अगस्त 13, 2015

POST : 485 सब लूटने - सब बेचने की आज़ादी ( विडंबना ) डॉ लोक सेतिया

    सब लूटने - सब बेचने की आज़ादी  ( विडंबना ) डॉ लोक सेतिया

      जाने क्यों मुझे लगा कि फेसबुक पर "बात महिला जगत की" पेज पर महिलाओं की बात लिखनी है तो कुछ पत्रिकाएं जो विशेषकर महिलाओं की कहलाती हैं को पढ़ना उपयोगी हो सकता है। और मैं अखबार - पत्रिकाएं बेचने वाले से ऐसी पत्रिकाएं खरीद लाया। जब पढ़ा उनको तो पता चला कि औरत को न तो खुद को कैसे ज़िंदा रखे इसकी चिंता है आज जब सुनते हैं छोटी छोटी बच्चियां तक वहशी लोगों की हवस का शिकार हो रही प्रतिदिन , न ही उसको और कोई गंभीर समस्या। पत्रिकाओं से पता चला कि आज की औरत की सब से बड़ी समस्या है कैसे उनका रंग गोरा हो सकता है , कैसे वो स्लिम हो सकती हैं , कैसे उनको नया फैशन अपनाना है , उनको मेहंदी कैसे लगानी हाथों पर , कौन सा इत्र , कौन सा दुर्गन्ध नाशक इस्तेमाल करना है , कैसे घर को कीमती चीज़ों से सजाना है। कहीं नहीं लगा कि उसको भूख की गरीबी की , खुद पर हो रहे अन्याय - अत्याचार की भी कोई समस्या है। अधिक नहीं तो 60 से 7 0 प्रतिशत महिलाओं की , जो खेतों में - घरों में दिन रत काम करती रहती , जो मज़दूरी करती हैं , जो सड़कों - गलियों से कूड़ा एकत्र कर बेच कर अपना और अपने बच्चों का पेट भरती हैं , जो हर जगह प्रताड़ित की जाती रहती हैं , डरी सहमी रहती हैं , उनकी एक भी बात मुझे नहीं मिली पढ़ने को।  लगा जो समाज मैं देखता हूँ आस पास वो तो यहां कहीं है ही नहीं , न जाने ये कहां की महिलाओं की बात है। मगर उन्हीं को दोष देना उचित नहीं है , यहां धर्म वालों को लोगों को धर्म क्या है , उस पर कैसे चलना है , नहीं सिखाना , उनको धर्म को बेचना है ताकि वो नाम शोहरत और दौलत कमा सकें।  कोई शिक्षा का कारोबार करता है , कोई स्वास्थ्य सेवाओं को बेचने में लगा है , मीडिया-पत्रकारिता की बात और सच्चाई की बात करने वाले , सच को नहीं तलाश करते वो सच का लेबल लगा कुछ भी बेच रहे हैं। पैसा कमाना ही एकमात्र उद्देश्य बन गया है सभी का। समाजसेवा तक एन जी ओ बना कर की जाती है ताकि सरकार से देश विदेश से चंदा लेकर जैसे मर्ज़ी उपयोग कर सकें। अब कोई आपकी पहचान का अफ्सर या विधायक - सांसद  बन गया तो उस से सरकारी धन अपने लिये पाने का ये आसान रास्ता है , इन जी ओ बना लो ! खास बात है सभी शीशे के घर में रहते हैं , कौन दूसरे को गलत बता सकता है। ये जो नेता उपदेश देते हैं आपको त्याग करने का औरों के लिये , आप सब्सिडी नहीं लो तो किसी और को देंगे , उनसे कोई पूछे तो कि देश में सब से बड़े परजीवी कौन हैं , आप नेता लोग जिनको इस गरीब देश से सभी कुछ चाहिए। जाते हैं गांधी जी की समाधि पर फूल अर्पित करने , की चिंता सब से दरिद्र की , भाषण देते हैं देशभक्त शहीदों का नाम लेकर , क्या यही सपना था उनका कि आप शासक बन राजसी शान से रहो और यहां हज़ारों लोग गरीबी से तंग आकर ख़ुदकुशी करते रहें। 

       क्या कहोगे कि ख़ुदकुशी का गरीबी से कोई ताल्लुक नहीं , चलो नरेंदर मोदी जी की सरकार के पहले साल के ये आंकड़े देखते हैं  , जिन लोगों ने आत्महत्या की उनकी आमदनी क्या थी , देखें :-

91820 जिनकी वार्षिक आय एक लाख से कम थी।

35405 जिनकी वार्षिक आय एक लाख से पांच लाख तक थी।

3656 जिनकी वार्षिक आय पांच लाख से दस लाख तक थी।

785 जिनकी वार्षिक आय दस लाख से अधिक थी।

       ( अब भूख से मरने वालों की गिनती तो कोई करता ही नहीं , 
               उसको तो किसी रोग से मरना बताते हैं )

      पंद्रह अगस्त को आज़ादी का जश्न कौन लोग मनाते हैं , कितने गरीब शोषित , गलियों में भीख मांगते बच्चे , रोज़ काम की तलाश में भटकने वाले युवा , और भी बदनसीब हैं जिनको अभी आज़ादी का अर्थ तक नहीं मालूम।

अगस्त 04, 2015

POST : 484 महिला जगत के लिये , पैगाम-ए-ग़ज़ल ( शायर मजाज़ लखनवी से डॉ लोक सेतिया "तनहा" तक )

            महिला जगत के लिये , पैगाम-ए-ग़ज़ल 

     ( शायर  मजाज़ लखनवी से डॉ  लोक सेतिया "तनहा" तक )

                        मजाज़ लखनवी जी  की  ग़ज़ल :- 

                    हिजाबे फ़ितना परवर अब हटा लेती तो अच्छा था ,
                  खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था।

                   तेरी नीची नज़र खुद तेरी अस्मत की मुहाफ़िज़ है ,
                   तू इस नश्तर की तेज़ी आज़मा लेती तो अच्छा था।

                    तेरा ये ज़र्द रुख ये खुश्क लब ये वहम ये वहशत ,
                    तू अपने सर से ये बादल हटा लेती तो अच्छा था।

                     दिले मजरूह को मजरूहतर करने से क्या हासिल ,
                     तू आंसू पौंछकर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था।

                     तेरे माथे का टीका मर्द की किस्मत का तारा है ,
                     अगर तू साज़े बेदारी उठा लेती तो अच्छा था।  

                       ( साज़े - बेदारी = बदलाव का औज़ार )

                      तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन ,
                      तू इस आंचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था ।





   ये शायद गुस्ताखी है कि ऐसे शायर के इतने लाजवाब कलाम के बाद ये नाचीज़ अपनी नई लिखी ताज़ा ग़ज़ल सुनाये।  मगर ऐसा इसलिये कर रहा हूं कि मुझे भी वही पैगाम आज फिर से दोहराना है , अपने अंदाज़ में।  पढ़िये शायद आपको कुछ पसंद आये :::::::

                         ग़ज़ल डॉ लोक सेतिया "तनहा"

                      ज़माने को बदलना है , नई दुनिया बसाना है ,
                      उठा कर हाथ अपने , चांद तारे तोड़ लाना है ।

                      कभी महलों की चाहत में भटकती भी रही हूं  मैं ,
                      नहीं पर चैन महलों में वो कैसा आशियाना है ।

                      मुझे मालूम है तुम क्यों बड़ी तारीफ करते हो ,
                      नहीं कुछ मुझको देना और सब मुझसे चुराना है ।

                     इसे क्या ज़िंदगी समझूं , डरी सहमी सदा रहती ,
                     भुला कर दर्द सब बस अब ख़ुशी के गीत गाना है ।

                      मुझे लड़ना पड़ेगा इन हवाओं से ज़माने की ,
                       बुझे सारे उम्मीदों के चिरागों को जलाना है ।

                     नहीं कोई सहारा चाहिए मुझको , सुनो लोगो ,
                    ज़माना क्या कहेगा सोचना , अब भूल जाना है ।

                      नहीं मेरी मुहब्बत में बनाना ताज तुम कोई ,
                  लिखो "तनहा" नया कोई , हुआ किस्सा पुराना है ।

                                ( डॉ लोक सेतिया "तनहा" )   
 

 

जुलाई 25, 2015

POST : 483 है तो बहुत कुछ और भी बताने को , हो अगर फुर्सत कभी ज़माने को ( आलेख ) - डॉ लोक सेतिया

 है तो बहुत कुछ और भी बताने को  हो अगर फुर्सत ज़माने  को 

                             ( आलेख )   डॉ लोक सेतिया                    

     कभी कभी सोचता हूं क्या अच्छा होता है , खुश रहना , मौज मस्ती करना , मुझे क्या हर बुराई को देख यही सोचना या फिर उदास होना देख कर कि देश समाज कितना झूठा कितना दोगला और कितना संवेदनाहीन हो चुका है। कोई सत्येंदर दुबे मार दिया जाता है भ्र्ष्टाचार के बारे पत्र लिखने के बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को , क्योंकि वो पत्र लीक हो जाता है देश के प्रधानमंत्री कार्यालय से। नहीं ये अकेली घटना नहीं है , ये हर दिन होता है। हज़ारों पत्र लिखे जाते हैं मुख्यमंत्रियों को अधिकारियों को जो रद्दी की टोकरी में फैंक दिये जाते हैं। हमारा समाज देखता तक नहीं उनको जो चाहते हैं बंद हो ये सब , कोई दुष्यंत कुमार अपनी बात ग़ज़ल में बयां करता है तो कोई दूसरा लिखने वाला व्यंग्य या कहानी में। सोचता है कोई , समझता है कोई। हां जब कोई शोर मचाता है लोकपाल के लिये आंदोलन का या कुछ भी बताकर और खबरों में छा जाता है हम उसको मसीहा मान लेते हैं। हम क्यों देखें कि इनमें कौन क्या है , इक वो है जो आयकर विभाग से वेतन लेकर विदेश पढ़ने को जाता है मगर वापस आकर नियमों का पालन नहीं करता कि अब उसको दो साल विभाग को अपनी सेवायें अनिवार्य रूप से देनी हैं। इतना ही नहीं वो विभाग से लिया क़र्ज़ भी तब तक लौटने को तैयार नहीं होता जब तक चुनाव लड़ने को ऐसा करने को मज़बूर नहीं होता। क्या यही ईमानदार है , या फिर इनका दूसरा साथी जो कहने को शिक्षक है , वेतन पढ़ाने का पाता रहता है मगर काम कोई और ही करता है मीडिया में जुड़कर। ये सब अवसरवादी लोग सत्ता हासिल करते ही उन्हीं के जैसे हो जाते जिनको कोसते थे पानी पी पी कर। अब उनको एक ही काम ज़रूरी लगता है विज्ञापनों द्वारा खुद को महिमामंडित करना।

             चलो उनको छोड़ औरों की बात करते हैं , पिछली सरकार ने हर विधायक को मंत्री-मुख्य संसदीय सचिव बना रखा था , उसका विरोध करने वाले अब खुद वही कर रहे हैं। हरियाणा में जो पहली बार विधायक बने उनको भी कुर्सी मिल गई , किसलिये ? क्या प्रशसनिक ज़रूरत को , कदापि नहीं , ताकि वो भी अपना घर भर सकें। और मोदी जी क्या करना चाहते हैं , किन लोगों की चिंता है ? देश की इक तिहाई जनता जो भूखी रहती है आपको उसकी ज़रा भी चिंता है , लगता तो नहीं।  किसानों की बात भी ज़रूरी है , मगर मोदी जी मिलते हैं अमिताभ बच्चन जी जैसे किसानों से , कोई गांव का किसान भला मिल सकता किसी ज़िले के अफ्सर से भी , मंत्री की बात तो छोड़ो।  मिल कर भी क्या होगा , ये सत्ता पर काबिज़ होते ही भीख देना चाहते हैं उनको जो वास्तव में देश की मालिक है जनता। मोदी जी तो इक कदम आगे बढ़कर अब सब्सिडी को छोड़ने को कहते हैं ये वादा कर कि किसी और को देंगे। ये नेता और इनके वादे , प्रचार पर पैसा बर्बाद करने वाले क्या जानता ये पैसा जिनका है वो भूख से मर रहे हैं , ख़ुदकुशी करने वाले किसानों को मोदी जी के मंत्री नपुंसक और असफल प्रेमी बताते हैं निर्लज्जता पूर्वक।  शर्म करो। बात आम आदमी पार्टी की हो या भाजपा की , जो कांग्रेस किया करती थी अपनों के अपकर्मों पर खामोश रहना वही ये भी करते हैं। किसी शायर का इक शेर याद आया है :-
                 " तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला ,
                   मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला। "

                  चलो इक और बात की जाये , बेटी बचाओ की बात , बेटी के साथ सेल्फ़ी की बात , अखबार भरे पड़े हैं तस्वीरों से , मुस्कुराती हुई।  वो जो कचरा बीनती फिरती हैं , कौन हैं ? वो जो घर घर सफाई बर्तन साफ करने का काम करती वो कौन हैं , इक सेल्फ़ी भी उनकी नहीं जिनके हिस्से कुछ भी नहीं है।  चलो छोड़ो उनका भाग्य ऐसा मानकर , मगर जिनकी सेल्फ़ी देख रहे हैं उनको क्या सब अधिकार मिलेंगे।  ये पूछना उस पिता से क्या उसको बेटे के बराबर सम्पति में हिस्सा दोगे ?

                सरकार बदलती है , तरीका नहीं बदलता , दिखाने को खिलाड़ियों को करोड़ों के ईनाम , असल में बच्चों को खेलने देने को समय नहीं न ही सुविधा। हरियाणा में किसी खिलाड़ी को स्कूल बनाने को ज़मीन , किसी को नौकरी भी पुरूस्कार भी। जब वक़्त आता देश के लिये पदक लाने का तब बिक जाते हैं खिलाड़ी बाज़ार में महंगे दाम पर। अब अदालत ने पूछा है हरियाणा सरकार से वो क्या कर रही थी जब सरकारी नौकरी पर नियुक्त खिलाड़ी विज्ञापन कर रहा था बिना अनुमति प्राप्त किये। लो इक नई खबर , वही पुराना तरीका , हरियाणा में अपने ही वरिष्ठ मंत्री , नेता को उन्हीं के विभाग के कर्यक्रम में नहीं बुलाना या समझ लो ऐसे बुलाना जैसे न आने को , फिर उसकी जासूसी करते सी आई डी वाले।  क्या डर है इनको , अगर सच ईमानदारी से देश सेवा करनी तो कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। पर्दादारी की ज़रूरत तभी होती है जब राज़ होते हैं छुपाने को। 

 

जुलाई 12, 2015

POST : 482 आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली की दशा कैसी ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली की दशा कैसी ( आलेख ) 

                             डॉ लोक सेतिया

    कभी लगता है की जैसे सच में हमारी आयुर्वेदिक पद्धति फिर इक बार लोकप्रिय हो रही है , जबकि ये सही नहीं है। आयुर्वेद के नाम पर कुछ लोग दवाओं का कारोबार ज़रूर कर रहे हैं और खूब मुनाफा कमा रहे हैं , लेकिन वास्तव में वो आयुर्वेद का कोई भला नहीं कर रहे , उसका दुरूपयोग ही कर रहे हैं ! वे लोगों को रोगमुक्त करने को कोई दवा नहीं बना रहे , बनाते हैं कुछ दवायें जिनसे उनको मनचाहा मुनाफा मिल सके ! जैसे सुंदरता बढ़ाने का दावा करने वाली क्रीम या मोटापा दूर करने वाली दवायें ! यौवनशक्ति वर्धक दवायें या कोई लंबे बाल करने और गंजापन दूर करने की दवा ! यहां मुझे ये सवाल नहीं पूछना की वो कितनी कारगर हैं या मात्र धोखा हैं ! जो सवाल करना है वो उनसे भी और खुद अपने आप से भी करना है , वो ये कि क्या हम जानते हैं आयुर्वेदिक पद्धति का अभिप्राय क्या है ! ये पैसा बनाने का कोई कारोबार नहीं है , ये वो मानव कल्याण का मार्ग है जिसमें विश्व में सभी के स्वास्थ्य की कामना की गई है !आप आयुर्वेदिक दवाओं को मात्र कोई उत्पाद समझ नहीं बना और बेच सकते अपने लाभ के लिये ! आजकल जैसे आयुर्वेदिक दवाओं को विज्ञापन द्वारा प्रचार से या कुछ लोग अपनी शोहरत का उपयोग कर शहर-शहर फ्रैंचाइज़ी बेच कर रहे वो तो इक छल है आयुर्वेद के साथ। वास्तव में किसी भी पद्धति में ऐसे उपचार नहीं किया जा सकता न ही किया जाने दिया जा सकता है। ये तो लोगों के जीवन से खिलवाड़ करना है जिसको प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता , लेकिन खेद की बात है स्वास्थ्य विभाग ऐसा होते देख कोई कदम नहीं उठा रहा , खामोश रह सब होने दे रहा है।
 ये धारणा गल्त है कि हर दूसरा आदमी आयुर्वेदिक जानकार हो सकता है , अख़बार में विज्ञापन देकर या टीवी चैनेल पर रोगों का निदान और उपचार बताना अनुचित ही नहीं कानून के अनुसार भी अपराध है , और चिकत्सा क्षेत्र से तो धोखा करना है ही। पद्धति जो भी हो सब से महत्वपूर्ण होता है इक योग्य चिकित्स्क का होना जिसने ज्ञान , शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त किया हो अर्थात क्वालिफाइड हो। सही निदान वही कर सकता है और निर्धारित करता है किसको क्या दवा दी जानी चाहिए।

                आपको आयुर्वेदिक ईलाज उसी चिकित्स्क से ही करवाना चाहिये , एलोपैथी हो , होमियोपैथी चाहे आयुर्वेदिक प्रणाली सभी में स्नातक कोर्स होते हैं , जिसमेंचिकित्सा के बहुत सारे विषय पढ़ाये जाते हैं , आयुर्वेद हज़ारों साल पुरानी प्रणाली है मगर यहां भी , द्रव्य-गुण , रोग-निदान , काया-चिकित्सा , शल्य-चिकित्सा , बाल-रोग , इस्त्री रोग जैसे तमाम विषय हैं पढ़ने को ! मगर आज भी लोग एक चिकित्स्क में और नीम हकीम में भेद करना नहीं जानते , तभी किसी से भी अपने स्वास्थ्य के बारे राय ले लिया करते हैं। अस्पताल में काम करने वाला हर कर्मचारी चिकित्सक नहीं हो सकता , बेशक वो इक अंग है जो सहायक है चिकित्स्या करने में। दवा बेचने वाला केमिस्ट जब आपको अधकचरी जानकारी से किसी रोग पर सुझाव देता है तो उसको भले थोड़े धन का लोभ हो वो आपके स्वास्थ्य से खिलवाड़ ही करता है। मगर आप हैं कि कम्पाउंडर या नर्स तो क्या वार्ड में रख-रखाव को नियुक्त व्यक्ति को भी अपना सलाहकार बना लेते हैं। कभी सोचा है खुद अपनी जान को कितना सस्ता समझ लिया है हमने। कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि देसी दवा कोई भी बता सकता है , जो सही नहीं है। आपको नहीं मालूम आयुर्वेदिक प्रणाली को विकसित होने में हज़ारों वर्ष लगे हैं , आधुनिक प्रणाली में लैब में कुछ ही दिन में परीक्षण किया जाता है जबकि आयुर्वेद की दवायें अपने समय में चिकिस्क बहुत जोखिम उठा कर खुद पर परीक्षण करते रहे हैं। आपको हैरानी होगी कि वो जांच वो परीक्षण इतने सत्य थे कि हज़ारों साल पहले जो लिखा हुआ चरक-सुश्रुत में वो आज भी सही साबित होती हैं , जबकि आज जो बात आधुनिक लैब जांच के बाद डॉक्टर्स बताते हैं कुछ वर्ष बाद गल्त साबित होती रही हैं। कितनी दवायें सालों देते रहने के बाद प्रतबंधित की जाती रही हैं।

           आयुर्वेद कोई अवैज्ञानिक प्रणाली नहीं है , आपको मालूम है मोतिया बिंद ( कैटरेक्ट ) का जो ऑपरेशन किया जाता है वो कैसे संभव हुआ होगा , ये जानकारी भी आयुर्वेद के ग्रंथों की देन है। आज आयुर्वेद की दशा भी ईश्वर जैसी है , सब जगह लोगों ने आस्था को अपना कारोबार बना लिया है। आयुर्वेदिक दवायें बनाने वाली कम्पनियों ने भी , पंडित-मौलवी , धर्म-गुरु की तरह इसको मुनाफा कमाने को इस्तेमाल किया है फ़र्ज़ को दरकिनार कर के। उनका उदेश्य रोगों की दवायें बनाना नहीं है , उनको ऐसी दवायें बनानी हैं जो प्रचार से बेच कर तगड़ा मुनाफा कमाया जा सके। ये आयुर्वेद के साथ धोखा है , विश्वासघात है , छल है। वो ऐसी दवायें बेच करोड़पति बन गये मगर आयुर्वेद की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर। मीडिया का दखल हर जगह बढ़ गया है , सही गल्त की पहचान करना और सभी को जानकारी देना उचित है , मगर बिना विषय की जानकारी भी खुद को निर्णायक समझने की मानसिकता ने उसको मार्ग से भटका दिया है। जब अख़बार टीवी पत्रिका वाले बताने लगें कि इस रोग की ये दवा है तब वो चिकित्सा नहीं आपके जीवन से खिलवाड़ है। मगर ऐसा काम खुले आम हो रहा है जो आयुर्वेद और जनता दोनों के लिये हानिकारक है। सरकार केंद्र की हो चाहे राज्यों की सभी ने जनता के स्वास्थ्य से किया जाने वाला ये अपराध होने दिया है। आयुर्वेद के साथ तो सौतेला व्यवहार किया जाता रहा है , सरकार के बजट का मात्र तीन प्रतिशत बाकी सब चिकिस्या पद्धति को और सत्तानवे प्रतिशत एलोपैथी को आबंटित किया जाता है। ऐसे में आयुर्वेद को बढ़ावा देने की बातें और आश्वासन कोरे झूठ हैं। मुझे इक पत्रिका ने कुछ साल पहले इक पत्र लिखा था जिसमें लिखा हुआ था कि आजकल लोग आयुर्वेद की ओर आकर्षित हैं और चाहते हैं आयुर्वेदिक ईलाज कराना , संपादक जी चाहते थे कि मैं आयुर्वेद का स्नातक होने के कारण उनकी पत्रिका के लिये इक कॉलम लिखूं लोगों को रोगों की दवायें बताऊं। वो गल्त नहीं कह रहे थे कि ऐसा करने से मुझे भी नाम मिलेगा और दूर-दूर तक पहचान भी। मगर मुझे आयुर्वेदिक चिकिस्या प्रणाली का दुरूपयोग अपने लाभ के लिये करना अनुचित लगा था और मैंने इनकार कर दिया था।मैंने उनको जवाब भेजा था कि मेरे विचार से ऐसे रोगों का सही उपचार नहीं किया जा सकता , हां अगर आप चाहें तो मैं पाठकों को कुछ लेख द्वारा जागरुक कर सकता हूं ताकि उनको जानकारी हो कि ज़रूरत पड़ने पर कैसे अपना चिकित्स्क और प्रणाली का चयन करना चाहिये। खान-पान , रहन-सहन , आचार-व्यवहार में क्या बदलाव कर स्वस्थ जीवन बिता सकते हैं। ये भी कि जानकारी दी जा सकती है कि कब किस डॉक्टर के पास जाना चाहिये , लोगों को समझाया जाना चाहिये कि छोटा-बड़ा अस्पताल या डॉक्टर नहीं होता है , देखना ये है कि कब आपको किसकी आवश्यकता है। हर वह डॉक्टर अच्छा नहीं हो सकता जिसके पास भीड़ लगी हो या जिसका नाम प्रचार बहुत सुना हो , सही ईलाज के लिये ऐसा डॉक्टर होना चाहिये जो आपकी सही जांच , और आपकी समस्या को ध्यान पूर्वक सुनने को समय दे सकता हो। इक सच आपको नहीं मालूम होगा कि जिनके पास बहुत अधिक भीड़ होती है उनको अपने डायग्नोसिस पर नहीं दवाओं पर ऐतबार होता है और वे आपको कितनी ही ऐसी दवायें लिख देते हैं जिनकी ज़रूरत नहीं होती अगर उनके पास रोग को समझने और निदान करने को समय या फुर्सत होती। सही इलाज के लिये सब से ज़रूरी है चिकत्स्क की योग्यता , अनुभव और अपने काम के प्रति उचित दृष्टिकोण। मगर उन संपादक जी को मेरा सुझाव नहीं पसंद आया था , क्योंकि उनको अपने पाठकों को प्रसन्न करना था जागरूक नहीं।

               मुझे ये स्वीकार करने में बिल्कुल संकोच नहीं है कि आयुर्वेद को खुद आयुर्वेदिक प्रणाली के शिक्षित लोगों ने भी दगा दी है। कई आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज में जहां मिश्रित प्रणाली की शिक्षा दी जाती है , छात्रों को एलोपैथी और आयुर्वेदिक दोनों का ज्ञान वा जानकारी दी जाती है , वहां भी अधिक ज़ोर आधुनिक प्रणाली पर दिया जाता है। हम अपने मरीज़ों को ये नहीं समझाना चाहते कि आयुर्वेदिक दवायें अधिक सुरक्षित हैं जबकि अंग्रेजी दवाओं के दुष्प्रभाव बहुत अधिक होते हैं। कितनी बार ऐसी दवायें रोग को खत्म नहीं करती , केवल लक्षणों को मिटाती हैं। यहां किसी प्रणाली को कमतर नहीं बताया जा रहा , बेशक एलोपैथी में नये अविष्कार और अनुसंधान से कितनी जटिल समस्याओं का हल मिला है शल्य-चिकिस्या द्वारा या बहुत सारी नई दवाओं से। ज़रूरत है सभी तरह की चिकित्सा को मिल कर अपना दायित्व निभाने की , सभी को स्वास्थ्य रहने में सहयोगी होने की। इक बात समझनी होगी कि सवासौ करोड़ की आबादी वाला देश बिना अपनी देसी चिकित्सा प्रणाली को महत्व दिये सभी को स्वस्थ रखने का मकसद हासिल नहीं कर सकता।

            शायद आपको मालूम होगा कि आज भी कितने ही रोगों की आधुनिक प्रणाली में कोई दवा नहीं है। एलोपैथिक डॉक्टर भी उनके लिये आयुर्वेदिक दवायें ही लिखते हैं , पीलिया , बवासीर , पत्थरी होना , पौरुष ग्रंथि का रोग , शुक्राणुओं की कमी , महिलाओं की समस्याओं का ईलाज आयुर्वेदिक दवाओं से ही किया जाता है। इक अपराध आयुर्वेद और अन्य सभी देसी प्रणाली के चिकित्स्क करते रहे हैं , अपनी जानकारी को गोपनीय बना पीड़ी दर पीड़ी अपने पास रखना , मानव कल्याण को भुला कर। हां इक अहम बात , ये मान लेना कि केवल नाड़ी देख कर सभी रोगों का पता चल सकता है , कदापि सही नहीं है , पल्स देखना एक हिस्सा मात्र है रोगी की जांच का। अब इक चौंकाने वाली डब्लू एच ओ की रिपोर्ट , कई साल पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी थी कि भारत में ज़रूरत से पांच गुणा अधिक दवायें इस्तेमाल की जा रही हैं और वो भी अधिकतर शहरी इलाके में , गांवों तक नहीं पहुंचती वो दवायें। इक कटु सत्य ये भी कि अस्पतालों-नर्सिंगहोम्स की बढ़ती संख्या के साथ रोग और रोगी कम नहीं हो रहे अपितु अधिक बढ़ रहे हैं , ये गंभीर चिंता की बात है। हमारे यहां भेड़ चाल की बुरी आदत है , हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती , ये जानते हुए भी चमक-दमक और प्रचार से प्रभावित हो कुछ भी अपना लेते हैं।

      मुझे लगा फेसबुक पर केवल खुद की अपने मतलब की बात को छोड़ , इक सार्थक काम किया जाये , सोशल मीडिया पर सभी को आयुर्वेद और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और जहां संभव हो राय भी दी जाये।
मगर यहां भी लोग सोचते अपनी गंभीर समस्या को घर बैठे हल कर लें , जो हो नहीं सकता। ज़रा इक बात सोचना , जब आप जाते किसी डॉक्टर के पास तब क्या वो कोई एक दवा ही लिखता है ? नहीं , उसको पूरा इक नुस्खा लिखना पड़ता है आपकी समस्या को समझ कर। तब कोई एक दवा किसी भी इक रोग का पूरा उपचार कैसे हो सकती है। बेशक कुछ समस्याओं का समाधान हो सकता है उन पुराने तजुर्बों से , मगर हर बिमारी का ईलाज बिना चिकित्स्क को मिले नहीं हो सकता। आसानी कभी कठिनाई बन सकती है , याद रखना।

( आपने ये लेख पढ़ा , अपनी राय देना , और अच्छा लगा हो तो औरों को भी बताना।  नेक काम होगा ) 
 

 

मई 31, 2015

POST : 481 राष्ट्रपिता होने की निशानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      राष्ट्रपिता होने की निशानी  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

                    ( पुरानी दास्तां लो फिर याद आ गई )  

बच्चों का खेल नहीं है बच्चों के सवालों के जवाब देना । बड़े बड़े ज्ञानी लोग बच्चों के सवाल का हल नहीं खोज पाते । अपनी अज्ञानता को छुपाने को कह देते हैं , ये बच्चों की समझ की बातें नहीं हैं । मगर हमेशा ये इतना आसान नहीं होता । भले टीवी पर इक विज्ञापन दावा करता है की अमुक ब्रांड का जांगिया पहन आप असम्भव को सम्भव कर सकते हैं " बड़े आराम से " । सरकारी विज्ञापन कब से समझा रहे हैं जनता को कि  देश प्रगति कर रहा है , मगर हम क्या करें देश में भूख से लोग मरते हैं , किसान खुदकुशी करने को मज़बूर हैं , लोगों को साफ पानी तक नहीं मिलता पीने को , बच्चे आज भी पढ़ने की उम्र में मज़दूरी करने को विवश हैं , गरीबों को कहीं भी मुफ्त इलाज नहीं मिलता । सरकार उनके मरने पर बीमे की बात करती है , ज़ख्मों पर नमक छिड़क कर कहती है , लो अच्छे दिन आये हैं । लगता है मैं भावावेश में विषय से भटक गया , चलो मुद्दे की बात करते हैं । काश बाज़ार के और सरकार के विज्ञापन झूठे नहीं होते , तो हर समस्या का समाधान किया जा सकता । कल तक अगर किसी बच्चे के सवाल का जवाब नहीं दे सकते थे तो चुप रहने से काम चल जाता था । आज़ादी के बाद कितने समय  से देश में सरकारें यही करती आई हैं , लेकिन सूचना के अधिकार ने  सरकार को बहुत परेशानी में डाल रखा है ।

    लखनऊ वालों की बात ही अल्ग होती है , जब वहां रहने वाली लड़की का नाम ऐश्वर्या हो तो कहना ही क्या । दस साल की ऐश्वर्या ने देश की सरकार को दुविधा में डाल दिया है , वह भी इक सवाल पूछकर कि  किस आधार पर महत्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा मिला हुआ है । बच्ची ने सवाल पी एम ओ से पूछा था , पी एम ओ ने उसे ग्रहमंत्रालय और ग्रहमंत्रालय ने उसे राष्ट्रीय अभिलेखागार को भेज दिया था , अभिलेखागार की सहायक निदेशक जयप्रभा रवींद्रन ने जवाब भेजा की उनके पास कोई भी ऐसा दस्तावेज़ मौजूद नहीं है । अर्थात भारत सरकार को इसकी जानकारी नहीं है की महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता किस आधार पर माना जाता है । अब इससे आगे का प्रश्न बहुत ही असहज करने वाला हो सकता है । पुरानी कितनी हिट फिल्मों की कहानी पिता के नाम की , मां की अथवा माता - पिता के कातिल की तलाश को लेकर होती थी । उन फिल्मों से स्टार सुपरस्टार क्या नायक महानायक तक बन गये लोग । हमारे समाज में पिता का नाम होना बेहद ज़रूरी है , यदा कदा उसके सबूत की ज़रूरत आन पड़ती है । कभी किसी के पिता या बेटे होने पर संशय हो तो मामला संगीन हो जाता है । इक राजनेता को अदालत में घसीटा गया , डी एन ए टेस्ट करवाया गया ये साबित करने को कि  वो किसी का पिता है । अब दुनिया वाले हमसे सवाल पूछ सकते हैं की बताओ क्या सबूत है गांधी जी के राष्ट्रपिता होने का , ऐसे में हम डी एन ए टेस्ट भी नहीं करवा सकते कितने सालों  पहले स्वर्ग सिधार चुके महात्मा गांधी जी का । यहां उनकी चीज़ों का कारोबार ही होता आया है , उनके विचार सब कभी के भुला ही चुके हैं । दिखाओ कोई हो जो इक धोती में रहता हो ये देख कर की लोग नंगे बदन हैं ।

         जब भी ये सवाल खड़ा होगा साथ कितने और प्रश्न भी लायेगा , पिता के नाम के साथ जन्म की तिथि की भी बात होगी । देश आज़ाद भले 1947 में हुआ हो उसका जन्म तब नहीं हुआ था वो बहुत पहले से था , नाम बदलता भी रहा हो तब भी इतना तो तय है की देश का अस्तित्व महात्मा गांधी के जन्म लेने से पहले से था । अर्थात राष्ट्र के पिता का जन्म बाद में हुआ जबकि राष्ट्र पहले से था । बात मुर्गी और अंडे जैसी सरल नहीं है , लगता है हमने एक पुत्र को अपने ही पिता का पिता घोषित कर डाला । " चाइल्ड इस फादर ऑफ़ मैन " कहते भी हैं , लेकिन दार्शनिकता की नहीं ठोस वास्तविकता की बात है । लोग इधर नकली प्रमाण पत्र बना लेते हैं , हमें ऐसा नहीं करना है , तलाश करना है किस आधार पर उनको राष्ट्रपिता घोषित किया गया । क्या है कोई सबूत या यहां भी किसी फ़िल्मी कहानी की तरह कोई इतेफाक है जो अंत में मालूम पड़ता है । सरकार को संभल जाना चाहिये , मीडिया को भी हर किसी को भगवान घोषित करने से सबूत सामने रखना चाहिये , जो आम इंसान भी नहीं साबित होते कभी वक़्त आने पर , उनको आपने कैसे कैसे भगवान घोषित किया हुआ है , खुद आपका भगवान तो केवल पैसा ही है ना । कल कोई बच्चा अपने मां - बाप से कह सकता है , मुझे तो नहीं लगता कि आप मेरे माता-पिता हैं । 
 
 इस बीच दस साल गुज़र चुके हैं और गंगा जमुना से कितना पानी बह चुका है ऐसी कहावत व्यर्थ है बल्कि आजकल दिल्ली की हवा तक ज़हरीली हुई है पानी की स्वछता को छोड़ देना चाहिए । सरकार की सोच के बदलने की चिंता करनी चाहिए । जैसे विवाह में कुंडली मिलान करते हैं तो अधिकांश पंडित जी कन्या की राशि उसका नाम बदलने से स्वभाव बदलने की बात बताते हैं । सब जानते हैं नाम बदलने से कुछ कभी नहीं बदलता है लेकिन टोटके आज़माना हमारी परंपरा रही है । आधुनिक सरकार ने नाम बदलने में कीर्तिमान स्थापित किया है बस नामकरण करने को ही महान कार्य समझा जाने लगा है । बदलते बदलते महात्मा गांधी का नाम योजना से चतुराई से गायब किया जा रहा है ।  महत्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम का नाम बदलने से सरकार का विश्वास है सभी कुछ बदल जाएगा । सत्ता की विशेषता यही होती है कि खुद को कभी नहीं बदलती दुनिया भर को बदलने की बात करती है ।  जिनको हमेशा से महात्मा गांधी कोई नायक नहीं खलनायक लगते थे उनके पास यही विकल्प था कि गोडसे का नाम नहीं रख सकते तो गांधी को कुछ इस तरह छोटा कर दिया जाए कि लोग ढूंढना भी चाहें तो नहीं मिल सके , मगर ऐसा होता नहीं है किसी ने महात्मा गांधी को उस शिखर पर नहीं बिठाया जिस से कोई और हटा सके । नाम बदलने से क्या कभी भारत देश की तकदीर को बदल सकते हैं , बड़े नादान है जनाब अपनी बड़ी लकीर नहीं बना सकते किसी की लकीर को मिटा कर छोटा करने की कोशिश कर रहे हैं । 
 
 मनरेगा के तहत 266 तरह के काम, घर द्वार पर ही होगी रोजाना कमाई, क्या आपको है  इसकी जानकारी? - MGNREGA Works in Himachal

मई 21, 2015

POST : 480 बिटिया रानी को लिखी इक चिट्ठी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 बिटिया रानी को लिखी इक चिट्ठी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

बिटिया रानी
कभी नहीं बुलाया ऐसे तो तुझे मैंने
हां अक्सर तेरी मां बुलाती है तुझको
जाने कितने प्यारे प्यारे नामों से
पर दिल चाहता है मैं भी बुलाता
तुझको कोई ऐसा ही प्यार भरा
सम्बोधन दे कर बेटी-पिता के नाते का ।

अभी तो बीता नहीं इक महीना भी
बिदा किया तुझको बिठा कर डोली में
कितने चाव से कतने अरमानों से
हज़ारों दुआएं देकर तेरे भविष्य की
जाने कितनी खुशियों की उम्मीदों
कितने रंग बिरंगे सपनों के साथ ।

अभी तो गुज़रे हैं दिन पंद्रह ही
जब दो पल को ही सही तू घर आई थी
पगफेरे की रस्म निभाने को संग लिये
अपने जीवन साथी को अपने ससुराल के परिवार को ।

याद आती रहती हैं हम सभी को पल पल
बातें तेरी क्या बतायें कैसी कैसी
कह देती मुझे पापा आप फिर लिख दोगे
हर बात पर कोई कविता-कहानी
मुझे नहीं है सुननी
नहीं मुझे भी बेटी सुनानी ।

पर आज नींद नहीं आई मुझे रात भर
करते करते तेरे फोन का इंतज़ार
लगता है कब से नहीं हो पाई खुल के
तुझसे तेरे मेरे सबके बारे में बात
दिल करता है अभी मिलने को तुझे
बुला लूं तुझे या चला जाऊं तेरे पास ।

याद है जब भी कभी होता था कुछ भी
तेरे मन में कहने को ख़ुशी का चाहे
छोटी छोटी आये दिन की परेशानियों का
करती थी फोन पर हर इक अपनी बात
क्या क्या बता देती थी कुछ ही पल में
चाहे रही हो कितनी भी दूर घर से
यूं लगता था होती हर दिन थी मुलाकात ।

जानते हैं हम सभी खुश हो तुम बहुत
अपने जीवन में आये इस सुहाने मोड़ से
बहुत कुछ नया सजाना है जीवन में
समझना है निभाने है रिश्ते नाते सभी
नहीं खेल बचपन का गुड्डे गुड़ियों का विवाह
खिलने फूल मुस्कुराहटों के तेरे चमन में ।

तुझे नहीं मालूम आज तबीयत मेरी ज़रा
लगती है कुछ कुछ बिगड़ी हुई सी
यूं ही ख्याल आया कभी ऐसे में
मुझे प्यार से डांट देती थी तुम कितना
और अधिक की होगी लापरवाही
बदपरहेज़ी
ख्याल रखते नहीं आप अपना पापा
मुझे देनी पड़ती थी कितनी सफाई
बताता था कब से आईसक्रीम नहीं खाई ।

कहने को मन में हज़ारों हैं बातें
यही चाहता मिल के खुशियों को बांटे
तुझे बुलाना है तेरे अपने ही इस घर में
कितनी ही तेरी अपनी चीज़ें हमने
वहीं पे सजा कर रखी हैं जहां रखी तुमने
सभी कुछ वही है
तेरा था जैसा घर में
नहीं है वो रौनक जो होती बेटियों से
तरसती है छत
तेरे कदमों की आहट को
तू ही फूल हो जो खिला इस आंगन में ।

समझना वो भी जो लिख नहीं पाया
ये खत नहीं है
नहीं है पाती
मुझे याद है वो जो तुम हो गुनगुनाती
सुना तुझसे था खुद भी साथ गाया
कभी भी नहीं धूप तुमको लगे बेटी
रहे प्यार का खुशियों का तुझपे साया । 



अप्रैल 07, 2015

POST : 479 रात दिन साथ मिलकर चले किसलिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       रात दिन साथ मिलकर चले किसलिये ( ग़ज़ल ) 

                           डॉ लोक सेतिया "तनहा"

रात दिन साथ मिलकर चले किसलिये
फिर भी बढ़ते रहे फासिले किसलिये ।

उम्र भर जब अकेला था रहना हमें
फिर बनाते रहे काफिले किसलिये ।

देख कर लोग सारे ही हैरान हैं
इन बबूलों पे गुल सब खिले किसलिये ।

हर किसी को बहुत कुछ है कहना मगर
चुप सभी लोग हैं , लब सिले किसलिये ।

मिल के दोनों चलो आज सोचें ज़रा
दिल नहीं जब मिले , हम मिले किसलिये ।

रोक लीं जब किसी ने हवाएं सभी
फिर ये पर्दे सभी खुद हिले किसलिये ।

रौशनी को नहीं चाहते लोग जब
दीप "तनहा" तुम्हारे जले किसलिये । 




फ़रवरी 12, 2015

POST : 478 आम आदमी पार्टी की जीत का राज़ ( तरकश ) डा लोक सेतिया

 आम आदमी पार्टी की जीत का राज़ ( तरकश ) डा लोक सेतिया

    चलो पहले इक कहानी याद करते हैं। कोई आम आदमी नेता बन गया , मंत्री पद मिल गया , इक पुराने दोस्त ने फ़ोन किया बधाई देने को। कह दिया जब अपने शहर आना तब मिलना , मंत्री बने मित्र बोले भाई तेरे घर आना तभी होगा जब चाय पिलाने का प्रबंध करो। पुराने दोस्त ने याद दिलाया यार तुम जब भी आते थे घर तब खुद ही रसोई घर में चले जाते थे , सबको पसंद जो थी तुम्हारी बनाई हुई चाय। मंत्री बन चुके मित्र ने समझाया कि उनके पी ए से पूछ लेना कैसा प्रबंध करना है। पी ए साहब ने समझाया कि नेता जी के साथ पूरा लावलश्कर होता है , अकेले चाय नहीं पीते , और खूब साज सज्जा और खाने पीने की व्यवस्था करनी होगी। उन पुराने दोस्त ने कहा पी ए साहब अपने मंत्री जी को बता देना उनको शायद भूल हुई है ये वो मित्र हैं ही नहीं जो मैं समझा था। वो तो बिना बताये जब मन हो चला आता था , बुलाना नहीं पड़ता था। और जब भी आता था कितने ही फूल खिल जाते थे उसकी मुस्कुराहट से। ये तो कोई दूसरा ही है जिसको बुलाना तो क्या मिलने से भी डर लगने लगा है। फिर भी कहना उनको जब ये मंत्री पद नहीं रहे तब शर्माना नहीं , हम नहीं बदलेंगे कभी। शासक बनते ही लोग आम आदमी नहीं रह जाते। कहानी का अंत बाद में , पहले राज़ की बात।

                 यकीनन केजरीवाल एंड पार्टी को वो अलादीन का चिराग मिल गया है। अब जनाब केजरीवाल साहब कोई झूठे वादे थोड़ा करते हैं , ईमानदार , देश और जनता के सेवक , राजनीति को साफ सुथरा बनाने वाले नायक हैं। जो वादे किये उनको पांच साल में अवश्य ही पूरा करेंगे। ज़रा देखते हैं उनको क्या क्या काम करना है और किस रफ्तार से करना होगा। उनकी सरकार के पास पांच साल अर्थात 1825 दिन हैं। 500 नए स्कूल खोलने हैं मतलब हर 3.65 दिन में इक स्कूल , अर्थात हर चौथे दिन। 20 नए कॉलेज भी खोलने हैं मतलब हर तीन महीने में नया इक कॉलेज खुलेगा। 1500000 सी सी टी वी कैमरे भी लगाने हैं , हर 2 मिनट में इक कैमरा लगेगा। 20000  पब्लिक टॉयलेट्स बनाने हैं मतलब हर 13 मिन्ट में एक शौचालय बनेगा। झोपड़ी वालों को घर भी मिलेगा , इसका हिसाब भी लगाना है हर दिन सैंकड़ों मकान नए बनेंगे , सरकार बना कर देगी। अब इसके बजट भी आयेगा ही , बजट में बिजली आधे रेट पर , पानी मुफ्त , और वैट की दर भी कम की जाएगी।

               ये करने का एक ही तरीका मुमकिन है , केजरीवाल जी को कोई अलादीन का चिराग मिल गया है , जो हुक्म मेरे आका बोलेगा और जो वो आदेश देंगे झट कर देगा।

फ़रवरी 10, 2015

POST : 477 वेलेनटाईन डे पर विशेष , प्रेम , ईश्क , क्या होता है ( आलेख ) डा लोक सेतिया

वेलेनटाईन डे पर विशेष प्रेम क्या होता है ( आलेख ) डा लोक सेतिया

    इधर सुनते हैं प्यार , इश्क़ , मुहब्बत की बहार आई हुई है। कोई नया तरीका है ये प्यार करने का। फलां दिन फूल देना है , इस दिन चॉकलेट , उस दिन परपोज़ करना है , और किस दिन इज़हार करना है। लगता है प्यार नहीं किया कोई अनुबंध किया है बाकायदा तरीके से। कमी रह जाती है तो इतनी कि इसका कोई दस्तावेज़ नहीं लिखा जाता न कहीं उसको दर्ज ही किया जाता है , वर्ना इसको भी कारोबार ही कहते। सच कहता हूं ऐसे प्यार की बात में मैं किसी भी सच्चे प्यार करने वाले का नाम नहीं शामिल करना चाहता। अपमान होगा उनका जिनका प्यार इक इबादत था , जुनून था , इक मिसाल था। नहीं सुना किसी सच्चे आशिक़ ने उसको बेवफ़ा कहा हो जिसको खुदा समझा और प्यार किया उस से। इधर तो कसमें वादे जाने क्या क्या करते हैं। इक शायर ने लिखा था इक नज़्म में , अपनी प्रेमिका को "तू मुझे ठुकरा के जा भी सकती है , मेरे हाथ में तेरा हाथ है जंजीर नहीं "। शायर उस प्यार को प्यार नहीं मानता जो उसी को अपनी गुलाम बना कर रखना चाहता हो , उम्र भर को ही नहीं , मरने के बाद भी चाहता हो वो कब्र में भी मेरे साथ ही लेटी हो। कैसा प्यार है जो किसी को पिंजरे में बंद करना चाहता है , इक बार पिंजरे में आया तो फिर उसको कोई आज़ादी नहीं बाहर जाने की। हैरानी की नहीं ये खेद की बात है कि हर तरफ लोग किसी की बेवफ़ाई की दुहाई देते फिरते हैं। अगर जानते क्या है प्यार तो खुद अपने प्यार को यूं रुसवा नहीं करते। वो प्यार प्यार है ही नहीं जिसमें कोई शर्त हो , पाने की , प्यार खुद को समर्पित करना है , किसी को हासिल करना नहीं। अगर कोई किसी को सच्चा प्यार करता है तो वो उसकी ख़ुशी चाहेगा जिसको चाहता है , अपनी ख़ुशी , अपनी मर्ज़ी , अपना स्वार्थ तो प्यार नहीं। प्यार जान देने या जान लेने का नाम नहीं , प्यार है इक तड़प , इक बेकरारी जो कभी खत्म नहीं होती। प्यार रूहानियत की बात है जिस्म की बात तो इक इल्ज़ाम है प्यार पर इश्क़ पर। प्यार वो है जो बंदे को खुदा बना दे , जो इंसान को इंसान भी नहीं रहने दे वो और जो भी हो प्यार हर्गिज़ नहीं है।

                                    होगा किसी संत का दिन वेलेनटाईन डे , मगर प्यार का ऐसा रूप तो उस ने कभी नहीं सोचा होगा जैसा आजकल दिखाई देता है। कोई बाज़ार है , कोई कारोबार है , कोई तमाशा है प्यार , ये क्या हो गया है तथाकथित प्रेमियों को। आडंबर नहीं होता है प्यार। चलो इक प्यार का गीत , फ़िल्मी ही सही , दोहराते हैं। किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार , किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार , जीना इसी का नाम है। 

 

फ़रवरी 08, 2015

POST : 476 लेखक से बोले भगवान ( कटाक्ष ) डा लोक सेतिया

       लेखक से बोले भगवान ( कटाक्ष ) डा लोक सेतिया

        आज फिर वही बात , जब मैंने हाथ ऊपर उठाया मंदिर का घंटा बजाने को तो पता चला घंटा उतरा हुआ है। मन ही मन मुस्कुराते हुए भगवान से कहना चाहा " ऐसा लगता है तुम्हारे इस मंदिर के मालिक फिर आये हुए हैं "। जब भी वह महात्मा जी यहां पर आते हैं सभी घंटे उतार लिये जाते हैं , ताकि उनकी पूजा पाठ में बाधा न हो। ऐसे में उन दिनों मंदिर आने वाले भक्तों को बिना घंटा बजाये ही प्रार्थना करनी होती है। कई बार सोचा उन महात्मा जी से पूछा जाये कि क्या बिना घंटा बजाये भी प्रार्थना की जा सकती है मंदिरों में , और अगर की जा सकती है तब ये घंटे घड़ियाल क्यों लगाये जाते हैं। पूछना तो ये सवाल भी चाहता हूं कि अगर और भक्तों के घंटा बजाने से आपकी पूजा में बाधा पड़ती है तो क्या जब आप इससे भी अधिक शोर हवन आदि करते समय लाऊड स्पीकर का उपयोग कर करते हैं तब आस-पास रहने वालों को भी परेशानी होती है , ये क्यों नहीं सोचते। अगर बाकी लोग बिना शोर किये प्रार्थना कर सकते हैं तो आप भी बिना शोर किये पूजा-पाठ क्यों नहीं कर सकते। बार बार मेरे मन में ये प्रश्न आता है कि किसलिये महात्मा जी के आने पर सब उनकी मर्ज़ी से होने लगता है , क्या मंदिर का मालिक ईश्वर है अथवा वह महात्मा जी हैं। ये उन महात्मा जी से नहीं पूछ सकता वर्ना उनसे भी अधिक वो लोग बुरा मान जाएंगे जो उनको गुरु जी मानते हैं। इसलिये अक्सर भगवान से पूछता हूं और वो बेबस नज़र आता है , कुछ कह नहीं सकता। जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि भगवान ऐसे मंदिरों में कैद है , छटपटा रहा है।

               कुछ दिन पहले की बात है। मैं जब मंदिर गया तो देखा भगवान जिस शोकेस में कांच के दरवाज़े के पीछे चुपचाप बैठे रहते हैं उसका दरवाज़ा खुला हुआ था। मुझे लगा शायद आज मेरी आवाज़ भगवान सुन सके , कांच की दीवार के रहते हो सकता है मेरी आवाज़ उस तक नहीं पहुंच पाती हो। मैं अपनी आंखें बंद कर प्रार्थना कर रहा था कि अचानक आवाज़ सुनाई दी " हे लेखक तुम सब की व्यथा लिखते रहते हो , कभी तो मेरे हाल पर भी कुछ लिखो " मैंने चौंक कर आंखें खोली तो आस-पास कोई दिखाई नहीं दिया। तभी उस शोकेस से भगवान जी बोले , " लेखक कोई नहीं है और यहां पर , ये मैं बोल रहा हूं तुम सभी का भगवान"। मैंने कहा प्रभु आपको क्या परेशानी है , कितना बड़ा मंदिर है यह आपके लिये , कितने सुंदर गहने - कपड़े आपने पहने हुए हैं , रोज़ लोग आते हैं आपकी अर्चना करने , सुबह शाम पुजारी जी आपका भोग लगाते हैं घंटी बजा बजा कर। किस बात की कमी है आपको , कितने विशाल मंदिर बने हुए हैं हर शहर में आपके। जानते हो भगवान आपके इस मंदिर को भी और बड़ा बनाने का प्रयास किया जा रहा है , कुछ दिन पहले मंदिर में सड़क किनारे वाले फुटपाथ की पांच फुट जगह शामिल कर ली है इसको और सुंदर बनाया जा रहा है। क्या जानते हो भगवान आपकी इस सम्पति का मूल्य अब करोड़ों रूपये है बाज़ार भाव से , और तेरे करोड़ों भक्त बेघर हैं। साफ कहूं भगवान , जैसा कि तुम सभी एक हो ईश्वर अल्ला वाहेगुरु यीशू मसीह , तुम से बड़ा जमाखोर साहूकार दुनिया में दूसरा कौन हो सकता है। अकेले तेरे लिए इतना अधिक है जो और भी बढ़ता ही जाता है। अब तो ये बंद कर दो और कुछ गरीबों के लिये छोड़ दो। अगर हो सके तो इसमें से आधा ही बांट दो गरीबों में तो दुनिया में कोई बेघर , भूखा नहीं रहे।

       प्रभु कहने लगे " लेखक क्यों मज़ाक कर रहे हो , मेरे जले पर नमक छिड़कने जैसी बातें न करो तुम। मुझे तो इन लोगों ने तालों में बंद कर रखा है। तुमने देखा है मेरे प्रमुख मंदिर का जेल की सलाखों जैसा दरवाज़ा , जिस पर पुजारी जी ताला लगाये रखते हैं। क्या जुर्म किया है मैंने , जो मुझे कैद कर रखते हैं। इस शोकेस में मुझे कितनी घुटन होती है तुम क्या जानो , हाथ पैर फैलाने को जगह नहीं। ये कांच के दरवाज़े न मेरी आवाज़ बाहर जाने देते न मेरे भक्तों की फरियाद मुझे सुनाई पड़ती है। सच कहूं हम सभी देवी देवता पिंजरे में बंद पंछी की तरह छटपटाते रहते हैं "।

                  तभी किसी के क़दमों की आहट सुनाई दी और भगवान जी चुप हो गये अचानक। मुझे उनकी हालत सर्कस में बंद शेर जैसी लगने लगी , जो रिंगमास्टर के कोड़े से डर कर तमाशा दिखाता है , ताकि लोग तालियां बजायें , पैसे दें और सर्कस मालिकों का कारोबार चलता रहे। पुजारी जी आ गये थे , उन्होंने शोकेस का दरवाज़ा बंद कर ताला जड़ दिया था। मैंने पूछा पुजारी जी क्यों भगवान को तालों में बंद रखते हो , खुला रहने दिया करो , कहीं भाग तो नहीं जायेगा भगवान। पुजारी जी मुझे शक भरी नज़रों से देखने लगे और कहने लगे आप यहां माथा टेकने को आते हो या कोई और ईरादा है जो दरवाज़ा खुला छोड़ने की बात करते हो। आप जानते हो कितने कीमती गहने पहने हुए हैं इन मूर्तियों ने , कोई चुरा न ले तभी ये ताला लगाते हैं। जब तक मैं वहां से बाहर नहीं चला गया पुजारी जी की नज़रें मुझे देखती ही रहीं। तब से मैं जब भी कभी मंदिर जाता हूं तब भगवान को तालों में बंद देख कर सोचता हूं कि सर्वशक्तिमान ईश्वर भी अपने अनुयाईयों के आगे बेबस हैं। जब वो खुद ही अपनी कोई सहायता नहीं कर सकते तब मैं इक अदना सा लेखक उनकी क्या सहायता कर सकता हूं। इन तमाम बड़े बड़े साधु , महात्माओं की बात न मान कौन इक लेखक की बात मानेगा और यकीन करेगा कि उनका भगवान भी बेबस है , परेशान है।

फ़रवरी 01, 2015

POST : 475 प्यार बस प्यार है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया { वेलेनटाइन डे पर }

      प्यार बस प्यार है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

किसी सुंदर हसीना
किसी खूबसूरत नवयुवक
को गुलाबी रंग का प्रेम पत्र
लाल गुलाब का कोई फूल
देना किसी ख़ास दिन को
और आई लव यू कहकर
करना प्यार का इज़हार
क्या ऐसा ही होता है प्यार
जैसे सजता है हर साल
गली गली , शहर शहर
कोई खुला बाज़ार ।

काश कि इतना सुलभ होता
सच में प्यार मिल जाता सभी को
मगर नहीं है आसान मिलना
जीवन भर की तलाश में भी
इक ऐसा सच्चा प्यार जो
महका दे जीवन को ऐसे
इत्र की खुशबू हो जैसे
महका दे तन मन को
फूलों की महक हो जैसे ।

प्यार किसी की मुस्कान है
बस किसी की इक नज़र है
कब हुआ क्योंकर किस से
कहां होती किसी को खबर
न होता करने से ये कभी
न रुकता किसी के रोकने से
अपने बस में नहीं होता कुछ भी
दिल जान सब लगता है
नहीं कुछ भी हमारा अब
जाने कैसे हो गये पराये सब ।

इक तड़प है बेकरारी है
न साथ देती दुनिया सारी है
प्यार है ईनाम भी सज़ा भी है
है इबादत भी खता भी है
भटक रहे लोग यहां सहरा में
समझ रहे चमकती रेत को पानी ।

इक आग है इश्क़ दुनिया वालो
चांदनी मत समझना इसको
राहें हैं कांटों भरी प्यार की
लिखी जाती है आह से आंसुओं से
जो भी होती है सच्ची प्रेम कहानी ।  
 

 

जनवरी 23, 2015

POST : 474 बदलाव की बातें नहीं बदलाव चाहिए ( आलेख ) डा लोक सेतिया

 बदलाव की बातें नहीं बदलाव चाहिए ( आलेख ) डा लोक सेतिया

    चलो इक पुरानी कथा याद करते हैं , इक महात्मा जी ( सच्चे , आजकल जैसे नहीं ) किसी नगर में आये और धर्म क्या है ये समझाते रहे। थोड़े दिन बाद जब वो जाने लगे तब उनको गुरु समझने वालों ने रोकना चाहा तब वो बोले देखो तुमको सबक पढ़ा दिया है धर्म क्या है अब मुझे और लोगों को भी तो समझाना है , यही साधु का धर्म है , इक जगह नहीं रहना। ज्ञान को बांटना होता है पूरे जगत में। आप सब याद किया करना जो सबक सीखा है हर दिन। बहुत दिन बाद जब वो वापस उधर लौटे तब देखा लोग हर रोज़ रटते रहते लिखी लिखाई बातों को , ठीक वैसा जैसा इधर हम सभी करते हैं। किसी पुस्तक को तोते की तरह सुबह शाम रटना , समझना नहीं। महात्मा जी निराश हो कर बोले ये आप सभी क्या करते हैं। जो पढ़ते हो उनपर अमल बिल्कुल नहीं नज़र आता। व्यर्थ गया मेरा सारा प्रयास। सोचो ये कहानी किसलिये याद आई , क्या देखा। चलो बताता हूं।

       कल हरियाणा में प्रधानमंत्री जी ने बेटियों को बचाने की शपथ दिलाई भरी सभा में हज़ारों लोगों को। क्या ये शपथ पहली बार किसी ने दिलाई , कितनी बार खिलाई गई ऐसी कितनी कसमें , भ्र्ष्टाचार के विरुद्ध , बाल मज़दूरी , दहेज़ , जाति धर्म के भेदभाव को मिटाने को और जाने क्या क्या। नतीजा नज़र आया कभी , कुछ लोगों को इस से मतलब नहीं कुछ फर्क पड़ता है या नहीं , उनको नाम शोहरत मिलती है कि वो महान काम कर रहे हैं। आमिर खान जैसे लोग नित नये शगूफे छेड़ते हैं , आजकल शर्म का ताज पहनाने का विज्ञापन दिखाई देता है , क्या ऐसे किसी को किसी को अपमानित करने का अधिकार है। क्या आप ऐसा कर सकते हैं , नहीं ? ये भी इक अपराध है , मगर जो लोग खुद को नियम कायदे से ऊपर समझते हैं उनको इसकी परवाह कहां। केजरीवाल कोई अकेले नहीं जो समझते हैं वे जो भी करें वो सही है और जो उनको सही नहीं मानता वो गल्त। इन लोगों की परिभाषायें बदलती रहती हैं। बात हो रही थी मोदी जी की बेटी बचाओ योजना की , ब्रांड अम्बेस्डर बनाया गया माधुरी दीक्षित जी को। पूरे हरियाणा में न भारत देश में कोई और लड़की या महिला इस काबिल मिली जो ये कार्य कर सके। शायद ऐसे ही आप महिलाओं को उनके अधिकार दिलाएंगे , जिनके पास पहले सब कुछ उनकी झोली में और खैरात डालनी है , और जो खाली हैं उनकी कोई सुध ही नहीं लेनी।

           दिल्ली में चुनाव में भी यही किया गया है , किरन बेदी जी को दल में शामिल करते ही मुख्यमंत्री पद की दावेदार भी बना दिया गया। क्या भाजपा में पहले कोई और महिला इस काबिल नहीं है , बता रहे हैं ऐसा चुनाव जीतने को किया गया। क्या मोदी जी का भरोसा खत्म हो गया , उनकी लहर नहीं रही या लगा कि काठ की हांड़ी अबकी बार नहीं चढ़ेगी। इससे तो लगता है इतना बहुमत पाकर भी भाजपा को अभी आत्मविश्वास की कमी डराती है। चुनाव जीतना हारना लोकतंत्र का हिस्सा है , येन केन प्राकेण चुनाव जितना आपको वहां ला खड़ा करता है जहां जनाब केजरीवाल साहब हैं। इक केजरीवाल से इतना डरते हैं आप कि मोदी को छोड़ किरन बेदी को पतवार थमा दी।

                    लोग शायद भूले नहीं जो वादे किये थे मोदी जी ने। मुझे तो कुछ भी नहीं बदला दिखाई देता। वही तौर तरीके जो कोई और अपनाता था अब भाजपा सरकार अपना रही है। प्रचार रैलियां और विज्ञापनों का शोर। सरकारी धन का दुरूपयोग। आखिर में इक पुरानी बात , आप बीती। 1980 की बात है मैं दिल्ली में रहता था , किरन बेदी जी तिलकनगर थाने में ए सी पी थी। कोई कॉलोनी में अवैध शराब का धंधा करता था। पत्र लिखा था और किरन बेदी जी ने इक दिन समय दिया था जवाब में पत्र भेज आकर मिलने को। लगा अब बात होगी न्याय की , मगर निराशा मिली थी , मिलने पर बोली थी मुझे जाना है आप अपनी बात उन हवलदार को बता दो , जो खुद ऐसे काम करवाता था महीना लेकर। तब किसी शायर का शेर याद आया था , " तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला "। कहीं जनता को मोदी जी से भी यही न मिले और अगर दिल्ली में किरन बेदी जी मुख्यमंत्री बन गई तो उनसे भी। चेहते और नाम नहीं बदलने हमने , जो भी सही नहीं सको बदलना है। बदलाव की बातें करना सब जानते हैं , बदलाव लाना सबके बस की बात नहीं होती। 

 

जनवरी 08, 2015

POST : 473 की मैं झूठ बोलिया ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       की मैं झूठ बोलिया ( तरकश ) डा लोक सेतिया

बहुत बातें हैं मन में कई दिन से , समझ नहीं पा रहा कि कैसे लिखूं । व्यंग्य की बात नहीं है , मगर देख कर लगता है इस पर कोई हंसे या रोये । मुझे याद है पंजाबी में बोलियां डाली जाती थी , सच्चे फांसी चढ़दे वेखे झूठा मौज मनाये , लोकी कहंदे रब दी माया , मैं कहंदा अन्याय  , वे की मैं झूठ बोलिया , वे की मैं कुफ्र तोलिया । कोइना भाई कोइना । और भी बहुत हैं ऐसी बोलियां ।

    चलो मुहावरे की भाषा को छोड़ सीधे जो कहना कहता हूं । गुरु जी बने हुए हैं , करते कारोबार हैं झूठ का , लेबल बिकता है सच के नाम का । अनुयाई हैं लाखों जो देखते ही नहीं गुरु किसको बनाया हुआ है , जो खुद भटका हुआ वो सभी को रास्ता दिखाता है । कोई गीता का ज्ञान बेचता है , कोई कुरान कोई गुरुग्रंथ साहिब को अपना अधिकार समझ व्यवसाय करता नज़र आता है । सब सफल हैं , सब मालामाल हैं । बचपन में पढ़ते थे वो कहानी हाऊ मच लैंड ए मैन नीड्स । खड़े होने को दो हाथ और मरने के बाद दो गज़ ज़मीन , जानते तो सभी हैं ,फिर भी भाग रहे हैं अधिक की चाह में । जब भी जाते किसी शोक सभा में तब देखते हैं कि वहां भी किसी तथाकथित गुरु का प्रचार किया जा रहा है , कैसी विडंबना है ऐसी जगह भी किसी को लगता अपना विस्तार करने का अवसर है । बहुत दिन से इक गुरु के अनुयाई किया करते थे इक जाप , इधर इक और ने उसी की तर्ज़ पर नया जाप लिखवा लिया सुना कर अपना प्रचार पाने को । अब ये राम और कृष्ण की बात करते हैं तो लगता है मानो उनका उपहास किया जा रहा है । नगर नगर में इनका नेटवर्क बनाया हुआ है , और सच कहूं तो अज्ञानी लोग ज्ञान देने की बात करते हैं । थोड़ा ध्यान दो तो मालूम होता है ये क्या सबक पढ़ा रहे हैं , कहीं सच्चाई की बात नहीं है , सब शॉर्टकट बताते स्वर्ग जाने का । केवल माला जपने से सब मिल जाना है , चाहे जीवन भर जो भी किया हो । मुझे लगता है अगर इनकी बात सच है तब नर्क तो कोई नहीं जाता होगा , सभी तो बैकुंठ को जाते हैं ये दावा किया जाता है । सब की शोक सभा में उसका गुणगान धर्मात्मा के रूप में करते हैं , क्या ऐसे जगह जो बोला जाता वो सच है । कहीं ऐसा तो नहीं जहां सिर्फ सच होना चाहिये वहां झूठ भी भरी सभा में ज़ोर ज़ोर से बोलते हैं । जो माता-पिता को रोटी नहीं खिलाते थे वो उनके नाम पर लंगर चलाते हैं , मृत्युभोज देते हैं । उनको लगता है ये भी अवसर है खुद को दानवीर कहलाने का । अगर गौर से देखो तो अब कलयुगी गुरुओं के कलयुगी ही शिष्य हैं , जिनको अपकर्म करते कभी ईश्वर याद नहीं आया जीवन भर वो धर्म बेचने वालों के साथी बन गये हैं । मुझे लगता है अगर ये सब सही है और जितने भी आजकल के संत महात्मा , साधु सन्यासी हैं वो सच्चे हैं तब धरती पर पापी कोई भी नहीं मेरे सिवा । चलो अच्छा है मुझे पता है मरने के बाद मुझे क्या मिलेगा , नर्क कोई बुरी जगह नहीं होगी , इस दुनिया से बुरी तो कदापि नहीं । और कितना अच्छा होगा वहां कोई और नहीं होगा , न कोई अपना न कोई पराया , न कोई दोस्त न कोई दुश्मन । बाकी सभी तो स्वर्ग में चले गये होंगे , वहां मुझे कितना चैन मिलेगा , चिंतन भी कर सकूंगा बैठ कर , अपने कर्मों का फल तो मिलना ही है उसमें घबराना क्या । लेकिन फिर भी खुश रहूंगा मैं नर्क में भी क्योंकि इस दुनिया से भगवान का बनाया नर्क भी बेहतर ही होगा । की मैं झूठ बोलिया । स्वर्ग नर्क दोनों  यहीं हैं और हम खुद बनाते हैं की मैं झूठ बोलिया । 
 
सिखी उपदेशों अनुसार स्वर्ग नर्क इसी... - The Kalgidhar Trust | Facebook

दिसंबर 25, 2014

POST : 472 नेताओं और मीडिया वालों का शोर ( आलेख ) डा लोक सेतिया

  नेताओं और मीडिया वालों का शोर ( आलेख ) डा लोक सेतिया

    समझना होगा सच क्या है , वो जो टीवी पर अख़बारों में परोसा जा रहा है अथवा वो जो हमें अपने सामने दिखाई दे रहा है। स्वछता अभियान और सुसाशन अभियान क्या हैं। सालों से ऐसे जाने कितने अभियान आये और चले गये , कभी किसी ने नहीं सोचा उनका हासिल क्या रहा। क्या क्या संकल्प क्या क्या बातें होती रही , सब आडंबर को , जनता को बहलाने को। ये विचत्र बात है आजकल नेता अफ्सर हर काम जो उनको खुद करना चाहिये , कहते हैं जनता ये तुमको करना है। इनको क्या करना है ? मात्र अधिकारों का उपयोग। कर्तव्य की बात किसी को याद ही नहीं। जब तक ये लोग मानते ही नहीं कि हमने अपना फ़र्ज़ नहीं निभाया अभी तक इसलिये देश की दुर्दशा हुई है ,तब तक इनसे कर्तव्य बिभाने की आशा भी करें तो कैसे। लेकिन अब इनका ये खोटा सिक्का भी लोग समझते हैं चल जायेगा। बहुत शोर हुआ था मोदी सरकार के समय पर दफ्तर पहुंचने का , क्या हो गया सब , आज भी देख लो कोई भी अधिकारी समय पर तो क्या प्रतिदिन दफ्तर जाता भी है। अभी कुछ दिन पहले एक चैनेल के एक शो के इकीस वर्ष पूरे होने पर इक आयोजन हुआ जिसमें प्रधानमंत्री राष्ट्रपति और तमाम मंत्री लोग शामिल हुए। क्या ऐसा ज़रूरी था , क्या उनके लिये ये जनता के कामों से अधिक ज़रूरी था। सच तो ये है कि ऐसा कदापि नहीं होना चाहिये , मगर जब इन नेताओं को ये भी समझ नहीं हो कि इनको किसी के कारोबार से , अपने प्रचार से अधिक महत्व देश के प्रति अपने काम को देना चाहिये तब इनसे क्या उम्मीद रखें बदलाव की। और ये जो खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताते हैं वो खुद क्या हैं , विज्ञापनों और पैसे के लिये कुछ भी करने वाले व्योपारी। क्या क्या नहीं दिखाते , ये वही हैं जो पैसे लेकर किसी को गुरु बनाते हैं उसकी महिमा का गुणगान करते हैं और जब पोल खुलती तब उसको अपराधी भी बताते हैं , बिना ये स्वीकार किये कि खुद ये भी उसी का हिस्सा रहे हैं। ये बहस करते हैं और बताते हैं कैसे किसकी सरकार बन सकती है , बिना ये समझे कि ये उनका अधिकार क्षेत्र नहीं है। इनको ये भी लगता है कि जो ये बताते उसका असर लोगों पर इतना अधिक होता है कि इनकी मर्ज़ी से सरकार बन सकती है। ये खुद को खुदा मान बैठे लोग जानते ही नहीं कि खुद ऊपर जाने की चाह में कितना नीचे पहुंच गये हैं। अब इनका हिसाब किताब कौन पूछे। सच तो ये है कि नेता और मीडिया वाले दोनों ही अपने हित को देश हित से अधिक महत्व देते हैं। तभी ये झूठा प्रचार आडंबर दोनों को उचित लगता है।

         पहले भी ये सब होता रहा है किसी न किसी रूप में। गरीबी हटाओ , बालमज़दूरी खत्म करो , भ्र्ष्टाचार बंद करो आदि आदि। क्या बदला , कुछ भी नहीं , सब भाषणों में , सरकारी आंकड़ों में होता रहा। वही फिर दोहराया जा रहा है , टीवी अख़बार पर नहीं वास्तव में सफाई और सुशासन चाहिये। मगर क्या ऐसा होगा , ये सब तो वही है जो कितनी बार आज़माया जाता रहा है , जनता को बहलाने को। ये शोर भी जो सुन रहे हैं इक दिन ख़ामोशी में बदल जायेगा , ऐसा अंदेशा है।

                                          

दिसंबर 08, 2014

POST : 471 रिश्तों की डोरी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   रिश्तों की डोरी ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया 

कभी देखा है
धागे जब उलझ जाते हैं
बहुत कठिन हो जाता है
उनको बचाकर अलग करना
ज़रा सा खींचा कोई धागा
टूट जाता है पल भर में
इक थोड़ा सा खींचने भर से ।

जीवन में रिश्ते नाते सभी
रहते हैं इक साथ ऐसे ही
हम सभी के अपने ही हाथों में
खोना नहीं चाहते हैं किसी को भी
मगर ज़रा सी भूल से हो जाता है
अक्सर ऐसा भी हम सभी से।

कोई इक रिश्ता उलझ जाता है
अपने किसी दूसरे रिश्ते से अचानक
नहीं आता सभी को ये काम
हर रिश्ते नाते को बचाकर रखना ।

मिलना जाकर किसी दिन इक बुनकर से
देखना उसको बुनते हुए धागों से
कितने रंग वाले कैसे कैसे होते हैं
सब को अपनी जगह पर रखता
सब को उतना ही कसता जितना ज़रूरी
सभी में रखता है थोड़ी थोड़ी सी दूरी ।

कोई धागा नहीं उलझने देता वो
टूटने नहीं देता इक भी धागा
और कभी कोई टूट भी जाता है
थोड़ा अधिक खींचने से अचानक
तब उसको अलग रखता दूसरे धागों से ।

गांठ नहीं लगता है कभी बुनकर
प्यार से उसी धागे के दोनों सिरे
फिर से मिला देता उनको कैसे
कभी टूटा ही नहीं था वो जैसे ।

दोस्तो सीखना सभी बुनकर से
प्यार मुहब्बत दोस्ती वाले सब रिश्ते
कैसे रखने हैं सभी हमने संभाल कर ।

और उस से बुनना है अपना जीवन
किसी खूबसूरत चादर की तरह
जिस में मिलकर हर धागा देता है
बहुत ही सुंदर शक्ल । 
 

 

दिसंबर 01, 2014

POST : 470 खोखले लोगों का धर्म ( आलेख ) डा लोक सेतिया

      खोखले लोगों का धर्म ( आलेख ) डा लोक सेतिया 

          कभी कभी हैरानी होती है कि क्या लोग सच में नहीं देख पाते कि जहां वो धर्म या समाजसेवा की बात समझ कर जाते हैं वहां न तो धर्म ही होता है न ही कोई सच्ची समाज सेवा ही। जो हो रहा होता है वो इक छल होता है , धोखा होता है , आडंबर होता है , दुनिया को दिखाने को इक तमाशा होता है। कोई संत बन स्वर्ग को बेच रहा है ,कोई आपको सारे पापों की सज़ा से बचाने का प्रलोभन देता है उसको गुरु बनाने पर , कोई अपने इस कारोबार में आपको भी शामिल कर लेता है। अधर्म को धर्म का नाम दिया जा रहा है , ऐसा धर्म किसी का कल्याण नहीं कर सकता। इस से बेहतर है आप किसी धर्म को न मानें , कोई गुरु न बनायें , किसी ईश्वर किसी देवी देवता की उपासना न करें। बल्कि इस से नास्तिक होना लाख दर्जा बेहतर होगा। ये बात कि कोई गुरु होना ही चाहिये या किसी न किसी धर्म का मानना ही चाहिये उन्हीं लोगों ने कही और सब जगह दोहराई जिनको ऐसा करने से कुछ हासिल करना था। कभी निष्पक्ष होकर पढ़ना सभी तथाकथित धर्म ग्रंथों को और समझना वो आपको ज्ञान देना चाहते हैं या ऐसा चाहते हैं कि आप कुछ भी न सोचें न ही समझने का ही प्रयास करें कि सही क्या गल्त क्या है। धर्म वो जो आपके विवेक को जागृत करे ताकि आप अच्छे बुरे , पाप पुण्य , सच झूठ को पहचान सकें। मुझे तलाश है ऐसे धर्म की ऐसे गुरु की , नहीं नज़र आता कोई , मगर मुझे ज़रूरत भी नहीं है। मेरी अंतरात्मा मेरा गुरु है जो बताती है सब से बड़ा धर्म मानवधर्म है। ईश्वर है या नहीं है मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता , न ही इस से कि कोई अगला या पिछला जन्म होता है या नहीं। हां जाता हूं मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे , देखता रहता क्या क्या होता धर्म के नाम पर वहां और सोचता जो सर्वशक्तिमान है क्या उसका बस नहीं चलता इन पर या वो भी अपने गुणगान से खुश होता है और अपने नाम पर ये सब होता देख कर भी अनदेखा करता है। नहीं ऐसा नहीं  है भगवान को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग उसको मानें या न मानें , उसकी अराधना अर्चना पूजा करें या न करें। उसको फर्क पड़ता होगा कि लोग उसके बनाये इंसानों से प्यार करते हैं या नहीं करते। जो जीवन में सभी से प्यार मुहब्बत से नहीं रहते , सद्कर्म नहीं करते , बिना स्वार्थ कुछ भी नहीं करते , अथवा अपने स्वार्थ के लिये सही गल्त सब कुछ करते हैं उनसे ईश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता , ये सभी जानते हैं। फिर भी लोग जानकर अनजान क्यों बने हुए हैं , समझना होगा।
                   ये जो लोगों की भीड़ दिखाई देती संतों , साधुओं , धर्मस्थलों पर उनका किसी धर्म से कोई सरोकार नहीं होता है। यहां लोग चाहते हैं किसी भी तरह कुछ पाना , कोई पहचान , कोई नाम , शोहरत , कोई रुतबा या समाज में वो कहलाना जो न तो हैं न ही बन सकते हैं। जब इनको अवसर मिलता है किसी भी तरह अपना नाम पहली कतार में लाने का तब ये उसको उपयोग करते हैं अपने मन की झूठी तसल्ली के लिये कि लोग मुझे ऐसा मानते हैं , वैसा होना कदापि नहीं चाहते। इक छल है खुद से , इसको धर्म नहीं कह सकते , धर्म क्या है ये जानना समझना कौन चाहता है। खुश हैं अमुक गुरु के अमुक कार्य में प्रचार में उनका भी नाम शामिल है , इक आयोजन है समाज सेवा के नाम पर अथवा धर्म प्रचार के नाम पर उसके निमंत्रण पत्र पर उनका भी नाम लिखा हुआ है सैंकड़ों और नामों में , कभी सोचा है क्या है ये। इक खोखलापन है , जो ये शोर हर तरफ होता दिखाई देता है उसका सच यही है। खाली ढोल बज रहा है , ढोल की पोल जब खुलती है तब पता चलता उसके भीतर तो कुछ भी नहीं था। क्या झूठ कहा मैंने , सोचना। 
 

 

नवंबर 26, 2014

POST : 469 लोग बड़े बड़े मकसद वाले ( तरकश ) डा लोक सेतिया

   लोग बड़े बड़े मकसद वाले ( तरकश ) डा लोक सेतिया

          कलयुग की बात है , दिन में अंधेरी रात है। देखो धर्म बिकता है , इक डाल है दूजा हर पात है। देखो बने हैं महल कितने सन्यासियों के वास्ते , होती जाने कैसे उनपर धन दौलत की बरसात है। अब मोह माया छोड़ने के उपदेश देता कौन है , सब तरफ नज़र आती चोरों ही की बारात है। साधू बने अपराधी चेले बचाने को मिले , सब देख कर अंधे हुए नेता हों या अफ्सर बड़े। नतमस्तक सभी अपने अपने मतलब के लिये , किसको है परवाह जनता यहां कैसे जिये। लिखा हुआ किस ग्रंथ में संत बन संचय करो , भगवान को हो बेचते कैसे कहें उससे डरो। है खेल ये कैसा जो इंसानियत से खेलते ,सच की बातें ही काफी झूठ की वंदना करो। गली गली फिरते साधु बनकर भिखारी , और कुछ बनाकर डेरे बने हैं बड़े शिकारी। गीता को भी बेचते सन्यासी कहते ज्ञान है , जिनको बनाया शिष्य पर उनका कुछ और अरमान है। ये खेल बहुत टेड़ा है भाई तू न उलझना यहां , तूने नहीं समझा इसे तू बहुत नादान है। बात इतनी जान ले बड़े लोगों की बड़ी शान है। देश की राजनीति भी बन चुकी दुकान है , जो चीज़ बिकती नहीं उसी का ऊंचा दाम है। सब को बड़े लक्ष्य पाने हैं , बंगले सभी को बनाने हैं। जो जितना बड़ा पद पाता है वो उतना ही और ललचाता है। कभी नगर पार्षद बन कर भी खुश था अब सांसद होकर भी नहीं चैन आता है , दिल का करें क्या जो मंत्री बनने को ललचाता है। इधर नहीं मिला अगर उधर को भाग जाता है। कभी लाख का सपना देखता था अब करोड़पति है गरीब कहलाता है। क्या करे कोई सभी का लक्ष्य बढ़ता जाता है।

           सरकार भी छोटे लक्ष्य नहीं बनाती अब , रोटी कपड़ा मकान , शिक्षा रोज़गार की बात नहीं होती।  गरीबी की रेखा का रोना सरकारें आजकल नहीं रोती। स्वदेशीकरण को भूल कर विदेशी बाजार की बात होती है। सब कुछ विदेशी कंपनियों को सौंप कर सरकार खुद बस सोती है। आतंकवाद हो या साम्प्रदायिकता नेताओं को दोनों चर्चा को याद रहते हैं , जिनको बताया दुश्मन कभी उसी को मसीहा कहते हैं। नेता हों या अफ्सर बड़े विदेश सब को भाता है , सोना बिकता नहीं पीतल खरीद लाता है। काला धन हो या हो भ्र्ष्टाचार दोनों ही सत्ता दिलाते हैं , सरकार जब बन गई तब सच यही समझाते हैं। कालाधन कभी नहीं आयेगा जनता को क्यों भरमाते हैं। सब को मालूम है मिलकर सभी ही खाते हैं।

      जो भी बैठा है पद पर सब यही दोहराते हैं , अपने अपने को रेवड़ियां हरदम खिलाते हैं। लोकतंत्र के नाम पर होता वही तमाशा है , सब को अपने बेटे से दामाद से ही आशा है। देश की बात रहती नहीं याद है , देखलो कर रहे विदेश जा फरियाद है। परमाणु बंब और अंतरिक्ष में मंगल की बात करते हैं , ये नहीं आता नज़र लोग अभी भी भूखे मरते हैं। हर नई सरकार धन प्रचार पर लुटाती है , हम बड़े महान हैं वाले पुराने गीत दोहराती है। लो समाजवाद भी ले आया विदेशी बग्गी है , राजसी शान की लालसा सभी में जग्गी है। साईकिल हो हाथी हो चाहे लालटेन हो , है इरादा सब का कुछ लेन हो कुछ देन हो। देखो किसी के आज भी खोटे सिक्के चल गये , कुछ लोग बहती गंगा में हाथ धोने से ही रह गये। क्या क्या दिखायें आपको देखो जिधर यही बात है , रौशन हैं बड़े नगर और गांवों में अँधेरी रात है। भीख मिलती है उसे जिसकी बड़ी औकात है।

नवंबर 24, 2014

POST : 468 कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

जाने कब से बंद थे
हम खुद अपनी ही कैद में
छटपटाते रहे अब तक
रिहाई के लिये हर दिन
किया ही नहीं हमने कभी
मुक्त होने का प्रयास भी
समझते रहे अपनी कैद को
अपने लिये इक सुरक्षा कवच ।

जानते थे ये भी हम कि
जीने के लिये निकलना ही होगा
इस अनचाही कैद से इक दिन
मगर देखते रहे इक सपना कि
आयेगा कभी कोई मसीहा
मुक्त करवाने हमको
खुद अपनी ही कैद से ।

तकदीर ने शायद हमको
दिखलाया है रास्ता
बंधनमुक्त होने का
और खुद हमने थामा है
इक दूजे का हाथ
और तब नहीं है बाकी कोई निशां
अपनी निराशा और तनहाई
की खुद ही बनाई उस कैद का ।

संग संग उड़ रहे हैं हम
और खुले गगन में
चले हैं छूने प्यार में
आकाश की नई ऊंचाई को
गा रहे हैं अब गीत ख़ुशी के । 
 

 

नवंबर 20, 2014

POST : 467 वी आई पी अपराधी , आम अपराधी ( तरकश ) डा लोक सेतिया

  वी आई पी अपराधी , आम अपराधी ( तरकश ) डा लोक सेतिया

         अपराध वही होता है अपराधी अलग अलग होते हैं । सरकार हो चाहे लोग ये देख कर आचरण करते हैं कि अपराध किसने किया है । अभी हरियाणा में एक अपराधी को अदालत के सख्त आदेश के बाद जैसे पकड़ा गया वो बताता है कि सरकार या सत्ताधारी दल बदलने से भी बदलता कुछ भी नहीं । सरकार पहले इक मेडिकल बोर्ड बनाती है जो अपराधी को गंभीर रूप से बीमार घोषित करता है , जब अदालत फटकार लगाती है कि आपने बिना उसकी अनुमति या जानकारी के कोई बोर्ड कैसे बनाया तब विवश होकर अपराधी को गिरफ्तार किया जाता है और दावा किया जाता है कि सरकार ने कितना महान कार्य किया है । जो लोग सड़क पर किसी जेबकतरे को पकड़ पीट देते हैं वही लोग गंभीर अपराध करने के बावजूद किसी का बचाव इसलिये करते हैं क्योंकि वो उनका गुरु है । अब ऐसे कलयुगी गुरु कैसी शिक्षा देते हैं ये समझ लेना चाहिये , क्या सीखा आपने अपने धर्म से अपने गुरु के प्रवचनों से , यही कि पापी और अपराधी का बचाव करना । मुझे किसी भी धर्मग्रंथ में ये लिखा नहीं मिला कि अन्यायी और पापी अगर कोई अपना है तो उसको सही बताना है । मतलब साफ है ये जो लाखों करोड़ों लोग जाते हैं कहने को धर्म की बात सुनने समझने उनको भी धर्म नहीं अपनाना है , धार्मिक होने का आडंबर करना है , इक तमगा लगाना है । तभी दुकान पर किसी धर्म का नाम लिखने से ये नहीं समझना कि वहां झूठ या लूट का कारोबार नहीं होगा । इक मुखौटा है धर्म भी लोगों को अपने अपकर्म को ढकने को । मगर हम केवल सरकार पर ही दोष नहीं दे सकते , जब कोई नेता जेल जाता है तब भी उसके समर्थक यही करते हैं , जब संजय दत्त को जेल में जाना पड़ता है तब बड़ी बड़ी बातें करने वाले फिल्मों वाले उनके पक्ष में खड़े नज़र आते हैं । सरकार और पुलिस सालों तक खामोश होकर देखती रहती है धर्म के नाम पर गुंडों का गिरोह बनते , खुद सरकारें बनाती हैं रामपाल , भिंडरावाले , आसाराम , रामरहीम जैसे लोगों को । और जब ये लोग खुद सरकार को चुनौती देते हैं तब जाकर समझ आता है हमने खुद जिनको देव के नाम पर दैत्यों जैसे कर्म करने दिये वो कितने भयानक हो गये हैं । क्या लोग समझेंगे इन सब की वास्तविकता को , नहीं कभी नहीं , क्योंकि लोग जो मापदंड दूसरों के लिये निर्धारित करते हैं खुद अपने पर उनको लागू नहीं करते । ये मीडिया वाले भी हमेशा दोहरे मापदंड ही अपनाते हैं , जब किसी और के साथ होता तब तमाशाई बन जाते हैं , जब खुद पर गुज़रती तब बेहाल हो जाते हैं । पुलिस भी जब इनके साथ आम लोगों की तरह बर्ताव करती तब इनको समझ आता सच क्या है । वर्ना ये भी बड़े लोगों के अपराधों पर खबर भी ऐसे देते हैं जैसे उनको नायक साबित करते हों । शायद कोई सबक इनको भी सीखना है , कि अपराध अपराध ही होता है चाहे जो भी अपराधी हो । वी आई पी लोग अपराध करते हैं रुतबा कायम रखने को किसी की मज़ाल नहीं जो उन पर हाथ डाल सके कभी गलती से पकड़े जाते हैं तो न्याय कानून उनको मासूम ही मानता है अभी सीखा नहीं सलीका बड़े बड़े अपराध कर कैसे बेगुनाही का प्रमाण जुटाते हैं , होनहार बिरवान के होत चीकने पात । भविष्य में बहुत बड़े पद पर आसीन होंगे लगता है जैसे राजनीति में अपराध करना इक अनिवार्य सबक है ।
 
 आईपीसी के तहत आपराधिक साजिश

नवंबर 19, 2014

POST : 466 भारत का आईना ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       भारत का आईना ( तरकश ) डा लोक सेतिया

          ये कुछ अलग है , मोदी मोदी का शोर विदेशों में खूब मचा हुआ है। एन आर आई भारतीय देश का झंडा लिये या तिरंगे के रंग में रंगे परदेस में अपने देश के प्रधानमंत्री का स्वागत कर रहे हैं जोश के साथ। टिकट खरीद कर बहुत दूर चल कर मोदी जी का भाषण सुनने आ रहे हैं। अच्छा है इक उम्मीद जागी है उन लोगों में देश में कुछ बदलाव की। मगर क्या वो सच भी होगी या जैसा कितनी बार पहले भी होता रहा है ये सब हम भूल ही जायेंगे। सवाल ये है कि क्या हम ये मान बैठे हैं कि सरकार बदलने से सब बदल जायेगा , सिर्फ मोदी नाम का मसीहा सब बदल देगा या हम खुद भी अपने को बदलेंगे। क्या ये सच नहीं है कि देश का बंटाधार होता रहा और हम हमें क्या सोच कर चुपचाप तमाशाई बने रहे। क्या अन्याय का विरोध करने कभी खुद सामने आये ? क्या भ्रष्टाचार करने वालों का विरोध करना तो क्या हम उनके सामने नतमस्तक नहीं होते रहे , और क्या फिर से वो कभी नहीं दोहरायेंगे। कहीं हम आडंबर तो नहीं रच रहे कि हम देशभक्त हैं जबकि हमको अपने अपने स्वार्थ को छोड़ बाकी कुछ भी दिखाई ही नहीं देता। क्या ये लोग जो भीड़ में शामिल हैं वो खुद भी कुछ देना चाहते हैं अपने देश को या मात्र दिखावा ही करते हैं देश प्रेम का। जानता हूं देशभक्ति की परिभाषा बदल चुकी है , देश की समस्याओं पर चिंता नहीं करते अब , उनको हल करने को प्रयास नहीं करते , ये काम सरकार का है , हमें तो क्रिकेट मैच में देशभक्ति का प्रदर्शन करना है , या किसी अन्ना किसी मोदी की जयजयकार ही करनी है। ये आसान है , वो भगत सिंह वो गांधी वाली देशभक्ति आउट ऑफ़ डेट हो चुकी है। अपने जीवन देश को अर्पित करना या लोग नंगे हैं तो खुद एक धोती पहनने की बात सोचना , है कोई ऐसी देशभक्ति वाला। ज़रा सोचना क्या मोदी कभी उन लोगों में भी भाषण देने ऐसे ही बन ठन कर जायेंगे जो देश की इक तिहाई जनता बदहाल है , जिसके पास न काम है न छत है न पैसा है न साधन हैं। पीने को पानी तक को तरसती है जो , दो वक़्त रोटी जिसको सपना लगता है। क्या मोदी जी प्राथमिकता में वो लोग कहीं हैं जो सब से निचले पायदान पर हैं। सवाल फिर वही है कब तक सरकारें जिनके पास है उनको और अधिक देने को महत्व देती रहेंगी , और जिनके पास कुछ नहीं वो हाशिये पर ही रहेंगे। उस आज़ादी उस लोकतंत्र का क्या मतलब जिसमें देश में इतनी असमानता हो। अमीरों को और अमीर बनाने से ये अंतर और बढ़ता ही जाता है , क्या किसी मोदी में है साहस कि जिनके पास अम्बार लगे हैं उनसे लेकर उनको दे सके जिनके पास कुछ भी नहीं है। ये गरीबी की रेखा क्या कभी खत्म होगी।

            कभी तो सोचना होगा कितना चाहिये धनवानों को , अंबानी को टाटा को , अमिताभ को , सचिन को , और इन नेताओं को अपने लिये। क्या अपराध नहीं है मानवता के प्रति कि कुछ लोग भूख से , बिना इलाज से मरते रहें और कुछ लोगों के पास इतना धन सड़ता रहे कि उनको खुद नहीं पता हो इसका करना क्या चाहिये। ये क्या हो रहा है धर्म के नाम पर , बड़े बड़े आश्रमों में , क्या जानते भी हैं धर्म को ? संचय करना किस धर्म में सही बताया गया है , और ये जो धन संपत्ति के अंबार जमा किये बैठे हैं ये धर्मगुरु हैं। और इनके अनुयायी क्या करते हैं अपने तथाकथित गुरु का बचाव चाहे वो अपराध ही करता रहे , देश की न्याय व्यवस्था को चुनौती देने वाले धर्म क्या अधर्म के मार्ग पर नहीं चल रहे। रावण को कंस को भगवान बनाने वालो कभी तो समझो ये क्या कर रहे हो। सब से पहले सच और झूठ की पहचान करना सीखो , तब मालूम होगा धर्म क्या है , सत्य ही धर्म है , ये सब धर्मग्रंथ समझाते हैं , प्रवचन से धर्म नहीं आयेगा न ही भाषण देने सुनने से देशभक्ति। विडंबना की बात है रास्ता दिखाने वाले खुद रास्ते से भटक गये हैं।

अंत में मेरी ग़ज़ल के कुछ शेर

रास्ता अंधे सबको दिखा रहे
वो नया कीर्तिमान हैं बना रहे।

सुन रहे बहरे बड़े ध्यान से
गीत मधुर गूंगे जब गा रहे।

उनपर है सबको ऐतबार भी
झूठ को सच जो हैं बता रहे।

हक दिलाने की बात कह कर
झोंपड़ी भी उनकी हैं हटा रहे।

दाग़ चेहरे के आते नहीं नज़र
आईना झूठा है ये बता रहे। 
 

 

नवंबर 14, 2014

POST : 465 इस बदलाव का सच ( ये ज़रूर पढ़ना ) डा लोक सेतिया

    इस बदलाव का सच ( ये ज़रूर पढ़ना ) डा लोक सेतिया

                टीवी पर हर समाचार चैनेल पर धूम मची है , मोदी जी का डंका विदेश में बजने लगा है। ऑस्ट्रेलिया में हज़ारों लोग टिकट खरीद कर मोदी जी भाषण सुनेंगे। आज बाल दिवस है। मुझे याद है पिछले साल मेरे एक मित्र अपनी बेटी को मिलने गये थे वहां , जब उनकी बेटी ने कहा था कि देखो यहां कूड़े का नामोनिशान तक नहीं है , तब उनके मुंह से अचानक ये शब्द निकल गये थे "अगर भारत में कचरा न हो तो एक तिहाई आबादी तो भूखी ही मर जायेगी , उनको तो रोटी ही कूड़े से मिलती है "। ये व्यंग्य नहीं वास्तविकता है इस देश की जिसको आज तक कोई नेता कोई सरकार न देखना चाहती है न ही समझना। वास्तव में हमारी सरकार , प्रशासन और आधुनिक इंडिया में रहने वाले लोग इनको देखना तक नहीं चाहते , इनको कुछ देने की तो बात ही क्या करें।
बात दिवस पर दो ख़बरें छपी हैं अख़बारों में , एक राजस्थान की है जहां चौदह साल के स्कूल का इक बच्चा ख़ुदकुशी करते हुए पत्र लिख कर छोड़ गया है अपने अध्यापकों को सज़ा देने को , जो उसको बेरहमी से पीटते थे होमवर्क नहीं करने पर। दूसरी हिसार की है हरियाणा में जिसमें अध्यापक का अमानवीय अत्याचार की बात है , क्या यही अध्यापक न्याय की डगर पर चलना सिखा सकते हैं , मगर यहां समस्या कुछ और ही है। ये लोग शिक्षा देने को अध्यापक नहीं बने हैं , इनमें से अधिकतर आईएएस आईपीएस या कुछ और ही बनना चाहते थे जब नहीं सफल हुए तब ये नौकरी कर ली वेतन पाने को। और आजकल जिनको सरकार हो या निजि स्कूल वाले नाम मात्र को वेतन देकर रखते हैं वे तो कुंठा के शिकार रहते ही हैं। उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है। हम बात बाल दिवस की और बच्चों की कर रहे थे , उसी पर आते हैं। इक घटना रेडियो पर सुनी थी मैंने बहुत साल पहले , इक बच्चे को सज़ा देकर बंद कर दिया अध्यापक ने कमरे में , और भूल गया उसको निकालना बाहर , उस दिन गर्मी की छुट्टियां होनी थी दो महीने की। दो महीने बाद उस बच्चे का शव मिला था स्कूल के कमरे में जब छुट्टियां समाप्त हुई। पिछले साल ऐसी इक घटना घटी थी हरियाणा में , कई घंटों बाद जब देखा जाकर अभिभावकों ने तब बच्चा बेहोश था , उसको चंडीगढ़ में पी जी आई में दाखिल किया गया था , मगर उसके दिमाग पर बहुत बुरा असर हो चुका था उम्र भर को। देखते रहते हैं स्कूली बच्चों को बंधक की तरह हर सरकारी कर्यक्रम में शामिल किया जाता है , लिखा था कुछ दिन पहले ये भी जब देखा था एक अधिकारी को फोन पर सरकारी स्कूल के मुख्य अध्यापक को ये कहते कि उपायुक्त जी के आने से पहले इतने बच्चे भेजने हैं। शिक्षा का अधिकार क्या मिल गया सबको , आज चौदह साल से कम उम्र के बच्चे अख़बार बांटते हैं कपास चुनते हैं कम मज़दूरी लेकर। कितने तथाकथित समाजसेवी लोगों के घर नौकर हैं छोटे बच्चे। मेरे शहर में इक बाल भवन है जो वास्तव में अफसरों की संपत्ति है , वो जिसको चाहे उपयोग करने की इजाज़त देते हैं। शायद लोग नहीं जानते कि वास्तव में वो जगह किसी ने कभी स्कूल की लायब्रेरी बना कर दान में दी थी , जो अब सरकारी संपत्ति बन चुकी है। कभी गुरु दत्त की फिल्म का इक गीत चर्चा में था " जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं "। कितने साल हो गये हैं मगर लगता है कुछ भी बदला नहीं है। बदलेगा भी कैसे जब सरकार बदलते ही देश के हालात को बदलने की बात छोड़ सब शामिल हो जाते हैं अपने राज्य अपने शासन को विस्तार देने में। भाजपा को हरियाणा महाराष्ट्र के बाद और राज्य जीतने हैं , अब जो धर्मगुरु कानून के शिकंजे में फंसे हैं भाजपा नेता वोट बैंक की खातिर उनकी शरण में हैं , अब ऐसे में क्या उम्मीद की जा सकती है। किसी शायर का इक शेर कहीं सच न हो जाये। "तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला "।   

 

नवंबर 12, 2014

POST : 464 कब तक तमाशाओं से बहलाएंगे देश को ( सवाल - तरकश ) डा लोक सेतिया

    कब तक तमाशाओं से बहलाएंगे देश को ( सवाल - तरकश ) 

                                      डा लोक सेतिया

              भाजपा को लगता है सत्ता की सीड़ी मिल गई है , हर रोग की एक ही दवा है मोदी नाम का जाप। सब यही रट रहे हैं , देश का शासन मिला अब राज्यों का भी मिलने लगा है। ऐसे में सत्ता हासिल करना ही कहीं इक मात्र ध्येय न बन जाये , बहुत मुमकिन है। सपनों से देश की जनता को छलते आये हैं हमेशा से ही राजनेता। कहीं फिर वही कहानी इस बार भी न दोहराई जाये , संभलना ज़रूरी है। चलो देखते हैं देश की सतसठ साल में जो बर्बादी हुई है उसके पीछे कारण क्या रहे हैं। इधर देश विदेश में काले धन की और घोटालों की राशि की बहुत बातें सुनाई दी हैं , मोदी जी का अवतार काफी हद तक इसी माहौल के कारण ही संभव हो सका है। मगर क्या मोदी जी सब बदल देंगे या कम से कम बदलना चाहते हैं। कुछ सवाल पहले याद रखने हैं।
क्या देश के गरीबों की गरीबी दूर होगी ?

क्या भूख से अब लोग नहीं मरेंगे ?
क्या शिक्षा सब को एक समान मिलेगी , शिक्षा का बाज़ार बंद हो सकेगा , क्या ये कारोबार और सिर्फ मुनाफे का कारोबार नहीं बना रहेगा ?

क्या सब को स्वास्थ्य सेवा एक समान मिला करेगी , क्या चिकित्साक्षेत्र की लूट थमेगी ताकि सही इलाज संभव हो सके या सारी सुविधायें धनवानों के लिये ही आगे भी सुरक्षित रहेंगी ?

क्या नौकरी काबलियत से मिला करेगी , बिना सिफारिश बिना रिश्वत ?

क्या प्रशासन न्यायकारी बन जायेगा , पुलिस जनता की मित्र बन सकेगी , इस विभाग को सुधारा जायेगा ताकि ये जनता का दमन न करके उसको सुरक्षा देने का कर्तव्य निभा सके ?

कोई ये न कहे कि आपने देश की सब से गंभीर बिमारी भ्र्ष्टाचार की बात ही नहीं की , तो उस पर पूरी चर्चा करते हैं। किसी भी योजना का धन अगर देश की जनता को नहीं मिलकर कुछ अन्य लोगों को मिलता है जिस से देश या जनता का कोई भला नहीं होता , और ही काम पर खर्च या बर्बाद किया जाता है तब उसको घोटाला कहते हैं। शायद बहुत लोग हैरान हों कि आज़ादी के बाद से इक ऐसा घोटाला देश की और राज्यों की सभी सरकारें करती आई हैं , वो है सरकारी प्रचार के अनावश्यक विज्ञापन। उनसे किसी को कुछ नहीं मिलता , मिलता है मुट्ठी भर अखबार टीवी वालों को मुफ्त का धन और नेताओं को झूठा प्रचार भी और मीडिया को अपने प्रभाव में रखने का रास्ता भी। यकीन करें इन विज्ञापनों पर इतना धन बर्बाद किया गया है जितना देश में आज तक हुए सभी घोटालों को देश विदेश में जमा काले धन की राशि में जोड़ कर भी नहीं हुआ है। लेकिन इसको रोकने की बात भला कौन करेगा , सच बोलने वाले ये सच कभी बोलते ही नहीं , पापी पेट का सवाल जो है। अभी बात हुई है किसी ने अपने किसी कार्यक्रम में देश के प्रधानमंत्री जी को क्यों नहीं बुलाया है। मुझे लगता है देश के प्रधानमंत्री को राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ही नहीं सांसदों विधायकों और प्रशासन के बड़े अधिकारियों को मुख्य अतिथि बनने से अधिक ज़रूरी और बहुत काम करने चाहियें। मुझे याद है कुछ साल पहले हमें बाल भवन में साहित्य की मासिक सभा करने की मनाही इसलिये की गई थी कि हमने इक कवि सम्मलेन में उपायुक्त महोदय को मुख्य अतिथि नहीं बनाया था। क्या ये लोग जनता की संपत्ति को अपनी निजि जायदाद समझना छोड़ देंगे।

                       गंगा की सफाई की बात हो रही है , थोड़ी सफाई संसद की भी की जानी चाहिये। संविधान में तीन कार्यों के लिये तीन अंग बनाये गये थे , कार्यपालिका अर्थात प्रशासन का काम था देश के विकास और जनता की सुविधाओं पर आबंटित धन को इमानदारी से खर्च करना , विधायिका का काम था उसपर निगाह रखना और योजनायें बनाना बजट पारित करना , न्यायपालिका का काम था न्याय व्यवस्था कायम रखना। जिस दिन नरसिंहराव जी ने सांसदों को हर वर्ष विशेष निधि देने का प्रावधान रखा था उस दिन ही विधायिका ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर अतिक्रमण किया था जिसको तभी न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिये थी। मगर ये रोग ऐसा बढ़ता गया कि अब कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री इसको रोकने को सोच भी नहीं सकता है। कौन नहीं जानता है कि ये राशि कैसे खर्च की जाती है , हर सांसद हर विधायक को जो हिस्सा देता है उसी ठेकेदार को ठेका मिलता है। यहां के पिछले विधायक ने तो खुद टाइलों की फैक्ट्री ही लगा ली थी और पांच साल तक हर विभाग उनकी टाइलें ही चौगुने दाम पर खरीदता रहा। मोदी जी क्या ये असंवैधानिक कार्य जो भ्र्ष्टाचार का बहुत बड़ा माध्यम भी है बंद कर सकते हैं। स्वच्छता की ज़रूरत आपके अपने घर को भी है , याद है संसद में प्रवेश करते समय माथा टेका था , मंदिर की पवित्रता को बखूबी जानते हैं नरेंद्र मोदी जी। कब शुरुआत करते हैं हम भी देखना चाहते हैं।   

 

नवंबर 10, 2014

POST : 463 नेहरू से लेकर मोदी तक ( इंडिया का कड़वा सच ) डा लोक सेतिया

 नेहरू से लेकर मोदी तक ( इंडिया का कड़वा सच ) डा लोक सेतिया

                    देश को आज़ाद हुए सतसठ वर्ष हो गये मगर अभी भी कहने को विकास की बात की जाती है मगर होता क्या है ? देश का धन बर्बाद किया जाता है , क्या अंतर है नेहरू की सरकार करे इंदिरा की वाजपेयी की मनमोहन की या अब मोदी की। भूल तो नहीं गये इमरजेंसी के विज्ञापन , आपात्काल का गुणगान , फिर फील गुड का दावा , भारत निर्माण का प्रचार , हरयाणा या अन्य राज्यों का अपना अपना नंबर वन का डंका बजाना। ये सब क्या है , किसी को लोकप्रिय साबित करने के लिये देश के धन की बर्बादी। कभी किसी ने नहीं सवाल किया इस देश में आज तक का सब से बड़ा घोटाला क्या है , कैसे बतायेंगे अखबार टीवी वाले कि हम शामिल हैं इस लूट में। इनका पेट भरता ही नहीं बिना सरकारी विज्ञापनों के , ये बैसाखियां ज़रूरी हैं इनके लिये। जो खुद अपने पैरों पर चलना नहीं चाहते वो सब से तेज़ सब से आगे होने का दम भरते हैं। हैरानी होती है कोई सरकार कोई नेता ये बदलना नहीं चाहता , क्या जनता को विज्ञापनों से पता चलेगा कि सच सब बदल चुका है। अगर बदलेगा तो लोगों को दिखाई नहीं देगा , दुष्यंत कुमार ने चालीस साल पहले जो लिखा था वो आज भी सच है। " रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख्याल आया हमें , इस तरफ आती तो हम भी देखते फसले बहार "। कभी हिसाब लगाना सतसठ साल में कितने लाखों हज़ार करोड़ रुपये इस तरह विज्ञापनों पर बर्बाद किये गये , मात्र मिडिया वालों को खुश रखने और अपने या अपने बाप दादा के नाम का डंका बजाने का काम करने के लिये , लोकतंत्र के नाम पर इस से बड़ा धोखा क्या हो सकता है। अभी सफाई अभियान की बात शुरू हुई है और हर तरफ बड़े बड़े विज्ञापन सड़कों पर लग गये हर विभाग के , देखा कल यहां पैमाइश की जा रही थी सड़कों की पार्कों की ये आंकड़े बनाने को कि इतनी जगह की सफाई की गई ताकि उसका बजट दिखाया जा सके , वही कागज़ी काम। इन विभाग वालों को दिखाई नहीं देता सीवर का होल सालों से खुला पड़ा है , पानी की लाईन कब से लीक करती है , फुटपाथ कब से रोक रखा है दुकानदारों ने , विभाग वाले सालों से किराया वसूल करते आ रहे हैं गैरकानूनी ढंग से , अफ्सर के घर सब्ज़ी जाती है और सामान जाता है रोज़ मुफ्त में , कितने तथाकथित नेता हैं जो किसी दुकानदार से सामान ले जाते बिना दाम चुकाये। क्या क्या बताया जाये , फिर दुष्यंत का शेर याद आता है। "इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं , आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार "।

     योजना के नाम पर फिर वही लोग उसी तरह लूट में शामिल हैं , इक तमाशा है जनता को दिखाने को। इक काम हमेशा सरकार ने किया है हर बात का दोष लोगों पर डालने का। विज्ञापन है लोग खुले में शौच करते हैं , उनको शर्मसार किया जाता है , क्या है ये ? कौन चाहता है खुले में शौच को जाना , क्या सुविधा है सब जगह लोग जा सकें जब मज़बूरी हो , पहले आपको वो सुविधा देनी होगी , अगर नहीं जानते हैं तो बता दूं आयुर्वेद में लिखा हैं मल मूत्र आदि के वेग को रोकना जानलेवा साबित हो सकता है। जब तक सरकार खुद अपना कर्तव्य निभाना नहीं चाहती बल्कि उसका दोष जनता पर डालने का काम करती रहेगी , वास्तविकता नहीं बदलेगी। हां इक बात तो बताना भूल ही गया सरकार या अफ्सर जो करना चाहते उसके लिये पैसा बजट सब हो जाता है। जो नहीं करना उसी को लेकर रोना रोते रहते धन नहीं है , धन की बर्बादी जब तक नहीं
रूकती , जनता का कोई भला नहीं होने वाला। अगर जो मनमानी कभी कोई और करता था वही आपको भी करनी है तो नतीजा भी वही ही निकलेगा। क्या अफ्सर सेवक बन जायेंगे , नेता शासक नहीं रहेंगे ? यही देखना है।