Sunday, 8 July 2012

हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा (ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

      हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा (ग़ज़ल ) 

                       डॉ लोक सेतिया  "तनहा"

हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा ,
दुःख दर्द भरी लहरों में साहिल नहीं समझा।

दुनिया ने दिये  ज़ख्म हज़ार आपने लेकिन ,
घायल नहीं समझा हमें बिसमिल नहीं समझा।

हम उसके मुकाबिल थे मगर जान के उसने ,
महफ़िल में हमें अपने मुकाबिल नहीं समझा।

खेला तो खिलोनों की तरह उसको सभी ने ,
अफ़सोस किसी ने भी उसे दिल नहीं समझा।

हमको है शिकायत कि हमें आँख में तुमने ,
काजल सा बसाने के भी काबिल नहीं समझा।

घायल किया पायल ने तो झूमर ने किया क़त्ल ,
वो कौन है जिसने तुझे कातिल नहीं समझा।

उठवा के रहे "लोक" को तुम दर से जो अपने ,
पागल उसे समझा किये साईल नहीं समझा।   

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