Thursday, 7 May 2020

आसमान सुनता नहीं ज़मीं की सदा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  आसमान सुनता नहीं ज़मीं की सदा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  सरकार सोचती है भगवान सब ठीक करेगा मुझे कुछ भी करने की क्या ज़रूरत है। उधर आसमान पर बैठा भगवान समझता है जब सरकार बना ली है सभी ने अपनी अपनी तो वही खुद सब करेंगे। ये उलझन है कि दो घर का मेहमान भूखा रहता है। ये बात इक बार फिर से साबित हो गई कि ये महान देश सिर्फ भगवान भरोसे चलता रहा है। सरकार और भगवन दोनों भरोसा रखने को बनाये गए हैं और उसके किसी कदम पर कोई सवालिया निशान नहीं लगा सकते हैं। भगवान पर सवाल बहुत हैं सब अन्याय अत्याचार देखता है करता नहीं कुछ भी सरकार तो कभी चाहती ही नहीं कुछ भी करना उसके लिए सरकार होने का अर्थ ही यही है। जब से कोरोना आया है वास्तव में सरकार को कुछ भी सूझता ही नहीं है और उसने जो भी करना है लोगों को करने को कहा है तब इतना भी उसकी मेहरबानी और समझदारी और महानता है। कोई माने या नहीं माने आज भी भारत देश को कोई बचा सकता है तो वही ऊपर वाला , हम आप बच गए और बचे रहे तो समझना भगावन की दया है। मगर भूले से भी जिनको नहीं बचाया जा सका उसका दोष उसको मत देना। आसमान वाला ज़मीं वालों की फरियाद सुन सकता तो समझता उसने भी दुनिया को अपने हाल पर छोड़ नहीं दिया होता ।

      सरकार का भी हर कदम उठाया जनहित को गया जाता है मगर साबित जनहित के खिलाफ होता है। शासक को कभी भी कोई दोष नहीं होता है उसकी लाठी गोली भी न्याय कहलाती है और जनता का अपना बचाव करना भी दंगा हो जाता है भले जनता निर्दोष भी हो। कानून की लाठी अंधी होती है और न्याय की देवी सच देखना नहीं चाहती अपनी आंखें बंद रखती है। गंधारी अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर अपनी निष्ठा धृतराष्ट्र के लिए होने का सबूत देती है। सत्ताधारी लोग देश की जनता की बदहाली ऊपर से आकाश मार्ग से देखते हैं जैसे कोई तमाशा है। बदहाली का मंज़र भी आसमान से खूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है। सरकार भी भगवान भी देख का समझता है सब भला चंगा है। चाहे भगवान हो या सरकार हमको कभी तो उनकी हक़ीक़त को समझना होगा कि ये दोनों भरोसे पर खरे उतरते हैं भी या नहीं और जो बार बार भरोसे को तार तार करते हैं उनको बार बार आज़माना समझदारी नहीं है। 

     शासक बनते ही सभी को चाहत होती है अपने देश राज्य को छोड़ और सभी देशों में राज्यों में अपनी शोहरत का कीर्तिमान स्थापित किया जाए। और जो धन जन कल्याण को खर्च कर नागरिक को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाई जा सकती हैं उसे अपने नाम का शोर और गुणगान का डंका पीटने पर बर्बाद किया जाता है। हम नासमझ नहीं हैं जानते हैं देखते हैं गरीब भूखे बेघर हैं और सरकार नेता अधिकारी मौज मस्ती पर जमकर सरकारी खज़ाने को उपयोग करते हैं। जनता की ज़रूरत होने पर बजट का रोना धोना होता है सरकार को जब चाहे जितना धन जिस तरह भी छीन कर वसूल कर लेने को तरीके होते हैं। भगवान देवी देवताओं की कथा कहानियों में भी हर कोई खुद को ऊंचा बड़ा और शक्तिशाली साबित करने को ही लगे रहते थे। यही दशा नेताओं अधिकारियों की बढ़ती हुई हवस की लालसा चाहत की भी है। भगवान के मंदिर हों या फिर सरकारी विभाग आपको चढ़ावा बहुत देना होता है मिलता थोड़ा है भोग लगाने के नाम पर किसी और को ज़रूरत से अधिक मिलता है। मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे दौलतमंद हो जाते हैं सबको संचय नहीं करने का उपदेश देते। सरकार नेता भी अपने लिए करोड़ों खर्च कर जो चाहे खरीद लेते हैं।

   दुनिया में कोई देश किसी देश का दोस्त नहीं होता है दोस्ती देशों के शासक लोगों की होती है जिसकी कीमत जनता को चुकानी होती है। उनकी आपसी जंग भी इसी तरह होती है टकराव होने पर उनकी लड़ाई में भी जान जाती है जनता की। आपने कभी सांढों की लड़ाई देखी है दो सांढ लड़ते हैं बर्बाद उनके पैरों तले दबकर बूटे होते हैं या जो भी ढेर मिट्टी का हो या रेत का या कोई अनाज या कुछ भी उसको धूल में उड़ाकर जब तक जाते हैं तो अपनी अपनी राह चल देते हैं। जानवर से लोग डरते हैं मगर नेताओं अफसरों से बचते हैं क्योंकि ये कब कैसे आपको बर्बाद कर सकते हैं आप सोच भी नहीं सकते हैं। कुछ महीने पहले जो राजनेता गले मिल कर दोस्ती का दिखावा कर रहे थे आज समय बदला तो आरोप लगा रहे हैं तुमने मुझे बर्बाद किया है। सत्ता का घिनौना खेल सामने कुछ पर्दे के पीछे कुछ और चुपचाप करता है। अगर कोरोना चीन की लैब से निकला है तो उसकी पटकथा जाने कब की लिखी गई होगी। अब अगर हम हमारे शासक ये नहीं जान पाए समय पर तो दोष उनका है , आपको हर किसी की जानकारी लेनी आती है देश की जनता की मगर जिनकी दोस्ती या दोस्त बनकर दुश्मनी की खबर रखनी थी वही नहीं रख सके तो कसूर किसी और का नहीं है।  सार की बात इतनी है कि कोई भी शासक किसी भी शासक पर भरोसा नहीं कर सकता है हर कोई इसी अवसर की तलाश में रहता है कि जब कोई अटूट भरोसा करने लगे तभी उसको घात लगाकर घायल कर दो।

ये कलयुग है कलयुग में जिस पर भरोसा करो वही अपनी असलियत दिखलाता है। भगवान हो या सरकार अपने होने का एहसास करवाने को लोगों को नित नई परेशानी देते रहते हैं। जिस दिन हमने भगवान भरोसे रहना और सरकार भरोसे रहना छोड़ खुद अपने भरोसे जीना शुरू कर दिया हमारी तमाम समस्याएं अपने आप हल हो जाएंगी। मगर कुछ लोग हैं जो ऐसा होने नहीं देंगे और जिन्होंने हमें ये बात समझाई हमने उनकी सुनी मगर समझी नहीं कभी।

खुदी को कर बुलंद इतना के तकदीर से पहले , 

ख़ुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है। 

( अल्लामा इक़बाल )

जब तक मंदिर और मस्जिद हैं , 

मुश्किल में इंसान रहेगा।  

( गोपालदास नीरज )

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक , कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक। 

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन , ख़ाक हो जाएंगे हम तुम को खबर होने तक। 

( मिर्ज़ा ग़ालिब )

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