Friday, 22 May 2020

आपने जो नहीं सोचा था ( दास्तां ए कोरोना ) डॉ लोक सेतिया

 आपने जो नहीं सोचा था ( दास्तां ए कोरोना ) डॉ लोक सेतिया 

क्या क्यों कैसे की बात नहीं है बात इतनी सी है इंसान अपने आप को खुदा नहीं खुदा से भी बढ़कर समझने लगा था। थोड़ा शिक्षा जानकारी और साधन क्या बना लिए समझने लगा कि जब चाहेगा कोई दुनिया भी बना लेगा। कभी चांद पर जाने की बात कभी विनाश के हथियार अणु बंब से क्या क्या जंग का साज़ो-सामान बनाने पर धन बर्बाद किया जबकि वास्तव में समाज को बनाने में इतने साधन धन दौलत का सही इस्तेमाल किया जाता तो अच्छा था। कुदरत का खेल है या खुद इंसान की किसी नासमझी और आग के साथ खेलने का नतीजा जो खुद अपने ही बनाये इक जीवाणु पर अपना बस नहीं रहा। किसी और को दोष देना आसान है मगर उस से होगा क्या , अभी भी लड़ाई झगड़े और देखने दिखाने की अहंकार की बातें। नहीं समझ आया कोई हैसियत नहीं है इंसान की पानी करा बुलबुला , अस मानव की जात , एक दिना छुप जाएगा , ज्यों तारा परभात। पल भर की हस्ती है मालूम नहीं अगला पल आखिरी होगा या अभी और कितने पल हैं पास फिर भी क्या क्या नहीं करते नफरत लूट अहंकार और नाम शोहरत ताकत पाकर ऊंचे आसमान पर ख्वाब में ऊंची उड़ानें भरते नहीं जानते कब नीचे गिरेंगे और नाम निशान नहीं बचेगा। क्या रोज़ होता नहीं है आज ही क्या पाकिस्तान में कराची में हुआ विमान हादिसा इक मिंट में सब घट गया कोई नहीं समझ सका क्या क्यों कैसे। मगर हम फिर भी अपनी ताकत और आधुनिक तरक्की को लेकर पागल हैं और जल्दी भागना है अभी बुलेट ट्रैन की बात होती है। कुदरत जिनको पंख देती है उनकी परवाज़ अकारण नहीं नाकाम होती हम इंसान ही किसी पंछी को निशाना बनाते हैं अन्यथा लाखों पंछी साथ साथ उड़ते हैं कोई दिशा निर्देश नहीं देता फिर भी उन में कोई टकराव नहीं होता है। हम आपस में देश देश से समाज आपसी मतभेद से तनाव और तकरार झगड़े टकराव के आदी बन गए हैं। 

कितनी अचरज की बात है कि आज भी लोग आपस में भिड़ते हैं राजनेता लाशों पर सत्ता की रोटियां सेंकते हैं। खुद को बड़ा अच्छा किसी को छोटा खराब साबित करने के मशगूल हैं रत्ती भर लाज शर्म नहीं है। कितनी अजीब बात है आज भी मंदिर बनाने में खुदाई से क्या मिला इसको लेकर चर्चा करते हैं। आज जो खुद बना रहे हैं विनाश का कितना सामान कल इक परमाणु बंब दुनिया को मलबे में बदल सकता है आपको धर्म क्या ये नहीं सिखाता है कि ऐसा होने से रोकना ज़रूरी है। परमाणु विस्फोट होने पर ख़ुशी जताते हैं क्या इनसे लोगों को रोटी मिलेगी स्वास्थ्य शिक्षा मिलेगी कदापि नहीं। ये सब आधुनिक विनाश का सामान बड़ी महंगी कीमत देकर मिलता है इतने सालों में यही धन देश को विकसित और गरीबी मिटाने को उपयोग किया जाना चाहिए था। पागलपन है जो हर कोई चाहता है उसके पास महल हों ढेर सारा धन हो और ताकत नाम शोहरत हो। मगर कुदरत ने ऐसा नहीं किया था उसने सबको हवा पानी धरती हरियाली बरसात से लेकर बदन में देखने को आंखें हाथ पांव सब इक समान दिए हैं ये कुछ लोगों ने औरों का हक छीना है कई तरह से तभी उनके पास ज़रूरत से अधिक है जबकि अधिकांश के पास ज़रूरत का भी नहीं। कैसा धर्म कैसी मानवता जब आप के पास इतना है कि किसी उपयोग का नहीं और आपके समाज में आपके ही देशवासी भूखे नंगे हैं। क्यों राजनेताओं को अपने खुद पर लाखों करोड़ों खर्च करते अपराधबोध नहीं होता है। जनता की सेवा का दम भरने वाले राजसी शान से ठाठ बाठ से जीते हैं। ये कोई राज धर्म नहीं है और आप राजा भी नहीं हैं सत्ता मिलने का अर्थ क्या यही है और सरकारी अधिकारी कर्मचारी दावे जो भी करते हैं वास्तव में कोई अपना काम ईमानदारी से नहीं करना चाहता लोग परेशान होकर शिकायत करते हैं तब भी कोई असर नहीं होता है। मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे जाने से कुछ हासिल नहीं होगा असली धर्म अपना कर्तव्य निभाना है। 

क्या आज भी जब कोरोना की दहशत है ये सभी बदले हैं नहीं ये आज भी अपने स्वार्थ और अभिमान से जो मर्ज़ी करते हैं जो करना चाहिए नहीं करते कोई कितना परेशान होता है। कोरोना से अधिक खतरा आप जैसे लोग हैं जो आम नागरिक की बुनियादी ज़रूरत को समस्या को जानबूझकर पूरा नहीं करते हैं। शायद विधाता बेबस है मगर उसकी लाठी बेआवाज़ होती है। अब भी सुधर जाओगे तो कोरोना से ही सही कोई सही मार्ग तो मिलेगा अपनी गलतियों को सही करने को अवसर है। हद है सरकार को ये अवसर भी लगा तो अपनी कमाई बढ़ाने का अच्छाई की राह चलने का भी समझ सकते थे। जीना है इंसान की तरह जियो मगर मौत फिर भी आनी है इक दिन हम सभी को अब मौत से घबराने से अच्छा है जब तक ज़िंदा हैं कुछ अच्छा ईमानदारी का फ़र्ज़ निभाने सबकी समस्याओं का समाधान करने सभी को उनके अधिकार देने का संकल्प लें तो मौत से दहशत नहीं होगी। हमारी अच्छाई हमेशा रहती है जीवन भर भी और मौत के बाद भी।

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