Monday, 30 July 2012

एक पत्नी ने बनवाया नया इक ताज ( कविता ) 13 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

बनवाया होगा ,
किसी बादशाह ने ,
अपनी मुमताज के नाम ,
कोई ताजमहल ,
मुझे नहीं है ,
उसे देखने की ,
कोई चाहत !
मगर चाहता हूँ ,
किसी दिन मैं ,
जा कर देख आऊं
उस ,
ह्युम्निटी हस्पताल को ,
जिसे बनवाया है
एक मज़दूर की पत्नी ने ,
पति की याद में ,
पति के बिना इलाज ,
मरने के बाद !
अपने बेटे को ,
अनाथालय में भेजकर ,
की तपस्या ,
अपने सपने को ,
पूरा करने की ,
डॉक्टर बनाया उसको ,
ऐसा अस्पताल ,
बनाने के लिए  !
ताकि अब और ,
किसी गरीब को ,
पैसा पास न होने के कारण ,
कोई कर न सके ,
इलाज से इनकार!!

Thursday, 26 July 2012

ग़ज़ल 1 3 ( हमको ले डूबे ज़माने वाले ) लोकप्रिय रचना

हमको ले डूबे ज़माने वाले ,
नाखुदा खुद को बताने वाले !
देश सेवा का लगाये तमगा ,
फिरते हैं देश को खाने वाले !
ज़ालिमों चाहो तो सर कर दो कलम ,
हम न सर अपना झुकाने वाले !
उनको फुटपाथ पे तो सोने दो ,
ये हैं महलों को बनाने वाले  !
तूं कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं ,
मेरी अर्थी को उठाने वाले  !
तेरी हर चाल से वाकिफ़ था मैं ,
मुझको हर बार हराने वाले  !
मैं तो आइना हूँ बच के रहना ,
अपनी सूरत को छुपाने वाले  !

ग़ज़ल 0 6 ( ख़ुदकुशी आज कर गया कोई )

ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ,
ज़िंदगी तुझ से डर गया कोई !
तेज़ झोंकों में रेत के घर सा ,
ग़म का मारा बिखर गया कोई !
न मिला कोई दर तो मज़बूरन ,
मौत के द्वार पर गया कोई  !
खूब उजाड़ा ज़माने भर ने मगर ,
फिर से खुद ही संवर गया कोई  !
ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है ,
उसपे इल्ज़ाम धर गया कोई  !
और गहराई शाम ए तन्हाई ,
मुझको तनहा यूँ कर गया कोई !
है कोई अपनी कब्र खुद ही "लोक" ,
जीते जी कब से मर गया कोई  ! 

Tuesday, 24 July 2012

ग़ज़ल 1 5 0 ( रहें खामोश जब तक सब कहा जाता शराफत है )

रहें खामोश जब तक सब कहा जाता शराफत है ,
कभी जब बोलता कोई उसे कहते बगावत है  !
खुदा देता नहीं क्योंकर सभी को सब बराबर है ,
कभी खुद देखता आकर किसे कितनी ज़रूरत है !
नहीं उनकी खता कोई हुई जिनको मुहब्बत है ,
कभी पूछो ज़माने से , उसे कैसी अदावत है  !
यहीं सब छोड़ना होगा सभी कुछ जोड़ने वाले ,
न जाने नाम पर किसके लिखी तुमने वसीयत है  !
मिटा डाला सभी ने खुद कभी का नाम तक उसका ,
मुहब्बत मांगते सब लोग कब मिलती मुहब्बत है  !
किसे फुर्सत यहाँ सोचे वतन कैसे बचेगा अब ,
सभी कुछ है उन्हीं का अब सियासत बस तिजारत है !
हसीनों की अदाओं को कहाँ समझा कभी कोई ,
दिखाना भी छुपाना भी यही उनकी नज़ाकत है  !
नहीं हिन्दू यहाँ कोई नहीं मुस्लिम यहाँ कोई ,
यहाँ होती धर्म के नाम पर केवल सियासत है  !
पिलाते और पीते हैं बड़े ही शौक से "तनहा" ,
जिसे जीना वो कहते हैं वही शायद कयामत है  !

Monday, 23 July 2012

ग़ज़ल 1 4 9 ( नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई )

नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई  ,
है अपनी जेब तक खाली कहीं पर घर नहीं कोई  !
चले थे सोच कर कोई हमें उसका पता देगा  ,
यहाँ पूछा वहां ढूँढा मिला दिलबर नहीं कोई   !
बताना हुस्न वालों को जिन्हें चाहत है सजने की ,
मुहब्बत से हसीं अब तक बना जेवर नहीं कोई  !
ग़ज़ल की बात करते हैं ज़माने में कई लेकिन ,
हमें कहना सिखा देता मिला शायर नहीं कोई  !
हमें सब लोग कहते थे कभी हमको बुलाना तुम ,
ज़रूरत में पुकारा जब मिला आ कर नहीं कोई  !
कहीं मंदिर बना देखा कहीं मस्जिद बनी देखी ,
कहाँ इन्सान सब जाएँ कहीं पर दर नहीं कोई  !
वहां करवट बदलते रात भर महलों में कुछ "तनहा"
यहाँ कुछ लोग सोये हैं जहाँ बिस्तर नहीं कोई  !

Tuesday, 10 July 2012

हाँ किया प्यार मैंने ( कविता ) 12 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

किया तो होगा ,
तुमने भी ,
कभी न कभी ,
किसी न किसी से प्यार !
धड़कता होगा ,
तुम्हारा दिल भी ,
देख कर किसी को ,
मुमकिन है ,
कर दिया हो तुमने ,
इज़हार मोहब्बत का ,
अथवा हो सकता है ,
रख ली हो ,
दिल की बात दिल में ,
समाज के डर से ,
या इनकार के  डर से !
मगर मैं जानती हूँ ,
ऐसा हुआ होगा ,
ज़रूर जीवन में एक बार ,
स्वाभाविक है ये ,
सभी को हो ही जाता है ,
एहसास प्रेम का !
आज जब मैंने ,
कर लिया ,
प्यार का एहसास ,
और कर दिया ,
परिणय निवेदन ,
करना चाहा ,
स्वयं को समर्पित ,
उसे जिसे चाहा ,
मेरे मन ने ,
तो क्यों ,
मान लिया गया ,
एक अपराध उसे !
क्यों दे दिया गया ,
मेरे पवित्र प्रेम की ,
भावना को ,
चरित्रहीनता का नाम!
क्या इसलिये ,
कि देना नहीं चाहता ,
पुरुष समाज ,
नारी को कभी भी ,
अधिकार चुनने का ,
पहल करने का ,
अधिकार नहीं है ,
औरत को ,
हर पुरुष चाहता है ,
नारी से मूक स्वीकृति ,
अथवा अधिक से अधिक ,
इनकार ,
वह भी शायद ,
क्षमा याचना के साथ !

चुभन ( कविता ) 11 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

धरती ने ,
अंकुरित किया ,
बड़े प्यार से उसे ,
किया प्रस्फुटित ,
अपना सीना चीर कर ,
बन गया धीरे धीरे ,
हरा भरा पौधा ,
उस नन्हें बीज से !
फसल पकने पर ,
ले गया काट कर ,
बन कर स्वामी ,
डाला था जिसने बीज ,
धरती में ,
और धरती को मिलीं ,
मात्र कुछ जडें ,
चुभती हुई सी !
अपनी कोख में ,
हर संतान को ,
पाला माँ ने , 
मगर मिला उन्हें सदा ,
पिता का ही नाम ,
जो समझता रहा खुद को ,
परिवार का मुखिया ,
घर का मालिक !
और हर माँ ,
सहती रही ,
कटी हुई जड़ों की ,
चुभन के  दर्द को ,
जीवन पर्यन्त !

है अधूरी कहानी ( कविता ) 10 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

ज़िंदगी  नहीं है ,
कागज़ पे लिखी ,
पर्दे पर दिखाई गई , 
कोई पटकथा ,
जिसे ले जाता है ,
मनचाहे अंत तक ,
लिखने वाला लेखक , 
भटकने नहीं देता ,
कहानी के पात्रों को ,
बचाये रखता है ,
अपने पात्रों के ,
वास्तविक चरित्र को ,
संबल बन कर !
छोड़ दिया है शायद ,
अकेला और बेसहारा ,
विधाता ने ,
जीवन में हर पात्र को !
भटक जाती है ज़िंदगी ,
धूप - छावं में,
अनजान पथ पर चलते हुए ,
बार बार  !
जाने कब ,
कहाँ कैसे ,
भटक जाते हैं ,
सभी पात्र ,
सही मार्ग से जीवन में ,
सभी करते रह जाते हैं प्रयास  ,
कहानी को ,
उचित परिणिति तक ,
ले जाने का ,
मगर आज तक ,
पहुंचा नहीं पाया कोई भी ,
पूर्णता तक उसको !
रह गयी है अधूरी ,
सब के जीवन की ,
वास्तविक कहानी ,
त्रिशंकु बन कर ,
रह गये  हैं ,
जीवन में तमाम लोग ! 

Sunday, 8 July 2012

ग़ज़ल 3 ( हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा )

हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा ,
दुःख दर्द भरी लहरों में साहिल नहीं समझा !
दुनिया ने दिये  ज़ख्म हज़ार आपने लेकिन ,
घायल नहीं समझा हमें बिसमिल नहीं समझा !
हम उसके मुकाबिल थे मगर जान के उसने ,
महफ़िल में हमें अपने मुकाबिल नहीं समझा  !
खेला तो खिलोनों की तरह उसको सभी ने ,
अफ़सोस किसी ने भी उसे दिल नहीं समझा  !
हमको है शिकायत कि हमें आँख में तुमने ,
काजल सा बसाने के भी काबिल नहीं समझा !
घायल किया पायल ने तो झूमर ने किया क़त्ल ,
वो कौन है जिसने तुझे कातिल नहीं समझा  !
उठवा के रहे "लोक" को तुम दर से जो अपने ,
पागल उसे समझा किये साईल नहीं समझा  !  

ग़ज़ल - 2 ( नया दोस्त कोई बनाने चले हो ) मेरी पसंद - डॉ लोक सेतिया

नया दोस्त कोई बनाने चले हो ,
फिर इक ज़ख्म सीने पे खाने चले हो  !
न टकरा के टूटे कहीं शीशा ए दिल ,
ये पत्थर को क्यों तुम मनाने चले हो !
उसी शाख पर जिसपे बिजली गिरी थी ,
नया आशियाँ क्यों बसाने चले हो !
यकीं कर के मौजों पे अपना सफीना ,
कहाँ बीच मझधार लाने चले हो !
छिपे हैं गुलों में हजारों ही कांटे ,
कि जिनसे घर अपना सजाने चले हो !
सितमगर हैं नश्तर से वो काम लेंगे ,
जिन्हें दागे-दिल तुम दिखाने चले हो  !
ये हंसने हंसाने की तुम चाह लेकर ,
कहाँ आज आँसू बहाने चले हो  !

ग़ज़ल 1 4 3 ( बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते ) डॉ लोक सेतिया

बिका ज़मीर कितने में ,हिसाब क्यों नहीं देते ,
सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते  !
किसी ने घर जलाया था , उसी से जा के ये पूछा ,
जला के घर हमारा आप आब क्यों नहीं देते  !
सभी यहाँ बराबर हैं सभी से प्यार करना तुम ,
सबक लिखा हुआ जिसमें किताब क्यों नहीं देते  !
छुपा नहीं छुपाने से हुस्न कभी भी दुनिया से ,
हसीं सभी हटा अपना हिजाब क्यों नहीं देते  !
नहीं भुला सके हम खाव्ब जो कभी सजाये थे ,
हमें वही सुहाने फिर से ख्वाब क्यों नहीं देते  !
इश्क यहाँ सभी करते , नहीं बचा कभी कोई ,
न बच सका किसी का दिल जनाब क्यों नहीं देते !
यही तो मांगते सब हैं हमें भी कुछ उजाला दो ,
नहीं कहा किसी ने आफताब क्यों नहीं देते  !
अभी तो प्यार का मौसम है और रुत सुहानी है ,
कभी किसी हसीना को गुलाब क्यों नहीं देते  !
उन्हें अभी बता देना यही गिला है "तनहा" को ,
हमें कभी सभी अपने अज़ाब क्यों नहीं देते  !

अलविदा ( कविता ) 0 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

तुम जा रहे हो ,
आज ,
छुड़ा कर मुझसे हाथ ,
भुला कर उम्र भर ,
साथ देने का वादा ,
जब मिल गया है ,
तुम्हें किनारा ।
चलो अच्छा हुआ ,
मिल गया तुम्हें  ,
कोई तो ऐसा
जो कर सके ,
पूरे तुम्हारे सपने  !
चाहा तो मैंने भी ,
यही था सदा ,
मगर कर न पाया कभी ,
मुझे और क्या चाहिये ,
तुम्हारी ख़ुशी से  बढ़कर ,
मैं जूझता रहा ,
तेज़ हवओं से ,
लड़ता रहा तूफानों से ,
नहीं डरा कभी ,
किसी भी भंवर से ,
समझा था मैंने सदा तुम्हें ,
अपनी  मंज़िल भी ,
किनारा भी ,
मैं खड़ा हूं  ,
वहीं उसी  कश्ती पर ,
थामे पतवार ,
बन के माझी ,
और देख रहा हूं  तुम्हें ,
आंसू लिये  ,
पलकों पर अपनी ,
कदम - कदम दूर जाते हुए ,
हाथ हिलाते हुए  !!

Saturday, 7 July 2012

मन की बात ( कविता ) 0 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

देख कर किसी को ,
बढ़ गई ,
दिल की धड़कन ,
समा गया कोई ,
मन की गहराईओं में ,
किसी की ,
मधुर कल्पनाओं में ,
खोए  रहे रात दिन ,
जागते रहे ,
किसी की यादों में ,
रात - रात भर ,
करते रहे सपनों में ,
उनसे मुलाकातें ,
चाहा कि बना लें उन्हें ,
साथी उम्र भर के लिए ,
हर बार रह गया मगर ,
फासला ,
कुछ क़दमों का ,
हमारे बीच ,
उनकी नज़रें ,
करती रहीं इंतज़ार , 
खामोश सवाल के ,
जवाब का ,
पर हम ,
साहस न कर सके ,
प्यार का इज़हार ,
करने का कभी ,
लबों पे ला न पाए ,
दिल की बात हम!!
                                                       

उमंग यौवन की ( कविता ) 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

उमंग यौवन  की ( कविता )
ये मस्ती ,
ये अल्हड़पन ,
ये झूम के चलना ,
ये हर पल गुनगुनाना ,
ये सतरंगी सपने बुनना ,
ये हवाओं संग उड़ना ,
ये भीनी भीनी खुशबु ,
ये बहारों का मौसम ,
ये सब है तुम्हारा आज ,
ओर है सारा जहाँ तुम्हारा।
जी भर के जी लो ,
आज तुम इनको ,
कुछ ऐसे कि ,
याद रह जाए उम्र भर ,
इनका मधुर एहसास ,
यौवन में ,
कदम रखता हुआ ,
अठाहरवां साल है ये  !!

नाट्यशाला ( कविता ) 0 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

                                                     नाट्यशाला ( कविता )
मैंने देखे हैं
कितने ही ,
नाटक जीवन में ,
महान लेखकों की ,
कहानियों पर ,
महान कलाकारों के ,
अभिनय के !
मगर नहीं ,
देख पाऊंगा मैं
वो विचित्र नाटक ,
जो खेला जाएगा ,
मेरे मरने के बाद
मेरे अपने ,
घर के आँगन में !
देखना आप सब ,
उसे ध्यान से ,
मुझे जीने नहीं दिया ,
जिन्होंने कभी ,
जो मारते  रहे हैं ,
बार बार मुझे ,
और मांगते रहे मेरे लिये ,
मौत की हैं  दुआएं ,
कर रहे होंगे ,
बहुत विलाप ,
नज़र आ रहे होंगे ,
बेहद दुखी ,
वास्तव में मन ही मन ,
होंगे प्रसन्न ,
कमाल का अभिनय ,
आएगा  तुम्हें नज़र ,
बन जाएगा  मेरा घर ,
एक नाट्यशाला!!

Friday, 6 July 2012

औरत ( कविता ) 0 5 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

तुमने देखा है ,
मेरी आँखों को ,
मेरे होटों को ,
मेरी जुल्फों को ,
नज़र आती है ,
तुम्हें ,
ख़ूबसूरती ,
नज़ाकत ,
और कशिश ,
मेरे जिस्म के ,
अंग अंग में ।
तुमने देखा है  ,
केवल बदन मेरा ,
प्यास बुझाने को ,
अपनी हवस की ,
बाँट दिया है तुमने ,
टुकड़ों में मुझे ,
और उसे दे रहे हो ,
अपनी चाहत का नाम !
तुमने देखा ही नहीं ,
कभी ,
उस शख्स को  ,
एक इन्सान है जो  ,
तुम्हारी तरह  ,
जीवन का एहसास लिये  ,
जो नहीं है ,
केवल एक जिस्म  ,
औरत है तो क्या  !                                  
(  शायद ये बात केवल  पुरुषों को ही नहीं महिलाओं को समझनी होगी कि वो मात्र शो पीस नहीं हैं  )  

नयी कविता ( कविता ) 0 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

              नई कविता
दुनिया के लोग ,
अपने भी ,
बेगाने भी ,
आते रहते हैं ,
जाते रहते हैं
प्रतिदिन ,
घटती रहती हैं घटनाएं ,
निरंतर ,
घूमता रहता है ,
वही चक्र ,
किसे क्या पसंद है ,
क्या नापसंद
इस बात से ,
होता नहीं ,
किसी को सरोकार ,
कभी बन के दर्शक ,
देखते हैं तमाशा ,
कभी स्वयं ,
बन जाते हैं ,
तमाशा भी ,
तमाशाई भी ,
हर दिन ,
इस कोलाहल में ,
शामिल रहता हूँ ,
मैं भी चाहे अनचाहे ,
हर साँझ चाहता हूँ ,
भुला दूँ वो सब बातें ,
अच्छी बुरी ,
दिन भर की ,
सो जाता हूँ ,
बिस्तर पर अकेला ,
रात भर ,
बदलता रहता हूँ करवटें ,
ऐसे में ,
लगता है मुझे ,
हर रात्रि ,
सो गया है ,
कोई मेरे करीब आ कर ,
प्यार से थपथपा रहा है मुझे ,
पल पल रहता है ,
इक मधुर सा एहसास ,
किसी के पास होने का ,
बीत जाती है ,
हर रात  यूँ ही ,
देखते हुए नये स्वप्न ,
आ जाती है ,
नयी सुबह ,
हर रात्रि के बाद ,
भोर के उजाले में ,
ढूंढता हूँ मैं उसे ,
जो था ,
रात्रि भर पास मेरे ,
और मिल जाती है ,
हर सुबह मुझे ,
तकिये के नीचे ,
इक नयी कविता।

Thursday, 5 July 2012

कैद ( कविता ) 0 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कब से जाने ,
बंद हूं ,
एक कैद में मैं ,
छटपटा रहा हूँ ,
रिहाई के लिये !
रोक लेता है ,
हर बार मुझे  ,
एक अनजाना सा डर ,
लगता है ,
एक सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये  !
मगर ,
जीने के लिए ,
निकलना ही होगा ,
कैद से मुझको,
कर पाता नहीं ,
बाहर निकलने का ,
कोई भी मैं प्रयास !
 देखता रहता हूँ ,
मैं केवल सपने ,
कि आएगा कभी ,
मसीहा कोई ,
मुझे मुक्त कराने  ,
खुद अपनी ही कैद से !!

साया ( कविता ) 0 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

पी लेता हूँ ,
यूँ तो अक्सर ,
ज़िंदगी का ,
मैं ज़हर !
जाने क्यों ,
फिर भी कभी ,
भर आती हैं ,
आँखें ,
और घुटने ,
लगता है दम !
रोकने से ,
तब रुकते ,
नहीं आंसू ,
मन करता है ,
जा कर ,
पास तुम्हारे ,
जी भर के ,
रो लेने को !
सोचता हूँ ,
मैं कभी कभी ,
जिसकी ,
तलाश है मुझे ,
तुम वही हो कि नहीं  !
भीगी पलकों के ,
इस नाते को ,
मैं नहीं कोई ,
नाम दे पाया  !
तुम्हें भी ,
याद आता है कभी ,
छत के कोने में ,
देर रात तक ,
राह तकता हुआ ,
गुमसुम सा खड़ा ,
कोई साया !

Wednesday, 4 July 2012

मुझे लिखना है ( कविता ) 0 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मुझे लिखना है  ( कविता )
कोई नहीं पास तो क्या ,
बाकी नहीं आस तो क्या।
टूटा हर सपना तो क्या ,
कोई नहीं अपना तो क्या।
धुंधली है तस्वीर तो क्या ,
रूठी है तकदीर तो क्या।
छूट गये मेले तो क्या ,
रह गये अकेले तो क्या।
बिखरा हर अरमान तो क्या ,
नहीं मिला भगवान तो क्या।
है ऊँची दीवार तो क्या ,
मिला नहीं प्यार तो क्या।
हैं कठिन राहें तो क्या ,
दर्द भरी हैं आहें तो क्या।
सीखा नहीं कारोबार तो क्या ,
दुनिया है इक बाज़ार तो क्या।
जीवन इक संग्राम तो क्या ,
नहीं पल भर आराम तो क्या।
मैं लिखूंगा नयी इक कविता ,
प्यार की  और विश्वास की ,
लिखनी है कोई कहानी मुझको ,
दोस्ती की और अपनेपन की ,
मुझे है अब जाना वहां ,
मिल सके सब कुछ जहाँ ,
खुशियाँ ही खुशियाँ हों बस ,
खिलखिलाती मुस्कानें हों ,
खिले हों फूल ही फूल  ,
हर तरफ हों बहारें ही बहारें ,
लिखना है वो सब खुद मुझे ,
जो लिखा नहीं मेरे नसीब में।