Wednesday, 27 May 2020

भगवान आपने क्यों किया ऐसा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    भगवान आपने क्यों किया ऐसा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

जीवन भर जिसका इंतज़ार था आखिर वो पल आ ही गया। मौत का इतना लंबा इंतज़ार भला कौन करता है। भगवान सामने थे अब और देरी नहीं करनी चाहिए। अभिवादन किया और बोल दिया आपको मालूम तो होगा मुझे इस क्षण का कितना इंतज़ार रहा है। भगवान कहने लगे जानता हूं सभी को मेरे दर्शन की लालसा रहती है मगर अभी मुझे चित्रगुप्त जी से आपका बही-खाता मंगवाना है। मैंने कहा भगवान क्या आपने भी भारत सरकार की तरह अपने आमदनी खर्च का विवरण को यही नाम दे दिया है। भगवान बोले नहीं नादान ये कोई बजट की बात नहीं कि आपको बीस लाख करोड़ में कुछ भी मिलना भी है या नहीं ये तो आपका हिसाब किताब है। मैंने कहा क्या देखना मुझे पता है मैंने आपके मंदिर में इक दो रूपये से अधिक दानपेटी में नहीं डाले मगर मैंने बदले में कुछ मांगा भी नहीं था। जानता था आपको लाखों करोड़ों देने वाले सोने चांदी के गहने मुकट आसन जाने क्या क्या भेंट करने वाले भक्त हैं उनकी इच्छाओं को ही पूर्ण करना आपको कठिन लगता होगा। मुझ जैसे जो सच में भक्ति का अर्थ नहीं समझता कोई भजन कीर्तन आरती नहीं गाता जिसे आपको खुश करने को गुणगान करना आपके नाम की माला जपना नहीं आता उसकी मनोकामना का कोई महत्व ही क्या होगा। हां किसी किसी दिन शायद जब हद से ज़्यादा परेशान हुआ कोई फरियाद की थी वो भी शिकायत की तरह। अब बस भी करो भगवान और दुःख दर्द नहीं सहे जाते। मगर लगा तब इतना अधिक शोर था कि तुम तक मेरी सिसकियों की आवाज़ पहुंची भी कहां होंगी। 

भगवान को अभी तक मेरा लेखा-जोखा वाला पन्ना नहीं मिला था इसलिए कहने लगे शायद ये 1951 के साल का बही खाता नहीं है अब इतना पुराना हो गया कि वर्ष साफ पढ़ने में नहीं आया और किसी साल का उठा लाया अभिलेख कक्ष से। मैंने कहा भगवान मेरा कर्मफल बाद में देखते रहना और अभी कोई सज़ा बची हो तो दे लेना कोई ना- नुकर नहीं करूंगा। मगर ज़रा अपने हिसाब पर भी निगाह डालते आपने क्यों किया ऐसा। भगवान हैरान मैंने क्या क्यों किया क्या कहना चाहते हो। मैंने कहा भगवान होना अपनी जगह इंसान होना अपनी जगह मगर नियम असूल सब पर बराबर होने चाहिएं। आपकी भगवान कहलाने की चाहत ने धरती पर क्या चलन चलाया है कि सबका जीना दुश्वार कर दिया है। भगवान अचंभित होकर बोले ये क्या माजरा है ऐसा क्या है जिसका दोष मुझी पर दे रहे हो। 

भगवान मुझे पता है आप सब जानते हैं मगर अनजान बन रहे हैं लेकिन मैं भी आपको मनवा कर रहूंगा आप को खुल कर साफ साफ कहना ज़रूरी है। आपको मालूम है धरती पर हर कोई अपना गुणगान करवाना चाहता है और जिनको किसी का गुणगान करना नहीं आता उनकी गिनती न नौ में होती है न तेरहां में ही। जाने क्या मिलता है आपको सुबह शाम अपना नाम जपवाने से आरती चालीसा कथा भजन कीर्तन सुनने से। कुछ लोगों की कमाई होती है उनको छोड़ अधिकतर को जो चाहते हैं कहां मिलता है सच तो ये है कि मिलता उनको है जिनको भगवान कभी याद ही नहीं रहता है। उनको याद ही पैसा कारोबार राजनीति या कुछ भी हर पल रहता है भगवान आपका नाम तो लोग अर्थी उठाते वक़्त याद करते हैं बस बाद में श्मशानघाट में भी चर्चा जाने क्या क्या होती है। वहाँ भी हर तरफ आपका गुणगान लिखा रहता है कोई देखता भी नहीं कोई समय बिताने को राम नाम लेने की बात कहता है जिसे सुनते नहीं लोग विवश होकर सुनना पढ़ता है। आपको इतना ही अच्छा लगता है तो अपने पास इक डीजे मंगवा लो आवाज़ जितनी चाहे ऊंची रखना कोई यहां आपको रोक नहीं सकेगा जब जहां अदालती कानून है वहां भी कोई नहीं मानता और पुलिस भी भगवान से डरती है सख्ती से रोकती नहीं जाकर विनती करती है थोड़ा लाऊड कम रखो। 

भगवान के पास कोई जवाब नहीं था देने को कुछ सोचने लगे , मैंने कहा क्यों आई बात समझ में। तभी 1951 साल का बही - खाता ढूंढ लाया कोई। खैर मैंने कहा चलो पहले मुझे जितनी सज़ाएं देनी हैं बताओ और फैसला सुनाओ तैयार हूं मैं हर सज़ा के लिए। मगर जवाब तो देना पड़ेगा आपने क्यों किया ऐसा। अब भगवान इक लंबी सांस लेकर बोले मुझे तो याद नहीं कि मैंने कब किसी को मेरा गुणगान करने को कहा था। किसी का भी किसी को अपना नाम जपने को कहना भला कितना छोटापन होगा और मुझे दुनिया वालों से कोई अपने होने नहीं होने का सबूत क्यों चाहिए। सच्ची बात तो ये है कि मुझे पहले इस बारे किसी ने क्यों नहीं सवाल किया , मैंने भी विचार नहीं किया ये तो गलत परंपरा है किसने शुरू की। लेकिन सच्ची बात तो ये है कि हमने कभी किसी के ऐसे कामों को कोई महत्व नहीं दिया है। कोई जीवन भर राम नाम की माला जपता रहे उसको यहां हिसाब केवल उन्हीं बातों का देना पड़ता है जो भलाई या बुराई उसने सभी के साथ की। भगवान का गुणगान या अपने किसी नेता अभिनेता खिलाड़ी का गुणगान उनकी अपनी गुलामी की मानसिकता के कारण है। मैंने इंसानों को अपना गुलाम कभी नहीं बनाना चाहा और भगवान ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु जीसस कोई भी नाम रटने से कुछ नहीं हासिल होता है। आस्तिकता भगवान को मानने का अर्थ है सभी से अच्छा व्यवहार करना अच्छाई सच्चाई की राह चलना। बेशक भगवान को भूल जाओ मगर इंसानियत को शराफ़त को कभी नहीं भुलाना। भगवान मुश्किल में हैं चाहे जिस किसी ने ये किया करवाया हो बही खाते में उनको ये अपने नाम लिखने को छोड़ कोई चारा नहीं बचता है। मुझे समझ आ गया अभी भगवान को अपना हिसाब ठीक करना है उसके बाद ही मुझे मेरा हिसाब किताब बताएंगे। इंतज़ार में खड़ा हूं।

Tuesday, 26 May 2020

अच्छी सच्ची जनता की नाकाबिल झूठी सरकार ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  अच्छी सच्ची जनता की नाकाबिल झूठी सरकार ( आलेख )

                                              डॉ लोक सेतिया

   ये सवाल कभी शायद खुद आपने भी अपने आप से किया हो। यूं ये सवाल दुनिया भर के लोग औरों से करते हैं। बेशक ऐसे लोगों को अपनी क़ाबलियत पर गरूर होता है और बाक़ी लोग उनको नाकाबिल लगते हैं। आज जो बात मुझे कहनी है उसका मकसद अलग है भले सब दुनिया आपको नासमझ और नादान या किसी काम का नहीं मानती हो आपको अपने को लेकर ज़रा भी दुविधा मन में नहीं रखनी चाहिए। सबसे पहले तो किसी को किसी और को जांचने परखने का अधिकार क्यों हो उनको जो खुद अपने को शायद नहीं परखना चाहते औरों को अच्छा खराब घोषित करते हैं और खुद को लेकर सोचना जानते ही नहीं। दुनिया ऐसे लोगों से भरी पड़ी है जो अपनी नज़र में हर तरह से शानदार हैं। होंगे भी मगर उनको इक बात की समझ नहीं है कि कोई भी आदमी सभी कुछ नहीं हासिल कर सकता फिर भी सभी में कुछ अच्छाई भी होती है जिसकी पहचान उनको नहीं होती है और ऐसे लोग कमियां ढूंढते हैं अच्छाई नहीं देख पाते हैं। 

   अब उस सवाल का जवाब आपको किसी को नहीं देना खुद सोचना है और समझना भी है। जिनको लेकर समझा जाता है सत्ता पाकर सब कुछ हासिल किया है और काबिल हैं सफल हैं नाम है शोहरत है। वास्तव में देखेंगे तो उन्होंने देश समाज को कुछ भी नहीं दिया होता है। जनता ने उनको भरोसा कर जनकल्याण और देश समाज की सेवा करने को निर्वाचित किया था शासक बनकर सत्ता का मनमाना उपयोग करने का अधिकार नहीं दिया था। लेकिन सत्ता की लूट जारी रही है लोग बदलते रहे हैं। हुआ करते थे कभी जो लोग इक आदर्श थे अपना तन मन धन देश समाज को अर्पण किया करते थे। आजकल खुद को गरीब परिवार का बताने वाले और गरीबी क्या है ये समझने का दम भरने वाले देश की गरीबी का उपहास करते हैं अपनी शान रहन सहन अपने तमाम ऊंचे ख्बाब जनता के धन से पूरे करते हैं। करोड़ों रूपये अपने गुणगान पर बर्बाद करते हैं। कितने झूठ बोलते हैं जिस बात को कभी अनुचित बताते थे सत्ता मिलते खुद और बढ़चढ़कर करते हैं। कोई नैतिकता कोई मर्यादा का पालन नहीं करते सत्ता और ताकत पाने को। देश सेवा जनता की सेवा भाषण तक वास्तव में अपने अपने दल अपनी संस्था संगठन या अपने ख़ास लोगों को खज़ाने की लूट की छूट देने का काम किया करते हैं। उन के चाहने वाले उनकी आलोचना नहीं पसंद करते बचाव में कहते हैं तो क्या फलां नेता को सत्ता सौंप दी जाये , अब उनको कोई नहीं समझा सकता कि सत्ता किसी दल की भी विरासत नहीं है न किसी भी परिवार की बपौती है। सवा सौ करोड़ में काबिल ईमानदार बहुत लोग मिल सकते हैं और अगर हमने देश की समाज की भलाई करनी है तो दल जाति धर्म परिवार की बात छोड़ केवल सच्चे ईमानदार लोगों को चुनना होगा जिनको आजकल के लोभी सत्ता के भूखे नेताओं की तरह लाखों करोड़ों अपने ऐशो आराम पर खर्च करना देशभक्ति नहीं लगता हो। मुझे ऐसे लोग कभी अच्छे नहीं लगते जो खुद आपने आप को महान घोषित करवाने को किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। मुझे कई साल पहले मेरे जन्म दिन पर बेटे अनुराग ने इक डायरी भेंट की थी जिस के पहले पन्ने पर लिखा था। हिंदी में अनुवाद किया है इंग्लिश में लिखा हुआ है। 

Popularity is a crime from the moment it is sought; it is only a virtue where men have it whether they will or no. 

          जॉर्ज सविले इक राजनेता के शब्द हैं।

 " शोहरत उसी पल इक गुनाह बन जाती है जब आप उसकी इच्छा रखते हैं। ये आपके उच्च नैतिकता वाले आचरण पर है कि आपको सफलता और शोहरत हासिल होती है या नहीं। "

      लेकिन अगर हमने जनता ने देश की मालिक होने के बावजूद भी खुद अपनी चाहत हासिल करने को किसी और का पैसा या सार्वजनिक धन का उपयोग नहीं किया है ये हम कर सकते हैं कभी नहीं। हम सभी साथ साथ चैन से रहते हैं आपसी मतभेद अपनी जगह। हमने अपने विरोधी या आलोचक को नुकसान पहुंचाने का काम नहीं किया है।  जबकि शासक ऐसा अधिकतर करते हैं और अपने गुणगान करने वालों को चाटुकार लोगों को बढ़ावा देते हैं जो सत्ता का अनुचित इस्तेमाल और खतरनाक है क्योंकि ऐसे अंध समर्थक कुछ भी करते देखे गए हैं। हम अपनी आलोचना को अपना अपमान नहीं समझते हैं। हम समझते हैं जब कोई कड़वा सच बोलता है निडर निष्पक्षता से विचार रखता है।  मगर शासक वर्ग को सच अखरता है सत्यमेव जयते देश का आदर्श वाक्य है। समाज की वास्तविकता को दर्शाना हर नागरिक का फ़र्ज़ है और शिक्षित हैं तो समाज को सच बताना अपना कर्तव्य समझना चाहिए । बहुत लोग हर शासक की महिमा बढ़ाई कर के बदले में अपनी आकांक्षा पूरी करते देखे हैं आजकल टीवी चैनल अख़बार यही करने लगे हैं। सत्ताधारी सरकार अपना पक्ष रखती है तमाम तरह से साधन उसके पास हैं और वो हमेशा यही बताते हैं हमने क्या क्या किया वह भी पूरा सच शायद ही बताते हैं। और जो करना चाहिए था मगर नहीं किया उस पर पर्दा डालने का काम किया जाता है। देश की जनता को वास्तविकता मालूम होनी चाहिए और सरकार जो नहीं करती वो भी पता होना चाहिए। सत्ता के लिए किसी भी तरह के हथकंडे अपनाना देश हित की बात नहीं हो सकती है। आजकल देश की राज्यों की सरकारें आये दिन अनावश्यक आयोजन करने पर सरकारी साधनों और पैसे तथा मशीनरी का दुरूपयोग करते हैं। शायद उनको याद दिलवाना चाहिए ऐसा करने पर जून 1975 में अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित किया था ये भी भष्टाचार है तब भी आज भी। अपनी बात से असहमत लोगों की भी राय का आदर करना जो नेता जानते थे उनकी तारीफ उनके विपक्षी भी करते थे। मतभेद होना लोकशाही में ज़रूरी है अन्यथा तानाशाही बन जाती है।

    इस बात को समझने को इक मिसाल देना चाहता हूं। आपने अपने घर खाना बनाने को खेत में काम करने को या किसी भी तरह कोई सेवक रखा हो तो क्या वो अपना काम करने को अपनी महानता बताएगा। वास्तव में उसे सही ढंग से और जो समझा कर नियुक्त किया था संतोषजनक कार्य नहीं करने पर आपको हक होगा आदेश देने का कि अगर सही ढंग से काम नहीं करना तो आपकी ज़रूरत नहीं है। देश से इतना तगड़ा वेतन सुविधाएं पाने के बाद भी जनता ही बदहाल हो तो ये कैसे जनसेवक कैसी कल्याणकारी सरकार है, कभी अपने मतलब की खातिर झूठ को सच बनाते हैं कभी देश समाज में नफरत फैलते हैं। सच देखा जाये तो देश की जनता अच्छी सच्ची और ईमानदार है मगर नेता सरकार अधिकारी कर्मचारी खुद अच्छा वेतन पाने के बाद भी कर्तव्य सच्ची ईमानदारी से निभाना नहीं चाहते। नागरिक को बेबस और मज़बूर करते हैं उनके सामने हाथ जोड़ अधिकार भी खैरात की तरह मांगने को। जिस देश की आधी आबादी भूखी बदहाल है उस देश का शासक अगर खुद अपने पर हर दिन लाखों खर्च करता है करोड़ों रूपये व्यर्थ के आयोजन आडंबर और अपनी शानो-शौकत पर बर्बाद करता है तो उसे मतलबी और संवेदनारहित ही समझा जाएगा। और ऐसे मुखिया के नीचे के लोग भी उसकी तरह मनमानी करेंगे ही।




Monday, 25 May 2020

ज़िंदगी को तबाह कर बैठे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

    ज़िंदगी को तबाह कर बैठे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 
ज़िंदगी को तबाह कर बैठे 
फिर वही हम गुनाह कर बैठे। 

कर लिया ऐतबार गैरों का 
पास था सब फ़नाह कर बैठे। 

सब चले राह उस पुरानी पर 
हम नई अपनी राह कर बैठे। 

जब हक़ीक़त खुली कहानी की 
आह भर लोग वाह कर बैठे। 

हम नहीं जानते मुहब्बत क्या 
बेवफ़ा फिर भी चाह कर बैठे। 

हम नहीं बन सके किसी के पर
इक तुझी पर विसाह कर बैठे। 

आज वादे सभी भुला "तनहा"
याद कर उसको आह कर बैठे।

ज़िंदगी को फ़नाह कर बैठे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    ज़िंदगी को फ़नाह कर बैठे  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

     कैसे नादान लोग हैं ज़िंदगी से मौत का खेल खेलते हैं। मौत का कारोबार करते हैं मौत का सामान बना रखा है और उसी पर घमंड करते हैं इतराते हैं धमकाते हैं मौत का बाज़ार सजाते हैं। जंग का साज़ो-सामान जंगी जहाज़ हथियार बेच कर अर्थव्यस्था को मज़बूत बनाते हैं। ऐसे समझदार औरों के घर आग लगाते हैं और दूर से खड़े देखते हैं मंद मंद मुस्कुराते हैं। धंधे की भाषा समझते हैं मुनाफ़े वाली दोस्ती बनाते हैं जब तक फ़ायदा नज़र आये दोस्ती निभाते हैं मतलब निकलते ही पतली गली से निकल जाते हैं। उल्लू बनाते हैं कभी हाथ मिलाते हैं कभी हाथ मरोड़ जाते हैं। मौत का व्यौपार करने वाले दो चार नहीं हैं असंख्य लोग हैं जो सस्ते दाम मौत बेचते हैं ज़िंदगी नाम देकर। मौत का कारोबार करने वाले इंसानियत मानवाधिकार और बीच बचाव बिचौलिया का उपयोग कर मसीहाई भी करते हैं। तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना की तरह मगर क़ातिल भी खुद गवाही भी खुद और फैसला भी खुद करने वाले जब न्याय करने का काम करते हैं तो कमाल करते हैं। उनका इंसाफ यही होता है कि जिसका क़त्ल हुआ वही खुद अपना क़ातिल भी था। किनारे पर खड़े होकर डूबती हुई कश्तियों का तमाशा देखने वाले भी कभी मझधार में फंसते हैं तो नाखुदा को ही ख़ुदा कहते हैं।

    मौत का खेल सर्कस में भी दिखाया जाता था इक कुंवे में मोटरसाईकिल चलाने का नज़ारा लोग देखने को दिल थाम कर बैठते थे। मौत का सामान बेचने वालों में भी मुकाबला होता रहता है बस यही झगड़ा है। कहते हैं कि मुहब्बत और जंग में कुछ भी अनुचित नहीं होता है लेकिन अब मगरमच्छ आंसू बहा रहा है ये नो बॉल है जिस पर उसको बाहर होना पड़ा है। सभी खिलाड़ी जिसे नो बॉल साबित करने लगे हैं उस बॉल को किसने किधर डाला अभी रहस्य बना हुआ है ये बाउंसर है सर से ऊपर थी। कौन रोता है किसी और की खातिर ए दोस्त , सबको अपनी ही किसी बात  को-रोना-आया। अब आंसू कौन पौंछे सभी का अपना अपना कोई न कोई रोना है। कोई अंपायर नहीं जिसे सभी सरपंच समझते हों जिसका निर्णय अंतिम समझा जाये हर कोई किसी न किसी की तरफ का हो चुका है। ऊपरवाला कब से दुनिया को उसके हाल पर छोड़ चुका है , जैसे कोई पिता अपनी संतान से तंग आकर घोषणा कर देता है ये जो भी करेगा इसकी ज़िम्मेदारी होगी मेरा इस से कोई मतलब नहीं है ये औलाद मेरे कहने से बाहर है। जब लोग बाप बदलने लगे बाप को गधा गधे को बाप बनाने बताने लगे तो वो क्या करता। अब नहीं सुनता हमारी चीख पुकार उसे समझ आ गया है ये लोग मतलबी हैं मतलब निकलते बदल जाएंगे।

           कैक्टस आंगन में लगाने लगे थे जाने क्यों कांटे दिल लुभाने लगे थे। मिले न फूल तो कांटों से दोस्ती कर ली गीत गाने लगे थे फूलों से दामन बचाने लगे थे। फूल बाज़ार में बिकने लगे थे कलियों को भी मसलने के दिन आने लगे थे। कोई शायर कहने लगा था , " ज़िंदगी की तल्खियां अब कौन सी मंज़िल पे हैं , इस से अंदाज़ा लगा लो ज़हर महंगा हो गया। " ज़हर के दाम बढ़ने लगे तो लोग ज़हर का कारोबार करने लगे फिर इक दिन ये भी हुआ कि शायर हैरान होकर कहने लगा , " ज़िंदगी अब बता कहां जाएं , ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं।    " शायर कृष्ण बिहारी नूर नहीं जानते थे जो राहत इंदौरी कब के कह चुके थे। " मौत का ज़हर है फ़िज़ाओं में , अब कहां जा के सांस ली जाये। दोस्ती जब किसी से की जाये , दुश्मनों की भी राय ली जाये। " कुछ नासमझ लोग कवि शायर ज़िंदगी और दर्द की किताब लिए फिरते रहे लेकिन कोई ज़िंदगी का ख़रीदार नहीं मिला ज़िंदगी से सभी लोग दूर भागते रहे और मौत इतनी खूबसूरत लगती थी कि सभी उसी से रिश्ते निभाते रहे। मौत की कविता सबको पसंद आई हंसते मुस्कुराते गुनगुनाते रहे। मौत बेचते रहे मौत को घर बुलाते रहे ज़िंदगी से नज़रें चुराते रहे। सच कड़वा लगा नहीं अच्छा समझा झूठ का ज़हर पीते पिलाते रहे , झूठ को खुदा तक बनाते रहे।

 इक ऐसी आंधी चली सब ऊंचे ऊंचे पेड़ों के जंगल तिनकों की तरह उड़ने लगे। बचाओ बचाओ का हाहाकार चहुंओर सुनाई देने लगा है। आग ही आग धुंवा ही धुंवा दुनिया के आकाश पर मौत के बदल मंडरा रहे हैं। सभी अपने अपने निशाने साधने लगे हैं खुद को पीड़ित साबित करने और किसी को मुजरिम ठहराने लगे हैं। आजकल लोग चांद पर बस्ती बनाने लगे हैं सितारों का जहां बसाने के सपने दिखाने लगे हैं। खण्हर हो चुकी हैं विरासत की इमारतें उन्हें मिट्टी में मिलाने लगे हैं उनको पुरानी बुनियाद लगती बेकार है बिना बुनियाद के महल बनाने लगे हैं दरो - दीवार थरथराने लगे हैं। ज़मीं को छोड़ कर आसमान पर आशियाने सजाने लगे हैं हवा में बड़ी बड़ी बातें बनाने लगे हैं। बुलेट से तेज़ रेलगाड़ी लाने लगे हैं क्या क्या सपने दिखाने लगे हैं। अच्छे दिन के मतलब अब समझ आने लगे हैं। शायद भूल से या भुलावा देने को उल्टा कहा था , अच्छे दिन आने वाले हैं , कहना चाहिए था अच्छे दिन जाने वाले हैं। हर कोई आजकल कहता है वो कितने अच्छे दिन थे काश फिर से वापस आ जाएं। कोई लौटा से मेरे बीते हुए दिन , बीते हुए दिन वो मेरे प्यारे पल छिन्न। गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दोबारा , हाफ़िज़ खुदा तुम्हारा। मगर अब खुदा हाफ़िज़ शब्द भी काम नहीं आता खुदा को खुदा नहीं समझा किस किस को खुदा बना डाला है। आखिर में इक पुरानी भूली हुई ग़ज़ल का मतला याद आया है।

        ज़िंदगी को फ़नाह कर बैठे  , हम ये कैसा गुनाह कर बैठे।

  देख तेरे इंसान की हालत क्या हो गई भगवान , कितना बदल गया इंसान कितना बदल गया इंसान। 


                                   अब भी बात नहीं समझ आई।

Sunday, 24 May 2020

ताकि सनद रहे को-रो-ना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     ताकि सनद रहे को-रो-ना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

अभी आपको न अपना महत्व पता है न इस कालखंड के महत्व को लेकर कुछ भी सोचा होगा। मगर आने वाले पचास सालों के बाद जब हम में से बहुत लोग नहीं होंगे तब शायद इक दिन कोरोना के नाम किया जाना संभव है। तब इतिहासकार कथाकार कविता ग़ज़ल लिखने वाले जब लॉक डाउन की चर्चा करेंगे तब ये भी लिखा जाएगा कितनी बार देश की जनता को अपने घर में बंद रहने को कहा गया था। जिनको घर में नज़रबंद होने का अनुभव नहीं क्योंकि इस से पहले ख़ास लोगों को ही उनके घर में कैद रहने की सज़ा मिलती थी उनको समझ आएगा बंधन बंधन ही होता है। आज़ादी से पहले विदेशी सरकार भी अनगिनत लोगों को कैद में डालती थी और उन के नाम दर्ज हैं इतिहास के पन्नों में। आपात्काल में जिनको जेल हुई बाद में उनको ईनामात भी मिले और सत्ता की भागीदारी भी। ऐसा भी हुआ कि 35 - 40 साल बाद किसी ने सत्ता मिलने के बाद जो भी उनके साथ जेल में थे उनको पेंशन देने का काम भी किया। कहते हैं कुछ लोगों ने आज़ादी से पहले किसी और जुर्म में कैद की सज़ा पाई थी मगर दस्तावेज़ बनवा कर कितने साल सरकार से पेंशन और सुविधाएं हासिल करते रहे ये घोषणा कर के कि उनको आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने के कारण सज़ा मिली थी। असली लोग रह गए उनको बदले में कुछ भी मांगना अच्छा नहीं लगा और समझदार या चतुर लोग बहती गंगा में डुबकियां लगाते रहे। आप के बाद आपके वारिस भी हकदार हो सकते है इसलिए आपको अभी इक शपथपत्र पंजीकृत करवा या नोटरी से सत्यापित करवा रख देना चाहिए ताकि समय और ज़रूरत पर काम आये , ऐसे दस्तावेज़ के आखिर में यही शब्द लिखने ज़रूरी हैं कि ये लिख दिया है ताकि सनद रहे। आप को-रो-ना कालखंड के साक्षी हैं आपका नाम दर्ज होना ज़रूरी है।

  अब मुद्दे की बात करते हैं सोचो क्योंकि सोचने पर कोई रोक नहीं है आप को घर से निकलने पर समय की और कितनी तरह की पाबंदी लगाई जा सकती हैं सरकार आपको सोचने से नहीं रोक सकती है। हालांकि हर सरकार की मंशा यही होती है कि लोग कुछ भी सोचें विचारें नहीं। फिर भी सरकार कुछ भी कर ले चाहे आपको सोचना भी मना हो तब भी आपने सोचा या नहीं सरकार नहीं साबित कर सकती है। सरकार चाहती है आप कोरोना को लेकर जितना मर्ज़ी सोचो मगर सरकार का आदेश क्या है क्यों है क्या सही है क्या सही नहीं है बिल्कुल भी नहीं सोचो। हां मुझे आपको कहना है कि सोचो , कभी दस बीस तीस साल बाद कोई शासक या कोई अदालत आदेश जारी कर सकती है कि कोरोना के समय में जिन जिनको अनावश्यक परेशानी हुई घर में बंद रहना पड़ा उनको कोई मुआवज़ा मिलना चाहिए। आपको साबित करना पड़ सकता है कि आप कितने दिन किस जगह बंद रहे थे। जो मज़दूर मीलों पैदल चलकर अपने घरों को वापस गये उनको भी सरकार को हर्ज़ाना भरना पड़ेगा। सरकार ने बाकयदा घोषित किया है कि हम सभी कोरोना से जंग लड़ रहे हैं अब भले आपको कोरोना को हराने को घर में बंद रहना पड़ा है आपने भी लड़ाई में किसी सैनिक की तरह भागीदारी निभाई है और कभी आपको भी पेंशन पाने का हक मिल सकता है। इतना ही नहीं जो लोग कोरोना रोग से पीड़ित होने के बाद ठीक हुए कोरोना को हराने का श्रेय उनको अवश्य मिलना चाहिए और उनको इस साहस पूर्ण कार्य के लिए मुमकिन है ईनाम पुरुस्कार के साथ कोई सांसद या विधायक बनने की योग्यता समझा जाये। आपकी जानकारी के लिए आज ऐसे कितने लोग सत्ता के बड़े पदों पर इसी योग्यता के कारण हैं कि उनको 19 महीने जेल या घर में नज़रबंद रहना पड़ा था। किसी किसी को लेकर संशय भी है कि जब वो जेल में थे या कहीं छुपे हुए थे तब उन्होंने असंभव को संभव कैसे किया था।

आप को दिखाने को मेरे पास कोई सबूत नहीं है कोई दस्तावेज़ नहीं है कि मैंने इमरजेंसी में भी खुलकर निडरता से सच लिखने का साहस किया था। मेरे पास आकर जो लोग छुपकर रहे आज सत्ता में हैं मगर उनकी तरह मैंने किसी संगठन से राजनीतिक दल से रिश्ता नहीं रखा था। हां जो आजकल शासक हैं मुझे समझाते थे सच मत कहा करो कोई सरकार को जानकारी देकर पकड़वा देगा। ऐसा कुछ तो नहीं हुआ मगर फिर भी जनहित की बात लिखने पर पुलिस थाने जाना पड़ा था सफाई देने को नहीं वास्तविकता समझाने को। खैर उन दिनों सरकारी अधिकारी भी असलियत को जानकर आदर सहित और अपनी भूल की क्षमा मांग कर बात को खत्म कर देते थे। अख़बार में लिखने को अपराध नहीं समझते थे। जैसे आज़ादी की जंग में जेल जाने वालों ने बदले में कुछ पाना नहीं चाहा था मैंने भी चालीस साल से अधिक नियमित लेखन के बदले कोई नाम शोहरत या कोई और विशेषाधिकार नहीं चाहा है। कुछ अख़बार में कॉलम लिखने वाले बाद में अपने काम को सीढ़ी बनाकर बहुत ऊंचे पहुंचे भी थे। आपको ये ध्यान दिलवा रहा हूं कि मेरी तरह नासमझी मत करना अपने आधार कार्ड पैन नंबर कार्ड की तरह इक दस्तावेज़ बनवा लेना इस को साबित करने को कि हम भी कोरोना के रोगी नहीं थे मगर कोरोना के नाम पर सज़ा पाई बंधन में रहे या अकारण आपकी आज़ादी और मौलिक अधिकार छीने गए। आजकल जो सत्तासीन हैं उनकी यही शिकायत है इमरजेंसी में सबके मौलिक अधिकार छीन लिए थे शासन करने वाले ने। तब उनके इस कदम को भी अनुशासन पर्व नाम दिया था संत विनोबा भावे जी ने। क्या पता उसी तरह आज जिस कदम को अच्छा और ज़रूरी घोषित किया जा रहा है और उचित मानते हैं इस कालखंड के बीतने के बाद उल्टा समझा जाये और जिनको भी आज़ादी से वंचित होना पड़ा उनको मुआवज़ा या पेंशन मिलने का निर्णय हो।

मगर जब ऐसा हो तब आपको इक बात याद रखनी चाहिए कि ये सलाह किसी ज्योतिषी ने या वकील ने आपको नहीं दी थी इस लेखक ने आपको चेताया था कि लिख कर रखना ताकि सनद रहे। नहीं नहीं मुझे कोई कमीशन नहीं चाहिए बस दिल से धन्यवाद करना और ये भी सोचना मेरी रचना कितनी काम की और सार्थक होती थी जिसे कभी आपने फालतू समझने की गलती की हो।

सत्ता का हम्माम सभी एक समान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   सत्ता का हम्माम सभी एक समान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   हमारे ही देश की नहीं दुनिया भर की आम जनता की तकदीर यही है। उसको चाहत होती है नायक की मगर नसीब में ख़लनायक मिलना लिखा है। शराफ़त ईमानदारी जनसेवा देशभक्ति राजनेताओं के मुखौटे हैं बाहरी दिखावे को हाथी के दांत की तरह शासन की बागडोर मिलते ही असलियत बाहर निकलती है और तब सब इक जैसे बन जाते हैं। सत्ता उनकी महबूबा है सत्ता उनकी चाहत है सत्ता मिलने के बाद उसको खोना कोई भी नहीं चाहता जबकि वास्तव में सत्ता कभी किसी की नहीं होती है सत्ता और कुर्सी बड़ी बेरहम होती है पल भर में इक को ठुकरा दूसरे को अपना लेते हैं। सत्ता का नशा चढ़ता है तो हर शासक समझने लगता है वही है जो सबसे अच्छा और महान है और खुद को मसीहा भगवान घोषित करवाने को किसी भी सीमा तक जाने को तैयार रहते हैं। दुनिया दो हिस्सों में विभाजित है शासक वर्ग और शासित वर्ग जनता ये दो किनारे हैं जो इक साथ चलते हैं मगर मिलते नहीं कभी भी। नदी के दो किनारे बीच में बहता पानी जो सत्ता की ताकत और मर्ज़ी से किसी की प्यास बुझाता है किसी को जीवन भर प्यासा रखता है। नदी या तो किसी रेगिस्तान में पहुंच कर सूख जाती है तब किनारे किनारे नहीं रहते या फिर कहीं समंदर में मिल जाती है और अपनी मिठास खो कर नेताओं की तरह खारी हो जाती है और विशाल भी। विश्व में सभी देश समंदर की मछलियों की तरह आचरण करते हैं उनको बहुत विस्तार मिलता है फिर भी इधर उधर दायरा बढ़ाने की लालसा होती है। बड़ी मछली छोटी को हज़्म कर जाती है मगरमच्छ से सबकी दोस्ती होती है। कौन मगरमच्छ है कौन मछुआरा ये खेल विश्व की राजनीति में खेलते रहते हैं। शह - मात का खेल जारी है ये शतरंज की बाज़ी है मियां बीबी राज़ी है फिर भी हर कोई बनता क़ाज़ी है।                     

      मुलतानी कहावत का हिंदी अनुवाद है। जब भी सांड आपस में भिड़ते हैं उनका कुछ भी नहीं बिगड़ता है कुछ देर में थक कर लड़ाई ख़त्म हो जाती है कोई न हारता है न कोई जीतता ही है। मगर जिस खेत में उनकी लड़ाई होती है उस में उगे हुए बूटे बर्बाद हो जाते हैं। आप चाहें तो इस को अपने देश में सरकारों नेताओं की जंग जो ज़ुबानी होती है टीवी बहस या मीडिया अख़बार में भाषण में या चाहो तो अमेरिका चाईना से किसी भी शासक की धमकी और देख लेने नतीजा भुगतने जैसे ब्यानबाज़ी से जोड़ सकते हैं। काठ की तलवारें हैं असली हथियार ताकत दिखलाने को रखी हैं कायरता होती है ऐसे बयान देना। शूरवीर या तो वार करते हैं या खामोश रहते हैं इनको कोई शांति की चिंता नहीं है इनका अपना गणित होता है। फायदा किस बात में है वास्तविक जंग का हौसला नहीं करते क्योंकि तब मामला आर या पार जीत या हार का होने के साथ दोनों पक्षों की आर्थिक बर्बादी का हो जाता है। तभी कितने सालों से दुश्मनी दोस्ती का खेल चलता रहता है। आम नागरिक जिसे समझते हैं देश की आबरू का सवाल है वास्तव में सत्ताधारी शासकों की अपनी रणनीति होती है। चुनाव करीब होते हैं तो तेवर कड़े रखने पड़ते हैं अन्यथा हज़ार साल तक जंग लड़ने वाले भी भूल जाते हैं। आपको लगता है अब पड़ोसी देश की खैर नहीं मगर सत्ताधारी लोग उधर इधर खूब समझते हैं मतलब क्या है।

   कोई कोरोना अचानक चला आया तो हंगामा हो गया। उस के सामने सभी की बोलती बंद हो गई। लगा अब आपसी झगड़े छोड़ पहले कोरोना को हराना है यही ऐलान किया गया हम साथ साथ हैं। मगर बीच में कोई दवा मांगने को लेकर धमकी देता कोई किसी को चेतवनी देता कोरोना का सच नहीं बताया तो देख लेना। अंजाम देखने वाले अपना अंजाम भी जानते हैं , किसी शायर की नज़र में सबको मालूम है अपना अंजाम फिर भी , अपनी नज़रों में हर इक शख़्स सिकंदर क्यों है। ये सभी खुद को सिकंदर मानते हैं इनको कोई कलंदर मिलेगा तो खुद को बेहद बौना पाएंगे। कलंदर वही होता है जिसके पास कुछ भी नहीं हो तब भी खुश रहता है भिखारी नहीं बनता मगर ये सभी कितने अमीर ताकतवर हों इनकी भूख मिटती ही नहीं। ये कोरोना को छोड़ आपस में लड़ने लगे हैं कोरोना की जीत इसी में है मगर ये हारने के बाद भी अपनी हार को मानते नहीं हैं। कोरोना नहीं जीत सकता था ये सत्ता के गुलाम हार गए हैं क्योंकि इनको ज़िंदगी और मौत की वास्तविक जंग लड़ना नहीं आता है ये दफ्तर में बैठकर फाईलों की कागज़ी लड़ाई लड़ना सीखे हैं। जैसे आधुनिक युग के बच्चे खेल के मैदान में नहीं खेलते अपने स्मार्ट फोन पर वीडियो गेम या कंप्यूटर पर कार्टून फिल्म अथवा काल्पनिक दुनिया की कहानियों को देख सच समझने लगते हैं। बहरी असली दुनिया से अजनबी अनजान रहते हैं। टीवी चैनल वाले खूब लड़वाते हैं आमने सामने सत्ता पक्ष विपक्ष को मगर मनोरंजन मकसद होता है सच झूठ का निर्णय नहीं भाईचारा अपनी जगह धंधे की बात पहले ये उनका कारोबार है। आप घर बैठे जब उनकी आपसी जंग देख रहे होते हैं तब वो अपने भीतर से चोर चोर मौसेरे भाई का रिश्ता बखूबी निभा रहे होते हैं , बहस ख़त्म होते ही गले मिलकर खेद जताते हैं भाई गलत मत समझना।

                           

Friday, 22 May 2020

चलो महफ़िल सजाओ शमां जलाओ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

 चलो महफ़िल सजाओ शमां जलाओ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   नहीं ये सन्नाटा जाने कब से पसरा हुआ है। कहने को हम भीड़ में रहते थे मगर साथ कोई नहीं होता था। कोई सफर कोई मंज़िल थी कुछ मकसद हुआ करता था रास्ता तय किया बिछुड़ गए तो इस तरह जैसे किसी का कोई वजूद ही नहीं था। समझा ही नहीं जीना किसको कहते हैं , सोचता तो हमेशा हमेशा से था कल इक दोस्त ने वीडियो भेजा तो अपनी ही भूली कहानी लगी। ज़िंदगी गुज़रती रही और हम सोचते ही रह गए अभी जीना शुरू करना है। कहीं आपको वो माहौल नहीं मिलेगा जिस में आप खुलकर जीना चाहते हैं जिस दिन अपने सोच लिया अपनी महफ़िल खुद सजा लोगे। मस्ती में कुछ पल जी लोगे बिता लोगे ज़िंदगी का असली मज़ा लोगे। मुझे कहनी है इक ग़ज़ल साथ साथ गुनगुना लोगे। 

         फिर कोई कारवां बनायें हम ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

फिर कोई कारवां बनायें हम
या कोई बज़्म ही सजायें हम।

छेड़ने को नई सी धुन कोई
साज़ पर उंगलियां चलायें हम।

आमदो रफ्त होगी लोगों की
आओ इक रास्ता बनायें हम।

ये जो पत्थर बरस गये  इतने
क्यों न मिल कर इन्हें हटायें हम।

है अगर मोतिओं की हमको तलाश
गहरे सागर में डूब जायें  हम।

दर बदर करके दिल से शैतां को
इस मकां में खुदा बसायें  हम।

हुस्न में कम नहीं हैं कांटे भी
कैक्टस सहन में सजायें  हम।

हम जहाँ से चले वहीँ पहुंचे
अपनी मंजिल यहीं बनायें हम।

आप भी हम भी जाने दुनिया भर में कितने लोगों से मिलते रहे जान पहचान हुई मगर शायद कभी ही ऐसा हुआ होगा जब किसी से मिलकर लगा हो कि काश ये जो भी शख़्स है रोज़ मिलता साथ साथ बात करते वक़्त ऐसे गुज़र जाता जैसे घंटों बाद भी महसूस हो यार अभी नहीं अभी तो कुछ कहा सुना नहीं। मगर अक्सर हमने ऐसे लोगों को खो दिया है उनकी मीठी यादें रहती हैं दिल की गहराई में। वो बचपन वो स्कूल कॉलेज के दिन कोई मकसद नहीं हुआ करता था कोई मिला साथ चलने को कहा चल पड़े फिर राह में और लोग मिलते गए और हम मिलकर बिना कोई तय किये बस ख़ुशी मस्ती से कुछ पल साथ रहे। अब तो जब मिलते हैं लोग देखते हैं आपको आपका लिबास आपका रुतबा आपका महत्व कोई मतलब हासिल होगा या नहीं जाने कितने सवाल दिल में होते हैं दिल से दिल की बात होती नहीं कभी मतलब की बात करते हैं। कोई किसी का अपना नहीं होता है बस दिखावे को नाते रिश्ते कोई हिसाब नहीं। जब कोई दुःख परेशानी कोई नज़र नहीं आता और ख़ुशी हो तो कोई नहीं जिसको बताएं और जो ख़ुशी से खुश होकर ख़ुशी को और भी बढ़ा सकता हो।

कितनी भीड़ होती है घर से बाहर बाज़ार में पीवीआर में होटल में पार्क में कभी किसी शानदार जगह जाते हैं शाम को बिताने को भी। मगर रौनक रौशनियों में भी भीतर इक अंधकार इक खालीपन इक वीराना इक अकेले होने का एहसास सभी चेहरे अनजाने अजनबी लगते हैं। घंटा दो नकली दिखावे की ख़ुशी के बाद वापस लौट आते हैं भीतर वही सूनापन लेकर। सोचते हैं भला अब गांव शहर छोड़ यहां कौन मिलेगा कोई आपस में खुलकर बात नहीं करता लगता है हर निगाह में इक शक का पर्दा है। मैंने कितनी बार राह चलते किसी से जान पहचान की और बातें हुई तो कभी लगता है लोग सोचते हैं कोई छिपा मकसद तो नहीं क्यों अपनी बात बताता है हमसे पूछता है। आदत बना ली है भरोसा नहीं करते आसानी से , इक दोस्त की बात याद आई है आहूजा नाम है आजकल नहीं मिले कोई बात नहीं हुई। साथ साथ हॉस्टल में रहे कुछ खट्टे मीठे अनुभव हुए , बिल्कुल अलग अलग सवभाव सोच थी हम दोनों की। मैंने उसको कभी कुछ भी समझाने की कोशिश नहीं की ठीक है जैसा भी है। उसका कहना होता था सेतिया तुम हर किसी को अच्छा समझते हो तभी जब कोई खराब साबित होता है तुम निराश हो जाते हो , मगर मुझे देखो मैं किसी पर भी भरोसा नहीं करता और कोई मुझे धोखा नहीं दे सकता है। उसका कहना था सबको खराब समझो जब तक साबित नहीं हो जाये कि वो अच्छा है लेकिन मेरी आदत अभी भी वही है सभी को अच्छा समझता हूं जब तक लोग खुद अपने को खराब नहीं साबित करते , और संबंध नहीं रहने पर भी ये याद रखता हूं कभी हम दोस्त थे कुछ तो अच्छाई मिली थी उस में भी।

मैंने दोस्त बनाना महफ़िल सजाना कभी नहीं छोड़ा अभी भी कोई महफ़िल नहीं है तब भी इक महफ़िल होती है मन में ख्यालों में बनानी है। हां जाने क्यों मुझे भीड़ से घबराहट होती है महफ़िल हो दो चार दस लोग जो मिल बैठें बिना कोई मतलब लिए। चर्चा हो कुछ भी जो भी कोई कहना चाहे मगर अब लोग लिखते हैं सोशल मिडिया पर खुद ही पढ़ते हैं न किसी को समझना न किसी को समझाना। नहीं किसी काम की नहीं ऐसी भीड़ भरी महफ़िल इस से अच्छा है खुद अपने साथ रहना अकेले भी मगर तन्हा नहीं अपने ही संग। खुद से अपनी बात कहना खुद को समझना और ज़िंदगी को जीना कैसे है विचार करना। दुनिया में लोग हैं अच्छे सच्चे भले भी तमाम तरह के मगर आपको ढूंढना होगा मेरी तरह कोई तो होगा इक दोस्त ही सही बहुत होता है ज़िंदगी की खुशियों को मिलकर बांटने दुःख दर्द परेशानियां दूर करने को। कभी चाहो तो मेरे पास आओ निराश नहीं होने दूंगा किसी को। इंतज़ार है राह देखता रहता हूं और घर का दरवाज़ा खुला रहता है। कोई है जो कह रहा है बुला रहे हो खुद चले आओ , आप कहेंगे तो बंदा हाज़िर है।

आपने जो नहीं सोचा था ( दास्तां ए कोरोना ) डॉ लोक सेतिया

 आपने जो नहीं सोचा था ( दास्तां ए कोरोना ) डॉ लोक सेतिया 

क्या क्यों कैसे की बात नहीं है बात इतनी सी है इंसान अपने आप को खुदा नहीं खुदा से भी बढ़कर समझने लगा था। थोड़ा शिक्षा जानकारी और साधन क्या बना लिए समझने लगा कि जब चाहेगा कोई दुनिया भी बना लेगा। कभी चांद पर जाने की बात कभी विनाश के हथियार अणु बंब से क्या क्या जंग का साज़ो-सामान बनाने पर धन बर्बाद किया जबकि वास्तव में समाज को बनाने में इतने साधन धन दौलत का सही इस्तेमाल किया जाता तो अच्छा था। कुदरत का खेल है या खुद इंसान की किसी नासमझी और आग के साथ खेलने का नतीजा जो खुद अपने ही बनाये इक जीवाणु पर अपना बस नहीं रहा। किसी और को दोष देना आसान है मगर उस से होगा क्या , अभी भी लड़ाई झगड़े और देखने दिखाने की अहंकार की बातें। नहीं समझ आया कोई हैसियत नहीं है इंसान की पानी करा बुलबुला , अस मानव की जात , एक दिना छुप जाएगा , ज्यों तारा परभात। पल भर की हस्ती है मालूम नहीं अगला पल आखिरी होगा या अभी और कितने पल हैं पास फिर भी क्या क्या नहीं करते नफरत लूट अहंकार और नाम शोहरत ताकत पाकर ऊंचे आसमान पर ख्वाब में ऊंची उड़ानें भरते नहीं जानते कब नीचे गिरेंगे और नाम निशान नहीं बचेगा। क्या रोज़ होता नहीं है आज ही क्या पाकिस्तान में कराची में हुआ विमान हादिसा इक मिंट में सब घट गया कोई नहीं समझ सका क्या क्यों कैसे। मगर हम फिर भी अपनी ताकत और आधुनिक तरक्की को लेकर पागल हैं और जल्दी भागना है अभी बुलेट ट्रैन की बात होती है। कुदरत जिनको पंख देती है उनकी परवाज़ अकारण नहीं नाकाम होती हम इंसान ही किसी पंछी को निशाना बनाते हैं अन्यथा लाखों पंछी साथ साथ उड़ते हैं कोई दिशा निर्देश नहीं देता फिर भी उन में कोई टकराव नहीं होता है। हम आपस में देश देश से समाज आपसी मतभेद से तनाव और तकरार झगड़े टकराव के आदी बन गए हैं। 

कितनी अचरज की बात है कि आज भी लोग आपस में भिड़ते हैं राजनेता लाशों पर सत्ता की रोटियां सेंकते हैं। खुद को बड़ा अच्छा किसी को छोटा खराब साबित करने के मशगूल हैं रत्ती भर लाज शर्म नहीं है। कितनी अजीब बात है आज भी मंदिर बनाने में खुदाई से क्या मिला इसको लेकर चर्चा करते हैं। आज जो खुद बना रहे हैं विनाश का कितना सामान कल इक परमाणु बंब दुनिया को मलबे में बदल सकता है आपको धर्म क्या ये नहीं सिखाता है कि ऐसा होने से रोकना ज़रूरी है। परमाणु विस्फोट होने पर ख़ुशी जताते हैं क्या इनसे लोगों को रोटी मिलेगी स्वास्थ्य शिक्षा मिलेगी कदापि नहीं। ये सब आधुनिक विनाश का सामान बड़ी महंगी कीमत देकर मिलता है इतने सालों में यही धन देश को विकसित और गरीबी मिटाने को उपयोग किया जाना चाहिए था। पागलपन है जो हर कोई चाहता है उसके पास महल हों ढेर सारा धन हो और ताकत नाम शोहरत हो। मगर कुदरत ने ऐसा नहीं किया था उसने सबको हवा पानी धरती हरियाली बरसात से लेकर बदन में देखने को आंखें हाथ पांव सब इक समान दिए हैं ये कुछ लोगों ने औरों का हक छीना है कई तरह से तभी उनके पास ज़रूरत से अधिक है जबकि अधिकांश के पास ज़रूरत का भी नहीं। कैसा धर्म कैसी मानवता जब आप के पास इतना है कि किसी उपयोग का नहीं और आपके समाज में आपके ही देशवासी भूखे नंगे हैं। क्यों राजनेताओं को अपने खुद पर लाखों करोड़ों खर्च करते अपराधबोध नहीं होता है। जनता की सेवा का दम भरने वाले राजसी शान से ठाठ बाठ से जीते हैं। ये कोई राज धर्म नहीं है और आप राजा भी नहीं हैं सत्ता मिलने का अर्थ क्या यही है और सरकारी अधिकारी कर्मचारी दावे जो भी करते हैं वास्तव में कोई अपना काम ईमानदारी से नहीं करना चाहता लोग परेशान होकर शिकायत करते हैं तब भी कोई असर नहीं होता है। मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे जाने से कुछ हासिल नहीं होगा असली धर्म अपना कर्तव्य निभाना है। 

क्या आज भी जब कोरोना की दहशत है ये सभी बदले हैं नहीं ये आज भी अपने स्वार्थ और अभिमान से जो मर्ज़ी करते हैं जो करना चाहिए नहीं करते कोई कितना परेशान होता है। कोरोना से अधिक खतरा आप जैसे लोग हैं जो आम नागरिक की बुनियादी ज़रूरत को समस्या को जानबूझकर पूरा नहीं करते हैं। शायद विधाता बेबस है मगर उसकी लाठी बेआवाज़ होती है। अब भी सुधर जाओगे तो कोरोना से ही सही कोई सही मार्ग तो मिलेगा अपनी गलतियों को सही करने को अवसर है। हद है सरकार को ये अवसर भी लगा तो अपनी कमाई बढ़ाने का अच्छाई की राह चलने का भी समझ सकते थे। जीना है इंसान की तरह जियो मगर मौत फिर भी आनी है इक दिन हम सभी को अब मौत से घबराने से अच्छा है जब तक ज़िंदा हैं कुछ अच्छा ईमानदारी का फ़र्ज़ निभाने सबकी समस्याओं का समाधान करने सभी को उनके अधिकार देने का संकल्प लें तो मौत से दहशत नहीं होगी। हमारी अच्छाई हमेशा रहती है जीवन भर भी और मौत के बाद भी।

Wednesday, 20 May 2020

सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो ( ख्यालों में ) डॉ लोक सेतिया

   सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो ( ख्यालों में ) डॉ लोक सेतिया 

धार्मिक कथाओं की तरह किसी ने तपस्या की और दर्शन देने पर खुश होक वरदान मांगने को कहा गया। उसने मांगा मुझे कोई दवा दे दो जो कोरोना को ठीक कर दे और कोरोना से बचाव भी करती हो। तथास्तु वरदान मिला मगर किसी को ये राज़ नहीं बताना किस ने वरदान दिया हर किसी को नहीं मिलते वरदान। आपको लगा होगा वाह फिर क्या समस्या है क्या परेशानी है मगर सच इस से आगे उलझन ही उलझन है। अब या तो वह आदमी अपने पास दवा होने की बात इश्तिहार में सबको बता कर मनमानी कीमत वसूल करना शुरू करे और हज़ारों करोड़ की कमाई करे या फिर वास्तविक भलाई करने को सबको मुफ्त या लागत मूल्य पर दवा देने की घोषणा कर दे। लेकिन अकेले करोड़ों लोगों तक कैसे बेच सकता है और बेचने में भी हज़ार झंझट हैं। सरकारी विभाग पता चलते ही पूछताछ को आपको नोटिस थमा देगा किस शोध किस आधार पर आप ऐसा दावा करते हैं। आप न तो किसी देश के शासक हैं जो कुछ भी कहते रहें कोई रोकता टोकता नहीं और न ही आपका करोड़ों का दवाओं का कारोबार है जो अपनी किसी दवा टॉनिक को गोलमोल ढंग से बेचने को वज्ञापन करें ये फायदा दे सकता है फायदा किसी को हो न हो उसका फायदा होना तय है। 

   मगर ऐसे लोग नासमझ ही नहीं अव्वल दर्जे के मूर्ख होते हैं , उसने सोचा क्यों नहीं देश की सरकार को ही बता दे और उसे बिना पैसा लिए दवा देकर सबको बांटने का वचन लेने की बात कहे। और उस ने यही किया तो क्या होगा , सरकार चाहेगी ये मनवाना कि दवा का शोध सरकारी खर्च से किया गया है क्योंकि सरकार को ये कोरोना भी इक अवसर लगता है। खुद सरकार घोषणा कर चुकी है उसको कोई ईनाम पुरुस्कार या कोई संसद की मेंबरशिप जो मर्ज़ी मिल सकता है मगर सरकार जो चाहती है वही सच मानना होगा। अब कैसे समझाए ये क्या राज़ है अगर ऐसे झूठ बोलकर दवा दी तो कोई असर नहीं होगा वरदान देते समय शर्त साथ है किसी और को शामिल नहीं करना ये क्या है किस ने दी है। लेकिन उसने ऐसा कोई स्वार्थ नहीं हासिल करना और इस तरह दवा देनी है कि देश की जनता की भलाई हो और कोई गोलमाल नहीं हो सके। 

अब उसने इक योजना बनाकर सरकार को भेजी , कोरोना की रामबाण दवा आपको निशुल्क मिल सकती है मगर कुछ शर्तों को मानना होगा। आपको सबसे पहले देश के तीस प्रतिशत गरीबों को खिलानी होगी मुफ्त में , उसके बाद मध्यम वर्ग को उचित दाम पर जितना वो आसानी से दे सकते हैं उपलब्ध करवानी होगी। मगर उन अमीर लोगों राजनेताओं को अधिकारी कर्मचारी जिन्होंने जनता के धन से करोड़ों रूपये किसी भी तरह वास्तविक वेतन से बढ़कर जमा किए हैं उनको दवा मिलनी चाहिए पहले उनकी हराम की जमा की कमाई को गरीबों को बांटकर ,ताकि सबको दवा भी मिल जाये और देश की गरीबी भी हमेशा को मिट जाये। क्या आपको लगता है सरकार तैयार हो जाएगी कदापि नहीं , अपनी एजंसी को उस को हिरासत में लेने एफआईआर दर्ज करने से धोखाधड़ी से लेकर तमाम धाराओं में जकड़ने का काम किया जाएगा। क्यों होगा नहीं समझे क्योंकि सरकार योजना बना चुकी होगी उस दवा को विदेश की सरकारों को ऊंचे दाम पर बेच कर खज़ाना भरने को। अब उसके लिए साबित करना नामुमकिन होगा कि अगर ऐसा किया तो दवा का कोई असर नहीं होगा। नतीजा उसको ठग घोषित कर जेल भेज दिया जाएगा। मैंने उसको यही राय दी है ये दवा किसी काम नहीं आनी है तुम कहोगे कोई मानेगा नहीं और धोखेबाज़ लोगों में तुम्हें भी शामिल कर लेंगे समझदार लोग। नकली सामान फिर भी बिक सकता है असली का कोई खरीदार नहीं है। कब से उसे तलाश कर रहा हूं वो मिल नहीं रहा कहां है कोई नहीं जानता कहीं ..............  नहीं नहीं।

Monday, 18 May 2020

यहां गंदे नाले में बहा सब कुछ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   यहां गंदे नाले में बहा सब कुछ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   शराब कितनी भी महंगी हो उसकी सही जगह यही है , और आप चिंता कर रहे हैं गंदे नाले में बहा दी। हां ये जिन्होंने गंदे नाले में बहाई है खुद को कानून से बचाने को वो तो खुद जाने कब से किसी गटर में पड़े हुए हैं। देश की राजनीति शायद वो सबसे बड़ा गंदगी का गंदा नाला है जो लगता ही नहीं बह रहा है और ये भी समझ नहीं आता किधर से किधर को जा रहा है। यहां कोई स्वच्छता अभियान नहीं चलाता है यही वो सत्ता की अविरल धारा है जिसमे हर कोई नहाता है जो भी शासक बन जाता है इस में मिलकर सब कुछ इक जैसा हो जाता है। किस गंदे नाले में ईमानदारी शराफ़त और नैतिकता को कितने लोगों ने फैंका तब जाकर उनको धन दौलत शोहरत नाम रुतबा सब हासिल हुआ। आपको जो लोग बड़े साफ सुथरे सजे धजे बन संवर का खुशबू लगाकर अच्छी अच्छी बातें करते लुभाते हैं उनके भीतर इस गंदे नाले से बढ़कर गंदगी भरी हुई है। अपने मन का मैल धोते नहीं छिपाते हैं। सत्ता का गटर बहुत फैला हुआ है आपको शहर शहर गांव गांव बस्ती बस्ती गली गली नज़र आएगा जब आपको वास्तव में गंदे नाले और साफ पानी की पहचान समझ आएगी।

   जाने कितने नगर हैं जिनके बीच इक गंदा नाला बहता है सरकार ने कितनी गहरी सीवर की लाइनें बिछाई हों इन गंदे नालों को ढकने की कोशिश भी काम नहीं आई है। ये किसी विरासत की तरह संभाली हुई जैसी हैं उसी तरह रहने दिया गया है। लोग हमेशा गंदे नाले से हटकर दूर से निकलते हैं मगर कुछ ऐसी जगह हैं जहां जाने का रास्ता ही गंदे नाले को पार कर गुज़रता है हैरानी होती है ऐसी बड़े बड़ी संस्थाओं संगठनों में हर तरह हरियाली फूल और बेहद खूबसूरत दुनिया बसाई होती है। सब जानते हैं यहां गंदा नाला भी है मगर देख कर भी नहीं देखते हैं आपने भी जाने कितनी ऐसी जगहों को जाकर देखा होगा और सोचा होगा क्या बात है यही तो स्वर्ग की तरह है शायद उस से बढ़कर सुंदर भी। गंदे नाले पहचान नहीं हैं ये कुछ उसी तरह की बात है जैसे किसी सड़क पर कोई निशान बना होता है। सावधान ये मार्ग सुरक्षित नहीं है , आगे खतरा है बचाव में ही बचाव है। शराब पीकर वाहन मत चलाएं कोई घर पर आपका इंतज़ार कर रहा है। ये रास्ता बंद है ये सड़क आम नहीं है खास लोगों के लिए है। कितनी तरह की चेतावनी मिलती रहती है हम ध्यान ही नहीं देते पढ़कर परवाह नहीं करते सुनकर अनसुना कर देते हैं।

    बचपन से समझाया गया था अच्छे लोगों का साथ रखना और बुरे लोगों से हमेशा बचना। मगर हमने अच्छे लोगों को पास नहीं फटकने दिया और खराब लोग गंदी आदतों को अपनी चाहत बना लिया। बेटा ये राजनेता बड़े मतलबी होते हैं अव्वल दर्जे के कपटी झूठे होते हैं इनकी कसम इनके वादे कभी ऐतबार मत करना। हमने याद रखी बात नहीं कभी भी हमने तो कोशिश की उन्हीं में शामिल होने उनसे भी बढ़कर बुराई की मिसाल बनने की। मैं ऐसे बहुत लोगों को करीब से जनता पहचानता हूं जो किसी विचारधारा की अच्छी बातों के उपदेश देकर सबको समझाते हैं कि पैसा कुछ भी नहीं है दौलत के पीछे मत दौड़ो। ये रेगिस्तान की चमकती रेत है पानी नहीं इस से प्यास नहीं बुझेगी और भागते भागते मर जाओगे। लेकिन वास्तविक ज़िंदगी में वही पैसा कमाने को उचित अनुचित सब तरीके अपनाते हैं। सतसंग को ज़रूर जाते हैं और गुरूजी गुरूजी के नाम की माला जपते हैं भजन गाते हैं। गुरूजी दीवार पर टंगी तस्वीर हैं जो लिविंगरूम की शोभा बढ़ाते हैं गुरूजी के चेले मिलकर खाते खिलाते हैं झूठ को सच बताते हैं सच को कभी नहीं अपनाते हैं। गंगा यमुना में कितने गंदे नाले मिलते जाते हैं मगर उसके बाद वो सभी बहती नदिया कहलाते हैं गंगा सफाई पर भी ऐसे लोग समझाते हैं जब आपस में मिल जाते हैं तो और बढ़ते जाते हैं। अब हालत ऐसी है कि कोई नदी बहते बहते किसी महानगर तक इतनी खराब हो जाती है कि उसका जल पीने की बात क्या सिंचाई के भी काबिल नहीं रहता है। आजकल लोग आरओ का पानी पीते हैं कौन जानता है जो पानी आपके घर तक नल में पहुंचा उस में नहर नदी का जल कितना बचा था और कितना गंदे नाले की मिलावट वाला पानी उसमें शामिल है। 

  इक चुटकुला बहुत पुराना है। इक सरदार जी अपनी सरदारनी को लेकर सिनेमा देखने जाने को तैयार हो रहे थे। सरदार जी ने कुरता पायजामा और सरदारनी ने नया सूट सलवार कमीज़ पहना हुआ था। जब सरदारनी ने अपनी सलवार में पुरानी सलवार से निकाल कर नाड़ा डाला तो सरदार जी बोले ये गंदा है दूसरा बदल लो। सरदारनी ने कहा अब देर हो जाएगी कौन सा नाड़ा बाहर नज़र आता है। डीटीसी की बस में अभी कुछ सफर किया कि बस कंडक्टर ने आवाज़ दी गंदे नाले वाले सीट से खड़े हो जाएं। सरदार जी ने सरदारनी को कहा अब देख लो क्या नतीजा हुआ। बस रुकी और कंडक्टर ने कहा जो भी सवारी गंदे नाले की है नीचे उतर जाए। सरदार जी सरदारनी को लेकर बस से उतर गए। वास्तव में उस बस स्टॉप का नाम ही यही था क्योंकि वहां गंदा नाला बहता था।

   गंदा नाला भी देश की अर्थव्यवस्था में शामिल है। शहर से सीवर का गंदा पानी और गंदगी बाहर निकलते ही नाले में मिल कर नगरपरिषद के लिए आमदनी का साधन बन जाती है। शहर के नज़दीक सब्ज़ी उगाने को इस पानी का उपयोग किया जाता है और समझा जाता है कि ऐसे पानी मिलने से खाद की भी ज़रूरत पूरी हो जाती है। शराब को नाली में बहाना ज़माने से होता रहा है उसकी बात फिर कभी विस्तार से।

Sunday, 17 May 2020

केबीसी अमिताभ-मोदी कोरोना ( एपीसोड ) डॉ लोक सेतिया

   केबीसी अमिताभ-मोदी कोरोना ( एपीसोड ) डॉ लोक सेतिया 

आज का एपीसोड हमारे खास मेहमान आदरणीय मोदी जी के साथ है। हम दोनों मिलकर कौन बनेगा करोड़पति का खेल खेलेंगे। नियम औरों के लिए होते हैं मोदी जी और खुद अमिताभ बच्चन हर नियम से ऊपर हैं। समय की भी कोई सीमा नहीं है और लाइफलाइन भी अपनी एप्प्स से लेकर किसी से भी जानकारी ले सकते हैं। कोई समस्या होने पर अमेरिका के ट्रम्प जी विशेषज्ञ भी हैं राय देने को। चलिए खेल की शुरआत करते हैं तालयों से स्वागत करते हैं मोदी जी का। मोदी जी आते हैं आते ही अमिताभ की कुर्सी की तरफ बढ़ते हैं अमिताभ जी कहते हैं जनाब उधर सवाल करने हैं मेरे कंप्यूटर जी पर आपको सामने जवाब देने को उधर बैठना है। मोदी जी याद दिलाते हैं आप भूल गए यहां नियम आपके नहीं मेरे बनाये लागू होंगे। आपको समझना होगा मुझे किसी को जवाब नहीं देने होता है मुझे सवाल खुद उछालना और खुद ही जवाब भी देना होता है। जी आपकी बात सच है मगर यहां दर्शक हैं सबके सामने अंदर की बात नहीं की जा सकती आप जो सवाल चाहते हैं वही सवाल होंगे चिंता मत करें निवेदन है। मोदी जी हंस दिए ये तो केवल मज़ाक था आप नाहक घबरा गए। वाह क्या बात है ऐसे समय भी आपका हंसी-ठट्ठा कायम है कमाल है लोग अब कोरोना के डर से चुटकुले भी शाकाहारी भेजते हैं। चलिए आप और हम शुरू करते हैं कौन बनेगा करोड़पति। दर्शको को बता देते हैं यहां धनराशि की कोई सीमा नहीं है और जितनी भी राशि मोदी जी जीतेंगे उसका उपयोग कोरोना फंड में किया जाएगा। 

मोदी जी पहला सवाल खज़ाने की खुदाई को लेकर है। ख़ज़ाना कहां है खुदाई कौन कर रहा है और खज़ाने का राज़ क्या है। आपके पास चार ऑप्शन हैं आप बताएं किस को लॉक करना है। इस से पहले की अमिताभ जी ऑप्शन का विवरण बनाते मोदी जी ने पूरक सवाल पहले ही करने का अधिकार उपयोग करने का बटन दबा दिया। मोदी जी कहने लगे कि लॉक डाउन की तरह लॉक करने के ऑप्शन कितने हैं मेरे सिवा कोई नहीं जानता है। आपको ऑप्शन की संख्या को अभी छोड़ देना चाहिए और बताते रहो क्या क्या जवाब मुमकिन है चार नहीं दस बीस जब तक सही जवाब नहीं आता और सही जवाब क्या है ये भी मुझे तय करना है जो मुझको हो पसंद वही सही जवाब। ठीक है जैसा आपका निर्देश है , अब आप बताएं खज़ाना बीस लाख करोड़ का है , या खज़ाना कितना है खुदाई के बाद मालूम होगा , या खज़ाना खाली है केवल तिजोरी की चाबी है , या खज़ाना खो गया कोई लूट गया है अब खज़ाना कागज़ भर है , या खज़ाना इक ख्वाब है जनता को दिखाने को , हाथी के दांत की तरह है खज़ाना खाने वाले दांत नज़र नहीं आते दिखाने वाले दिखला रहे हैं। मोदी जी ने कहा आपको अभी सही जवाब का ऑप्शन नहीं मिला चलो मैं खुद बता देता हूं। इतने साल में जितनी कमाई आपकी हुई और चैनल वालों की हुई वही ख़ज़ाने की सही धनराशि है और उस में से जितना उनको मिला जो खिलाड़ी बनकर खेलने आये ऊंठ के मुंह में जीरे की तरह उतना ही हिस्सा जनता को मिलना है। अमिताभ बच्चन जी ओह तो ऐसा है ज्ञान की बात अवसर देने की बात भाग्य की बात सब बकवास है असली बात धंधे की है।

चलो मोदी जी अब अगला सवाल बेहद महत्वपूर्ण है। कोरोना क्या है कैसे कोरोना की माहमारी ने आपको राहत दी है जो आपकी सरकार के मुरझाए चेहरे खिल उठे हैं। कोरोना क्या सच आपकी सरकार के लिए मौके पर आया है और इसका अंत कब कौन कैसे करेगा। मोदी जी कहने लगे कोरोना को आप जैसा चाहे देख सकते हैं कोरोना क्या है ये आपकी सोच पर निर्भर करता है। कोरोना ने अच्छा किया बुरा किया जो भी किया समझने वाले पर है कोरोना ने कितने सबक पढ़ाये सिखाये हैं। बड़ा छोटा सबको बराबर बनाने का कार्य किया है चर्चा का विषय यही रह गया है कोरोना की काली आंधी ने सबकी आंखों में इतनी मिट्टी धूल भर दी है कि अंधकार ही अंधकार है ये भरी दुपहरी में अंधियारा सूरज परछाई से हारा अटल जी की कविता है। मगर हमने दिव्य दृष्टि हासिल की है और हमने सब साफ देखा है। आपने दूरदर्शन पर महाभारत रामायण का अंत देख लिया है मोदी जी ने अचानक विषय बदल दिया है। अमिताभ बच्चन भी यही करते रहे हैं दर्शकों को बीच बीच में खिलाड़ी को लेकर बनाई फिल्म दिखाने लगते हैं। ऐसे में भावुकता में जो बात हो रही थी पीछे छूट जाती है। मोदी जी ने 90 से अधिक देशो की सैर की है उन के दौरों की झलकियां दिखाई गई हैं। उसके बाद अमिताभ बच्चन ने जानना चाहा आपका शतक अभी अधूरा है अब कब तक सौ देशों की सैर का विश्व कीर्तिमान स्थापित करने वाले हैं। कब किस किस देश जाने वाले हैं। कोरोना को किस तरह हारने वाले हैं इस का जवाब मोदी जी बताने वाले हैं तभी हूटर बज गया है। अमिताभ बच्चन कह रहे हैं समय समाप्त हुआ है अब दर्शकों के लिए आज का यही सवाल है। सवाल ध्यान से नोट कर लें और कल रात नौ बजे तक इसका जवाब देना है। ऑप्शन आपके सामने हैं। 1 समझौता कर के  2 लॉक डाउन को और और बढ़ाने से  3 कोई हवन धार्मिक आयोजन कर के 4 बिना उसका अंत किये घोषणा कर कि उसका नामो-निशान मिटा दिया है।



Saturday, 16 May 2020

हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

      हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना ( ग़ज़ल ) 

                                 डॉ लोक सेतिया "तनहा" 


हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना 
कोई कभी हिदायत ये आज तक न माना। 

मझधार में पहुंच कर सरकार कह रही है 
सब डूब जायें बेशक बस नाख़ुदा बचाना।      ( नाख़ुदा = नाविक , मल्लाह , मांझी , केवट , कर्णधार )

हम मांगते न सोना हम मांगते न चांदी 
रहने को झौंपड़ी बस दो वक़्त का हो खाना। 

फिर वो ग़ज़ल सुना दो जो दर्द को भुला दे 
खुशियां हमें मिलेंगी किस दिन ज़रा बताना। 

ये ज़िंदगी ने पूछा चलते तो जा रहे हो 
अब तो कहीं बना लो रहने को इक ठिकाना। 

मंज़िल भी दूर तुमको चलना भी है अकेले
इक बात याद रखना मत राह भूल जाना। 

चढ़कर मचान पर अब क्या देखते हो "तनहा" 
था कारवां उन्हीं से उनको था साथ लाना। 

( नवंबर 2011 के शुभ तारिका के हरियाणा अंक में शामिल रचना आज ब्लॉग पर भी लिख रहा हूं )

Friday, 15 May 2020

देने वाला एक है मांगत बीस लाख करोड़ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 देने वाला एक है मांगत बीस लाख करोड़ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   कुछ गड़बड़ है देश की आबादी एक सौ तीस करोड़ ही है फिर बीस लाख करोड़ क्या दुनिया भर से लोग आये हैं हाथ पसारे। नहीं ऐसा नहीं है मांगने वाले नहीं हैं बीस लाख करोड़ बंट रहे हैं। किसको कितना मिलता है देने वाला बता रहा है नहीं बता रही भी हैं इंग्लिश में हिंदी में अनुवाद करता है साथ बैठा कोई। ये हिंदी की बारी बाद में यही सच है। टुकड़े टुकड़े दिन बीता धज्जी धज्जी रात मिली , जिसका जितना आंचल  था उतनी ही सौगात मिली। टीवी पर सब मिल रहा है बाहर जाने की ज़रूरत क्या है टीवी के सामने हाथ फैलाओ और ले जाओ। क्या कहते हो टीवी से कैसे मिलेगा सबको ये समझाओ , चलो इधर आओ मंदिर के कपाट भी खुल गये हैं क्या करोगे ज़रा बताओ। भगवान के सामने जाकर जितना है जेब में भावना से चढ़ाओ फिर अपना सीस झुकाओ और आरती गाओ घंटी बजाओ भजन उपदेश सुन लो खुश हो जाओ। आंखें बंद कर भगवान से जितना चाहो मांग लो बिल्कुल नहीं शर्माओ। सामने देखो उधर ऊपर भगवान देवी देवता का हाथ आपको आशीर्वाद देता हुआ नज़र आएगा कितना अच्छा लगा जैसे कह रहे तथास्तु जाओ झूमो नाचो गाओ। ये विश्वास भरोसे की बात है सवालात मत उठाओ जाओ भाई जाओ पीछे लंबी कतार है कदम उल्टे घर को बढ़ाओ। भगवान सब देता है सबको देता है आपकी कमीज़ फ़टी थी झोली कैसे भरती जिनके पास पहनने को नहीं था नंगे बदन थे झोली नहीं थी हाथ पसारे खड़े थे उनको वही मिला जो बड़े लोग होते हैं झोला लेकर आते थे आजकल बड़े बड़े सूटकेस भरवा जाते हैं। भगवान से कोई हिसाब नहीं पूछ सकता किस को कितना दिया क्या क्या दिया कौन खाली हाथ चला गया सबकी झोली भरने की बात सच है आपकी बात झूठी है। बस ये वरदान मिलने की तरह की बात है , देने वाली की हैसियत मांगने वाले की औकात है। राजा बोला रात है रानी बोली रात है मंत्री बोला रात है संत्री बोला रात है ये सुबह सुबह की बात है।

   आपको पहले भी कितनी बार बताया था कुछ भी ज़रूरत हो कोई भी परेशानी किसी की शिकायत हो बस ऐप्प खोलो और जैसे जैसे संदेश मिले हां नहीं भरते जाओ , आपने सही विकल्प नहीं चुना है फिर से वापस जाओ। सही की दबाओ , आपने अधिक समय लगा दिया है अभी और संभव नहीं है बाद में कोशिश करें। भगीरथ कोशिश करने के बाद आपको इक संख्या एसएमएस से मिली है भविष्य में उपयोग करने को। बस अब आपको इंतज़ार करना है जब भी पता करोगे आपकी समस्या विचाराधीन है मिलेगा। फिर इक दिन आपको एसएमएस मिलेगा आपकी समस्या का समाधान किया जा चुका है। अब आपको अपना माथा पीटना बाकी है। किसी भी जगह आपकी कोई बात दिखाई नहीं देगी ढूंढते रह जाओगे। जिन खोजा तीन पाइया गहरे पानी पैठ , मैं बपुरा डूबन डरा रहा किनारे बैठ। कबीर जो का इशारा समझो बहती गंगा में डुबकी लगाओ अब गंगा निर्मल हो गई है। आपको तैरना नहीं आता तो किसी खेवनहार को तलाश करो फिर कश्ती से उस पर आओ जाओ कोई तरीका सोचो कोई जाल बिछाओ। ये नहीं होता तो डूब जाओ भवसागर को पार कर जाओ।

   अपने कहीं कोई कभी भगवान देखा है जो गरीब हो मुझे सभी भगवान बड़े बड़े भवन सोने चांदी के गहने और चमकीले रेशमी लिबास पहने सुबह शाम छप्पन भोग का आनंद उठाते दिखाई दिए हैं। अमीरों के नाम खुदे हैं शिलालेख पर दानवीर और धर्मात्मा का सच्चे भक्त होने का सबूत। ऐसे भगवान को गरीब लोग परेशान क्यों करते हैं अपना कोई और भगवान तराशते जो उनकी तरह भूखा नंगा उनकी व्यथा समझता। ये सरकार भी कहलाती गरीबों की है होती अमीरों की ही है क्या शान है जब जो चाहती है किसी अलदीन के चिराग की तरह मांगने से पहले मिल जाता है कभी भूखी नहीं सोती है पेट भर सोने के बाद ही तो सुनहरे ख्वाब दिखाई देते हैं। दस लाख कभी ख्वाब थे जब इस नाम की फिल्म बनी थी और दस लाख की लॉटरी लगते ही सब बदल गया था। आजकल दस लाख की औकात क्या है जनाब दस लाख का इक इक सूट बनवा पहनते हैं। क्षमा मांगते हुए कवि प्रेम धवन जी से गीत को आधुनिक ढंग से पैरोडी बनाया है क्योंकि यही वास्तविकता है।

चाहे लाख करो तुम बातें बोलो झूठ हज़ार , जब तक गरीब नंगे पांव चलते तुम कैसी सरकार। 

साथी संगी अमीरों के तुम कैसी लूट मचा ली , आधी आबादी भूखी उसकी थाली है खाली। 

बेबस लोगों के आंसू उनकी आहें तक बेकार , इनकी सब उम्मीदों का किया है तूने बंटाधार। 

सबसे ज़्यादा धन दौलत है पास तुम्हारे पर , नहीं ख़त्म होती और भूख और पाने की कभी। 

बेघर बेचारों की किस्मत में ठोकरें खाना है , झूठे हैं सरकारी आपके दावों के सब इश्तिहार। 

क्या किसी का ईलाज करोगे जनाब खुद जब , है आपकी व्यवस्था है लाचार सबसे बीमार। 

आपको शायद नहीं मालूम उनकी चिंता कितनी बड़ी है। लॉक डाउन ने कोरोना को हराया या नहीं उनको बचाया है सच सामने कम आया है और जाने कितना छुपाया और दफ़नाया है। ये बीस लाख करोड़ भी जैसे झूठी माया है कोई समझ नहीं पाया ये क्या जाल बिछाया है। डर है घबराहट भी है सन्नाटा छाया है नहीं पता इतने दिनों में क्या खोया है क्या पाया है। दलील नहीं काम आई अपील करने लगे हैं मगर लोग ख़ामोशी को छोड़ चिल्लाने लगे हैं। ऐसे में आपको दुष्यन्त कुमार की ग़ज़ल सुनाने लगे हैं। 

                दुष्यन्त कुमार जी की लाजवाब ग़ज़ल ( साये में धूप , से साभार )

होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिये , इस परकटे परिंदे की कोशिश तो देखिये। 

गूंगे निकल पड़े हैं ज़ुबां की तलाश में , सरकार के खिआफ़ ये साज़िश तो देखिये। 

बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन , सूखा मचा रही है ये बारिश तो देखिये। 

उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें , चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये। 

जिसने नज़र उठाई वही शख़्स ग़ुम हुआ , इस जिस्म के तिलिस्म की बंदिश तो देखिये।

  अभी तक सरकार को समझ नहीं आया था मज़दूर और किसान मेहनतक़श लोग देश की नींव होते हैं बिना आधार की अर्थव्यस्था किसी आधार कार्ड से संभलेगी नहीं। 

जादू है नशा है मदहोशियां ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  जादू है नशा है मदहोशियां ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

खूबसूरती हुस्न अदाएं नज़ाकत इक चिंता बनी रहती है असर कहीं कम नहीं हो जाए। चालीस पार करते ही संवरने की ज़रूरत बढ़ जाती है। कुछ ऐसा ही उनके साथ होता है जिनका शोहरत पाने का ख्वाब सच हो जाता है तो शायर की कही बात याद आती है सताती है तड़पाती है , शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है , जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है। सत्ता के खिलाड़ी को खेल की चिंता से अधिक जीत की हार की चिंता होती है। जब हालात अच्छे होते हैं तब उल्टा फैंका भी सीधा पड़ता है। यहां आपको इक की व्याख्या समझानी ज़रूरी है। गांव के दो चौधरी रोज़ आपस में जुआ खेलते थे , इक दिन उन में से एक अपने घोड़े पर बैठ कहीं जाने को तैयार था कि तभी दूसरा उसके दरवाज़े पर आ पहुंचा। देख कर कहने लगा आज तो बहुत मन था खूब जमकर खेलने का मगर आप तो जा ही रहे हैं चलो किस्मत खराब है कि अच्छी है आज़माने की बात रह गई। सुनकर वो चौधरी बोले भाई चिंता क्यों करते हो बताओ कितना दांव पर लगाना चाहते हैं अभी पल भर में बाज़ी खत्म हो जाएगी। घोड़े पर बैठे बैठे कहने लगे देखो मैं अपना जूता उछालता हूं आप बताना सीधा या उल्टा , नीचे ज़मीन पर जूता जैसे पड़ेगा जीत हार का फैसला हो जाएगा। घर से जाते जाते भी एक चौधरी जीत कर खुश थे और एक हार कर भी खुश थे हसरत बाकी तो नहीं रही खेलने की।

   ये पुराने समय की बात थी आजकल चौधरी अपने विरोधी की क्या उसके पुरखों तक की पगड़ी उछालते हैं। दाग़ अच्छे बन जाते हैं उनके साथ मिलने से सबसे अधिक दाग़दार उनकी के लोग हैं मगर कहते हैं इधर कोई दस रूपये में दाग़ साफ करता है कोई समझाता है जब कोई आप पर भरोसा करता है तब आपका फ़र्ज़ बन जाता है उसके आंचल को बेदाग़ करने का जिस का आंचल मैला हुआ वो भी कहती है मेरे पास भी है हमने मिलकर इसको बनाया है नंबर वन। पहले आज़माओ फिर विश्वास करो। ये सारा खेल नंबर वन को लेकर है। बीवी कुली हीरो से कितनी फ़िल्में नंबर वन जोड़ कर बनाई गई हैं। खान बंधुओं को लेकर मीडिया बहुत चिंतित रहता था। किसी अभिनेता को तो सदी का महानायक घोषित कर दिया गया है। टीवी चैनल कितने घटिया और बिकाऊ समझे जाने लगे हों रहते सब नंबर वन की दौड़ में शामिल हैं। टीआरपी का नशा पागलपन से बढ़कर मदहोश करता है।
         
     कोरोना क्या आया तमाम लोगों की धड़कनें बढ़ने लगी हर किसी को जान की चिंता से अधिक किसी जहान की चिंता सताने लगी। अपनी अपनी सबकी परेशानी होती है , जाने कब से उनकी चाहत थी अपनी शोहरत को बुलंदी के शिखर पर पहुंचाने की। क्या नहीं किया और क्या नहीं छोड़ दिया , सबकी चादर को मैली बताने से लेकर जिसकी चादर पर कोई छींटा भी नहीं था उस पर भी तोहमत लगा दी आपने चादर को जस की तस रख दीनी चदरिया किस तरह बचाए रखा जब हम सभी हम्माम में नंगे नहाते हैं सदन में सभाओं में कीचड़ उछालते हैं कोई तो छींटा नज़र आता सच बड़ी निराशा हुई उनको। कोई रैनकोट पहन नहाते हैं खिसियाहट में कह दिया मगर मौनी बाबा मौन रहे। कहते हैं जहां लोग ऐसे चर्चा करते हैं समझदार खामोश रहना उचित समझते हैं , सफाई देने की कोई ज़रूरत ही नहीं जब पूछने वाला खुद आरोप लगाने में ही बेगुनाही का सबूत दे रहा हो।नम्ब्र वन होने को एड़ी छोटी का ज़ोर लगाया है कभी ऐसे ऐसे काम भी किये जो नेकनामी नहीं बदनाम करने वाले समझे गए। मगर बदनाम होना भी नाम वाला होना होता है ये सोचकर मनमौजी अंदाज़ से ज़िंदगी का लुत्फ़ उठाते रहे।

   टीवी वाले अखबर को खबर बनाते हैं खबर की खबर नहीं रखते। जाने किस आधार पर घोषणा नहीं करते बल्कि कोई राज़ की बात बताते हैं कि विश्व भर के सभी देश कोरोना को लेकर उन्हीं से सलाह मशविरा करते हैं। साल पहले दावा था उनसे पहले जितने भी इस कुर्सी पर रहे उन सभी से इनकी शोहरत बढ़कर है। अब जब तमाम अटकलें हैं और हज़ारों सवाल हैं जिनका जवाब नहीं है उनके पास और तब सवाल करने पर ही सवाल उठाते हैं। दुष्यन्त कुमार के शब्दों में , हमने सोचा जवाब आएगा , इक बेहूदा सवाल आया है। जाने कोई जादू की छड़ी है जबाब के हाथ लगी , जो दुनिया को कोरोना को लेकर कोई और नहीं दिखाई देता। ये टीवी वालों की काल्पनिक कहानी हो मुमकिन है क्योंकि उनके लिए सब कुछ मुमकिन है अन्यथा हम से अधिक विकसित और आधुनिक देश जो वैज्ञानिक सोच से चलते हैं आस्था भरोसा अंधविश्वास से किस्मत नहीं आज़माते डॉक्टर्स और कोरोना के शोध पर हमसे कहीं अधिक ध्यान देते हैं शोध पर जितना धन ज़रूरी खर्च करने को तैयार हैं भला उनसे क्या सलाह मांग सकते हैं। हां ये मुमकिन है उनसे इस बात की राय कोई शासक लेता हो कि कैसे कुछ भी नहीं कर के भी सब कुछ कर दिया और क्या कुछ नहीं कर सकते कहने और समझने का आत्मविश्वास किस तरह से हासिल किया जा सकता है। हमारे हरियाणा की कहावत है , जिसकी खाओ बाजरी , उसकी साजो हाज़िरी। ये नशा ये मदहोशी सब पैसे का खेल है , जिस दिन खेल खत्म पैसा हज़्म।  

Thursday, 14 May 2020

अच्छे दिनों की ढलती शाम के लंबे लंबे साये - डॉ लोक सेतिया

 अच्छे दिनों की ढलती शाम के लंबे लंबे साये - डॉ लोक सेतिया 

चाहा कुछ और था मिला कुछ और ये ऑनलाइन खरीदने का नतीजा है। तारीख़ पर तारीख़ जैसे ऐप्प्स ही ऐप्प्स मगर नतीजा वही इंसाफ नहीं मिलता मिलती है नित नई कोई ऐप्प। अच्छे दिन होते ही नहीं है ऐसा नहीं है हमने दादा जी से सुना था कभी बहुत अच्छे दिन थे जब जीने की ज़रूरत की चीज़ें सस्ती हुआ करती थी और इंसानियत की मूल्यों की कोई कीमत नहीं होती थी सिक्कों में ये सब अनमोल होते थे। जब सब कुछ बाज़ार में बिकने लगा तो क्लर्क से अफ़्सर क्या सांसद विधायक यहां तक किसी हर्षद मेहता ने देश को सबसे ऊंचे पद वाले की कीमत केवल एक करोड़ बताई थी। जनसत्ता के संपादक को कहना पड़ा था कि अगर ये सच है तो उन्होंने अपना ईमान बहुत सस्ते में बेचा है। अब उनकी बात का अर्थ क्या यही नहीं निकलता कि बिकना ही है तो अपना दाम बढ़ चढ़ कर रखना चाहिए। कम कीमत में ज़मीर नहीं बेचना चाहिए आखिर ज़मीर एक ही होता है कितनी बार बेचोगे। कभी समय था समझते थे बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता। मगर कितना बदल गया वक़्त भी इंसान भी अब बिक गये जो वही खरीदार हैं। टीवी अख़बार मीडिया सबने अपने मुहमांगे दाम वसूले हैं आजकल उनके शोरूम हैं जहां क्या नहीं बिकता क्या नहीं खरीद सकते। आज कई साल पहले लिखी रचना याद आई है। ब्लॉग पर है अब फिर से दोहराना चाहता हूं कुछ बदलाव करने के बाद। 

        1                    चुनाव अध्यक्ष का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      हम शांति पूर्वक घर के अंदर बैठे हुए थे कि तभी बाहर से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें आने लगी। श्रीमती जी देखने गई कि इतनी आवाज़ें किसलिये हो रही हैं। और तुरंत घबरा कर वापस भीतर आ गई और कहने लगी कुछ ख्याल भी है कि बाहर क्या हो रहा है। हमने पूछा ये इतना शोर क्यों है , लगता है गली से बाहर का कोई कुत्ता आया होगा , और अपनी गली के सारे कुत्ते उस पर भौंकने लगे होंगे। श्रीमती जी बोली आप बाहर निकल कर तो देखो यहां अपने घर के सामने वाले पार्क में सारे शहर के कुत्ते जमा हो गये हैं और वे एक दूसरे पर नहीं भौंक रहे , जो आदमी उनको भगाने का प्रयास करे उसको काटने को आते हैं। अपना टौमी भी उनके बीच चला गया है , ऐसे आवारा कुत्तों में शामिल हो कर वो भी आवारा न बन जाये , उसको बुला लो। घर से बाहर निकल कर हमने जब अपने टौमी को आवाज़ दी तो पार्क में जमा हुए सभी कुत्ते हमारी तरफ मुंह करके भौंकने लगे। जब हमने देखा कि हमारा टौमी भी उनमें शामिल ही नहीं बल्कि हम पर भौंकने में सब से आगे भी है तो हम घबरा गये। तब हमें कुत्तों के डॉक्टर की बात याद आई कि अगर कभी टौमी कोई अजीब हरकत करे तो तुरंत उसको सूचित करें। हमने तभी उनसे फोन पर विनती की शीघ्र आने की और वे आ गये। आते ही सीधे वे उन कुत्तों की भीड़ में चले गये और उनको देख कर कोई कुत्ता भी नहीं भौंका सब के सब खामोश हो गये। जैसे बच्चे चुप हो जाते हैं अध्यापक को देखकर। हम दूर से देख कर हैरान थे और वे एक एक कर हर कुत्ते को पास बुलाते और उसके साथ कुछ बातें करते इशारों ही इशारों में। हम कुछ भी समझ नहीं पा रहे थे मगर लग रहा था उनको मालूम हो गया है क्या माजरा है। थोड़ी देर बाद डॉक्टर साहब ने आकर बताया कि चिंता की कोई बात नहीं है , आपका टौमी और बाकी सभी कुत्ते तंदरुस्त हैं। आज उनकी एक विशेष सभा है। हमने उनकी फीस दी और उनसे पूछा कि ये कैसी सभा है , ऐसा तो पहले नहीं देखा कभी भी हमने। उन्होंने बताया कि वे कुत्तों की भाषा को समझते हैं और हमें बता सकते हैं कि आज क्या क्या हो रहा है इस सभा में। वे कुत्तों से बातें करते रहे हैं और आज उन सब ने बताया है कि यहां आज शहर के कुत्तों ने अपना प्रधान चुनना है।
          डॉक्टर साहब ने बताया हमें जो जो भी बातें आपस में कर रहे थे सब कुत्ते। कई कुत्ते चाहते हैं प्रधान बनना और वो अपना अपना दावा पेश कर रहे हैं। आप विश्वास रखें उनमें कोई लड़ाई नहीं हो रही है , हर कोई अपनी बात रख रहा है और सब की बात सुनी जा रही है।  जिसको भी ज़्यादातर सदस्य पसंद करेंगे वही प्रधान घोषित कर दिया जायेगा , प्रयास है कि चुनाव सभी की सहमति से ही हो। कोई वोट नहीं , बूथ कैप्चरिंग नहीं ,जात पाति , रिश्ते नातों का कोई दबाव नहीं , न ही कोई प्रलोभन , सब खुले आम पूरे लोकतांत्रिक ढंग से हो रहा है। जो बातें उन्होंने देख कर बताई वो वास्तव में दमदार हैं ज़रा आप भी सुनिये।
                सब से पहले शहर के प्रधान का कुत्ता बोला कि उसको ही प्रधान बनाया जाना चाहिये। जब तुम सभी के मालिकों ने मेरे मालिक को अपना प्रधान चुना है तो तुम सब को वही करना चाहिये , शहर के प्रधान का कुत्ता होने से मेरा हक बनता है प्रधानगी करने का। इस पर कई सदस्यों ने सवाल उठाया कि शहर वाले तो हमेशा प्रधान चुनने में गलती कर जाते हैं और जिसको समझते हैं काम करेगा वो किसी काम का नहीं होता है। प्रधान बनने के बाद सारे वादे भूल जाता है और कुर्सी को छोड़ने को तैयार नहीं होता चाहे लोग न भी चाहते हों। प्रधान का कुत्ता बोला कि मैं ऐसा नहीं करूंगा , जब भी कहोगे हट जाउंगा , मैं कुत्ता हूं आदमी जैसा नहीं बन सकता। तब एक सदस्य ने सवाल उठाया कि तुमने अपना धर्म नहीं निभाया था , जब तुम्हारे मालिक के घर में चोरी हुई थी तब तुम भौंके ही नहीं। प्रधान के कुत्ते ने कहा ये सच है कि मैं नहीं भौंका था लेकिन तुम नहीं जानते कि ऐसा इसलिये हुआ कि प्रधान के घर से जो माल चोरी गया वो माल भी चोरी का था और उसको जो चुराने वाले थे वो भी प्रधान के मौसेरे भाई ही थे। इस पर पुलिस वाले का कुत्ता खड़ा हो कर बोला हम सभी को अपनी सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिये , आजकल चोर चोरी से पहले कुत्ते को जान से मारने का काम करने लगे हैं , हमें पुलिस से रिश्ता बनाना चाहिये ताकि वो हमारी सुरक्षा कर सके। तब एक सदस्य ने कहा क्या हम पुलिस पर यकीन कर सकते हैं ,पुलिस खुद चोरों से मिली रहती है। जान बूझकर चोरों को नहीं पकड़ती है , उनसे रिश्व्त लेकर चोरी करने देती है। तब पुलिस के कुत्ते को क्रोध आ गया और वो बोला था , और तुम खुद क्या करते हो। तुम्हारा मालिक जनहित का पैरोकार बना फिरता है और सब से फायदा उठाता रहता है ये क्या मुझसे छुपा हुआ है। इस बीच शहर के बड़े अधिकारी का कुत्ता खड़ा हो गया और बोला आप सभी ख़ामोशी से ज़रा मेरी बात सुनें। जब सब चुप हो गये तो वो पार्क के बीच में बने चबूतरे पर खड़ा हो लीडरों की भाषा में बातें करने लगा। कहने लगा मैं ये नहीं कहता कि मुझे अपना प्रधान बनाओ , मगर जिसको भी बनाया जाये उसको पता होना चाहिये कि हम सब को क्या क्या परेशानियां हैं। हमारी तकलीफों को कौन समझता है , हम केवल चोरों से घर की रखवाली ही नहीं करते हैं , अपने अपने मालिक के शौक और उनका रुतबा बढ़ाने के लिये भी हमारा इस्तेमाल किया जाता है। मालकिन के साथ कार में , उसकी गोदी में , उसके साथ खिलौना बन कर पार्टियों में जाकर हमें कितनी घुटन होती है , और कितना दुःख होता है सब के सामने उसके इशारों पर तमाशा बन कर। हम क्या उसके पति हैं। इसके इलावा हम में बहुत सदस्य ऐसे भी हैं जिनके मालिक न भरपेट खाना देते हैं न ही रहने को पूरी जगह ही। हम बेबस जंजीर में जकड़े कुछ भी नहीं कर पाते। हमें जब मालिक बचाव के टीके न लगवायें और हम बीमार हो जायें , तब खुद ही हमें गोली मार देते हैं ये क्या उचित है। आपको पता है कितने मालिक अपने कुत्तों से पीछा छुड़ाने के लिये उसको दूर किसी जंगल में छोड़ आते हैं भेड़ियों के खाने के लिये। और भी बहुत सारी बातें हैं जिनसे हम अनजान ही रहते हैं। मेरे को यूं भी फुर्सत नहीं है कि प्रधान बन कर ये सब काम करूं , आप किसी को भी अपना प्रधान चुनो मगर वो ऐसा हो जो ये बातें जनता हो समझता हो और इनका समाधान कर सके। सभी कुत्ते तब एक साथ बोले थे कि वो आपके बिना दूसरा कोई हो ही नहीं सकता है। और आला अधिकारी के कुत्ते को प्रधान चुन लिया गया , उसको फूलमाला पहना दी गई।

      अब फिर उसी बात पर आते हैं जहां से चर्चा की शुरआत हुई थी। इक और रचना भी है। 

     2              जो बिक गये , वही खरीदार हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

कहानी एक वफादार कुत्ते की है। अपने गरीब मालिक की रूखी सूखी रोटी खा कर भी वो खुश रहता। कभी भी गली की गंदगी खाना उसने स्वीकार नहीं किया। वो जानता था कि मालिक खुद आधे पेट खा कर भी उसको भरपेट खिलाता है। इसलिये वो सोचता था कि मुझे भी मालिक के प्रति वफादार रहना चाहिये , उसके सुख़ दुःख को समझना चाहिये। वो दिन रात मालिक के घर और खेत खलियान की रखवाली करता। अचानक कुछ लोग मालिक के घर महमान बन कर आये और उसके कुत्ते की वफादारी को देख उससे कुत्ते को खरीदने की बात करने लगे। गरीब मालिक अपने कुत्ते को घर का सदस्य ही मानता था इसलिये तैयार नहीं हुआ किसी भी कीमत पर उसको बेचने के लिये। तब उन्होंने कुत्ते को लालच दे कर कहा कि तुम इस झौपड़ी को छोड़ हमारे आलीशान महल में चल कर तो देखो। मगर वफादार कुत्ते ने भी उनके साथ जाने से इनकार कर दिया। ऐसे में उन्होंने दूसरी चाल चलने का इरादा कर लिया और कुत्ते से कहा कि तुम रहते तो यहीं रहो , बस कभी कभी ख़ास अवसर पर जब हम बुलायें तब आ जाया करना। हम भी तुम्हें खिला पिला कर दिखाना चाहते हैं कि तुम हमें कितने अच्छे लगते हो। बस यही राजनीति की चाल थी , वे यदा कदा आते और कुत्ते को घुमाने को ले जाते। कभी कोई बोटी डाल देते तो कभी हड्डी दे देते चबाने को। धीरे धीरे कुत्ता उनकी आने की राह तकने लगा , और उनके आते ही दुम हिलाने लगा। इस तरह अब उसको मालिक की रूखी सूखी रोटी अच्छी नहीं लगने लगी और धीरे धीरे उसकी वफादारी मालिक के प्रति न रह कर चोरों के साथ हो गई। जब महमान बन कर आये नेता ही चोर बन उसका घर लूटने लगे तो बेखबर ही रहा। अपने कुत्ते की वफादारी पर भरोसा करता रहा जबकि वो अब चोरों का साथी बन चुका था।
                              आजकल किसी गरीब की झौपड़ी की रखवाली कोई कुत्ता नहीं करता है। अब सभी अच्छी नस्ल के कुत्ते कोठी बंगले में रहते हैं कार में घूमते हैं। मालकिन की गोद में बैठ कर इतराते हैं , और सड़क पर चलते इंसानों को देख सोचते हैं कि इनकी हालत कितनी बदतर है। हम इनसे लाख दर्जा अच्छे हैं। इन दिनों कुत्तों का काम घरों की रखवाली करना नहीं है , इस काम के लिये तो स्कियोरिटी गार्ड रखे जाते हैं। कुत्ते तो दुम हिलाने और शान बढ़ाने के काम आते हैं। जो आवारा किस्म के गली गली नज़र आते हैं वे भी सिर्फ भौंकने का ही काम करते हैं , काटते नहीं हैं। जो रोटी का टुकड़ा डाल दे उसपर तो भौंकते भी नहीं , जिसके हाथ में डंडा हो उसके तो पास तक नहीं फटकते।
                                     चुनाव के दिन चल रहे हैं , ऐसे में एक नेता जी अखबार के दफ्तर में पधारे हैं , अखबार का मालिक खुश हो स्वागत कर कहता है धनभाग हमारे जो आपने यहां स्वयं आकर दर्शन दिये। मगर नेता जी इस बात से प्रभावित हुए बिना बोले , साफ साफ कहो क्या इरादा है। अब ये नहीं चल सकता कि खायें भी और गुर्रायें भी। संपादक जी वहीं बैठे थे , पूछा नेता जी भला ऐसा कभी हो सकता है। हम क्या जानते नहीं कि आपने कितनी सुविधायें हमें दी हैं हर साहूलियत पाई है आपकी बदौलत। आप को नाराज़ करके तो हमें नर्क भी नसीब नहीं होगा और आपको खुश रख कर ही तो हमें स्वर्ग मिलता रहा है। आप बतायें अगर कोई भूल हमसे हो गई हो तो क्षमा मांगते हैं और उसको सुधार सकते हैं। नेता जी का मिज़ाज़ कुछ नर्म हुआ और वो कहने लगे कि कल आपके एक पत्रकार ने हमारी चुनाव हारने की बात लिखी है स्टोरी में , क्या आपको इतना भी नहीं पता। संपादक जी ने बताया कि अभी नया नया रखा है , उसको पहले ही समझा दिया है कि नौकरी करनी है तो अखबार की नीतियों का ध्यान रखना होगा। आप बिल्कुल चिंता न करें भविष्य में ऐसी गल्ती नहीं होगी। अखबार मालिक ने पत्रकार को बुलाकर हिदायत दे दी है कि आज से नेता जी का पी आर ओ खुद स्टोरी लिख कर दे जाया करेगा और उसको ही अपने नाम से छापते रहना जब तक चुनाव नहीं हो जाते। सरकारी विज्ञापन कुत्तों के सामने फैंके रोटी के टुकड़े हैं ये बात पत्रकार जान गया था।
                     सच कहते हैं कि पैसों की हवस ने इंसान को जानवर बना दिया है। जब नौकरी ही चोरों की करते हों तब भौंके तो किस पर भौंके। भूख से मरने वालों की खबर जब खूब तर माल खाने वाला लिखेगा तो उसमें दर्द वाली बात कैसे होगी , उनके लिये ऐसी खबर यूं ही किसी छोटी सी जगह छपने को होगी जो बच गई कवर स्टोरी के शेष भाग के नीचे रह जाता है। कभी वफादारी की मिसाल समझे जाते थे ये जो अब चोरों के मौसेरे भाई बने हुए हैं। जनता के घर की रखवाली करने का फ़र्ज़ भुला कर उसको लूटने वालों से भाईचारा बना लिया है अपने लिये विशेषाधिकार हासिल करने को। जब मुंह में हड्डी का टुकड़ा हो तब कुत्ता भौंके भी किस तरह। अपना ज़मीर बेचने वालों ने जागीरें खड़ी कर ली हैं इन दिनों। जो कोई नहीं बिका उसी को बाकी बिके लोग मूर्ख बता उपहास करते हैं ये पूछ कर कि तुमने बिकने से इनकार किया है या कोई मिला ही नहीं कीमत लगाने वाला क्या खबर। वो मानते हैं कि हर कोई किसी न किसी कीमत पर बिक ही जाता है। तुम नहीं बिके तभी कुछ भी नहीं तुम्हारे पास , खुद को बेच लो ऊंचे से ऊंचा दाम लेकर ताकि जब तुम्हारी जेब भरी हो तिजोरी की तरह , तब तुम औरों की कीमत लगा कर खरीदार बन सको और ये समझ खुश हो सको कि सब बिकाऊ हैं तुम्हारी ही तरह।

                         दोनों रचनाओं का सारांश यही है :-

हमने अध्यक्ष का चुनाव क्या सोचकर किया और जो हमारे घर की चौकीदारी को रखवाली को अपना कर्तव्य बताते थे उनको लोभ लालच ने बिकने पर विवश कर दिया है। आजकल पालतू कुत्ते हैं जो दुम हिलाते हैं भौंकना छोड़ काटना भूल गए हैं।

सोने-चांदी के कलम नहीं लिखेंगे आंसू की दास्तां ( गरीबी की पीड़ा ) डॉ लोक सेतिया

सोने-चांदी के कलम नहीं लिखेंगे आंसू की दास्तां ( गरीबी की पीड़ा ) 

                                     डॉ लोक सेतिया 

जो लिखना चाहता हूं उस असहनीय दर्द की व्यथा कथा को लिखने को अश्कों का इक समंदर चाहिए। पता नहीं जो टीवी पर अपने घर किसी तरह वापस जाते भूखे नंगे गरीब मज़दूर महिलाएं बच्चे सैकड़ों मील का फासला धूप या बारिश जैसा भी मौसम हो जाते नज़र आ रहे हैं उनकी पीड़ा को कोई समझ भी रहा है। उनकी बदहाली को भी टीवी चैनल वाले बताते दिखलाते हैं तब रत्ती भर भी मानवीय संवेदना उनके चेहरे और खबर बताने के ढंग में दिखाई नहीं देती है। दो दिन से तो मोदी जी की भारत सरकार द्वारा की बीस लाख करोड़ की घोषणा की चर्चा से अधिक महत्व किसी और विषय का नहीं का रह नहीं गया है। सरकार के लोग टीवी पर आकर बीस लाख करोड़ का विवरण बताते हुए अपने चेहरे पर गर्व और मुस्कुराहट लिए नज़र आते हैं जिसे देख कर लगता ही नहीं उनको करोड़ों बेबस उन गरीबों की दशा का कोई एहसास भी है। खुद ही अपनी पीठ थपथपाते लगते हैं जबकि जो भी किया गया या किया जाना है वो कोई उपकार नहीं है आपको करना ही चाहिए था और माफ़ करें ये जनता का धन है जनता के लिए ही है कोई महानता की बात नहीं है। क्या हम को अपनी साहूलियत से इस बात को अनदेखा कर देना चाहिए कि कोरोना को लेकर लॉक डाउन घोषित करने से पहले क्यों सरकार को देश की सबसे नीचे की पायदान पर गरीबी रेखा से नीचे के करोड़ों उन मज़दूरों की कोई चिंता नहीं होनी चाहिए थी जो अपने घर से हज़ार मील दूर रोज़ी रोटी की खातिर गए हुए हैं। अगर आप कोरोना की आहत होने के बाद भी नमस्ते ट्रम्प आयोजित करते हैं तो क्यों नहीं काम और सभी अन्य तरह की रोक लगाने से पहले उनकी उचित व्यवस्था करते। घोषणा करने से हुआ कुछ नहीं लोग बेसहारा और मज़बूर होकर अपनी जान हथेली पर रखकर निकल पड़े। 

हमने सुनी हैं दर्द की कहानियां उन से जो आज़ादी के समय बंटवारा होने पर इधर आये उधर से या उधर गए इधर से। मुहाज़िरनामा , मुनव्वर राणा की ज़ुबानी सुनते ही आपकी आंखें अगर नम नहीं होती है तो फिर आप ज़िंदा नहीं हैं एहसास मर चुके हैं। मगर तब हालात और थे नफरत की आग थी दोनों तरफ ही और कोई नहीं जानता था जिधर जा रहे हैं उधर भविष्य क्या होगा। सब कुछ छोड़ या जितना मुमकिन था समेट कर घर नहीं मकान नहीं शहर नहीं बहुत कुछ छोड़ आये थे। जाने कितने साल लगे थे उनको फिर से खुद को खड़ा करने में फिर भी जीवन भर इक तीस चुभती रहती थी जब कोई उनको शरणार्थी कोई मुहाज़िर कह कर बुलाता। आज अपने ही देश में अपने ही घर लौटने में अपनी ही बनाई सरकारों की असंवेदनशीलता ने जो दर्द उनको दिया है वो बंटवारे से बढ़कर है। उस से अधिक खेदजनक बात है देश राज्य की सरकार के साथ बाकी समाज का भी उनको लेकर उदासीन नज़र आना। आपने सोचा नहीं होगा भले जानते हैं कि देश की सड़कें बहुमंज़िला इमारतें आलीशान बाजार जहां जो भी है इन्हीं की मेहनत और पसीने से ही निर्मित हैं। कोई उद्योग कोई विकास इनके बिना नहीं मुमकिन था मगर जब इनको ज़रूरत थी कोई आसरा नहीं कोई दर्द बांटने वाला नहीं मिला। अपनी सबसे अधिक पसंद की गई ग़ज़ल से कुछ शेर यहां उपयुक्त हैं। 

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया


हमको ले डूबे ज़माने वाले ,
नाखुदा खुद को बताने वाले।

देश सेवा का लगाये तमगा ,
फिरते हैं देश को खाने वाले।
उनको फुटपाथ पे तो सोने दो ,
ये हैं महलों को बनाने वाले।

तूं कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं ,
मेरी अर्थी को उठाने वाले।

मैं तो आइना हूँ बच के रहना ,
अपनी सूरत को छुपाने वाले।

उन लाखों लोगों के आंसू भी खुश्क हो चुके हैं उनके चेहरे जाने कैसे अपनी निराशा और बेबसी को छुपाए अपने बच्चों की भूख और पांव के छालों को अनदेखा कर चल रहे हैं। जाने कितने कब कैसे कोरोना से नहीं अव्यवस्था का शिकार हो कर परलोक सिधार गए कोई उसका दोषी नहीं कोई मुजरिम नहीं। आज उनकी मौत कोई हादिसा नहीं कोई समाचार नहीं और कुछ दिन बाद उनके लंबे दर्द भरे सफर की भी कोई बात किसी इतिहास के पन्ने पर दर्ज हुई नहीं दिखाई देगी। उनकी मौत बेमौत मरना उनकी नियति समझी जाएगी और हमेशा की तरह गरीबी अभिशाप है कहकर भूल जाएंगे गरीबी क्यों है। आज बीस लाख करोड़ का पैकेज कोई पहला नहीं है पचास साल से कितनी योजनाओं का नतीजा शून्य रहा है। और ये तो घोषणा गरीबी को मिटाने की है ही नहीं ये तो है अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने की। जिनके पास कुछ है उनको थोड़ा और साथ या सहारा देने की बात है जिनके पास कुछ भी नहीं उनके लिए कुछ है भी नहीं।

 बीस लाख करोड़ की राशि को बताते हुए टीवी वाले दो के बाद 13 जीरो लगती हैं सुनकर इक बात का ख्याल आया की आज से पांच सौ साल पहले बीस रूपये की कीमत कितनी होती थी। तब नानक को पिता ने बीस रूपये देकर कोई अच्छा कारोबार करने को भेजा था। रस्ते में उनको कुछ भूखे साधुओं की टोली मिली। तब उनको लगा इनको रोटी खिलाने से अच्छा और कोई कारोबार क्या हो सकता है। और उन्होंने सारे बीस रूपये इसी नेक काम पर खर्च कर दिए थे। वो इक अकेले इंसान की बात थी पांच सौ साल पहले। मुझे नहीं लगता आज इतने बढ़े देश की सरकार के बीस लाख करोड़ की कीमत उस से बढ़कर होगी। मगर इन में भी वास्तव में भूखे गरीबों को क्या कब कितना मिलता है विश्वास से कोई नहीं जानता क्योंकि भाषण बहुत सुनते रहे हैं हुआ क्या सामने है। दो और बातें हैं जो बाद में कहनी हैं इक गांव की मुखिया की बेटी ऐश्वर्या की और इक बड़ी पुरानी कविता पंजाबी की।

                    वतन से इश्क़ गरीबी से बैर और प्यार अमन से ,

                         सभी ने ओढ़ रखे हैं नकाब जितने हैं।



Wednesday, 13 May 2020

कोरोना ज्ञान का संदेश है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     कोरोना ज्ञान का संदेश है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

शायद अभी नहीं पहचानोगे समझोगे तभी जानोगे कभी कोरोना की कथा लिखोगे उसका संदेश मानोगे। क्या अभी कुछ सालों से आपको इक कमी नहीं महसूस हो रही थी कि अब तो समाज के पतन की हद हो गई है अब तो कोई समाज सुधारक आना चाहिए। शायद इस से भी आप भी सहमत होंगे कि ये भी साफ लगने लगा था कि इस युग में उपदेश सुनकर लोग नहीं सुधरने वाले। जब उपदेशक खुद अपनी शिक्षा पर नहीं चलते तब गीता बांचने से भला कोई धर्म को आत्मा नश्वर है जैसी बात को समझेगा गीता ज्ञान या कोई भी धर्म उपदेश जब समझाने वाले ही नहीं समझे तो उनका समझाना किस काम का। तभी आधुनिक युग में सुधार लाने को कोरोना जैसा उपाय ज़रूरी हो गया था। नहीं यहां कोरोना को अवतार नहीं घोषित करना है वो क्या है कौन है कोई नहीं समझा तो मुझ जैसे को क्या पता इसलिए मुझे उसे अच्छा या बुरा नहीं साबित करना है बस सोचना है समझना है जानना है कि उसके आने से क्या हुआ है। आज के अध्याय में इसी विषय की चर्चा करनी है। 

कुछ महीने पहले कितनी बिमारियां कितने डॉक्टर नर्सिंग होम अस्पताल शहर शहर रोगी ही रोगी खड़े रहते थे इंतज़ार में। और स्वास्थ्य सेवाओं के लोग जितनी भी भीड़ रहती हो चाहते थे कारोबार को अधिक बढ़ाना। विस्तार में जाना अनावश्यक है कुछ बातों को भूल जाना अच्छा होता है मिट्टी डालो उन सब पर। आज देखते हैं तो लगता है कोरोना को छोड़ कोई रोग नहीं है कोई भीड़ नहीं नज़र आती है। ऐसा नहीं है कि अब वो ठीक हो गई हैं हुआ ये है कि अब समझ आया जिनसे हम घबराते थे वो कोई इतनी भयानक नहीं थीं जितनी ये है। इक बार कोई इंसान भाग्य विधाता के पास गया और शिकायत की कि आपने मुझे इतनी भारी गठड़ी सर पर बोझ बना लाद दी कोई छोटी हल्की होती तो अच्छा था। विधाता उसको लेकर किसी जगह गया जहां बड़े छोटे कितने ही पत्थर रखे हुए थे , और फिर उस इंसान से कहा इन सभी को उठाओ और पढ़ लो किस पर किसका नाम लिखा हुआ है फिर जो भी तुम्हें उठाते हुए छोटा और हल्का लगे उसी पर अपना नाम मुझसे लिखवा लेना। एक एक कर कितने पत्थर उठा कर देखे उन पर किस किस का नाम लिखा है पढ़ कर देखा कोई भी पसंद नहीं आया तभी इक छोटा पत्थर दिखाई दिया मगर जब उसे पलट कर देखा तो अपना नाम लिखा हुआ था। वास्तव में जब तक औरों के दुःख दर्द समझते नहीं तभी तक अपने दुःख दर्द परेशानियां बड़ी लगती हैं जब बाकी दुनिया के दर्द तकलीफ समझते हैं तभी पता चलता है कि हमसे भी बदनसीब और तमाम लोग हैं। हैरानी की बात ये भी है कि अब डॉक्टर अस्पताल नर्सिग होम वाले भी कोरोना से घबराते हैं और नहीं चाहते उनके पास भीड़ जमा हो , खुद ही कहते हैं आपको आने की ज़रूरत नहीं है फोन पर ही सलाह ले सकते हैं। कभी उनको फोन पर खुद बात करने की फुर्सत नहीं होती थी और उनका स्टाफ रोगी को समय पर आने की बात कहता क्योंकि डॉक्टर व्यस्त हैं। 

अब इसी तरह क्या क्या सुधार नहीं हो गया नज़र आता है , पुलिस वाले लोगों को वास्तव में सुरक्षित रखने का फ़र्ज़ निभाने लगे हैं। अब तो वही नेता जो भरी सभा में गोली मारने की बात करते थे आज टीवी पर उसी अपनी सरकार के बीस लाख करोड़  के आर्थिक पैकेज की जानकारी दे रहे हैं। जब तक पानी नाक तलक नहीं आया समझे ही नहीं देश की अर्थव्यवस्था की नैया डोल रही है , जब लगा ये डूबी तो हमें भी ले कर डुबोएगी तब खुद अपनी जान और सबकी जान बचाने की बात समझ आई है। नाखुदा को खुदा कहा है तो फिर , डूब जाओ खुदा खुदा न करो। बड़ी देर कर दी मेहरबां आते आते। कौन कौन नहीं सुधरने लगा है सामने है। गंगा मैली हो गई थी पापियों के पाप धोते धोते अब सब पापी घर बैठे हैं मेरे जैसे तो गंगा कितनी साफ लगने लगी है। जो लोग रात दिन पैसे कमाने में भाग दौड़ में घर परिवार बच्चे जीने का आनंद तक भूल गए थे अब समझने लगे हैं थोड़ा आराम भी कर लें तो सुकून है। बाहर जाने किस किस ढंग का खाना पीना छोड़ अब घर पर बना सब अच्छा लगने लगा है। मुझे याद नहीं कितने समय से कोई दोस्त कोई जान पहचान वाला कोई रिश्ते नाते वाला बिना काम मिलने क्या फोन भी करना याद रखता हो। अब सभी को मिलने की चाहत दिल से होने लगी है और फोन नहीं तो सोशल मीडिया पर बात मैसेज वीडियो कॉल पर ही सही सम्पर्क बना रहता है। 

समाज में और भी बहुत कुछ बदल रहा है मगर ये भी जानते हैं हम सभी कि जैसे सब ठीक होने लगता कभी भी हम वापस अपनी पुरानी आदतों और चाहतों के गुलाम बन जाते हैं। लेकिन अब हर किसी ने समझ लिया जैसे देश की सरकार से विश्व भर की सरकारों ने स्वीकार कर लिया है कि शायद लंबे समय तक या फिर हमेशा हमेशा कोरोना के साथ ही रहना होगा। जब किसी से लड़कर हराना मुश्किल लगता है तब बीच का कोई रास्ता बनाते हैं। जिओ और जीने दो , कोरोना को समझना समझाना होगा हम हारे न तुम जीते मैच बराबरी पर समाप्त करते हैं। 21 ओवर्स 19 ओवर्स 14 ओवर्स अभी कितने और ओवर्स लॉक डाउन के घरों में बैठे टीवी सोशल मीडिया पर दुनिया भर की जंग देखते रहेंगे। लेकिन जैसा लग रहा है कोरोना दुनिया को बदलने को इक संदेश की तरह आया है मगर अभी भी लोग अपने अहंकार और ताकत से सबको डराने लगे हैं कभी किसी को धमकी कभी सबक सिखाने की बात होती है। कोरोना मुमकिन है ऐसे सभी लोगों की हेकड़ी निकलने तक अपना समाज सुधर जारी रखे। 

  आजकल कोई ऐसी बात नहीं करता है कभी फ़िल्मकार कथाकार इक सपना देखा करते थे जब सब अच्छा होगा। फैज़ अहमद फैज़ की नज़्म अकेली नहीं है हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे। नया ज़माना इक फिल्म बनी थी हेमा मालिनी धर्म जी की लिखी किताब से पढ़कर गीत गाती है। कितने दिन आंखें तरसेंगी , कितने दिन यूं दिल तरसेंगे। इक दिन तो बादल बरसेंगे , ए मेरे प्यासे दिल। आज नहीं तो कल महकेगी खुशियों की महफ़िल। नया ज़माना आएगा। ज़िंदगी पर सबका एक सा हक है सब तसलीम  करेंगे , सारी खुशियां सारे दर्द बराबर हम तकसीम करेंगे। नया ज़माना आएगा नया ज़माना आएगा।


शायद यही ढंग हो उस ख्वाब की हक़ीक़त में बदलने का , नया ज़ामना मुमकिन है अच्छे दिन लेकर आये।

Tuesday, 12 May 2020

सिक्कों के बाज़ार में इंसान का मोल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 सिक्कों के बाज़ार में इंसान का मोल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    कुछ समझ नहीं आता कहां से शुरू करूं , किसी समय मुझे मेरे पिता जी ने भी पैसे की कीमत इसी तरह समझाई थी। तब सौ रूपये की कीमत बहुत होती थी मुझे कहा था जेब में सौ रूपये हों तो बोतल का नशा होता है। मगर मैं परले दर्जे का मूर्ख पिता जी का समझाया पाठ कभी नहीं सीखा। तभी न मेरी जेब में कभी पैसा रहा और न कभी शराब का नशा क्या होता है मुझे पता चला। देखा है कई लोगों को पैसा आया तो शराब भी पीना भी सीख लिया और लगता है कि उनकी पत्नी भी सोने चांदी की झंकार से शराबी पति को भी बहुत आदर देती हैं भले शराब पीकर वो क्या से क्या हो जाता है। खैर बात आज की है शाम या रात आठ बजे टीवी पर मोदी जी बार बार समझा रहे थे। बीस लाख करोड़ करीब करीब जीडीपी का कितना हिस्सा होता है , साल 2020 में बीस लाख करोड़ किस बजट का कितना भाग होता है। सच बीस लाख करोड़ शब्द कहते हुए उनके चेहरे पर चमक दिखाई देती थी। उनके आने से जो आ जाती है चेहरे पर रौनक वो समझते हैं बीमार का हाल अच्छा है। तो हमारे चारागर को ईलाज समझ आ गया था कोरोना कोरोना का रोना छोड़ ये हिसाब लगाओ बीस लाख करोड़ में कितने ज़ीरो लगते हैं और 130 करोड़ के हिस्से में कितना पैसा आएगा। नहीं कोई जुमला नहीं ये सच है आपके बैंक खाते में नहीं मगर आपके ही नाम पर इनकी बंदरबांट होगी। 

कहते हैं हर बात का कहने का सही वक़्त होता है मुझे तो ये जले कटे पर नमक छिड़कना लगा शायद किसी को पसंद आई हो ये बात। जाने कितनी फिल्मों के डायलॉग याद आने लगे , सबसे मशहूर डायलॉग कितनी फिल्मों में अमीर बाप गरीब लड़के को खाली चेक देकर कहता इस में जितनी चाहे कीमत भर लो अपनी मगर मेरी बेटी को छोड़ दो। दामिनी फिल्म में एडवोकेट चड्ढा बताता है उसका मुवकिल पांच लाख दे रहा है इक लड़की की कीमत इतनी कम नहीं है। नायक कहता है इसे भड़वागिरी कहते है कानून की दलाली से इज़्ज़त की नीलामी तक पहुंच गए। खैर पैसा बोलता है तो अंदाज़ यही होता है अमेरिका पाकिस्तान को ही नहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन तक को हड़काता है सहायता देने को बंद करने की धमकी या कारनामा। ये कोई ताकत नहीं कमज़ोरी होती है। राज्य सभा की सीट कहते हैं कीमत देनी पड़ती है अमीरों की बात है। हम लोग कभी अपनी जान की कीमत नहीं लगवाते हैं और सरकार भी आम आदमी की जान की कोई कीमत नहीं समझती है। जाने किस फिल्म की बात है नायक खलनायक का पैसों से भरा बैग खोलकर नोटों की बारिश कर देता है और उस खलनायक के सभी साथी नोट झपटने में लग जाते हैं। 

राजनीति का सच यही है सभी किसी न किसी दाम पर बिकने को तैयार हैं। टीवी चैनल मीडिया वाले तो शर्मसार भी नहीं होते ज़मीर बेचने को कोई अच्छा सा नाम दे देते हैं। सभी जानते हैं पैसा सबसे अधिक वैश्या के पास होता है ये भी सच है कि राजनीती और वैश्यावृति इक जैसे धंधे बताये गए हैं। कितनी फिल्मों में यही देखा भी है मगर मुझे पाकीज़ा फिल्म की मीनाकुमारी की बात अलग लगती है। जिसने उसको पाला पोसा जब पता चलता है रईस नवाब साहब अपनी बेटी को छीनने आने वाले हैं तो लखनऊ चली जाती है उसे लेकर। मगर उसे जन्म देने वाली मां भी मीनाकुमारी का ही निभाया किरदार है जो जीते जी खुद कब्रिस्तान चली जाती है। लखनऊ में जाकर शानदार बंगला गुलाबी महल खरीद कर मीना कुमारी की परवरिश करने वाली बाई बड़े धनवानों के सामने उसका मुजरा नाचना गाना करवाती है , साहिब जान लखनऊ की शान बन जाती है। 

   मोदी जी के बाद टीवी पर बारी थी नितिन गडकरी जी टीवी पर साक्षात्कार दे रहे थे , यकीन मानिये कोई दर्द का चिंता का भाव नहीं दिखाई दिया। क्या मुस्कान है जान कुर्बान करने के काबिल। शायर का कहना याद आया , क्या बात है कि अमीरों के घर मौत का दिन भी लगता है त्यौहार सा। मगर ये कोई बड़े छोटे लोगों की मौत का मातम नहीं है मातम होना चाहिए था कोरोना का और आपने कोरोना से हार मान ली उसे साथ लेकर जीना मरना है। सुना था कफ़न में जेब नहीं होती और सिकंदर भी जब दुनिया से गया दोनों हाथ खाली थे। ये किस अवसर की बात करने लगे आप हद है। मुझे आज भी याद है इक दोस्त जो मेरी तरह डॉक्टर भी है और लेखन भी करते हैं मुझे फोन पर अपनी पहचान इस तरह से बता रहे थे , मेरे नर्सिंग होम में कितने बिस्तर हैं एक्स - रे भी तीन है और जाने क्या क्या। मगर मुझे उनकी किताब मैगज़ीन बिकवानी नहीं आती थी ये साफ मना किया तो बुरा मान गए। नहीं मुझे नहीं आता किसी से भी चंदा मांगना ये आदत है इसी पर तकरार करने लगे। मेरी हैसियत जो भी है खैरात नहीं चाहिए किसी भी नाम से। मैंने बहुत ऐसे गरीब लोग देखे हैं जिनके पास पैसे के सिवा कुछ भी नहीं। मगर मेरा पागलपन देखिये मैंने अपनी नयी ग़ज़ल उन्हीं की बात पर कहकर उन्हीं को भेजी भी थी। ग़ज़ल कहते हैं समझ गए होंगे। ग़ज़ल ये है :-

 

कैसे कैसे नसीब देखे हैं  ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कैसे कैसे नसीब देखे हैं ,
पैसे वाले गरीब देखे हैं।

हैं फ़िदा खुद ही अपनी सूरत पर ,
हम ने चेहरे अजीब देखे हैं।

दोस्तों की न बात कुछ पूछो ,
दोस्त अक्सर रकीब देखे हैं।

जिंदगी को तलाशने वाले ,
मौत ही के करीब देखे हैं।

तोलते लोग जिनको दौलत से ,
ऐसे भी कम-नसीब देखे हैं।

राह दुनिया को जो दिखाते हैं ,
हम ने विरले अदीब देखे हैं।

खुद जलाते रहे जो घर तनहा ,
ऐसे कुछ बदनसीब देखे हैं। 

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कुछ कहना है खामोश हैं सभी ( सन्नाटा ) डॉ लोक सेतिया

  कुछ कहना है खामोश हैं सभी ( सन्नाटा ) डॉ लोक सेतिया 

   यूं तो महफ़िल सजी है कितनी रौनक नज़र आती है मगर हर कोई मिलता है तो इक नज़र देख कर पास से गुज़र जाता है। इक सन्नाटा सा छाया हुआ है कोई सरसराहट भी नहीं किसी के कदमों की आहट तक सुनाई नहीं देती है। शायद कोई अनहोनी घटना घटी हो या कोई बड़ा जादूगर आया और सबको अपने जादू से सम्मोहित कर चला गया पत्थर बना कर जो चलते फिरते हैं किसी जादू के खिलौने की तरह। जादूगर फिर वापस आएगा और सबको मुक्त करवा देगा मदहोशी से अपनी छड़ी से। ठीक होने के बाद सभी को कुछ भी याद नहीं रहता कितने साल से हम किसी की कठपुतली बने हुए हैं। ऐसा लगता है देश के नागरिक अहिल्या की तरह किसी श्राप से शिला बन गए हैं और किसी राम के आने तक निर्जीव संवेदना रहित होकर रहना नियति है। कोई राम नहीं आएगा कोई और अपने जादू से फिर से जीवन भर दे अगर नसीब अच्छा है। 

    लोग फिर सम्मोहन का शिकार हो जाते हैं , जादूगर अपनी जादूगिरी दिखलाते हैं। लोग पीते हैं लड़खड़ाते हैं दिल की दुनिया के ग़म भुलाते हैं। एक हम हैं जो तेरी महफ़िल में प्यासे आते हैं प्यासे जाते हैं। तुम बताओ तुम्हारी दुनिया है क्यों खुदा कोई खुद ही बनाते हैं सब इसी बात से परेशां हैं रहबर क्यों कारवां लुटवाते हैं। आप पंडित नहीं मौलवी भी नहीं आप सरकार हैं आते जाते हैं काम की बात कभी नहीं करते जाने क्या राज़ है छुपाते हैं। आपने बात जो बताई है सुन रखी है और सुनाई है मेरा है आप जो समझते हैं सच कहें चीज़ वो पराई है। आज कुछ और बात करते हैं कभी कोई और बात कहते थे , हर किसी को यही कठिनाई है क्या क्या बात क्यों बनाई है। आपको तालियां ही भाती हैं सवाल सुनते ही तिलमिलाते हैं खुद को समझ बैठे हैं नहीं जो धोखा देते हैं मुस्कुराते हैं। आपको सभी को जगाना था आप तो खुद ही किसी गहरी नींद में हैं और सपनों के आकाश में उड़ते फिर रहे हैं । आप भी हैं और हम भी मुसाफ़िर हैं भौर हुई , चाय पीते पिलाते हैं। राजधर्म किस तरह निभाते हैं लोग भैंस के सामने बीन बजाते हैं। रावण महाराज भी आजकल रामकथा गाकर सुनाते हैं।

    यही आजकल का निज़ाम है असली सवाल पर चर्चा नहीं करते हैं। बेसिर पैर की बातें बनाते हैं सुनाते हैं। आप इंसान हैं या कोई इश्तिहार हैं क्या क्या गज़ब ढाते हैं। सच कहें आप बड़े झूठे हैं फिर भी हमको बहुत लुभाते हैं। आपको देखते ही रहते हैं लोग क्या अंदाज़ है क्या खूबसूरत अदा है सभी हैरान रह जाते हैं। हमने माना सबसे बड़े जादूगर हैं आप सभी को दिखाई देता वही जो दिखाते हैं। करिश्मा है अजब लोग जानते हैं ये जादू धोखा है फिर भी धोखा खाने चले आते हैं। कितने जादू टोने कितने मंत्र आपने दिए हैं काम कोई वक़्त पर नहीं आते हैं। लूटते हैं सभी लुटते हैं और मसीहाई यही है समझा जाते हैं। अपने खूब बनाया बहाना  है कोई नहीं आपका ठिकाना है फिर मिलेंगे अभी चलते हैं मज़बूरी है नहीं बहाना है शाम ढल गई घर भी जाना है। आपके बिन नहीं दिल लगता क्या करें ज़ालिम बहुत ज़माना है , आशिक़ी है कहते हैं  जिगर मुरादाबादी इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। आशिक़ महबूबा चांद तारों खूबसूरत नज़ारों की बातें करते हैं उनको वास्तविकता को छोड़ ख्यालों की दुनिया अच्छी लगती है। उनके पास तर्क की कोई बात नहीं होती बस चाहत ने अंधा बना रखा होता है। सत्ता का भी यही हाल है सत्ताधारी को हक़ीक़त देखना पसंद नहीं होता है चाटुकार सच नहीं देखने देते झूठा गुणगान करते हैं और अपने महिमामंडन से इंसान खुद को मसीहा समझने लगता है।

  देश और राज्य की सरकारों के नैतिक पतन की कोई सीमा नहीं है जब आजकल लोग आपदा से पीड़ित हैं इनको अपने खज़ाने भरने की पड़ी है। मैंने कहीं पढ़ा कि जब किसी देश के माहमारी आपदा होती है तब शासक को अपने खज़ाने भरने की नहीं खज़ाने को बांटने की बात करनी होती है। शायद आपको लगेगा कि ये कैसे मुमकिन है तो खोजना आपके धर्म की किसी किताब में शासक का यही धर्म बताया है। इक जानकर से बात की तो उन्होंने इस को ज़रूरी भी और उचित के साथ संभव भी है बताया। उनके पास समझाने को आसान ढंग था , देश के बीस प्रतिशत रईस लोग अगर अपनी जमापूंजी का पांचवा नहीं दसवां भाग भी गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को दान नहीं उनका अधिकार समझ कर सौंप देते हैं तो उनकी हालत एक साल से दो तीन साल में सुधर कर मध्यम वर्ग जैसी हो जाएगी। क्योंकि उनके पास जो ज़रूरत से अधिक दौलत है वो गरीबों की हक की मेहनत की कीमत नहीं देने से ही होती है। शोषण किये बिना संभव नहीं इतना ज़मीन आसमान का अंतर होना। लेकिन यही अमीर अपने पास जमा पूंजी को घटने से चिंतित होते हैं मगर देश की सरकार उनको अनुचित सहयोग देने की जगह उन्हें आदेश दे सकती है कि आप ऐसा करेंगे तो आपको अगले साल दो तीन आयकर नहीं भरना पड़ेगा। सरकार को कुछ भी देना नहीं है केवल लेना नहीं और जिनसे लेना उनको वही गरीबों को देने का निर्णय लागू करवाना है। मध्यम वर्ग को कोई अनुदान नहीं देने की ज़रूरत मगर बदहाली में उनसे तमाम तरह के कर वसूलना छोड़ सकते हैं विपदा खत्म होने तक। यकीन करें बड़े छोटे आसान कदम उठाकर देश की तीन चौथाई जनता की हालत सुधार सकते हैं।

   मगर सरकार कभी ऐसा नहीं करती है क्योंकि पहली बात तो उनकी अवधारणा अर्थव्यवस्था की उल्टी है जो सबको बराबरी पर लाना नहीं चाहती अमीर को अमीर गरीब को और गरीब बनाने का काम करती है। दूसरी सबसे अनुचित बात सरकार सत्ताधारी नेताओं अधिकारी लोगों का खुद पर रहीसाना ढंग से जीने को कितनी तरह की सुविधाओं को वीवीआईपी लोगों के लिए उपलब्ध करवाने का लूट और आमनवीय तौर तरीका बना लिया गया है जिसको छोड़ना नहीं चाहते। अगर इनमें थोड़ी भी मानवीय संवेदना रत्ती भर भी मानव धर्म का भाव बाकी है तो इनको खुद देश के औसत नागरिक की आय के बराबर वेतन लेकर देश और समाज की वास्तविक सेवा करने का आदर्श दिखाना चाहिए। और इस के लिए उनके पास कोई कमी नहीं हो सकती है इतना सब है देश के संसाधन और विरासत में मिले तमाम अन्य साधन। देश की जनता ने हर बात मानी तब भी सरकारी हिसाब और आंकलन गलत साबित हुआ। अब कहने लगे लोग क्या चाहते हैं बताएं हम लॉक डाउन करें या कैसे खोलें। जनाब पहले नहीं सोचा न ही पूछा था बस जब मर्ज़ी जैसा निर्णय किया और अंजाम नहीं समझा सोचा न ही वही फिर से दोहराना बंद किया।

शायद आज इक नीति- कथा की बात करना भी अनुचित नहीं होगा। जिनको धर्म ईश्वर और अच्छाई बुराई के फल आदि पर भरोसा है उनको सोचना होगा इस कथा के अनुसार शासक का अधिक लोभ लालच ही कारण होता है देश में कुदरत के नराज़ होने का। धर्म की किताब में भी लिखा है शासक के अनुचित कर्म आचरण की सज़ा देश राज्य की जनता को मिलती है। आखिर जनता का दोष है किस को शासक बनाती है।  

   ये निति कथा ब्लॉग पर नीचे दिए लिंक पर भी पढ़ सकते हैं इक और राजस्थानी 

            लोक कथा " तू पी - तू पी "  भी साथ है।


http://blog.loksetia.com/2014/03/blog-post.html

Monday, 11 May 2020

समझौता कोरोना से कर लो ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  समझौता कोरोना से कर लो ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

            " ये खैरखाह ज़माने ने तय किया आखिर , नमक ही ठीक रहेगा जले कटे के लिए। " 

   गुरूजी आर पी मह्रिष जी का शेर है। जनाबेआली समझा रहे हैं अब दर्द की दवा यही है दर्द सहना होगा। दर्द के साथ जीने की आदत डालनी होगी। कब तलक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहोगे , भला ऐसे भी कोई राज करने का मज़ा है। बहुत हाल चाल जान लिया तसल्ली दे दे कर थक गए अब भूखे भजन न होये गोपाला। सरकार को कर चाहिए कर देने को आपको कारोबार करना होगा बहुत कारोबार अपनी ज़रूरत को किया अब देश की तिजोरी खाली होने को है वही नहीं भरी तो सत्ता का हासिल क्या है। कभी विचार ही नहीं किया था राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों ने कि जनता नहीं है सरकार के भरोसे , सरकार का वजूद ही जनता के सहारे है। चलो पता चला सेवक सेवक होता है मालिक मालिक रहता है। 45 दिन में टें बोलने लगे लोग 72 साल से हिम्मत नहीं हारे हैं। उनको यही लगता था जनता ज़रूरी  है शासन करने को लोग होने चाहिएं और वोट देने को भी जनता की ज़रूरत आमदनी को भी होती है इसकी कल्पना नहीं की थी। अब तो बात आशिक़ी जैसी बन गई है तुम बिन जीवन कैसा जीवन। हम तुमसे जुदा हो के मर जाएंगे रो रो के।

    सरकार ने घोषित किया है ये ऐसा दुश्मन है जिसे घर मैं बंद रहकर भी घर से निकाल नहीं सकते। जैसे कोई अपने प्यार को दिल से निकाल नहीं सकता चाहे साथ हो चाहे दूर हो। जान का दुश्मन है जिसे अपनी जान समझ बैठे हैं अजीब बात है कोरोना क्या क्या रंग दिखलाता है कभी ताली कभी थाली कभी दिया कभी कोई और बात लगता ही नहीं रोग है या कोई संजोग है। शायर बशीर बद्र जी का कहना है आखिर कोई कब तक लड़ेगा। परिवार अदालत सरहद की जंग ये सिलसिला कभी खत्म नहीं होता है। आखिरकार समझौता ही रास्ता बचता है। साथ ये भी समझाते हैं कि दुश्मनी करते समय उस सीमा तक नहीं पहुंचना चाहिए कि बाद में आंख से आंख मिलाना मुश्किल हो। जो कभी लड़ने को छोड़ कुछ भी नहीं सीखे किसी को नहीं छोड़ा कोरोना से लड़ाई से ऐसे भागने की बात कहने लगे हैं। 

        दुश्मनी का सफर एक कदम दो कदम , तुम भी थक जाओगे हम भी थक जाएंगे। 

   दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे ,जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिन्दा न हों।

     दुनिया में सब किसी की पसंद का नहीं हुआ करता। पसंद नापसंद दोनों तरह के लोग माहौल चीज़ें गांव शहर रास्ते आदमी रिश्ते नाते होते हैं। पहले सभी सब कुछ बदलने की कोशिश करते हैं फिर ऐसा भी होता है कि जिनको बदलना था खुद उन्हीं जैसे हो जाते हैं , या जो न बदलते हैं न ही बदलना चाहते हैं हालत को देख कर समझ कर समझौता कर लेते हैं। टकराव आखिर कब तक हर कोई थक जाता है।  आखिर बड़े बड़े शूरवीर घुटने टेक देते हैं हार नहीं मानते मगर शांति समझौता करने की बात होने लगती है। चीन पाकिस्तान आतंकवाद से हम रोज़ लड़ते हैं रोज़ मिल बैठते हैं , सयाने लोग कहते थे बीच का रास्ता बनाए रखना चाहिए ज़िद करके रूठे हैं तब भी मान जाने की उम्मीद कायम रखनी चाहिए और जब कोई मनाने आये तो मान भी जाना चाहिए। इतनी जल्दी हार मानने की उम्मीद तो नहीं थी जैसे सरकार ने सीना ठोककर कहा था कोरोना को हराना ही है चाहे कुछ भी हो। दो महीने भी नहीं हुए और सरकार ने झुकने का निर्णय कर लिया है देश की जनता का हौंसला कायम रहता है उसे कितनी तरफ से किस किस ने घेरा हुआ है सबसे लड़ती रहती है हर पल उसकी जंग किसी जद्दोजहद की तरह चलती रहती है। राजनेताओं को केवल एक ही लड़ाई लड़नी आती है चुनावी जंग में उनको कोई रोक नहीं सकता है सत्ता लुभाती रहती है।

      इक कहानी याद आई है इक नगर के शासक को सूचना मिली कोई बदमाश नगर भर को परेशान करने लगा है। अपने सिपहसलार को कहा उसको आदेश भेजो दरबार में हाज़िर हो अभी , हवालदार आदेश देकर वापस लौट आया मगर बदमाश ने कोई जवाब नहीं दिया। उसके बाद दरोगा को जाकर पकड़ने का आदेश जारी किया गया मगर दरोगा का हुक्म नहीं माना बदमाश ने कह दिया जाओ नहीं चलता साथ। दरोगा अकेला हाथ में डंडा पकड़े समझ गया जान है तो जहान है आकर बताया जनाब मुझसे नहीं पकड़ा गया। अब सिपहसलार खुद साथ अपनी सेना लेकर बदमाश को सबक सिखाने पहुंचा मगर अकेला बदमाश दस पर भारी पड़ने लगा जाने क्या क्या हथियार लिए थे जो शहर के शासक के पास नहीं थे। आखिर शासक को बदमाश को समझौता करने को शांतिवार्ता को किसी की मध्यस्ता से मिलना पड़ा। जब आमना सामना होता है तब कोई छोटा बड़ा नहीं होता है जो जीता वही सिकंदर होता है। सरकार ने अभी तक सोचा भी नहीं था कि कोई छोटा सा जीवाणु उसको विवश कर सकता है हारने की तो बात सपने में नहीं थी दुनिया को जीतने का भरोसा था। जल्द समझ गए ये कोई चुनाव नहीं है जो किसी भी तरह जीत लेंगे और नहीं जीत सके तब भी जोड़ तोड़ खरीद फ़रोख़्त से अपनी सरकार बनवा लेंगे। यहां खुद को चाणक्य होने का दावा करने वाले भी खामोश हैं उनको सब जानकारी सबको समझानी ज़रूरी लगती थी अब कोरोना शब्द बोलते ज़ुबान लड़खड़ाने लगती है।  सवाल कोरोना का होना नहीं है सवाल सरकार का सरकार होना है।

       सुदर्शन फ़ाक़िर की ग़ज़ल है।


आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यों है , ज़ख्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यों है।

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी , अपनी नज़रों में हर इक शख़्स सिकंदर क्यों है।

जब हक़ीक़त है कि हर ज़र्रे में तू रहता है , फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यों है। 

ज़िंदगी जीने के काबिल तो नहीं अब फ़ाकिर , वर्ना हर आंख में अश्कों का समंदर क्यों है। 

क्या बदनसीबी है कि जब लोग जीने से तंग आकर मौत का भी सामना करने को तैयार होते हैं , फ़रमान जारी किया जाता है जीने के लिए। ये भी कोई जीना है डर डर कर हर पल मौत को देखना , इक बार मरना मुश्किल नहीं ये बार बार नहीं मरना चाहते लोग।

   जाते जाते अपनी इक ग़ज़ल भी पेश करता हूं :-

हमको जीने की दुआ देने लगे ,
आप ये कैसी सज़ा देने लगे।

दर्द दुनिया को दिखाये थे कभी ,
दर्द बढ़ने की दवा देने लगे।

लोग आये थे बुझाने को मगर ,
आग को फिर हैं हवा देने लगे।

अब नहीं उनसे रहा कोई गिला ,
अब सितम उनके मज़ा देने लगे।

साथ रहते थे मगर देखा नहीं ,
दूर से अब हैं सदा देने लगे।

प्यार का कोई सबक आता नहीं ,
बेवफा को हैं वफ़ा देने लगे।

कल तलक मुझ से सभी अनजान थे ,
अब मुझे मेरा पता देने लगे।

मांगता था मौत "तनहा" रात दिन ,
जब लगा जीने , क़ज़ा देने लगे। 

        ( ग़ज़ल लोक सेतिया "तनहा" )