Thursday, 10 January 2013

रुलाता सब ज़माना है , हमें रोना नहीं आता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

    रुलाता सब ज़माना है , हमें रोना नहीं आता ( ग़ज़ल ) 

                        डॉ लोक सेतिया "तनहा"

रुलाता सब ज़माना है , हमें रोना नहीं आता
हमें अश्कों से अपने दर्द सब धोना नहीं आता।

सिखा जाना कभी आकर दिलों को जीतते कैसे
हमें सब और है आता , यही टोना नहीं आता।

बढ़ाते जा रहे हैं सब कतारें खुद गुनाहों की
न बांधो पाप की गठड़ी अगर ढोना नहीं आता।

यहां पर आंधियां चलती बहुत ज़ालिम ज़माने की
तुम्हें लेकिन संभल कर खुद खड़े होना नहीं आता।

सभी कांटे हमें देना , उन्हीं को फूल दे देना
ख़ुशी का बीज जीवन में , जिन्हें बोना नहीं आता।

हमेशा मांगते रहते , मगर कैसे मिले कुछ भी
जिन्हें पाना तो आता है , मगर खोना नहीं आता।

चले आये हैं महफ़िल में , बिताने रात इक अपनी
अकेले रात भर "तनहा" हमें सोना नहीं आता।

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