Thursday, 28 May 2020

अब लगे टूटने सब भरम आपके ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अब लगे टूटने सब भरम आपके ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

अब लगे टूटने सब भरम आपके 
क्या करम आपके क्या थे ग़म आपके। 

वक़्त ने आपकी पोल सब खोल दी 
कितने झूठे थे सारे वहम आपके। 

अब मसीहा नहीं मानते लोग भी 
काम आये नहीं पेचो-खम आपके। 

सोचना एक दिन ओ अमीरे-शहर 
लोग सहते रहे क्यों अलम आपके। 

कब निभाई किसी से वफ़ा आपने 
आप किसके हुए कौन हम आपके। 

ज़हर देते रहे सबको कहकर दवा 
ख़त्म होंगे कभी क्या सितम आपके। 

खून की बारिशें जिसमें "तनहा" हुईं 
लोग देखा करेंगे हरम आपके।

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