Sunday, 31 May 2020

सच से बच झूठ बना सच ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   सच से बच झूठ बना सच ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  कोरोना से बचना है तो उसको पहचान लो क्योंकि कोरोना सच है और सभी मानते हैं सच कभी नहीं मर सकता है हमेशा ज़िंदा रहता है कभी हारता नहीं है आखिर जीत सत्य की होती है। काश कोरोना भी झूठ होता तो कभी किसी न किसी की पकड़ में आ ही जाता। आपको यहीं रहना है और कोरोना को भी सरकार ने घोषित किया है उसे देश से निकालना मुमकिन नहीं है। जिनका दावा रहा है सब मुमकिन है उनको भी नामुमकिन लगता है कोरोना को हराना भी और सत्य को पराजित करना भी। आपको सीखना है कैसे कोरोना के साथ जीना है उस से बचकर रहना है। जैसे हमेशा आप सच से इक फ़ासला बनाकर चलते हैं कोरोना से भी दूरी रखनी है हाथ नहीं मिलाना दूर से नमस्कार करना है। अब आपको कोरोना की नहीं सच की पहचान करनी है और सच को अपना दुश्मन समझना है जो बेशक कितना छोटा दिखाई देता हो कभी भी खतरा साबित हो सकता है। अमेरिका घोषित कर सकता है कि कोरोना चाईना से आया है फिर भी अपने देश से बिना पासपोर्ट वीज़ा घुसने वाले इंसानों को निकाल बाहर करता है कोरोना को हाथ से छूना भी नहीं चाहता। भारत से उसको नमस्ते का सबक ऐसा समझ आया है कि उसकी नमस्ते नमस्ते नमस्ते हो गई है। कोरोना खतरनाक है सच भी कम खतरनाक नहीं होता है। सच को फांसी पर सूली पर चढ़ाते हैं कभी ज़हर का प्याला पिलाते हैं। सदा सच बोलो। ये तीन शब्द बेहद खतरनाक हैं। जो इनको मान ले उसकी दशा खराब हो जाती है। आपको विस्तार से सच की पहचान समझा दी है कोरोना की भी पहचान यही है सच को ख़त्म नहीं किया जा सका है झूठ ने कितने जाल बिछाए हैं सच और कोरोना झूठ को पाताल से भी ढूंढ लेते हैं। सच बताओ आजकल कौन है जो सभी को अपनाता है , कोरोना ने कोई भी भेदभाव नहीं किया सारी दुनिया को अपना माना है।

झूठ का बोलबाला है झूठ खूब ऊंचे दाम बिकता है सच को कोई खरीदार नहीं मिलता है उसकी कीमत दो कौड़ी का इक धेला भी नहीं है। सच्चे फांसी चढ़दे वेखे झूठा मौज मनाये , लोकी कहंदे रब दी माया मैं कहंदा अन्याय। की मैं झूठ बोलिया की मैं कुफ्र तोलिया। झूठ सच से बचने को सच बनकर रहता है क्योंकि झूठ से बड़ा बहरूपिया कोई नहीं है। झूठ दावा करता है सबको भलाई सबका साथ सबका विकास करने का मगर ये सब मिलता झूठ के अपने कुनबे को ही है। आपको सभी कुछ हासिल हो सकता है अगर आप भी झूठ को अपना भगवान समझ उसकी आराधना कर झूठ की डगर पर चलते हैं। सच की राह चलना बहुत कठिन है। झूठ सिंहासन पर विराजमान है और सच कटघरे में खड़ा अपनी सफाई देने को विवश है उसके पास अपने सच होने का कोई सबूत कोई दस्तावेज़ नहीं है। झूठ ने अपने पर सच का लेबल लगवा रखा है और वही अदालत है वकील है न्यायाधीश भी है। सच को खुद झूठ ने गायब करवा दिया है। दुनिया के बाज़ार में खरा सच किसी के पास नहीं बचा है आधा सच आधा झूठ मिलावट वाला सभी खरीद रहे हैं। सच कभी बिकता नहीं बाज़ार में मगर सच का इक आधुनिक मॉल शहर शहर खुल गया है। झूठ बनाने वाले झूठ पर सच का लेबल लगा कर खूब मालामाल हो रहे हैं। सच को लेकर इक ग़ज़ल कही है मैंने पेश है।


                     ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा"


इस ज़माने में जीना दुश्वार सच का
अब तो होने लगा कारोबार सच का।

हर गली हर शहर में देखा है हमने
सब कहीं पर सजा है बाज़ार सच का।

ढूंढते हम रहे उसको हर जगह , पर
मिल न पाया कहीं भी दिलदार सच का।

झूठ बिकता रहा ऊंचे दाम लेकर
बिन बिका रह गया था अंबार सच का।

अब निकाला जनाज़ा सच का उन्होंने
खुद को कहते थे जो पैरोकार सच का।

कर लिया कैद सच , तहखाने में अपने
और खुद बन गया पहरेदार सच का।

सच को ज़िन्दा रखेंगे कहते थे सबको
कर रहे क़त्ल लेकिन हर बार सच का।

हो गया मौत का जब फरमान जारी
मिल गया तब हमें भी उपहार सच का।

छोड़ जाओ शहर को चुपचाप "तनहा"
छोड़ना गर नहीं तुमने प्यार सच का।

2 comments:

Meena Bhardwaj said...

सादर नमस्कार,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा मंगलवार (02-06-2020) को
"हमारे देश में मजदूर की, किस्मत हुई खोटी" (चर्चा अंक-3720)
पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

"मीना भारद्वाज"

Sudha devrani said...

झूठ बिकता रहा ऊंचे दाम लेकर
बिन बिका रह गया था अंबार सच का।
वाह!!!
बहुत सुन्दर ...लाजवाब सृजन।