Sunday, 30 December 2012

ग़ज़ल 1 7 0 ( और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी )

और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी ,
बस सलामत रहे दोस्ती हमारी !
ग़म किसी के सभी हो गए हमारे ,
और उसकी ख़ुशी अब ख़ुशी हमारी !
अब नहीं मांगना और कुछ खुदा से ,
झूमने लग गई ज़िंदगी हमारी !
क्या पिलाया हमें आपकी नज़र ने ,
ख़त्म होती नहीं बेखुदी हमारी !
याद रखनी हमें आज की घड़ी है ,
जब मुलाक़ात हुई आपकी हमारी !
आपके बिन नहीं एक पल भी रहना ,
अब यही बन गई बेबसी हमारी !
जाम किसने दिया भर के आज "तनहा" ,
और भी बढ़ गई तिश्नगी हमारी ! 

Saturday, 29 December 2012

ग़ज़ल 7 6 ( नहीं कभी रौशन नजारों की बात करते हैं )

नहीं कभी रौशन नज़ारों की बात करते हैं ,
जो टूट जाते उन सितारों की बात करते हैं !
हैं कर रही बरबादियां हर तरफ रक्स लेकिन ,
चलो खिज़ाओं से बहारों की बात करते हैं !
वो लोग सच को झूठ साबित किया करें बेशक ,
जो रोज़ आ के हमसे नारों की बात करते हैं !
वो जानते हैं हुस्न वालों की हर हकीकत को ,
उन्हीं के कुछ टूटे करारों की बात करते हैं !
गुलों से करते थे कभी गुफ्तगू बहारों की ,
जो बागबां खुद आज खारों की बात करते हैं !
हुआ हमारे साथ क्या है ,किसे बतायें अब ,
सभी तो नज़रों के इशारों की बात करते हैं !
जिसे नहीं आया अभी तक ज़मीं पे चलना ही ,
वही ज़माने के सहारों की बात करते हैं !
जो नाखुदा कश्ती को मझधार में डुबोते हैं ,
उन्हीं से "तनहा" क्यों किनारों की बात करते हैं !

ग़ज़ल 7 5 ( प्यार की बात मुझसे वो करने लगा )

प्यार की बात मुझसे वो करने लगा ,
दिल मेरा क्यों न जाने था डरने लगा !
मिल के हमने बनाया था इक आशियां ,
है वही तिनका तिनका बिखरने लगा !
दीनो-दुनिया को भूला वही प्यार में ,
जब किसी का मुकद्दर संवरने लगा !
दर्दमंदों की सुन कर के चीखो पुकार ,
है फ़रिश्ता ज़मीं पे उतरने लगा !
जो कफ़स छोड़ उड़ने को बेताब था ,
पर सय्याद उसी के कतरने लगा !
था जो अपना वो बेगाना लगने लगा ,
जब मुखौटा था उसका उतरने लगा !
उम्र भर साथ देने की खाई कसम ,
खुद ही "तनहा" मगर अब मुकरने लगा !

Friday, 28 December 2012

ग़ज़ल 1 6 9 ( बहाने अश्क जब बिसमिल आये )

बहाने अश्क जब बिसमिल आये  ,
सभी कहने लगे पागल आये  !
हुई इंसाफ की बातें लेकिन ,
ले के खाली सभी आंचल आये  !
सभी के दर्द को अपना समझो ,
तुम्हारी आंख में भर जल आये  !
किसी की मौत का पसरा मातम ,
वहां सब लोग खुद चल चल आये  !
भला होती यहां बारिश कैसे ,
थे खुद प्यासे जो भी बादल आये  !
कहां सरकार के बहते आंसू ,
निभाने रस्म बस दो पल आये  !
संभल के पांव को रखना "तनहा" ,
कहीं सत्ता की जब दलदल आये  !

ग़ज़ल 11 0 ( हमको जीने के सब अधिकार दे दो )

हमको जीने के सब अधिकार दे दो ,
मरने की फिर सज़ा सौ बार दे दो !
अब तक सारे ज़माने ने रुलाया ,
तुम हंसने के लिए दिन चार दे दो !
पल भर जो दूर हमसे रह न पाता ,
पहले-सा आज इक दिलदार दे दो !
बुझ जाये प्यास सारी आज अपनी ,
छलका कर जाम बस इक बार दे दो !
पर्दों में छिप रहे हो किसलिये तुम ,
आकर खुद सामने दीदार दे दो !
दुनिया ने दूर हमको कर दिया था ,
रहना फिर साथ है इकरार दे दो !
दिल देने आज "तनहा" आ गया है ,
ले लो दिल और दिल उपहार दे दो !

ग़ज़ल 1 0 6 ( हमको मिली सौगात है )

हमको मिली सौगात है ,
अश्कों की जो बरसात है !
होती कभी थी चांदनी ,
अब तो अंधेरी रात है !
जब बोलती है खामोशी ,
होती तभी कुछ बात है !
पीता रहे दिन भर ज़हर ,
इंसान क्या सुकरात है !
होने लगी बदनाम अब ,
इंसानियत की जात है !
रोते सभी लगती अगर ,
तकदीर की इक लात है !
"तनहा" कभी जब खेलता ,
देता सभी को मात है !

Thursday, 27 December 2012

ग़ज़ल 1 0 4 ( जब हुई दर्द से जान पहचान है )

जब हुई दर्द से जान पहचान है ,
ज़िंदगी तब हुई कुछ तो आसान है !
क़त्ल होने लगे धर्म के नाम पर ,
मुस्कुराने लगा देख हैवान है !
कुछ हमारा नहीं पास बाकी रहा ,
दिल भी है आपका आपकी जान है !
चार दिन ही रहेगी ये सारी चमक ,
लग रही जो सभी को बड़ी शान है !
लोग अब ज़हर को कह रहे हैं दवा ,
मौत का ज़िंदगी आप सामान है !
उम्र भर कारवां जो बनाता रहा ,
रह गया खुद अकेला वो इंसान है !
हम हुए आपके, आके "तनहा" कहें ,
बस अधूरा यही एक अरमान है !   

Sunday, 23 December 2012

अलविदा पुरातन स्वागतम नव वर्ष ( कविता ) 7 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

अलविदा पुरातन वर्ष ,
ले जाओ साथ अपने ,
बीते वर्ष की सभी ,
कड़वी यादों को ,
छोड़ जाना पास हमारे ,
मधुर स्मृतियों के अनुभव।
करना है अंत ,
तुम्हारे साथ ,
कटुता का देश समाज से ,
और करने हैं समाप्त  ,
सभी गिले शिकवे ,
अपनों बेगानों से ,
अपने संग ले जाना ,
स्वार्थ की प्रवृति को ,
तोड़ जाना जाति धर्म ,
ऊँच नीच की सब दीवारें। 
इंसानों को बांटने वाली ,
सकुंचित सोच को मिटाते जाना  ,
ताकि फिर कभी लौट कर ,
वापस न आ सकें ये कुरीतियां ,
तुम्हारी तरह ,
जाते हुए वर्ष ,
अलविदा !!
स्वागतम नूतन वर्ष  ,
आना और अपने साथ लाना ,
समाज के उत्थान को ,
जन जन के कल्याण को ,
स्वदेश के स्वाभिमान को ,
आकर सिखलाना सबक हमें ,
प्यार का भाईचारे का ,
सत्य की डगर पर चलकर ,
सब साथ दें हर बेसहारे का ,
जान लें भेद हम लोग ,
खरे और खोटे का ,
नव वर्ष ,
मिटा देना आकर ,
अंतर ,
तुम बड़े और छोटे का !! 

Saturday, 22 December 2012

ग़ज़ल 1 0 1 ( रुक नहीं सकता जिसे बहना है )

रुक नहीं सकता जिसे बहना है ,
एक दरिया का यही कहना है !
मान बैठे लोग क्यों कमज़ोरी ,
लाज औरत का रहा गहना है !
क्या यही दस्तूर दुनिया का है ,
पास होना दूर कुछ रहना है !
बांट कर खुशियां ज़माने भर को ,
ग़म को अपने आप ही सहना है !
बिन मुखौटे अब नहीं रह सकते ,
कल उतारा आज फिर पहना है !
साथ दोनों रात दिन रहते हैं ,
क्या गरीबी भूख की बहना है !
ज़िंदगी "तनहा" बुलाता तुझको ,
आज इक दीवार को ढहना है !

ग़ज़ल 9 9 ( उसको न करना परेशान ज़िंदगी )

उसको न करना परेशान ज़िंदगी ,
टूटे हुए जिसके अरमान ज़िंदगी !
होने लगा प्यार हमको किसी से जब ,
करने लगे लोग बदनाम ज़िंदगी !
ढूंढी ख़ुशी पर मिले दर्द सब वहां ,
जायें किधर लोग नादान ज़िंदगी !
रहने को सब साथ रहते रहे मगर ,
इक दूसरे से हैं अनजान ज़िंदगी !
होती रही बात ईमान की मगर ,
आया नज़र पर न ईमान ज़िंदगी  !
सब ज़हर पीने लगे जान बूझ कर ,
होने लगी देख हैरान ज़िंदगी !
शिकवा गिला और "तनहा" न कर अभी ,
बस चार दिन अब है महमान ज़िंदगी !

Friday, 21 December 2012

ग़ज़ल 9 7 ( गये भूल हम जिंदगानी की बातें )

गए भूल हम ज़िन्दगानी की बातें ,
सुनाते रहे बस कहानी की बातें !
तराशा जिन्हें हाथ से खुद हमीं ने ,
हमें पूछते अब निशानी की बातें !
गये डूब जब लोग गहराईयों में ,
तभी जान पाये रवानी की बातें !
रही याद उनको मुहब्बत हमारी ,
नहीं भूल पाये जवानी की बातें !
हमें याद सावन की आने लगी है ,
चलीं आज ज़ुल्फों के पानी की बातें !
गये भूल देखो सभी लोग उसको ,
कभी लोग करते थे नानी की बातें !
किसी से भी "तनहा" कभी तुम न करना ,
कहीं भूल से बदगुमानी की बातें !

ग़ज़ल 6 0 ( शिकवा नहीं है न कोई शिकायत है )

शिकवा नहीं है न कोई शिकायत है ,
उनसे मिला दर्द लगता इनायत है !
जीने ही देते न मरने ही देते हैं ,
ये इश्क वालों की कैसी रिवायत है !
करना अगर प्यार ,कर के निभाना तुम ,
देता सभी को वो ,इतनी हिदायत है !
बस आखिरी जाम भर कर अभी पी लें ,
उसने हमें आज दे दी रियायत है !
जिनको हमेशा ही तुम लूटते रहते ,
उनसे ही जाकर के मांगी हिमायत है !
आगाज़ देखा न अंजाम को जाना ,
"तनहा" यही तो सभी की हिकायत है !

Tuesday, 18 December 2012

ग़ज़ल 1 6 8 ( जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर )

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर ,
हमारा भी इक दोस्त होगा कहीं पर !
यही काम करता रहा है ज़माना ,
किसी को उठा कर गिराना ज़मीं पर !
गिरे फूल  आंधी में जिन डालियों से  ,
नये फूल आने लगे फिर वहीं पर !
वो खुद रोज़ मिलने को आता रहा है ,
बुलाते रहे कल वो आया नहीं पर !
किसी ने लगाया है काला जो टीका ,
लगा खूबसूरत बहुत उस जबीं पर !
भरोसे का मतलब नहीं जानते जो ,
सभी को रहा है यकीं क्यों उन्हीं पर !
रखा था बचाकर बहुत देर "तनहा" ,
मगर आज दिल आ गया इक हसीं पर !

Friday, 14 December 2012

ग़ज़ल 1 6 7 ( दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये )

दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये  ,
और क्या चाहिये शायरी के लिये  !
उसके आंसू बहे , ज़ख्म जिसको मिले ,
कौन रोता भला अब किसी के लिये  !
जी न पाये मगर लोग जीते रहे ,
सोचते बस रहे ख़ुदकुशी के लिये  !
शहर में आ गये गांव को छोड़ कर ,
अब नहीं रास्ता वापसी के लिये  !
इस ज़माने से मांगी कभी जब ख़ुशी ,
ग़म हज़ारों दिये इक ख़ुशी के लिये  !
तब बताना हमें तुम इबादत है क्या ,
मिल गया जब खुदा बंदगी के लिये  !
आप अपने लिए जो न "तनहा" किया ,
आज वो कर दिया अजनबी के लिये  !    

Thursday, 6 December 2012

ग़ज़ल 3 2 ( क्या अजब हादिसा हो गया )

क्या अजब हादिसा हो गया ,
झूठ सच से बड़ा हो गया !
कश्तियां डूबने लग गई ,
नाखुदाओ ये क्या हो गया !
सच था पूछा ,बताया उसे ,
किसलिये फिर खफ़ा हो गया !
साथ रहने की खा कर कसम ,
यार फिर से जुदा हो गया !
राज़ खुलने लगे जब कई ,
ज़ख्म फिर इक नया हो गया !
हाल अपना बतायें किसे ,
जो हुआ , बस हुआ ,हो गया !
देख हैरान "तनहा" हुआ ,
एक पत्थर खुदा हो गया !

ग़ज़ल 9 ( आपके किस्से पुराने हैं बहुत )

आपके किस्से पुराने हैं बहुत ,
सुन रखे ऐसे फसाने हैं बहुत !
बेमुरव्वत तुम अकेले ही नहीं ,
आजकल के दोस्ताने हैं बहुत !
वक़्त को कोई बदल पाया नहीं ,
वक़्त ने बदले ज़माने हैं बहुत !
हो गये दो जिस्म यूं तो एक जां ,
फासले अब भी मिटाने हैं बहुत !
दब गये ज़ख्मों की सौगातों से हम ,
और भी अहसां उठाने हैं बहुत !
मिल न पाये ज़िंदगी के काफ़िये ,
शेर लिख लिख कर मिटाने हैं बहुत !
फिर नहीं शायद कभी मिल पायेंगे  ,
आज "तनहा" पल सुहाने हैं बहुत !
 

Wednesday, 5 December 2012

ग़ज़ल 8 ( पूछते सब ये क्या हो गया )

पूछते सब ये क्या हो गया ,
बोलना तक खता हो गया !
आदमी बन सका जो नहीं ,
कह रहा मैं खुदा हो गया !
अब तो मंदिर ही भगवान से ,
लग रहा कुछ बड़ा हो गया !
भीख लेने लगे लगे आजकल  ,
इन अमीरों को क्या हो गया !
नाज़ जिसकी  वफाओं पे था ,
क्यों वही बेवफा हो गया !
दर-ब-दर को दुआ कौन दे ,
काबिले बद-दुआ हो गया !
कुछ न "तनहा" उन्हें कह सका ,
खुद गुनाहगार-सा हो गया !

ग़ज़ल 1 6 6 ( कश्ती वही साहिल वही तूफाँ वही हैं )

कश्ती वही साहिल वही तूफां वही हैं ,
खुद जा रहे मझधार में नादां वही हैं !
हम आपकी खातिर ज़माना छोड़ आये  ,
दिल में हमारे अब तलक अरमां वही हैं !
कैसे जियें उनके बिना कोई बताओ ,
सांसे वही धड़कन वही दिल जां वही हैं !
सैलाब नफरत का बड़ी मुश्किल रुका था ,
आने लगे फिर से नज़र सामां वही हैं !
हालात क्यों बदले हुए आते नज़र हैं ,
जब रह रहे दुनिया में सब इन्सां वही हैं !
दामन छुड़ा कर दर्द से कुछ चैन पाया ,
फिर आ गये वापस सभी महमां वही हैं !
करने लगे जो इश्क आज़ादी से "तनहा" ,
इस वतन पर होते रहे कुरबां वही हैं !

Tuesday, 4 December 2012

ख्यालों में रह रह के आये जाये कोई ( नज़्म ) 4 3 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

ख्यालों में रह रह के आये जाये कोई ,
तसव्वुर में आ आ के मुस्काये कोई !
सराहूं मैं किस्मत को ,जो पास मेरे ,
कभी खुद से घबरा के आ जाये कोई !
वो भूली सी , बिसरी हुई सी कहानी ,
हमें याद आये , जो दोहराये कोई !
ठहर जाए जैसे समां खुशनुमां सा ,
मेरे पास आ कर ठहर जाये कोई !
किसी गुलसितां में खिलें फूल जैसे ,
खबर हमको ऐसी सुना जाये कोई !

Monday, 3 December 2012

ग़ज़ल 4 4 ( बेवफा हमको कह गये होते )

बेवफ़ा हमको कह गये होते ,
हम ये इल्ज़ाम सह गये होते !
बहते मौजों के साथ पत्थर भी ,
जो न साहिल पे रह गये होते !
ग़म भी हमको सकून दे जाता ,
हंस के उसको जो सह गये होते !
ज़ेब देते किसी के दामन को ,
अश्क जो यूं न बह गये होते !
यूं न हम राह देखते उनकी ,
जो न आने को कह गये होते !
थाम लेते कभी उसे बढ़कर ,
दूर "तनहा" न रह गये होते !