अगस्त 11, 2018

POST : 868 रूह भटक रही है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        रूह भटक रही है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

       सब उसकी तस्वीर के सामने हाथ जोड़ फूल चढ़ा रहे हैं।  अफ़सोस जता रहे हैं। भगवान इसकी आत्मा को शांति दे कह रहे हैं। आत्मा तड़प रही है ये क्या माजरा है ये कैसा तमाशा है। जीते जी कोई साथ नहीं था अकेले ज़िंदगी का सफर तय किया और आज इतनी भीड़ लगी है। कितनों के तो नाम तक याद नहीं हैं शायद पहचान नहीं रही , कभी बात ही नहीं की जो आज रिश्ते नाते निभाने को फल फूल भी लेकर आये हैं। मांगने पर कांटें भी उधार नहीं देते यही। शोक सभा हो रही है मगर शोक नदारद है , ये आंसू ये रोना धोना आज किस काम का। मुझे रुलाते भी थे रोने भी नहीं देते थे , खुश रहो कहते भले थे खुश रहने देते नहीं थे। ख़ुशी देख कर जलते रहे और आज खुश हैं मगर दुखी बने हुए हैं। मंच पर जो लोग भली भली बातें कर रहे उनकी निगाह भी सामने जमाराशि पर है , और कह रहे हैं माया साथ नहीं जाती मोह माया को छोड़ दो। मरना सच है जीना झूठ बात तो ठीक है बस जो समझा रहा खुद उसी को समझ नहीं आती। ये सब नहीं जानते रूह सब देख रही है और समझ रही है , बेचैन हो रही है और चाहती है ये सब बंद हो। भगवान से यही तो कहा था जो मेरे अपने हैं उनका हाल बता दो तो भगवान इस जगह लेकर आये , मगर खुद नहीं रुके इक पल को भी बाहर दरवाज़े पर छोड़ कर चले गये। भगवान नहीं देख पाते ये सब , झूठी और दिखावे की विनती खुदा इस आत्मा को शांति देना स्वर्ग देना। मन में तो कुछ और है , कोई सोचता है ज़रूर नर्क गयी होगी इसकी आत्मा। कोई सोचता है यकीन ही नहीं होता ज़िंदा नहीं है कहां आसानी से मरते हैं ऐसे लोग। भगवान के साथ भी छल कपट होता है भरी सभा में। भगवान नहीं समझ सके ये सब किस मकसद से किया जाता है , मरने के बाद बहुत कुछ जीते जी कुछ भी नहीं। 
 
                 क्या क्या बातें नहीं कर रहे लोग। इधर उधर की बेकार की भी और अपने अपने काम की भी। समय सब को लग रहा ठहर गया है घड़ी चलती नहीं जैसे धीमी चल रही है थककर रुकना चाहती है। जितनी चाबी भरी उतनी चलती है अब सैल खत्म होने को , सांस चलने की तरह। बस यही इक घड़ी ही वास्तव में शोक जता रही है। कोई मरने वाले को याद नहीं कर रहा सभी और ही बात कर रहे हैं। सब को बोरियत हो रही है रूह तक को लगता है कब जाऊं इस जगह से , भगवान आओ मुझे यहां से कहीं दूर ले जाओ। एक घंटा इतना लंबा तो कभी नहीं लगता था हर सेकंड लगता है इक सदी के समान है। इतनी लंबी आयु थी अब समझ आया आत्मा को शरीर से निकल कर। लोग सोच रहे हैं जो तय समय था दस मिंट ऊपर हो गये है , इनको आज वक़्त की पाबंदी की बात समझ आई है जो कभी किसी के वक़्त की कदर नहीं करते हैं। गप्पबाज़ी में क्या स्मार्ट फोन पर सोशल मीडिया पर व्यर्थ समय बिताने वाले ऐसे दिखा रहे हैं जैसे उनका इक इक लम्हा किसी विशेष कार्य को होता है। सभा का अंत हुआ तो सबको चैन आया मगर रूह को अभी भी नहीं मिला चैन। लोग कतार लगाकर अफ़सोस जताने नहीं अपना चेहरा दिखाने आये हैं किसे जिसे देख भी नहीं सकते उसको छोड़ बाकी सबको। अब जाने की जल्दी नहीं है आपस में मिलना जुलना बातें करना खूब शोर है और पूरा माहौल बदल गया है। हंस रहे हैं सब कुछ है बस शोक ही नहीं है मगर है शोकसभा ही की जगह। इतना अधिक शोर है कि रूह घबरा रही है भगवान मुझे यहां से ले जाओ गुहार लगा रही है। हलवा मिल रहा खुशबू लुभा रही है रूह सकपका रही है। गाड़ी बुला रही है सीटी बजा रही है ,  चलना ही ज़िंदगी है चलती ही जा रही है। देखो वो आ रही है देखो वो जा रही है। आते हैं लोग जाते हैं लोग पानी के जैसे रेले , जाने के बाद आते हैं याद गुज़रे हुए वो मेले। यादें मिटा रही है यादें बना रही है। 
 

 


अगस्त 10, 2018

POST : 867 भीख भिखारी और भिक्षा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       भीख भिखारी और भिक्षा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      भीख की महिमा , भिखारी सारी दुनिया , मोबाइल वाले भिखारी , भिक्षा सरचार्ज , ये सभी मेरी 2003 में लिखी और छप चुकी रचनाएं हैं । आज की रचना उसी विषय पर है मगर नई लिख रहा हूं पुरानी याद आ रही हैं । सरकार अगर पुरानी योजनाओं को नाम बदल चला सकती है तो थोड़ा अधिकार मुझे भी मिल सकता है पिछली बातों को दोहराने का । शुरुआत जनाब जाँनिसार अख़्तर जी की इक ग़ज़ल से की जाये तो कैसा हो । पहले उनकी ग़ज़ल का आखिरी शेर लिखता रहा हूं आज मुक़्क़मल ग़ज़ल पेश है :-
 

ज़िन्दगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो ,  कुछ न कुछ हमने तेरा क़र्ज़ उतारा ही न हो । 

 

कूए-क़ातिल की बड़ी धूम है चल कर देखें ,  क्या खबर कूच-ए-दिलबर से प्यारा ही न हो । 

 

        ( कूए-क़ातिल = क़ातिल की गली )
 

दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी ,  चौंक उठता हूँ कहीं तूने पुकारा ही न हो । 

 

कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर ,  सोचता हूँ तेरे आँचल का किनारा ही न हो । 

 

शर्म आती है कि उस शहर में हैं हम कि जहाँ ,  न मिले भीख तो लाखों का गुज़ारा ही न हो । 

 

        शर्म उनको मगर नहीं आती । दिल्ली की बात है कल ही उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है अब दिल्ली में भीख मांगना अपराध नहीं होगा । शायर ने ये बात लगता है बॉम्बे को जो अब मुंबई है सोच कर कही होगी । मगर शायरी की खासियत यही है सभी जगह हाल वही मिलता है । एक लाख लोग बताये जा रहे हैं जो बेबसी में देश की राजधानी में भीख मांगकर गुज़ारा करते हैं । सरकार को चिंता है मुमकिन है जो बात 15 साल पहले इक मज़ाक लगती थी आज सच हो जाये । हुआ यूं कि इक अख़बार में एक भिखारी को मोबाइल फोन पर बात करते दिखाती तस्वीर छपी थी और तब भी शाइनिंग इंडिया की धूम थी । तब भी कोई आईएएस अधिकारी सत्येंद्र दुबे कत्ल किया गया था सच बोलने की खातिर , भ्र्ष्टाचार की बात पी एम ओ को लिखने के बाद । परसों फिर कुछ लोग राफेल की बात पर सच समझना चाहते थे । आपको लगेगा ये किधर की बात किधर जा रही है , मगर नहीं ये भी भीख की ही बात है । 
 
सरकार जनता को अधिकार भी खैरात की तरह देती है मगर अपने खास लोगों को भागीदार बनाकर करोड़ों रक्षा सौदे में उपहार की तरह देती है । ये जो बिक चुके हैं टीवी चैनल वाले अख़बार मीडिया वाले विज्ञापन की भीख पर जीते हैं । तेज़ चलने की बात कहने को है अपाहिज हैं बिना सरकारी बैसाखियों के दो कदम भी नहीं चलते हैं । बिक गये हैं बेचते हैं खबरें भी और झूठ को सच का लेबल लगाकर भी , खबर के साथ साथ किसी की फोटो देख समझना खरीदार वही है और उसी का सब बिकता है ये तो बिचौलिए दुकानदार हैं । टीवी अख़बार वालों को राजनीति को छोड़ देश की कोई खबर खबर नहीं लगती , मोबाइल हाथ में देकर फोटो लिया और खबर बन गई । आजकल भी देश की वास्तविकता को दरकिनार कर वायरल विडिओ की बातें करते हैं । सरकार भी आजकल सब स्मार्ट फोन या ऐप्स पर करती है तो मुमकिन है भिखारियों को भी आधार कार्ड और ऐप्स से जोड़ा जाये । भीख भिक्षा और भिखारी शोध का विषय हैं । 
आओ भीख की महिमा सुनते हैं । 

           ये बात सभी धर्म के ग्रंथ एक समान कहते हैं कि जिसके पास धन दौलत , सुख सुविधा सब कुछ है मगर उसको तब भी और अधिक पाने की लालसा रहती है वो सब से दरिद्र है । आप जिनको बहुत महान समझते हैं वे भी क्या ऐसे ही नहीं हैं । उनको अपने काम से सब मिलता है , नाम - पैसा - शोहरत , फिर भी उनकी दौलत की हवस है कि मिटती ही नहीं । विज्ञापन देने का काम करते हैं , पीतल को सोना बताते हैं , अपनी पैसे की हवस पूरी करने को । हम तब भी उनको भगवान बता रहे हैं । ईश्वर तो सब को सब कुछ देता है , कभी मांगता नहीं , उसको कुछ भी नहीं चाहिये ।  इन कलयुगी भगवानों को जितना भी मिल जाये इनको थोड़ा लगता है । ये जब समाज सेवा भी किया करते हैं तो खुद अपनी जेब से कौड़ी ख़र्च नहीं किया करते , यहां भी इनके चाहने वाले उल्लू बनते हैं । उल्लू मत बनाना कह कर खुद उल्लू सीधा कर लेते हैं अपना । देश के नेता हों या प्रशासन के अधिकारी ये सारे भी इसी कतार में शामिल हैं । देश की गरीब जनता इनकी दाता है और ये लाखों करोड़ों की संपत्ति पास होने के बाद भी उसके भिखारी । ये लोग भीख भी मांग कर नहीं मिले तो छीन कर ले लिया करते हैं , इनको भीख पाकर भी देने वाले को दुआ देना नहीं आता । हर भिखारी मानता है कि भीख लेना उसके हक है , भीख लेकर ख़ाने में उनको कोई शर्म नहीं आती । वेतन जितना भी हो रिश्वत की भीख बिना उनका पेट भरता ही नहीं । ये भीख मज़बूरी में पेट की आग बुझाने को नहीं लेते , कोठी कार , फार्म हाउस बनाने को लेते हैं । ये जो भीख लेते हैं उसको भीख न कह कर कुछ और नाम दे देते हैं ।

            भीख भी हर किसी को नहीं मिला करती , उसी को मिलती है जिसे भीख मांगने का हुनर आता हो । ये गुर जिसने भी सीख लिया वो कहीं भी चला जाये अपना जुगाड़ कर ही लेता है । भीख और भ्र्ष्टाचार दोनों की समान राशि है , बताते हैं कि रिश्वत की शुरुआत ऐसे ही हुई थी । पहले पहले अफ्सर - बाबू किसी का कोई काम करने के बाद ईनाम मांगा करते थे , धीरे धीरे ये उनकी आदत बन गई और वह काम करने से पहले दाम तय करने लगे जो बाद में छीन कर लिया जाने पर भ्र्ष्टाचार कहलाने लगा । आज देश में सब से बड़ा कारोबार यही है , तमाम बड़े लोग किसी न किसी रूप में भीख पा रहे हैं ।  जिनको हम समझते हैं देश के सब से अमीर लोग हैं उनको भी सरकारी सबसिडी की भीख चहिये नहीं तो वो रहीस रह नहीं सकते । आजकल भीख मांगने वाले भी सम्मान के पात्र समझे जाते हैं , जिसे देखो वही इस धंधे में शामिल होना चाहता है । भीख नोटों की ही नहीं होती , वोटों की भी मांगी जाती है , वोट जनता का एकमात्र अधिकार है वो भी नेता खैरात में देने को कहते हैं , वोट पाने के हकदार बन कर नहीं । कई साल से देश की सरकार तक समर्थन की भीख से ही चल रही है । देश की मलिक जनता को जीने की बुनियादी सुविधाओं की भी भीख मांगनी पड़ रही है , मगर नेता-अफ्सर सभी को नहीं देते , अपनों अपनों को देना पसंद करते हैं । अफ्सर मंत्री से मलाईदार पोस्टिंग की भीख मांगता है तो मंत्री जी मुख्य मंत्री जी से विभाग की । हर राज्य का मुख्य मंत्री केंद्र की सरकार के सामने कटोरा लिये खड़ा रहता है । राजनीति और प्रशासन जिंदा ही भीख के लेन देन पर है । विश्व बैंक और आई एम एफ के सामने कितनी सरकारें भिखारी बन ख़ड़ी रहती हैं । इनको भीख किसी दूसरे नाम से मिलती है जो देखने में भीख नहीं लगती । मगर जिस तरह गिड़गिड़ा कर ये भीख मांगते हैं उस से सड़क के भिखारी तक शर्मसार हो जाएं । सच तो ये है कि सड़क वाले भिखारी भीख अधिकार से और शान से मांगते हैं , उनको पता है लोग भीख अपने स्वार्थ के लिये देते हैं , बदले में पुण्य मिलेगा ये सोच कर । बड़े बड़े शहरों में रोक लगा दी गई थी , सड़क पर भीख मांगने पर , जो पुलिस वाले खुद सड़क पर खड़े होकर भीख लिया करते वो  जुर्माना करते थे  उन पर जो भीख दे रहा होता है ।  भिखारी पर नहीं होता जुर्माना । मतलब यही है कि भीख मांगना नहीं देना अपराध है । देश की तमाम जनता इस कानून के कटघरे में खड़ी नज़र आती है , इस युग में किसी पर दया करना कोई छोटा अपराध नहीं है ।

        दाता एक राम है भिखारी सारी दुनिया । धर्म की दुकानों पर भीख को दान कहते हैं गरीब लोग उपदेश सुनते हैं जितना है उसी में खुश रहो अपने गुरु जी से जो खुद कतनी आमदनी कितने डेरे कितने हर शहर में सतसंग घर बनवाता जाता है बदले में दो रूपये का बिस्कुट का पैकेट एक रूपये में खरीद कर खुश हो जाता है । ये सस्ता माल जो कंपनी बेचती है कभी घाटे में नहीं रहती । दान की और भीख की महिमा का सार यही है कि कई गुणा वापस मिलता है , भीख देने वाले को दुआओं की ज़रूरत होती है । आखिर में इक राज़ की बात बताता हूं । हम लोग स्वर्ग नर्क की चिंता करते मर जाएंगे मगर जब कभी ऊपर पहुंचेंगे तो समझेंगे सच क्या है । भगवान ने सब को जी हां सभी को एक ही जगह एक साथ एक समान रखा हुआ है । वहां न कोई जन्नत है न कोई दोखज है , न कोई अपना अपना धर्म ही है । ये सब इसी धरती पर खुद इंसानों ने बनाया हुआ है । अब आपकी मर्ज़ी है चाहो नर्क में रहो या स्वर्ग का आनंद लो ।  लूटने वाले मज़े लूट रहे हैं और हम मूर्ख लोग मंदिर मस्जिद के झगड़े में नर्क भोग रहे हैं । भगवान को हमारी सहायता की ज़रूरत नहीं है , भगवान को नहीं खतरा किसी और को है ।  भगवान को पहचान लोगे तो शैतान का खेल खत्म हो जायेगा , शैतान कोई और नहीं है खुद हमारे भीतर छुपा बैठा है ।  आपको याद है बनवास में भी माता सीता जी के पास रावण भिक्षा मांगने आया था , जंगल में खुद कंद मूल खाते थे मगर दर पर आये को भीख देनी ज़रूरी थी । राम जी पत्नी की बात मानते थे इसलिए सोने का हिरण लाने चले गये थे । अनादिकाल से भिक्षा भिक्षुक की कथाएं चली आ रही हैं । भीख देने को अब आयकर विभाग नियम बना सकता है । नकद कितनी और कितनी भीख आयकर मुक्त और भीख देने पर कितनी छूट । इक घटना याद आई ।

              इक दुकानदार का हिसाब किताब सही मिला आयकर अधिकारी हैरान हुए । उनसे कहा सेठ जी सुबह से छापे डालने में लगे मिला नहीं कुछ भी । भूख लगी है आप खाना ही मंगवा कर खिला देते ।  सेठ जी बोले क्यों नहीं ऐसा तो पुण्य का काम है । पांच सौ रूपये तब बड़ी रकम थी , नौकर को देकर सभी अधिकारियों  के लिए होटल से अच्छा खाना लाने को कहा । नौकर के जाने के बाद मुनीम जी ने पूछा सेठ जी ये पांच सौ किस खाते में लिखने हैं । सेठ जी ने बताया खर्च खाते में डाल दो और लिख देना भिखारियों को खाना खिलाया । आयकर विभाग वालों को ठीक से समझ आ गया कि हिसाब बिल्कुल ठीक कैसे है ।

  Raja aur Bhikhari ki Katha || राजा और भिखारी की कथा || आर्यावर्त की कहानियां


अगस्त 09, 2018

POST : 866 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग 11 - डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग-11   

                                           डॉ लोक सेतिया 

    आज रात की कहानी पहले ही सुना देते हैं। आपको अकारण उलझन में क्यों रखना। उसके बाद चर्चा होगी कि किस मोड़ पर कहानी पर चर्चा करने वाले क्या क्या अभिमत ज़ाहिर कर रहे थे। अधिकतर सवाल गैर ज़रूरी होते हैं और दर्शाते हैं कि हम हर किसी की ज़िंदगी में दखल देने को उतावले बैठे हैं। पति पत्नी और छोटा सा बच्चा है परिवार में पति नौकरी करता है मगर अपना घर और अन्य ज़रूरतों को समझ पत्नी से भी नौकरी करने को कहता है। बच्चा छोटा है मगर उसके लिए देखभाल को रखा जा सकता है किसी को वेतन देकर और यही किया जाता है और कोई समस्या नहीं आती सब डर बेकार साबित होते हैं। मगर पत्नी को पति के दफ्तर में ही नौकरी मिलती है और जिस का डर होता है , उन पति पत्नी को नहीं बाकी लोगों को , वही होता है। पत्नी को तरक्की मिलती है और वो पति की बॉस बन जाती है। लोग फिर डर जताते हैं अब शादी का टिकना मुश्किल है मगर सब सामान्य रहता है। आखिर में जब पत्नी को ऊपर से निर्देश मिलता है अपने आधीन कर्मचारी पति को नौकरी से हटाने को तब लगता है जैसे अभी आसमान टूटने को है। मगर ऐसा कुछ भी नहीं होता है और जब घर आकर पत्नी खुद भी नौकरी छोड़ने की बात करती है तो पति उसको मना ही नहीं करता है बल्कि जो कोई भी अपेक्षा नहीं कर रहा था वो कहता है। शायद ऐसा होता नहीं होगा अक्सर मगर होना ऐसा ही चाहिए। हर कहानी की सार्थक इसी में है कि वो मार्गदर्शन करे राह दिखलाये। पति कहता है मुझे भी शुरू में तुम प्रतिद्विंदी लगी मगर फिर समझ गया कि तुम मुझसे काबिल और मेहनती हो और तरक्की की हकदार भी। तुमने मुझे नौकरी से निकला क्योंकि तुम्हें करना पड़ा अपने पद और अपने ऊपर के अधिकारी के आदेश का पालन करने को। घर में हम पति पत्नी हैं अब बॉस और कर्मचारी नहीं रहे ये अच्छा है तुम इक दुविधा से बच सकोगी। रही मेरी बात तो मैं चार पांच साल घर पर बच्चे की देख रेख करूंगा और तुम काम करोगी। जब बच्चा बड़ा हो जायेगा मैं कहीं भी नौकरी कर लूंगा शायद तुम ही मुझे फिर से रख लो क्योंकि तब तक तुम सीईओ बन जाओ शायद।  कितनी सरल सी बात है अगर समझ आ जाये तो। कोई टकराव कोई मतभेद नहीं हुआ जिसका अंदेशा बाहरी लोगों को था। वास्तविक जीवन में ऐसा अगर नहीं होता तो उसका कारण लोगों का औरों की ज़िंदगी में अनावश्यक दखल देना है। 

                                  चर्चा समाज की मानसिकता की

   स्टुडिओ में बैठे और टीवी पर देखने वाले क्या विचार रख रहे थे। पत्नी पति के घर के लिए ही तो कमा रही है , क्यों उसका अपना घर नहीं है अपनी ज़रूरत नहीं है। जो पति भी कभी आपसी मतभेद में बातों में ये कहते हैं कि मैं आप सभी के लिए ही तो कमाता हूं उनको भी मालूम होना चाहिए घर पर पत्नी भी सभी के लिए काम करती है क्या कभी कहती है उपकार करती हूं , अगर कहती है तो अनुचित है। हैरानी की बात है इक्कीसवीं सदी में पढ़ लिखकर भी हम महिला पुरुष में समानता की बात नहीं करते और ये औरत का काम है ये आदमी का ये समझते हैं। जबकि कोई काम नहीं जो आज महिला नहीं करती है और कोई काम नहीं जो पुरुष भी महिलाओं की तरह नहीं कर सकते। अभी भी हमारी सोच को विकसित होना है और बदलना है। 
 

 

POST : 865 जिएं तो जिएं कैसे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

         जिएं तो जिएं कैसे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

      जीने को कुछ बातें ज़रूरी हैं । महात्मा विदुर बताते हैं , स्वास्थ्य तन मन , अपनी आमदनी से गुज़र बसर करना , निडर होकर रहना , अपने देश में रहना । सुखी जीवन को यही चार बातें ज़रूरी हैं । दो और बातें भी साथ हों तो सोने पर सुहागा , अच्छा परिवार विशेषकर जीवन साथी और आज्ञाकारी संतान , सबसे आखिर में सबसे महत्वपूर्ण अच्छे और सच्चे लोगों से मेल जोल रखना । थोड़ा ध्यान से पढ़ना क्या इस से बढ़कर कुछ होता है । मगर अधिकतर आजकल केवल तन के स्वास्थ्य और धन की बहुलता पर सब केंद्रित हैं । मगर सच तो ये है कि धन ही सब से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है और हैरानी की बात है कि जितना अधिक धन उतनी अधिक समस्याएं भी बढ़ती जाती हैं । तन मन को रोगी बनाकर धन हासिल करते हैं फिर उस धन से तन मन को निरोग करने को जतन करते हैं । बाहरी ख़ुशी है सब के पास दिखाने को भीतर से सब चिंता डर परेशानी में अपने ही जाल में फंसे हैं । वो कहानी आज भी सच है हाऊ मच लैंड ए मैन नीड्स , आदमी को कितनी ज़मीन चाहिए , जी नहीं दो गज़ भी नहीं मिली कुए यार में बादशाह बहादुर शाह ज़फर तक को । सबक सीखने को बहुत हैं सीखता कौन है । दार्शनिकता की नहीं केवल स्वस्थ्य की ही बात करते हैं आज अन्यथा विषय से भटक सकते हैं जिस तरह उपदेशक बात को कहीं से कहीं ले जाते हैं मगर बात अर्थहीन हो जाती है लोग सुनते हैं तो सुनने को ही । चलो स्वस्थ्य जीवन की बात करते हैं ।

           मन स्वस्थ्य होना आवश्यक है और उसे विचार से चिंतन मनन से और अध्यन से ही किया जा सकता है । मंदिर मस्जिद जाने से भी नहीं , बल्कि मंदिर मस्जिद जाते हैं मन की स्वछता के बगैर तो जाकर कुछ भी नहीं मिलता है । तन की चिंता रहती है , स्वस्थ्य रहने को केवल व्यायाम योग काफी नहीं हैं , योग तो सभी आयु में और अधकचरे ज्ञान से और भी गलत है जो आजकल होने लगा है । सैर की अहमियत सब जानते हैं मगर सैर करने का भी तरीका होता है । अच्छे वातावरण में चुप चाप और मौसम के अनुसार सुविधजनक कपड़े पहन कर सैर की जानी चाहिए । अधिकतर लोग सही ढंग से ये भी नहीं करते हैं । आपको दिल की बिमारी मधुमेह या मोटापा और जोड़ों के दर्द ही रोग लगते हैं जिनसे बचना चाहते हैं । खान पान और जीवन शैली से गुर्दा जिगर और कैंसर तक दबे पांव किसे कब जकड़ लेते हैं कोई नहीं जान पाता है  । सब से बड़ी मूर्खता हम नियमित स्वास्थ्य की जांच नहीं करवाते और यथासंभव अच्छे क्वालिफाइड डॉक्टर से बचते हैं क्योंकि वो भी अब आपके स्वास्थ्य से अधिक अपने आर्थिक हित को ध्यान रखते हैं और अनावश्यक जांच आदि और दवाएं लिखते हैं जिनसे ज़रूरत नहीं होने पर नुकसान भी होते हैं । ईमानदारी का अभाव हर जगह है , नेता अधिकारी शिक्षक व्यौपारी सब अपने कमाई किसी भी तरह अधिक करने को अनुचित धन अपनाते हैं । क्या ये काम खतरनाक रोग नहीं है जो देश समाज को बर्बाद कर रहा है । अपने स्वार्थ में अंधे होकर हम कितने अमानवीय कार्य करते हैं । कहने को बड़े बड़े अस्पताल हैं मगर वास्तविक सुविधा और प्रशिक्षित लोग कम होते हैं । कभी नीम हकीम खतरा ऐ जान कहते थे आजकल नीम हकीम भी फल फूल रहे हैं और हम खुद जाते हैं उनके पास कितनी बार सरकारी विभाग छापे मारता है और झोला छाप कुछ दिन बाद लोगों की ज़िंदगी से खिलवाड़ करता दिखता है । बड़े बड़े अस्पतालों में भी नर्सिंग होम में यही और ढंग से होता है । आपके पास बचने को कोई तरीका नहीं है क्योंकि सरकार को अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं और अच्छी शिक्षा की कोई चिंता नहीं है ।

        हवा में ज़हर , हर चीज़ में मिलावट और आयुर्वेद या देसी चिकित्स्या के नाम पर केवल साबुन शैम्पू गोरे रंग की क्रीम और वज़न बढ़ाने कम करने के धंधे आपको और गुमराह कर रहे हैं । कम लोग जानते हैं कोई समस्या हो तो क्या करें किस के पास जाएं । दो चीज़ें ज़रूरी है , पहली हमारी शिक्षा में जीवन की वास्तविक कठिनाइयों की जानकारी शामिल करना और दूसरी आपके पास कोई एक सही चिकित्स्क सलाहकार होना फॅमिली डॉक्टर की तरह जो आपको कुछ फीस लेकर सही मार्गदर्शन दे सकता हो । मगर इक कटु सत्य ये है कि हम ऐसी बेहद मूल्यवान राय की कदर नहीं करते और मुफ्त में मिली सलाह से भटकते रहते हैं बिना ये जाने कि जिसने आपको बिना फीस लिए किसी के पास भेजा है उसका इस में अपना स्वार्थ भी होता है । सब से ज़रूरी है अपनी तंदरुस्ती की कीमत समझना जो बेहद कीमती है । हमारी देश की राज्यों की सरकारों ने शिक्षा स्वस्थ्व सेवा और साफ पीने का पानी तक उपलब्ध करवाना अपना कर्तव्य नहीं समझ इनसे किनारा कर लिया है जिस से अधिकांश जनता को बुनियादी सुविधाएं मिलना असंभव हो गया है । कम से कम इतना तो सामजिक फ़र्ज़ हर सरकार को सभी नागरिकों के लिए निभाना अनिवार्य होना चाहिए । इस में कोई भेदभाव करना संविधान की भावना के अनुरूप नहीं होगा जैसे कुछ विशेष निम्न वर्ग के लिए घोषित किया जाता है । 
 

 

अगस्त 06, 2018

POST : 864 जिन्हें लेना ही आता है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        जिन्हें लेना ही आता है  ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

           माफ़ करें आज का विषय महिला पुरुष की समानता की बात पर नहीं है इसलिए उस नज़रिये से मत पढ़िये । पत्नी को भी सरकार भी कहते हैं तो बिना कारण तो नहीं ऐसा हुआ कि घर की सरकार वही है । उन्हीं का शासन चलता भी है , आपकी पत्नी की भी राय यही होगी कि भाभी जी जो इशारा करती हैं भाई साहब वही कहते हैं करते भी हैं और सोचते समझते भी हैं । मगर इस सब के बाद भी भाई साहब समझदार तो हैं बस बीवी को ही नहीं समझते हैं । लेकिन आपके लिए पत्नी की राय ये नहीं है , आप नासमझ भी हैं और बुद्धू भी आपको कितना समझाती है पत्नी समझते ही नहीं । बाबू समझो इशारे । थोड़ा दूसरे किरदार की बात भी हो जाये , सरकार गवर्नमेंट की , जनता को लेकर उसकी राय भी पत्नी जैसी ही है । मूर्ख लोग समझते ही नहीं कितना विकास किया है कितनी भाग दौड़ दिन रात करते हैं , गरीबी भूख कब की मिट चुकी है और हम खूब मज़े में हैं । आंकड़े जारी करते हैं इश्तिहार बंटवाते हैं विज्ञापनों पर करोड़ों रूपये खर्च करते है हर दिन फिर भी लोग हमारे भाषणों को झूठा बताते हैं । जिनको पता होता है वो एक के चार नहीं आजकल पचास हज़ार गुणा बढ़ जाते हैं , नहीं समझते जो हाथ मलते जाते हैं । आओ अब विषय पर आते हैं , नासमझ तो हैं हम खुद भी मगर आपको समझाते हैं । 
 
             सरकार की तिजोरी खाली होती है जब भी सरकार सत्ता में आती है । पहली चिंता हर नेता को यही सताती है । मगर सत्ता की देवी क्या क्या करामात दिखाती है , सरकार घाटे में भी खुद अपने खज़ाने को लुटवाती है । सरकार है क्या दरवाज़े पर बंधा खड़ा शान दिखलाने वाला सफेद हाथी है । सफ़ेद हाथी की कीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू , चुटकी भर सिंदूर की बात कब किसको समझ आती है । सरकार कैसे कैसे जनता से कर वसूल करती जाती है , किसी भूखे के पेट पर लात मरते बिल्कुल नहीं घबराती है । आप ही से लेकर सौ रूपये आपको दस रूपये देकर एहसान जतलाती है । खुद कितना हज़्म करती है तभी तो सरकार सरकार कहलाती है । सरकार आपका नहीं हर साल अपना बजट बनाती है , आपके लिए आफत लाती है फिर थोड़ी आफत कम कर देती है जो राहत बतलाती है । आपकी आमदनी पर आयकर विभाग की नज़र जाती है , जब आमदमी नहीं घाटा हो तब उसकी नज़र नज़र नहीं आती है । आय नहीं है तो भी क्यों नहीं है कई सवाल उठाती है । एक नहीं दो नहीं पचास रास्ते अपनाती है , चोर आपको साबित करती है खुद साहूकार  बन जाती है । मुसीबत आने पर कोई भी नहीं काम आती है । 
 
                  पत्नी भी यही सोचती है समझती है और समझाती है । आपकी कमाई उसी की ही बन जाती है । आपकी आमदनी पर अपना अधिकार जतलाती है मगर उसके पर्स की राशि उसी की बन जाती है । बदकिस्मती जब आपकी आती है आपकी पत्नी साहुकार भी बन जाती है , उधार देकर सरकार की तरह इतराती है । कितना दिया हिसाब लिखती जाती है , लिया भी था नहीं याद आती है । आपने जो दिया वो घर खर्च था वो जो दे रही है जमाखर्च है पाई पाई गिनवाती है । पत्नी से लिया क़र्ज़ कोई चुकता नहीं कर पाया है , सब उनकी माया है । पुरुष कितने भी समझदार हों पत्नी से अपना हिसाब कभी नहीं छुपा सकते हैं , राज़ की बात भी खुद ही बता कर फंसते हैं । आपकी कमाई कब सफेद से काली बन जाती है , महिलाओं की कमाई पर आयकर विभाग की भी नहीं नज़र जाती है । सरकार किसी की भी हो महिला जगत से घबराती है , उनकी बचत बचत ही समझी जाती है । नोटबंदी में उन पर कोई मुसीबत नहीं आती है , बहनों से सरकार डरती है , जानती है बिंदिया चमकती है चूड़ी खनकती है तो कितने सितम बरपाती है । संसद में मंत्री बनी बैठी खामोश हो जाती है जो महंगाई पर पहली सरकार को चूड़ियां भिजवाती है । आप उसको क्या भेज लोगे यही गुनगुनाती है , नाचती झूमती जाती है । अब समझो कोई भी सरकार महिला आरक्षण बिल क्यों नहीं पारित करवाती है , जितनी भी थोड़ी हों महिलाएं संसद में महिलाओं की गूंज साफ सुनी जाती है । जिस दिन एक तिहाई संख्या महिलाओं की हो गई सब पुरुष सांसदों की बोलती बंद कराती है । किसे पता किस किस की पत्नी कैसे पर्दे के पीछे से सत्ता चलाती है । अंत नहीं है इस कथा का मगर बात कही नहीं समझी जाती है । सरकार से डर लगता है पत्नी भी डराती है ये दोनों नहीं किसी पर रहम खाती हैं ।  देश की सरकार घर की पत्नी दोनों ही प्यार जताती जिसने अपनाया उसी को सबक सिखाती है , मगर कोई भी मुसीबत खुद नहीं आती धूम धाम से लाई जाती है जोश में बनाई जाती है । पत्नी से सरकार से हारना मज़बूरी है । शक्ति ताकत से अहंकार उपजता है । 

aaj ka jeevan mantra If you get any power, then use it in good works,  misuse of power becomes the cause of destruction. | आज का जीवन मंत्र: अगर  कोई शक्ति मिले

अगस्त 04, 2018

POST : 863 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 10 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग -10 

                                     डॉ लोक सेतिया 

    3 अगस्त की कहानी सदियों पुरानी है , आधुनिक परिवेश में बदले रूप में। जुआ या सट्टा या फिर खेल की जीत हार पर शर्त से लेकर आदत कुछ भी हो सकती है। जब शुरुआत ही कोई दोस्त के साथ शर्त लगाकर लड़की को परपोज़ करने से होती है तो आगे अंजाम क्या होना था। किसी धर्म वालों को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता मगर सवाल तो आते हैं मन में चिंतन तो किया जाना उचित है। द्रोपती को दांव पर किसने लगाया धर्मराज से पहले उसका विवाह मछली की आंख में तीर लगाने वाले से करने की शर्त खुद पिता ही ने रखी थी। बेटी कोई गाय बकरी है जो किसी के हाथ दे सकते हैं। जनक जी को भी धनुष तोड़ने की शर्त रखने की क्या ज़रूरत थी। जो पंडित बतलाते हैं राम और सीता की कुंडली के 36 के 36 गुण मिलते थे उन्होंने कभी सोचना ही नहीं चाहा कि विवाह की शर्त से पहले क्या सभी स्वयंबर में आये युवकों की कुंडलियां मिलाई गई थी। खुद को जुए में दांव पर लगाने वाले पतियों को द्रोपती ने छोड़ नहीं दिया था तो प्यार में अंधी लड़की जो खुद ही पिता के समझाने के बावजूद जुआरी सट्टेबाज़ से शादी करती है भला खुद को दांव पर लगाने वाले पति को कैसे छोड़ देती। फिर जो उसको शादीशुदा होने के बावजूद भी पति से अलग करवाने को वही करता है जुए में दांव ही लगाता है दूसरे को खलनायक साबित करने को।  नायक कैसे हो सकता है। जब एक जैसे हैं तो पहले जिस से प्यार किया विवाह किया उसी को चुनना उचित ही था। कहानी में अंत में समझा जाता है अब उसको समझ आ गई है और वो आगे से जुआ सट्टा खेलना छोड़ देगा। वास्तविकता में ऐसा होता शायद ही देखते हैं। मैंने अपने आस पास कितने ही घर तबाह होते देखे हैं इसी कारण। मगर आप इस को सिर्फ जुए सट्टे और शेयर मार्किट की बात मत समझना। 
 
                     हम हर चुनाव में अपने वोट को इसी तरह दांव पर लगाते हैं। विचार करते हैं कैसा है क्या चाहता है। इतना धन क्यों खर्च करता है। हर बार सत्ता भले जिस किसी दल को मिलती है और जो भी दल सत्ता से वंचित रहता है उनकी जीत हार खेल की तरह है मगर जनता द्रोपती की तरह दांव पर लगाई जाती ही नहीं बल्कि हर बार हारती वही है जनता ही। वास्तव में जिसकी जीत होनी चाहिए वो खुद ही बिना सोचे समझे वरमाला डालती है जो जुए की तरह ही लड़ते हैं चुनाव। जीतने पर लाख गुणा और हारने पर जो लगाया गया पानी में , मगर उनकी कोई मेहनत की खून पसीने की कमाई नहीं होती है हम जानते हैं। जिस संसद में शायद सौ से अधिक आपराधिक कार्यों से संबंधित चुने हुए बैठे हों उस संसद से कानून व्यवस्था की समझने की उम्मीद रखना खुद को ठगना है। 
 
                                 लॉटरी पर रोक है मगर टीवी शो पर यही धंधा बड़े बड़े नाम वाले खेलते नहीं खिलाते हैं और खुद करोड़पति नहीं अरबपति बनते जाते हैं। आपको कितनी अच्छी अच्छी बातें समझाते हैं खुद पैसे की खातिर जो मर्ज़ी करते जाते हैं। आजकल ऐसे लोग आदर्श कहलाते हैं। मैं आज बेहद हैरान हुआ देख कर अख़बार के ऊपरी स्थान पर महान लोगों की जहां नैतिकता की मूल्यों की बातें छापते हैं इक आधुनिक सफल कारोबारी की कही बात लिखी थी " सब को अवसर समान मिलते हैं मगर जो अवसर का उपयोग करते हैं वो सफल होते हैं। " कौन सवाल करेगा क्या क्या हथकंडे नहीं अपनाते हैं। हर सत्ताधारी से मधुर संबंध बनाते हैं , बिना लाइसेंस लिए मोबाइल के बाज़ार में आते हैं और देश को चूना लगा सरकार से माफ़ करवाते हैं।  जनाब ईमानदारी की भाषा में ये अवसरवादी असल में चोर कहलाते हैं। चलो छोडो आदर्श की बातें आओ हम सब मिलकर गुनगुनाते हैं। गलती से मिस्टेक करने वाला गीत गाते हैं। क्या खूब है गुमराह करते हैं मार्गदर्शक कहलाते हैं। 
 

 

अगस्त 03, 2018

POST : 862 तेरी सुबह कह रही है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

             तेरी सुबह कह रही है  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 


     मैं गरीबों की बात करता हूं अमीरों के साथ करता हूं । तुम रात को दिन समझ लेना मैं दिन में रात करता हूं । मैं आफ़ताब हूं तुम प्यासी धरती हो धूप की मैं बरसात करता हूं । मुझसे सवाल कौन करे मैं सब से सवालात करता हूं । मेरी हर बात झूठी है मैं सच्ची बात करता हूं । हालात मुझसे डरते हैं खुद मैं ऐसे हालात करता हूं । सब मेरी बात करते हैं मैं खुद मन की बात करता हूं । मैं अपने को जनता ही नहीं इस तरह मुलाकात करता हूं । मैंने पाले हुए हैं मगरमच्छ कितने मछलियों को प्यार करता हूं । मैं मैं हूं मैं ही मैं हूं इस की ही बात करता हूं । किताबों से बैर रखता हूं शिक्षा की बात करता हूं । सपना मेरा जब से हुआ सच सपनों के महल में रहता हूं । महल वो किसी और का है हर किसी से कहता फिरता हूं । इस आलीशान महल को अपनी झौपड़ी है सबको कहता हूं । ताज बदलता नहीं कभी बस राज बदलता रहता हूं । अब रोज़ ख्वाब आता है कच्ची दीवार जैसा ढहता हूं । मुझे नींद अब नहीं आती सोते में ऐसा कहता हूं । मुझे हारना नहीं आता हारना भी है यही सच है सच है मैं हारने से डरता हूं । मेरे ख्वाब बहुत ऊंचे हैं मुझको खुदा कहलाता है खुदाई न छीन ले कोई जान जाती है बात से मुकरता हूं । मेरे पास ऐसा जादू है सम्मोहित सभी को करता हूं । फूटेगा या नहीं फूटेगा मेरा घड़ा भरता ही नहीं भरता हूं और भरता हूं । कितना सफर अभी बाकी है दिन रात सफर ही करता हूं ।

       तेरी सुबह कह रही है तेरी रात का फ़साना । हर मोड़ पर लिखा था कोई न इधर जाना , लेकिन अच्छी कोई हिदायत कोई भी नहीं माना । अब कौन किससे पूछे तुम आगे कितना पहुंचे , वो लोग सब पीछे रहे जिनको था साथ लाना । सब दर्द से कराह रहे हैं आह भरना भी मना है , देखना ज़रूरी है तेरा नाच गाना । खो गए हैं जनता के कहीं सवेरे , तेरी रौशनी ने बढ़ा दिए हैं कुछ और भी अंधेरे । साये भी हैं डराते हर शाम कांपती है हर राह डर है घेरे ।  मौसम है सुहाना जो लड़की गा रही है , बादलों को बुला रही है , बिजली भी गिरनी है दिल में सोचती है घबरा रही है । बंद दरवाज़ों को खोलता नहीं कोई कोई अजनबी अकेला और भीड़ आ रही है । भीड़ जुटी हुई तफरीह के लिए जो सामने आया उसी पर कहर ढा रही है । यहां किसी कवि की कविता याद आई है । हर कोई अपने झोले में अपना अपना सच लिए हुए है । भगत सिंह पाश सफदर हाशमी कितनी बार जन्म लेते कोई साथ नहीं चलता है , कलम तो कलम है अपने खून से लिखती है अपनी ही मौत का फरमान ।

         आज़ादी किसी बेबस महिला की तरह बंद है उनकी कैद में जो दावा करते हैं सुरक्षा देने का । झुकना नहीं जानते जो जो भी कट गए हैं , ये लोग कितने अजीब हैं ख़ामोशी से हर ज़ुल्म सह गए हैं । अब कोई नहीं गुनगुनाता उनके गीतों को जो खून बनकर रगों में बह रहे हैं । सरफ़रोशी की तमन्ना किसी के दिल में नहीं बाकी , बाज़ुए कातिल के हौसले बढ़ गए हैं । सब ने समझ लिया है आएगी नहीं सुबह कभी हर किसी के आंगन में , मीनार महलों के रौशनी को रोके हुए बढ़ते जा रहे हैं । दिन भी है रात जैसे और रातों को दिन हैं कहते , हवा चलाने दिया जलाने का दम भर रहे हैं । ये हद है आप को 1975 से 1977 का आपत्काल याद है और उस समय जो कैद रहे उनको पेंशन भी मिलने लगी चालीस साल बाद । जो उसी समय जेल में रहने से ही नेता ही नहीं राज्यों के मुख्यमंत्री तक बने उन्होंने क्या नहीं किया । मगर आज जो बिना आपात्काल घोषित किये डर दहशत ही नहीं बदले की भावना से विरोध की आवाज़ को दबाने को लगे हैं वो क्या है । अगर उसे काला अध्याय समझा जाता है तो ये भी कोई सुनहरी काल कदापि नहीं कहलायेगा ।
         
     
Famous 20 Sher On Fasana - Amar Ujala Kavya - आज का लफ़्ज़:जानें 'फ़साना'  का मतलब और शायरों के अशआर
 

अगस्त 02, 2018

POST : 861 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 9 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 9 

                                      डॉ लोक सेतिया 

     आज की कहानी पर चर्चा करना बेहद कठिन कार्य है। इस को समझने के लिए कुछ पुरानी कहानियों की बात की जाये तो शायद आसानी होगी। इक फिल्म में अशोक कुमार जो नायक से लेकर हास्य कलाकार और चरित्र अभिनेता तक तमाम तरह के किरदार निभा चुके हैं , एक डॉयलॉग बोलकर वो बात समझा देते हैं जो कहानी के सभी अभिनय करने वाले नहीं समझा पाते। " औरत की पवित्रता को शरीर के दो इंच हिस्से से नहीं आंका जा सकता है , उसके मन आत्मा की पावनता अधिक महत्व रखती है। " ये खेद की बात है हम आज भी अपनी मानसिकता को बदल पाये नहीं न ही बदलना चाहते हैं। धूल का फूल जैसी फिल्म भी और साधना जैसे फिल्म के रौंगटे खड़े करने वाले गीत का भी कोई असर हुआ नहीं। चलो ये दो गीत सुनते हैं। 
 

जिस समाज की दुहाई देते हैं उसी समाज के मुंह पर तमाचा है। और जो संतान नाजायज़ कहलाती है उसका क्या दोष होता है। मुजरिम वो पिता है जो बिन बियाही मां बनाता है किसी को। 


नहीं इतना काफी नहीं है। इक पंजाबी कहानी इस से भी अलग है। इक महिला को बच्चा पैदा होता है जो केवल उसी को  जानकारी होती है कि न लड़का है न ही लड़की। मगर वो इस राज़ को छुपाये रखती है कितनी मुश्किल से कोई नहीं समझ सकता। सब से छुपाकर नहलाने से कपड़े बदलने और दोस्तों के साथ खेलने तक इसका ध्यान रखना कि कोई नहीं जान सके। सामाजिक विवशता से उसकी शादी भी करनी पड़ती है , बेटा पति धर्म निभाने में सक्षम नहीं है इसलिए जिसको बहु बनाकर लायी उसके साथ किसी और से संबंध स्थापित करवा संतान भी पैदा करवा लेती है। बच्चा नहीं समझता क्यों कोई दूसरा आदमी उसकी मां से मिलने आता है। जब जिसको पिता समझता रहा उसकी मौत होती है तब उसकी लाश को नहलाते समय समझता है कि वो पिता बन ही नहीं सकता था। 
 
      बहुत घटनाएं जीवन में होती हैं जिनका पता किसी को नहीं होता सिवा उस के जिसके साथ घटा कुछ भी। इक पति पत्नी बच्चा गोद लेते हैं बिना किसी को बताये मगर बड़े होने पर पढ़ लिख जाने के बाद भी जब उन्हें मालूम होता है कि हम इनकी नहीं किसी और की संतान हैं जो पालन पोषण नहीं कर सकते थे और उन की भलाई और भविष्य के लिए किसी और को सौंप दिया था। किसी को पूरी जानकारी और हालात की वास्तविकता को समझे बिना अपराधी मान लेना गुनाह है मगर हम सभी ऐसा करते हैं। हर किसी को लेकर कोई धारणा बनाते ही नहीं उन पर थोपते भी हैं। विडंबना की बात ये भी है कि हम अपनी गलती मानते भी नहीं और किसी तरह जान भी लें कि हमने गलत समझा तो कोई खेद व्यक्त नहीं करते हैं। 
 
        आज की कहानी यही थी। डीएनए टेस्ट से पता चलता है कि मेरा पिता वास्तविक पिता नहीं है और मां को दोषी समझ कुछ दिन बाद घर छोड़ जाने लगता है। जो वास्तविकता सामने आती है खुद उसी को शर्मसार करने वाली होती है। किसी नाबालिग लड़की से सामूहिक बलात्कार के बाद जो उस लड़की को निर्दोष समझ विवाह ही नहीं करता बल्कि उस हादिसे के कारण जन्म लेने वाले बच्चे को भी बेटा ही मनाकर प्यार लाड दुलार से बड़ा करता है उसी को बीमारी की हालत में छोड़ कर जाने लगता है तब असलियत पता चलती है और उसका मन साफ हो जाता है। मगर तब तक जो दर्शक स्टुडिओ में बड़ी बड़ी बातें कर रहे थे अब किसी को खेद भी नहीं है कि हम कौन हैं किसी महिला पर लांछन लगाने वाले। दुःख इस बात का है चाहे कितनी कहानियां कविताएं नज़्में ग़ज़लें लिखी जाएं और लोगों को अच्छी भी लगें तब भी उनकी हमारी सोच बदलती नहीं है कभी। सवाल वहीं का वहीं खड़ा है सदियों से।

अगस्त 01, 2018

POST : 860 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 8 डॉ लोक सेतिया

 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 8 

                                            डॉ लोक सेतिया 

        आज पहली अगस्त की कहानी। शायद हर कोई जीवन की गुज़री वास्तविकता को फिर से दोहराने से बचता है। लिखने वाले भी अपनी आत्मकथा लिखते मुमकिन हैं कुछ बातें छुपा लेते हों अथवा उनको अपनी सुविधा से दिखा सकते हैं। आज जब कहानी की शुरुआत भी नहीं हुई थी केवल इतना एंकर ने बताया कि ये कहानी दोस्ती पर है तो मुझे जाने क्यों लगा शायद इस में किसी तरह से मेरी बात हो सकती है। और कुछ कुछ मेरे जीवन से मिलती जुलती कहानी ही थी आज की। हालांकि बिल्कुल अलग ढंग से और शायद दूसरे दृष्टिकोण से भी। आज शायद मुझमें साहस है अपनी बात सभी पढ़ने वालों को बताने का। मगर पहले आज की टीवी शो की कहानी की बात। 
शुरुआत होती ही दो दोस्तों की दोस्ती से है। भरोसे प्यार विश्वास और इक अटूट बंधन। मुझे ओशो की दोस्ती की परिभाषा हमेशा पसंद रही है। 
 
  आपसी बात में इक दोस्त दूसरे को पूछने पर बताता है कि उसे कोई लड़की पसंद थी और दो साल तक उसका पीछा किया मगर उसने इनकार कर दिया था। और वो दोस्त राय देता है कि उस लड़की के घर के सदस्यों से मिलकर बात करनी चाहिए। इनकार तो पहले ही मिल चुका है इस से बुरा क्या हो सकता है। मगर तभी दोस्त किसी पुराने दोस्त की दोस्ती की बात बेहद नफरत से बताता है कि कभी ये मेरा सब से अच्छा दोस्त रहा है मगर उसने दोस्ती के साथ विश्वासघात किया है और मेरी बहन को लेकर भाग कर उससे शादी कर ली थी। ये जानने के बाद दोस्त के घर जाने पर उसी लड़की से सामना होता है जिसकी बात दोस्त को बता चुका होता है और समझता है फिर से उसी तरह मैं भी अपने दोस्त की बहन से प्यार की बात करूंगा तो वो शायद सह नहीं सकेगा और सोच लेता है दोस्ती को खोना नहीं है। कोई दूसरा सोच सकता है कि उसने तो पहले ही बता दिया था किसी लड़की से प्यार की बात तो अब ये क्यों नहीं बता देता कि वो लड़की तुम्हारी बहन ही है। लड़की खुद भी कहती है मैं भी आपको पसंद करती हूं मगर फिर इस तरह मिलने की उम्मीद नहीं थी। और दोस्त की बहन की सगाई हो जाती है खुद शामिल रहता है उस में। लेकिन शादी से दो दिन पहले लड़की उस के साथ भागने की बात करती है और इतना ही नहीं उसकी मां को भी पता चलता है तो वो भी उनके विवाह की बात से सहमत हो जाती है। मगर वो उनकी बात नहीं मानता है और दोस्ती की लाज रखता है। मुझे यही उम्मीद थी क्योंकि या तो जैसे ही लड़की को पता चला था कि जिसको चाहती है भाई का दोस्त है तो तभी भाई और मां को अपनी बात बता देती और उसके बाद जो होता मंज़ूर करती। मगर तब खामोश रहकर बाद में ऐसे समय बताना तो और बड़ा आघात होता भाई पर भी दोस्ती पर भी। मैं मानता हूं कि किसी से प्यार होना कोई शर्त नहीं है विवाह भी उसी से हो सके। बहुत कारण होते हैं और तब निर्णय सोच समझ कर लेने उचित होते हैं , कितने आधुनिक समाज में रहते हों कुछ सामाजिक बंधन निभाने अच्छी बात है। ज़रा इक फ़िल्मी उदाहरण से इक गीत से समझते हैं।


छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए , ये ज़रूरी नहीं आदमी के लिए। 

प्यार से भी ज़रूरी कई काम हैं , प्यार सब कुछ नहीं ज़िंदगी के लिए। 

तन से तन का मिलन हो न पाया तो क्या , मन से मन का मिलन कोई कम तो नहीं। 

खुशबू आती रहे दूर ही से सही , सामने हो चमन कोई कम तो नहीं। 

चांद मिलता नहीं सब को संसार में , है दिया ही बाहर रौशनी के लिए। 

अब अपने जीवन की वास्तविकता , दो बातें हुई। पहली बात मेरे पिता जी के इक दोस्त के घर आना जाना था और उनकी बेटी से मिला करता था। मन में भावना रहती थी बहन की तरह की है। मुझे नहीं खबर थी पिता जी ने अपने दोस्त से रिश्ते की बात कब की थी। मुझे जब बताया गया तो मैं इस रिश्ते को मंज़ूर नहीं कर सका और इस बात पर हम बाप बेटे में मतभेद सामने आये। मुझे मनाने की हर कोशिश नाकाम रही। अब इक और इत्तेफ़ाक़ होना था , मेरे बचपन के इक दोस्त ने अपनी बहन से मेरे रिश्ते की बात की तो पिता जी ने मुझे या किसी भी और सदस्य को बताना उचित नहीं समझा , शायद मेरे पहले संबंध से इनकार की बात से उनको लगा ये भी वही बात है। मगर वास्तव में मैं कभी अपने दोस्त की बहन से मिला ही नहीं था उनको देखा भी नहीं था। शायद इत्तेफाक की बात है कि उस दोस्त से मेरा पत्राचार होता रहता था और मुझे उसका पत्र मिला जिस में इशारे से रिश्ते की बात मेरे पिता से की और निर्णय मुझ पर है ऐसा उसे बताया गया लिखा हुआ था। गांव आने पर बात की तो मेरे पिता जी के बड़े भाई ताया जी मुझे साथ लेकर दोस्त के घर मिलने चले आये और बिना लड़की को देखे ही रिश्ता पक्का कर दिया। हम पति पत्नी हैं और सब ठीक है , मगर यहां हमारा कोई पहले जान पहचान और दोस्त की बहन का नाता नहीं था। इसलिए वो सवाल खड़ा ही नहीं हो सकता था , जबकि पिता जी के दोस्त की बेटी से मिलता रहा था परिवारिक संबंध समझ कर। आज की कहानी को अंत लेखक ने सभी दर्शकों की पसंद का भले नहीं किया हो , मुझे बेहद अच्छा लगा। दोस्ती मेरी नज़र में बाकी हर रिश्ते से बढ़कर अहमियत रखती है।

POST : 859 हम देखेंगे मगर कब देखेंगे ( हम क्या क्या भूल गये हैं ) डॉ लोक सेतिया

        हम देखेंगे मगर कब देखेंगे ( हम क्या क्या भूल गये हैं ) 

                                              डॉ लोक सेतिया 

   वो इक गीत नहीं था जो हम भूल गए हैं। कोई कहानी नहीं थी इक ध्येय था संकल्प था मकसद था। हम देखेंगे इक दिन ज़रूर हम देखेंगे। जब ज़ुल्म सितम करने वाले महनतकश लोगों की जमात की आंधी से उसी तरह उड़ जाएंगे जैसे तेज़ हवा में रूई के फाहे उड़ते हैं। दबे कुचले लोग मनसद पर बिठाये जाएंगे , सब ताज़ उछाले जाएंगे सब तख्त गिराए जायेंगे। ये जो बुत खुदा बनकर अपनी इबादत कराते हैं उन सभी को बाहर निकाल उनकी जगह वास्तविक हकदार मज़दूर किसान और देश को अपने हाथों से बनाने वालों को आदर देकर उनको छत दी जाएगी। ऐसे कितने गीत हैं जो दिलों में आग सुलगाते थे कुछ कर गुज़रने के  जज़्बात पैदा किया करते थे , केवल गीत नहीं थे इक ख्वाब का जिसकी ताबीर सामने लानी थी। हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकल के इस देश को रखना मेरे बच्चो संभल के। जिन शायरों की ग़ज़ल सुनकर हम तालियां बजाते हैं उनका मकसद तालियां बजवाना हर्गिज़ नहीं था। कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए , कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए। ये क्यों हुआ और होता आया हो रहा है , एक ज़ालिम था जो कुल बस्ती का पानी पी गया। ये कौन हैं जो विचार को कत्ल करने का फरमान जारी करते हैं खुलेआम। 
 
             बुद्धिमानों , जिस बांस की पोर ने , सीने में छेद करवा , प्रेम गीत छूने वाली , बांसुरी बनना,  था , वह बन न जाये , दस्ता कुल्हाड़ी का। कवि का नाम बताने से क्या होगा , उसकी बात सच है आज सच की बात लिखने वाले सत्ता की कुल्हाड़ी में दस्ता ही बने हैं , पेड़ का दर्द यही है कुल्हाड़ी में लगा दस्ता उसका अपना है लकड़ी का बना हुआ। दूसरों के घर लगी आग को , बसंत कहने वालो , दावानल तो दावानल है , जिसमें घिरे हो तुम भी। कवि की बात कविता की आग थी हमने बुझाया है कई चिरागों को , सबूत हैं मेरे घर में अंधेरों के ये धब्बे , कभी यहां उजालों ने ख़ुदकुशी की है। हमने कवि को फूल अर्पित कर समझ लिया क़र्ज़ अदा हो गया। उस का संदेश कब किसी तक पहुंचा अभी। सुनो उसकी आवाज़ को , साथ चलने को खुद आना चाहता है। पर ये तो बताओ तुमने अंधेरा चीर कर जाना है , या अंधेरे की ओर ही जाना है। कोई नहीं बोला कुछ भी सब को अंधेरे की ओर ही जाना था जा रहे हैं। दुष्यंत कुमार हो या नीरज या कोई पंजाबी कवि रेणु सभी का दर्द वही था। सत्ता और धनवानों ने कविता ग़ज़ल को अदबी महफ़िल से निकाल कोठे पर बिठा दिया है और किसी नाचने वाली की तरह घुंघरू की ताल पर नाच नाच उन्हीं का दिल बहला रहे हैं जो नाम शोहरत इनाम पुरुस्कार से खरीद कर उनको अपने मनोरंजन को लाये हैं। चंद सिक्कों को डालकर गुलाम बना उनकी आवाज़ के दर्द का लुत्फ़ उठाते हैं। 
 
                        मैं तो यही सोचकर घबरा जाता हूं कि हम चले कहां से थे और आ पहुंचे कहां हैं। मैं भी गुनहगार हूं , क्योंकि कवि कहता रहा , विद्रोह का अर्थ नहीं होता , सब कुछ सहज आसान सा। शब्द गुस्साते , देते चुनौती , हमें अर्थ दो , हमें अर्थ दो। मुझे जाना था सुकरात से मिलने , अब मैं खड़ा हुन , अपने सत्य के समक्ष , हो रहे हैं सवाल जवाब , कैसे मिटेगा अज्ञानता का अंधकार। यह कौन है , किसने , लटका दिया है , बीच चौराहे , सरे आम। मैं , स्वयं ही तो हूं , नित्य , आईना दिखलाता था , कहता था कानों में निरंतर , मेरी भी सुन , मेरी भी सुन। सब और कवियों शायरों की रचनाओं के बाद आखिर में मेरी अपनी भी रचनाएं शामिल करता हूं।

बेचैनी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया


पढ़ कर रोज़ खबर कोई ,
मन फिर हो जाता है उदास।

कब अन्याय का होगा अंत ,
न्याय की होगी पूरी आस।

कब ये थमेंगी गर्म हवाएं ,
आएगा जाने कब मधुमास।

कब होंगे सब लोग समान ,
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास।

चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें ,
फिर वो न आए हमारे पास।

सरकारों को बदल देखा ,
हमको न कोई आई रास।

जिसपर भी विश्वास किया ,
उसने ही तोड़ा है विश्वास।

बन गए चोरों और ठगों के ,
सत्ता के गलियारे दास।

कैसी आई ये आज़ादी ,
जनता काट रही बनवास।

इक दिन  ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सब से पहले आपकी बारी ,
हम न लिखेंगे राग दरबारी। 

और ही कुछ है आपका रुतबा ,
अपनी तो है बेकसों से यारी। 

लोगों के इल्ज़ाम हैं झूठे ,
आंकड़े कहते हैं सरकारी। 

होते सच काश आपके दावे ,
देखती सच खुद नज़रें हमारी। 

माना आज न सुनता है कोई ,
गूंजेगी इक दिन आवाज़ हमारी।

जुलाई 31, 2018

POST : 858 आकाश पर भारत क्लब ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     आकाश पर भारत क्लब ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

                   आपको पता ही है हम भारतवासी देश में इक दूसरे को नहीं जानते समझते और लड़ते झगड़ते रहते हैं।  मगर जैसे ही भारतवासी किसी और देश की धरती पर जाते हैं भारतीयता जाग उठती है और हम कोई संगठन संस्था अथवा मनोरंजन को क्लब बना लेते हैं। विदेश में हमारी बात हम ही समझते हैं , चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है सुनकर आंखे भर आती हैं दो पल को मगर देश वापस आने की भूल नहीं करते। देशवासियों के लिए हमारा प्यार विदेशी धरती पर ही पनपता है , अपने देश की आबोहवा देश में मुहब्बत पनपने के अनुकूल नहीं है। राजनेताओं और धर्म वालों ने नफरतों की आंधियां जो चला रखी हैं। इस भुमिका से आपको समझ आ गया होगा देश से बाहर हम भारतवासी एक हो जाते हैं मिल बैठते हैं। सब विरोध नफरत की बातें भुलाकर साथ साथ नाचते गाते झूमते हैं।
 
                                    बिल्कुल यही बात है , भारत से ऊपर जाकर सभी महान आत्माएं एक साथ हैं। आज उनकी सभा में चलते हैं और देखते हैं कौन क्या क्या बात करता है। गांधी जी गोड़से को प्यार से कहते हैं भूल जाओ उस घटना को। मैंने माफ़ ही नहीं किया बल्कि याद तक नहीं जो हुआ। कितनी बार हमने चर्चा की है कोई मतभेद है ही नहीं बीच में। नेहरू जी पटेल जी से कह रहे हैं आपको उनकी बात पर गौर नहीं करना चाहिए , उन्हें नहीं मालूम हम कभी अलग नहीं थे। विरोधी होने का मतलब ही नहीं हम तो एक दूसरे के पूरक थे इक दूजे बिन अधूरे थे। सत्ता की चाहत कब थी हम लोगों में किसी को भी , इक कांटों का ताज था हमारे सरों पर कर्तव्य और ज़िम्मेदारियों का। बड़ा छोटा कोई किसी को नहीं मानता था। भक्त सिंह जी आकर खड़े सुन रहे थे सब बातें। बोले हम सब जो चाहते थे उसकी बात कोई नहीं करता है और हमारे नाम पर दुश्मनी की आग फैला कर दलगत स्वार्थों की गंदी राजनीति करते हैं बेशर्म लोग। मुझे दुःख होता है जब एक दो दिन मेरी मूर्ति पर लोग फूल अर्पित करते हैं मगर मेरे देश प्यार को समझते ही नहीं और मेरी सोच मेरा चिंतन कोई मायने नहीं रखता। मुझे तो अपना अपमान लगता है साल भर कोई याद नहीं रखता बस दो दिन मेरी आपकी सबकी बात करते हैं वो भी सच नहीं आधा सच आधा झूठ मिलाकर अपने मकसद को हासिल करने के लिए। देश के सभी आदर्श लोगों को इन्होंने बाज़ार का सामान बना दिया है जिसे उपयोग कर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ना चाहते हैं। 
 
                      ये सब पुरानी सभी बातों को छोड़ चुके हैं भूल गये हैं और एक साथ मुहब्बत से रहते हैं मिलते हैं विचार विमर्श करते हैं। मगर हम देशवासी स्वार्थी लोगों के बहकावे में आकर उनके नाम पर बांटने बंटने की बात करते हैं। उनकी आत्माएं बेहद अफ़सोस करती हैं हमारी समझ और सोच पर और इसको देश भक्ति तो हर्गिज़ नहीं मानते हैं। आप जानते हैं वो सभी क्या चाहते हैं। उन सभी को अपने बुत और शिलालेख अच्छे नहीं लगते है क्योंकि इनका उपयोग उनकी विचारधारा के विपरीत देश को गलत राह पर ले जाने को ही किया जाता है इनकी तरह बनना कोई नहीं चाहता है। काश उनके पास कोई स्मार्ट फोन होता और वो सभी संदेश भेज कर आपको आगाह करते इन सब बातों से ऊपर उठने को।  कोई नेता चुनावी लाभ के लिए सबको मुफ्त फोन किसी कंपनी के बंटवाने की बात कर रहा है जिसका चुनाव होने तक कोई बिल भी नहीं आएगा। कोई किसी तरह ऐसी सुविधा आकाश पर भारत क्लब के सदस्यों को उपलब्ध करवा दे तो कितना अच्छा हो। कुछ भी हो सकता है कोई अनुपम खेर का शो दावा किया करता था।

जुलाई 30, 2018

POST : 857 आत्मनिर्भर और आज़ाद बने देश ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   आत्मनिर्भर और आज़ाद बने देश ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

    किस बात का गर्व है , अंतरिक्ष में चांद पर पहुंचने और अणु बंब बनाने पर। अपनी सुरक्षा को लड़ाकू विमान और साज़ो-सामान खुद नहीं बनाते विदेश से मंगवाते हैं उनकी शर्तों पर। अपना सामान उनकी शर्तों पर बेचना उनका उनकी शर्तों पर खरीदना , विदेशी निवेश उनके आर्थिक फायदे को ध्यान में रखकर स्वीकार करना। शीतल पेय और तमाम सामान्य उपयोग की चीज़ें विदेश से खरीदना आर्थिक गुलामी का ही दूसरा नाम है। किस स्मार्ट शहरों की बात करते हैं जो देखने में सुंदर भी हों भी अगर तो इंसानियत से खाली हों। क्या ये देश सभी का नहीं है , किसी महानगर में सब कुछ तो किसी गांव या छोटे शहर में सामन्य शिक्षा स्वास्थ्य सेवा तो क्या साफ पीने का पानी भी नहीं है। आज भी कितने लोग इसी से बिमार होते हैं , मगर हमारे तथाकथित महान लोग आर ओ बेचने को देश सेवा मानते हैं। इतनी ही चिंता थी तो जो पैसा सांसद बनकर मिलता था उसे किसी गांव में साफ पानी उपलब्ध कराने पर ही खर्च कर देते। आपसे ये भी नहीं हुआ कि जिन गांवों को गोद लिया उन्हीं को जाकर देख लेते। राज्य सभा की सदस्यता को तमगा समझने वाले देश को क्या दे सकते हैं। फोर लेन सिक्स लेन सड़कों से अधिक ज़रूरी है देश के हर गांव तक बुनियादी सुविधाओं को पहुंचाना। मगर ये किसी को ज़रूरी लगता ही नहीं। आपके शहर में सरकारी अस्पताल में जो जो उपकरण हैं सब विदेशी हैं और जब उनमें खराबी आती है तो उसको ठीक करवाने को बाहर से लोग आते हैं या जो पुर्ज़ा खराब हो बाहर से मंगाया जाता है। अंतरिक्ष में परशेपण करते हैं मगर एम आर आई , इको , सी टी स्कैन मशीन देश में नहीं बना सकते। हर दिन देश के पास डॉलर कम अधिक होने की चिंता और अपनी कीमत घटने का डर ये कैसा कारोबार है। भारत देश के पास अपने इतने संसाधन हैं कि उनका सही उपयोग किया जाये तो कोई कमी नहीं रहेगी। मगर हमारी मानसिकता विदेश को खुद से बेहतर समझने की और देश को लेकर हीनभावना की।

बहुत देश हैं जो अपने नियम अपने देश की भलाई को सामने रखकर बनाते हैं। हम कब तक उन आदर्शों की बात करते रहेंगे जो देश हित के लिए सही नहीं है। कुछ थोड़ी सी बातें हैं जो कुछ लोगों को पसंद नहीं आएं मगर लागू करनी चाहिएं देश को सामने रखकर।

                          देश से शिक्षा पाकर विदेश में पैसा कमाने वालों को और अधिक लाभ देने की जगह उनसे उनकी आमदनी का कुछ हिस्सा समाज कल्याण पर खर्च करवाना चाहिए। जो बाहर जाकर बस जाते हैं अच्छा जीवन जीने को उनकी देशभक्ति तभी वास्तविक है अगर उनकी करोड़ों की आमदनी से कुछ वो देश के लोगों की बुनियादी ज़रूरतों पर खर्च किया करें कर्तव्य समझ कर उपकार मान कर नहीं। हम इतने स्वार्थी बन गए हैं कि खुद अपने देश समाज को कुछ देना चाहते नहीं , हमें विवश करना होगा नियम बनाकर कि देश में रहते भी और विदेश में जाकर भी इक सीमा से अधिक आमदनी होने पर खुद अपने ऐशो-आराम पर पैसा बर्बाद करने की जगह औरों के जीवन को सुधारने पर खर्च करना होगा। ये खेद की बात है कि हमारे देश के अर्थशास्त्री तक देश की भलाई नहीं विदेशी लोगों की भलाई की बात करते हैं। रहना पाना भारत से सब कुछ और नीतियां आई एम एफ या विश्व बैंक की लागू करना। स्वदेशी की रट लगाने से देश और जनता की भलाई नहीं होने वाली , स्वदेशी की अवधारणा को समझना और उसका पालन करना ज़रूरी है।

                  ( बहुत बातें बाकी हैं , बाद में इसी पोस्ट पर विस्तार से लिखनी हैं ) 
 

 

जुलाई 29, 2018

POST : 856 अब बाबाजी फैशन बाज़ार में ( टेड़ी बात ) डॉ लोक सेतिया

    अब बाबाजी फैशन बाज़ार में ( टेड़ी बात ) डॉ लोक सेतिया 

   बाबाजी की दुकान में सब कुछ बिकता है फिर भी अभी बाबाजी को समझ नहीं आता बाकी दुकानदार क्यों हैं बाज़ार में। लालची लोगों ने हर माल में मिलावट कर दी है , बाबाजी की दुकान पर जो भी माल बिकता है  बस वही शुद्ध सस्ता और असली है। हर दिन बाबाजी परेशान होते हैं अभी कितना कुछ है जो उनकी दुकान में नहीं बिकता है और लोगों को किसी और की दुकान पर जाना पड़ता है। खाने पीने से साबुन शैम्पू शहद से आटा दाल तक यहां तक कि फर्श साफ करने का देसी फार्मूला वाला पदार्थ भी उनका अपना है जो मालूम नहीं कौन किस जगह किस तरह बनाता है। बाबाजी की मोहर लगते शुद्धता की गारंटी समझी जाती है। आज कोई नया कारोबारी आया है जो चाहता है कि बाबाजी के नाम से नया फैशन चलाया जाये। बाबाजी को पहली बार लगा ये कोई मज़ाक है क्योंकि खुद बाबाजी जो पहनते हैं वो कभी कभी लगता है नाम को ही पहना हुआ है एक वस्त्र। नहीं बाबाजी हमारा मतलब सबको भगवा रंग पहनाने का नहीं है , हम तो सवदेशी पहनने को प्रकृतिक ढंग से बनाये परिधान बाज़ार में लाना चाहते हैं जो आपके नाम से आपके खुद विज्ञापन में नेचुरल घोषित होंगे और जिनको पहन कर लोग सभी तरह के रोगों से बच सकेंगे ये भी आप ही बताया करेंगे। आपके नाम से बने परिधान रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा कर सब को तंदरुस्त करेंगे। आपने तीस साल की रिसर्च के बाद उनको बनाया है सब को बताया करेंगे। बाबाजी आप जो भी कहोगे लोग मान लेंगे। काला धन आपने ही तो सफ़ेद किया या करवाया है सरकार द्वारा। आपको विज्ञापन में हरे हरे पेड़ के पत्तों से तन ढक कर दिखाना होगा कि इनसे ही बनाकर आप पहनने को सूट साड़ी कमीज़ सलवार और जींस तक बना लिया है। आपके नाम से डिज़ाइन पेटंट करवा सकते हैं। बाबजी को मालूम हुआ आज कि कितना बड़ा कारोबार यही अकेला है , अगर सारा देश उनके बनाये परिधान खरीद कर पहनेगा तो अंबानी टाटा बिरला सब उनके सामने पानी भरते दिखाई देंगे। मगर इक सवाल ने परेशानी खड़ी कर दी है कि सरकारी सहायता से जितने भी लोग नंगे बदन रहते हैं उनको मुफ्त पहनने को वस्त्र मिल सकेंगे। नहीं फिर तो देश की असली पहचान ही मिट जाएगी। बाबाजी जानते हैं सरकार देश की सदियों पुरानी पहचान फिर से कायम करने को कितनी बेचैन है उसको ये सुझाव पसंद कैसे आएगा। सरकार को राज़ी किया जा सकता है कि किसी को भी सूती रेशमी या किसी भी आधुनिक ढंग से बने परिधान को पहनने पर रोक लगाई जाये क्योंकि हमारे पूर्वज केवल पेड़ों के पत्तों से तन ढकते थे।  ये सौदा भी गोपनीयता की शर्त के साथ किया जायेगा ताकि कोई कीमत पर सवाल नहीं पूछ सके।

POST : 855 क्या लिखना क्यों लिखना किसलिए लिखना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      क्या लिखना क्यों लिखना किसलिए लिखना ( आलेख ) 

                                डॉ लोक सेतिया 

        सब लिखने वाले लिख रहे हैं सब को पता है क्यों लिखते हैं।  मुझे कभी कभी समझ नहीं आता मैं क्यों लिखता हूं। कोई मकसद हासिल नहीं करना , कोई खुशफहमी नहीं है साहित्यकार होने की तो क्या अच्छा लेखक होने की भी। कम ही पढ़ा है मगर जिनको भी पढ़ा है , दुष्यंत कुमार परसाई श्रीलाल शुक्ल प्रेम चंद नीरज जाँनिसार अख्तर थोड़ा थोड़ा  शरद जोशी बशीर बद्र ग़ालिब दाग़ ज़फ़र जैसे उच्च कोटि के लिखने वालों को।  साहिर लुधियानवी और पिछले पचास सालों के फ़िल्मी गीतकारों के गीत ग़ज़ल सुनता रहा हूं। इन सभी से सीखने की कोशिश की है मगर मेरे पास उन जैसे लोगों की समझ और शब्दावली तो नहीं है उनकी कल्पनाशीलता भी नहीं संभव मुझमें। मुझे अच्छी तरह मालूम है मेरा लेखन कोई उच्च कोटि का नहीं हो सकता है। किताब छपवाना नाम शोहरत या इनाम आदि भी मेरा मकसद नहीं है। हां अभी तक कुछ साल पहले तक ये चाहत अवश्य रहती थी कि ज़्यादा लोग मुझे पढ़ें और समझें भी। इसलिए अपने लेखन को कई तरह से पाठकों तक पहुंचाने का काम करता आया हूं। मगर मेरा लिखना इस के लिए नहीं रहा है। वास्तव में मुझे लिखना उसी तरह ज़रूरी लगता है जैसे सांस लेना जीने के लिए। मैं भी अगर लिखता नहीं तो ज़िंदा नहीं रहता या फिर यूं कह सकता हूं कि लिखना बंद करना मेरी मौत होगा। और कुछ भी नहीं मेरे पास करने को लिखने को छोड़कर।

              बहुत लोग लिखते हैं किसी एक विधा में अधिकार पूर्वक। मैंने ग़ज़ल नज़्म कविता व्यंग्य कहानी लघुकथा और सामाजिक समस्याओं पर आलेख लिखना और भी कई ढंग अपनाये हैं अपनी मन की बात को उजागर करने को। लिखना खुद अपने साथ संवाद करना है , मेरे पास संवाद करने को कोई रहा नहीं है क्योंकि मैं जहां जहां रहा विचारों के लिए दूर दूर तक इक रेगिस्तान फैला हुआ मिला। बस चमकती हुई रेत जो पानी जैसी दिखाई देती तो है मगर प्यास नहीं बुझा सकती। तभी कई बार लिखना पड़ा है कि जब भी कोई मुझे पढ़ना तो मेरी तुलना किसी बड़े ऊंचे पेड़ से नहीं करना जो फलदार है और छायादार भी। मैं तो पौधा हूं जो किसी रेगिस्तान में अनचाहे उग आया और जिसे आंधियों तूफानों ने उजाड़ा हर आने जाने वाले के पैरों ने कुचला रौंदा , मगर फिर भी जाने कैसे बार बार उगता रहा। जिनको माली ने सींचा रखवाली की खाद पानी दिया और हर तरह से सुरक्षित रखने का जतन किया उनकी ऊंचाई और मेरा बौनापन हालात के अंतर से हैं।

                जब भी कुछ भी मन को विचलित करता है तब लिखना मेरी मज़बूरी बन जाती है। अब कोई फर्क नहीं पड़ता लोग पढ़ते हैं या नहीं , कभी पढ़ा करते थे लोग सभी को। आजकल हर कोई सोशल मीडिया पर व्यस्त है इक पागलपन में उलझा हुआ मनोरंजन के नाम पर इक ऐसी राह पर जाता हुआ जो राह किसी मंज़िल को नहीं जाती है। ये बाहर निकलना नहीं है खुद को अपने भीतर बंद करना है। खुद को भी जैसा है वैसा नहीं देखना बल्कि जो नहीं है वो समझना चाहते हैं। शिक्षा ज्ञान की नहीं अज्ञानता को बढ़ावा देने का काम करने लगे हैं। सार्थक लेखन सिमट कर रह गया है केवल इक दायरे में पठन पाठन होता है। मैं हर दिन लिखता हूं ताकि अपने ज़िंदा होने का पता खुद को चलता रहे। जिस दिन गहरी नींद आएगी सोते सोते ही दुनिया से विदा हो जाऊंगा। अभी जाग रहा हूं और जागते रहो की आवाज़ लगा रहा हूं , ये भी जनता हूं कि जागते रहो की आवाज़ किसी पुराने ज़माने में लगाई जाती थी और कोई भी जागते रहो की आवाज़ सुनकर जगता नहीं था। 
 

 

POST : 854 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 7 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 7 

                                     डॉ लोक सेतिया 

     पिछले दो दिन की दोनों कहानियों की बात से पहले कुछ और बात कहने की अनुमति चाहता हूं।  हमारे देश का आदर्श वाक्य है " सत्यमेव जयते " मगर हम अपने ही देश के बारे सच कहने को नापसंद करते हैं। सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा , कहते हैं गीत गाते भी दिल से हैं मगर जब भी कोई किसी बाहरी देश से होकर आता है तो अधिकतर यही बताता है कि रहने को वही जगह है। मगर वहां रहते तो समझ पाते कि जिस तरह इस देश में मनमर्ज़ी करते हैं शायद ही किसी और देश में कर सकते। मगर बात सच बोलने की है , कल की कहानी में जो बात सबसे महत्वपूर्ण थी वो यही कि सब अपने धर्म अपने परिवार अपने समाज की अच्छाई बढ़ा चढ़ा कर बताते हैं लेकिन उसकी कमियां या गलतियां छिपाते हैं। अमेरिका के बारे कहा जाता था उनको अपनी बखिया खुद उधेड़ना आता है। कल किसी सत्ताधारी दल के नेता का भरी सभा में बयान था कि जो बुद्धीजीवी देश की जनता के मानवाधिकारों की बात करते हैं या सेना पर सवाल उठाते हैं अगर मुझे होम मिनिस्टर बनाते तो उनको गोली से मरवा देता। शायद उनको नहीं पता खुद सेना के लोग भी अपने अधिकारियों और सरकार पर आरोप लगाते हैं , विरोध भी जताते हैं कि एक रैंक एक पेंशन नहीं लागू करते और झूठ बताते हैं। पुलिस वालों की खुद अत्याचार की कानून तोड़ने से लेकर अपराध करवाने की घटनाएं सामने आती हैं आये दिन। किसी बेगुनाह को फंसवाना , किसी को झूठे ढंग की मुठभेड़ में मार देना , और नशा मुक्ति केंद्र में खुद नशा करना और नशा उपलब्ध करवाना , सत्ता के हाथ में कठपुतली बनकर किसी नेता के जूते साफ करना जैसे काम देखे हैं। जब कोई सैनिक सोशल मीडिया पर अपनी कहानी बताता है तो हंगामा हो जाता है। जब कारगिल युद्ध का फौजी अपने बदन में दुश्मन की गोली लिए अपाहिज बनकर जीता है मगर उसे पेट्रोल पंप और ज़मीन देने का वादा नहीं निभाते सत्ताधारी लोग और विवश होकर उसे झूठे बर्तन लोगों के धोने पड़ते हैं अपनी दुकान खोलकर , तब ये नेता कारगिल के शहीदों की केवल बातें कर रहे होते हैं। इन्होंने खुद सभी नेताओं ने देश को दिया क्या है खुद पर देश का धन बर्बाद किया और सिर्फ भाषणों में देशसेवा की है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश भी अगर देश की जनता के सामने न्यायपालिका की वास्तविकता रखते हैं तो सत्ताधारी लोग उसे अनुचित बताते हैं। सच को देखना कठिन होता है और सच बोलने में जोखिम भी होता है। ऐसा सदियों से होता आया है कि सच बोलने वालों को सूली चढ़ाया जाता रहा है।

        इक महिला पत्रकार को अपने और अपने पिता के परिवार के गुरु का स्टिंग ऑपरेशन करने को कहते हैं तो उसे लगता है मेरा भरोसा है जिस पर भगवान होने का भला उसकी जांच कैसे करूं शक कर। मगर असलियत सामने आती है तो सच कड़वा लगता है , मगर उस खुद को ब्रह्मचारी बताने वाले को जब किसी महिला के साथ देखते हैं तो वो बचाव में उस को अपनी पत्नी बताता है और अभी तक नहीं बताने का कारण समाज सेवा करना बताता है। बचकाना बात लगती है शादीशुदा होकर भी समाज सेवा की जा सकती थी। मुझे इक बात कभी समझ नहीं आती है कि माता पिता को जो बच्चे दुनिया के सब से अच्छे लगते हैं बड़े होने पर उन्हीं में हर बुराई दिखाई क्यों देती है। मैंने शायद ही किसी को माता पिता की बुराई करते देखा सुना है , बेहद कम कभी ऐसा होता है। मगर अधिकतर माता पिता खुद अपनी संतान की बुराई औरों से करते मिलते हैं। शायद उनके माता पिता भी ऐसा करते होंगे , होता ये है कि हम अपनी संतान को अपना गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं और जब कोई बेटा बेटी अपना जीवन अपने ढंग से जीना चाहे तो लगता है हमारी सत्ता जा रही है। अपने बच्चों का पालन पोषण करें मगर बड़े होने पर उनको आज़ाद पंछी की तरह खुले आकाश में उड़ने से रोक कर अपने स्वार्थ के पिंजरे में बंद मत करें। पिंजरे में कैद पक्षी खुश नहीं रह सकता है।

        इक कहानी में जवान विधवा बहु नौकरी करती है और सास ससुर की देख रेख करती है जो अपने पोते को संभालते हैं और बहु के साथ रहते हैं , बेटी उनको बुलाती है मगर उसके पास नहीं जाते। उस महिला को दफ्तर में कोई विवाह का प्रस्ताव रखता है तो वो सास ससुर को साथ रखने की बात करती है जो विवाह करने वाला पुरुष समझाता है अजीब लगेगा कि पति के घर उसके माता पिता के साथ नहीं पहले पति के माता पिता को साथ रखे। फिर उसकी ननद तो चाहती थी साथ रखना इसलिए वो अपने बच्चे को लेकर इक खत लिखकर चली जाती है विवाह कर के ताकि बच्चे को अच्छा भविष्य मिल सके। बाद में जब वही पहले पति के माता पिता वृद्धआश्रम में मिलते हैं तब पता चलता है खुद उनकी बेटी ने घर से निकाल दिया क्योंकि उसे माता पिता नहीं काम करने को नौकर चाहिए थे। तब सास ससुर स्वार्थी बनकर उस बहु से उसके बच्चे को छीनना चाहते हैं क्योंकि पोते पर उनका अधिकार है। बच्चे का भविष्य नहीं खुद को सहारा चाहिए , विवश होकर बेटा सौंपती भी है मगर जब उस से विवाह करने वाला सवाल करता है कि क्या आपने अपनी बहु को बेटी समझा था। समझते तो खुद उसकी शादी करवाते , तब उनको समझ आता है कौन सही था कौन गलत। आखिर वही बहु और उसका पति उनको अपने घर साथ रखते हैं। अर्थात संतान हो या माता पिता अपनी जगह कोई भी सही या गलत हो भी सकता है और नहीं भी। पूरे समाज को एक ही ढंग से दिखाना अनुचित है कभी कोई भी गलत हो सकता है। हम सभी को आपसी तालमेल कायम करना सीखना चाहिए।

                 तीसरी कहानी भी पिता बेटे को लेकर है। बेटा छोटा है पत्नी की मौत के बाद भी दूसरा विवाह नहीं करता सौतेली मां की बात सोचकर। जबकि कि  कहानी में और जीवन में देखते हैं ऐसी महिलाएं अधिकतर अच्छी होती हैं और बिना कारण बदनाम हैं। मगर हैरानी होती है जब जवान बेटे से इक दिन साठ साल की आयु में पिता अनुमति चाहता है विवाह करने की किसी महिला से प्यार हो गया है। बेटे को ये बात बेहद आपत्तिजनक लगती है और वो जाकर जिस लड़की से शादी कर विदेश जाना चाहता है उसे बताता है। तब वो लड़की समझाती है कि ऐसा होने देना उचित है क्योंकि हम जब विदेश में जाकर रहेंगे तो कोई उनका साथी होगा ख्याल रखने को। हमें चिंता नहीं रहेगी। तब वो पिता से घर आकर कहता है मुझे मिलवाओ जिस से आप विवाह करना चाहते हैं। ये अक्सर कथाकार करते हैं दर्शक या पाठक को अचंभित करने को अचानक कुछ ऐसा सामने लाकर खड़ा करना जिसकी कल्पना नहीं की होती। नाटकीयता कहते हैं जबकि वास्तविक जीवन में उसकी ज़रूरत नहीं होती है। यही इस कहानी में होता है अगली सुबह जब पिता उस महिला को अपने बेटे से मिलवाने घर पर बुलवाता है और महिला आती है साथ अपनी बेटी को लेकर। मगर बेटा और उस महिला की बेटी नहीं जानते थे हमारे ही माता पिता हैं जो इक दूसरे को चाहते हैं और शादी करना चाहते हैं।  यहां समस्या उनके खुद के रिश्ते पर खड़ी हो जाती है मगर वो अपने पिता से अपनी माता से कह भी नहीं सकते अन्यथा ये भी तय था वो उनकी शादी करवाते अपनी नहीं।

                      तब लड़का लड़की मिलते हैं और जो लड़की कल खुद लड़के को राज़ी कर रही थी अपने पिता की शादी को स्वीकार कर लेने को , आज अपनी मां की शादी करने को अनुचित समझती है। उसे अब मेरी शादी की बात सोचनी चाहिए अपनी नहीं। लड़का उसको अगली सुबह मंदिर में आने को कहता है ताकि शादी कर सकें।  कथाकार फिर कहानी में नाटकीयता लेकर आचंभित करता है , जब लड़की मंदिर पहुंचती है तो पता चलता है उसे प्यार करने वाला अपने पिता की शादी उसकी मां से करवा रहा होता है। तब बताता है कि अगर पिता इतने साल तक विवाह नहीं करता बेटे को सौतेली मां नहीं मिले जो शायद प्यार नहीं करे इस विचार से तो बेटा क्यों अब पिता के लिए इस आयु में अच्छी जीवन संगिनी मिलने में अड़चन नहीं बनकर साथ दे सकता है। समस्या कुछ भी नहीं है इक बात समझने की है कि हम सभी जो नहीं मिलता किसी रिश्ते से उसकी शिकायत को मन में रखकर उसे गलत समझने की आदत बदल जितना मिला जिस से उसी से ख़ुशी अनुभव कर सकते हैं। इक गीत कुछ ऐसा ही है।

मन रे तू काहे न धीर धरे , वो निर्मोही मोह न जाने जिसका मोह करे। 

उतना ही उपकार समझ कोई जितना साथ निभा दे , ........ 

जुलाई 27, 2018

POST : 853 पाप नहीं , अपराध है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

         पाप नहीं , अपराध है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   गरीबो खुश हो जाओ। सरकार ने कर दिया है ऐलान कि  जो भी अब तुम्हें अन्न देने से इनकार करेगा वह दंड का भागीदार बनेगा। बस अब तुम भूख से नहीं मर सकते। जब भूख लगे जिससे मर्ज़ी जाकर अनाज मांग लो। जो न दे उसे सरकार का यह विज्ञापन भी दिखा दो , जिस पर प्रधानमंत्री वाजपेयी जी और खाद्य मंत्री दोनों के फोटो लगे हैं। इसमें कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि अन्न पैसे देकर मिलेगा या उधार भी मिलेगा। हां कोई इनकार नहीं कर सकता। उम्मीद है भूख से तड़पने वालों ने यह विज्ञापन ज़रूर पढ़ लिया होगा। सरकार ने लाखों रूपये इस विज्ञापन को छपवाने को अख़बार को बेकार तो नहीं दिए। रोटी न मिलती हो तो भी अख़बार तो पढ़ लेना चाहिए , ताकि सरकार क्या क्या कर रही है यह तो पता चलता रहे। 
 
( 27 साल हो गये हैं इस बात को , सूचना के अधिकार को अब कम अहमियत देती है सरकार वर्ना ये जानना चाहिए कि इन सालों में कितने अधिकारी नेता या जमाखोर मुजरिम साबित हुए और सज़ा मिली उनको )
 
     सरकार अनुपयोगी खर्चे कम कर रही है। बजट में घाटा बढ़ता जा रहा है। उसे सीमा में लाना है।  मगर सरकार के विज्ञापन तो बहुत उपयोगी होते हैं।  बस इसी से पता चलता है सरकार कितना बढ़िया काम कर रही है। यह सभी विज्ञापन इतिहास में दर्ज हो जाते हैं तो सबूत बन जाते हैं। सामने भले कुछ भी हुआ नज़र नहीं आता हो और खबरें छपती रहती हों योजनाओं की वास्तविकता उजागर करती हुई। मगर उन खबरों को भुला दिया जाता है जिन में सरकारी गोदामों में अनाज सड़ रहा है और लोग भूख से मर रहे हैं बताया गया होता है। जब तक सर्वोच्च न्यायालय ने फटकार नहीं लगाई सरकार चैन से सो रही थी। अब मज़बूरी में में कुछ करना पड़ा है तो करना कम दिखाना अधिक है। अपना गुणगान करना है अपना ढोल बजवाना है। मीडिया वालों से भाईचारा बढ़ाना है अपने खिलाफ की हर खबर को दबवाना ढकवाना है और अपनी मर्ज़ी की खबर भी बनवाना है। शायद इन इन विज्ञापनों की संख्या से अदालत को तसल्ली हो जाये कि सब कुछ ठीक ठाक है। 
 
              लेकिन जिन के पास सरकारी दुकानों से अनाज खरीदने को पैसे नहीं हों वो क्या करें। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके पास राशन कार्ड नहीं हैं , तो कई हैं जिनके राशन कार्ड आधारहीन बता रहे हैं आधार कार्ड से जुड़े नहीं हुए। वो सरकारी गोदामों को लूट नहीं सकते क्योंकि लूटने का हक अमीर लोगो और अधिकारीयों के पास सुरक्षित है। चूहों पर इल्ज़ाम धर कर गोदाम खाली हो जाते हैं। होटल ढाबे वालों को विज्ञापन दिखाने से खाना मिल जाये और बिल सरकार बाद में चुका दे ऐसा करते तो नेताओ अधिकारीयों को फायदा ही होता। जिन बेरोज़गार लोगों के पास काम ही नहीं , पैसे कहां से लाएं सरकारी दुकानों से अनाज खरीदने को। कौन उनको अनाज देगा और कौन नहीं देने पर दंडित करेगा। जिन का कर्तव्य था ज़िम्मेदारी होनी चाहिए उन नेताओं के तो फोटो आदेश देने वाले के रूप में ऊपर छपे हैं। 

            मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ है , क्या मेरे हक में फैसला देगा।

विज्ञापन कभी सूचना देने का काम करते थे , अब लोगों को लुभाने और मुर्ख बनाने का काम करते हैं। सरकारी विज्ञापन तो टीवी चैनल और अख़बार वालों की जीवन धारा हैं ये नहीं मिले तो बेमौत मर जाएं बेचारे। तेज़ दौड़ते हैं मगर सरकारी बैसाखियाँ लेकर। कंपनियां हर सामान बेचने का विज्ञापन देती हैं और ऐसे भी विज्ञापन होते हैं जिनको देख हंसी आती है। छोटे बच्चे भी समझने लगे है हमें उल्लू बना रहे हो। झूठ की कोई सीमा नहीं बचती विज्ञापन में। जिनको लोग महानायक भगवान जाने क्या क्या समझते हैं , अमिताभ बच्चन से सचिन तेंदुलकर तक जो खुद नहीं उपयोग किया उसी का दावा करते हैं बढ़िया है। सोना गिरवी रखने से मालिश का तेल परेशानी दूर करने की सलाह देते हैं। सचिन को अगर आर ओ का पानी नहीं मिलता तो जाने क्या होता ये भी डर सबको दिखाते हैं। पिछले कुछ सालों से राजनेता की भी मार्किटिंग होती है , किसी को बताया गया ब्रांड अम्बेड्स्टर है जनाब। बिकना भी शान बन गया है , बेचो खुद को और महान कहलाओ। 
 
         पाप नहीं अपराध है का विज्ञापन देकर समझ लिया समस्या का समाधान हो गया है। इतने साल बाद लोग भूल गए अन्यथा अख़बार को दिल्ली में भूख से बच्चियों की मौत की खबर छापनी ही नहीं थी। अब लड़ाई दिल्ली और देश की सरकार के बीच की हो गई है। मगर सरकारी विज्ञापन काम तो आते ही हैं , दिल्ली सरकार को विज्ञापन देने से पहले राज्यपाल से अनुमति लेनी पड़ती है देश की सरकार को कोई नहीं रोकता टोकता। गरीबी हटाओ के इश्तिहार से कितने लोग अमीर बन गए। स्वच्छ भारत मेक इन इंडिया मेड इन इंडिया खुले में शौच बंद सभी विज्ञापनों पर सच है वास्तविकता में झूठ। गंगा साफ होते होते और मैली हो गई है। हर ऐसे योजना ने भ्र्ष्टाचार के नए नए तरीके इजाद किये हैं और कीर्तिमान स्थापित किये हैं। कुछ गरीबों की गरीबी मिटती ही ऐसे ही गरीबी मिटाओ कार्यकर्म से है। इस देश के रहनुमाओं ने नेताओ अधिकारीयों बाबुओं ने बाढ़ सूखा भूकंप सब की राहत से राहत का अनुभव किया है। मुश्किल यही है कि सरकारी विज्ञापन जिनके लिए होते हैं वही नहीं पढ़ते। उनकी भलाई है इसी में , गरीब झुगी झौपड़ी वाले पढ़ लिख गए तो क्या होगा। सभी विज्ञापन पर यकीन कर , कोई काम नहीं मिलने पर किसी सेठ करोड़ी मल के घर के सामने खड़े होकर उस से पूछेंगे तुम्हारे घर में अनाज है या नहीं है। सेठ जी कहेंगे जितना मर्ज़ी ले लो भाव तीस रूपये किलो का है। वो अख़बार में छपा इश्तिहार दिखला कर कहेंगे पैसे नहीं हैं मगर तुम मना करोगे तो सरकार से शिकायत करेंगे और तुम जेल में होगे। करोड़ी मल उनको सरकारी गोदाम जाने को कहेगा तो वो कहेंगे उस में सड़ा गला हुआ अनाज है जानवर भी नहीं खाते हैं। जब मुफ्त में पाने का अधिकार है तो बढ़िया ही खाएंगे। 
 
                      सामने वाले घर में इक भिखारी आंखें दिखा रहा है , घर की मालकिन ने बताया अभी बनाई नहीं रोटी थोड़ी देर में आना। अपने स्मार्ट फोन पर सरकारी ऐप पर शिकायत की धमकी देकर कहता है रोज़ रोज़ चक्क्र नहीं लगा सकता कल से वक़्त पर बना रखना वरना ...   सरकारी विज्ञापन देखा है न। लोग पहले गरीब को रोटी खिलाते थे पुण्य कमाने के लिए। दरवाज़े से कोई भूखा लौट जाये तो पाप समझा जाता था। मगर अब कनून के अनुसार अपराध है। कल मेरा जन्म दिन है याद रखना कुछ मीठा भी बनाना और केक तो ज़रूरी है ही।

POST : 852 भूख है तो सब्र कर ( शासक कह रहा ) डॉ लोक सेतिया

   भूख है तो सब्र कर ( शासक  कह रहा ) डॉ लोक सेतिया 

फिर दुष्यंत कुमार की बात।  भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ , आजकल संसद में ज़ेरे बहस है मुद्दआ। यही होता है रोटी से खेलना , कौन लोग हैं जो देश से हर दिन इतना खाते हैं जिससे लाखों लोगों का पेट भर सकता है । मुझे अपशब्द उपयोग करना पसंद नहीं है मगर जब उनको लाज नहीं आती खुद पर करोड़ों रूपये बर्बाद करते तो देवता नहीं कह सकता । बार बार गंगभाट और रहीम का वार्तालाप याद आता है दो दोहों में सवाल जवाब है । ज़रा पढ़ कर समझना । 
 
गंगभाट :-
 
सिखियो कहां नवाब जू ऐसी देनी दैन , ज्यौं ज्यौं कर ऊंचे करों त्यों त्यों नीचे नैन । 
 
( अर्थात , रहीम जो इक रियासत के नवाब थे हर सहायता मांगने वाले की सहायता किया करते थे , मगर गंगभाट जो इक कवि थे उन्होंने देखा दान देते समय रहीम अपनी नज़रें झुका लिया करते हैं , आंख मिलाकर सहायता नहीं देते मांगने वाले को। पूछा ये क्या ढंग हुआ भला बताओ तो सही । 
 
रहीम :-
 
देनहार कोऊ और है देत रहत दिन रैन , लोग भरम मोपे करें याते नीचे नैन। 
 
( अर्थात , देने वाला तो कोई और है ऊपर वाला देता रहता है दिन रात मुझे , मैं तो माध्यम हूं उसकी दात को आगे देने को , लोग सोचते हैं रहीम देता है यही सोचकर शर्म से मेरी नज़रें झुकी रहती हैं )
 
वो अपनी रियासत के मालिक थे , हमारे नेता तो किरायेदार हैं और रखवाली करने को बनाये गए हैं , फिर भी बेशर्मी से दावे करते हैं मैंने ये दिया वो दिया है । पत्थर पर अपना नाम लिखवाते हैं , बताओ क्या अपनी कमाई से इक धेला भी दिया है । हर दिन खुद पर रहने आने जाने ऐशो आराम पर करोड़ों खर्च करना गुनाह है अपराध है पाप है अगर आप किसी भी धर्म को मानते हैं । धर्म दंगे करना नहीं सिखाता कोई भी , हर धर्म भलाई करने और सहायता करने को कहता है । 

देवता कौन होते हैं , माना जाता है हमारे देश में करोड़ों देवी देवता थे । अर्थात जो लोग यहां रहते थे औरों को देते थे इसलिए देवता थे । 

राक्षस कौन होते हैं , जो सब से छीन कर सभी तहस नहस करते थे और उनकी भूख तब भी नहीं मिटती थी वो राक्षसी स्वभाव था । 

राजनेता कोई मसीहा नहीं होते हैं , इनको सत्ता खुद शासन करने को चाहिए देश सेवा और जनता की सेवा बिना किसी पद पर आसीन हुए करते रहे हैं लोकनायक और बापू कहलाये जो । 

आपके इश्तिहार को देखें या असलियत को :-

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार , घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार । 

इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं , आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार । 

ये दिल्ली की बेरहमी की बात नहीं जो कल की खबर है और जिस पर संसद में पक्ष विपक्ष भिड़े हैं । देश की आधी आबादी की हालत यही है मगर आप को बुलेट ट्रैन की ज़रूरत है । अपने लिए हर जगह भवन की ज़रूरत है । कल पाकिस्तान में जीतने के बाद इमरान खान ने जो कहा हमारे देश के नेता भी जानते हैं मगर कभी नहीं कहते । जब देश में गुरबत है भूख है तो मुझे प्रधानमंत्री बनकर महलनुमा आवास में नहीं रहना कोई छोटी जगह देखूंगा और प्रधानमंत्री आवास और बाकी राजयपालों के भवन को या जनता के लिए स्कूल अस्पताल बनाने को उपयोग करूंगा या उनको होटल रसोर्ट बनाकर कर उनकी आमदनी जनता पर खर्च की जाएगी । दुश्मन से भी अच्छी बात सीखी जा सकती है । उन्होंने ये भी कहा चीन ने कैसे करोड़ों लोगों को गरीबी से मुक्त करवाया और कैसे भ्र्ष्टाचार पर अंकुश लगाया उनसे सबक लेंगे । चार साल पहले गरीबी और भ्र्ष्टाचार मिटाने की बात कर सरकार बनाई थी मगर अभी तक किया केवल एक ही काम है । जैसे भी हो हर राज्य में अपने दल की सरकार बनवाते जाना , देश के गरीब भूखों की याद रहती कैसे । केवल अपने संगठन से जुड़े लोगों को मुख्यमंत्री मनोनीत करना राष्ट्रपति उप राष्ट्रपति बनवाना किस सोच को बताता है । जो लोकपाल की बात थी उसका क्या हुआ । अब कहते हैं कांग्रेस मुक्त भारत हुआ अब विपक्षी दल मुक्त भारत बनाना है । कितना गंभीर असंवैधानिक कार्य करने की बात है । भूलना मत जो बनाते हैं हमेशा रहता है नाम उनका मिटाने वाले खुद मिट जाते हैं यही होता हैं अंजाम उनका ।
 

 


जुलाई 26, 2018

POST : 851 मैं किसी का भगवान नहीं ( कहा ख़ुद उसने ) डॉ लोक सेतिया

    मैं किसी का भगवान नहीं ( कहा ख़ुद उसने ) डॉ लोक सेतिया 

   मैं जो कहने जा रहा उस पर यकीन नहीं करना , मुझे कोई बताता तो मैं हर्गिज़ नहीं मानता । आप इसे मनघड़ंत कहानी नहीं समझ सकते तो इक पागल का ख्वाब समझ लेना । मैं उसको नहीं पहचानता मगर उसने कहा वही है दुनिया बनाने वाला । तो मैं क्या करूं यही कहा था मैंने बिना सोचे ही । उसने कहा तुम इधर उधर मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरजाघर किस की खातिर जाते हो , मेरी तलाश में ही तो जाते हो । कभी मिला वास्तव में जैसे आज सड़क किनारे खड़े बातें कर रहे हम दोनों ।  तुम किसी को बताना नहीं नहीं तो लोग तुम्हें पागल समझ पागलखाने भेज देंगे या तुम्हें नास्तिक है कहकर किनारा कर लेंगें मुमकिन है कुछ ज़्यादा ही कटटर  हों तो तुम्हारे साथ गलत व्यवहार भी कर दें । मेरा कोई लेना देना नहीं है फिर भी मुफ्त में बदनाम मुझे ही करते हैं । भला मुझे किसी को सज़ा देनी होती तो क्या खुद ही नहीं दे सकता था ऐसे बदमाश रखता अपना शासन चलाने को । पढ़ा है कभी सुना है कभी खुदा ईश्वर अल्लाह ने किसी को परेशान किया हो इबादत करने के लिए या मुझ पर भरोसा करने को । जब तक लोग वास्तव में भगवान को मानते थे और भलाई की राह चलते थे मैं भी सुःख दुःख में सबके साथ रहता था । जब लोगों ने ये काम छोड़ सिर्फ दिखावा करना शुरू किया और शोर करने लगे मेरे नाम की आड़ में खुद को आस्तिक साबित करने का मुझे लोगों के साथ रहना कठिन हो गया । विवश होकर मैंने अपने को अपने पद से मुक्त कर सब को उनके हाल पर छोड़ दिया है । अब आजकल लोग जिसकी पूजा इबादत करते हैं वो मैं नहीं हूं , मुझे तो समझ ही नहीं आता किसकी आरती किसकी कथा किसका सतसंग किया जाता है । ये बड़े बड़े पत्थरों के धार्मिक स्थान और पत्थर के देवी देवता या किसी और तरह से किसी किताब को मेरा नाम देकर जो किया जाता है उसे क्या कहा जाना चाहिए मुझे ही नहीं समझ आता । सच तो ये है कि मुझे ये लोग पास भी फटकने नहीं देते , सब ने अपने खुदा घड़ लिए अपनी सुविधा से जो अच्छा और आसान लगता करते हैं । नासमझ हैं जो मुझे समझने की बात करते हैं खुद अपने आप को ही कभी नहीं समझते हैं । मैं जाता नहीं वहां जहां कहीं ये सब होता है सुबह से शाम तक । मगर आज चलता हूं और मुझे तुम ही बताना कि इन सब का मतलब है क्या ।

                 इक सभा में कोई बोल रहा था माता पिता और बच्चों को लेकर हाल खराब है । बच्चे अपने माता पिता के नहीं हैं कोई किसी का नहीं है सब की झूठी प्रीत है । मुझे तो नहीं लगा ऐसा इसी सभा में अधिकांश लोग अच्छे हैं मगर ये जो सब को बुरा बता रहा है खुद कितना अच्छा है नहीं विचार करता । इसे उपदेश भी देना है तो कीमत लेकर देता है , इसकी बातों से असर कैसे होगा । यकीन करोगे इस ने कभी अपनी माता पिता गुरु का कहना नहीं माना ये कुछ भी नहीं करना चाहता था लेकिन हलवा पूरी खाकर सुःख चैन से खुद को काबिल समझदार और महान कहलाना चाहता था जिस के लिए भगवान का नाम उपदेश देने का कारोबार शुरू कर लिया है । ये जो लोग आपको अधिक का लोभ लालच नहीं करने का उपदेश देते हैं खुद समझते हैं उन्हें जो मिलता है का कम है । और जो लोग धार्मिक स्थलों को विशाल और तमाम सुविधाओं के सहित बनवाते हैं लोगों को थोड़े में खुश रहने को कहते हैं । इक छोटा सा घर बना हुआ था तब भी भगवान को कोई असुविधा नहीं थी , ऊंची इमारत कीमती साज़ो सामान किस भगवान को चाहिए । इंसान धूप गर्मी बरसात में बेबस हैं और इतने बड़े भवन में कोई नहीं रहता सब कुछ जमा किया हुआ है । हवा को पंखे की जगह ऐसी और सीसी टीवी कैमरे लगा क्या साबित करना है कि जो लोग आये हैं सब पर भरोसा किया ही नहीं जा सकता । मैंने कभी किसी पर ऐसी निगाह नहीं रखी , जो करता है फल मिलता है मुझे दखल देने की ज़रूरत ही नहीं है । आप कैसे उपदेश दे रहे हैं सबको पापी अधर्मी बता रहे हैं लताड़ते हैं बच्चों को खेलने को कुछ सीखने को नाचने को भेजते हैं साथ नहीं लाते मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे । भाई बच्चों को बचपन का आनंद लेने दो और संगीत या और किसी कला की शिक्षा लेने में बुराई क्या है । खुद जो भजन गाना जानते हैं बचपन से ही सीखा नहीं होता तो कब सीखते गाते । बच्चे भगवान का रूप हैं तो उनको किसलिए उनकी मर्ज़ी बिना कुछ करवाना दिखावे को । शायर की बात सच्ची है ,   घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें , किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये । मस्जिद इंसान ने बनाई है भगवान ने बच्चे को अपने हाथ से बनाया है तो महत्व किसका अधिक है ,  गीतकार भी समझाते हैं ।  बच्चे मन के सच्चे , मगर आप उस सच्चाई पर अपने झूठ और दिखावे का लेबल क्यों लगाना चाहते हैं । खुद भगवान भी दुनिया में जन्म लेकर बचपन का आनंद लेते रहे ये भी खुद कथा सुनाते हैं ।

           सब को लालच नहीं करने की बातें कहने वाले और अधिक भवन धन दौलत जमा करते जा रहे हैं , धर्म के नाम पर हज़ारों एकड़ ज़मीन किसी भी तरह हथिया ली है । गरीब को घर नहीं रोटी कपड़ा नहीं और धर्म के नाम पर अंबार लगा रखे हैं तो धर्म है क्या । धर्मशाला कोई नहीं मुसाफिर को रहने को ठिकाना नहीं , किसी भूखे को खाना नहीं मिलता किसी बेघर को रहने क्या भीतर नहीं आने देते । कहीं तो शुल्क लगा रखे हैं दर्शन बिकता है प्रसाद भी बेचते हैं । कौन सा भगवान है ये कैसा धर्म है । कोई आपकी बात से सहमत नहीं तो धर्म के नाम पर हिंसा किस धर्म की किताब में लिखा है । कोई अनुबंध किया हुआ है जो भगवान को मनवाने को ज़ोर ज़बरदस्ती करते हैं ये कैसी ठेकेदारी है । मत पूछो क्या क्या दिखाया समझाया मुझे उस ने जो खुद को वास्तविक भगवान बता रहा था मगर उसके पास कोई प्रमाण पत्र नहीं था । आधार कार्ड भी नहीं बना हुआ न कोई वोटर कार्ड तो राजनेताओं के किसी काम का नहीं वो भगवान । मुझे यही समझाया तुम कहीं मत जाओ मुझे ढूंढने को , मैं खुद चला आता हूं जो सच्चे दिल से पुकारता है उसके पास । बस उसी दिन से नहीं गया किसी धार्मिक जगह माथा टेकने , मुझे तो ध्यान ही नहीं आया कि भगवान सामने है तो सर झुकाता पांव छूता । शायद उसे भी ये नहीं पसंद था जो मेरे मन में ये ख्याल नहीं आया । मैंने तो उसको ये भी कह दिया ठीक किया जो अपने को अपने पद से मुक्त कर लिया जब किसी से कोई काम ठीक से नहीं होता हो तो हट जाना चाहिए । सही कहा आपने मैं भी मानता हूं ये दुनिया बनाकर कभी इक पल चैन से नहीं रह पाया । कोई सत्ता का भूखा नेता थोड़ा हूं जो कुर्सी को छोड़ते महसूस करता है जान निकलती है । नीरज जी मेरे पास आये हैं बहुत मधुर स्वर है और कितना सुंदर गीत लिखते हैं । मुझे समझते हैं बस ऐसे थोड़े से लोग ।

उस से मिलना नामुमकिन है , जब तक खुद पर ध्यान रहेगा। 

जब तक हैं मंदिर और मस्जिद , आदमी परेशान रहेगा। 

   तुम छोड़ दो ये सब करना जो तुम्हें  जीना नहीं सिखाता और परेशानी देता है । भगवान की बात है माननी ही होगी मना करना उचित नहीं है । आपको यकीन नहीं हुआ मुझे जो मिला भगवान नहीं था आपका । आपका भी भगवान आएगा खुद आपके पास इंतज़ार करने में आपका जाता क्या है । कभी मिलने आये तो उस से भगवान होना का सबूत मत मांगना , बेचारा नहीं दे सकेगा ।  कोई मुझे अपने धर्म की बात कर रहा था अपने गुरु की बात बता रहा था कैसे उसने गांव के गांव खरीद लिए अपने विस्तार के लिए । उनको अपने पास कोई और किसी और धर्म को मानने वाला नहीं चाहिए , उनके घर दुकान धार्मिक स्थल तक तोड़ अपने बनाये और उनके साथ कीमत देकर सौदा किया उनको किसी और जगह घर बनवा कर दिए और जिस जगह जो उनका धार्मिक स्थल तोड़ा  था उसके बदले और बना कर दिया मगर उसकी देखरेख अपने चेलों को ही सौंप दी । कोई चढ़ावा नहीं चढ़ा सकता बस सुबह शाम औपचारिकता निभाते हैं । बड़े महान हैं जो औरों को नसीहत देते हैं धन दौलत मत जमा करो और खुद अपने धर्म के नाम पर फैलते जाते हैं धंधा और अपनी दौलत ताकत और राजनीति में प्रभाव को उपयोग कर घरों को खेतों को ही नहीं गांवों को इंसानों को खरीदना उचित मानते हैं । ऐसे गुरु की शिक्षा कैसी होगी समझ सकते हो । मेरा भगवान तेरा भगवान उसका इसका किसका भगवान । मुझे ही बांट कर कहते हो मैं एक ही हूं , तुम लोग एक होने दोगे किसी को । भगवान ने किसी के नाम कोई वस्तु नहीं की थी , किसी को ज़मीन मकान पेड़ पौधे बटवारा नहीं किया था । सब की ज़रूरत को सभी कुछ था मगर किसी की हवस को पूरी करना तो भगवान के बस की भी बात नहीं है । भगवान को क्या समझते हैं , जमाखोर जो इतना सब खुद अपने नाम जोड़ता जा रहा है जबकि उसी के बनाये बंदे बेघर हैं भूखे हैं । आपके चढ़ावे से खुश होता होगा और अपने गुणगान से भी ख़ुशी हासिल करता होगा जो वो भगवान नहीं हो सकता । आपने भगवान को भी कारोबारी इंसान समझ लिया जो देता कम लेता ज़्यादा है , मुनाफाखोर है क्या भगवान । नहीं है तो सब धर्मों के पास दौलत बढ़ती क्यों जाती है , धर्म पर खर्च नहीं करते धर्म का विस्तार करने पर निवेश करते हैं । अब कोई उपाय नहीं है केवल एक ही तरीका है लोग इनकी वास्तविकता को समझ छोड़ दें मानना किसी भी धर्म को । भगवान को मानें चाहे नहीं मानें कोई फर्क नहीं पड़ता है , इन धर्मों को मानकर भगवान को मानना नहीं कहा जा सकता है । धर्म और भगवान एक ही नहीं हैं , धर्म आपको बंधन में रखता है जबकि भगवान ने आपको बंधनमुक्त किया हुआ है । सब बंधनों से मुक्त होना चाहते हैं तो पहले इन से मुक्ति पाओ जो आपको कुछ भी करने की क्या सोचने समझने की इजाज़त नहीं देते हैं । भगवान कोई बाहर से नहीं आये थे न आते हैं मुझे मेरे भीतर से मिले आपको आपके अंदर से मिल सकते हैं ।