Monday, 30 July 2012

एक पत्नी ने बनवाया नया इक ताज ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 एक पत्नी ने बनवाया नया इक ताज  ( कविता )  डॉ लोक सेतिया

बनवाया होगा
किसी बादशाह ने
अपनी मुमताज के नाम
कोई ताजमहल
मुझे नहीं है
उसे देखने की
कोई चाहत।

मगर चाहता हूँ
किसी दिन मैं
जा कर देख आऊं
उस
ह्युम्निटी हस्पताल को। 

जिसे बनवाया है
एक मज़दूर की पत्नी ने
पति की याद में
पति के बिना इलाज
मरने के बाद।

अपने बेटे को
अनाथालय में भेजकर
की तपस्या
अपने सपने को
पूरा करने की
डॉक्टर बनाया उसको
ऐसा अस्पताल
बनाने के लिए।
 
ताकि अब और
किसी गरीब को
पैसा पास न होने के कारण
कोई कर न सके
इलाज से इनकार।

Wednesday, 25 July 2012

है अधूरी कहानी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      है अधूरी कहानी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

ज़िंदगी  नहीं है
कागज़ पे लिखी 
पर्दे पर दिखाई गई  
कोई पटकथा।

जिसे ले जाता है
मनचाहे अंत तक
लिखने वाला लेखक  
भटकने नहीं देता
कहानी के पात्रों को।

बचाये रखता है
अपने पात्रों के
वास्तविक चरित्र को
संबल बन कर।

छोड़ दिया है शायद
अकेला और बेसहारा 
विधाता ने
जीवन में हर पात्र को।

भटक जाती है ज़िंदगी 
धूप - छावं में
अनजान पथ पर चलते हुए
बार बार।

जाने कब कहाँ कैसे
भटक जाते हैं सभी पात्र
सही मार्ग से जीवन में।

सभी करते रह जाते हैं प्रयास 
कहानी को उचित परिणिति तक
ले जाने का
मगर आज तक
पहुंचा नहीं पाया कोई भी
पूर्णता तक उसको।

रह गयी है अधूरी
सब के जीवन की
वास्तविक कहानी
त्रिशंकु बन कर रह गये  हैं
जीवन में तमाम लोग।

Sunday, 22 July 2012

नाट्यशाला ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

         नाट्यशाला ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मैंने देखे हैं
कितने ही
नाटक जीवन में
महान लेखकों की
कहानियों पर
महान कलाकारों के
अभिनय के।

मगर नहीं देख पाऊंगा मैं
वो विचित्र नाटक
जो खेला जाएगा
मेरे मरने के बाद
मेरे अपने घर के आँगन में।

देखना आप सब
उसे ध्यान से
मुझे जीने नहीं दिया जिन्होंने कभी
जो मारते  रहे हैं बार बार मुझे
और मांगते रहे मेरे लिये
मौत की हैं  दुआएं।

कर रहे होंगे बहुत विलाप
नज़र आ रहे होंगे बेहद दुखी
वास्तव में मन ही मन
होंगे प्रसन्न।

कमाल का अभिनय
आएगा  तुम्हें नज़र
बन जाएगा  मेरा घर
एक नाट्यशाला।

Saturday, 21 July 2012

मन की बात ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       मन की बात ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया 

देख कर किसी को
बढ़ गई दिल की धड़कन
समा गया कोई
मन की गहराईओं में
किसी की मधुर कल्पनाओं में
खोए  रहे रात दिन
जागते रहे किसी की यादों में
रात - रात भर करते रहे
सपनों में उनसे मुलाकातें।

चाहा कि बना लें उन्हें
साथी उम्र भर के लिए
हर बार रह गया मगर
फासला कुछ क़दमों का
हमारे बीच।

उनकी नज़रें
करती रहीं इंतज़ार 
खामोश सवाल के जवाब का
पर हम साहस न कर सके
प्यार का इज़हार करने का कभी।

समझ नहीं सके वो भी
हमारी नज़रों की भाषा को
और लबों पे ला न पाए
दिल की बात कभी हम।
                                                       

Friday, 20 July 2012

अलविदा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    अलविदा ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया 

तुम जा रहे हो आज
छुड़ा कर मुझसे हाथ
भुला कर उम्र भर
साथ देने का वादा
जब मिल गया है
तुम्हें किनारा ।

चलो अच्छा हुआ
मिल गया तुम्हें 
कोई तो ऐसा
जो कर सके
पूरे तुम्हारे सपने।

चाहा तो मैंने भी
यही था सदा
मगर कर न पाया कभी
मुझे और क्या चाहिये
तुम्हारी ख़ुशी से  बढ़कर।

मैं जूझता रहा
तेज़ हवओं से
लड़ता रहा तूफानों से
नहीं डरा कभी
किसी भी भंवर से।

समझा था मैंने सदा तुम्हें
अपनी  मंज़िल भी
किनारा भी
मैं खड़ा हूं वहीं उसी  कश्ती पर
थामे पतवार बन के माझी।

और देख रहा हूं  तुम्हें
आंसू लिये पलकों पर अपनी
कदम - कदम दूर जाते हुए
हाथ हिलाते हुए। 

Wednesday, 18 July 2012

उमंग यौवन की ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   उमंग यौवन  की ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

ये मस्ती
ये अल्हड़पन
ये झूम के चलना
ये हर पल गुनगुनाना
ये सतरंगी सपने बुनना
ये हवाओं संग उड़ना
ये भीनी भीनी खुशबु
ये बहारों का मौसम
ये सब है तुम्हारा आज
ओर है सारा जहाँ तुम्हारा।
जी भर के जी लो
आज तुम इनको
कुछ ऐसे कि
याद रह जाए उम्र भर 
इनका मधुर एहसास।

यौवन में
कदम रखता हुआ 
अठाहरवां साल है ये।

Sunday, 15 July 2012

कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

कब से जाने बंद हूं
एक कैद में मैं
छटपटा रहा हूँ
रिहाई के लिये।

रोक लेता है हर बार मुझे 
एक अनजाना सा डर
लगता है कि जैसे 
इक  सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये।

मगर जीने के लिए
निकलना ही होगा
कभी न कभी किसी तरह
अपनी कैद से मुझको।

कर पाता नहीं
लाख चाह कर भी
बाहर निकलने का
कोई भी मैं जतन ।

देखता रहता हूं 
मैं केवल सपने
कि आएगा कभी मसीहा
कोई मुझे मुक्त कराने 
खुद अपनी ही कैद से।

Wednesday, 11 July 2012

साया ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   साया ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

पी लेता हूं 
यूं तो अक्सर
ज़िंदगी का
मैं ज़हर।

जाने क्यों
फिर भी कभी
भर आती हैं आंखें 
और घुटने
लगता है दम।

रोकने से
तब रुकते नहीं
आंखों से आंसू
तनहाई में अक्सर।

मन करता है
जा कर पास तुम्हारे
चुप चाप बैठ कर
जी भर के रो लेने को।

सोचता हूं 
मैं कभी कभी
अकेले में ये भी
जिसकी तलाश है मुझे 
तुम वही हो कि नहीं।

भीगी पलकों के
हम दोनों के शायद
इस नाते को कभी
मैं नहीं कोई भी
नाम दे पाया।

तुम्हें भी
याद आता है कभी
छत के कोने में देर रात तक
राह तकता हुआ
गुमसुम सा
खड़ा कोई साया।

Tuesday, 10 July 2012

चुभन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

           चुभन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

धरती ने
अंकुरित किया
बड़े प्यार से उसे
किया प्रस्फुटित
अपना सीना चीर कर
बन गया धीरे धीरे
हरा भरा पौधा
उस नन्हें बीज से।

फसल पकने पर
ले गया काट कर
बन कर स्वामी
डाला था जिसने बीज
धरती में
और धरती को मिलीं
मात्र कुछ जडें
चुभती हुई सी।

अपनी कोख में
हर संतान को
पाला माँ ने 
मगर मिला उन्हें सदा
पिता का ही नाम
जो समझता रहा खुद को
परिवार का मुखिया
घर का मालिक।

और हर माँ
सहती रही
कटी हुई जड़ों की
चुभन के  दर्द को
जीवन पर्यन्त।

Friday, 6 July 2012

औरत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

           औरत    ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

तुमने देखा है
मेरी आँखों को
मेरे होटों को
मेरी जुल्फों को ,
नज़र आती है तुम्हें 
ख़ूबसूरती नज़ाकत और कशिश
मेरे जिस्म के अंग अंग में ।
 
तुमने देखा है 
केवल बदन मेरा 
प्यास बुझाने को 
अपनी हवस की ,
बाँट दिया है तुमने
टुकड़ों में मुझे
और उसे दे रहे हो 
अपनी चाहत का नाम।

तुमने देखा ही नहीं 
कभी उस शख्स को 
एक इन्सान है जो
तुम्हारी ही तरह  ,
जीवन का हर इक 
एहसास लिये। 
 
 
जो नहीं है केवल एक जिस्म 
औरत है तो क्या।