जून 04, 2019

संविधान क्या पूर्णतया लागू है और सफल भी ( विवेचना ) डॉ लोक सेतिया

     संविधान क्या पूर्णतया लागू है और सफल भी ( विवेचना ) 

                                        डॉ लोक सेतिया 

        चर्चा की जाती है और कुछ लोग संविधान के जानकर होने का दावा करने वाले घोषणा करते हैं कोई निर्णय या अन्य कोई बात किस सीमा तक उचित है संविधान के अनुसार। मुझे बहुत सिमित जानकारी है संविधान को लेकर अधिकांश भारतीय जनता की तरह। मालूम हुआ कि संविधान सभा ने इसका बड़ा अंश 1935 के बने अंग्रेजी शासन के कानून को रखते हुए शामिल किया है और थोड़ा कुछ चौथाई भाग और देशों के संविधान से लिया गया है और बेहद कम दसवां भाग ही खुद नया विचार कर बना कर शामिल किया गया है। हम मानते हैं ये दुनिया का सबसे अच्छा संविधान है और इस में बदलाव भी होते रहे हैं। मगर शायद ही किसी ने फिर से सोचने की कोशिश की है कि अपने उद्देश्य में किस सीमा तक सफल रहा है। ईमानदारी पूर्वक चिंतन किया जाये तो लगेगा ये बनाने वालों की उम्मीदों आपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा है। राजनैतिक दलों ने इसके पालन की अनदेखी ही नहीं की बल्कि अपनी मर्ज़ी से परिभाषित करना चाहा है। कुछ मुख्य बातों को लेकर चिंतन करते हैं। 

             संविधन में लोकतंत्र की बात है किसी दलीय व्यवस्था वाले लोकतंत्र की नहीं है। जनता अपने सांसद विधायक निर्वाचित करती है जिनको अपने बीच से किसी को नेता चुनना होता है और बहुमत जिस के साथ उसको सरकार का प्रमुख बना देते हैं। मगर ये पहली ही बात बिना संविधान को बदले ही छोड़ दी गई और सांसद विधायक अपनी आज़ादी से नेता नहीं चुनते पहले से कोई आलाकमान बड़ा नेता घोषित किया जाता है। ये संसदीय प्रणाली नहीं अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली जैसा है मगर पूरी तरह से उस की नकल भी नहीं है। सबसे अजीब बात है राजनेताओं ने कई नियम अपनी सुविधा और साहूलियत को ध्यान में रख कर बना लिए बदल लिए है। विधायक निधि सांसद निधि इसी तरह की बात है क्योंकि संविधान विधायिका को कानून बनाने और बजट बनाकर उसको लागू करवाने को अधिकार देता है , व्यय खर्च का दायित्व कार्यपालिका पर सौंपता है न्याय व्यवस्था का न्यायपालिका को दिया गया है। 

      दल बदल कानून को इस तरह तलवार की तरह उपयोग किया जाता है सदन के सदस्य बंधक हैं व्हिप को मानना पड़ता है वोट अपनी सोच अनुसार नहीं दल की मर्ज़ी से देना होता है। बिना लोकलाज और शर्म के अपने लिए तमाम साधन  सुख सुविधा छीन लेने का कार्य किया गया है बगैर देश की गरीबी की दशा की परवाह किये हुए। मगर चाहे ये सभी मिलकर आपसी बंदरबांट को जो भी मनमानी करते रहें हम लोग जो वास्तव में देश के मालिक कहलाते हैं कुछ भी नहीं कर सकते हैं। कम से कम पढ़े लिखे तथाकथित बुद्धीजीवी कहलाने वालों को इसकी चर्चा अवश्य करनी चाहिए कि क्या वास्तव में हमारा संविधान सफल है। या फिर कोई भूल कोई गलती कोई जल्दबाज़ी हुई थी और अपने देश का संविधान यहां की व्यवस्था अपने अनुसार चलाने को किसी की कॉपी पेस्ट नहीं खुद अपना मौलिक बनाना उचित था। जिस तरह हमने गीता को केवल कसम उठाने को किताब बना दिया है समझने की ज़रूरत नहीं समझते हैं उसी तरह संविधान कुछ लोगों को देश और जनकल्याण की नहीं अपने स्वार्थ और सत्ता पाने का माध्यम भर बन गया है। 
 

 

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