Sunday, 30 December 2012

ग़ज़ल 1 7 0 ( और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी ) - लोक सेतिया "तनहा"

और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी - लोक सेतिया "तनहा"

और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी ,
बस सलामत रहे दोस्ती हमारी।

ग़म किसी के सभी हो गए हमारे ,
और उसकी ख़ुशी अब ख़ुशी हमारी।

अब नहीं मांगना और कुछ खुदा से ,
झूमने लग गई ज़िंदगी हमारी।

क्या पिलाया हमें आपकी नज़र ने ,
ख़त्म होती नहीं बेखुदी हमारी।

याद रखनी हमें आज की घड़ी है ,
जब मुलाक़ात हुई आपकी हमारी।

आपके बिन नहीं एक पल भी रहना ,
अब यही बन गई बेबसी हमारी।

जाम किसने दिया भर के आज "तनहा" ,
और भी बढ़ गई तिश्नगी हमारी।  

Saturday, 29 December 2012

ग़ज़ल 7 6 ( नहीं कभी रौशन नजारों की बात करते हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

नहीं कभी रौशन नज़ारों की बात करते हैं - लोक सेतिया "तनहा"

नहीं कभी रौशन नज़ारों की बात करते हैं ,
जो टूट जाते उन सितारों की बात करते हैं।

हैं कर रही बरबादियां हर तरफ रक्स लेकिन ,
चलो खिज़ाओं से बहारों की बात करते हैं।

वो लोग सच को झूठ साबित किया करें बेशक ,
जो रोज़ आ के हमसे नारों की बात करते हैं।

वो जानते हैं हुस्न वालों की हर हकीकत को ,
उन्हीं के कुछ टूटे करारों की बात करते हैं।

गुलों से करते थे कभी गुफ्तगू बहारों की ,
जो बागबां खुद आज खारों की बात करते हैं।

हुआ हमारे साथ क्या है ,किसे बतायें अब ,
सभी तो नज़रों के इशारों की बात करते हैं।

जिसे नहीं आया अभी तक ज़मीं पे चलना ही ,
वही ज़माने के सहारों की बात करते हैं।

जो नाखुदा कश्ती को मझधार में डुबोते हैं ,
उन्हीं से "तनहा" क्यों किनारों की बात करते हैं।

ग़ज़ल 7 5 ( प्यार की बात मुझसे वो करने लगा ) - लोक सेतिया "तनहा"

प्यार की बात मुझसे वो करने लगा - लोक सेतिया "तनहा"

प्यार की बात मुझसे वो करने लगा ,
दिल मेरा क्यों न जाने था डरने लगा।

मिल के हमने बनाया था इक आशियां ,
है वही तिनका तिनका बिखरने लगा।

दीनो-दुनिया को भूला वही प्यार में ,
जब किसी का मुकद्दर संवरने लगा।

दर्दमंदों की सुन कर के चीखो पुकार ,
है फ़रिश्ता ज़मीं पे उतरने लगा।

जो कफ़स छोड़ उड़ने को बेताब था ,
पर सय्याद उसी के कतरने लगा।

था जो अपना वो बेगाना लगने लगा ,
जब मुखौटा था उसका उतरने लगा।

उम्र भर साथ देने की खाई कसम ,
खुद ही "तनहा" मगर अब मुकरने लगा। 

Friday, 28 December 2012

ग़ज़ल 1 6 9 ( बहाने अश्क जब बिसमिल आये ) - लोक सेतिया "तनहा"

बहाने अश्क जब बिसमिल आये - लोक सेतिया "तनहा"

बहाने अश्क जब बिसमिल आये  ,
सभी कहने लगे पागल आये।

हुई इंसाफ की बातें लेकिन ,
ले के खाली सभी आंचल आये।

सभी के दर्द को अपना समझो ,
तुम्हारी आंख में भर जल आये।

किसी की मौत का पसरा मातम ,
वहां सब लोग खुद चल चल आये।

भला होती यहां बारिश कैसे ,
थे खुद प्यासे जो भी बादल आये।

कहां सरकार के बहते आंसू ,
निभाने रस्म बस दो पल आये।

संभल के पांव को रखना "तनहा" ,
कहीं सत्ता की जब दलदल आये।

ग़ज़ल 11 0 ( हमको जीने के सब अधिकार दे दो ) - लोक सेतिया "तनहा"

 हमको जीने के सब अधिकार दे दो - लोक सेतिया "तनहा"

हमको जीने के सब अधिकार दे दो ,
मरने की फिर सज़ा सौ बार दे दो।

अब तक सारे ज़माने ने रुलाया ,
तुम हंसने के लिए दिन चार दे दो।

पल भर जो दूर हमसे रह न पाता ,
पहले-सा आज इक दिलदार दे दो।

बुझ जाये प्यास सारी आज अपनी ,
छलका कर जाम बस इक बार दे दो।

पर्दों में छिप रहे हो किसलिये तुम ,
आकर खुद सामने दीदार दे दो।

दुनिया ने दूर हमको कर दिया था ,
रहना फिर साथ है इकरार दे दो।

दिल देने आज "तनहा" आ गया है ,
ले लो दिल और दिल उपहार दे दो। 

ग़ज़ल 1 0 6 ( हमको मिली सौगात है ) - लोक सेतिया "तनहा"

 हमको मिली सौगात है   - लोक सेतिया "तनहा"

हमको मिली सौगात है ,
अश्कों की जो बरसात है।

होती कभी थी चांदनी ,
अब तो अंधेरी रात है।

जब बोलती है खामोशी ,
होती तभी कुछ बात है।

पीता रहे दिन भर ज़हर ,
इंसान क्या सुकरात है।

होने लगी बदनाम अब ,
इंसानियत की जात है।

रोते सभी लगती अगर ,
तकदीर की इक लात है।

"तनहा" कभी जब खेलता ,
  देता सभी को मात है।

Thursday, 27 December 2012

ग़ज़ल 1 0 4 ( जब हुई दर्द से जान पहचान है ) - लोक सेतिया "तनहा"

 जब हुई दर्द से जान पहचान है - लोक सेतिया "तनहा"

जब हुई दर्द से जान पहचान है ,
ज़िंदगी तब हुई कुछ तो आसान है।

क़त्ल होने लगे धर्म के नाम पर ,
मुस्कुराने लगा देख हैवान है।

कुछ हमारा नहीं पास बाकी रहा ,
दिल भी है आपका आपकी जान है।

चार दिन ही रहेगी ये सारी चमक ,
लग रही जो सभी को बड़ी शान है।

लोग अब ज़हर को कह रहे हैं दवा ,
मौत का ज़िंदगी आप सामान है।

उम्र भर कारवां जो बनाता रहा ,
रह गया खुद अकेला वो इंसान है।

हम हुए आपके, आके "तनहा" कहें ,
बस अधूरा यही एक अरमान है।  

Sunday, 23 December 2012

अलविदा पुरातन स्वागतम नव वर्ष ( कविता ) 7 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

अलविदा पुरातन , स्वागतम नव वर्ष ( कविता ) लोक सेतिया

अलविदा पुरातन वर्ष ,
ले जाओ साथ अपने ,
बीते वर्ष की सभी ,
कड़वी यादों को ,
छोड़ जाना पास हमारे ,
मधुर स्मृतियों के अनुभव।

करना है अंत ,
तुम्हारे साथ ,
कटुता का देश समाज से ,
और करने हैं समाप्त  ,
सभी गिले शिकवे ,
अपनों बेगानों से ,
अपने संग ले जाना ,
स्वार्थ की प्रवृति को ,
तोड़ जाना जाति धर्म ,
ऊँच नीच की सब दीवारें।
 
इंसानों को बांटने वाली ,
सकुंचित सोच को मिटाते जाना  ,
ताकि फिर कभी लौट कर ,
वापस न आ सकें ये कुरीतियां ,
तुम्हारी तरह ,
जाते हुए वर्ष ,
अलविदा।

स्वागतम नूतन वर्ष  ,
आना और अपने साथ लाना ,
समाज के उत्थान को ,
जन जन के कल्याण को ,
स्वदेश के स्वाभिमान को ,
आकर सिखलाना सबक हमें ,
प्यार का भाईचारे का ,
सत्य की डगर पर चलकर ,
सब साथ दें हर बेसहारे का ,
जान लें भेद हम लोग ,
खरे और खोटे का ,
नव वर्ष ,
मिटा देना आकर ,
अंतर ,
तुम बड़े और छोटे का।  

Saturday, 22 December 2012

ग़ज़ल 1 0 1 ( रुक नहीं सकता जिसे बहना है ) - लोक सेतिया "तनहा"

रुक नहीं सकता जिसे बहना है - लोक सेतिया "तनहा"

रुक नहीं सकता जिसे बहना है ,
एक दरिया का यही कहना है।

मान बैठे लोग क्यों कमज़ोरी ,
लाज औरत का रहा गहना है।

क्या यही दस्तूर दुनिया का है ,
पास होना दूर कुछ रहना है।

बांट कर खुशियां ज़माने भर को ,
ग़म को अपने आप ही सहना है।

बिन मुखौटे अब नहीं रह सकते ,
कल उतारा आज फिर पहना है।

साथ दोनों रात दिन रहते हैं ,
क्या गरीबी भूख की बहना है।

ज़िंदगी "तनहा" बुलाता तुझको ,
आज इक दीवार को ढहना है। 

ग़ज़ल 9 9 ( उसको न करना परेशान ज़िंदगी )

 उसको न करना परेशान ज़िंदगी - लोक सेतिया "तनहा" 

उसको न करना परेशान ज़िंदगी ,
टूटे हुए जिसके अरमान ज़िंदगी।

होने लगा प्यार हमको किसी से जब ,
करने लगे लोग बदनाम ज़िंदगी।

ढूंढी ख़ुशी पर मिले दर्द सब वहां ,
जायें किधर लोग नादान ज़िंदगी।

रहने को सब साथ रहते रहे मगर ,
इक दूसरे से हैं अनजान ज़िंदगी।

होती रही बात ईमान की मगर ,
आया नज़र पर न ईमान ज़िंदगी।

सब ज़हर पीने लगे जान बूझ कर ,
होने लगी देख हैरान ज़िंदगी।

शिकवा गिला और "तनहा" न कर अभी ,
बस चार दिन अब है महमान ज़िंदगी। 

Friday, 21 December 2012

ग़ज़ल 9 7 ( गये भूल हम जिंदगानी की बातें ) - लोक सेतिया "तनहा"

गए भूल हम ज़िन्दगानी की बातें - लोक सेतिया "तनहा"

गए भूल हम ज़िन्दगानी की बातें ,
सुनाते रहे बस कहानी की बातें।

तराशा जिन्हें हाथ से खुद हमीं ने ,
हमें पूछते अब निशानी की बातें।

गये डूब जब लोग गहराईयों में ,
तभी जान पाये रवानी की बातें।

रही याद उनको मुहब्बत हमारी ,
नहीं भूल पाये जवानी की बातें।

हमें याद सावन की आने लगी है ,
चलीं आज ज़ुल्फों के पानी की बातें।

गये भूल देखो सभी लोग उसको ,
कभी लोग करते थे नानी की बातें।

किसी से भी "तनहा" कभी तुम न करना ,
कहीं भूल से बदगुमानी की बातें। 

ग़ज़ल 6 0 ( शिकवा नहीं है न कोई शिकायत है ) - लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा नहीं है न कोई शिकायत है  - लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा नहीं है न कोई शिकायत है ,
उनसे मिला दर्द लगता इनायत है।

जीने ही देते न मरने ही देते हैं ,
ये इश्क वालों की कैसी रिवायत है।

करना अगर प्यार ,कर के निभाना तुम ,
देता सभी को वो , इतनी हिदायत है।

बस आखिरी जाम भर कर अभी पी लें ,
उसने हमें आज दे दी रियायत है।

जिनको हमेशा ही तुम लूटते रहते ,
उनसे ही जाकर के मांगी हिमायत है।

आगाज़ देखा न अंजाम को जाना ,
"तनहा" यही तो सभी की हिकायत है।

Tuesday, 18 December 2012

ग़ज़ल 1 6 8 ( जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर ) - लोक सेतिया "तनहा"

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर - लोक सेतिया "तनहा"

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर ,
हमारा भी इक दोस्त होगा कहीं पर।

यही काम करता रहा है ज़माना ,
किसी को उठा कर गिराना ज़मीं पर।

गिरे फूल  आंधी में जिन डालियों से  ,
नये फूल आने लगे फिर वहीं पर।

वो खुद रोज़ मिलने को आता रहा है ,
बुलाते रहे कल वो आया नहीं पर।

किसी ने लगाया है काला जो टीका ,
लगा खूबसूरत बहुत उस जबीं पर।

भरोसे का मतलब नहीं जानते जो ,
सभी को रहा है यकीं क्यों उन्हीं पर।

रखा था बचाकर बहुत देर "तनहा" ,
मगर आज दिल आ गया इक हसीं पर।

Friday, 14 December 2012

ग़ज़ल 1 6 7 ( दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये ) - लोक सेतिया "तनहा"

दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये - लोक सेतिया "तनहा"

दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये  ,
और क्या चाहिये शायरी के लिये।

उसके आंसू बहे , ज़ख्म जिसको मिले ,
कौन रोता भला अब किसी के लिये।

जी न पाये मगर लोग जीते रहे ,
सोचते बस रहे ख़ुदकुशी के लिये।

शहर में आ गये गांव को छोड़ कर ,
अब नहीं रास्ता वापसी के लिये।

इस ज़माने से मांगी कभी जब ख़ुशी ,
ग़म हज़ारों दिये इक ख़ुशी के लिये।

तब बताना हमें तुम इबादत है क्या ,
मिल गया जब खुदा बंदगी के लिये।

आप अपने लिए जो न "तनहा" किया ,
आज वो कर दिया अजनबी के लिये।     

Thursday, 6 December 2012

ग़ज़ल 3 2 ( क्या अजब हादिसा हो गया ) - लोक सेतिया "तनहा"

क्या अजब हादिसा हो गया - लोक सेतिया "तनहा"

क्या अजब हादिसा हो गया ,
झूठ सच से बड़ा हो गया।

कश्तियां डूबने लग गई ,
नाखुदाओ ये क्या हो गया।

सच था पूछा ,बताया उसे ,
किसलिये फिर खफ़ा हो गया।

साथ रहने की खा कर कसम ,
यार फिर से जुदा हो गया।

राज़ खुलने लगे जब कई ,
ज़ख्म फिर इक नया हो गया।

हाल अपना   , बतायें किसे ,
जो हुआ , बस हुआ , हो गया।

देख हैरान "तनहा" हुआ ,
एक पत्थर खुदा हो गया।

ग़ज़ल 9 ( आपके किस्से पुराने हैं बहुत ) - लोक सेतिया "तनहा"

आपके किस्से पुराने हैं बहुत - लोक सेतिया "तनहा"

आपके किस्से पुराने हैं बहुत ,
सुन रखे ऐसे फसाने हैं बहुत।

बेमुरव्वत तुम अकेले ही नहीं ,
आजकल के दोस्ताने हैं बहुत।

वक़्त को कोई बदल पाया नहीं ,
वक़्त ने बदले ज़माने हैं बहुत।

हो गये दो जिस्म यूं तो एक जां ,
फासले अब भी मिटाने हैं बहुत।

दब गये ज़ख्मों की सौगातों से हम ,
और भी अहसां उठाने हैं बहुत।

मिल न पाये ज़िंदगी के काफ़िये ,
शेर लिख लिख कर मिटाने हैं बहुत।

फिर नहीं शायद कभी मिल पायेंगे  ,
आज "तनहा" पल सुहाने हैं बहुत। 
 

Wednesday, 5 December 2012

ग़ज़ल 8 ( पूछते सब ये क्या हो गया ) - लोक सेतिया "तनहा"

पूछते सब ये क्या हो गया - लोक सेतिया "तनहा"

पूछते सब ये क्या हो गया ,
बोलना तक खता हो गया।

आदमी बन सका जो नहीं ,
कह रहा मैं खुदा हो गया।

अब तो मंदिर ही भगवान से ,
लग रहा कुछ बड़ा हो गया।

भीख लेने लगे लगे आजकल  ,
इन अमीरों को क्या हो गया।

नाज़ जिसकी  वफाओं पे था ,
क्यों वही बेवफा हो गया।

दर-ब-दर को दुआ कौन दे ,
काबिले बद-दुआ हो गया।

कुछ न "तनहा" उन्हें कह सका ,
खुद गुनाहगार-सा हो गया। 

ग़ज़ल 1 6 6 ( कश्ती वही साहिल वही तूफाँ वही हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

 कश्ती वही साहिल वही तूफ़ां वही हैं - लोक सेतिया "तनहा"

कश्ती वही साहिल वही तूफां वही हैं ,
खुद जा रहे मझधार में नादां वही हैं।

हम आपकी खातिर ज़माना छोड़ आये  ,
दिल में हमारे अब तलक अरमां वही हैं।

कैसे जियें उनके बिना कोई बताओ ,
सांसे वही धड़कन वही दिल जां वही हैं।

सैलाब नफरत का बड़ी मुश्किल रुका था ,
आने लगे फिर से नज़र सामां वही हैं।

हालात क्यों बदले हुए आते नज़र हैं ,
जब रह रहे दुनिया में सब इन्सां वही हैं।

दामन छुड़ा कर दर्द से कुछ चैन पाया ,
फिर आ गये वापस सभी महमां वही हैं।

करने लगे जो इश्क आज़ादी से "तनहा" ,
इस वतन पर होते रहे कुरबां वही हैं।

Tuesday, 4 December 2012

ख्यालों में रह रह के आये जाये कोई ( नज़्म ) 4 3 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

 ख्यालों में रह रह के आये जाये कोई ( नज़्म ) लोक सेतिया 

ख्यालों में रह रह के आये जाये कोई ,
तसव्वुर में आ आ के मुस्काये कोई।

सराहूं मैं किस्मत को ,जो पास मेरे ,
कभी खुद से घबरा के आ जाये कोई।

वो भूली सी , बिसरी हुई सी कहानी ,
हमें याद आये , जो दोहराये कोई।

ठहर जाए जैसे समां खुशनुमां सा ,
मेरे पास आ कर ठहर जाये कोई।

किसी गुलसितां में खिलें फूल जैसे ,
खबर हमको ऐसी सुना जाये कोई। 

Monday, 3 December 2012

ग़ज़ल 4 4 ( बेवफा हमको कह गये होते )

बेवफ़ा हमको कह गये होते ,
हम ये इल्ज़ाम सह गये होते !
बहते मौजों के साथ पत्थर भी ,
जो न साहिल पे रह गये होते !
ग़म भी हमको सकून दे जाता ,
हंस के उसको जो सह गये होते !
ज़ेब देते किसी के दामन को ,
अश्क जो यूं न बह गये होते !
यूं न हम राह देखते उनकी ,
जो न आने को कह गये होते !
थाम लेते कभी उसे बढ़कर ,
दूर "तनहा" न रह गये होते !