Tuesday, 19 March 2013

ये कैसे समझदार होने लगे सब ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ये कैसे समझदार होने लगे सब ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ये कैसे  समझदार   होने लगे सब
दिया छोड़ हंसना , हैं  रोने लगे सब।

लगे प्यार करने , समझ कर तिजारत
जो पाया था , उसको भी खोने लगे सब।

किसी पर कभी तुम भरोसा न करना
नहीं अब बचाते ,  डुबोने लगे सब।

जिन्हें मुझसे सुननी थी मेरी कहानी
सुनाता रहा मैं , वो सोने लगे सब।

सभी आसमां के चमकते सितारे
हमें  दुल्हनों के बिछौने लगे सब।

किया रोज़ दावा , कभी हम न रोते
मिला ज़ख्म ,पलकें भिगोने लगे सब।

भुला कर मुहब्बत , मिला क्या है "तनहा"
यहां फूल तक शूल होने लगे सब।

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