए रचनाकार पर बंदिश लगाना अनुचित है । एकतरफा नियम नहीं होने चाहिएं । 
 
   व्यंग्यकार की समस्या यही है सबको कटाक्ष पढ़ कर आनंद आता है औरों को लेकर लिखा होने पर । जब भी जिस को अपनी संस्था संगठन को लेकर कड़वी वास्तविकता पढ़ने को मिलती सभी बुरा मानते हैं । ग़ज़ल की बात दूसरी है सभा में सामने बैठे लोग ताली बजाते हैं वाह वाह करते हैं बगैर समझे कि मतलब क्या है । मगर ऐसा अवसर कम मिलता है बेबाक सच कहने वाले को लोग सभाओं में बुलाने से घबराते हैं । कविता नज़्म का अपना एहसास होता है लेकिन वास्तविक सही जानकारी के आलेख लोग पढ़ना नहीं चाहते इसलिए किताबों को नहीं व्हाट्सएप्प फेसबुक को विश्वसनीय समझ गुमराह होते हैं । मैंने सबको लेकर निडरता पूर्वक सच लिखने की कोशिश की है और राजनीति धर्म समाजसेवा से पत्रकारिता पर ही नहीं खुद लिखने वाले लेखक और स्वास्थ्य सेवाओं डॉक्टर्स पर भी निसंकोच लिखा है । सात घर छोड़ने वाली और झूठ की चाशनी लगा सच बोलने वाली शैली नहीं अपनाई है ।
 
  सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि मुझे कभी भी राग-दरबारी नहीं भाया है किसी शासक किसी तथाकथित महानायक का गुणगान नहीं किया है । मुझे कुछ लोग आदरणीय लगते रहे हैं जिन्होंने अपना जीवन देश समाज को समर्पित किया और सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत किया , लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी और लाल बहादुर शास्त्री जी जैसे गिने चुने लोग मेरे लिए प्रेरणा का स्त्रोत रहे हैं । चाटुकारिता करने वाले लोग जिनको मसीहा बताते हैं अक्सर वो अच्छे इंसान भी साबित नहीं होते हैं । मेरी किताबों में आपको कोई भगवान कोई मसीहा कोई देवी देवता नहीं मिलेगा , शायद उनकी मसीहाई पर सवालात की बात अवश्य दिखाई देगी ।
 




अगस्त 25, 2022

POST : 1594 ग़म का कारोबार नहीं करते ( आधी अधूरी कहानी ) डॉ लोक सेतिया

   ग़म का कारोबार नहीं करते ( आधी अधूरी कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

   सच कहने और स्वीकार करने में संकोच नहीं करते हैं हम , लिखने वाले दुनिया के बाज़ार की परवाह नहीं करते हैं । हार जाते हैं हारते नहीं हैं , खरीदार ज़माना है झूठ का , और हम दुनिया के बाज़ार में बिकते नहीं हैं । कई बार कितने लोग मुझे चने के झाड़ पर चढ़ाते हुए कहते थे आपकी लेखनी कमाल की है । मैं बहुत बार जानता समझता था कहने वाले ने मुझे पढ़ा ही नहीं है सिर्फ खुश करने या कोई मतलब होने के कारण झूठी तारीफ करता है । निसंकोच बताएं कोई सहायता कर सकता हूं तो अवश्य ख़ुशी से करना चाहूंगा । 25 साल की उम्र में ज़िंदगी से सामना हुआ तो कुछ महीनों में दोस्ती रिश्ते अपनापन की वास्तविकता समझ आ गई थी , हर कोई मुझे इस्तेमाल करना चाहता था और कोई कीमत नहीं समझ कर खरीदार बन कर मुझे पाना चाहता था बदले में देना कुछ भी नहीं चाहता था । होशियारी हमने कभी नहीं सीखी जीवन भर नासमझ रहे हैं । मैं समझता हूं कि मेरा लेखन कोई बड़े ऊंचे स्तर का नहीं है और कभी बड़े बड़े साहित्य कारों से तुलना करने की मूर्खता नहीं की है । इसलिए कहता था मेरा लेखन उच्च कोटि का नहीं मगर वास्तविक और मौलिक एवं सच्चाई को उजागर करता है। 
 
  उनको शायद उम्मीद नहीं थी ऐसा होने की जबकि मुझे अक्सर जैसी आशंका रहती है वैसा ही होता है तभी मैं नाकामी निराशा से घबराता नहीं , उन्होंने कहा आपकी किताब को जैसा उन्होंने सोचा था पाठक वर्ग से उतना प्यार मिला नहीं है । बहुत कारण हैं पहला मुझे खुद को बाज़ार की वस्तु बनकर संवरना नहीं आता है और कभी लोग जैसा चाहते हैं लिखना मंज़ूर नहीं किया । और दूसरा आधुनिक युग में सोशल मीडिया से लेकर अन्य दुनियादारी के तौर तरीकों से तमाम हथकंडे अपना कोशिश करने की आदत नहीं है । किसी को झूठी चमक - दमक से आकर्षित करना भले बाद में उसको लगे विज्ञापन के झांसे में गलती कर बैठा उचित नहीं होता है । सच को समझने में वक़्त लगता है और कितनी बार किसी को ज़िंदा रहते स्वीकार नहीं किया गया लेकिन मौत के बाद या सूली चढ़ाने के बाद समझा दुनिया ने कि सच क्या था । मंच पर वाह वह और तालियां बटोरने वाले सार्थकता से अधिक नाम शोहरत पैसा बनाने पर ध्यान देते हैं शायद नहीं समझते ये कुछ पलों की बात है कालजयी रचना का महत्व अलग होता है । सभी जिस राह चलते हैं आसान राह सफलता हासिल करने की मुझे भाती नहीं है खुद अपनी बनाई पगडंडी पर चलना पसंद है । 
 
     मेरी भी किताब बिकवा दो , व्यंग्य रचना लिखी थी बीस साल पहले जब अटल बिहारी बाजपेयी जी की किताब जननायक को लेकर यू जी सी से विश्वविद्यालयों को पत्र भेजा गया । 1000 रूपये मूल्य की किताब आज एक चौथाई कीमत पर उपलब्ध है कितनी पढ़ी गई खरीद कर कितनी विवश हो मंगवाई लायब्रेरी की अलमारी की शोभा बढ़ा रही ये राज़ की बात है । लेकिन अच्छे साहित्य लेखन की कटौती एक ही है वर्षों बाद कोई पढ़ता है तो क्या विचार आता है , क्या उस कालखंड में लोग यही सोचते समझते पसंद करते और लिखते पढ़ते थे या फिर ऐसा लगता हो कि तब भी ऐसे लीक से हटकर निडर होकर भीड़ में शामिल नहीं होने वाले विचारशील हुआ करते थे । मेरा मानना है कि कई साल बाद कोई पढ़ेगा मुझे तो यही समझेगा कि ये लिखने वाला शानदार शब्दों और कलात्मकता से प्रभावित भले नहीं कर सका हो लेकिन अपने समय की वास्तविकता को उजागर करने में पूर्णतया सफल रहा है । समाज की सही तस्वीर आईने में दिखलाना ही पहला और अंतिम मकसद होता है लेखन धर्म में। 
 
अपनी चार अभी तक प्रकाशित पुस्तकों को लेकर मैं दावा कर सकता हूं की सभी अपने नाम के अनुरूप रचनाओं का संकलन हैं ।
 
1  फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी , ग़ज़ल संग्रह में ज़िंदगी का फ़लसफ़ा है । 
 
2  एहसासों के फूल , कविता संग्रह में भावनाओं की कोमल छुवन है । 

3 हमारे वक़्त की अनुगूंज , व्यंग्य रचनाओं में इस समय की सच्चाई है ।
 
4 दास्तानें ज़िंदगी , ज़िंदगी की कहानियों को बयां करती दास्तानें हैं ।
 
 

 

अगस्त 24, 2022

POST : 1593 यहां भगवान बन जाते वहां शैतान बन जाते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

         यहां भगवान बन जाते वहां शैतान बन जाते ( ग़ज़ल ) 

                 डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

यहां भगवान बन जाते , वहां शैतान बन जाते
हमेशा के लिए तुम क्यों नहीं इंसान बन जाते । 
 
ज़रूरत पर हमेशा ही झुकाए सर चले आये 
तुम्हारे पास आएं लोग तब अनजान बन जाते । 
 
तुम्हारे वास्ते दर खोलना महंगा पड़ा सबको 
निकाले से नहीं निकले जो वो महमान बन जाते । 
 
अदावत की सियासत से कभी कुछ भी नहीं मिलता 
न जो अभिशाप बनते काश इक वरदान बन जाते । 
 
बहुत करते रहे तुम सब अमीरों पर मेहरबानी 
गरीबों के लिए अच्छे सियासतदान बन जाते । 

भरी नफरत दिलों में , और आ जाते हैं मंदिर में 
समझते सब को अपना आप गर भगवान बन जाते । 

मुहब्ब्बत उम्र भर " तनहा " रहे करते ज़माने से 
दिखावा लोग सब करते हैं झूठी शान बन जाते । 



 
 

अगस्त 23, 2022

POST : 1592 ज़िंदगी भर ख़ुशी ढूंढते हैं लोग ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       ज़िंदगी भर ख़ुशी ढूंढते हैं लोग ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

मिलती नहीं जीवन भर क्यों 
मिलती है ख़्वाबों में शायद वो 
और हम ने ख़्वाब सजाना ही 
हक़ीक़त से घबरा छोड़ दिया । 

वही मांगते हैं खुशियां उन्हीं से 
देते हैं जिनको दर्द की सौगातें 
इंसान इंसान हैं कोई पेड़ नहीं 
पत्थर खा देते हैं फल सबको ।
 
बना दिया है कारोबार उसे और 
कीमत लगाते हैं सब ख़ुशी की 
दर्द के बदले कौन बांटता है अब 
अपनों बेगानों को वास्तविक ख़ुशी । 
 
इक बार इक ख़ुशी मिली हमको 
करीब जा कर देखा उसकी आंखें 
अश्क़ों से भरी हुई थी दर्द सहते 
मुस्कराहट मगर लबों पे रहती थी ।
 
वो नन्हीं सी बिटिया चाहती थी 
उठा कर कोई चूमे माथा उसका 
फुर्सत थी किसे खेले संग कौन 
खिलौनों से बहलाना था आता । 
 
देख कर ग़म सभी भूल भूल जाएं 
मासूम ख़ुशी बड़ी हो गई धीरे धीरे 
घबराती अब सबसे करीब आने से
खुश होने लगे सभी उसे रुलाने से । 
 

 

 
 
 

अगस्त 20, 2022

POST : 1591 लिखने वाले लेखक का दर्द ( आलेख ) डा लोक सेतिया

   लिखने वाले लेखक का दर्द  ( आलेख )  डॉ लोक सेतिया 

    घटना कोई तीस साल पहले की है , लेखक का दर्द शीर्षक से व्यंग्य रचना लिखी थी अखबार को भेजी थी । शोषण पर संपादकीय पढ़ा था संपादक जी का तो ख्याल आया कितने बड़े बड़े अखबार पत्रिका वाले करोड़ों की आमदनी होने पर भी लिखने वाले तथा समाचार भेजने वालों को कुछ भी नहीं देते या नाम भर को मानदेय देते हैं जो सम्मानजनक कदापि नहीं लगता है । अफ़सोस हुआ जब इक संपादक ने रचना को लौटाया पुर्ज़े-पुर्ज़े कर फाड़ कर और लाल सियाही से काटने को लकीर लगा कर । सामान्य तौर पर खेद सहित रचना लौटाई जाती थी अन्य किसी को भिजवाने के लिए । तब ध्यान आया था जब किसी के यहां कोई मर जाता है तब उधर से फाड़ कर चिट्ठी भिजवाई जाती है , मैंने समझ लिया था उनका ज़मीर मर गया है । लिखना तलवार की धार पर चलना है हिंदी लेखक को शायद ही अपनी महनत का उचित मेहनताना मिलता है , सबके शोषण और मानवता के दर्द की बात लिखने वाला खुद अपना दर्द नहीं बताता कभी पाठक को । तीस चालीस साल लिखने के बाद किताबें छपवाई तब सोशल मीडिया पर जानकारी देने को पब्लिशर का संपर्क नंबर दिया और किसी दोस्त का जवाब आया पैसे लेते हैं दोस्त से उपहार देना चाहिए । उनकी बात वास्तविकता बताती है लोग किताब खरीद कर नहीं पढ़ते अधिकांश तौर पर , जब मैंने लिखना शुरू किया था इक पत्रिका में कॉलम छपता था , क्या आप मांग कर भोजन खाते हैं कपड़े पहनते हैं अन्य आवश्यक चीज़ें मुफ्त लेते हैं । अगर नहीं तो मांग कर नहीं खरीद कर पढ़ें और अपने परिवार को अच्छे साहित्य से जोड़ कर सही मार्गदर्शन पाने की आदत डालें । कुछ साल पहले सार्थक लेखन पर इक आलेख लिखा था जब इक बचपन के दोस्त के बेटे ने अपनी किताब के विमोचन पर कोई आलेख पढ़ने को कहा था , ढाई आखर प्रेम के लिखना बाक़ी है अभी , शीर्षक से रचना पढ़ कर सुनाई थी सभा में । मगर सुझाव उनको आलोचना क्यों लगा मुझे समझ नहीं आया था ।

      18 मई 2014 ( अभी बाक़ी है पढ़ना लिखना )                    

    बात करते हैं उनकी भी आज जिनका दावा है कि वो दर्पण हैं समाज का। बहुत जोखिम भरा काम है ये , आईने को आईना दिखाना। इतनी छवियां उनमें दिखाई देती हैं कि नज़रें हार जाती हैं उनको निहारते निहारते। ये विषय इतना फैला हुआ है कि इसका ओर छोर तलाशते उम्र बीत सकती है। इसलिये कुछ आवश्यक बातों पर ही चर्चा करते हैं ताकि ये समझ सकें कि आज का साहित्य , आज का लेखक कहां खड़ा है , क्या कर रहा है और किस दिशा में जा रहा है। जब भी कोई कलम उठाता है तब वास्तव में सब से पहले वो खुद अपने आप को तलाश करता है , मैं क्या हूं , मेरा समाज कैसा है , कहां है। तब सोचता है कि ये समाज होना कैसा चाहिये , मुझे क्या करना चाहिये इसको वो बनाने के लिये। इतिहास में जितने भी महान लेखक हुए हैं वो सभी अपने इसी मकसद को लेकर लिखते रहे हैं। उन्होंने ये कभी नहीं सोचा था कि उनको लिखने से क्या हासिल होगा या क्या नहीं मिलेगा। कुछ भी पाना या खोना उनका ध्येय नहीं था , केवल इक लगन थी जो उनको लिखने को विवश करती रही। और उन्होंने दुनिया को वो दिया जो सदियों तक कायम रहा। इधर कुछ ऐसे भी लोग हैं जो लिखने को विवश नहीं होते , कोई विवशता उनको लिखने को बाध्य करती है।  जैसे अखबार या पत्रिका का संपादक नित लिखता है नये विषय पर इसलिये नहीं कि उसकी सोच विवश करती है , बल्कि इसलिये कि उसको इक औपचारिकता निभानी है।

                इधर देखते हैं इक भीड़ नज़र आती है लिखने वालों की , मगर ध्यान दें तो समझ नहीं आता इसको क्या कहना चाहिये। साहित्य सृजन या कुछ और या मात्र कागज़ काले करना। कुछ भी तो दिखाई नहीं देता जो सार्थक हो , कोई बताता है वो महिला विमर्श की बात कहता है , कोई जनवादी-वामपंथी लेखन का पैरोकार बना बैठा है , कोई दलित लेखन का दम भरता है। ये कैसा साहित्य है जिसको पूरा समाज नज़र नहीं आता , कोई खास वर्ग दिखाई देता है जिसमें। कितना भटक गया है आज का लेखक , क्या हासिल करना चाहता है वो समाज को इस तरह टुकड़ों में विभाजित कर के। सब की बात क्यों नहीं करना चाहता ये इस नये दौर का नया लेखक। जब लिखने वाला खुद को और अपने समाज को पहचानने के वास्तविक ध्येय से भटक जाता है , और चाहता है लोग उसको पहचानें , उसके लेखन का सम्मान हो , मूल्यांकन हो तब वही होता है कि आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। लगता है यही करने लगा है आज का लेखक। वह समाज को कुछ देना नहीं चाहता बल्कि उससे कुछ पाना चाहता है। अथवा जितना देता है उससे अधिक पाने की लालसा रखता है। कई-कई किताबें छपवा डाली हैं , शायद ही कभी सोचा हो कि उनमें लिखा क्या है। बहुत हैरानी होती है जब अधिकतर पुस्तकों में कुछ भी काम का नहीं मिलता , कुछ तो जो सार्थक हो , जो समाज को सही दिशा दिखाने का कार्य करे। अन्यथा व्यर्थ समय और शब्दों की बर्बादी से क्या हासिल होगा। अब उस पर शिकायत कि लोग पढ़ते ही नहीं किताबों को , क्या कहीं लेखन में कमी नहीं जो पाठक ऊब जाता है कुछ पन्ने पढ़कर। एक हास्यस्पद बात है , बहुत सारे लेखक खुद अपने ही लेखन पर फिदा हैं। जैसे कोई दर्पण में अपनी ही सूरत को निहारता रहे और अपने आप पर मोहित हो जाये। कहते तो हैं कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता , मगर मेरे कॉलेज के इक सहपाठी कहते थे कि दर्पण हर देखने वाले को बताता है कि तुमसे खूबसूरत दूसरा कोई नहीं है। शायद हम खुद अपने आप को बहलाना चाहते हैं। माना जाता है कि खुद को और बेहतर बनाने के लिये अपने से काबिल लोगों का साथ हासिल करना चाहिये मगर आजकल के लेखक उनका साथ पसंद करते हैं जो उनको महान बताकर हरदम उनकी तारीफ करता रहे। अपनी कमियों से नज़र चुराकर लेखक काबिल नहीं बन सकता है। सम्मान , पुरूस्कार आदि की अंधी दौड़ में शामिल लेखक सच से बहुत दूर हो जाता है। देश में और राज्यों में साहित्य अकादमी में लोगों को पद काबलियत को देख कर नहीं बल्कि सत्ताधारी नेताओं की चाटुकारिता करने से मिलते हैं और सत्ता के चाटुकार कभी सच्चे लेखक नहीं बन सकते। ऐसे लोग हर वर्ष अपनों अपनों को रेवड़ियां बांटने का काम करते हैं। साहित्य भी गुटबंदी का शिकार हो चुका है , साहित्य अकादमी के पद पर आसीन व्यक्ति हर उस लेखक को सरकारी आयोजन में नहीं बुलाता जो उसको पसंद नहीं है। जिनको लोग समझते हैं कि अच्छे साहित्यकार हैं तभी पद पर हैं कई बार वो लेखक ही नहीं होते।

                    वापस मूल विषय पर आते हैं। हम मंदिर मस्जिद गिरिजाघर या गुरुद्वारे किसलिये जाते हैं , अक्सर ये याद नहीं रहता। क्या हम ईश्वर को देखने गये थे , दर्शन करने , स्तुति करने या केवल अपनी बात कहने।  कभी कुछ मांगने तो कभी कुछ मिलने पर धन्यवाद करने। कितनी बार तो हम श्रद्धा से नहीं किसी भय से या अपराधबोध से जाते हैं। कभी काश ये सोच कर जाते कि आज अपने भगवान का हाल-चाल पूछेंगे , कि वो कैसा है और वो बताता कि कितना बेबस है परेशान है अपनी दुनिया को देख कर। हम जो अपनी दुनिया में ये शिकायत करते हैं कि अब बच्चे स्वार्थी बन गये हैं , मां बाप से क्या पाया है कभी सोचते ही नहीं , हर दिन मांगते रहते हैं और अधिक , लौटाना जानते ही नहीं। भगवान को भी तो ऐसा ही लगता होगा कि हम कभी खुश ही नहीं होते , उसने कितना दिया है , क्या क्या दिया है , हम हैं कि सब अपने पास रख लेना चाहते हैं। भगवान को नहीं चाहिये हमसे कुछ भी , मगर हम इतना तो कर सकते थे कि जितना हमें मिला उसका आधा ही हम उसके नाम पर लौटा देते उनको देकर जिनके पास कुछ भी नहीं है। ऐसे हमारा आस्तिक होना किस काम का है , जब हमने धर्म की किसी बात को जीवन में शामिल किया ही नहीं।

            यही हाल तो है साहित्य का भी। समाज के दुःख दर्द पर लिखना , क्या इतना ही काफी है। क्या हमें दूसरों के दुःख दर्द से वास्तव में कोई सरोकार भी है। करते हैं प्रयास किसी की परेशानी दूर करने का। सब से पहले हर लिखने वाले को चिंतन करना होगा कि जैसा उसका लेखन पढ़कर प्रतीत होता है क्या वो वैसा है। अधिकतर किसी का लेखन पढ़कर जो छवि मन में उभरती है , जब नज़दीक जाकर मिल कर देखें तो वह सही नहीं दिखाई देती। प्यार की , संवेदना की , मानवता की , परोपकार की बातें लिखने वाला अपनी वास्तविक ज़िंदगी में कठोर , निर्दयी और आत्मकेंद्रित होता है। ईर्ष्या , नफरत , बदले की भावना को मन में रख कर उच्चकोटि का साहित्य नहीं रचा जा सकता। जिसको देखो खुद को महाज्ञानी समझता है , खुद को सब कुछ जानने वाला समझना तो सब से बड़ी मूर्खता है। समझना है तो ये कि अभी हम कुछ भी नहीं जानते और जानने को कितना कुछ है। ढाई आखर प्रेम के पढ़ना बाकी है अभी। 
 

 

अगस्त 14, 2022

POST : 1590 जादूगर शहंशाह की कथा ( तरकश / कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

  जादूगर शहंशाह की कथा ( तरकश / कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

सदियां बदल गई युग बदलते रहे झूठ बोलने वाले सभी को छलते रहे , भोले भाले लोग झांसे में आकर घर लुटाते रहे चालबाज़ फूलते फलते रहे। ठगी का कारोबार दुनिया भर में शान से चलता है चोर डाकू चाहे कितना धन दौलत जमा कर लें जीवन भर भटकते रहते हैं ठग नाम शोहरत ऐशो आराम से सपने दिखला सब से वाहवाही लूटते चैन से रहते हैं । जादू का खेल दिखलाना जादूगरी कहलाता है फिर भी देखने वाले समझते हैं नज़र आने वाला दृश्य झूठा छल है , जैसे दुष्यंत कुमार कहते हैं :- 

     ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल लोगो , कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो । 

    जादू आशिक़ भी किया करते हैं और हुस्न वालों का जादू कब किसी को दीवाना कर दे कोई नहीं समझ पाता। राजनीति और सिनेमा में करिश्मा अभिनेता नेता नायिका का ग़ज़ब ढाता है मगर कब किसी का करिश्मा काम नहीं आये बेअसर हो जाये कोई नहीं जानता। ऐसा पहली बार देखा किसी की जादूगरी का नशा ऐसा चढ़ा है कि लोग ज़हर भी ख़ुशी ख़ुशी पीने लगे हैं । उसकी अदाएं निराली हैं मीठी मीठी बातें मतवाली हैं । लोग बेकार नहीं रोज़गार नहीं बजाते थाली हैं देते ताली पर ताली हैं । उसका नशा छा गया है धरती पर झूठ का फ़रिश्ता आकर दुनिया को तिलस्म से भरमा गया है । उसने सबको अपने जादू से सम्मोहित किया है पास उसके सत्ता का जलता दिया है लोग खुद बनकर बाती जलते हैं राख होने तक अरमान पलते हैं । सिसकियां भरना नसीब हो गया है रोते रोते ज़माना गहरी नींद सो गया है । जादूगरी से मिला कुछ भी नहीं सब अपना गुम हो गया है । खिलाता ख़ास लोगों को मीठा बताशा है कोई तमाशबीन बन गया है हर शख़्स बन गया तमाशा है । ख्वाबों ख्यालों की बेचता मिठाई है दुकान नहीं कोई शोरूम नहीं इक तस्वीर ऑनलाइन मिलती है स्वाद लाजवाब है बिना चखे सब कहते हैं । राजा नंगा है कहानी जैसे लोग शहंशाह के मुल्क में रहते हैं । निदा फ़ाज़ली जी की ग़ज़ल सुनते हैं। 
 
 
मन बैरागी, तन अनुरागी, कदम-कदम दुशवारी है
जीवन जीना सहल न जानो बहुत बड़ी फनकारी है

औरों जैसे होकर भी हम बा-इज़्ज़त हैं बस्ती में
कुछ लोगों का सीधापन है, कुछ अपनी अय्यारी है

जब-जब मौसम झूमा हम ने कपड़े फाड़े शोर किया
हर मौसम शाइस्ता रहना कोरी दुनियादारी है

ऐब नहीं है उसमें कोई , लाल परी न फूल गली
यह मत पूछो, वह अच्छा है या अच्छी नादारी है

जो चेहरा देखा वह तोड़ा , नगर-नगर वीरान किए
पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेज़ारी है ।
 
 
 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 

जुलाई 28, 2022

POST : 1589 देशभक्ति तमाशा बन गई ( तरकश ) डा लोक सेतिया

        देशभक्ति तमाशा बन गई ( तरकश ) डा लोक सेतिया

     कुछ लोग गहन विचार-विमर्श कर रहे हैं। देशभक्ति की बात हो रही है। कोई सवाल उछालता है , ये क्या चीज़ है , सुना है बड़े काम आती है आजकल। एक नवयुवक बताता है मनोजकुमार की फिल्म का गीत गाना देशभक्ति का काम है , मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती। जो जितना ऊंचे स्वर में गाता है वो उतना ही महान देश भक्त समझा जाता है। वैसे और भी गीत हैं , कुछ सरकारी विज्ञापन भी हैं , मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा एवं कम-आन इंडिया , दिखा दो। ये भी देशप्रेम को प्रदर्शित करने का ही काम करते हैं। क्रिकेट का खेल देखते हुए तिरंगा लहराना और अपने चेहरे या वस्त्रों को तिरंगे के रंगों में रंगना भी देशप्रेम का प्रमाण है। छबीस जनवरी या पंद्रह अगस्त को दूरदर्शन का सीधा प्रसारण देखते हुए गप शप करना हो , चाहे छुट्टी का मज़ा लेते हुए पिकनिक मनाना ये भी देशभक्ति का ही अंग हैं। देशभक्ति ही वो सलोगन है जो प्रतियोगिता में जीत दिलवा सकता है। ये वो फार्मूला है जो हमेशा हिट रहता है , सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेने वाली सुंदरियां तक अपने जवाबों में इसकी मिलावट करके अच्छे अंक बटोर सकती हैं। इसलिये वे देश से अनपढ़ता और गरीबी को मिटाने के उदेश्य की बात करती हैं। मगर जब प्रतियोगिता में जीत जाती हैं तब इन सब को भूल कर बड़ी बड़ी कंपनियों के विज्ञापन करने और चमक दमक वाले कार्यक्रम करती हैं देशभक्ति समझ कर। 
 
     देशभक्ति वो विषय है जिसपर कुछ खास दिनों में लिखता है लेखक , छापते हैं अखबार वाले और पत्रिका वाले। अध्यापक को भी ये विषय पढ़ाना होता है छात्रों को ताकि परीक्षा में अच्छे अंक मिल सकें। इस सबक को समझना ज़रूरी है न ही समझाना ही। रटने का सबक है , तोते की तरह हम सब रटते रहते हैं। कुछ अन्य लोगों के लिये ये एक रंगारंग कार्यक्रम की जैसी है वे देशभक्ति के नाम पर कितने ही आयोजन आयोजित किया करते हैं। कभी किसी दौड़ का नाम , कभी मानव श्रृंखला बनाकर प्रदर्शित की जाती है देशभक्ति। पहले कभी देशभक्ति के मुशायरे और कवि सम्मलेन भी आयोजित किये जाते थे मगर आजकल उनका चलन बाकी नहीं रह गया। अब देशभक्ति पर पॉप संगीत के कार्यक्रम सफल होते हैं। आई लव माई इंडिया गाते हुए नाचना इस युग की वास्तविक देशभक्ति समझी जाती है। इस नज़र से देखो तो युवा पीढ़ी देशभक्ति से भरी पड़ी है।

          इन दिनों कई तरह की देशभक्ति दिखाई देती है। आधे घंटे का सीरियल जिसमें दो कमर्शियल ब्रेक हों , और तीन घंटे की फिल्म भी जिसको कई कंपनियां मिल कर प्रयोजित करें। टीवी के हर चैनेल में देशभक्ति का तड़का ज़रूरी है , उदेश्य भले पैसा बनाना ही हो , बात देश प्रेम की ही करनी होती है। सब चैनेल अपने को बाकी से बड़ा देशभक्त साबित करने का प्रयास करते हैं। इन टीवी सीरियल और फिल्मों के नाम और विज्ञापन लुभावने तो होते हैं मगर देखने पर इनका प्रभाव दूसरा ही नज़र आता है। दर्शक सोचते हैं कि देशभक्ति कोई समझदारी का काम नहीं है। बस एक बेवकूफी है , पागलपन है। क्या मिला देशभक्तों को जान गवांने से , क्या काम आई उनकी कुर्बानी। न देश को कुछ मिला न जनता को। बस मुट्ठी भर लोगों ने सब की आज़ादी को , लोकतंत्र को ढाल बना अपनी कैद में कर लिया। आजकल ज़रा दूसरी तरह की देशभक्ति होती है , आंदोलन होते हैं , दंगा फसाद करवाते हैं , तोड़ फोड़ की जाती है। जनता को मूर्ख बना सत्ता हासिल करने को समझौते किये जाते हैं। चुनाव जीत सरकार बनाते ही सब भूल कर वही दुहराते हैं जिसका विरोध किया था। शासक बन ऐश करते हैं , झंडा फहराते हैं ,सलामी लेते हैं , देशभक्त कहलाते हैं। अफ्सर लोगों के लिये देशभक्ति ऐसा ब्यान है जिसे कभी भी किसी भी अवसर पर दिया जा सकता है। जनता के धन से खुद हर सुख सुविधा का उपयोग करते हुए गरीबों की हालत से दुखी होने की बातें करना और गरीबी मिटाने को कागज़ी योजनायें बना उनको कभी सफल नहीं होने देना , देश के विकास के झूठे आंकड़े बनाना देशभक्ति है। सत्ताधारी नेता की चाटुकारिता , मंत्री के आदेश पर हर अनुचित कार्य करना , पद का दुरूपयोग करना भी देशभक्ति है।

           नेताओं के लिये देशभक्ति ऐसा नशा है जिसको अपने भाषणों द्वारा जनता को पिला मदहोश कर उससे मनचाहा वरदान पा सकते हैं। देश को लूट कर खाने वाले नेता डंके की चोट पर देश के लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का दावा करते हैं। चुनाव करीब आते ही नेताओं पर देशभक्ति का ज्वर चढ़ जाता है। हर नेता नई रौशनी लाना चाहता है , सत्ता मिलते ही फिर अंधेरों का सौदागर बन जाता है। एक बार कुर्सी मिल जाये तो हर नेता उसे अपनी बपौती समझने लगता है। देशभक्ति इनके लिये कारोबार है , कभी गल्ती से देशभक्ति के नाम पर कोई जेलयात्रा कर आया हो तो वो ही नहीं उसका परिवार भी मुआवज़ा पाने का हकदार बन जाता है। कुछ लोगों की देशभक्ति जनता पर चढ़ा हुआ ऐसा कर्ज़ है जिसका भुगतान करते करते उसकी कमर टूट चुकी है , तब भी वो चुकता नहीं हो रहा , कुछ लोगों के वारिसों को उसका ब्याज ही मिला है , असल बाकी है। 
 
    आज़ादी मिले 75 साल होने को हैं आज़ादी की आयु की चर्चा होने लगी है , वर्षगांठ मनाते मनाते पचीसवीं पचासवीं से पिहचतरवीं तक संख्या पहुंच गई है । गुलामी सैंकड़ों साल की रही है आज़ादी को सौ वर्ष होने को अभी 25 साल और कौन इंतज़ार करता । कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक , वास्तव में आज़ादी के अर्थ तक बदले गए हैं । आज़ादी खो गई है या कहीं गुम है , अभी पिछले दिनों इक पुरानी फिल्म " मैं आज़ाद हूं " दोबारा देखी टीवी पर । अमिताभ बच्चन जी का किरदार लाजवाब है इक अखबारी कॉलम लिखने वाले का काल्पनिक किरदार जनता से सरकार तक शोहरत हासिल कर लेता है । ऐसे में इक बेबस भूखे गरीब को लालच देकर नकली आज़ाद बन कर सबको दिखलाना पड़ता है । टीवी पर अमिताभ बच्चन जी कौन बनेगा करोड़पति शो का संसाचल करते हैं कितने सालों से , विज्ञापन टीवी पर दिखलाया जा रहा है आज़ादी की पिहचतरवीं वर्षगांठ मनाने को लेकर । फिल्म में आज़ाद ख़ुदकुशी कर मर जाता है  , उसको मारने की कोशिशें करने वाले उसको ख़ुदकुशी नहीं करने देना चाहते बल्कि क़त्ल करने की कोशिश करते करते बचाने की ज़रूरत महसूस करते हैं । अमिताभ बच्चन को अपनी असफल रही कमाल की फिल्म की याद कभी न कभी आती होगी , 7 अगस्त को शो की शुरुआत करते हुए किरदार की कड़वी याद आए तो उनका तमाशा सिर्फ तमाशा बन जाएगा । ये देश आजकल तमाशाओं के भरोसे चल रहा है । देशभक्ति का खेल तमाशा इस दौर का सबसे अधिक बढ़िया कारोबार बन गया है । कौन खिलाड़ी है कौन तमाशा दिखलाता है और तमाशाई कौन है सवाल सबसे बड़ी उलझन है। कीमत बढ़ कर सात करोड़ पचास लाख हो गई है करोड़पति बनाते बनाते लोग कंगाली में आटा गीला होने की चिंता करते हैं।



जुलाई 24, 2022

POST : 1588 माली की नज़र में प्यार नहीं ( फूल चमन में कैसा खिला ) डॉ लोक सेतिया

माली की नज़र में प्यार नहीं ( फूल चमन में कैसा खिला ) डॉ लोक सेतिया 

कल किसी की पोस्ट पढ़कर न जाने कितनी बातें अंतर्मन में उभरती रहीं । कुछ अजीब बात या किसी की सिमित दायरे की समझ की बात है । लिखा था जो माता पिता अपनी संतान के परीक्षा में बढ़िया प्रदर्शन पर गौरव और ख़ुशी जताते हुए पोस्ट लिखते हैं उनको पढ़कर कम अंक पाने वाले बच्चे हीनभावना का शिकार हो जाते हैं । ये समझने का सही ढंग नहीं है लेकिन उनकी बात को अनदेखा नहीं कर सही पक्ष सामने रखना ज़रूरी है । विस्तार से इसकी चर्चा करते हैं । माता पिता भाई बहन दादा दादी एवं दोस्त रिश्तेदार पीठ थपथपाते हैं तो बढ़ावा देते हैं और महनत करने सफलता अर्जित करने को । समस्या उनको लेकर है जिनकी आदत होती है अपनी संतान की तुलना अन्य किसी से कर उस में हीनभावना पैदा करने की । उनको अपने बच्चे को समझना चाहिए और उसकी प्रतिभा को जानकार उनको जिस कार्य में रूचि है उसी क्षेत्र में शिक्षा अथवा कार्य करने को प्रोत्साहन देना चाहिए । जब अपने ही परिवार के सदस्य किसी से तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करते हैं तब ठीक वैसा होता है जैसे कोई छोटा सा पौधा किसी बंजर ज़मीन पर उग आया हो जहां बाड़ बनकर खेत की रखवाली वाला बागबां उस को मसलता कुचलता है । कोई नहीं जानता ऐसा अनचाहा पौधा कैसे खुद को बचाए रखता है हर दिन कोई पैरों तले कुचलता है कोई जानवर खा जाता है लेकिन वो फिर फिर उगता रहता है । अनचाहा बनकर जीना कितनी बार मरना होता है । 
 
जीवन में सब किसी की मर्ज़ी से नहीं होता है और खुश होकर जीने का आनंद लेना चाहते हैं तो जो मिलना संभव नहीं उसकी चिंता छोड़ कर जो हासिल है उसकी कीमत और अहमियत समझनी चाहिए । अजीब बात है जिस से मनचहा सभी कुछ पाना चाहते हैं उसी को गरियाते लताड़ते रहते हैं । नफ़रत तिरिस्कार ज़हर की तरह होते हैं जीवन को फलने फूलने नहीं देते हैं । प्यार भरे शब्द अपनेपन का व्यवहार नई ऊर्जा नए साहस का संचार करते हैं । आप धन वैभव ताकत भौतिक सुविधाओं से आपसी रिश्तों में मिठास और भरोसा नहीं जगा सकते हैं साधन मिलने से वास्तविक संतोष और खुशी नहीं मिलती है । कस्तूरी मृग की तरह भीतर के एहसास को समझे बगैर हम मृगतृष्णा के पीछे भागते भागते बिना जिए मर जाते हैं । शायद हमारी अनावश्यक कामनाओं अधिक और सब कुछ आसानी से पाने की आरज़ू ने भीतर के अमृतकलश के प्यार को सुखा दिया है । सब चाहते हैं उनको प्यार अपनापन मिले मगर खुद बांटते नहीं प्यार दुनिया में , हर किसी से टकराव अहंकार नीचा दिखाने की भावना ने आपसी सद्भाव और पारस्परिक मेल मिलाप को बर्बाद कर दिया है । संबंध औपचरिकता निभाने को सोशल मीडिया फेसबुक व्हाट्सएप्प पर बधाई शुभकानाएं अभिवादन तक रह गए हैं । दोस्ती रिश्ते नाते जब कारोबारी नज़र से दिखाई देते , बनते-बिगड़ते हैं तब उनका हासिल कुछ भी नहीं रहता है । ढाई आखर प्यार वाले पढ़ना पढ़ाना छोड़ दिया है । चमकती हर चीज़ सोना नहीं होती है । अनमोल हीरे की परख नहीं पत्थर को जाने क्या समझने लगे हैं समंदर किनारे सीपियां मिलती हैं मोती गहराई में जाकर तलाश करने पड़ते हैं । नाम शोहरत पाने और अपने को सबसे बड़ा या ऊंचा साबित करने की कोशिश ने छोटा बना दिया है नैतिक गिरने को ऊपर उठना नहीं कहते हैं । अपने किरदार को सच के दर्पण  में देखना कठिन है दुनिया पर उंगली उठाना सब जानते हैं ।
 
 

जुलाई 20, 2022

POST : 1587 ज़ालिम को फ़रिश्ता कहना है ( व्यंग्य-कहानी ) डॉ लोक सेतिया

 ज़ालिम को फ़रिश्ता कहना है ( व्यंग्य-कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

    घोषणा करता हूं ये वास्तविक कहानी है कोई कपोल कल्पना नहीं ,  अक्सर फ़िल्म वाले अलग ढंग से बताते हैं , ये काल्पनिक कथा है किसी से सरोकार नहीं घटना का । वास्तव में असली बात सच को झूठ से मिला कर पेश करते हैं अभिनय करने वाले लोगों का नाम तौर तरीका पहनावा सब किसी किरदार से मिलता जुलता है । दर्शक वही समझते हैं जो निर्देशक चाहता है समझाना , यहां नाम चेहरे नहीं मिलते लेकिन किरदार असली हैं हमारी वास्तविक दुनिया वाले । बात की शुरुआत करते हैं आधुनिक युग की असलियत को जानते समझते हुए कि शराफत ईमानदारी सच्चाई आत्मा की आवाज़ नैतिक मूल्य बड़े आदर्श आजकल बेकार की बातें समझी जाती हैं किताबी और उपदेश देने को अमल करने को हर्गिज़ नहीं । इस कहानी को इक निर्माता-निर्देशक की तलाश है ।
 
  शोर ही शोर है चहुंओर है चोर नहीं है चौकीदार है ज़रा मुंहज़ोर है । मनमौजी है शाही लिबास है दुनिया भर में वही सबसे ख़ास है । सिंघासन पर बैठा अंधेरा है रौशनी उसी के पास है । उसका बड़ा नाम है , ऊंचा सबसे दाम है , दुनिया सब बेनाम है , जाने कौन गुमनाम है अनजान है , फिर भी निराली शान है। लंगड़ा उसका घोड़ा है दौड़ा दौड़ा दौड़ा है जिसके हाथ में लाठी है भैंस उसी की हो जाती है । सब कुछ जिसने तोड़ा है साबुत कुछ नहीं छोड़ा है उसका बड़ा कमाल है बेचा घर का सारा माल है उसका शौक निराला है तन गोरा है मन काला है । तिजोरी का रखवाला है खुल जा सिम सिम का ताला है अलीबाबा चालीस चोर है हिजाब है न कोई नकाब है बेहिसाब सब हिसाब है । उसका बही-खाता है जो मसीहा उसको बताता है मनचाही मुराद पाता है । घर फूंक तमाशा देखने वाला इस कहानी पर फिल्म बना सकता है पटकथा तैयार है ये सिर्फ इक छोटा सा दृश्य है जैसे इक इश्तिहार है ।
 
कहानी का नायक मसीहा कहलाता है ज़ुल्म भी करता है तो लोग आह नहीं भरते वाह-वाह करते हैं । ग़ज़ल पेश है :-

रंक भी राजा भी तेरे शहर में ( ग़ज़ल ) 

डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

रंक भी राजा भी तेरे शहर में
मैं कहूं यह  बात तो किस बहर में।

नाव तूफां से जो टकराती रही
वो किनारे जा के डूबी लहर में।

ज़ालिमों के हाथ में इंसाफ है
रोक रोने पर भी है अब कहर में।

मर के भी देते हैं सब उसको दुआ
जाने कैसा है मज़ा उस ज़हर में।
 
मत कभी सिक्कों में तोलो प्यार को 
जान हाज़िर मांगने को महर में। 
 
अब समझ आया हुई जब शाम है 
जान लेते काश सब कुछ सहर में। 
 
एक सच्चा दोस्त "तनहा" चाहता 
मिल सका कोई नहीं इस दहर में।
 
 
 

 



 

जुलाई 16, 2022

POST : 1586 ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ ( अजब-ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया

  ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ ( अजब-ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया 

उसको लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है वहां चोर लुटेरे ठग अपराधी गुंडे बदमाश शान से बैठते हैं ये राजनीतिक दलों की मज़बूरी है सत्ता पाने को दूसरा कोई रास्ता नहीं दिखाई देता। धनबल बाहुबल झूठ धोखा फरेब कपट सब करना पड़ता है जनता को उल्लू बनाने की खातिर अन्यथा नेताओं की मंशा उनकी सत्ता हासिल कर मनमानी करने की हवस की वास्तविकता मालूम हो तो ज़मानत ज़ब्त हो जाये। लेकिन बड़ी बदनामी होती है जब रिश्वत भ्रष्टाचार घोटाले और बहुमत के दम पर तानाशाही करने को देश समाज की भलाई साबित किया जाता है और कुछ निडर लोग विपक्ष वाले या बिना बिके मीडिया वाले झूठ को झूठ बताने की बात करते हैं । उस तथाकथित मंदिर में भले जैसा भी व्यक्ति सुशोभित होता है उसको आदरणीय माननीय कहना होता है उनको लेकर असभ्य शब्द उपयोग नहीं किये जाने चाहिएं। अब चाहे उनका किरदार कैसा हो उनकी सोच कितनी घटिया हो और उनको सही गलत की कोई समझ नहीं हो और उनको अपनी ज़ुबान पर बोलते समय लगाम लगाना नहीं आता हो नासमझ बच्चों की तरह शरारत करना उनकी आदत हो उनको अनुशासन सिखाना ज़रूरी है। घर की भीतर की बात बाहर नहीं जानी चाहिए आपस में टकराव का असली कारण देश की जनता को पता नहीं लगने देना है और विश्व भर में सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाने का क्या लाभ जब ये सब को समझ आने लगे कि यहां लठ तंत्र लूट तंत्र और झूठ का बोलबाला है । सत्यमेव जयते लिखा हुआ है मगर सत्य से किसी को कोई मतलब नहीं है। 
 
फ़िल्मी नायक जिनकी आदत होती है डायलॉग बोलने की और सिनेमा पर अपनी ताकत और शक्ति दिखाकर दर्शकों की तालियां बटोरने की उन से भाषण सभाओं में नर्म मुलायम शब्दों का उपयोग करने की आपेक्षा करना व्यर्थ है। टीवी फिल्म से लेकर न्याय-व्यवस्था स्थापित करने वाले सभी अंगों में नियुक्त लोग लाठी डंडे और ज़ोर ज़बरदस्ती सब करने को जायज़ समझते हैं यहां तक कि सत्ताधारी शासक के अनुचित गैर कानूनी आदेश का पालन करते हर देश और संविधान की भावना नागरिक आज़ादी और विचारों को अभिव्यक्त करने के मौलिक अधिकार तक की अवेहलना करते हैं । ऐसे खतरनाक भयानक वातावरण को छोड़ शब्दों के बोलने पर रोक लगाने की चिंता करना ऐसा है जैसे भीतर जिस्म सड़ा गला हो सभी अंग बेकार हों लेकिन उसके बहरी पहनावे की सुंदरता और बुझे हुए चेहरे के पीलापन उदासी निराशा को ढकने को सजाने की कोशिश की जाए। 
 
शराबखाने में शराब पीने की छूट हो मगर होश की बात करने की शर्त हो , किसी जिस्म फ़रोशी के बाज़ार में गंदा धंधा करने की आज़ादी हो पर वहां गाली गलोच की भाषा पर ऐतराज़ हो । अजब ग़ज़ब है घर गली दफ़्तर से टीवी सीरियल सिनेमा तक शराफत की तहज़ीब की धज्जियां उड़ाना खराब नहीं है बस उन सभी बातों को छुपाए रखना अनिवार्य हो । कल चमन था आज इक सहरा हुआ , देखते ही देखते ये क्या हुआ।
मुझ को बर्बादी का कोई ग़म नहीं , ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ। 
 



 

जुलाई 14, 2022

POST : 1585 सात्विक भाषा के शब्द का शब्दकोश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   सात्विक भाषा के शब्द का शब्दकोश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

वहां कोई अपराधी कोई झूठा कोई रिश्वतखोर निर्वाचित होकर नहीं बैठ सके ये करना संभव नहीं है स्वीकार कर लिया गया है । लेकिन भरी सभा में झूठ भ्रष्टाचार जैसे शब्द उपयोग नहीं किए जाएं ऐसा करना मुमकिन हो सकता है उन शब्दों पर प्रतिबंध लगा सकते हैं । किसी नियम बनाने से सभी को ईमानदार बनाया नहीं जा सकता तो क्या हुआ बेईमानी करने वाले को बेईमान नहीं कहा जाए ये नियम लागू किया जा सकता है । मगर चिंता नहीं करें नेताओं को सत्ताधारी या विपक्ष वालों को भाषण देते समय अपशब्द बोलने से लेकर गोली मारो सालों को से हिंसा और नफरत फ़ैलाने की छूट रहेगी । कल तक जो सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी पर ब्यान दे रहे थे कि टीवी पर किसी शासक दल के प्रवक्ता को अपने ब्यान की क्षमा मांगनी चाहिए उनको इस बदलाव पर खामोश रहना उचित होगा । सभ्यता मर्यादा शिष्टाचार का पालन सिर्फ एक जगह होना चाहिए अथवा हमेशा हर जगह ऐसे सवालों के जवाब खोजने लगे तो कितने सवाल खड़े हो सकते हैं । कोई जांच आयोग कितने साल तक शोध करेगा तब सामने आएगा पिछले इतने सालों में किस किस ने कितनी बार ऐसे असभ्य शब्दों का उपयोग किया है । कोई शरीफ़ शराफ़त से चर्चा करता शायद ढूंढना कठिन लगे हर किसी ने कोई न कोई शब्द कभी न कभी उच्चारित किया होगा चोर को चोर क़ातिल को क़ातिल घोटाला करने वाले को हिस्सा लेने वाला पाए जाने पर अथवा आरोप लगाने को । जब किसी को ऐसा कहना खुद अपराध समझा जाएगा तब जुर्म हुआ होगा मुजरिम सामने होगा फिर भी आरोप लगाना नियम का उलंघन होगा। समस्या गंभीर है इसलिए भाषा विभाग को असभ्य आचरण करने वालों की गरिमा का ध्यान रखते हुए शब्दकोश में प्रतिबंधित शब्दों की जगह पर्यायवाची सात्विक शब्द घड़ने होंगे क्योंकि पुराने शब्द खरे साबित नहीं हुए हैं। 
 
अभी शुरुआत हुई है धीरे धीरे किताबों से कहानियों से ऐतहासिक दस्तावेज़ों से जाने किस किस जगह से संशोधन कर सब फिर से लिखना पढ़ना पढ़ाना होगा । लगता है हमको अभी तक उलटी पढ़ाई पढ़वाते रहे हैं अब सब सीधा करना होगा । जसपाल भट्टी जी नहीं हैं अन्यथा उनकी तमाम बातें उल्टा-पुल्टा होती थी उनकी बोलती बंद हो जाती या ऐसा भी संबव है सरकारी शिक्षा विभाग उन्हीं से नया शब्दकोश बनवाने का अनुबंध करना चाहता । हिंदी भाषा के जानकार विशेषज्ञ पीएचडी वालों को अवसर का उपयोग कर कोई आधुनिक शब्दकोश बनाने का कार्य कर गाली गलोच की जगह आदर सूचक शब्द सुझाने का कार्य शीघ्र करना ज़रूरी होगा।



POST : 1584 अल्फ़ाज़ किस को पेश करें ( मुश्किल बड़ी है ) डॉ लोक सेतिया

   अल्फ़ाज़ किस को पेश करें ( मुश्किल बड़ी है ) डॉ लोक सेतिया 

अल्फ़ाज़ एहसास से भरे होते हैं खोखले शब्द निरर्थक होते हैं जिनका कोई मसलब नहीं होता है । मेरी किताबें मुझे जान से अधिक प्यारी हैं ज़िंदगी भर की महनत का नतीजा है । कभी कभी महसूस हुआ है कोई ख़फ़ा ख़फ़ा सा है बात कोई नहीं उसको लगता है मैंने अपनी किताब उसको भेंट नहीं की । उसे पढ़ने में कोई रूचि नहीं है मैं जानता हूं उसको ये फज़ूल की बात लगती है उसको फुर्सत ही नहीं जाने कितने काम हैं उसके लिए ज़रूरी पैसे का कारोबार सबसे महत्वपूर्ण है । धार्मिक सामजिक संस्थाओं से जुड़ना नाम शोहरत सबसे जान पहचान बढ़ाना उसको विचारधारा की नहीं शान ओ शौकत की बात लगती है । जाने कितनी किताबें उसने अलमारी जैसे शोकेस में सजा रखी हैं दिखाने को कभी खोल कर पढ़ी नहीं लेकिन सब जानता है का भाव हमेशा रहता है । जिनको लेकर मुझे लगता है साहित्य से अनुराग है किताबों से लगाव है उनको किताब भेंट की है मगर जब किसी के बारे पता है उनको किताब पढ़ना समय की बर्बादी लगता है उनको किताब देना किताब का निरादर करना लगता है ।
 
सालों पहले किसी के पास इक लेखक की पुस्तक देखी थी और पूछा कैसी लगी आपको , सुनकर हैरान हुआ था उनका दोस्त है उपहार में नहीं बाकायदा कीमत लेकर दे गया है । सौ रूपये निकालो मांग कर किताब थमा गया है उन्होंने उनकी किताब मुझे दे दी थी ऐसा कह कर कि उनके लिए ये किसी काम की नहीं रद्दी की टोकरी में फैंकनी होगी किसी दिन । लोग मुझे जानते हैं खरी खरी बात पसंद हैं इसलिए बतला देते हैं । इक बार उनकी रद्दी की टोकरी से शहर के सबसे बड़े अधिकारी की काव्य रचनाएं उठा लाया था उनके बताने पर कि उन का कर्मचारी प्रेस-नोट के साथ दे गया है । इक शिक्षक जो निजि विद्यालय चलाते हैं राजनेता भी समझे जाते हैं मिलने आये अपने दल की चुनावी पत्रिका भेंट करने मुझे सच पता चला खुद उन्होंने पढ़ा नहीं था उस में क्या लिखा है । मैंने पढ़ कर ब्लॉग पर लिखा था खूबसूरत कवर और बढ़िया कागज़ अच्छी छपाई है मगर झूठ का पुलिंदा है तथ्य और वास्तविकता से कोई नाता नहीं क्या चुनावी घोषणापत्र ऐसे होते हैं जिसको पढ़ना किसी काम का नहीं कभी निभाए नहीं जाते जो उन वादों की बात होती है । खैर उन्होंने बताया उनको सिर्फ वही किताबें पढ़ना पसंद है जो आर्थिक फायदे की होती हैं , उनको स्कूल की पढ़ाई की किताबें भी पढ़ने की फुर्सत नहीं मिलती है बच्चों को शिक्षा देने को अध्यापक नियुक्त कर रखे हैं वेतन पर। 
 
ख़ास नाम वाले लोग नेता लोग अधिकारी और उच्च पद पर आसीन लोग सभाओं में मुख्य अतिथि बनकर भाषण देते हैं साहित्य को लेकर समझ नहीं रखते कभी । जाने माने लेखकों की शानदार बातें रटी हुई दोहराते हैं बिना सोचे भी कि उनका विषय से कोई संबंध है भी या नहीं । लेकिन इस बात को जान कर भी कई लिखने वाले उनको अपनी किताब भेंट करते हुए फोटो लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं । कई बार कोई लेखक किसी बड़े साहित्यकार होने का रुतबा पाये व्यक्ति को किताब भेंट कर देता है जिस की रचनाएं कितनी गहराई लिए हों वो खोलते तक नहीं सोचते हैं नवोदित रचनाकार की लिखी कहां उच्च स्तर की होंगी । वास्तव में खुद को बुलंदी पर पाने वाले अन्य को छोटा देखते हैं जैसे पहाड़ पर खड़ा आदमी नीचे के लोगों को कीड़े मकोड़े जैसा देखता है जबकि नीचे से खुद और बौना लगता है पहाड़ पर खड़ा हुआ । शोहरत की बुलंदी हमेशा कायम नहीं रहती है । 
 
आधुनिक लोग पढ़ाई लिखाई समझने ज्ञान पाने को नहीं नौकरी पैसा आमदनी और जीवन में भौतिक सुख सुविधाओं को हासिल करने को करते हैं ।  उच्च आदर्श और नैतिकता सच्चाई अच्छाई जैसे मापदंड रहे नहीं हैं और धन दौलत से आदर सम्मान को आंका जाता है । वास्तव में अच्छे साहित्य की ज़रूरत आज पहले से अधिक है भटके हुए समाज को राह दिखलाने को अंधकार मिटाने रौशनी लाने को । समस्या गंभीर है हमारे गांव में कहावत है आप बैल को तालाब पर ले जा सकते हैं मगर प्यास नहीं है तो पानी नहीं पिला सकते हैं , छी-छी कहते रहने से बैल पानी नहीं पीता है । पाठक में पढ़ने की प्यास नहीं तो किताब पास होने से कोई फायदा नहीं है । विडंबना है लोग जिन महान पुस्तकों ग्रंथों की उपदेशों की बातें करते हैं उनकी पूजा अर्चना करते हैं अध्यन नहीं करते , उपहार में बांटते हैं ऐसी किताबों को । संविधान की रट लगाने वाले संविधान को पढ़ते समझते नहीं अनुपालन क्या करेंगे । शिक्षित समाज सभ्य तभी हो सकता है जब उसको शब्दों का अर्थ भी मालूम हो । अपने अल्फ़ाज़ व्यर्थ बर्बाद नहीं करें सोच समझ कर पेश करें। गागर में सागर भरने की तरह संक्षेप में इतना कहा है ।

जुलाई 06, 2022

POST : 1583 सिर्फ उसी दोस्त के नाम कताबें ( मकसद ) डॉ लोक सेतिया

   सिर्फ उसी दोस्त के नाम कताबें ( मकसद ) डॉ लोक सेतिया 

   ये सवाल इक न इक दिन सामने आना लाज़मी था , मुझे जो भी कहना है इस ज़ालिम ज़माने से नहीं कहना है । किसी को फुर्सत कहां मेरी दास्तां मेरी बात मेरी ज़िंदगी के एहसास दिल के जज़्बात को समझने की । बचपन से जवानी की तरफ बढ़ती उम्र का खूबसूरत ख़्वाब था बस एक दोस्त की तलाश जो मेरा अपना हो पूरी तरह से जीवन भर को । नाम पता मालूम नहीं जाने किस गांव नगर बस्ती गली में रहता हो । पब्लिशर को नहीं समझ आती मेरी मन की बात क्योंकि कारोबार की घाटे मुनाफ़े की बात नहीं है और सामान्य पाठक वर्ग को साहित्य कविता ग़ज़ल कहानी व्यंग्य काल्पनिक रचनाएं लगती हैं या किसी की नाम शोहरत दौलत पाने की चाहत । लेकिन मुझे इनकी ज़रूरत नहीं है , जीवन भर प्यास रही है कोई एक अपना हो जिस को ज़िंदगी की दास्तां सुननी हो मुझे सुनानी भी हो । फिल्म आनंद के बाबुमोशाय या तलाश फिल्म की नायिका की तरह हंस परदेसी के आकर मिलने की आरज़ू । कभी किसी दिन मेरी कोई किताब पढ़कर शायद उसको मेरी ही तरह से ख़्वाब को हक़ीक़त बनाने की तरकीब समझ आ जाए और हम मिल जाएं तब सार्थक होगा मेरा लिखना।