Saturday, 30 May 2020

बैरंग चिट्ठी आई है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      बैरंग चिट्ठी आई है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

           खत हवेली का फुटपाथ के नाम - गरीबों का मज़ाक

    ये जो बिगड़े रईस ज़ादे होते हैं कुछ भी करते हैं। अभी कल ही की बात तो है इक मां की लाश से नन्हा बच्चा खेल रहा था उसके ऊपर से चादर खींचता हुआ। बेचारा क्या समझता उसकी मां किस नींद में सोई है। ये जो हालात हैं कोई आजकल में नहीं बने हैं और इसके दोषी आज के शासक नहीं पहले के भी तमाम लोग हैं जिन्होंने गरीबों के नाम पर राजनीती की गरीब को दिया भीख मांगने का हक भी नहीं। कल उसके घर मातम था मगर यही बेदर्द लोग भीड़ बनकर अपनी अपनी अमानवीय राजनीति करने को चैक देने आये थे मीडिया के कैमरे साथ लाये थे।

आज बड़े सरकार ने खत भेजा है सभी देशवासियों को जिनमें ऐसे बदनसीब भी शामिल हैं जो जाने ज़िंदा भी हैं कि मर गए हैं। सरकार ने लिखा है उसने पिछले साल भर में बड़े बड़े कीर्तिमान स्थापित किये हैं। आपको कौन रोक सकता है जनाब आप मौज मस्ती जश्न मनाओ जनता के धन से देश विदेश जाओ। किसी को अपने देश में बुलाओ गरीबों से नमस्ते नमस्ते कहलवाओ और गरीबी को इक दीवार बनवा कर छुपाओ। पर जले पर नमक मत छिड़को मुर्दों को धर्म कथा मत सुनवाओ उनकी आत्मा की शांति के नाम पर उनकी रूहों को और मत तड़पाओ। कोई नहीं है इस देश में दर्दमंद गरीबों का जानते हैं ये बात अब ना समझाओ। गरीबों को आंसू बहाने दो आप अपनी बांसुरी अपने महल में बजाओ हमको मत सुनाओ। बहुत हुआ और मत सताओ।


मेरी ग़ज़ल से कुछ शेर :-

हमको ले डूबे ज़माने वाले ,
नाखुदा खुद को बताने वाले।

देश सेवा का लगाये तमगा ,
फिरते हैं देश को खाने वाले।



उनको फुटपाथ पे तो सोने दो ,
ये हैं महलों को बनाने वाले।

तूं कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं ,
मेरी अर्थी को उठाने वाले।
 
 
  आज आपको इक राज़ की बात बताता हूं जो कोई राज़ की बात है नहीं। मेरे लिखने की शुरआत चिट्ठियों से ही हुई है। कॉलेज के समय कॉलेज में ही डाकघर था जो कॉलेज से हॉस्टल जाते रास्ते में ही था और अगर कॉलेज की डॉक्टर की पढ़ाई की खातिर अस्पताल जो उसी परिसर में ही था को जाते तब भी राह उधर से जाती थी। कमरा नंबर बता कर डाकघर से अपनी चिट्ठी का पता चल जाता था और शायद महीने में कोई एक दिन होता था जब मेरा कोई खत नहीं आता और मैंने कोई खत नहीं लिख कर भेजा हो। लोग अक्सर मुहब्बत में लिखे खत की बात करते हैं मुझे अपने हर खत में मुहब्बत की खुशबू का एहसास होता था। बहुत साल तक सभी खत संभाल कर रखे थे न जाने कब कैसे कहीं खो गए। अपने खत हर किसी को नहीं पढ़ाए जा सकते हैं , कभी कबूतर पालते थे आशिक़ , कभी महबूबा डाकिया से लिखवाती थी खत और कभी कोई कासिद होता था खत ले जाता जवाब ले आता। सरकार को खुले खत भी बहुत भेजे हैं अब उसकी बात मत करना नहीं तो विषय छूट जाएगा। पहले मेरी कुछ कविताएं खत को लेकर हैं कुछ शेर भी हैं उनको पढ़ते हैं।

लिखे खत तुम्हारे नाम दोस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

लिखता रहा नाम तुम्हारे
हर दिन मैं खत 
अकेला था जब भी
और उदास था मेरा मन  
जब नहीं था कोई
जो सुनता मेरी बात
मैं लिखता रहा
बेनाम खत तुम्हारे नाम।

जानता नहीं 
नाम पता तुम्हारा
मालूम नहीं
रहते हो किस नगर की
किस गली में तुम दोस्त।

मगर सभी सुख दुःख अपने
खुशियां और परेशानियां
लिखता रहा सदा तुम्हीं को
तलाश भी करता रहा तुम्हें।

फिर आज दिल ने चाहा
तुमसे बात करना
और मैं लिख रहा हूं 
फिर ये खत नाम तुम्हारे।

सोचता हूं  शायद तुम भी
करते हो ऐसा ही मेरी तरह 
लिखते हो मेरे लिए खत
तुम भी यही सोच कर।

कि मिलेंगे हम अवश्य
कभी न कभी तो जीवन में
और पहचान लेंगे
इक दूजे को।

तुम तब पढ़ लेना मेरे ये
सभी खत नाम तुम्हारे 
और मुझे दे देना इनके
वो जवाब जो लिखते हो
तुम भी हर दिन सिर्फ मेरे लिये 
मेरे दोस्त। 
मुझे अभी भी उस दोस्त की तलाश है और उसको खत देने भी हैं उस से लेकर पढ़ने भी। खतों को लेकर मेरा पागलपन इतना ही नहीं और भी हैं खत आज खोलता हूं। 

मेरे खत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मेरे बाद मिलेंगे तुम्हें
मेरे ये खत मेज़ की दराज से
शायद हो जाओ पढ़ कर हैरान
मत होना लेकिन परेशान।

लिखे हैं किसके नाम 
सोचोगे बार बार तुम
मैं था सदा से सिर्फ तुम्हारा
पाओगे यही हर बार तुम।

हर खत को पढ़कर तुम तब
सुध बुध अपनी खोवोगे
करोगे मन ही मन मंथन
और जी भर के रोवोगे।

मैंने तुमको जीवन प्रयन्त
किया है टूट के प्यार
कर नहीं सका कभी भी
चाह कर भी मैं इज़हार।

कर लेना तुम विश्वास तब
मेरे इस प्यार का तुम
किया उम्र भर जो मैंने
उस इंतज़ार का तुम।  
शायद अब आपको ख़त किसे कहते हैं महसूस हुआ अवश्य होगा। खत स्याही से कम अश्कों से ज़्यादा और लहू से भी लिखे जाते थे। अब कहां वो ज़माना वो भावनाएं वो लोग वो दिल के जज़्बात। तब नाकाम मुहब्बत भी आशिक़ महबूब या महबूबा के खत दुनिया से छिपाकर रखते थे उसकी रुसवाई नहीं होने देते थे। 

कुछ शेर भी अर्ज़ हैं मेरे लिखे खत को लेकर :-

उसको लिखेंगे ख़त कभी दिल खोल के हम भी ,
हम हो गये तेरे लिये बदनाम लिखेंगे।
ऐसा इक बार नहीं , हुआ सौ बार ,
खुद ही भेजे ख़त पाये हमने। 

      आज किसी का खत खुले आम पढ़ा सुनाया जा रहा था लगता है मन की बात करते करते उकता गए हैं। मुझे याद आया इक दोस्त कभी मुझसे अपनी महबूबा को भेजने को खत लिखवाने आया था। मैंने उसकी थोड़ी मदद की थी लेकिन ताकीद भी की थी हर किसी को अपना खत मत दिखाना देवर फिल्म में यही हुआ था दोस्त को भेजा था अपने लये जिसे देखने दोस्त खुद उसी पर फ़िदा हो गया था। मुझे क्या खबर थी कभी इश्क़ में रकीबों को कासिद बनाते नहीं , खता हो गई मुझसे क़ासिद मेरे तेरे हाथ पैगाम क्यों दे दिया। बहारों ने मेरा चमन लूटकर। फूल तुझे भेजा है खत में फूल नहीं मेरा दिल है। ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर कि तुम नाराज़ न होना। चिट्ठी आई है , लिखे जो खत तुझे , चिट्ठी न कोई संदेश। आख़िरी खत फिल्म भी थी , बहारो मेरा जीवन भी संवारो। हमने सनम को खत लिखा। खत लिख दे सांवरिया के नाम बाबू कोरे कागज़ पे लिख दे सलाम बाबू। तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे। कहां तक बताएं क्या क्या गिनवाएं खत क्या होते हैं कमबख़्त मोबाइल ने चिट्ठियों का लुत्फ़ ही खत्म कर दिया। किसी की ग़ज़ल है एक आंसू कोरे कागज़ पर गिरा और अधूरा खत मुकम्मल हो गया। सच कहूं ये अंजाम देख कर समझ नहीं आया रोया जाये या हंसा जाये। खत बड़ी नाज़ुक चीज़ होती है अल्फ़ाज़ परखता रहता है आवाज़ भी मेरी तोल कभी। खुशबू की ज़ुबां में बोल कभी फूलों की तरह लब खोल कभी। ये खत लिखना मन की बात करना ये हम दिल वालों की विरासत है इसको अपनी सत्ता की राजनीति का माध्यम मत बनाओ। मगर आपका निज़ाम है नहीं मानोगे मगर वो खत क्या जो हाथ में पकड़ आंखों से पढ़ दिल से महसूस कर उसका जवाब देने को मज़बूर नहीं कर सके। हमने भी भेजे हैं सैंकड़ों नहीं हज़ारों खत डाक से ईमेल से किसी का भी कोई जवाब नहीं आया। बैरंग लौट आये हमने जितने भी खत भेजे उनको सभी को।

   ये चिट्ठी कैसी है जिस में जिसको लिख कर भेजी उसका हाल चाल नहीं पूछा ये सोच लिया सरकार में सब राज़ी ख़ुशी हैं तो जनता भी राज़ी ख़ुशी से रह रही होगी। मालूम नहीं कहां से ये तहज़ीब सीखी है जनाब ने कोई हाल ए दिल बताया पूछा नहीं बस खुद ही अपना यशोगान गुणगान महिमा का बखान किया। अपने मुंह मियां मिट्ठू बन गए ये भी नहीं सोचा होगी आपकी सरकार की वर्षगांठ जनता की हालत इस से बदतर कभी नहीं थी। अमावस की रात को चांदनी रात बताकर ये प्यार मुहब्बत की मीठी बातें करने का सही समय नहीं है जब लोग केवल घर में कैद नहीं हैं मौत से आमना सामना करते कोरोना से ज़िंदगी को छीन कर जीने का जतन कर रहे हैं। और आप ख़ैरख़्वाह हैं जो समझते हैं नमक ही ठीक रहेगा जले कटे के लिए। ये आर पी महरिष जी का शेर है " ये ख़ैरख़्वाह ज़माने ने तय किया आखिर , नमक ही ठीक रहेगा जले कटे के लिए। लोग कोई वक़्त था , डाकघर से लोग जवाबी पोस्टकार्ड लेकर भेजते थे जिस पर अपना पता लिखा पोस्टकार्ड सलंग्न रहता था। ताकि खत मिलने पर जवाब भी ज़रूर देना है ताकीद रहे।

   कही मैं उसका पता भूल ना जाऊं राशिद ,  मुझको लिखता है वो हर बार जवाबी काग़ज़।



     मगर आपको जवाब पसंद नहीं आएगा इसलिए आपने ये एकतरफा संवाद का तरीका ढूंढ लिया है। मन की बात कहते हैं दर्द की दास्तां हमारी नहीं सुनते। चिट्ठी भी अपने भेजी मिली नहीं खबर इश्तिहार बन गई और आपका पता सबको पता है ये भी पता है कुछ भी लिख भेजो कौन पढ़ता है आपने अपनी बात लिखी या लिखवाई और सुनाई भी सुनवाई भी। लेकिन लोग आपको नहीं बता सकते उनकी भी कोई बात है। मेरे इक दोस्त ज़रूरी खत भेजना होता था तो बैरंग भेजते थे जिस पर कोई टिकट नहीं लगाते थे मगर जिसको मिलता उसको दुगनी कीमत देनी होती थी। गरीबी में आटा गीला कहावत है अब आपका खत है बैरंग है मिला है लेना भी ज़रूरी है। इतनी बेदर्दी भी अच्छी नहीं। आज कहा सो कहा अब ऐसा सितम मत करना ये तो इक फ़रमान है इसको चिट्ठी नाम मत देना फिर कभी। खत चिट्ठी बड़े कोमल एहसास होते हैं जिनमें उनका नाम है बदनाम नहीं करना। कभी मिली थी कोई चिट्ठी आपको लिखा हुआ था चिट्ठी नहीं तार समझना , टेलीग्राफ को तार कहते थे। थोड़े लिखे को बहुत समझना घर जल्दी वापस आ जाना। मिली क्या कभी लगता है आपको नहीं खबर चिट्ठी का असर मुझे याद है इक घटना पर छोडो इक ग़ज़ल जो ऐसे गलत पता देने वाले आशिक़ को लेकर है।



  







1 comment:

Sanjaytanha said...

बहुत सही लिखा है