Sunday, 24 May 2020

ताकि सनद रहे को-रो-ना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     ताकि सनद रहे को-रो-ना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

अभी आपको न अपना महत्व पता है न इस कालखंड के महत्व को लेकर कुछ भी सोचा होगा। मगर आने वाले पचास सालों के बाद जब हम में से बहुत लोग नहीं होंगे तब शायद इक दिन कोरोना के नाम किया जाना संभव है। तब इतिहासकार कथाकार कविता ग़ज़ल लिखने वाले जब लॉक डाउन की चर्चा करेंगे तब ये भी लिखा जाएगा कितनी बार देश की जनता को अपने घर में बंद रहने को कहा गया था। जिनको घर में नज़रबंद होने का अनुभव नहीं क्योंकि इस से पहले ख़ास लोगों को ही उनके घर में कैद रहने की सज़ा मिलती थी उनको समझ आएगा बंधन बंधन ही होता है। आज़ादी से पहले विदेशी सरकार भी अनगिनत लोगों को कैद में डालती थी और उन के नाम दर्ज हैं इतिहास के पन्नों में। आपात्काल में जिनको जेल हुई बाद में उनको ईनामात भी मिले और सत्ता की भागीदारी भी। ऐसा भी हुआ कि 35 - 40 साल बाद किसी ने सत्ता मिलने के बाद जो भी उनके साथ जेल में थे उनको पेंशन देने का काम भी किया। कहते हैं कुछ लोगों ने आज़ादी से पहले किसी और जुर्म में कैद की सज़ा पाई थी मगर दस्तावेज़ बनवा कर कितने साल सरकार से पेंशन और सुविधाएं हासिल करते रहे ये घोषणा कर के कि उनको आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने के कारण सज़ा मिली थी। असली लोग रह गए उनको बदले में कुछ भी मांगना अच्छा नहीं लगा और समझदार या चतुर लोग बहती गंगा में डुबकियां लगाते रहे। आप के बाद आपके वारिस भी हकदार हो सकते है इसलिए आपको अभी इक शपथपत्र पंजीकृत करवा या नोटरी से सत्यापित करवा रख देना चाहिए ताकि समय और ज़रूरत पर काम आये , ऐसे दस्तावेज़ के आखिर में यही शब्द लिखने ज़रूरी हैं कि ये लिख दिया है ताकि सनद रहे। आप को-रो-ना कालखंड के साक्षी हैं आपका नाम दर्ज होना ज़रूरी है।

  अब मुद्दे की बात करते हैं सोचो क्योंकि सोचने पर कोई रोक नहीं है आप को घर से निकलने पर समय की और कितनी तरह की पाबंदी लगाई जा सकती हैं सरकार आपको सोचने से नहीं रोक सकती है। हालांकि हर सरकार की मंशा यही होती है कि लोग कुछ भी सोचें विचारें नहीं। फिर भी सरकार कुछ भी कर ले चाहे आपको सोचना भी मना हो तब भी आपने सोचा या नहीं सरकार नहीं साबित कर सकती है। सरकार चाहती है आप कोरोना को लेकर जितना मर्ज़ी सोचो मगर सरकार का आदेश क्या है क्यों है क्या सही है क्या सही नहीं है बिल्कुल भी नहीं सोचो। हां मुझे आपको कहना है कि सोचो , कभी दस बीस तीस साल बाद कोई शासक या कोई अदालत आदेश जारी कर सकती है कि कोरोना के समय में जिन जिनको अनावश्यक परेशानी हुई घर में बंद रहना पड़ा उनको कोई मुआवज़ा मिलना चाहिए। आपको साबित करना पड़ सकता है कि आप कितने दिन किस जगह बंद रहे थे। जो मज़दूर मीलों पैदल चलकर अपने घरों को वापस गये उनको भी सरकार को हर्ज़ाना भरना पड़ेगा। सरकार ने बाकयदा घोषित किया है कि हम सभी कोरोना से जंग लड़ रहे हैं अब भले आपको कोरोना को हराने को घर में बंद रहना पड़ा है आपने भी लड़ाई में किसी सैनिक की तरह भागीदारी निभाई है और कभी आपको भी पेंशन पाने का हक मिल सकता है। इतना ही नहीं जो लोग कोरोना रोग से पीड़ित होने के बाद ठीक हुए कोरोना को हराने का श्रेय उनको अवश्य मिलना चाहिए और उनको इस साहस पूर्ण कार्य के लिए मुमकिन है ईनाम पुरुस्कार के साथ कोई सांसद या विधायक बनने की योग्यता समझा जाये। आपकी जानकारी के लिए आज ऐसे कितने लोग सत्ता के बड़े पदों पर इसी योग्यता के कारण हैं कि उनको 19 महीने जेल या घर में नज़रबंद रहना पड़ा था। किसी किसी को लेकर संशय भी है कि जब वो जेल में थे या कहीं छुपे हुए थे तब उन्होंने असंभव को संभव कैसे किया था।

आप को दिखाने को मेरे पास कोई सबूत नहीं है कोई दस्तावेज़ नहीं है कि मैंने इमरजेंसी में भी खुलकर निडरता से सच लिखने का साहस किया था। मेरे पास आकर जो लोग छुपकर रहे आज सत्ता में हैं मगर उनकी तरह मैंने किसी संगठन से राजनीतिक दल से रिश्ता नहीं रखा था। हां जो आजकल शासक हैं मुझे समझाते थे सच मत कहा करो कोई सरकार को जानकारी देकर पकड़वा देगा। ऐसा कुछ तो नहीं हुआ मगर फिर भी जनहित की बात लिखने पर पुलिस थाने जाना पड़ा था सफाई देने को नहीं वास्तविकता समझाने को। खैर उन दिनों सरकारी अधिकारी भी असलियत को जानकर आदर सहित और अपनी भूल की क्षमा मांग कर बात को खत्म कर देते थे। अख़बार में लिखने को अपराध नहीं समझते थे। जैसे आज़ादी की जंग में जेल जाने वालों ने बदले में कुछ पाना नहीं चाहा था मैंने भी चालीस साल से अधिक नियमित लेखन के बदले कोई नाम शोहरत या कोई और विशेषाधिकार नहीं चाहा है। कुछ अख़बार में कॉलम लिखने वाले बाद में अपने काम को सीढ़ी बनाकर बहुत ऊंचे पहुंचे भी थे। आपको ये ध्यान दिलवा रहा हूं कि मेरी तरह नासमझी मत करना अपने आधार कार्ड पैन नंबर कार्ड की तरह इक दस्तावेज़ बनवा लेना इस को साबित करने को कि हम भी कोरोना के रोगी नहीं थे मगर कोरोना के नाम पर सज़ा पाई बंधन में रहे या अकारण आपकी आज़ादी और मौलिक अधिकार छीने गए। आजकल जो सत्तासीन हैं उनकी यही शिकायत है इमरजेंसी में सबके मौलिक अधिकार छीन लिए थे शासन करने वाले ने। तब उनके इस कदम को भी अनुशासन पर्व नाम दिया था संत विनोबा भावे जी ने। क्या पता उसी तरह आज जिस कदम को अच्छा और ज़रूरी घोषित किया जा रहा है और उचित मानते हैं इस कालखंड के बीतने के बाद उल्टा समझा जाये और जिनको भी आज़ादी से वंचित होना पड़ा उनको मुआवज़ा या पेंशन मिलने का निर्णय हो।

मगर जब ऐसा हो तब आपको इक बात याद रखनी चाहिए कि ये सलाह किसी ज्योतिषी ने या वकील ने आपको नहीं दी थी इस लेखक ने आपको चेताया था कि लिख कर रखना ताकि सनद रहे। नहीं नहीं मुझे कोई कमीशन नहीं चाहिए बस दिल से धन्यवाद करना और ये भी सोचना मेरी रचना कितनी काम की और सार्थक होती थी जिसे कभी आपने फालतू समझने की गलती की हो।

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