मार्च 08, 2019

POST : 1019 नारी महिमा महिला दिवस पर ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   नारी महिमा महिला दिवस पर ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

     औरत की गाथा शुरू की कहां से जाये मुझ पुरुष को समझ कहां। उसकी महिमा का बखान करना आसान नहीं है। खुद को पहचानती है जो महिला वो कभी अपने आप को पुरुष से कमतर नहीं समझती है। औरत इक ऐसी पहेली है जिसका हल खुद विधाता को भी नहीं मालूम। आज आपको थोड़े शब्दों में संक्षेप में नारी महिमा बताते हैं , और इस में रत्ती भर भी खोट नहीं है कसम खाते हैं। विषय पर आते हैं।

महिला जीना जानती है और जीने का मज़ा हर रंग में लेती भी है।
अपनी सुंदरता पर हर महिला को यकीन होता है और हर नारी खुद अपने आप से बेहद प्यार करती है।

सजना संवरना नाचना झूमना गाना हंसना रोना सिमटना और खुलना सभी उसको आता है।
खुद को छिपाती लगती है मगर वास्तव में दिखलाती होती है , घूंघट की आड़ में चांद जैसे बदली में छुपा हो।

अपनी भावनाओं को व्यक्त करना जानती है , बिना बोले इज़हार इनकार करना जानती है।
हर महिला नज़रों की भाषा समझती है और बुरी नज़र से देखने वालों को पहचान लेती है।
उत्स्व मनाती है और खुशियां अपने घर आंगन में भरती है। ख़ुशी बांटती है ख़ुशी चाहती भी है।
सदियों से पुरुष जगत कुंठित होकर उसको अबला बेबस कहकर छोटा करने का व्यर्थ जतन करता है मगर तब भी नारी दिल से कभी खुद को छोटा नहीं मानती है। विशाल दिल की स्वामिनी है और हीनभावना का शिकार नहीं होती है।

नारी कदम से कदम मिलाकर चलना चाहती है मगर पुरुष उसको पीछे छोड़ने की कोशिश में भागता भागता हार जाता है थककर। महिला कभी हार नहीं मानती न ही विराम लेती है।
पुरष नारी को कैसे समझ सकता है जब उसे खुद अपनी ही पहचान नहीं होती है। नारी से ही पुरुष को असली पहचान मिलती है।

महिला पुरुष को गुलाम नहीं बनाना चाहती कभी भी , उसको अपना साथी हमजोली हमसफ़र हमराज़ बनाना चाहती है। पुरुष खुद महिला की गुलामी करते हैं उसकी उंगलियों के इशारे पर नाचते हैं।

महिला देना जानती है और जितना प्यार आदर मिलता है उस से बढ़कर वापस देती है जाने क्यों पुरुष को पाना आता है देना नहीं। देता है तो एहसान उपकार मानकर कर्तव्य समझ नहीं , महिला सब अर्पण करती है ख़ुशी से मर्ज़ी से कर्तव्य मानकर।

ममता प्यार वात्सल्य देवी की तरह वरदान देने का कार्य महिला कर सकती है। कोमलता मन की है वाणी की है अन्यथा महिला की शक्ति की कोई सीमा नहीं है।

नारी कहते हैं पुरुष बिना अधूरी है जबकि पुरुष का नारी बिन कोई अस्तित्व ही नहीं है। नारी पुरुष को जन्म देती है उसको जीना सिखलाती है उसका जीवन संवारती है।

आओ मिलकर महिला जगत को नमन करते हैं महिला दिवस को मिलकर मनाते हैं। 

 

मार्च 07, 2019

POST : 1018 न्यायालय को न्याय करना चाहिए ( सही हल ) डॉ लोक सेतिया

  न्यायालय को न्याय करना चाहिए ( सही हल ) डॉ लोक सेतिया 

  अदालत ने ठीक कहा अदालत इतिहास की गलती को बदल नहीं सकती है मगर सोचने की बात और समझने की बात ये है कि खुद अदालत कोई गलती नहीं कर सकती है। न्याय करने वाले को न्याय करना है तो किसी भी पक्ष की भावना पर नहीं जाना चाहिए और केवल निष्पक्षता से न्याय करना चाहिए। जब अदालत खुद निर्णय नहीं करना चाहती और समझौता करवाने की बात करती है तब दोनों पक्ष भले सहमत हो जाते हैं न्याय की देवी घायल होती है। ये कोई तलाक का मुकदमा नहीं है है कि अपने किसी घर को बचाने को बच्चों की भलाई को देखते हुए पति पत्नी में समझौता करवाना है और उसके लिए जिस किसी ने जितने भी अत्याचार किये सब की माफ़ी मिलनी है। और अगर इतने महत्वपूर्ण मुकदमें पर यही किया जाना है तो इतना विलंब किस कारण किया गया। अगर भगवान और आस्था का सवाल है तो कौन सा भगवान अपने लिए पक्षपाती और भावना को देख कर किया फैसला मंज़ूर करेगा न कि वास्तविक निर्णय विवेकपूर्ण ढंग से। न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी अंधा होने की निशानी नहीं है बल्कि इस की पहचान है कि अपने पराये दोस्त दुश्मन को बिना देखे न्याय देना है। चलो इन दिनों के ही कुछ निर्णय की बात करते हैं और विचार करते हैं क्या उनका निर्णय देते समय भी भावनाओं की बात को महत्व दिया जाता तो क्या होता। 

करोड़ों लोगों की भावना को देखते तो राम रहीम और आसाराम को जेल नहीं भेजना था। अगर करोड़ों लोगों की भीड़ को देखना है तो किसी भी राजनेता पर घोटाले का मुकदमा नहीं चलाना चाहिए। आपको न्याय करना नहीं अदालत जारी रखनी है आमजन को सज़ा देने को ही नहीं बेगुनाही को भी जुर्म साबित करने को। सब से पहला सवाल न्यायपालिका पर यही है क्या न्याय हासिल करने को भी कीमत देनी पड़ती है उचित है। जाने कितने गरीब अदालत की चौखट नहीं लांघ सकते क्योंकि वकील करने और मुकदमा करने को क्या पेट भरने को पैसा नहीं है। संविधान की व्याख्या करते हैं न्यायधीश किसी दिन न्याय किसको कहते हैं इसकी भी व्याख्या करने का हौंसला कर दिखाए कोई। करोड़ों मुकदमे लटके हुए हैं मगर कुछ ख़ास लोगों को न्याय पल भर में मिलता है ये कैसा विधान है। आपकी अदालतों ने कितने ही दंगे फसाद करवाने वालों को निर्दोष घोषित किया है यदा कदा किसी को सज़ा सुनाई तो वाह वाह होती है और जितनी गलतियां की सब भूल जाती हैं। 

आपको इतिहास नहीं बदलना और न कोई बदल सकता है। किस शासक ने क्या किया कोई गवाही नहीं आपके पास लेकिन खुद आपको इतिहास की भूल को सुधारने की आड़ में ऐसी बड़ी गलती नहीं करनी जो बाद में देश की न्याय व्यवस्था को ही कटघरे में खड़ा कर सवालिया निशान लगाती है। आपको डर लगता है सच को सच बताने में तो साफ कह दें आपके बस की बात नहीं न्याय करना। अपने किसी शायर का वो शेर सुना होगा। 

         इतिहास ने वो मंज़र भी देखा है , लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई। 

राम अगर भगवान हैं तो इनको भी न्याय ही स्वीकार होगा कोई खैरात का समझौता करता फैसला नहीं। अब शायद सभी को अपने नायकों की शिक्षा को याद करना चाहिए। राजा हरीशचंद्र का न्याय भी इक मिसाल रहा है और खुद राम का न्याय भी जो पत्नी का निर्दोष होने पर भी त्याग करते हैं ताकि आम नागरिक का भरोसा कायम रहे न्याय की निष्पक्षता पर। आपकी अदालत क्या आज सीता को न्याय देने की बात करना चाहती है। इन उलझनों में राजनीति जनता को उलझाना जानती है मगर आपको न्याय की कुर्सी केवल न्याय करने की शपथ लेकर मिलती है उस शपथ को और देश की न्यायपालिका की साख को कायम रखना है। जिस न्यायधीश ने इंदिरा गांधी को पद पर रहते अदालत आने पर विवश किया और अभी जिस ने राम रहीम को सज़ा सुनाई उन्हीं से कुछ सीख लेनी अच्छी बात है। 

 



फ़रवरी 18, 2019

POST : 1017 बिक रहा है आतंकवाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        बिक रहा है आतंकवाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

 आजकल आतंकवाद का मौसम है । अख़बार टीवी चैनल से सोशल मीडिया तक सब जगह आतंकवाद की धूम मची हुई है । कभी अमेरिका और लादेन को लेकर अफ़ग़ानिस्तान पर हमले की बात होती थी आजकल कितने नाम सामने आते जाते रहते हैं पलक झपकते ही कहीं गुम भी हो जाते हैं । विश्व में शांति की बात करने वाले तमाम देश हथियारों के सौदागर भी हैं उनकी अर्थव्यवस्था निर्भर है जंग पर । उन से हथियार कोई भी खरीदे उनको सामान बेचना है और मौत का सामान सस्ता महंगा नहीं देखा जाता जिनको मौत का खेल खेलना है हर मोल देने को तैयार हैं । टीवी अख़बार वाले नई स्टोरी नया शीर्षक ढूंढते रहते हैं हम हादसे की जगह से सीधा दिखा रहे हैं सबसे पहले और सच्ची तस्वीरें । पर्दे के पीछे इस सब की भी कीमत ली जाती है चुकाई जाती है । हम शोर मचाते रहते हैं आतंकवाद पीड़ित हैं सभी देश हमारे साथ खड़े हो जाओ मगर हर देश को हर घटना अपनी सुविधा से आतंकवादी लगती है अथवा कुछ और लगती है । राजनेताओं को आतंकवादी घटना खुद को देशभक्त बताने का अवसर लगती है ।
 
         कोई घर पर पत्नी के आतंकवाद की बात करता है तो कोई लिखने वाला इस विषय पर दो अलग अलग लेख लिखता है और दो जगह भेजता है दोनों जगह छपती है रचना और मानदेय मिलता है । लिखने वालों को हर बात विषय नज़र आती है और टीवी चैनल पर कई लोग विशेषज्ञ बनकर चर्चा करते हैं तभी उनका गुज़र बसर होता है । स्कूल का संचालक बच्चों की उदंडता से परेशान है अध्यापक से अनुशासन की बात कहता है , अध्यापक बच्चों की मां से शिकायत करते हैं आपका बच्चा पढ़ाई पर नहीं लड़ाई पर ध्यान देता है । पत्नी अपने पति से गिला करती है अपने बिगाड़ा हुआ है बच्चों को , तंग आ चुकी हूं इनकी शरारतों से । कब किस ने क्या तोड़ फोड़ दिया पता नहीं चलता है , पिता बच्चों को धमकाते हैं सुधर जाओ वर्ना अध्यापक से शिकायत कर देंगे । सुनकर बच्चे मन ही मन मुस्कुराते हैं आतंक की बात हास्य की सिथ्ति बन गई है । देश में भी सरकार विपक्ष बाकी लोग गेंद दूसरे के पाले में डालते हैं सरकार पड़ोसी देश पर आरोप लगाती है । खुद अपनी गलती किसी को समझ नहीं आती है । मामला समझ से परे है दो गायक एक सुर में गा रहे हैं , बात रोने की लगे फिर भी हंसा जाता है , यूं भी हालात से समझौता किया जाता है ।
 
             अब उनकी याद बाकी है कभी व्यंग्य में सबसे बड़ा नाम था उनका । पत्नी पर व्यंग्य लिख लिख कर खूब पैसा कमाया था उन्होंने । ओसामा बिन लादेन पर लिखते हुए अपने घर पर बंब डालने का न्यौता तक देने की बात की थी अपनी पत्नी को सबसे खतरनाक आंतकवादी कह डाला था । पत्नी पर हास परिहास चुटकुले पहले भी कम नहीं थे मगर ये तो हद पार करना हो गया था । मामला हत्या का और धारा 307 का बनता था कत्ल की योजना खुद बनाते हैं और कविता में किसी महबूबा की कातिल अदा की बात कर तालियां बटोरते हैं । व्यंग्यकार की पत्नी होना कितना दुश्वार है कोई मेरी पत्नी से पूछे कभी , मगर हाय री नारी अपने पति की इस खराबी की बात नहीं करती जबकि थाने में रपट लिखवाना बनता है महिला को मानसिक परेशानी देना अपराध है । कब तक अबला की सहनशीलता का इम्तिहान लिया जाता रहेगा , वास्तव में पत्नी का आतंक होता तो क्या भरी सभा में ये बार बार कहने का साहस करते । ऐसे लिखने वाले उन पतियों के दर्द से वाक़िफ़ नहीं हैं जो पत्नी की तानशाही की बात ज़ुबान पर लाने का सपना भी नहीं देख सकते । ऐसे व्यंग्य पढ़कर उनके ज़ख्म फिर से हरे हो जाते हैं । ज़ख्मों पर नमक छिड़कना व्यंग्य वालों को खूब आता है । दर्द में हास्य ऐसे ही नहीं पैदा होता है । अमेरिका बाकी देशों में आतंकी खेल खेलता रहा था , इसकी शुरुआत उसी की की हुई है जब खुद उसी के सीने में दर्द उठा तब कराह उठा और आजकल सभी देश उसी से मसीहाई की गुहार लगाते हैं । तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना ।
 
          आंतकवाद के सामने घुटने टेकने का काम किस ने नहीं किया और कौन है जिसने मानवता के कातिलों से बात करने और समझौता करने की वकालत नहीं की । बीच का कोई रास्ता सही नहीं होता है आतंकवाद को नामंज़ूर करना है तो उसके रंग की बात नहीं की जानी चाहिए । जिनकी राजनीति ही उन्माद फैला कर विध्वंस कर वोट पाने की रही हो उनको आतंकवाद भी देशभक्त होने का सबूत देकर सत्ता पाने की सीढ़ी लगता हो तो अचरज नहीं है । कोई संगठन भीड़ बनकर दंगे करता है तो क्या उस आतंक को अच्छा वाला आतंकवाद मान सकते हैं अपने अपने गिरेबान में झांकना होगा । नेताओं का भी आतंक है जो लोग सच बोलने से डरते हैं सत्ता और सरकारी विभाग खुद जो मर्ज़ी करते हैं मगर आम नागरिक पर नियम कानून का डंडा चलाते हैं आतंक पैदा कर रिश्वत या जुर्माना वसूल करने को उचित मानते हैं । ध्यान से देखना कोई बॉस अपने कर्मचारी के साथ मनचाहा काम लेने और उसकी महनत से कमाई करने के बाद भी नौकरी से निकालने का भय देकर मानसिक डर किसी आतंकी से बढ़कर देता है । आतंकवाद के चेहरे कई हैं जिन पर विस्तार से बात फिर कभी की जाएगी । 
 
  आतंकवाद पर क्या नहीं हो सकता है , आजकल टीवी चैनल ऐमीनेशन फिल्मों का उपयोग कर दर्शकों को भड़काने उकसाने को बहस का आयोजन कर आतंकवाद को मनोरंजन का साधन समझ बेच कर खूब पैसा बना रहे हैं । सत्ता की राजनीति का शांति और ख़ुशहाली से कोई मकसद पूरा नहीं होता राजनीति का काम ही बांटना भेदभाव बढ़ाकर जनता को उलझाना है । सरकार और सरकारी विभाग साधारण नागरिक के लिए भय और आतंक का प्रतीक हैं , गब्बर सिंह की तरह वसूली अपने आप चंदा समझ देना शर्त है बचने की अन्यथा सरकारी चाबुक हमेशा तैयार है । आतंकवाद का कोई चेहरा नहीं होता फिर भी राजनेता उसको कोई शक़्ल देकर अपनी राजनीति चमकाते हैं । आतंकवाद के जनक से मिलते हैं हाथ मिलाते हैं ज़ोर शोर से भाषण में उसको ख़ाक़ में मिलाने की शपथ उठाते हैं ।  आतंकवाद कुछ नहीं है सरकारों ने मिलकर इक जाल बिछाया है ये सभी कुछ लोगों की माया है जिन्होंने पाखंड को इक औज़ार बनाकर हम सभी को आपस में लड़वाया है । सत्ता उसकी जननी है आतंकवाद उसका जाया है उसी ने पाला पोसा है बढ़ाया है ।

हमें 'आपके आतंकवादी' और 'मेरे आतंकवादी' के युग में नहीं लौटना चाहिए: UN में  भारत ने दिया सख्त संदेश | Jansatta

फ़रवरी 17, 2019

POST : 1016 कहां से कहां पहुंचे खोया क्या पाया क्या ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

कहां से कहां पहुंचे खोया क्या पाया क्या ( आलेख )  डॉ लोक सेतिया

    बस अब आतंकवाद को खत्म करने का वक़त आ गया है , ये ब्यान उस समय का है जब संसद पर आतंकी हमला हुआ था। तब समझ आया था तब तक आतंकवाद को खत्म करने का समय ही नहीं आया था। अपने घर को आग लगी तब समझ आया वर्ना देश जलता रहा शासक बंसी बजाते रहे। अमेरिका भी 11 सितंबर से पहले आतंकवाद को हथियार बेचने का कारोबार समझता रहा था। हमारे नेता हर समस्या पर उचित समय पर कदम उठाने की बात करते हैं। गरीबी भूख बदहाली खराब शिक्षा और स्वास्थ्य दवाओं को ठीक करने का वक़्त कभी नहीं आने वाला है क्योंकि राजनीति करने को इनकी बहुत ज़रूरत है। आतंकवाद पर कहते हैं पड़ोसी देश बढ़ावा देता है और सीमा पार से आतंकी आते हैं मगर क्या हमने आतंकवाद को अपने घर महमान बनाने की बात नहीं की है। अज़हर मसूद जैसे आतंकवादी को खुद कंधार ले जाकर रिहा करने का फल था संसद पर हमला। आज बात का विषय केवल आतंकवाद नहीं है और न ही किसी भी दल की सरकार की ही बात है बात देश के हर वर्ग की है केवल राजनेताओं की ही नहीं है आम नागरिक से कारोबार करने वाले नौकरशाही और उद्योग जगत के साथ टीवी अख़बार और समाज को दर्पण दिखाने वाले बुद्धीजीवी वर्ग की भी है। ये बेहद ज़रूरी है कि आज चिंतन और मनन ही नहीं किया जाये कि हमने आज़ादी के बाद क्या खोया क्या पाया है बल्कि अपनी गलतियों को स्वीकार कर उनको सुधारना भी होगा। अपनी महानता का डंका पीटना छोड़ खुद को सक्षम बनाना होगा और ऐसा आंखें बंद कर नहीं किया जा सकता है। 
 
       जिस देश की महिमा का गुणगान किया जाता है वो ऐसा तो नहीं था। झूठ मक्कारी बेईमानी ख़ुदपरस्ती और कर्तव्य पालन की नहीं अधिकारों और ताकत सत्ता धनबल के दुरूपयोग की खराब आदतों ने देश की जड़ों में दीमक की तरह खोखला करने का काम किया है सारी व्यवस्था को ही। देशभक्ति और साहस केवल भाषण देने बोलने और लिखने का नाम नहीं है। हम अन्याय अत्याचार के सामने घुटने टेकने के आदी होकर किसी भी तरह से मतलब पूरा करने में विश्वास रखते हैं। आतंकवाद हिंसा कोई भी किसी भी कारण करता है उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए। पूर्वोतर की बात हो या पंजाब में हुए आतंकवादी हमले उनका कोई धर्म नहीं होता है मगर खेद की बात है आज भी कोई भिंडरावाले को संत बताता है तो किसी ने गोडसे का मंदिर बना रखा है। ये दोगलापन आतंकवाद को बढ़ावा देता है। हर सरकार दोषी है जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं देकर केवल सत्ता की राजनीति करते रहे हैं। बेशर्मी है कि देश की आधी आबादी को दो वक़्त रोटी नसीब नहीं और राजनेता और अधिकारी राजाओं की तरह विसालिता पूर्वक जीवन जीते हैं और अपने खुद के ऐशो आराम पर ही नहीं अपने झूठे गुणगान करने पर बेतहाशा धन खर्च करते हैं। जिस आज़ादी की बात भगतसिंह गांधी सुभाष ने सोची थी वो कहां है। हमने अपने पूर्वजों से अंगेरजी शासन की निर्दयता की बात सुनी है तो उनकी देश के धन को ईमानदारी से खर्च करने की भी मिसाल देखी है क्योंकि उनकी बनाई हुई इमारत पुल अवधि बीत जाने के बाद भी कायम रहे हैं जबकि हमारे नेताओं के अपने खास लोगों को ठेके देने की बात आम है जिस में घटिया सामान और अन्य कारणों से हादसे हुए हैं। जिस भी दल की सरकार जिस भी राज्य में रहती है उसके लोग लूट को अपना अधिकार मानते हैं। इतना ही नहीं बड़े बड़े नेता अधिकारी वर्ग को अपने दल के लोगों की बात नहीं मानने पर अंजाम भुगतने की बात तक कहते हैं। 
 
         हमारी पुलिस हमारे सभी विभाग के अधिकारी कर्मचारी अगर अपना कर्तव्य निष्ठा से और देश के लिए ईमानदार होकर निभाते तो शायद हालत बहुत हद तक अच्छी हो चुकी होती। मगर उनके लालच और स्वार्थ के साथ नेताओं की चाटुकारिता ने देश की दशा को बदहाली तक ला खड़ा किया है। हम आम लोग भी नियम कानून को तोड़ने में संकोच नहीं करते हैं मगर अपने देश के संविधान की उपेक्षा करने के बाद भी नेता अधिकारी और आम नागरिक खुद को देशभक्त कहते हैं। उद्योग जगत ने केवल अपने मुनाफे कमाने को उद्देश्य बना लिया है और तमाम करोड़पति लोग देश की खातिर कोई योगदान नहीं देते हैं अन्यथा हमारे देश की परंपरा रही है समाज कल्याण पर अपनी आमदनी खर्च करने की खुद अपने पर केवल ज़रूरत भर को खर्च करने की। धर्म के नाम पर भी संचय करने का कार्य किया है हर किसी ने और ये कहना अनुचित नहीं होगा कि सभी धर्म साधु संत वास्तविक उद्देश्य से धर्म के मार्ग से भटक गये हैं। कलाकार टीवी फिल्म वाले देश को जनता को जगाने और संदेश देने की जगह पैसा बनाने को टीआरपी और विज्ञापन जाल में उलझे रसातल को जाते जा रहे हैं। नारे लगाना जुलूस निकलना गीत गाना झंडा फहराना देशभक्ति क्या यही है या हम सभी को अपना सर्वस्व देश को अर्पित करने की वास्तविक देशभक्ति की ज़रूरत है। जिस दिन हम देश को बाकी सबसे अधिक महत्व देंगे और अपने पास और अधिक की लालसा को छोड़ सभी को समानता की बात का विचार करने लगेंगे शायद देश को सारे जहां से अच्छा बनाने की ओर उस दिन चलने लगेंगे। 
 
             हम जिनको आदर देते हैं और जिनकी कही बात को आंखें बंद कर यकीन करते हैं उनकी बात सच साबित नहीं होने पर भी हम नहीं समझते कि उनकी कथनी और करनी अलग अलग है। किसी को याद है कभी किसी ने देश के सबसे बड़े पद पर होते इक सपना दिखलाया था कलाम जी ने 2020 में भारत से गरीबी भूख जैसी समस्याओं का अंत होने और हर नागरिक खुशहाल होगा ऐसी योजना पर काम करने का दावा किया गया था। अगले साल 2020 आने को है मगर देश की समस्याएं कम नहीं हुई बढ़ती गई हैं। देश के बड़े पद के नेताओं का काम झूठी तसल्ली देना और झूठे ख़्वाब दिखलाना नहीं होना चाहिए। और जब कोई ऐसा कहता है तो हम को उनसे सवाल करना चाहिए कि कैसे होगा और अगर नहीं हुआ तो किसकी ज़िम्मेदारी होगी। ये कहना कि गरीबी हटाओ अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे केवल जुमले थे और वोट पाने को ऐसा              हम जिनको आदर देते हैं और जिनकी कही बात को आंखें बंद कर यकीन करते हैं उनकी बात सच साबित नहीं होने पर भी हम नहीं समझते कि उनकी कथनी और करनी अलग अलग है। किसी को याद है कभी किसी ने देश के सबसे बड़े पद पर होते इक सपना दिखलाया था कलाम जी ने 2020 में भारत से गरीबी भूख जैसी समस्याओं का अंत होने और हर नागरिक खुशहाल होगा ऐसी योजना पर काम करने का दावा किया गया था। अगले साल 2020 आने को है मगर देश की समस्याएं कम नहीं हुई बढ़ती गई हैं। देश के बड़े पद के नेताओं का काम झूठी तसल्ली देना और झूठे ख़्वाब दिखलाना नहीं होना चाहिए। और जब कोई ऐसा कहता है तो हम को उनसे सवाल करना चाहिए कि कैसे होगा और अगर नहीं हुआ तो किसकी ज़िम्मेदारी होगी। ये कहना कि गरीबी हटाओ अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे केवल जुमले थे और वोट पाने को ऐसा करना पड़ता है तो देश की जनता से छल करना है। जिस देश के राजनेताओं को चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा मकसद लगता हो उस देश का भगवान भी कुछ नहीं कर सकते हैं। विचारधारा नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर हमने खोया जो सब है वो बेहद कीमती था और जिसको पाने की बात करते हैं उसकी अहमियत कुछ भी नहीं मगर वास्तव में उसको भी पाया कुछ मुट्ठी भर लोगों ने है। चंद घरानों पर धन की बारिश और अधिकतर के हिस्से कुछ भी नहीं ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए थी। जिस समाजवाद की बात थी उसको कभी का छोड़ पूंजीवादी व्यवस्था अपनाने का अंजाम यही होना ही था। करना पड़ता है तो देश की जनता से छल करना है। जिस देश के राजनेताओं को चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा मकसद लगता हो उस देश का भगवान भी कुछ नहीं कर सकते हैं। विचारधारा नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर हमने खोया जो सब है वो बेहद कीमती था और जिसको पाने की बात करते हैं उसकी अहमियत कुछ भी नहीं मगर वास्तव में उसको भी पाया कुछ मुट्ठी भर लोगों ने है। चंद घरानों पर धन की बारिश और अधिकतर के हिस्से कुछ भी नहीं ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए थी। जिस समाजवाद की बात थी उसको कभी का छोड़ पूंजीवादी व्यवस्था अपनाने का अंजाम यही होना ही था। 

 

फ़रवरी 11, 2019

POST : 1015 फ़साना-ए-मुहब्बत ताराना-ए-मुहब्बत ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

  फ़साना-ए-मुहब्बत ताराना-ए-मुहब्बत ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया 

       हम जिसे प्यार समझते हैं वो कोई सपनों की दुनिया है। कोई हसीना खूबसूरत अदा दिलकश सितारों की रंगीनियां कोई लड़का जो बस प्यार की बातें करता हो चांद तारे लाने के ख्वाब बुनता हो और जिसका साथ आप किसी और दुनिया में चले जाना चाहते हो जहां बस दो प्यार करने वाले हों और कोई रोकने टोकने वाला नहीं हो। मुहब्बत की इस दुनिया में भूख गरीबी और जीवन की वास्तविक उलझनों कठिनाईओं समस्याओं की कोई जगह नहीं है। महबूबा तेरी तस्वीर किस तरह मैं बनाऊं ऐसी ही एक फिल्म का गीत है , फ़िल्मी कहानी में लेखक कोई न कोई रास्ता नकाल लेता है अपने नायक को उसके सपनों की रानी से मुलाकात का। हम सब के साथ ऐसा होना संभव नहीं है और हम अपने महबूब महबूबा की छवि किसी फ़िल्मी अदाकार अदाकारा या कहानी के किरदार में ढूंढते हैं। ये इश्क़ असली ज़िंदगी में कायम रहता नहीं है क्योंकि कोई भी आपसे पल दो पल को मिलता है तब सब से सुंदर पहनावा खूबसूरत बातें और किसी मनपसंद जगह मुलाकात में सब लुभावना होता है लेकिन जिस के साथ जीवन भर साथ निभाना होता है उस के साथ तकरार भी इनकार भी और वो सब जो सपना नहीं हक़ीक़त होता है देख लगता है ख्वाब टूटता हुआ। जो लोग जिस्म की खूबसूरती को देख कर नहीं इक दूजे की शख्सियत को समझ और स्वीकार करने के बाद रिश्ता बनाते हैं उनके संबंध में कोई दरार कोई दिवार कोई उलझन कोई अड़चन नहीं होती है। मगर अधिकतर लोग आकर्षण को प्यार मान उसके मिलने नहीं मिलने पर भाव बदलते हैं जो सच्चा प्यार होता नहीं है। 
 
               ये प्यार इश्क़ मुहब्बत के फ़साने नये पुराने दिल लुभाते हैं मगर इस नामुराद रोग का ईजाल क्या अभी तक रोग है कि बला है कोई नहीं समझ पाया है। अपने अपने अनुभव से लोग बातें करते हैं कभी कहते हुए डरते हैं कभी बात से मुकरते हैं। झूठे आशिक़ साथ जीने मरने का दम भरते हैं जब बात बिगड़ती है तो बच कर गुज़रते हैं। कहानी से पहले कुछ गीत कुछ ग़ज़ल कुछ नग्मों पर गौर करते हैं। शुरुआत धूल का फूल से करते हैं। वफ़ा की राह में कितने गुनाह होते हैं , ये उनसे पूछो जो तबाह होते हैं। ए मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया , जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया। जो मैं ऐसा जानती प्रीत किये दुःख होय , नगर ढिंढोरा पीटती प्रीत ना कारिओ कोय। ज़माने में अजी ऐसे कई नादान होते हैं , वहां ले जाते हैं कश्ती जहां तूफ़ान होते हैं। बहुत हैं पर आखिर में मुगल-ए -आज़म की ग़ज़ल। मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये , बड़ी चोट खाई जवानी पे रोये। ये सब को पता होता है मगर जानकर अन्जान बन जाते हैं मुझे अपनी इक ग़ज़ल का मतला याद आया है यहां सही लगता है उस को सुनाता हूं फिर कहानी पर आता हूं। 

           हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना , कोई कभी हिदायत ये आज तक न माना। 

    मुझे सख्त ऐतराज़ है कोई किसी को बेवफ़ा कहकर बदनाम करता है और खुद को उसी का चाहने वाला बताता है। जिसको प्यार करते हो उसकी रुसवाई कैसे कर सकते हो और किसी को बदनाम करते हो तो फिर आपका प्यार कितना मतलबी है। मुझे इक गीत सुनकर लगता है कोई किसी को उस से बढ़कर बद्द्दुआ नहीं दे सकता है मगर दिलजले आशिक़ यही किया करते हैं ज़रा सुनो क्या क्या नहीं कहा आशिक़ ने। 

मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे , मुझे ग़म देने वाले तू ख़ुशी को तरसे। 

तू फूल बने पतझड़ का तुझपे बहार न आये कभी , मेरी ही तरह तू तड़पे तुझको करार न आये कभी। 

जिए तू इस तरह कि ज़िंदगी को तरसे। 

तेरे गुलशन से ज़्यादा वीरान कोई वीराना न हो , इस दुनिया में कोई तेरा अपना तो क्या बेगाना न हो। 

किसी का प्यार क्या तू बेरुखी को तरसे। 

इतना तो असर कर जाएं मेरी वफ़ाएं ओ बेवफ़ा , इक दिन तुझे याद आएं तेरी ज़फाएं ओ बेवफ़ा। 

पशेमां हो के रोये तू हंसी को तरसे। 

              जिस प्यार में ये हाल हो उस प्यार से तौबा। आजकल प्यार का बाज़ार सुनते हैं करोड़ों का है आप भी उनके जाल में अपना सब कुछ लुटवा दें उस से पहले कुछ वास्तविक कहानियों को एक बार ध्यान से समझ लोगे तो बच सकते हैं। गुलाब दे दिया चॉकलेट भी मगर अभी समय है और बात बढ़ाने से पहले जाने माने आशिक़ों की असलियत जान सकते हैं। साहिर लुधियानवी जी की नज़्म ताजमहल बहुत काम की है। कोई किसी को अच्छा लगता है मिलते हैं इक दूजे को समझते हैं मगर अगर किसी मोड़ पर किसी को लगता है साथ निभाना मुश्किल है तो हाथ छोड़ कर जा सकते हैं , साहिर कहते हैं तुम्हारे हाथ में मेरा हाथ है जंज़ीर नहीं। आपको साहिर से मुहब्बत की अमृता की कहानी के साथ इमरोज़ की भी कहानी मालूम होगी , मगर कोई भी किसी को बेवफा नहीं कहता है। समझ आये तो कोई किसी को पसंद करता है मगर जिसको पसंद करता है जब उसी को साथ चलना नहीं पसंद तो उसको मज़बूर नहीं किया जाना चाहिए , प्यार कोई कैद नहीं है और अपने आशिक़ को महबूबा को आज़ादी नहीं देना तो हर्गिज़ प्यार नहीं है। चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों। अभिनेता राजकपूर की कितनी कहानियां हैं नरगिस की ही नहीं मगर नरगिस ने अपनी जान बचाने वाले सुनील दत्त से विवाह किया तो आपको सच्चा इश्क़ समझ नहीं आया। जो बिना किसी संबंध अनुबंध आपकी जान बचाने को आग में कूद कर आपको बचाता है उस से अच्छा कोई और नहीं हो सकता है। धर्मेंदर हेमा की काहनी में किरदार और भी हैं धर्मेंदर की काहनी में उनकी पत्नी के इलावा मीना कुमारी भी रही जिसको सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया और हेमा मालिनी की बात किसी और से सगाई होते होते रह गई। प्यार एक से होता है की परिभाषा बदलनी होगी , खुशवंत सिंह को आशिक़ मिजाज़ कहते हैं जिसने वास्तव में मुहब्बत को कभी समझा भी नहीं। जिन महिलाओं से रिश्ता बनाया उनकी निजि बातों को गॉसिप का विषय बना दिया। कोई नहीं जनता अमिताभ बच्चन के दिल की बात रेखा के मन की बात मगर उनके फ़िल्मी किरदार को किस्सा बना दिया है सोशल मीडिया वालों ने और फ़िल्मी जगत ऐसी बातों को भुनाता है बेचता है पैसा बनाता है। सिलसिला फिल्म बन जाती है यहां कोई सामाजिक बंधन की बात नहीं है कोई विवाहित है या कुंवारा है और कितने लोगों से नाता रखता है कोई सवाल नहीं उठाता है। आजकल टीवी चैनल पर किसी रियल्टी शो में जाने पर हर कोई मंच पर किसी से इश्क़ मुहब्बत की बात करता है तब हम देखते हैं हंसते हैं मगर कोई खराबी नहीं लगती है। टीवी शो पर महिला लड़की नारी को लेकर एक ही नज़रिया दिखाई देता है बाकी कोई रिश्ता महत्व नहीं रखता है , लेकिन हम वही लोग अपने समाज में किसी लड़की लड़के को महिला पुरुष को बात करते देखते हैं तो हंगामा खड़ा कर देते हैं। रंग बदलती हमारी दुनिया का असली चेहरा बेहद भयानक है और शायद महिलाओं के असुरक्षित भी। अवसर मिलते मुहब्बत की पावनता हवस में बदल जाती है तभी हम उसी पक्ष को देखते हैं जो डरावना है। 
 
                             इश्क़ करना है तो खुदा से वतन से करो और टूटकर करो जो सबसे ऊपर है। कितने लोग हुए हैं देश की आज़ादी की खातिर जीते रहे हंसते हंसते सूली चढ़ गये। दुनिया की बात की सच्चाई है कोई किसी के साथ नहीं मरता है , मन रे तू काहे न धीर धरे। कोई न संग मरे। जिस के साथ जितना साथ निभ जाए उसी को अच्छा जान लेना उचित है। कल तक जिसकी मुहब्बत की कसम खाई आज बात बिगड़ी तो उसी में बुराई नज़र आने लगी। मेरे दोस्त जवाहर ज़मीर का शेर है। वो जब पहलू में थे तो था मुहब्बत का यकीन , गैर से की गुफ्तगू तो बदगुमानी बन गई। जिस पर आपको भरोसा नहीं जिसको आप उसकी मर्ज़ी से जीने नहीं देना चाहते उस से आपका प्यार झूठा है सच्चा नहीं। किसी और शायर का कहना है " प्यार में बहुत ज़रूरी है बेवफ़ाई कभी कभी कर ली "।  इक बात हर कोई कहता है मगर वास्तव में उस में सच्चाई बिल्कुल भी नहीं है वो है दिल से प्यार का रिश्ता। किसी मनोचिकित्स्क से पूछना इश्क़ प्यार मुहब्बत जैसा खलल दिमाग़ की शरारत है दिल बेचारा बेवजह बदनाम है। दिल किसी पर आना दिल लेना देना सभी बनी बनाई बातें हैं किसी का दिल किसी के पास नहीं होता है। ये इक ज़िद है कोई किसी को पसंद हो तो चाहना भी और चाहते हैं तो उसको अपना बनाना भी। जिसको जो पसंद किया उसका  मिल जाना ज़रूरी तो नहीं है। और जब कोई ये सोचता है कि मेरी नहीं तो किसी की नहीं हो ये तो प्यार भी तानाशाही हो गया। जिसको कोई पसंद उसकी मर्ज़ी भी होनी चाहिए। लोग मिलते हैं शुरुआत में जितनी कशिश होती है कुछ दिन बाद नहीं रहती बाकी। इधर तो सोशल मीडिया ने मामला आसान भी किया है और उलझाया भी है बहुत। सोशल मीडिया पर जैसे नज़र आते हैं और जैसी बातें करते हैं जिस दिन आमने सामने मिलते हैं तो लगता है आकाश से ज़मीन पर पहुंच गये हैं। इधर तो संबंध टूटने पर भी पार्टी करने लगे हैं इक फिल्म बना डाली इसी पर। कितनी बार प्यार हुआ कितनी बार किस ने किस को छोड़ा समझना आसान नहीं। कैसे कह दूं कि मुझे छोड़ दिया है उसने , बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की। मुहब्बत की बात की जाती है तो मानते हैं सुंदरता से ही प्यार किया जा सकता है मगर बात ये भी मशहूर है कि खूबसूरत है वफ़ादार नहीं हो सकता। मेरी इक ग़ज़ल का मतला कुछ इस तरह है।

               सभी को हुस्न से होती मुहब्बत है , हसीं कितनी हसीनों की शिकायत है। 

        निराश मत होना सच्चा प्यार अभी भी करते हैं जो उनकी बात बताना बाकी है। राजनेताओं का कुर्सी से सत्ता से प्यार वास्तव में कभी नहीं खत्म होता। जान रहती है बिना सत्ता मगर उसी तरह जैसे बिन जल मछली। इनसे अधिक कोई किसी को नहीं चाहता सत्ता पाने को भाई दोस्त सब को छोड़ सकते है , जो भी करना पड़े कर सकते हैं। राजनेताओं का आपसी रिश्ता बनता बिगड़ता है सत्ता की चाहत और ज़रूरत के अनुसार। सत्ता पाने को गधे को बाप बाप को गधा कहना कोई मुश्किल काम नहीं है। इस का खुमार जब चढ़ता है सत्ता पाकर तो इंसान खुद को भगवान से बड़ा समझने लगता है। जब कोई राजनेता आपको वेलेनटाइन डे पर रोके तो उस से पूछना सत्तारानी से अलग होकर कैसा लगेगा।  इक और बात कही जाती है जीने का मतलब है मरने से पहले किसी से इश्क़ कर लेना। मेरा आपको सुझाव है कि अपने दिमाग़ से काम लेना और दुनिया की बातों में आकर कोई मुसीबत नहीं खरीदना। फिर भी वैलेंटाइन डे पर इक शेर कहना लाज़मी है। 

                              अभी तो प्यार का मौसम है और रुत सुहानी है ,

                              कभी किसी हसीना को गुलाब क्यों नहीं देते । 


 

                                

 


फ़रवरी 09, 2019

POST : 1014 महानायक के किरदार का अभिनय ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   महानायक के किरदार का अभिनय ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    पता नहीं हम लोग ही आंखे खुली होते हुए भी देखते रहे फिर भी नहीं समझे। शुरुआत से ही वह अभिनय ही करते रहे हैं। साल पहले ही नकली लालकिला बनवा भाषण देने का कार्य उसी आने वाली फिल्म का हिस्सा था , जैसे कैमरे के सामने आने से पहले रिहसल करते हैं अदाकार लोग। नेता जी का सपना सच हुआ मगर समस्या बनी रही कि उनको चार साल तक सपना ही लगता रहा और किसी महानायक के किरदार का अभिनय करने से उनको फुर्सत नहीं मिली। जब पता चला फिल्म बनकर पूरी होने के बाद असली इम्तिहान दर्शक पसंद करते हैं या नहीं बाद में मालूम होता है की ही तरह आपका अभिनय सज धज जनता को कितना मोह पाई और क्या कोई करिश्मा आपके अभिनय आपके तौर तरीके ढंग और बोले गये डॉयलॉग दिखा पाए सामने आता है ठीक उसी तरह आपने देश जनता को क्या दिया भविष्य के चुनाव में दिखाई देता है। नेताजी को भरोसा है सब कुछ उनकी लिखवाई पटकथा के अनुसार हुआ है और उनका किरदार हिट होना ही चाहिए। मगर यहां अमिताभ बच्चन सलमान शारुख आमिर सब के दिल की धड़कन बढ़ जाती है कितने अनुभव के बाद भी फिर आपकी तो पहली असली फिल्म है बेशक आपने किसी पुरानी शोले जैसी सुपरहिट फिल्म का रीमेक चोरी से बना लिया है थोड़ा इधर थोड़ा उधर से मसाला जोड़कर चटनी बनाई है मगर अभी बाज़ार में स्वाद का इम्तिहान होना बाकी है और आजकल बच्चे भी जाने किस को पसंद करते हैं किसको नहीं पता नहीं चलता है। 
 
                 रामायण महाभारत में शानदार अभिनय करने वाले लोगों को उस समय वास्तविक राम सीता कृष्ण अर्जुन मानकर आरती उतारते थे मगर आजकल उनकी हालत मत पूछो पछताते हैं अपनी हैसियत से बड़ा किरदार निभा कर। तीन घंटे की फिल्म और घंटे आधे घंटे रोज़ाना का सीरियल के हज़ार एपिसोड देखना अलग अनुभव है मगर चार साल तक लगातार किसी को सामने देखना बिल्कुल अलग बात है। अभिनय करने वाला भूल जाता है पिछले बोले डॉयलॉग मगर सुनने देखने वाले उनको दोहराते रहते हैं और जिस पल बात उल्टी तरफ की नज़र आती है मोहभंग होते देर नहीं लगती। अपने हर दिन इतने रंग बदले हैं कि तस्वीर सतरंगी नहीं बनी बदरंगी बनती लगती है। आपने परिधान और छवि पर इतना ध्यान दिया कि आपको ये भी समझना ज़रूरी नहीं लगा कि जिस तरह का किरदार निभाना था उस को ये सब जंचता नहीं है। तैनू सूट सूट करदा सुना है वो पंजाबन की बात है जो साड़ी पहनती हैं उनकी अपनी बात होती है और मुंबई में चोली का चलन बदलता है तो दिल्ली में फैशन पल पल बदलता है। गंगा जमुना में नायक बोली भी खड़ी बोलता है और पहनावा भी धोती कमीज़ और लहज़ा भी देसी तब जानदार अभिनय से शानदार शाहकार बनता है। 
 
         अब जब तीन चैथाई फिल्म बन चुकी है और चार साल तक किरदार निभाया जा चुका है आखिरी सीन की शूटिंग बची है तब कहानी को बदलना कठिन है। अंत आपकी मर्ज़ी का बना सकते हैं मगर कोई नहीं जनता कि नतीजा क्या होगा। दर्शक चैंक सकते हैं या आपको हैरान कर सकते हैं , शायद आपको फिल्मों का अधिक पता नहीं हो यहां बेहतरीन कहानी और निर्देशन से बनी फिल्म नहीं चलती तो कभी लचर किस्म की बनाई फिल्म भी चल जाती है। जनता का मिजाज़ और दर्शकों का कोई भरोसा नहीं है। इक बात तय है कि फिल्म के कुछ समय बाद लोग फ़िल्मी किरदार को याद रखते हैं मगर अभिनय करने वाले का कोई पता नहीं होता उसका क्या हुआ। समझदार को इशारा काफी है बाकी बची कहानी को सही अंजाम तक पहुंचाना होगा। जाते जाते मेरा इक ग़ज़ल का मतला हाज़िर है। 

                                सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे 

                                 हम ज़िंदगी को ज़िंदगी के नाम लिखेंगे।


फ़रवरी 08, 2019

POST : 1013 गुनहगार की तरह ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

          गुनहगार की तरह ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

      ये हमारी व्यथा कथा है कि मुजरिम होने का कबूलनामा नहीं मालूम , पर झूठी कसम नहीं खाते सच सच बताते हैं कि हम देश के तीस फीसदी गरीब लोग वास्तव में रहते हैं भूखे नंगे बेबस होकर भी गुनहगार की तरह ही और मरने की राह देखते रहते हैं। जो दस बीस फीसदी बड़े लोग राज चलाते हैं और जो बीस तीस फीसदी उनके नीचे खुशहाल हैं और जो हमसे थोड़ा ऊपर बीस फीसदी जो जी लेते हैं किसी हाल में आप सब लगता है हमारी तरफ ऐसी नफरत भरी नज़र से देखते हैं जैसे हमने देश में जन्म लेकर इक अपराध किया है। बदसूरत लोग आपकी चमकती जगमग दुनिया पर मखमल में टाट का पैबंद की तरह हैं। आप सब लोग देश को बहुत कुछ देते हैं अपनी आमदनी से हर तरह से मगर हम पास होता ही नहीं कुछ भी देने को। इक फिल्म की कहानी में हम में ही कोई गरीब किसी होटल के बाहर भिखारी की तरह खड़ा देखता है बड़ी सी कार से उतरते हुए किसी अमीर की जेब से उसका बटुआ गिरते हुए और फिर उस नीचे पड़े बटुए को उठाकर लेकर होटल के भीतर जाकर उस अमीर को देता है। अमीर कहता है या पूछता है तुम्हारे पास खाली जेब कुछ भी नहीं है तुम चाहते तो रख सकते थे मिला बटुआ जिस में बहुत पैसा था तो गरीब कहता है जी मैं कोई चोर नहीं हूं किसी का बटुआ लेकर धनवान नहीं बनना है। तब वो अमीर होटल में पार्टी में नाचते झूमते हुए लोगों की तरफ इशारा कर बोलता है कि ये सभी कभी तुम्हारी तरह गरीब थे मगर इन्होने किसी का गिर गया पैसों से भरा बटुआ वापस नहीं किया और आज अमीर बन गये हैं। तब बात फ़िल्मी कहानी की थी मगर आज यही देश की वास्तविकता है बस ज़रा अंतर इस बात का है कि कोई बटुआ जेब से नहीं गिरा मिलता कोई रास्ता कोई छेद सरकारी गोदाम से या देशवासियों के घर की दिवार से बना हासिल करना सीख लोग ऊपर बढ़ते जाते हैं। महनत से ईमानदारी से किसी का गुज़र बसर होता ही नहीं है चोरी और सीनाज़ोरी यही देश की व्यवस्था बन गई या बना डाली है। 
 
              नसीब की बात नहीं मालूम मगर बदनसीबी की पता है , गरीब जिस पिता के घर जन्म लेता है गाली सुनकर बड़ा होता है और जब जीवन भर कोशिश कर अपने घर जन्म लेने वाली संतान को बड़े होकर गरीबी की दलदल से बाहर निकालता है तब भी खुद ही अपने को गाली देता महसूस करता है कि बाप भी अच्छा था बच्चे भी बड़े बन अच्छे हैं इक मैं ही बुरा और कमनसीब हूं। देश का हर गरीब जागते हुए सपना देखता है अमीर होने के नहीं केवल ख्वाब देखता है दो वक़्त रोटी के और किसी भी तरह थोड़ा हंसी ख़ुशी के चार पल मिलने के। सरकार भी कुछ लोग भी हम गरीबों को कोई खैरात देते हैं दया करने का दिखावा करते हुए मगर वास्तव में बदले को पुण्य पाना या हमारे पार जो अधिकार रहता है वोट देने का , उसको मांगना भी खरीदना भी और झूठे सपने दिखला छीन लेना भी मकसद रहता है। जब भी देश में चुनाव होता है तब लगता है हम भी देश के बराबर के मालिक हैं हमारा भी वोट बाकी लोगों के बराबर है। समझते हैं शायद इस बार सरकार बराबर बराबर सबको सब बांटेगी और हम भी अपना हिस्सा पाकर जीने के काबिल बन जाएंगे। अपना वोट कीमती वोट लगता है देश की हर संपत्ति पर समानता का हिस्सा पाने का साधन है। मगर हम सभी इक पल को राजा होने का वहम पाले जिस पल वोट डालते हैं अपना सब कुछ लुटवा आते हैं। बाद में फिर पांच साल इंतज़ार उस इक पल का और हमेशा अपने इक पल के अवसर को खोते रहते हैं। देश की राजनीति जाने क्या क्या शोर रहता है हर दिन गली गली नगर गांव हम भी सामने देखते रहते हैं पर नहीं समझ पाते उनका क्या मतलब है। 
 
              जीना मरना एक जैसा है ज़िंदगी मिलती नहीं मौत आती नहीं आसानी से। कोई हादिसा होता है तभी हमारी मौत को सरकार भी समाज भी सिक्कों से तोलते हैं और कुछ हज़ार का कभी अधिक मुआवज़ा मिलता है मरने के बाद उसके वारिस को जीते जी नहीं मिला जो लगता है मर कर पा लिया है। ऐसी मौत की चाहत रखते हैं कुछ लोग ये सोच कर जिस पिता को पत्नी को बच्चों को खुद जीते हुए नहीं दे पाए मरने से ही कुछ दे कर जाएंगे तो चैन से मर तो पाएंगे। सरकार चाहती है हमारी संख्या का अनुपात आंकड़ों में घटाना मगर कम नहीं होता संख्या बढ़ती जाती है। गरीबी का फीसदी आंकड़ा और गरीबों की जनसंख्या का आंकड़ा मिलता नहीं इक कम होता है दूजा बढ़ता जाता है। सालों पहले जब देश के बड़े नेता को गुज़रना होता था तब हम गरीबों की बस्ती को परदे कनातें लगाकर ढक देते थे जनाब को देख कर दुःख नहीं महसूस हो इसलिए। आजकल सड़कों की सजावट और आंखों को चुंधियाती रौशनी में हमारा अस्तित्व विलीन हो जाता है उनको पता होता है हम हैं मगर नज़र नहीं आते हैं। हम भी उसी तरह हैं जैसे देश में अपराध बढ़ रहे हैं मगर अपराधी किस बिल में छुपे हैं पता नहीं चलता मगर अपराधी हमारी तरह गरीब नहीं होते हैं मालदार होते हैं देश विदेश जाते हैं राजनीती में शामिल होकर शासक भी बन जाते हैं। उनके अपराध की जांच सरकार अपनी सुविधा के अनुसार करती है और निर्णय होते होते अपराधी का निशान बाकी रहता नहीं है। हम बेक़सूर हैं फिर भी गरीबी के गुनाह परे शर्मसार रहते हैं। हर किसी के सामने हाथ जोड़ कोई गुनाह किया नहीं मगर गुनाह की माफ़ी मांगते हैं। पुलिस से सरकारी अधिकारी से नेता से पूछना हम खुद गुनहगार होने का सबूत देते हैं। हर कोई इसी नज़र से देखता है हमको हर दिन।  गिला है इल्ज़ाम मान लेते हैं फिर भी सज़ा का फरमान जारी नहीं होता अक्सर सदियों तक सज़ा पाकर भी फरियादी कहलाये जाते हैं।

        इक शानदार भवन के बीच लंबे चौड़े फैले हॉल में मंच पर बहुत लोग हमीं गरीबों की बात सुना रहे हैं और सामने बैठे रईस लोग लुत्फ़ उठाते हुए तालियां बजा रहे हैं। नहीं मालूम उन्हीं में किस किस ने किस किस बेबस गरीब को कितना सताया होगा। गरीबी की बात कहने सुनने को कोई गरीब नहीं फिर भी भूले से भटकता हुआ मैं उधर चला आया। रहमदिल लोग हैं समझ गलती से पायदान चढ़ उनसे मुखातिब हुआ तो संचालक को हैरानी हुई बिना बुलाये किस तरह चला आया तुम्हारा काम बाहर दरवाज़े पर सलामी देना है कविता ग़ज़ल और बड़ी बड़ी गंभीर बातों की समझ कहां तुझ को। जो काम बताया गया करो चुपचाप ख़ामोशी से पानी चाय देने के बाद नज़र नहीं आना कैमरे की तरफ। गरीबी की बात मगर गरीब को धुत्कार करना जाने कितना अच्छा कितना खराब है। कोई ग़ज़ल आधी कोई शेर अकेला कोई चर्चा किसी विषय से शुरुआत करते और पहुंचती बात किसी और विषय पर। जाने क्यों लगा शायर की खुद अपनी ग़ज़ल घायल कराहती होगी उसे टुकड़ों टुकड़ों में सुनाते हुए। ये कोई अदब की पहली सी रिवायत नहीं लगती आधी आधी कितनी कविता ग़ज़ल और हर बार बीच में तालियों की भीख की बात आयोजकों की तारीफ की और बार बार उन्हीं के नाम कोई शेर कहने का ढंग लगा जैसे किसी राजदरबार के कवि शायर अपने आका का दिल बहलाने को खुश कर ईनामात पाने को बेताब हैं। गरीबी का दर्द नहीं समझते उसको उपयोग करते हैं और गरीब को मंच से ठोकर लगाकर नीचे उतार देते हैं। कोई साहित्यकार कहलाता है कोई राजनेता आयोजन का महत्वपूर्ण अंग है कोई और आयोजन के भागीदार हैं और सब के इश्तिहार लगे हैं कारोबार भी समाज की बात करने का दम भरने का दावा भी और कवियों शायरों कलाकारों के शुभचिंतक भी। किसी गरीब की कोई भलाई इस से नहीं होने वाली है। इंसानियत इंसानियत की बात मगर इंसानियत को भूलकर अपने अपने मकसद याद हैं। अपनी कहानी में अपना कोई किरदार नज़र नहीं आया मुझे।

फ़रवरी 06, 2019

POST : 1012 झूठ को सच बनाता आईना टीवी सिनेमा - डॉ लोक सेतिया

    झूठ को सच बनाता आईना टीवी सिनेमा - डॉ लोक सेतिया 

    आजकल हर दिन एक रुपया रोज़ देकर टीवी चैनल का कोई न कोई पैक लेने का विज्ञापन दिखाई देता है। हम हवा पानी के प्रदूषण पर चिंता जताते हैं मिलावट की वस्तु और फल सब्ज़ी पर कीटनाशक की चर्चा करते हैं। सोशल मीडिया स्मार्ट फोन के समाज पर हो रहे बुरे असर की बात करते हैं फेसबुक व्हाट्सएप्प से बढ़ते अपराधों का भी विचार कभी कभी आता है मगर इन पर हम कोशिश कर अंकुश लगा सकते हैं। लेकिन टीवी चैनल के सीरियल की कहानी विज्ञापन की नग्नता और छल कपट और फिल्मों की कहानी संगीत किस तरह से किस पर क्या असर छोड़ते हैं शायद कोई सोचता ही नहीं है। फिल्म टीवी का बहुत शौक रहता था मुझे और उनसे बहुत जानकारी और समझ मिला करती थी लेकिन अब टीवी सीरियल फिल्म देख समझ नहीं आता कि उनके बनाने वालों का मकसद है क्या , क्या केवल पैसा कमाना समाज को गुमराह कर या बच्चों और युवा वर्ग को भटका कर इक अपराध नहीं है। कलाकार कला सृजन का मकसद समाज को भटकाना नहीं हो सकता है जो ऐसा कर रहे हैं सच्चे कलाकार नहीं पैसे के लालची लोग लिखने वालों फिल्म टीवी सीरियल बनाने वालों समाज के दुश्मन हैं। हर टीवी सीरियल की हर फिल्म की कहानी की बात करना संभव नहीं है मगर यहां अधिकांश जो परोसते हैं उसकी बात से समझ सकते हैं। 
 
          शायद टीवी सीरियल वालों को लगता है दर्शक के पास कोई दिमाग नाम की चीज़ नहीं है इसलिए अपनी कहानी में कितनी बार कोई मरता है ज़िंदा होता है , चेहरा बदल लेता है और अपराध कर बच जाता है। बार बार अजब इत्तेफाक होते रहते हैं और सबसे बुरी बात कोई भी किरदार सही दिशा नहीं दिखलाता है। छल कपट षड्यंत्र पुरुष महिला सभी निडरता से करते हैं कोई कानून का डर नहीं है और अधिकारी डॉक्टर जब जिस को जो करना हो रिश्वत देकर झूठी रपट बनवा लेते हैं। हर कोई असंभव लगने वाले कार्य किसी को बेहोश करना कोई फ़िल्मी खलनायक जैसे पहले फिल्म में अपने अड्डे पर किया करते थे टीवी सीरियल का हर किरदार करने को सक्षम है। नागिन बन औरत बन जाने किस युग में जीना चाहते हैं , अंधविश्वास जादू टोना तंत्र के नाम पर बलि की बात और बंधक बनाकर रखने और ऐसे समाज जिस में आज भी बच्चियों के लिए शिक्षा उपलब्ध नहीं है और एक साथ आधुनिक होते हुए सदियों पिछड़े लोग वास्तविक समाज में जो कहीं नहीं मिलते टीवी सीरियल फिल्म में उनकी कहानी दिखाई देती है। फिल्म टीवी कला अगर वास्तविकता से परे कोरी कल्पना जो शायद उस पुराने युग में भी नहीं संभव था को आज की सच्चाई बताना चाहते हैं और विचारशीलता को नकारते हैं। 
 
           कॉमेडी के नाम पर बेहूदा डॉयलॉग और घटिया निम्न स्तर के चुटकुले सुनकर लगता है इनको स्वस्थ्य हास्य की समझ नहीं है। हर शो में रियल्टी के नाम पर बनावट और लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है। सरकार का विभाग इसकी चिंता करता है कि लोग जिस चैनल को देखें उसकी ही कीमत चुकाएं मगर क्या इस पर पहले ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए कि मनोरंजन के नाम पर जो परोसा जा रहा है उस से समाज की मानसिकता खराब ही नहीं हो रही बल्कि नैतिकता और आदर्श का पतन हो रहा है। जो धर्म की समाज के मूल्यों की दुहाई देते हैं उनको ये सब क्यों नज़र नहीं आता है। कभी कभी किसी टीवी सीरियल को देखकर सोचता हूं कि कई साल बाद जब लोग इसको फिर से देख सकेंगे तो क्या उनको ऐसा नहीं लगेगा कि हम कितने ज़ाहिल नासमझ और दिमाग से काम नहीं लेने वाले लोग थे। एक साथ रहते हैं एक घर में मगर हर एपीसोड में कोई दोस्त दुश्मन कोई दुश्मन दोस्त हो जाता है। बार बार धोखा छल कपट फिर भी बार बार प्यार मुहब्बत करना लगता है पिछले दिन की कहानी आपको भूल जानी चाहिए अन्यथा आपको समझ नहीं आएगा कोई भी किरदार क्या है। हर कोई गुनहगार भी है और खुद को सही भी साबित करता है। सब चालाक भी हैं मगर नासमझ और मूर्ख भी हैं जो सामने होते हुए किसी बात को नहीं समझ पाते हैं।

      टीवी और फिल्म वालों ने भगवान को अपनी कठपुतली समझा हुआ है जैसे मन चाहा उपयोग कर लेते हैं। दुनिया भर के गलत कार्य करने वाला भगवान के सामने हाथ जोड़ अपने अनुचित कर्मों में भी साथ मांगता ही नहीं कथाकार दिखलाता है उसकी दुआ सुन ली भगवान ने। इक अजीब सी दुविधा दर्शक को रहती है कि किस बात को कब सही और कब गलत समझना होगा। समय के साथ तमाम चीज़ों में बदलाव आता है और हर चीज़ पहले से बेहतर बनते बनते और अच्छी बनती जाती है मगर हमारे देश का सोशल मीडिया टीवी चैनल सिनेमा हर दिन और बदतर हालत होती जाती रहती है। खराब होने को सफलता की निशानी जैसे मान लिया गया है , बेतुकी कहानी निरर्थक गीत के बोल और संगीत के नाम पर शोर के साथ अपशब्दों को भद्दे लगने वाले शब्दों को स्वीकार करना बताता है कि हम सभ्यता को त्याग असभ्य बनने को तरक्की कहने लगे हैं। जो बच्चे इस सब को देख कर बड़े होंगे उनको पहले युग के आदर सूचक शब्द बकवास लगेंगे और गाली देना गंदी भाषा का उच्चारण करना आधुनिकता लगेगा। कभी ये समझते थे कि अपनी कुरीतियों को गलत परंपराओं को छोड़ समय के साथ अच्छी बातों को अपनाना चाहिए मगर यहां तो जो हमारी अच्छी और कायम रखने के काबिल बातें थीं उनको छोड़ व्यर्थ की फालतू की गंदी और खराब बातों को अपना रहे हैं। ये सब टीवी सोशल मीडिया और फिल्मों तथा जाने माने नायक नायिकाओं से सीखा है हमने और सीख रहे हैं। पढ़ाते हैं हमको ये उल्टी पढ़ाई जो उल्टी पढ़ाई तो मैं क्या करूं। 

 

फ़रवरी 05, 2019

POST : 1011 ईमानदारी नहीं रही ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          ईमानदारी नहीं रही ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      अख़बार में इश्तिहार छपा है समाचार पक्का है टीवी चैनल वाले भी सबूत के साथ घोषणा करते हैं नहीं बचा सके सोशल मीडिया वाले मिलकर भी उसको । बस इक रस्म निभानी है सपुर्दे ख़ाक करना है कि जलाना है एक जैसी बात है कोई फर्क नहीं पड़ता है । कोई किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगा सकता कि उसने मारा है मरने दिया है या बचाया नहीं है । सभी को वो कब से बेकार अनचाहा बोझ लगती थी सब उसको अपने से दूर बाकी लोगों के पास देखना चाहते थे । ईमानदारी के परिवार का कोई बचा नहीं इसलिए उसकी शोक सभा आयोजित कोई नहीं कर सकता । मगर आजकल लोग अवसर की तलाश में रहते हैं कोई जश्न मनाया जाये । ऐसे में सभी बेईमान लोगों ने मिलकर ईमानदारी की याद में सभा आयोजित करने का कार्य किया है । चलो अच्छा है ऐसे अवसर पर विरोध की बात भुलाना दिल में ख़ुशी और सामने संवेदना व्यक्त करना बचा हुआ है । पहले शोक सभा पर रिश्तेदारों को खत लिख बुलावा भेजते थे आजकल अपने पराये का भेद नहीं है और सार्वजनिक सूचना देते हैं और तमाम लोग कुछ मिंट का मौन रखने फूल चढ़ाने आते हैं । किसी के चेहरे पर दुःख की कोई झलक नहीं नज़र आती और जो जितना बड़ा व्यक्ति समझा जाता है जश्न उतना भव्य और शानदार होता है । इक शायर कहता है कि :- बड़े लोगों के घर सोग का दिन भी लगता है त्यौहार सा । उस शायर को लगता था :- इस तरह साथ निभाना है मुश्किल , तू भी तलवार सा मैं भी तलवार सा । 
 
           सभा की शुरुआत होने वाली है और देश का हर ख़ास वर्ग इस जश्न में शामिल है । हर टीवी चैनल पर सीधा दिखाया जा रहा है और देश के बड़े बड़े सभी शहरों में एक साथ जश्न मना रहे हैं । इस से पहले कि मंच से भाषण शुरू हों मैं आपको अपनी इक नज़्म सुनाता हूं मौका भी है दस्तूर भी है । 


                        जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये

                        बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये ।

                    इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात

                        जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये ।

                    वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं

                       कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये ।

                    मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे

                      मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये ।

                      दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई

                       ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये ।

                       जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी

                        इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये । 

            मंच पर सबसे पहले महान लेखक संचालन करने को माइक पर आये हैं , कह रहे हैं आज का दिन बहुत ख़ास इतिहासिक दिन है और शायद हमारी एकता का सबूत भी है जो ईमानदारी के विलुप्त होने पर एकमत हैं और एक साथ मिलकर उसे श्रद्धासुमन भेंट करने वाले हैं । समय के साथ जो भी अनावश्यक समझा जाने लगता है उसका अंत होना स्वाभाविक है और अंत को स्वीकार करना ज़रूरी है । ईमानदारी देखने में जैसी भी थी उसका गुणगान जितना भी किया जाता रहा हो वास्तव में उसका होना सभी को समस्या लगता रहा है । राजनीति और धर्म वालों को इस शब्द ने बहुत परेशान किया है । कारोबार करने वालों को भी यही सब से बड़ा दुश्मन लगती थी और सरकारी कर्मचारी के लिए इस से बड़ी दुविधा कोई नहीं थी । उनकी निष्ठा उनकी ईमानदारी पल पल बदलती रहती थी और किस के लिए ईमानदार रहना है उनकी यही समस्या कोई काम करने नहीं देती थी । कर्तव्य के लिए ईमनादार होने पर नौकरी से हाथ धोने का डर देश समाज के लिए ईमानदारी रोज़ बिस्तर बांध तबादले की तलवार लटकी हुई लगती थी और जनता के लिए ईमानदार होना तो नासमझी का सबूत होती थी । ईमानदारी होती है ये शायद कुछ लिखने वालों का ख्वाब था जो उनकी कविता कहानी उपन्यास निबंध आदि में दिखाई देता था और उनकी रचनाओं में आखिर में ईमनदारी जीत जाती थी सच ज़िंदा रहता था और झूठ का मुंह काला होता था । मगर किसी ने भी उनकी रचनाओं को जीवन में अपनाने का काम किया नहीं और गीता कुरान बाइबल गुरुग्रंथ साहिब को सजावट का सामान समझ सुरक्षित रखा गया बंद कमरों में । कुछ खासियत रही होगी जो ईमानदारी का गुणगान सभी करते रहे मगर किसी ने उसे अपने भीतर जगह नहीं दी । ईमानदारी से प्यार किसी भय की तरह किया है सभी ने इसलिए उसका वास्तव में कोई बाकी रहा ही नहीं । बारी बारी सब अपनी बात कहने को आये हैं और समय की कमी को देखते हुए थोड़े शब्दों में सार की बात कहना उचित होगा , कहकर उन्होंने माइक किसी और को थमा दिया है । 
 
       नेताजी की आंखों में मगरमच्छ के आंसू हैं , गला भरा हुआ है शब्द निकल नहीं रहे लगता है सबसे करीबी रिश्ता उन्हीं का था । हमने बहुत कोशिश की थी ईमानदारी को न सही उसके कुछ अवशेष ही किसी तरह बचाकर रखने की मगर कोई भी विभाग कामयाब नहीं हुआ बचा पाने में । हम आने वाली नस्लों को दिखला सकते थे कि ईमानदारी का अंजाम क्या से क्या हुआ ताकि उनको सबक मिलता । मगर सब जानते हैं ईमानदारी का बंटाधार खुद ईमानदार समझे जाने वालों ने किया है । गैर लोग इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं । अधिकारी की बारी आई तो उनका कहना था कि ईमानदारी हमेशा हर विभाग के हर दफ्तर में दीवार पर टंगे इश्तिहार जैसी रही है जिस पर जहां रिश्वत देना मना है उसी जगह बिना रिश्वत कोई काम नहीं होता है । कोई भी ईमानदार होने की सज़ा भोगना नहीं चाहता अन्यथा सब ईमानदार ही हैं । ईमानदारी के चर्चे सदा होते रहे हैं बस उसको देखना संभव हुआ नहीं है , जिस के ईमानदार होने का शोर हुआ उसी ने सबसे अधिक घोटाले का इतिहास रचा है । भगवा पहने कारोबारी के कहना है कि उसने असली ईमानदारी को सुरक्षित रखा हुआ है और उसके लेबल लगी बेईमानी को कोई भी ईमानदारी समझ महंगे दाम खरीद सकता है । इस तरह तमाम लोग आते रहे और संवेदना व्यक्त करते रहे । 
 
    इधर दूर किसी शहर की गरीबों की बस्ती में इक झौपड़ी में इक महिला ने बच्ची को जन्म दिया है । टीवी चैनल का कैमरा उस पर थम गया है बता रहा है कि महिला के साथ दुष्कर्म किया गया था और अपराधी अभी पकड़ा नहीं गया है । टीवी वालों ने उस को ईमानदारी नाम दे दिया है अर्थात ईमानदारी उस लड़की का नाम है जिस के पिता का कोई अता पता नहीं है और जिसकी मां उसको जन्म देते ही मर गई है । ईमानदारी की शोकसभा मातम मनाना छोड़ उसके जन्म पर जश्न मनाने लगी है । ईमानदारी का भविष्य सभी जानते हैं बड़ी होने पर उसके माथे पर कलंक सभी को दिखाई देगा उसको बिना कोई गुनाह किए गुनहगार समझेगा समाज ।अच्छा होता जन्म लेते ही उसको मौत आ जाती , ईमानदारी हमेशा पल पल मरती रही है ज़िंदा रहने को किसी लेखक की कहानी बनने को । ईमानदारी पर कोई उपन्यास नहीं लिखा जा सकता लिखी जाएगी तो बस इक लघुकथा शायद ।  ईमानदारी का स्मारक बनाया जाएगा सरकार ने घोषणा की है विश्व में सबसे विचित्र और शानदार डिज़ाइन होगा उसका जिसे देखने दुनिया आएगी । 
 
 राष्ट्रपति होने के लिए ईमानदारी और जवाबदेही ज़रूरी है | जेनिस एस. एलिस

फ़रवरी 03, 2019

POST : 1010 गलत परंपराओं आडंबरों को ढोते हम लोग - डॉ लोक सेतिया

   गलत परंपराओं आडंबरों को ढोते हम लोग - डॉ लोक सेतिया 

       आपका आदर्श कौन है , अगर आप किसी की शोहरत या सफलता से प्रभावित होकर उसको अपना नायक मानते हैं और उसकी तस्वीर या पत्थर से बनाई मूरत की आरती पूजा करते हैं तो शायद आपको इक बात पर विचार करना चाहिए कि ऐसा करने से हासिल क्या होगा और क्या ऐसा कर के आप अपनी भीतर की छुपी हुई गुलामी की मानसिकता का परिचय तो नहीं दे रहे हैं। हम कुछ ख़ास नामों का गुणगान किया करते हैं और देश को उनके योगदान की बात करते हुए उनके बुत उनकी समाधियां उनके नाम पर कोई इमारत बना उनकी वस्तुओं को सहेज कर रखते हैं जिस पर हर साल सालों साल देश की जनता का धन खर्च किया जाता है जो किसी गरीब देश जिस में आधी आबादी शिक्षा स्वास्थ्य बुनियादी ज़रूरतों से बंचित है पर खर्च किया जाता तो मुमकिन है उन्हीं महान नायकों को सच्ची श्रद्धांजलि होती। हमने विचार को छोड़ केवल दिखावे को किसी के नाम पर आडंबर करना आसानी समझी है। देश की आज़ादी अथवा देश के निर्माण में अगर योगदान की बात की जाये तो केवल उन्हीं नाम वाले लोगों ने सभी कुछ नहीं किया है बल्कि सच तो ये है इस में तमाम बाकी लोगों का भी योगदान रहा है और शायद उनके साथ अन्याय है कि उनकी काबलियत महनत को दरकिनार कर थोड़े से लोगों को महत्व देने का कार्य किया जाये। देश समाज के लिए कुछ भी करना सभी का कर्तव्य है और ऐसा कभी नहीं माना जाना चाहिए कि उन्होंने देश पर कोई उपकार या एहसान किया था जिसे सदियों तक हमको क़र्ज़ की तरह चुकाना होगा। जिन लोगों ने देश की सेवा करने को समाज को बेहतर बनाने को जो भी किया उनको उस से ख़ुशी मिलती थी और अपना कर्तव्य समझते थे बदले में कोई चाहत तमगे आदि की नहीं रखते थे। उनके कार्य को अधूरा छोड़ उनके नाम पर देश का धन खर्च करना उनका आदर करने से अधिक उनकी विचारधारा को भुलाना है। इक पुल कोई शुरुआत करता है बनाने की और कोई बनकर तैयार होने पर उद्घाटन करता है दोनों के नाम के शिलालेख लगा देते हैं जबकि पुल बनाया किसी कारीगर किसी मज़दूर ने देश की जनता के कर द्वारा जमा धन से है और वास्तविक हकदार वही लोग हैं। सत्ताधारी राजनेता जनता के निर्वाचित सांसद विधायक जनता के नियुक्त सेवक हैं और उनको ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने को खज़ाने से जितना मिलता है वो बहुत अधिक है। वास्तविक जनता के सेवक तब कहलाते जब इतने अधिक साधन सुविधाएं नहीं लेकर सादगी से जीवन व्यतीत कर समाज कल्याण में योगदान देते। ये खेदजनक बात है कि अपने देश में राजनीति करने वालों में ऐसा सच्ची देशभक्ति की भावना नहीं है और निर्वाचित होने के बाद खुद को शासक और राजा महाराजा की तरह देश का मालिक समझने लगते हैं और मनमानी करते हैं। आपको अगर ये महान लगते हैं तो आपकी महानता की परिभाषा बदलनी चाहिए क्योंकि ये गलत है। 
 
       कब हम इस वास्विकता को समझेंगे कि नेताओं अधिकारियों की राजसी विलासिता के चलते ही देश की गरीबी बढ़ती रही है। जो सबसे आखिर में खड़े वंचित व्यक्ति के आंसू पौंछने की बात कहते थे हम उनकी समाधि को सजाने उस पर फूल चढ़ाने पर धन बर्बाद करते हैं तो उनकी विचारधारा के विपरीत आचरण करते हैं। नहीं गरीब देश में 150 एकड़ ज़मीन पर महल में किसी बड़े पद वाले का शाही ढंग से रहना जिस पर हर दिन कितने लाख खर्च होते हैं और इसके बावजूद गरीबों के दुःख दर्द की बात करना एक साथ नहीं हो सकते। इसको उचित कहना देश के गरीबों का उपहास करना है। देश समाज की सेवा इतने महंगी कीमत लेकर की जाती है तो नहीं ज़रूरत ऐसे देशसेवकों की सफेद हाथी की तरह बोझ बन गए है ये लोग। कोई सवाल नहीं करता इनसे कि आप पर कितना धन देश की जनता खर्च करती है क्या उस आम जनता को भी कोई न्यूनतम आय मिलनी ज़रूरी है कि नहीं। आंकड़ों की बाज़ीगरी नहीं देश में बड़े छोटे की खाई इतनी अधिक नहीं स्वीकार की जा सकती है कोई हर दिन हज़ारों करोड़ की आमदनी करे और किसी को दिन में रोटी खाने को सौ रूपये भी नहीं मिलते हों। जनता की सेवा का दम भरने वाले को आम नागरिक की औसत आमदनी से कितने गुणा अधिक मिलना चाहिए। विकसित अधिकतर देश में आम नागरिक की आय और सरकारी अमले की औसत आय या वेतन में दो से पांच गुणा अधिक का अंतर होता है अर्थात आम जनता अगर एक रुपया कमाती है तो सरकारी कर्मचारियों का औसत वेतन दो से पांच रूपये होता है जबकि यही हमारे गरीब देश में बीस तीस पचास गुणा होते होते आजकल हज़ारों गुणा हो चुका है और कोई सरकार कभी किसी बजट में इस पर इक शब्द नहीं बताती है। विदेशी शासक लूटते रहे थे मगर स्वदेशी तो उनसे भी बढ़कर लुटेरे निकले हैं। क्या किसी बजट में किसी सरकार ने बताया है कि पिछले पांच सालों में किस किस राजनेता पर सरकारी खज़ाने से कितना धन खर्च किया गया। चौंक जाओगे जानकर कि उनके एक एक मिंट की कीमत करोड़ों में हमने चुकाई है , विडंबना ये है कि ऐसा करने वाले हम आम नागरिकों को किसी गुनहगार की तरह समझती है। 
 
               अपराध उस व्यवस्था का है जिस के चलते कोई कारोबार की आड़ में कुदरत की दी हुई हवा पानी जैसी चीज़ों को हथिया कर बेचता है। जिस व्यवस्था की कल्पना आज़ादी पाने से पहले की गई थी उस में महल और झौंपड़ी का इतना अंतर स्वीकार नहीं था। इसकी छूट किसी को नहीं दी जानी चाहिए कि कोई सर छुपाने को जगह नहीं पाए और कोई आलीशान महल बनाकर रहता हो। देश की कुल संपत्ति का 70 प्रतिशत केवल दस प्रतिशत हथिया लेते हैं तो ऐसा व्यवस्था मंज़ूर नहीं की जा सकती है। जिस विकास की बात करते हैं नेता उस में मानवीयता की कोई बात नहीं है और देश इंसानों से होता है सड़कों इमारतों को विकास नहीं समझा जा सकता है।


जनवरी 29, 2019

POST : 1009 कुछ रह गया कुछ छोड़ दिया ( साहित्य की दुनिया - उपसंहार ) डॉ लोक सेतिया

    कुछ रह गया कुछ छोड़ दिया ( साहित्य की दुनिया - उपसंहार ) 

                                                  डॉ लोक सेतिया 

     दो पोस्ट लिख कर भी वास्तव में बात कतरे तक पहुंची और समंदर का ओर छोर समझना रह गया । वह पुरानी कहानी अंधे को हाथी अपने हाथ जिस जगह लगे उसी अनुसार लगा । मगर बात और भी है कुछ को कहना भूल गये लिखने वाले तो कुछ तो जानकर नहीं लिखा और रहने दिया । आपको हमको जो कविता जो ग़ज़ल दर्द भरी मन को छूती लगती है उसके पीछे की कहानी अगर कोई है तो कोई नहीं जानता  जिस की बेवफ़ाई का मातम कोई कर रहा है क्या वास्तव में उसका कोई दोष था या उस पर झूठी तोहमत लगा दी किसी ने अपनी कलम के हुनर का गलत इस्तेमाल कर के । अक्सर लिखने वालों ने किसी को नायक साबित करने को दूसरे की बात को ऐसे ढंग से लिखा कि उसकी अच्छाई भी सामने आने नहीं पाये । आशिक़ लोग जब किसी की बेवफ़ाई की बात कहते हैं तो शायद भूल जाते हैं ताली दोनों हाथ से बजती है और जिसको वास्तव में प्यार किया उसकी रुसवाई करना सबसे बड़ी बेवफ़ाई होती है । सवाल महिला पुरुष का भी नहीं जब जो किसी को पाना चाहता है उसकी मर्ज़ी का आदर नहीं करता है । ऐसा नहीं है कि लिखने वालों ने इस पक्ष को लेकर लिखा ही नहीं मगर बहुत कम लिखने वालों ने लिखा और जाने क्यों उसकी बात उतनी चर्चित नहीं हुई । सफर फिल्म में नायक नायिका मुहब्बत करते हैं मगर नायक को पता चलता है उसको खून का कैंसर है और नायिका भले उसके साथ विवाह करना चाहती है वो जिसको चाहता है उसकी भलाई की खातिर अपने प्यार का वास्ता देकर उस से विवाह करने को कहता है जो सह-अभिनेता नायिका को चाहता है । अंजाम भले जो भी हो और वास्तव में अंजाम लेखक अपने मन में तय कर चुका होता है कि कहानी सार्थक है मगर अंजाम अंत में दुःखद ही रखना है । आनंद फिल्म फिर भी बेहतर है जिस में नायक जिसे चाहता है नहीं मिलती तो उस शहर से दूर चला जाता है और अपनी महबूबा की रुसवाई नहीं करता है । दो बदन फिल्म की नायिका इक डॉयलॉग में सच्चे प्यार की परिभाषा बताती है कि जो पा लेने को प्यार समझता है उसको प्यार क्या है समझने को कई जन्म लेने होंगे । अनुभव फिल्म की नायिका का डॉयलॉग शायद ही कोई समझेगा जो अपने पति को कहती है , हम दोनों कुछ पल को मिला करते थे और कॉलेज के ज़माने में जितना समय हमने साथ बिताया उसको एक साथ जोड़ा जाये तो सात घंटे भी नहीं बनेंगे कुल , मगर उन सात घंटों में जितना प्यार मुझे उस से मिला आपसे शादी के बाद सात सालों में भी उतना मिला नहीं , और उसने मुझे कभी छुआ तक नहीं । 
 
ख़ामोशी हंसते ज़ख्म सफर मिलन अनुभव जैसी फ़िल्मी कहानियां हम को पसंद नहीं आईं क्योंकि हम भी अपनी मानसिकता को बदलना नहीं चाहते । औरत कविता मेरी इस विषय को लेकर ही है कि क्या किसी महिला के बदन को टुकड़ों में बांटकर देखना चाहत कहला सकता है , तेरी आंखें तेरे होंट तेरा फलां अंग इस तरह सुंदरता की बात करना उचित है या जिसको भी चाहते उसको पूरी तरह से उसकी शख्सियत को प्यार करना चाहिए । शायद महिलाओं को भी इस जाल से निकलना चाहिए और मजाज़ लखनवी जी की ग़ज़ल को समझना और उस से सबक लेना चाहिए । तू इस अंचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था । 
 
      कल किसी की पोस्ट पर लिखा हुआ पढ़ा अमृता और इमरोज़ को लेकर , लिखा था हर औरत में थोड़ी अमृता मिलती है मगर किसी पुरष में इमरोज़ नहीं मिलता । मेरे इक दोस्त को जाने क्या सूझी कि अपना नाम इमरोज़ रख लिया । मगर आपको अमृता की बात समझ आती है इमरोज़ की नहीं उनका रिश्ता उस तरह का था ही नहीं और आपको कोई अमृता इमरोज़ नज़र आये तो शायद आपको ही बदकार बदचलन शब्द याद आने लगें क्योंकि हम खुद जैसे भी हों औरों से चाहते हैं सामाजिक बंधनों का पालन करना । साहिर की बात को भी नहीं समझा अपने अन्यथा उसको इल्ज़ाम देना नहीं चाहते , कोई आशिक़ अपनी महबूबा को मुझे छोड़ कर भी तुम जा सकती हो , तेरे  हाथ में मेरा हाथ है जंजीर नहीं । हमारी समस्या है कि हम जिसको प्यार करते हैं ऐसा मानते हैं या दावा करते हैं उसको आज़ादी नहीं देते उसकी भावनाओं का आदर नहीं करते । तू अगर मेरी नहीं है तो पराई भी नहीं वाला प्यार और चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों जैसा सच्चा इश्क़ कितना अंतर है । छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए । ये भोग भी एक तपस्या है तुम त्याग के मारे क्या जानो अपमान रचेता का होगा रचना को अगर ठुकराओगे , संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे । 
 
               आपको वही लोग भाते हैं जो सफल हुए मगर जो असफल रहे उनकी कहानी कोई लिखता भी नहीं है । जावेद अख्तर को जानते हैं मगर उनके वालिद जाँनिसार अख्तर को शायद नहीं जो साहिर के समय के उनके दोस्त थे और कहते हैं साहिर की रचनाओं को ठीक किया करते थे । मगर उनके बारे बताया जाता है कि साहिर की महफ़िल में किसी सोफे के कोने पर सिकुड़े हुए बैठे रहते थे । उनकी शायरी को पढ़ोगे तो पता चलेगा कितना लाजवाब लिखते थे । सारी दुनिया में गरीबों का लहू बहता है , ये ज़मीं मुझको मेरे खून से तर लगती है । जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं , देखना ये है कि अब आग किधर लगती है । कोई और शायर थे जो बॉम्बे से असफल निराश वापस जाते हुए अपना कालम सारा बेच गये चंद रुपयों में मज़बूरी में जिनको बेचकर कोई हसरत जयपुरी शोहरत की बुलंदी पर जा पहुंचा । ऐसे जाने कितने किस्से हैं जो खो गये वक़्त की आंधी उनको कहां ले गई पता नहीं चला । 
 
         आखिर में इक और विषय की बात करना चाहता हूं , हर सभा में कोई उपदेशक कहता मिलता है कि बच्चे बुरे हैं और माता पिता अच्छे जो उनके लिए क्या कुछ नहीं करते । सोचो जो आज माता पिता हैं कभी वो भी बच्चे थे और तब उनको लेकर भी यही बात कही जाती होगी । बच्चे भी खराब हो सकते है और माता पिता भी ऐसे होते हैं जो अपने बच्चों के साथ सही नहीं करते हैं । अपने बच्चों को आज़ादी नहीं देना अपने आधीन रखने को जैसे चाहे करना ये भी इसी दुनिया में होता है । बच्चे को अच्छा बनाना बुराई की तरफ भेजना दोनों काम करते हैं माता पिता । जो चोर रिश्वतखोर अपराधी मतलबी देश को समाज को नर्क बनाते हैं उनकी संतान को भलाई का सबक कैसे समझ आएगा । मगर इक चलन बन गया कि जैसे भी हों माता पिता पूजनीय हैं जैसे जैसा भी है मेरा पति मेरा देवता है ये सच लिखना नहीं है और साहित्य को सच हर तरफ का पूरा लिखना चाहिए आधा सच झूठ से भी खराब होता है । 
 
 
 Sahitya Duniya / साहित्य दुनिया



जनवरी 28, 2019

POST : 1008 साहित्य की दुनिया का चेहरा ( खरा सच ) डॉ लोक सेतिया ( भाग दो )

 साहित्य की दुनिया का चेहरा ( खरा सच ) भाग दो - डॉ लोक सेतिया

                                        ( पिछले अंक से आगे )

   एक तरफ वास्तविक लेखक चुपचाप बिना कोई मानदेय या रॉयल्टी पाये सृजन करता है और छापने वाले अख़बार मैगज़ीन वाले बिना कीमत चुकाये या नाम को कुछ देकर उसका शोषण करने के बावजूद भी कहते हैं साहित्य की समाज की भलाई का महान काम करते हैं। एक रचना लेखक के दर्द की भेजी थी लिखने वाले लिख अपनी भी कहानी और नतीजा क्या हुआ जानना चाहोगे। किसी अख़बार ने जो शहीद परिवार फंड की बात किया करता था मेरे लिखे हुए कागज़ के पुर्ज़े कर के अर्थात उसको फाड़कर वापस भेजा था। मैंने तब उनको खत लिखा था कि ऐसी रिवायत है कि जब किसी के घर कोई मरता है तो चिट्ठी को फाड़कर भेजते हैं सभी को सूचना देने को। उनके वहां भी ज़मीर की मौत हुई होगी या समझ आया था। यकीन करना ये अख़बार कोई घाटे में नहीं चलता है करोड़ों की आमदनी है और बहुत जगह से इक बड़ी संख्या में छपता है। कभी अख़बार लिख कर बिकते थे आजकल बिक कर लिखते हैं। बड़े क्या शहर के हज़ार दो हज़ार संख्या में छपने वाले सांध्य दैनिक भी सत्ताधारी दल का गुणगान करते कई कई अंक निकालते हैं दल से कीमत लेकर। मगर फिर भी सच और लोकतंत्र का सतंभ होने का दावा भी है। कड़वा सच यही है कि बहुत लोग इस काम को करते हैं मगर उनकी कमाई अधिकारियों के लिए बिचौलये बन रिश्वत का धंधा चलाने से होती है। मेरी रचना पढ़कर इक मैगज़ीन के संपादक का फोन आया जो बताने लगे चालीस साल से मैगज़ीन निकलती है और अभी भी कुछ हज़ार घाटे का कारोबार हर महीने है। मैंने पूछा आपको वेतन मिलता है तो पता चला उनका वेतन घर का किराया कार और फोन आदि सुविधाओं का खर्च मिलाकर भुगतान लाखों में है। बाकी जो भी कर्मचारी हैं उनका भी वेतन बाकायदा देते हैं बिजली का बिल और कागज़ की कीमत और छपाई का बिल भी चुकाते हैं और डाक से भेजने का ही नहीं जो मैगज़ीन बेचते हैं उनको भी पैसे मिलते हैं। केवल एक लिखने वाले को ही देना ज़रूरी नहीं है उनको दिलासा देने को खत भेजते हैं जब संभव हुआ भुगतान किया जाएगा। तीन साल में हर महीने छपी रचनाओं का मानदेय बकाया है। सवाल ये है कि जिनके विज्ञापन छापते हैं उनसे एक पेज के लाखों वसूल करते हैं मगर लिखने वाले को दो सौ भी देने में आनाकानी करते हैं। 
 
          लिखने वाले भी कम नहीं है जिनको नाम शोहरत हासिल है उनकी रचनाएं सुनकर लगता है जैसे ग़ज़ल कविता को हथियार बनाकर किसी को नफरत का निशाना बना रहे हैं। सच कहने का अधिकार है और सत्ता की खामियां बताना आलोचना करना भी हर लिखने वाले का काम है मगर जब कोई खुलकर किसी को खलनायक बताने की बात करते हुए ये भी ज़ाहिर करता है कि उनको बोलने की आज़ादी नहीं है तब बात हज़म नहीं होती है। देश विदेश जो मर्ज़ी कहते हैं मगर अपने धर्म या वर्ग के नाम पर उनका दमन किया जाता है दहशत है कहकर तालियां और खूब धन पाते हैं। यकीनन ऐसा ग़ज़ल कविता साहित्य के साथ उचित नहीं है और हर किसी को इक सीमा का उलंघन करने की इजाज़त नहीं हो सकती। साहित्य दुर्भावना पैदा करने का माध्यम नहीं है और आपको राजनीति की बात किसी और मंच से करनी चाहिए। साहित्य ग़ज़ल कविता की अपनी मर्यादा है और जिस तरह इधर लोग अपनी ग़ज़ल को भी पूरा नहीं टुकड़ों में बांटकर सुनाते हैं उसे मुशायरे की परंपरा में अनुचित कहते हैं। ग़ज़ल सुनने का शुऊर भी और सुनाने का सलीका भी होना चाहिए , इक मतला और इक शेर पेश है , तालियां बजाकर दाद देंगे तो अच्छा है , सामने पहली कतार में बैठे आयोजकों का नाम बार बार लेकर उनकी चाटुकारिता करना किसी बड़े शायर की शोभा नहीं देता है। कवि सम्मेलन और मुशायरे के नाम पर चुटकलेबाजी जुमले उछालना और बस किसी तरह मनोरंजन करना देख लगता है साहित्य और अदब की नहीं मसखरे या बहरूपिये हैं जो किसी को खुश कर अपना पेट भरते हैं।  
 
            टीवी चैनल के मालिक और फ़िल्मकार बिना लिखने वालों के नहीं चलता उनका काम कभी। मगर इक तरफ जो पर्दे के सामने है नायक नायिका अदाकार उनको लाखों करोड़ों और लिखने वाले को कहने भर को थोड़ी बहुत राशि मिलना न्याय की बात नहीं है। अभी कुछ साल तक लिखने वाले से सभी अधिकार कोई खरीद लिया करता था मगर अब कानून बदल गया है फिर भी चलन बदला नहीं है। वास्तव में जैसे हम सोचते हैं कि किसान को अपनी फसल की कीमत उसकी महनत का मोल मिलना चाहिए ठीक उसी तरह हर लेखक की रचना को उपयोग करने से पहले लिखने वाले की मर्ज़ी की कीमत देनी चाहिए। जब तक लिखने वाले को लेखन से पेट भरने को रोटी नहीं मिलती कोई साहित्य और अदब को बढ़ावा देने की बात करता है तो इक झूठ या छल है। खेद की बात है कि देश की हर राज्य की साहित्य अकादमी को खूब बजट मिलता है मगर उसका सार्थक उपयोग साहित्य को बढ़ावा देने को नहीं कुछ अपनों को रेवड़ियां बांटने को किया जाता है। अधिकतर ईनाम पुरुस्कार जिनको मिलते हैं उसके काबिल नहीं होते हैं और जो वास्तव में हकदार हैं उनको कुछ नहीं मिलता क्योंकि उनको इसकी कला आती नहीं है। ऐसे ही एक बहुत अच्छे लेखक को कैंसर रोग होने पर हरियाणा की पंजाबी अकादमी ने नाम भर को सहायता भी विलंब से दी थी जबकि उनसे कम अच्छा लिखने वाले अकादमी के निदेशक बने हुए थे और दोनों एक ही शहर के रहने वाले थे। साहित्य अकादमी के पद ही जब साहित्य को योगदान नहीं अन्य कारण से मिलने लगे तो कुछ भी उम्मीद बचती नहीं है। शायद तभी आजकल पहले जैसे कद के लिखने वाले किसी विधा में नज़र नहीं आते हैं और उनका बोलबाला है जो किसी तरह पहली कतार में बैठने का जुगाड़ करना जानते हैं। 
 
 Sahitya Duniya / साहित्य दुनिया
       


जनवरी 27, 2019

POST : 1007 उनको कब मिलेगा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

         उनको कब मिलेगा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

      ऐसे वैसों को दिया है कैसे केसों को दिया है उनको भी भाररत्न दिला दे चींटी को पहाड़ चढ़ा दे । बेहद उदास बहुत निराश हैं । अभी नहीं मिला तो फिर कब मिलेगा । ऊपर वाले तेरी रहमत से दिल भर गया है कोई जीते जी जैसे मर गया है । पहले से भगवा धारण नहीं किया होता तो आज का दिन देख बाबा जी बाबा बन जाते । निंदा करने से जो हाथ से निकल गया मिलने वाला भी नहीं जानते हैं मगर क्या करें आंसू छुपाना आता नहीं है । काश इतना सब बनाया खुद अपने नाम से इक भारतरत्न भी खुद का घोषित किया होता तो किसी और की दया मेहरबानी का इंतज़ार नहीं रहता । व्यथा सुनाई तो सुनकर दार्शनिक दोस्त कहने लगे चिंता की बात नहीं है थोड़ा वक़्त बीतने दो फिर जैसे कभी फोन किसी किसी के पास था मगर समय बदला तो मोबाइल फोन क्या स्मार्ट फोन भिखारी तक के पास है । आपको याद है कभी गांव में पढ़ा लिखा कोई विरला हुआ करता था और खुद आप काला अक्षर भैंस बराबर थे लेकिन समय का खेल है कि आज हर खेल के मैदान में असली खेल आपका ही है । आपका नाम सफलता का दूसरा नाम है । कुछ साल पहले आपके पास साईकिल भी नहीं थी मगर आजकल हवाई जहाज़ पर चलते हैं टीवी चैनल पर धूम मची है । कोई मुनाफाखोरी करते नहीं कहते हैं और जितना धन अपने जमा किया है किस ने इतनी जल्दी किया है बताओ । चाहो तो किसी और देश से भी जुगाड़ किया जा सकता है समकक्ष कोई ईनाम मगर आपका स्वदेशी का भांडा फूट जाएगा । धैर्य से काम लो अबकी नहीं तो अगली बार सही पहले से इंतज़ाम कर लेना यूं ही किसी के भरोसे मत रहना । मगर लगता नहीं दार्शनिक जी की बात का कोई असर हुआ है । 
 
     कुछ सोच कर बोले नहीं मुझे नहीं मिला इसका अफ़सोस नहीं है जिसको मिला उसको कैसे मिला क्यों मिला इस का गिला है । भाई मैंने क्या दिया है देश को जो मुझे मिलता लेकिन जिनको मिला उनका कोई योगदान देश को ऐसा ख़ास हो तो बताओ । भारतरत्न को इतना आसान बना दिया तो कल हर कोई लिए फिरता दिखाई देगा । दुखती राग को छेड़ना उचित नहीं ये सोच दार्शनिक बात बदलने लगे । छोड़ो ये सब राजनीति की बातें हैं आपको तो राजनीति नहीं देश की जनता की चिंता है अभी तक काला धन भी मिला नहीं लोकपाल का कुछ नहीं हुआ अब कोई तो कदम उठाना होगा चुनाव आने को हैं । इक पल में कितने आसन बदल डाले खामोश रहकर कहा कुछ भी नहीं । हाथ में कभी काले धन वालों के नाम की लिस्ट हुआ करती थी आज सरकारी ईनाम पाने वालों की सूचि हाथ में है । जाने क्या बात है कि लाख कोई समझाता रहे इन धन दौलत ईनाम तमगे का मोह व्यर्थ है दिल है कि जितना मिलता है लालच बढ़ता जाता है और अपना ही विज्ञापन याद आने लगा है लालची लोगों ने मिलवाट कर देश को लूटने का काम किया है । भारतरत्न की शुद्धता को लेकर किसी ने विचार किया ही नहीं । सोना खरा खोटा परखने को मापदंड तय हैं तो रत्न जैसे मूलयवान चीज़ की कोई कसौटी होनी ज़रूरी है । पता तो लगाया जाये कौन खरा रत्न है और किस को सौ फीसदी शुद्ध रत्न समझा जाये । किसी शासक के दरबार में नवरत्न हुआ करते थे ऐसे गिनती बढ़ती गई तो भाव कम होता जाएगा हीरे जवाहरात रत्न सभी का । जिसको देखो हीरे की अंगूठी पहने फिरता है । ये बात उस दिन खत्म होगी जिस दिन उनकी झोली भी खाली नहीं होगी । इक भारतरत्न का सवाल है बाबा । 
 
 Sunela Ratna Citrine Gem Can Increase Wealth And Prosperity Know The  Benefits - इस रत्न को धारण करने से धन-संपत्ति में वृद्धि होने की है  मान्यता, जानिये धारण करने के नियम और

जनवरी 26, 2019

1006 साहित्य की दुनिया का चेहरा ( खरा सच ) डॉ लोक सेतिया ( पहला भाग )

     साहित्य की दुनिया का चेहरा ( खरा सच )  डॉ लोक सेतिया

                                         पहला भाग

       साहित्य की दुनिया का गगन बहुत फैला हुआ है , किताबों की दुनिया कविता कहानी ग़ज़ल से आगे भी इतिहास और समाज धर्म जीवनियां चालीसे लिखने तक जाने क्या क्या शामिल है। लिखने वाले फ़िल्मी बकवास बेसिर पैर की टीवी सीरियल की कहानी ही नहीं झूठे सच्चे इश्तिहार तक लिखने का काम करते हैं। और इस सब में उनका महत्व लिखने वालों से अधिक है जो छापने का काम करते हैं। जिनके लिए लिखना कमाई करने का इक साधन है और जो इसे कारोबार की तरह करते हैं उनकी बात अलग है मगर वास्तविक सृजन का कार्य करने वाले खुद को साहित्यकार कहने समझने वाले और साहित्य की सेवा का दम भरने वालों की सचाई खुद अपना चेहरा आईने में देखना है। अगर गली गली नेता बने लोग मिलते हैं और अख़बार टेलीविज़न को खबर भेजने वाले खुद को सतंभ कहने वाले रहते हैं तो हर गांव शहर में खुद को कलम का सिपाही बताने वाले भी बिना ढूंढे ही नज़र आते रहते हैं। मुझे साफ़ कहना है और ईमानदारी से स्वीकार करना है कि मैं भले लिखता रहता हूं करीब तीस चालीस साल से नियमित अख़बार मैगज़ीन ब्लॉग फेसबुक आदि पर भी और कविता ग़ज़ल कहानी व्यंग्य आलेख से जनहित की बात लिखने का काम किसी गुनहगार की तरह सरकार अधिकारियों और संस्थाओं को भेजने का किया है मगर अपने लेखन को लेकर कोई गलतफहमी मुझे नहीं रही है कि मैं बढ़िया लेखक भी हूं साहित्यकार होना तो बहुत दूर की बात है। मगर लिखना मेरा जूनून है और बिना इसके रहना मेरे लिए कठिन ही नहीं असंभव लगता है। कोई किताब नहीं छपी छपवाई अभी तक मगर मुमकिन है कभी छपवा लूं तब भी मुझे पता है जैसे अधिकांश लिखने वाले मानते हैं खुद को विलक्षण लिखने वाला मैं कभी नहीं सोच सकता क्योंकि मुझे हमेशा तमाम महान लेखकों को पढ़कर लगता है कि उनके लिखे हुए के सामने मेरा लिखा ज़रा भी ठहरता नहीं है। इक बात का दावा है कि जो लिखा अपने अनुभव से अपने शब्दों से अपने खुद के ढंग से ही लिखा है कभी किसी की नकल करना पसंद नहीं किया है। 
 
     फेसबुक पर देखता हूं हर दिन कोई अपनी किताब छपने की बात किसी ईनाम की बात कोई ख़िताब मिलने की बात बताता है। फेसबुक पर हर दिन इतना लिखा नज़र आता है कि जीवन भर पढ़ते रहो पढ़ना मुमकिन नहीं है। पढ़ता कौन है कहना कठिन है बिना पढ़े पसंद करने की रस्म निभाई जाती है इसे ही सोशल मीडिया की दोस्ती कहते हैं। फिर भी हर दिन किसी की फेसबुक पर पढ़ता हूं समझना चाहता हूं मगर इक पुराना अनुभव है इक दोस्त को कमियां बताने पर नाराज़गी का इस सीमा तक कि भाई साहब से तुम क्या कौन तक बात पहुंच गई। यकीन करें भलाई को राय देने की सज़ा अभी भी जारी है बेशक मिलते हैं हंस कर बात करते हैं दुनियादारी है। मगर कई दिन से इक बेचैनी सी थी इस विषय को लेकर कि क्या आजकल का लेखन किसी काम आता है कोई सार्थकता है इस सृजन में। समाज को बदलने आईना दिखाने को सफल है। लिखने का मकसद अगर ये नहीं किसी और मकसद से लिखा जाता है तो उसको क्या कह सकते हैं। खुद लिखना और अपने दायरे में सुनाना सुनना और इक दूसरे की तारीफ करना सामने महान लिखने वाला बताना मगर पीठ पीछे उसी को बकवास लिखा कहना जैसी बातें दिखाई देती हैं तब विचार आता है सच को सच कहना नहीं जानते जो उनसे सच लिखने की उम्मीद करना बेकार है। और जो दर्पण समाज को वास्तविक चेहरा नहीं दिखलाता हो उसको तोड़ना चाहिए या सजाना चाहिए। 
 
                     किसी का भी नाम लिए बिना समझ सकते हैं जो भी महान लिखने वाले हुए हैं चाहे किसी भी देश में किसी भी भाषा में लिखते थे उनका लेखन अमर और कालजयी बना तो इसलिए कि उस से इक संदेश मिलता है और उनकी कृतियां समय के साथ खोती नहीं हैं। आज जो लिख रहे हैं क्या बाद में उसकी कोई सार्थकता होगी उपयोगी समझा जाएगा। इक कसौटी पर खरा उतरना ज़रूरी है अन्यथा आपका लिखा समय और साधन की बर्बादी होगा। इक बेहद खेदजनक दशा ये भी है कि बेशक लोग लिख रहे हैं और छपते भी हैं मगर उनका नियमित लेखन भी उनकी आजीविका का साधन बन नहीं सका है। ये कहना कि लेखक के लिए पैसा कोई महत्व नहीं रखता और उसको अपनी बात अपने विचार व्यक्त करने से ही ख़ुशी और संतोष मिलता है वास्तविकता से नज़र चुराना है। क्या ये हैरानी की बात नहीं कि जो अख़बार मैगज़ीन वाले किताबें छापने का कारोबार करने लोग हैं उनकी रोटी रोज़ी इस काम से चलती है आराम से और साहित्य की सेवा करने का दम भरने के बावजूद लिखने वाले को नाम भर को अथवा कुछ भी नहीं देते हैं। क्या ये उचित है और जो लिखने वाला शोषण पर बेबाक लिखता है खुद शोषण का शिकार है मगर खामोश है। इस विषय पर लिखना अपराध है जो आपकी रचनाओं को छपने से रोक सकता है। मगर सच बोलने का साहस हर कीमत पर होना चाहिए। वीररस की बात लिखना और खुद वास्तव में कायरता से जीना तो खुद अपने लिखने को अपमानित करना है। 
 
                        ( बाकी बात भाग दो  में जारी है अभी लेख अधूरा है ) 
 
 
Sahitya Duniya / साहित्य दुनिया
 

जनवरी 24, 2019

POST : 1005 क्या शोध आयुर्वेदिक को लेकर ( असली-नकली ) डॉ लोक सेतिया

 क्या शोध आयुर्वेदिक को लेकर ( असली-नकली ) डॉ लोक सेतिया 

        दावा करते हैं हमने कई साल शोध किया और बर्तन धोने का आयुर्वेदिक साबुन बनाया। दंतमंजन बनाया टूथपेस्ट बनाई फेसवाश बनाया महिअलों को मरहम दी बनाकर चेहरे को खूबसूरत बनाने की। बिस्कुट तेल घी आटा से लेकर सब असली हमारा है और हमने किसानों से लेकर हर किसी तक को बहुत कुछ दिया है। टीवी चैनल को विज्ञापन देकर मालामाल किया है और मुनाफे का कारोबार नहीं करते फिर भी कितनी कमाई की है कोई हिसाब नहीं है। बाकी विषय की बात छोड़ देते हैं अभी एक ही विषय की चर्चा करते हैं। एक वही नहीं और भी तथाकथित गुरु जी है आर्ट ऑफ़ लिविंग वाले और कितनी कंपनियां नई पुरानी दावा करती हैं आयुर्वेद को बढ़ावा लाने का। आयुर्वेद जैसा माना जाता है कुदरत की दी हुई स्वस्थ रहने की जीने की विधि है और उपचार करने का कुदरती तरीका है। 
 
                   अपने शोध किया कहते हैं तो पहली बात कोई भी आयुर्वेदिक या किसी भी पद्धति में शोध करने की बात करेगा तो किस बात को लेकर। यकीनन रोग के उपचार को लेकर पुरानी दवा को और बेहतर बनाने को लेकर या कोई वास्तविक शोध किसी गंभीर रोग का ईलाज खोजने को लेकर। शोध कोई पहाड़ों पर घूमते हुए वीडियो बनाने से हाथ में हरी जड़ी बूटी पकड़ने से नहीं किया जाता है। जो विदेशी कंपनी भी कई साल से आयुर्वेद के नाम पर सामान बेचती है उसने भी भारत में पेटेंट नियम नहीं लागू होने का लाभ उठाया है और आयुर्वेद की किताबों से नुस्खे लेकर उपयोग किया है अपना कारोबार करने को। आयुर्वेद को इन सभी ने कोई नया योगदान नहीं दिया है और हर किसी ने आयुर्वेदिक किताब से जानकारी लेकर उत्पाद बनाकर केवल कमाई की है व्यौपार में मुनाफा बनाया है। बदले में आयुर्वेद को दिया कुछ भी नहीं बल्कि उसका भरोसा कम किया है और जनता को भटकाने का काम किया है क्योंकि किसी भी रोग का उपचार पहले शिक्षित वैद द्वारा जांच और निदान करने के बाद उसके बताये नुस्खे से ईलाज आदि से संभव है। मगर हर किसी ने बिना कोई चिकित्स्क की सलाह नीम हकीम बनकर उपचार की बात करने का अमानवीय अपराध किया है। खेद की बात है कि सरकार आयुर्वेद को बढ़ावा देने को बहुत कार्य करने की बात करती कहती है मगर आयुर्वेदिक उपचार इस तरह से कोई देश भर में करता है तो ऐसे लोगों पर कोई रोक नहीं लगाती है। गरीब की जोरू सबकी भाभी की मिसाल की तरह हर कोई उसके साथ छेड़खानी करता है। मगर इस का दोष आयुर्वेद की शिक्षा हासिल करने वालों और आयुर्वेदिक शिक्षा देने वालों पर भी है जो केवल दो हज़ार साल पुराने बताये ईलाज से आगे नया और आधुनिक समय के अनुकूल कोई शोध नया करने की बात सोचना ही नहीं चाहते हैं। बेशक किसी भी पद्धति को आगे बढ़ने को सरकार का सहयोग ज़रूरी होता है और जब एलोपैथी का बजट नब्बे फीसदी से भी अधिक और अन्य सभी आयुर्वेदिक यूनानी होमियोपैथी सिद्ध का दस फीसदी से कम होगा तो आयुर्वेद का ज़िंदा रहना भी कितना कठिन रहा है हम जानते हैं। आयुर्वेद के अपने बनकर लूटने वाले तमाम लोग हैं मगर वास्तव में आयुर्वेद का सगा कोई नहीं है। हालत ऐसी है जैसे अपनी ही संतान के साथ सौतेले जैसा बर्ताव किया जाता रहा है। काश आज़ादी के बाद आयुर्वेद पर शोध किया जाता और इसको बढ़ावा देकर विकसित किया जाता तो मुमकिन है आजकल जितने नये रोग उतपन्न हुए हैं नहीं हुए होते क्योंकि आयुर्वेदिक दवाओं से कोई रोग ठीक हो सकता है किसी दूसरे रोग को पैदा नहीं करता है आयुर्वेदिक उपचार।


जनवरी 23, 2019

POST : 1004 काला धन मिल गया है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      काला धन मिल गया है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       सही समय पर उसका पता चल गया है। जाने क्यों तमाम लोग चिंतित थे कि वो कहां गायब हो गया। किसी ने पिछले चुनाव के समय उसको खोज कर लाने का वादा किया था। तब समझा जा रहा था किसी और देश में जाकर छुप गया है। तमाम दुनिया को छान मारा फिर भी मिल नहीं सका था और लोग सवाल करने लगे थे इस बार चुनाव में कैसे जवाब देंगे जनाब। मगर मिला भी तो उस जगह जहां सब जानते थे फिर भी किसी को ख्याल ही नहीं आया कि उसका असली ठिकाना तो राजनीतिक दल ही हैं उनसे अधिक काला धन किसी और के पास होना संभव ही नहीं है। चिंता होने लगी थी चुनावी जंग बिना वास्तविक हथियार कैसे लड़ेंगे सभी दल वाले। हिसाब लगाया जा रहा है काला धन पहले किस दल की तिजोरी में अधिक था और अब किस दल के खज़ाने में ज़्यादा है। काले धन का धन्यवाद जो जब उसकी सबसे अधिक ज़रूरत थी खुद ही सामने चला आया है। देखा तो पूछना ही पड़ा कहां खो गया था भाई लोग जाने क्या क्या वहम करने लगे थे कि शायद तुम खत्म ही हो गये हो। हंस दिया काला धन , कहने लगा मुझे पता था ढूंढने वाले सभी लोग हर घर की तलाशी लेंगे मगर खुद अपने घर की कोई तलाशी नहीं लेगा। दल कोई भी हो और कितना भी विरोध आपस में भले हो भाईचारा कायम रखना सबको महत्वपूर्ण लगता है। कोई भी दल सत्ता में हो किसी भी दल को काले धन को लेकर कोई चिंता नहीं रहती है। आम जनता के माथे पर काला धन दाग़ की तरह होता है मगर राजनेताओं के चेहरे पर काले टीके जैसा नज़र लगने से बचाने को लगा प्यार की निशानी जैसा।
 
    जिनको भी काला धन मिलने पर हिस्सा पाने की ललक रही उनको भरोसा रखना होगा बस कुछ दिन बाकी हैं। चुनाव आयोग अदालत जांच करने वाले सब ख़ामोशी से काले धन को फिर से नाचता खेलता और सब को नचवाता नज़र आएगा चुनावी जंग उसी से लड़ी जीती हारी जाएगी। कोई भी जीते कोई भी हारे इक यही काला धन है जो विजयी रहेगा और जिसकी जयजयकार हमेशा की तरह होगी ही। काला धन गुनगुना रहा है हम काले हैं तो क्या हुआ दल वाले हैं हम इस दल उस दल दल दल वाले हैं। काला धन सीना चौड़ा कर छाती ठोक खुले आम कह रहा है कोई है माई का लाल जो बिना उसके चुनाव लड़ भी सकता है। ये सभी नेता तो अपने हाथ की उंगलियों पर नाचने वाली कठपुतलियां हैं असली जीत हमेशा मुझ काले धन की हुई है और होती रहेगी। मेरी सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है सरकारी अधिकारी से लेकर जाने माने तमाम लोग मेरे चाहने वाले हैं उनके घर दफ्तर मेरा बसेरा है। कोई लाख कोशिश कर ले काला रंग पक्का होता है जिस पर चढ़ता है उतरता नहीं है। राजनीति काजल की कोठरी है उस में कालिख लगती सभी को है मगर अपनी कालिख को दाग़ कोई नहीं मानता है सब उसको तिलक समझते हैं।
 
            हमने काला धन की बात जाकर टीवी चैनल वाले और अख़बार वाले को बताई और कहा आपको यकीन नहीं तो चलो मिलवा देते हैं। अचानक वही अट्टहास फिर सुनाई दिया और देखा जनाब वहां भी चले आये हैं , क्या साक्षात्कार देने को बुलाया है कह दिया। बोला हर दल जो भी विज्ञापन देता है मेरी बदौलत ही तो है मगर यहां आकर काला सफ़ेद का भेद बाकी नहीं रहता है रंगीन होते ही सभी रंग मिलने से चमक बढ़ जाती है। मीडिया वालों के पास काला धन होने की बात कोई नहीं कर सकता है क्योंकि फिर सुनाई कैसे देगी उसकी आवाज़। मीडिया के शोर में बाकी सभी की आवाज़ दब जाती है मार दी जाती है कुचल दी जाती है। जिस देश में हर धार्मिक स्थल दो नंबर के पैसे से दान लेकर या फिर किसी भी ढंग से ज़मीन मुफ्त में या नाम भर की सस्ती कीमत चुकाकर बनते हों उस जगह कोई खुदा कोई भगवान कोई देवी देवता चढ़ावे को काले सफ़ेद धन का होने की चिंता करता होगा। भूल गये नानक को खाने को रोटी किसी भी अमीर के घर से नहीं मिली थी और उन सभी को निचोड़ा तो खून निकला था दूध निकला था इक गरीब मज़दूर की घर की रोटी से ही। अब कोई नानक कोई कबीर जैसा संत है जो सब को खरी खरी सुनाता है। लिखने वाले तक भी आधा अधूरा सच लिखते हैं और इस तरह कि जब मर्ज़ी उसका अर्थ बदल कर समझा सकें। काला धन मिल भी गया है और अब उसका हौसला भी पहले से कई गुणा अधिक बढ़ा हुआ है। देखना आपके आस पास भी होगा खड़ा हुआ मस्ती में झूमता गाता शान से कदम रखता हुआ।

      काला धन वास्तव में काला कलूटा नहीं दिखाई देता है बस उसको किसी की नज़र नहीं लगे तभी नाम रख दिया है काला लगता बहुत प्यारा है श्याम सलोना है। काला धन पाकर कुछ नहीं खोना है गोरेपन का बेकार का रोना धोना है काला धन कोई जादू है कोई टोना है आपके पास सुरक्षित खरा सोना है। सच है काला धन बड़े काम आता है इंसान का घर नहीं बनता भगवान का मंदिर बन जाता है। सत्ता वालों का जितना फैला आसमान है किस्मत बलवान है गधा पहलवान है हुआ पूरा उनका हर इक अरमान है नहीं समझ सका इक वही नादान है काले धन से सारी शान है आखिर पैसा ही उनका भगवान है। सुनो साधो काले धन की कहानी है दूध कितना मिला कितना पानी लगे देखने याद आएगी नानी। सुनाई उसी ने अपनी कहानी कदर उसकी जिस किसी ने है जानी शराबी बोतल नशा झूमते लोग बहता हुआ खून बदलते रंग कितने लब्ज़ों के बदले हैं मानी। सिंहासन बनाया है सोने चांदी से है काले धन की सब मेहरबानी हर मुश्किल की है बड़ी आसानी। बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन , सूखा मचा रही है ये बारिश तो देखिए। दुष्यंत कुमार कहते हैं मगर कमर जलालवी फ़रमाते हैं , रहा बरसात में ऐ शैख़ मैं सूखा न तू सूखा , यहां तो जिस कदर बारिश
हुई उतना लहू सूखा। ये काले धन की झमझम बारिश उन पर हुई जिनके आलीशान दफ़्तर और महल जैसे घर बन गए गरीबों का लहू बहता रहा सूखता रहा है सत्ता के गलियारों में। खबर नहीं छपती है सच की झूठे सब अखबारों में आंसू आहें खो जाती हैं महफ़िल की झंकारों में।