मेरे ब्लॉग पर मेरी ग़ज़ल कविताएं नज़्म पंजीकरण आधीन कॉपी राइट मेरे नाम सुरक्षित हैं बिना अनुमति उपयोग करना अनुचित व अपराध होगा । मैं डॉ लोक सेतिया लिखना मेरे लिए ईबादत की तरह है । ग़ज़ल मेरी चाहत है कविता नज़्म मेरे एहसास हैं। कहानियां ज़िंदगी का फ़लसफ़ा हैं । व्यंग्य रचनाएं सामाजिक सरोकार की ज़रूरत है । मेरे आलेख मेरे विचार मेरी पहचान हैं । साहित्य की सभी विधाएं मुझे पूर्ण करती हैं किसी भी एक विधा से मेरा परिचय पूरा नहीं हो सकता है । व्यंग्य और ग़ज़ल दोनों मेरा हिस्सा हैं ।
मार्च 16, 2023
POST : 1628 एंटी-रिश्वतखोरी वायरस औषधि ( तीर निशाने पर ) डॉ लोक सेतिया
मार्च 11, 2023
POST : 1627 ख़ूबसूरत लगते हैं गुनाहगार लोग ( ये मुहब्बत है ) डॉ लोक सेतिया
ख़ूबसूरत लगते हैं गुनाहगार लोग ( ये मुहब्बत है ) डॉ लोक सेतिया
मार्च 10, 2023
POST : 1626 सत्ता का राक्षस ख़्वाब में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
सत्ता का राक्षस ख़्वाब में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
मार्च 09, 2023
POST : 1625 सुबह का इंतिज़ार कब तक ( दर्द की दास्तां ) डॉ लोक सेतिया
सुबह का इंतिज़ार कब तक ( दर्द की दास्तां ) डॉ लोक सेतिया
POST : 1624 अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया
कोशिश
है जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण मुख्य बातों पर संक्षेप में साधारण शब्दावली
में विचार विमर्श करना ताकि साधारण व्यक्ति समझ कर अपना सके और फ़ायदा उठा
सके । सबसे पहले अच्छा जीवन बिताने के लिए जो बातें अतिआवश्यक हैं उनकी
चर्चा , शारीरिक और मानसिक के साथ सामाजिक स्वास्थ्य के बिना कुछ भी संभव
नहीं है । खुश रहना मौज मस्ती करना शानदार रहन-सहन साधन सुविधाएं वास्तव
में अच्छे जीने के लिए उस सीमा तक ज़रूरी हैं जहां तक पहले वर्णित शारीरिक
मानसिक सामाजिक स्वस्थ्य हासिल करने में कोई बाधा उतपन्न नहीं करते ये सब
अन्यथा भौतिक चीज़ों की दौड़ में वास्तविक जीवन चौपट हो जाता है । आजकल यही
होने लगा है और समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है । देश की समाज की व्यवस्था जर्जर हो चुकी है सब कुछ जैसा होना चाहिए उस के विपरीत हो गया है । बदलाव का शोर है बदलाव हो नहीं रहा क्योंकि खुद को कोई भी बदलना नहीं ज़रूरी समझता है।
सुन रहे बहरे ध्यान से देख लो , गीत सारे गूंगे जब गा रहे ।
सबको है उनपे ही एतबार भी , रात को दिन जो लोग बता रहे ।
लोग भूखे हैं बेबस हैं मगर , दांव सत्ता वाले हैं चला रहे ।
घर बनाने के वादे कर रहे , झोपड़ी उनकी भी हैं हटा रहे ।
हक़ दिलाने की बात को भूलकर , लाठियां हम पर आज चला रहे ।
बेवफाई की खुद जो मिसाल हैं , हम को हैं वो "तनहा" समझा रहे ।

मार्च 08, 2023
POST : 1623 होली का सरकारी फ़रमान ( राज़ की बात ) डॉ लोक सेतिया
होली का सरकारी फ़रमान ( राज़ की बात ) डॉ लोक सेतिया
मार्च 07, 2023
POST : 1622 भगवान परेशान मैं हैरान ( होली की ठिठोली ) डॉ लोक सेतिया
भगवान परेशान मैं हैरान ( होली की ठिठोली ) डॉ लोक सेतिया
मार्च 06, 2023
POST : 1621 भांग पड़ी कुंएं में आग लगी धुंएं में ( होली कथा ) डॉ लोक सेतिया
भांग पड़ी कुंएं में आग लगी धुंएं में ( होली कथा ) डॉ लोक सेतिया
होली पर स्वदेशी गीत : -
सबको हमने फूल बनाया , फूल उगाना था बेकार
( उल्लू - अप्रैल फूल )
लाये हैं कांटों की बहार , इक हूं मैं दूजे मेरे यार ।
तुम हो सत्ता की कुर्सी , खाती वफ़ादारी की कसमें
कौन चोर कौन साहूकार , कुछ मत पूछो मुझसे यार ।
दोनों लगा कर रंग बेशर्मी का , राजनीति की होली खेलें
लोकलाज को छोड़ो भी अब , टीवी की नकली तकरार ।
मैं करता हर किसी से छेड़छाड़ , रोक सकेगा मुझे कौन
डुबोकर सबको जाना पार है , मेरी जीत सभी की हार ।
जोड़ी क्या खूब बनाई अपनी , तुम हो झूठी मैं मक्क़ार ।
मार्च 03, 2023
POST : 1620 मुन्नाभाई को आदर्श बना लिया है ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया
मुन्नाभाई को आदर्श बना लिया है ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया
फ़रवरी 21, 2023
POST : 1619 भगवान का व्हाट्सएप्प नंबर ( अद्भुत-अविश्वसनीय ) डॉ लोक सेतिया
भगवान का व्हाट्सएप्प नंबर ( अद्भुत-अविश्वसनीय ) डॉ लोक सेतिया

फ़रवरी 18, 2023
POST : 1618 राजनीति की लघुकथा ( हक़ीक़त भी अफ़साना भी ) डॉ लोक सेतिया
राजनीति की लघुकथा ( हक़ीक़त भी अफ़साना भी ) डॉ लोक सेतिया
जनवरी 29, 2023
POST : 1617 दर्द भरी दास्तां ( अफ़साना ग़ज़ल का ) डॉ लोक सेतिया
दर्द भरी दास्तां ( अफ़साना ग़ज़ल का ) डॉ लोक सेतिया
आखिर में मेरी डॉ लोक सेतिया 'तनहा' की इक ग़ज़ल पेश है :-
जब नहीं आते हो आ जाती हर शाम ग़ज़ल ।
वो सुनाने का सलीका वो सुनने का शऊर
कुछ नहीं बाकी रहा बस तेरा नाम ग़ज़ल ।
वो ज़माना लोग वैसे आते नज़र नहीं
जब दिया करती थी हर दिन इक पैगाम ग़ज़ल ।
आंसुओं का एक दरिया आता नज़र मुझे
अब कहूँ कैसे इसे मैं बस इक आम ग़ज़ल ।
बात किसके दिल की , किसने किसके नाम कही
रह गयी बन कर जो अब बस इक गुमनाम ग़ज़ल ।
जामो - मीना से मुझे लेना कुछ काम नहीं
आज मुझको तुम पिला दो बस इक जाम ग़ज़ल ।
जनवरी 23, 2023
POST : 1616 दुनिया बनाने वाला हैरान परेशान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
दुनिया बनाने वाला हैरान परेशान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
जनवरी 20, 2023
POST : 1615 पानी का सफ़र ज़िंदगी भर ( चलते-चलते ) डॉ लोक सेतिया
पानी का सफ़र ज़िंदगी भर ( चलते-चलते ) डॉ लोक सेतिया
जनवरी 15, 2023
POST : 1614 नकली की कीमत असली की चाहत नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया
नकली की कीमत असली की चाहत नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया
दिसंबर 29, 2022
POST : 1613 क़िताब की दर्दनाक दास्तां ( तिरछी नज़र ) डॉ लोक सेतिया
क़िताब की दर्दनाक दास्तां ( तिरछी नज़र ) डॉ लोक सेतिया

दिसंबर 16, 2022
POST : 1612 किताबें मेरी ख़त हैं दोस्ती वाले ( अंदाज़ अलग है ) डॉ लोक सेतिया
किताबें मेरी ख़त हैं दोस्ती वाले ( अंदाज़ अलग है ) डॉ लोक सेतिया
जनाब साक़िब लखनवी अज़ीम शायर हैं कहते हैं
' ज़माना बड़े शौक से सुन रहा था , हमीं सो गये दास्तां कहते कहते '।
कोई पचास साल पहले कही थी मैंने पहली ग़ज़ल
' किसे हम दास्तां अपनी सुनाएं , कि अपना मेहरबां किस को बनाएं ।
ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
सन्नाटा वहां हरसू फैला-सा नज़र आया ।
हम देखने वालों ने देखा यही हैरत से
अनजाना बना अपना , बैठा-सा नज़र आया ।
मुझ जैसे हज़ारों ही मिल जायेंगे दुनिया में
मुझको न कोई लेकिन , तेरा-सा नज़र आया ।
हमने न किसी से भी मंज़िल का पता पूछा
हर मोड़ ही मंज़िल का रस्ता-सा नज़र आया ।
हसरत सी लिये दिल में , हम उठके चले आये
साक़ी ही वहां हमको प्यासा-सा नज़र आया ।