मार्च 16, 2023

POST : 1628 एंटी-रिश्वतखोरी वायरस औषधि ( तीर निशाने पर ) डॉ लोक सेतिया

 एंटी-रिश्वतखोरी वायरस औषधि ( तीर निशाने पर ) डॉ लोक सेतिया 

आख़िर देश को लूटने वालों घूसखोरों घोटालेबाज़ों से जनता को बचाने का उपाय खोज लिया गया ।  ये एक औषधि है जिस का उपयोग सिर्फ भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए ही नहीं बल्कि अदालत में झूठी गवाही से लेकर जाली दस्तावेज़ नकली नोट और किसी की भी झूठी गलत रिपोर्ट को परखने उसे पूरी तरह से जड़ से मिटाने का काम कर सकती है । सफलता पूर्वक आज़माने के बाद सरकार से इस का उपयोग करने की इजाज़त मांगी गई है । शोध से प्रमाणित हुआ है कि एक बार इस औषधि की खुराक देने के बाद महारिश्वतख़ोर भी पूरी तरह से ईमानदार बन कर अपना फ़र्ज़ बिभाने लगता है और रिश्वत शब्द सुनते ही उस के भीतर उसकी आत्मा उसका विवेक उसको रोकने में कामयाब हो जाता है । मन में काली कमाई की बात आते ही उसको घबराहट बेचैनी होने लगती है और चेहरे का रंग बदरंग लगने लगता है जिस से सामने खड़ा व्यक्ति आस पास के लोग पहचान सकते हैं कि उसकी नीयत खराब है । किसी तरह इन सब को अनदेखा करते हुए कोई भूलकर गलती से भी रिश्वत लेता है तो औषधि का असर सामने आता है और उसको सीने पर भारी बोझ लगने लगता है जिस के कारण वो कुछ भी खा पी नहीं सकता है । बस सभी सरकारी विभाग के हर एक अधिकारी हर इक कर्मचारी को ये औषधि लेना अनिवार्य किया जा सकेगा और जो इनकार करेगा उस को नौकरी छोड़नी पड़ेगी । सरकारी कर्मचारियों के अलावा निजी कंपनी तमाम बड़े उद्योग या निकाय के स्टॉफ  से लेकर अदालत के सभी न्यायधीश वकील से स्टाफ़ तक को औषधि की खुराक देने से न्याय बिल्कुल सही और बिना देरी मिलने लगेगा क्योंकि सबकी सच्चाई या कोई चालाकी तुरंत पकड़ी जाएगी । ठीक कोरोना की वैक्सीन की तरह औषधि देश की जनता को देने से देश समाज से बेईमानी अपराध धोखाधड़ी का अंत हो जाएगा और कोई भी न रिश्वत मांगेगा न कोई रिश्वत दे कर अनुचित ढंग से फायदा उठाएगा । भूखे मरने का भय किसी को कुछ भी अनुचित नहीं करने देगा । 
 
विषय अति संवेदनशील है सरकार को हर कदम संभल संभल कर रखना पड़ता है , गोपनीय ढंग से उच्च स्तर की समिति गठित की गई है जो इस पर कैसे कारवाई हो से लेकर सभी पहलुओं पर विचार करेगी । सरकार ने चिंता जताई है कि कहीं औषधि नेताओं पर सांसदों विधायकों पर उपयोग करनी पड़ गई तब देश की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ सकता है । शोध करने वाले विशेषज्ञों ने चौंका दिया है ये सुझाव देकर कि पहले इस समिति के सभी सम्मानित सदस्यों को औषधि की खुराक दी जाए ताकि उनका निर्णय शत प्रतिशत सही और निष्पक्ष होकर जारी हो सके , साथ ही प्रमाणित भी हो जाएगा कि सरकार दल या शासक किसी का कोई दबाव उन पर कोई प्रभाव नहीं कर सकेगा । सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है ये अनहोनी घटना लग रही है जिस से चर्चा की कोई समिति का सदस्य बनने को तैयार नहीं है , सभी का कहना है उनका ऐसा कोई अनुभव नहीं है इस पर जानकार लोगों को नियुक्त किया जाए । हैरानी है लोग खुद को नाक़ाबिल घोषित कर रहे हैं । जैसा होता है मीडिया के जासूस भीतर की खबर ले आते हैं और ब्रेकिंग न्यूज़ बना देते हैं इस बात पर खबर सवालिया निशान लगाकर फैलाई गई है कि क्या वास्तव में ऐसा कोई प्रयोग सफल हो गया है । 
 
सरकार को मामला गंभीर लगा है इसलिए ख़ास ख़ास टीवी अखबार मीडिया वालों को बुलाया गया है ।  उन से कहा गया है कि जिस किसी को इस पर सवाल पूछना है उसको लिखित देना होगा कि अगर सच में ऐसी कोई औषधि बनाई गई है तो वो औषधि की खुराक लेने पर सहमत हैं और तभी सवालात की झड़ी लगा सकते हैं । अब आया ऊंठ पहाड़ के नीचे सभी सकते में हैं इतनी ख़ामोशी छाई है कि सबकी घटती बढ़ती सांसों की आवाज़ सुनाई देने लगी है । सरकारी प्रवक्ता ने चटखारा लेते हुए कहा है कि आपको सांप क्यों सूंघ गया है ज़रा सा मज़ाक सुन कर सिट्टी पिट्टी गुम हो गई सोचो इतनी ऊल - जुलूल खबरें बनाते रहते बेसिर पैर की जनता की क्या हालत होती होगी । पहली बार सवाल करने वालों से सवाल किया गया तो उनको लगा जैसे नीचे से ज़मीन खिसक गई है । 
 
 सरकार भी चलती नहीं है कोई और कहीं से चलाता है जो कभी किसी को सामने दिखाई नहीं देता उसको बिग बॉस कहते हैं । बिग बॉस का हर आदेश आखिरी होता है जिनको समझ नहीं आया उनको टीवी शो बिग बॉस की पुरानी कड़ियां देखनी चाहिएं । इस साल बिग बॉस के लिए इक गाना भी सुबह जागते ही गाया जाता था उसकी महिमा का वर्णन करते हुए । सरकार को अपने इशारे पर चलाने वाले बिग बॉस ने आकाशवाणी की तरह निर्णय सुनाया है कि हमारा देश कोई इतना बड़ा जोखिम नहीं उठा सकता है और जिस औषधि की खोज की गई है उस पर प्रतिबंध लगाया जाता है और भविष्य में कभी ऐसा कोई प्रयास नहीं किया जाएगा ये तय किया जाता है । जितनी औधधि बनी थी नष्ट कर दी गई है लेकिन बिग बॉस ने औषधि का फॉर्मूला अपनी तिजोरी में बंद कर रख लिया है क्या करना है वही जानता है आखिर बिग बॉस सबका मालिक है जो उसकी मर्ज़ी कर सकता है । सभी लोग जिनको इस की जानकारी मिल गई किसी तरह से चाहते हैं कि इस को झूठी अफ़वाह की तरह भुला देना अच्छा है सबकी भलाई इसी में है ।  राज़ की बातें खुलने लगीं तो अंजाम क्या होगा ये सच सब को डराता है । 



 
 

मार्च 11, 2023

POST : 1627 ख़ूबसूरत लगते हैं गुनाहगार लोग ( ये मुहब्बत है ) डॉ लोक सेतिया

 ख़ूबसूरत लगते हैं गुनाहगार लोग ( ये मुहब्बत है ) डॉ लोक सेतिया  

मैंने सोचा सोच सोच कर बार बार सोच कर समझा तब जाकर समझ पाया कि  अपराध क्या है अपराधी कौन नहीं है और यकीन हुआ कि दुनिया में मुजरिम हर शख़्स है । किसी शायर ने कहा भी इक फुर्सत ए गुनाह दी वो भी चार दिन , देखे हैं हौंसले परवरदिगार के । ऊपरवाले के दरबार में हम सब खड़े होते हैं गुनाहगार की तरह । जुर्म अपराध पर चर्चा बहुत की जाती है पर खुद अपने गिरेबान में कोई नहीं झांकता । कहने को हर कोई कह देता है जीना गुनाह है पर क्या क्या गुनाह नहीं किया कोई किसी को नहीं बताता है । गुनाह करने से जो लज़्ज़त जो ख़ुशी मिलती है उसका लुत्फ़ ही और है । यहां सभी ग़ालिब की तरह कह नहीं सकते कि मस्जिद के ज़ेरे साया घर बना लिया है , ये बंदा ए कमीना हमसाया ए खुदा है । शराफ़त बस इक मुखौटा है असली चेहरा दिखाई दे जाता तो आदमी चेहरा दिखाने के काबिल नहीं होता । दुनिया बनाने वाले ने अच्छा किया या खराब किया पर उस ने सब की भीतर मन की बात को किसी और तो क्या खुद को भी पता नहीं चलने दिया तभी भगवान भी आदमी की असलियत को समझ नहीं पाया । उसके सामने आकर भूल अपराध जाने अनजाने किए सब की क्षमा याचना करता है और पल भर बाद वही दोहराता है क्योंकि बुरे कर्म करने में बड़ा मज़ा आता है । क्या कमाल की बात है हम अपने आप से अपनी वास्तविकता को छुपकर जीते हैं नहीं तो शर्म से ही मर जाते । दार्शनिक लोग सब समझते हैं उनको मालूम है कि दुनिया में सभी अच्छे-सच्चे होते तो दुनिया बेरंगी और बोझिल लगती ये तो अपराधी लोग ही हैं जिन्होंने दुनिया को कितने रंगों से भरा है लाल रंग खून की निशानी है और काला रंग घनी ज़ुल्फ़ों से लेकर काला टीका नज़र लगने से बचाने से काजल की कोठरी वाला बहुरंगी होता है । गोरा और काला दोनों भाई भाई हैं और हरा लाल नीला पीला जामुनी गुलाबी उनका परिवार हैं ज़रा आगे ध्यान से पढ़िये सरकारी इश्तिहार हैं अपराधी सांसद विधायक हैं शासक शानदार किरदार हैं यहां राजनीति में सभी दिलदार हैं दोस्त हैं दुश्मनी को हमेशा तैयार हैं । 
 
अपराध जगत के महारथी समझे जाने वाले से राजनीति के अपराधीकरण विषय पर साक्षात्कार करने का अवसर मिला उन्होंने बहुत सारा व्याख्यान दिया उनकी बात को संक्षेप में वर्णन करते हैं । सत्ता की बहती गंगा में कितनी तरह से कहां कहां से आया है सब काम गंदे ख़राब छल कपट धोखा हेराफेरी लूटपाट से क़त्ल करने के करने के बाद सत्ता की चौखट पर सर झुकाया है सब पाप धुल गए हैं बेगुनाह साबित हुआ जब इस में नहाया है । झूठ को सच बताकर सच को अफ़वाह बताया है हमने धर्म देशभक्ति को अपना हथियार बनाया है रंगे हाथ पकड़े गए हाथ ख़ाली लेकर आए थे राजनीति में सभी पर हर कोई झोली भर घर लाया है । पाप क्या पुण्य क्या है ये भेदभाव मिटाया है बस इतना समझ लो हमको नहीं उसने बनाया जिस को भगवान हमने बनाया है । दुनिया कहती है झूठी मोह माया है हमने सिर्फ ईमान को बेचा है बदले में जो भी चाहा खूब पाया है । सबको उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करने का हुनर राजनीति कहलाती है ये वो डायन है जो सबका लहू पीती है और अपनी प्यास बुझाती है क्या कभी किसी धनवान को शासक को शर्म ओ हया आती है । ये भी इक तपस्या है जो बंद खिड़कियों दरवाज़ों में चुपके से की जाती है सरकार चलाना आसान नहीं है गंगा उलटी बहती है नीचे से ऊपर को जाती है । ध्यान से पढ़ना सब इतने में सार की बात समझाई है राजनेता की चतुराई है हर शख़्स हरजाई है ।    
 
मुझे अपने गुनाह स्वीकार हैं मैंने कोई अपराध छोड़ा नहीं है , सबसे मुहब्बत करना भी गुनाह होता है और सच लिखना सच कह देना भी जुर्म ही है जो रोज़ किया है और सज़ा भी मंज़ूर की है । आखिर में मुझे हमेशा दस्तक़ फिल्म की ग़ज़ल पसंद रही है उसी से अपनी बात ख़त्म करते हैं । सब सच कहा लिखा है और कुछ भी झूठ नहीं शपथ लेता हूं ।
 

 


मार्च 10, 2023

POST : 1626 सत्ता का राक्षस ख़्वाब में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

         सत्ता का राक्षस ख़्वाब में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

इक चारों तरफ फैली बड़ी ऊंची लंबी चौड़ी दैत्याकार छवि मुझे अक्सर रातों को जगाती है । चैन से सोया नहीं जब से सोचने समझने लगा हूं अपने समाज की वास्तविक तस्वीर को लेकर । शब्दों से चित्र बनाना चाहता हूं तो हर शब्द आकार खोने लगता है जैसे किसी फिल्म में आधुनिक तकनीक से दिखलाया गया था । तारे ज़मीं पर फिल्म जैसे , बनाई तस्वीर शब्दों की लिखावट डगमगाती दिखती है धुंधली नज़र है या तस्वीर के रंग फीके पड़ गए हैं समझ नहीं आता मुझे । मनोचिकित्सक उपचार बताता है मस्तिष्क को आराम की ज़रूरत है समाज की देश की चिंता करने को सरकार बहुत है आपको खुद जीने की चिंता करनी है मौत के आ जाने तक । इक दार्शनिक वहीं बैठे थे सुनकर कहने लगे आपको ख़्वाब में जो दिखाई देता है कोई व्यक्ति नहीं है सरकार का साकार रूप है । सरकार से डरना ज़रूरी है जनता की यही सबसे बड़ी मज़बूरी है मगर डरावने सपने दिल की धड़कन को बढ़ा देते हैं कभी लगता है सोते सोते शायद धड़कनें बंद ही हो जाएं ।  
 
 पंडित जी सपनो का अच्छा बुरा फल बतलाते हैं ज्योतिष से समस्या का कोई हल बताते हैं । इक गुरु जी मिले जिनसे मेरी कोई जान पहचान नहीं इक दोस्त उनके अनुयाई हैं साथ लेकर गए मुझे तो सब जानते समझते हैं ऐसा दावा करने वाले बोले आज नहीं सोच विचार कर कल बताते हैं । आज दोबारा जाकर वही सवाल उनका भी वही जवाब कल बताते हैं । कल कब आएगा उनको नहीं पता मुझको भी नहीं खबर कल तक कौन जीता है पल में प्रलय आएगी सुना है कल कभी नहीं आता है हमेशा आज होता है गुज़रा हुआ कल और आने वाला कल कोई अस्तित्व नहीं होता दोनों का । फिर उसी पुरानी किताब निकाली तो इक कथा पढ़ने को मिली सरकार क्या होती कैसी होती है । कुछ मिलती जुलती कहानी इक बड़े लेखक का उपन्यास भी है अरुण प्रकाश जी की कोंपल कथा , वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है , मगर ये किताब किसी और की है । 
 
सरकार इक कल्पना है और कल्पना सुंदर भी हो सकती है और बेहद बदसूरत भी लेकिन सरकार कभी जनता की नहीं होती है सरकार जनता के लिए कभी कुछ नहीं करती जनता को सरकार की खातिर जीना मरना होता है । जनता वरमाला पहनाती है ये भी उसकी ख़ुशी मर्ज़ी से नहीं बल्कि विवशता होती है उसको खुद आज़ाद रहने की अनुमति नहीं है सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था यही है आपको गुलामी स्वीकार करनी होगी दूजा कोई विकल्प नहीं है । पत्नी बनकर दासी होना दासता को अपना भाग्य समझना और जनता का राजनेताओं को वोट देकर शासक बनाना उनकी जीहज़ूरी करना एक जैसे हालात हैं । नियम कायदे कानून सरकारी मशीन के हाथ हैं और कार्यपालिका न्यायपालिका सभी सुरक्षा को तैनात लोग संस्थान आदि किसी तलवार बंदूक एटम बंब की तरह हैं । अधिकारी कर्मचारी इंसान नहीं संवेदना रहित हथियार हैं जिनको जो भी शासक जो भी सरकार जो भी विभाग उपयोग कर अपनी हर मनोकामना को पूर्ण करवा सकता है । नियम कायदे कानून जनता पर सख्ती से लागू होते हैं लेकिन सरकार अधिकारी ख़ास लोगों पर लचीले और नर्मदिली से हाज़िर होते हैं । नतीजा समझ आया है कि मौत की गहरी नींद आने तक मुझ जैसी जनता को सत्ता का राक्षस ख़्वाब में आकर डराता रहेगा । 
 

 

मार्च 09, 2023

POST : 1625 सुबह का इंतिज़ार कब तक ( दर्द की दास्तां ) डॉ लोक सेतिया

 सुबह का इंतिज़ार कब तक  ( दर्द की दास्तां  ) डॉ लोक सेतिया 

   क्या बतलाएं हम ने कैसे सांझ सवेरे देखे हैं , सूरज के आसन पर बैठे घने अंधेरे देखे हैं । किसी बड़े शायर का शेर वर्तमान समाज की दशा को परिभाषित करने में सक्षम है । शासक वर्ग ईश्वर धर्म के नाम पर जनता को ठगने का कार्य करते हैं छलिया बन कर भेस बदलते रहते हैं और अधिकारी कमाल का अभिनय करते हैं जब नागरिक उन को मिलते हैं उनसे समस्याओं पर बात करने को छोड़ उपदेशात्मक रवैया अपना कर अपना पल्ला झाड़ कर सरकार की मनमानी की परेशानी बताते हैं जबकि सिफ़ारिश घूस वालों के लिए सब आसान हो जाता है । आम नागरिक को ऊपरवाले पर अर्थात भगवान पर भरोसा करने की बात कहते हैं और जतलाते हैं कि जैसे उनके अधिकार होते हुए भी सही फैसला करने की अनुमति  नहीं है । निर्णय उनको लेना है नियम यही है मगर उनका विवेक कोई काम तभी करता है जब उनका फायदा या मज़बूरी हो । राजनेता अफ़्सर कर्मचारी सभी आपस में मिले हुए होते हैं मगर जिनको न्याय नहीं मिलता उनको दूसरे का दोष बताकर खुद को मासूम दिखलाने की कोशिश करते हैं । आम जनता सब समझती है मगर खामोश रहती है क्योंकि  जानती है कि तलवार से घाव मिलता है मरहम नहीं । 
 
   संत बनकर उपदेश देने वाले सरकारी अनुकंपा पा कर अनुचित को उचित करवा लेते हैं वोट का गणित काम आता है और देश राज्य की सरकार उनकी चरण वंदना करते हैं जबकि सामन्य नागरिक पर बेरहमी से जब चाहे जो नियम बनाकर लूट का अवसर खोजते रहते हैं । अधर्म धर्म बन गया है और मानवीयता का वास्तविक धर्म किसी सरकार किसी प्रशासन किसी संगठन किसी संस्था यहां तक कि किसी न्यायालय को याद तक नहीं है । बड़े ख़ास लोगों पर सरकार की अनुकंपा रहती है और उसी कार्य के लिए साधारण व्यक्ति पर कोई तरस नहीं खाता उसको दर दर ठोकरें खाने को विवश किया जाता है । टीवी पर सोशल मीडिया पर सभी शासक सरकारें लोक कल्याण और जनता की सेवा भलाई की चर्चा भाषण करते हैं जबकि वास्तविकता विपरीत मिलती है जब किसी आम नागरिक को अनावश्यक परेशानी होती है । गुरु नानक जी ने इक शासक को कहा था एती मार पई करलाने तैं कि  दर्द न आया । बाबर के ज़ुल्म की बात थी शायद ।   





POST : 1624 अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   अब तो इस तालाब का पानी बदल दो  ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   कोशिश है जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण मुख्य बातों पर संक्षेप में साधारण शब्दावली में विचार विमर्श करना ताकि साधारण व्यक्ति समझ कर अपना सके और फ़ायदा उठा सके । सबसे पहले अच्छा जीवन बिताने के लिए जो बातें अतिआवश्यक हैं उनकी चर्चा , शारीरिक और मानसिक के साथ सामाजिक स्वास्थ्य के बिना कुछ भी संभव नहीं है । खुश रहना मौज मस्ती करना शानदार रहन-सहन साधन सुविधाएं वास्तव में अच्छे जीने के लिए उस सीमा तक ज़रूरी हैं जहां तक पहले वर्णित शारीरिक मानसिक सामाजिक स्वस्थ्य हासिल करने में कोई बाधा उतपन्न नहीं करते ये सब अन्यथा भौतिक चीज़ों की दौड़ में वास्तविक जीवन चौपट हो जाता है । आजकल यही होने लगा है और समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है । देश की समाज की व्यवस्था जर्जर हो चुकी है सब कुछ जैसा होना चाहिए उस के विपरीत हो गया है । बदलाव का शोर है बदलाव हो नहीं रहा क्योंकि खुद को कोई भी बदलना नहीं ज़रूरी समझता है।

   ये कोई मनघडंत कहानी नहीं है बहुत पुरानी इक किताब है जो धर्म शासन व्यवस्था सामाजिक मान मर्यादा को लेकर लिखी गई है और जिस में नीति-कथाओं बोध-कथाएं लोक-कथाएं से सही गलत अच्छे बुरे की व्याख्या की गई है । इक बोध कथा संत महात्मा और राक्षस का अंतर समझाती है , साधु जीवन भर जितना भोजन खा कर जीवित रहता है राक्षस का पेट उतना खाने पर एक बार भी भरता नहीं है । देवता कहते हैं उन को जो देते हैं सबको बांटते हैं थोड़ा पास रखते है आवश्यकता भर को जमा कर रखते नहीं कल की खातिर । दान और पुण्य की परिभाषा भी है कि धनवान भूखे गरीब की सहायता करते हैं रास्ते पर मुसाफिर की सुविधा पानी छांव रात भर आराम करने को मुसाफिरखाना बनाते हैं तभी ईश्वर का धन्यवाद करते हैं कोई नाम शोहरत पाने को दिखाने को कुछ नहीं करते कभी । वास्तविक धर्म समाज का कल्याण और उपकार की भावना से कर्म करना है जब कोई मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरिजाघर दानपेटी में किसी भी तरह अर्जित धन को देकर ऐसा समझता है ऊपरवाला खुश होगा आशीर्वाद वरदान देगा तो वो खुद को औरों को धोखे में रख रहा होता है । शायद यही सबसे बड़ी अज्ञानता की बात है कि कोई खुद को दाता और ईश्वर को भिखारी समझता है । विधाता ने सभी को सब आवश्यकता का मिले ये व्यवस्था की है अगर ध्यान पूर्वक समझा जाए तो , लेकिन बाक़ी सब तौर तरीके मतलबी लोगों ने अपने स्वार्थ हासिल करने को लागू कर के सब से उनका अधिकार छीन कर वही किया है जो दानव किया करते थे कथाओं में पढ़ते हैं देवताओं पर अन्याय अत्याचार कर अपनी भूख अपनी हवस मिटाने को । वास्तव में ऐसे लोग धर्म को ईश्वर को न तो मानते हैं न समझते हैं  सिर्फ आडंबर करते हैं । अधिक कहना ज़रूरी नहीं विचार करेंगे तो सब खुद अपने विवेक से जान जाओगे , आखिर में महात्मा गांधी जी की समझाई बात । हमें खुद वो बदलाव बनना चाहिए जो हम दुनिया में देखना चाहते हैं , तभी हम अंधेरे में रौशनी की किरण फैला सकते हैं । 
 
 हैं उधर सारे लोग भी जा रहे  ,    रास्ता अंधे सब को दिखा रहे ।

सुन रहे बहरे ध्यान से देख लो ,   गीत सारे गूंगे जब गा रहे ।

सबको है उनपे ही एतबार भी ,    रात को दिन जो लोग बता रहे ।

लोग भूखे हैं बेबस हैं मगर  ,        दांव सत्ता वाले हैं चला रहे ।

घर बनाने के वादे कर रहे  ,        झोपड़ी उनकी भी हैं हटा रहे ।

हक़ दिलाने की बात को भूलकर ,  लाठियां हम पर आज चला रहे ।

बेवफाई की खुद जो मिसाल हैं  ,   हम को हैं वो "तनहा" समझा रहे ।
 
 
 कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं: दुष्यंत कुमार - YouTube








मार्च 08, 2023

POST : 1623 होली का सरकारी फ़रमान ( राज़ की बात ) डॉ लोक सेतिया

     होली का सरकारी फ़रमान ( राज़ की बात ) डॉ लोक सेतिया  

आपने क्या समझा कि ये आपके हमारे लिए कोई खुशखबरी की बात है , जी नहीं हज़ूर ये उनकी आपस की बात है । सरकार ने ये इश्तिहार सरकारी विभागों को भेजा है होली पर सभी अधिकारी कर्मचारी सबको ये संदेश  ध्यान पूर्वक पढ़ना है बिल्कुल उसी तरह जैसे शपथ उठाई जाती है । लिखा है सरकार जो चाहे सब संभव है कुछ भी नहीं जो सरकार नहीं कर सकती है लेकिन क्या सरकार को जो करना चाहिए वो सब करना है गंभीर विषय यही है । सरकार को सब नहीं करना चाहिए सिर्फ वही करना चाहिए जिस से सरकार के सरकार होने का मतलब समझ आता रहे हर किसी को । सरकार चाहती है जैसा हो ये शब्द लिखने से मंशा साफ नहीं हो जाती है मगर सरकार चाहती है ऐसा होना लाज़मी है लिखने का अर्थ है कुछ भी हो आपको आदेश का अनुपालन करना ही होगा अन्यथा आप दोषी समझे जाएंगे । 75 साल से सभी राजनेताओं अधिकारियों ने यही किया है बस सरकार चलती रहनी चाहिए भले सब रुक जाए और सरकारी तौर तरीका कभी किसी हाल में बदलना नहीं चाहिए । साकार जनता चुनती है बनाती है लेकिन आज तक कभी किसी ने नहीं समझा कि सरकार जनता की या जनता की खातिर है । सरकार किसी शासक नेता की कहलाती है या किसी राजनैतिक दल की अथवा गठबंधन की मिली जुली खिचड़ी जैसी सरकार । खिचड़ी अमूमन मज़बूरी से खाई जाती है शौक से अधिकांश लोग नहीं खाते हैं । जिनको खिचड़ी पसंद भी होती है उनको भी खिचड़ी के हैं चार यार घी , पापड़ ,  दही , अचार साथ चाहिएं ही । गठबंधन भी कुछ मिलता जुलता होता है यारी निभाने में सरकार अक्सर खुद और बीमार होने लगती है । 

     विषय की बात करते हैं जो भी कुछ बनाता है वो उसकी होना आवश्यक नहीं है , घर कोई बनाता है उस में रहना किसी और को होता है । जनता सरकार को बनाती है पर जनता सरकार की मालिक नहीं सरकार को जनता अपनी गुलाम लगती है । शासक बनकर जनता के पैसे से शानो शौकत ठाठ-बाठ राजनेताओं का अधिकार होता है और जनता को उसका हक़ भी सरकारी ख़ैरात की तरह मिलता है । होली पर सरकारी फ़रमान जारी हुआ है कि सरकार की धूमिल होती छवि को झाड़ पौंछ कर सुथरा नहीं चमकदार बनाया जाना चाहिए । सोशल मीडिया पर ध्यान पूर्वक निगाह रखनी है और गरीबी भूख बेरोज़गारी से लेकर बेदर्दी एवं तानाशाही को भला किया जा रहा घोषित करना ज़रूरी है । उदाहरण स्वरूप एमरजेंसी को आपात्काल इक अनुशासन पर्व है के इश्तिहार चरों तरफ दिखाई देते थे । सब को यकीन होने लगा था देश कोई त्यौहार मना रहा है बस उसको दोहराना है सुशासन लाना घोषित करना है जनता को उल्लू बनाना है । जनता को देशभक्ति का सबक पढ़ाना है खुद देश को बर्बाद कर जश्न मनाना है , नीरो की तरह बंसी बजाना है । अगला चुनाव जीतना है शतरंज का खेल खेलते हैं हर दांव आज़माना है । सबसे ज़रूरी मोहरा वज़ीर है फ़िल्म का नाम भी वज़ीर है ये आख़िर में राज़ बताना है जो खुद को राजा रानी घोड़े हाथी समझते रहे उनको प्यादों से पिटवाना है । मौसम भी आशिक़ाना है कहीं से सत्ता को अपने पास लाना है पाक़ीज़ा का युग नहीं कोठे पर मुजरा नहीं देखने जाते ठेकेदार से नवाब साहब तलक सरकार का जिनसे गहरा याराना दोस्ताना है उनका दिल क्या मांगता है समझना है उनको समझाना है । सत्ता की नर्तकी को दरबार में नचवाना है आइटम सॉन्ग का लुत्फ़ उठाना है महिला दिवस को होली संग मिलाना है औरत को बस इक इस्तेमाल की चीज़ बनाकर उसका भविष्य उज्जवल बनाना है इक्कीसवीं सदी का आधुनिक ज़माना है । राज़ खुला तो बात ये निकली है कि सरकार महिला दिवस पर होली का हास्य कवि सम्मेलन आयोजित करवाना चाहती थी इस लिए इक व्यंग्यकार जो महिलाओं की बड़ी चिंता करता है उसी से ये फ़रमान लिखवा कर भिजवा दिया लेकिन समय पर गंभीर बात को इक मज़ाक़ था कहकर पीछा छुड़ा लिया है । 



 
  


मार्च 07, 2023

POST : 1622 भगवान परेशान मैं हैरान ( होली की ठिठोली ) डॉ लोक सेतिया

     भगवान परेशान मैं हैरान ( होली की ठिठोली ) डॉ लोक सेतिया 

नशे का चढ़ा हुआ खुमार था 
मैं था फुटपाथ पर खड़ा हुआ
 
कर रहा नहीं आने वाले का
बड़ी बेताबी से इंतिज़ार था । 
 
होली के रंगों का सजा इक 
हुड़दंग का खुला बाज़ार था 
 
अजनबी जाना पहचाना वही 
घोड़े पर शान से सवार था । 

उसने मुझे आवाज़ देकर बुला 
नाम पता ठिकाना पूछ लिया  
 
याद नहीं देखा लगते कहा तो
बतलाया कलयुगी अवतार था । 
 
कहने लगा मुझे लिखते हो क्या 
किसलिए भला मिलता है क्या 

मैंने कहा खुद क्या तुमने किया 
दुनिया बना नहीं बंदा खुश था ।
 
ऐसा लगा परेशान था ख़ुदा बड़ा
थोड़ा सा घबरा गया शरमा गया
 
कोई जवाब नहीं देने को सूझा
बेबस बेचारा हुआ लाचार था । 

उसने सुनाई दास्तां ज़ुबानी तब
दुःखी आवाज़ भरा हुआ गला 

दुनिया ज़माने से इंसानों से
भगवान हो गया बेज़ार था । 

दिल में छुपा कर रखते हैं 
मुहब्बत जिस को कहते हैं  

सोशल मीडिया पर क्योंकर 
तमाशा बनाया दिलदार था ।
 
बस शोर है हर तरफ मचा यही
भगवान है धर्म क्या चीज़ क्या
 
वजूद बदल गया कोई बोलो
कब भला मैं कहीं सरकार था । 
 
जिस ने जैसा चाहा मर्ज़ी से
खिलौना बना खेला है मेरे संग 

हैरान हूं परेशान हूं इंसाफ़ करो 
बेख़ता सज़ा का न हक़दार था ।  
 

तस्वीरों तकरीरों सोशल मीडिया
के जंगल में भटका दिया मुझको 
 
नहीं जानता कौन भगवान बना हुआ
मैं तो ऐसा नहीं बस रूहानी प्यार था ।
 
 









मार्च 06, 2023

POST : 1621 भांग पड़ी कुंएं में आग लगी धुंएं में ( होली कथा ) डॉ लोक सेतिया

 भांग पड़ी कुंएं में आग लगी धुंएं में ( होली कथा ) डॉ लोक सेतिया  

   अच्छा हुआ कि खराब हुआ अब इस पर सोचना बेकार है बस जो होना था हुआ हो गया । शोध चल रहा था जिस रोग की दवा खोजने का वो रामबाण दवा आखिर बन ही गई ये अलग बात है वक़्त तो लगता ही है और वक़्त इतना लग गया कि दवा की ज़रूरत नहीं रही रोग खुद ही ख़त्म हो गया । होली का शुभ दिन है उस नामुराद का नाम भी नहीं लेना अच्छा है । बड़े साहब से आदेश मिला होली मनानी है कोई बढ़िया चीज़ असरदार बना कर भेजनी है । शोध पर ध्यान देकर गहन विचार विमर्श किया तो बेहद अद्भुत जानकारी मिली कि बनाई गई दवा आदमी को पिला कर सच्चाई और ईमानदारी पैदा हो जाती है और इंसान को सही गलत की पहचान होने लगती है मुर्दा ज़मीर ज़िंदा हो जाता है । अपनी प्रयोगशाला में सभी साथी कर्मचारियों पर आज़माया और परिणाम सफल रहा । बड़े साहब को गोपनीय जानकारी दी गई और भरोसा दिलवाया गया कि होली पर आपके सभी साथी सहयोगी अधीनस्थ कर्मचारियों अधिकारियों को भांग में मिलाकर ये दवा पिलाई जाए तो सभी अच्छे सच्चे ईमानदार बन जाएंगे । भांग का नशा उतरेगा लेकिन दवा का असर साल से अधिक अवधि तक रहेगा ही रहेगा और उस के बाद अगली होली पर दूसरी खुराक पिलाई जा सकेगी ।  
 
बड़े साहब समझदार हैं उन्हें भलीभांति मालूम है कि खास कुछ लोगों और खुद अपने आप को ईमानदारी की दवा कदापि नहीं पिलानी है बाकी सभी को वफ़ादार और ईमानदार बनाना फायदे की बात है । साहब ने उस दवा को देश भर में जहां जहां उनकी महिमा का विस्तार था भिजवा दी ताकि सभी उनके समर्थक उनको मसीहा समझने वाले उनके ही बनकर जीवन सफल करने की धारणा बनाए रखें । असंख्य लोगों को दवा पिलाई गई जो भांग या नशा नहीं करते थे उनको भी साहब की सलामती की शपथ देकर पीने को मनवा लिया गया । 
 
चार दिन बाद परिणाम सामने था जिन्होंने दवा मिली भांग पी थी वो जब भी झूठ बेईमानी हेराफेरी घूसखोरी का कार्य करने लगते आस पास सभी को इक दुर्गंध का आभास होता और इक घबराहट बेचैनी भ्र्ष्टाचार अनुचित कार्य करने वाले को महसूस होने लगती । दवा बनाने वालों से इस पर सपष्टीकरण मांगा गया क्योंकि साहब को अपने आस पास हर किसी से दुर्गंध आने लगी थी । दवा बनाते समय ये उपाय किया गया था कि जिन्होंने दवा की ख़ुराक ली उनको रोग करीब आने की आहट इक सुगंधित खुशबू की तरह लगे लेकिन फिर से चपेट में आने का खतरा होने पर दुर्गंध का एहसास जहां तक हवा की पहुंच हो वहां तलक पता चल जाए ।
साहब को बताया गया कि ये तो खुद एक जांच की तरह है रिश्वतखोर चोर अनुचित कार्य करने वालों से दुर्गंध मिलते ही लोग समझ जाएंगे कि आदमी खराब है । निकलो न बेनकाब ज़माना ख़राब है ग़ज़ल की तरह है । साहब की समस्या ख़त्म नहीं हुई बढ़ गई है अब किसी पर भी भरोसा करना तो क्या अपना हुक़्म चलाना कठिन होने लगा है । जैसे साहब कोई काम करने को आदेश देते हैं गुलाम जी हज़ूर कहते हैं और उनका कमरा ही नहीं घर से मीलों दूर तक बदबू लोगों को परेशान करने लगती है जैसे उनके आलीशान भवन जैसे महल में दुनिया भर की गंदगी का ढेर पड़ा हुआ है । कालीन जिन को ढके छुपाए रहते थे सब को खबर हो रही है । 
 

होली पर स्वदेशी गीत : - 

सबको हमने फूल बनाया , फूल उगाना था बेकार 

( उल्लू - अप्रैल फूल )   

लाये हैं कांटों की बहार , इक हूं मैं दूजे मेरे यार । 

तुम हो सत्ता की कुर्सी , खाती वफ़ादारी की कसमें 

कौन चोर कौन साहूकार , कुछ मत पूछो मुझसे यार । 

दोनों लगा कर रंग बेशर्मी का , राजनीति की होली खेलें 

लोकलाज को छोड़ो भी अब , टीवी की नकली तकरार । 

मैं करता हर किसी से छेड़छाड़ , रोक सकेगा मुझे कौन 

डुबोकर सबको जाना पार है , मेरी जीत सभी की हार । 

जोड़ी क्या  खूब बनाई अपनी , तुम हो झूठी मैं मक्क़ार । 


 

मार्च 03, 2023

POST : 1620 मुन्नाभाई को आदर्श बना लिया है ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

    मुन्नाभाई को आदर्श बना लिया है ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

दिल को  बहलाने को वक़्त बिताने को ग़म को छुपा कर मुस्कराने को खेल तमाशा देखना दिखलाना ठीक बात हो सकती है लेकिन जनता के दर्द को समस्याओं को सुलझाने की जगह दिखावा करने को तमाशा करना ज़ुल्म की इंतिहा है । सरकार का काम लोकतंत्र के शासन में खेल तमाशे करना नहीं ईमानदारी निष्ठा से अपने कर्तव्य का निर्वहन करना होना चाहिए मगर अफ़सोस है सत्ता पर चयन होने निर्वाचित होने या नियुक्त होने पर जो शपथ उठाई जाती है निभाई नहीं जाती अन्यथा समस्याओं का समाधान होना असंभव नहीं था । भेड़चाल की तरह देश की सरकार से राज्य की सरकारों विभागों एवं अन्य संगठनों संस्थाओं ने मुन्नाभाई को आदर्श बना लिया है और रोगग्रस्त समाज को उपचार की जगह जादू की झप्पी से लेकर मरने से पहले आखिरी आरज़ू पूरी करने को अस्पताल में अर्धनग्न नर्तकी का नाच गाना करवाया जाता है और विडंबना देखिए दर्शक से फ़िल्मी भर्ती रोगी तक किसी की मौत पर तमाशा देख तालियां बजाते हैं । लेकिन राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी शायद भूल रहे हैं कि नाटक में किरदार वास्तव में नहीं मरता जबकि यहां आपकी व्यवस्था की बदहाली से लोग रोज़ बेमौत मरते हैं । जब कोई अधिकारी कानून व्यवस्था की नाकामी पर कोई आडंबर करता है जनता को दिखाने को समारोह की तरह आयोजित करता है विभाग को मुस्तैद करने का तमाशा शहर भर में मीडिया में दिखाने को तब अपराधी खलनायक की अट्ठास करते हैं और जिनको दर्द हुआ उनके ज़ख्मों पर नमक छिड़कने का कार्य होता है । ऐसा कोई नेक दिल इंसान नहीं कर सकता और वही कर सकता है जिसका विवेक उसको रोकता नहीं गंभीर समस्या को उपहास बनाकर झंडी दिखा कर जुलूस की तरह परेड करवाने का खेल करने से ।  
 
शासक बनते ही भला चंगा आदमी कैसे बदल जाता है और कर्तव्य निभाना भुलाकर अपने पद का उपयोग अधिकारों की लाठी से बेहरम बन सामान्य नागरिक को डराने धमकाने और शोषण करने लगता है जबकि ख़ास वर्ग धनवान रसूखदार लोगों से दोस्ती निभाता है उनको मनमानी करने की आज़ादी देता है । देश क्या सच इस तरह से आज़ाद है कि कुछ मुट्ठी भर लोग मनमर्ज़ी कर सकते हैं बाक़ी जनता बेबस लाचार ज़ुल्म सहकर ज़ालिमों से गुहार लगाती है दया रहम की भीख याचक बन कर मांगती खड़ी उनके दरवाज़े पर । जनता से नेता अधिकारी ऐसे पेश आते हैं जैसे कोई मुजरिम बिना अपराध क्षमा की विनती करता है । जो नियम कानून देश की जनता की भलाई नहीं करते बल्कि उनका जीना मुश्किल करते हैं उनको बदला हटाया जाना चाहिए था लेकिन यहां हर शासक सत्ता मिलते ही और तानाशाही करने की खातिर अपनी साहूलियत से कानूनों को सख्त बनाता जनता पर थोपने को और शासक वर्ग धनवान सुविधा संपन्न लोगों से भाईचारा निभाते हुए उनके लिए हर कायदा कानून लचीला मुलायम और जब चाहे तोड़ने की राह बनाता है । 
 
कहीं पढ़ा था कुछ लोग रोमंच और आनंद महसूस करते हैं किसी को तड़पता रोता बिलखता देख कर जबकि कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जिनको ज़ुल्म सहने की आदत पड़ जाती है और समय गुज़रते उनको अपने दर्द से भी लगाव हो जाता है । आशिक़ी मुहब्बत की बात और है लेकिन न्यायपालिका कार्यपालिका निष्ठुर और असंवेदनशील हों तो समाज और इंसानियत पर खतरा मंडराने लगता है । डॉक्टर अगर मरीज़ की व्यथा सुनता नहीं तो रोग ठीक नहीं हो सकता और बढ़ता ही जाता है । 75 साल से देश की जनता ही नहीं बल्कि संविधान तक से यही होता रहा है । कुछ लोगों ने सत्ता धन और शोहरत ताकत हासिल करने के मकसद से संसद संविधान अन्य संस्थानों को असाध्य रोग का बीमार बना दिया है । लाशों पर खड़े होकर हंसने वाले क्या कहलाते हैं जानते हैं सभी । सबसे अधिक महत्वपूर्ण सवाल इक चिंता का विषय यही है कि फिल्म का मुन्नाभाई खुद को समाजसेवक समझता था जबकि था इक गुंडा मवाली जिस को हमने नायक समझ लिया । लेकिन भूल गए उसका अस्पताल फ़र्ज़ी था रोगी भी फ़र्ज़ी थे वास्तव में बीमार नहीं थे । जबकि यहां फ़र्ज़ी डॉक्टर की तरह खुद को देश समाज जनता का सेवक कहने वाले शासक असली समस्याओं को उपहास समझने लगे हैं । उनकी समस्या सिर्फ और सिर्फ अपने स्वार्थ ऐशो-आराम और शासकीय अधिकार शानदार राजसी जीवन की आकांक्षा ही है ।  
 
मुहब्बत ही न जो समझे वो ज़ालिम प्यार क्या जाने , 
 
किसी फ़िल्म में महबूबा पर लिखी ग़ज़ल मौजूदा समय के हालात में सरकार पर खरी लगती है । 
 
उसे तो क़त्ल करना और तड़पाना ही आता है  , गला किस का कटा क्योंकर कटा तलवार क्या जाने । 
 

 

फ़रवरी 21, 2023

POST : 1619 भगवान का व्हाट्सएप्प नंबर ( अद्भुत-अविश्वसनीय ) डॉ लोक सेतिया

  भगवान का व्हाट्सएप्प नंबर ( अद्भुत-अविश्वसनीय ) डॉ लोक सेतिया 

     आखिर ऊपरवाले को सोशल मीडिया अकॉउंट बनवाना ही पड़ा , दुनिया बदल चुकी है साधु संत तक आधुनिक ढंग से पूजा ईबादत आरती से लेकर घर बैठे साक्षात दर्शन धार्मिक स्थल के ऑनलाइन करने करवाने लगे हैं ।  इधर सब नकली बाज़ार में बिकता है भगवान तक असली हैं इसकी पहचान मुश्किल हो गई है । काफी समय पहले मैंने खुद ईश्वर से विनती की थी आधुनिक संचार माध्यम का उपयोग कर अपनी बनाई दुनिया की असलियत वास्तविकता सच्चाई को देखने समझने की । इसलिए कि मुझ जैसे नासमझ लोग रोज़ सुबह फेसबुक मेसेंजर व्हाट्सएप्प पर धर्म की बातें देवी देवताओं की तस्वीरें और चौंकाने वाले आपको विवश करने वाले संदेश पढ़ पढ़ कर घबराने लगे हैं कि यहां सोशल मीडिया वाले भगवान को नाराज़ किया तो कुछ भी हो सकता है । बाक़ी चाहे जो भी हो जाए कोई चिंता नहीं मगर अगर कहीं सोशल मीडिया का अकॉउंट बंद कर दिया उस ने तब कैसे ज़िंदा रह सकते हैं । 
 
     ठीक से जांच परख लिया कि व्हाट्सएप्प पर असली भगवान से वार्तालाप हो रहा है तब जाकर उन से खुल कर अपने मन की बात कहनी पड़ी । मैंने पूछा भगवान दुनिया में करोड़ों करोड़ों लोग आपसे विनती करते हैं उनकी प्रार्थनाएं उनकी फ़रियाद पर जाने क्यों लगता है कि आप सुनवाई ही नहीं करते हैं । भगवान ने जो बताया बिल्कुल सच है इसलिए आपको सभी को उनकी कही बात बतानी आपकी भलाई में आवश्यक है । भगवान ने बताया जब कोई आदमी किसी भी आदमी के पास जाकर अपनी समस्या बताता है या सहायता मांगता है या फिर परेशान होकर हाथ जोड़कर विवशता पूर्वक निवेदन करता है कि आप धनवान बलवान और ताकतवर हैं मगर मैं कमज़ोर बेबस लाचार इंसान हूं कृपया मुझ पर रहम करें मुझे बिना अपराध सज़ा देना छोड़ दें और जीने दें चैन से । लेकिन अहंकार और अपनी दौलत शासकीय अधिकार शारीरिक ताकत के कारण वो उस का दर्द नहीं समझता और मनमानी करता है तब मुझे ऐसे लोगों को ब्लॉकलिस्ट करना पड़ता है । भला ऐसा कैसे संभव है पूछा तो कहने लगे साधारण सी बात है आपको कितने संदेश मिलते हैं लेकिन जिनको चाहते हैं उनको छोड़ बाकी को एक क्लिक से डिलीट कर देते हैं इतना ही नहीं जिनकी बात से आप सहमत नहीं जिनको पसंद नहीं करते उनको नाराज़ होकर ब्लॉक कर देते हैं ।  सोचते तक नहीं आप कौन हैं कोई नेता डॉक्टर या भाई बंधु हैं जिनकी ज़रूरत किसी को पढ़ सकती है कभी भी लेकिन आपकी सुविधा आपकी मनमानी उनको आपसे बात तक नहीं करने देती और वो व्यक्ति निराश बेबस होकर रह जाता है कुछ भी नहीं कर सकता है । विधि का यही विधान है जो दूसरों से जैसा व्यवहार करता है उसको उसकी करनी का वैसा ही फल मिलता है जब कोई मेरे बनाए इंसानों की बात अनसुनी करता है तब उस उस की बात मुझ तक नहीं पहुंचती जैसे आपने टीवी का फोन का म्यूट बटन दबाया होता है तब आवाज़ बंद हो जाती है ।
 
  भगवान से इस विषय का कोई संबंध तो रत्ती भर भी नहीं फिर भी उत्सुकतावश मैंने सवाल किया , भगवान क्या आपके संचालन में भी कोई साइट्स या ऐप्प्स हैं जो कभी ठीक काम नहीं करती कभी रुकावट की बात पर खेद जताती हैं । नहीं मैंने कभी अपने को मशीनों का गुलाम नहीं बनाया है अन्यथा सोचो अगर मैंने हवा पानी सूरज चांद रात दिन को उजाले-अंधेरे को शासकों सरकारों के हवाले कर दिया होता तो जनता को किस किस की क्या कीमत चुकानी पड़ती और कभी किसी कारण सरकारी साइट ऐप्प्स बंद हो जाती हो लोग कुछ ही पलों में बेमौत मर जाते । कभी अमिताभ बच्चन जी ने ब्लॉग पर सूचित किया था कि उनके पास ईश्वर का ईमेल है जिस पर संवाद किया करते हैं मगर उन्होंने बताया नहीं सबको क्योंकि सब उनके बराबर नहीं हो सकते हैं लेकिन मुझे कोई राज़ छुपाकर नहीं रखना है जिस को जब चाहिए मुझसे मिलकर नंबर मांग सकता है । थोड़ी ज़हमत उठानी पड़ती है कुछ पाने को बस इरादा कर कोशिश करने से क्या नहीं मिल सकता है ।  
 
व्हाट्सएप का नया फीचर, शेयर करे सभी फॉर्मेट की फाइल | Hari Bhoomi

फ़रवरी 18, 2023

POST : 1618 राजनीति की लघुकथा ( हक़ीक़त भी अफ़साना भी ) डॉ लोक सेतिया

   राजनीति की लघुकथा ( हक़ीक़त भी अफ़साना भी ) डॉ लोक सेतिया 

   सरकार का संदेशा मिला है कितने साल हुए क्या किया पर जनता को संबोधित किया जाएगा । क्या हासिल होगा कोई नहीं जानता बस जनता को भरोसा दिलवाना है सरकार चल रही है । कितने दरवाज़े खोलने की बात होती है और अधिकांश ज़रूरत पड़ने पर पता चलता है आजकल बंद है  कुछ दिन बाद खुलेगा । सरकारी वेबसाईट ऐप्प खुद इक जाल है जो इंसान से इंसान को अलग कर मनमानी करता है लेकिन सरकार की साहूलियत है किसी सरकारी बाबू अधिकारी को जनता से बात कर परेशान नहीं होना पड़ता । सरकारी वेबसाईट पर लगाकर पिंड छुड़ाते हैं और दावा करते हैं आसानी होगी जबकि मुसीबत बढ़ती गई है । शायद कभी मंत्री अधिकारी नहीं कंप्यूटर साइट्स ऐप्स शासक बनकर काम का काम तमाम करेंगी । मशीन कभी संवेदना नहीं करती समझती और आजकल सरकारी लोग मशीन की तरह मानवीय संवेदनाओं से रहित हो गए हैं । मंदिर मस्जिद पूजा धर्म अनुष्ठान व्यर्थ हैं जब शासक बन कर अधिकारी नेता चुनाव से किसी पद पर बैठ कर जनता से उचित संवाद नहीं करते मनचाहे ढंग से जनता को रोज़ मुजरिम की तरह गुनहगार बनाकर खड़े करते हैं अनावश्यक नियम कानून से और फ़ायदा उठाने को जबकि बनाया जाता है राह आसान करने को ।   शासक बनते रोड़े बनकर परेशान करते हैं सामान्य नागरिक को और खुद जब जैसे मर्ज़ी करने को आज़ाद हैं ।  
    
     घटना कुछ दिन पहले की है जिनको चुनकर नगर का भाग्यविधाता बनाया था जनता ने बैठे थे किसी जगह अपना दुखड़ा सुना रहे थे । चलो थोड़ा पहेली बना कर आपको समझने या हल करने का कार्य करते हैं ताकि कुछ आनंद आप को आये और थोड़ा लुत्फ़ हम भी उठा सकेंगे । कहानी की रोचकता मज़ा देती है हम किरदार को भगवान और पुजारी एवं भक़्त का आवरण पहनाते हैं जैसे नाटक में रामलीला में किया जाता है । पुजारी जी के दफ़्तर गया था कि वहां साक्षात भगवान विराजमान थे । मेज़ पर मधुर मिष्ठान पड़ा था , नहीं मालूम भगवान को अर्पित किया था पुजारी जी ने अथवा स्वयं भगवान लाये थे पुजारी जी की खातिर , मगर मुझे क्या स्वादिष्ट मिष्ठान मिला खाकर धन्यवाद किया । 
 
    पुजारी जी कह रहे थे आपको बनाया जिन लोगों ने मालिक भाग्यविधाता सुना है दर दर भटक रहे हैं उनकी समस्याओं की सुनवाई नहीं होती है । भगवान के आधुनिक अवतार की आवाज़ में बेबसी दर्द छलक आया था , बोले आपको क्या बताएं लोग मुझसे मिलते ही नहीं । इधर उधर भटकते रहते हैं अन्य तमाम लोगों के पास जाकर समस्या बताते हैं जो समाधान नहीं करते उलझन बढ़ाते हैं । पुजारी जी कहने लगे आप सबको बतलाओ मुझसे मिलो अपनी समस्या की बात बताओ , भगवान खामोश हो गए फिर सोच कर बोले कोई तरीका बताओ कैसे सबको जानकारी मिले कि मैं चाहता हूं लोग सीधे मुझसे संवाद स्थापित करें । पुजारी जी ने अपने यूट्यूब चैनल पर उनका साक्षात्कार रिकॉर्ड किया और सोशल मीडिया पर जारी कर दिया ।   
 
  मुझे काम आन पड़ा तो ध्यान आया वो मुझ से दूर नहीं हैं और मैं उनसे बात कर उनसे मुलाक़ात करने उन्हीं के स्थल पर चला गया । चर्चा की परेशानी बताई तो जवाब मिला ये कोई कठिन समस्या ही नहीं है आप चिंतामुक्त होकर जाएं मेरा नियुक्त सहायक खुद आपकी समस्या सुलझवाने आपसे आकर मिलेगा । लेकिन समस्या का समाधान कब कौन करेगा अभी तक नहीं पता चला है । ऊपरवाले की शासन व्यवस्था इसी ढंग की है सबको दर्शन देते हैं हाथ उठाकर वरदान देने की तरह मगर उस के बाद क्या हुआ उनको फुर्सत नहीं मिलती क्योंकि खुद अपनी समस्याओं में फंसे हुए रहते हैं । भगवान भी मोह माया के जाल में उलझे हैं और उसके सभी  विभाग अधिकारी हर दिन उसकी महिमा का गुणगान करने से खाली ही होते , जनता की सुनवाई हो भी तो आखिर कैसे और समाधान करने की चाहत भी किस अधिकारी को है । जिसे देखो हर कोई अपनी उलझन में उलझा हुआ है । सरकार इसी को कहते हैं जो चलती रहती है किसी कोल्हू के बैल की तरह घूमती रहती है कहीं नहीं पहुंचती बस वहीं की वहीं रहती है । जनता को कोल्हू की ओखली में डालकर पीसते हैं उसका खून है जो पैसा बन कर अर्थव्यवस्था का संचालन कर रहा है । लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की सेवा इसी ढंग से की जाती है । 
 
 कोल्हू के बैल के आंखों पर पट्टी क्यों बांधा जाता है और वह बिना हांके ही  कैसे चलता रहता है ? - Quora

जनवरी 29, 2023

POST : 1617 दर्द भरी दास्तां ( अफ़साना ग़ज़ल का ) डॉ लोक सेतिया

       दर्द भरी दास्तां ( अफ़साना ग़ज़ल का ) डॉ लोक सेतिया 

ग़ज़ल की हालत देख कर आंसू निकल आए , इतने शानदार सभागार में मुशायरा आयोजित किया गया था , ग़ज़ल की उदासी देखी नहीं गई । देखा खड़ी थी अकेली इक कोने में अपने दर्द को अकेले सहती छुपती हुई , दुःख को छुपाती हुई । हाथ जोड़ निवेदन किया चलो आपकी जगह सामने सजे मंच पर है यहां नहीं आप को सुनने आये हैं हज़ारों चाहने वाले । ग़ज़ल कहने लगी ठीक से पढ़ो कहीं लिखा है मेरा नाम सब को किसी नाम वाले शायर को सुनना है देखो कितने शायरों के नाम उनकी तस्वीर लगी हैं बैनर पर ग़ज़ल की कोई तस्वीर कोई नाम होता नहीं है एहसास हुआ करते हैं । ग़ज़ल की बात कोई नहीं करता इन दिनों कुछ लोग जिनकी शोहरत है उनकी बात होती है मेरे अपने हैं लेकिन मुझसे अनजान हो गये हैं नाम शोहरत पहचान दौलत मिली तब से बेगाने बन गए हैं । ग़ज़ल ने अपनी दर्द भरी दास्तां मुझे सुनाई शायद किसी और को ग़ज़ल को क्या हुआ क्या क्यों हो रहा उसको घायल किया जा रहा कि क़त्ल किया जाने लगा है समझने की फुर्सत नहीं थी । तालियां बजती रहीं वाह वाह लोग कहते रहे और शायर लोग ग़ज़ल से बढ़कर जाने क्या क्या करते रहे । अब उसकी हिक़ायत खुद ग़ज़ल की ख़ामोश लबों की ज़ुबानी लिखी नहीं कही है उसने समझना चाहो तो समझना पढ़कर भूल मत जाना । 
 
महफ़िल में मुझे टुकड़े टुकड़े कर हिस्सों में बांटकर सुनाने वाले क्या मेरे आशिक़ हैं कोई शेर किसी ग़ज़ल का कोई मतला कोई बीच का भाग जैसे किसी महबूबा माशूका के मुखड़े जिस्म के अंगों की नुमाईश बाजार में कोई करे ।  ग़ज़ल आधी-अधूरी क्या मुकम्मल अच्छी नहीं लगती जैसे होंट आंखें कमर छाती हाथ पांव सब मिलाकर उसकी शख़्सियत की बात नहीं करते जिस्म को देखते हैं रूह से वाकिफ़ नहीं जो लोग । कोई किसी आयोजक को मुख़ातिब होकर पढ़ता है कोई अपनी किसी बात से जोड़ता है । ग़ज़लियत की ग़ज़ल की नफ़ासत की नाज़ुकी की ईशारों की मुहावरेदार भाषा की स्वभाव की बात को दरकिनार कर पथरीली आवाज़ में किसी जंग किसी नफरत की राजनीति से धर्म की चर्चा होती है जबकि ग़ज़ल का इस सब से कोई भी सरोकार कोई रिश्ता नहीं होता है । शासक राजनेता अधिकारी वर्ग संवेदना शून्य लोग मानवीय दुःख दर्द से जिनका कोई नाता नहीं मंच से शायरी करते हुए शायर और उसके अल्फ़ाज़ को बेरहमी से क़त्ल करते हैं । भला मेरा उनसे कोई संबंध मुमकिन है ग़ज़ल सच का आईना है सोने चांदी के गहनों से झूठ को सजाकर कुछ हासिल नहीं हो सकता हैं । अब न तो ग़ज़ल कहने का शऊर है शायरों में और न सुनने वालों में सुनने का सलीका और कोई पैग़ाम भी नहीं देती आधुनिक युग की रास्ता भटकी ग़ज़ल नाम की रचनाएं । 
 
ग़ज़ल किसी को बड़ा छोटा नहीं समझती और न किसी की महिमा का गुणगान करती है न ही किसी से टकराव करना जानती है ।  ग़ज़ल प्यार मुहब्बत इंसानियत का संदेश देती है उसको किसी सरहद की दिवारों में कैद करना मुमकिन ही नहीं है । ग़ज़ल ने इक सवाल पूछा है दुनिया भर में ग़ज़ल की महफ़िल सजाने वालों से कि वहां ग़ज़ल सुनने कहने पढ़ने कौन आते हैं और कौन किसी नाम वाले शायर को सुनने आते हैं । अगर ग़ज़ल की बात है ग़ज़ल से इश्क़ है तो बस ग़ज़ल का ज़िक्र हो बाक़ी सब को छोड़कर । ग़ज़ल कहने वालो मुझे अल्फ़ाज़ से बहर में छंद का ख़्याल रखते हुए बयां करना सीख लिया और मधुर स्वर में गाकर सुनने वालों को मुग्ध कर लिया लेकिन तौर तरीका अंदाज़ मेरे साथ मेल खाता नहीं तो बनाव श्रृंगार किस काम का । कवि सम्मेलन मुशायरे शोर लगते हैं ग़ज़ल से जो सुकून मिलता है वो नहीं दिखाई देता है । जो सुनकर लोग भीतर अंतर्मन तक महसूस कर स्तब्ध नहीं हो जाएं और ताली बजाना वाह वाह करना भूल खामोश रह जाएं वो लाजवाब ग़ज़ल सुनाई नहीं देती जो सभा से उठकर घर जाने पर भी ज़हन में गूंजती रहती हो ।  
 

 आखिर में मेरी डॉ लोक सेतिया 'तनहा' की इक ग़ज़ल पेश है  :-

दिल पे अपने लिख दी हमने तेरे नाम ग़ज़ल
जब नहीं आते हो आ जाती हर शाम ग़ज़ल ।

वो सुनाने का सलीका वो सुनने का शऊर
कुछ नहीं बाकी रहा बस तेरा नाम ग़ज़ल ।

वो ज़माना लोग वैसे आते नज़र नहीं
जब दिया करती थी हर दिन इक पैगाम ग़ज़ल ।

आंसुओं का एक दरिया आता नज़र मुझे
अब कहूँ कैसे इसे मैं बस इक आम ग़ज़ल ।

बात किसके दिल की , किसने किसके नाम कही
रह गयी बन कर जो अब बस इक गुमनाम ग़ज़ल ।

जामो - मीना से मुझे लेना कुछ काम  नहीं
आज मुझको तुम पिला दो बस इक जाम ग़ज़ल । 
 

 

जनवरी 23, 2023

POST : 1616 दुनिया बनाने वाला हैरान परेशान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     दुनिया बनाने वाला हैरान परेशान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

कुछ बात ऐसी हुई कि ऊपरवाला खुद अपने निवास स्थान को छोड़ नीचे धरती पर चला आया । सोचा था शायद वहीं चैन सुकून मिला तो वापस आसमानों की तरफ भूले से भी देखना नहीं । धरती पर आकर देखा तो दुनिया बदल चुकी थी जैसी उसने बनाई और जिस भविष्य की कल्पना कर धारणा बनाकर छोड़ दिया था दुनिया को खूबसूरत से भी बढ़कर शानदार सभी के जीने ख़ुशी से रहने को तमाम चीज़ें उपलब्ध करवा कर उसका कोई वजूद ही नहीं था । उसने कभी ऐसी दुनिया बनाने की चाहत नहीं की थी ये कोई और किसी शैतान की बनाई दुनिया लगती है । घूमते फिरते अजनबी लोगों से पूछता रहा ये कौन सी दुनिया है किस ने बनाया है ये सब तबाही का मंज़र दिखाई देता है कोई भी यहां जितना भी हासिल है उस को पाकर संतुष्ट नहीं है । चलते चलते कितने बड़े बड़े महल जैसे मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरजाघर कितने धर्मों के धार्मिक स्थल नज़र आये काफी तहकिक़ात के बाद पता चला ईश्वर अल्लाह जीसस वाहेगुरु रहते हैं उन जगहों पर । देवी देवता पीर पय्यमबर फ़रिश्ते मसीहा संत साधु उपदेशक असंख्य नाम वाले गली गली शहर शहर बस्ती बस्ती गांव गांव विराजमान हैं जिनकी आराधना पूजा ईबादत आरती महिमा का गुणगान होता है । धन दौलत चढ़ावा तरह तरह के व्यंजन उनको भोग लगाए जाते हैं हीरे जवाहरात सोना चांदी के ज़ेवरात पहनाए जाते हैं । खुदा को अल्लाह को बंदे मनाए जाते हैं किस बात से खफ़ा हुआ दुनिया का मालिक कोई नहीं जानता भजन आरती अरदास क्या क्या नहीं जिस को रोज़ सुबह शाम दोहराए जाते हैं । इक पहेली है विधाता ईश्वर ख़ुदा कितने नाम हैं सभी सुलझाने की बात नहीं करते उलझन को बढ़ाए जाते हैं । इक दुनिया बनाने वाले के अनगिनत तस्वीरें बुत क्या क्या नहीं बनाकर बाज़ार में सिक्का जमाए मुनाफ़ा कमाए कारोबार चलाए जाते हैं ।  किसी कंपनी की तरह शाखाएं खोलते जाते हैं ख़रीददार को जो मांगोगे मिलेगा की तरह झांसा देकर उल्लू बनाए जाते हैं । 
 
आखिर उपरवाले को एहसास हुआ कि दुनिया को बनाकर उसे अपने हाल पर छोड़ आज़ादी से सबको मनमानी करने की छूट देना बड़ी गलती थी और उसको खुद हर दिन पल पल संभालना भी उसका दायित्व था । कुछ सहायकों को देखभाल करने को नियुक्त करने से सब सुचारु ढंग से नहीं चल सकता था । बहुत सोचने चिंतन करने के बाद विधाता ने निर्णय लिया जब तक तमाम समस्याओं को समझ नहीं लेते और समाधान नहीं खोज लेते उस आकाशलोक में नहीं लौटना है । बहुत दिन से दुनिया का मालिक फुटपाथ पर रह रहा है । उधर ऊपर जब मालिक बहुत समय तक दिखाई नहीं दिए तो उस लोक में सबको चिंता होने लगी ढूंढते ढूंढते थक गये सभी तब राज़ खुला किसी ने कटाक्ष किया था मालूम भी है जिस दुनिया को बनाया था किस हाल में है । भारत देश के लोकतंत्र की तरह सिंघासन पर विराजमान शासक अधिकारी सोचते हैं सब बढ़िया है शानदार है क्योंकि सरकारी आंकड़े योजनाएं सभी दिखलाते हैं चारों तरफ हरियाली है फूल ही फूल खिले हैं । भूख गरीबी बदहाली अन्याय अपराध भेदभाव जनता की समस्याएं कब की मिटाई जा चुकी हैं उन फाईलों को दीमक चाट गई है और अधिकारी कर्मचारी सरकारी अनाज के गोदामों को पेट भरकर खाते खाते मस्ती में झूमते रहते हैं । देश का सारा धन दौलत साधन पांच फ़ीसदी अमीरों का  है बाकी को कुछ नहीं मिला और उनको समझाया गया है कि ये उनकी फूटी किस्मत है बदनसीबी है । सरकार समाज का कोई दोष नहीं है दुनिया बनाने वाले ने सबको एक समान देने का प्रावधान नहीं किया है तभी जिसकी लाठी उसकी भैंस का शासन कायम है । मुश्किल अजीब है ऊपरवाला अपनी बनाई दुनिया को  देख कर दंग है और जिनको बनाया था वो बंदे उसको पहचानते नहीं मानते ही नहीं खुद ईश्वर धरती पर आया है अपने आप बगैर किसी कर्मकांड आयोजन किये ।  

उपरवाले को खोजते खोजते उस लोक वासी धरती पर पहुंचे और बदली दुनिया के हालात उसके आधुनिक अंदाज़ को देख समझ कर विधाता को मनाने लगे ज़िद छोड़ अपनी आसमानी दुनिया को लौट चलें । बस अब बहुत देर कर दी तुमने दुनिया को बनाकर सुध बुध नहीं ली अब सब ने अपने अपने भगवान खुदा देवी देवता बना लिए हैं । दुनिया  को उनके खुद के बनाये नकली भगवानों के रहमो करम पर छोड़ कोई और नई असली दुनिया बनाओ  ये सब मानते भी हैं कि असली दुनिया कहीं कोई और है । लेकिन ऊपरवाला नहीं माना उस से अब कोई नई दुनिया बन ही नहीं सकती अपनी गलती की सज़ा झेलनी पड़ेगी उसको फुटपाथ पर रहना होगा प्रायश्चित करने को ।  टीवी पर देखा कोई फ़िल्मी अदाकारा को आरती कर रहे थे कोई किसी शातिर अपराधी को मन की बात समझने वाला समझ उसके पांव पकड़े थे कोई किसी राजनेता की तस्वीर के सामने सर झुकाए खड़े थे , कितने लोग अपना भगवान खुदा कितनी बार बदल रहे थे । दुनिया असली कैसे रहती जब दुनिया वालों ने अपनी पसंद से साहूलियत को देख ईश्वर नकली बनाकर उनकी भक्ति शुरू कर दी है ।



जनवरी 20, 2023

POST : 1615 पानी का सफ़र ज़िंदगी भर ( चलते-चलते ) डॉ लोक सेतिया 

     पानी का सफ़र ज़िंदगी भर ( चलते-चलते ) डॉ लोक सेतिया  

   न जाने किसकी कही बात पढ़कर अपनी ज़िंदगी के सफर को बयां करने को शब्द मिले शीर्षक की तलाश थी पूरी हुई । अब क्या लिखना सोचने की ज़रूरत नहीं है लेकिन आसान भी नहीं जीवन की कड़ियों-लड़ियों को तरीके से जोड़ना सिलसिलेवार शुरआत से अभी तलक जारी सफर तक । इक बहता हुआ पानी जिसे खुद अपने उद्गमस्थल  का पता नहीं किधर जाना कब तक कहां तक चलते रहना कोई खबर नहीं । कहीं किसी ने शब्द लिखे हुए थे , पत्थरों पर पानी के निशां रहते हैं मगर पानी पर कोई निशां पत्थरों का नहीं रहता है । पत्थर ही पत्थर मिलते रहे नसीब से कोई रास्ते में रुकावट बनकर कभी कोई किसी ने हाथ से उछाल कर फैंका मुझे आहत करने को । राह के रोड़े पत्थर से टकराता बचता राह बनाता बढ़ता गया और जितने भी जिस जिस ने मेरे भीतर हलचल पैदा करने को फैंके पत्थरों को अपने भीतर संजोता गया उछालने वालों पर कुछ फुहार की तरह छींटे देकर भिगोता हुआ । कोई किनारा किसी नदी की तरह मुझे नहीं मिला बांध कर रखने को मेरी फितरत आज़ाद सफर जिधर मर्ज़ी चलते रहने की बनी रही । अभिलाषा है किसी रेगिस्तान में मरु उद्यान बनकर कुछ फूल कुछ पेड़ पौधे कुछ पंछियों पशुओं राह चलते गुज़रते आते जाते मुसाफिरों की प्यास बुझाने को उपयोगी बन कर रहने की । 
 
     मैंने पहले बताया था मैं इक पौधा हूं जो उग आया किसी तपते रेगिस्तान में जैसा लगता है जिस को कितनी बार कुचला गया पैरों तले कभी आंधियों तूफानों ने बर्बाद किया कभी जानवर खाते उजाड़ते रहे । मैं जाने क्यों और कैसे दोबारा उग जाता रहा भले बौना रहा कद मेरा और फ़लदार नहीं बन पाया हालात की सौग़ात के कारण । मैं प्यासा हूं खुद पानी होकर भी अपनी नियति पर हैरान भी हूं , मेरा कोई ठिकाना नहीं मेरा घर है जिस में दुनिया बसती है कितने अपने पराये रहते हैं बस अनचाहा महमान भी मैं ही हूं । बहता पानी बनकर अपने निशां सभी पर छोड़े हैं ऊबड़ खाबड़ पत्थरों को सलीके से तराशा है उनकी शक़्ल को कितना नर्म मुलायम बना दिया है । कभी कभी तो कोई पत्थर कीमती बन कर ऊंचे आलीशान भवनों की शान बन गया या किसी महल की गुंबद होकर खुद पर इतराने लगा है । पत्थर को देवता भगवान बनाया मैंने अपने हाथ से तराशकर और वही मुझ से मेरी निशानी मांगते हैं जब मैं उनको नहलाने को लाया जाता हूं पावनता की कसौटी पर जांचा परखा जाता हूं । कितने नामों से जाना जाता हूं लेकिन इन्हीं सब बातों में वास्तविक अस्तित्व को खो जाता हूं । 
 
   इक हरियाणवी लोक कथा की बात याद आई पानी और प्यास को लेकर । अपने खेत पर कुंवे पर पानी की गागर भरती पणिहारिन से राह चलते चार राही पानी पिलाने की बात कहते हैं तो पणिहारिन पहले अपना परिचय बताओ तभी पिला सकती हूं अजनबी अनजान लोगों बात नहीं करती । पहला व्यक्ति जवाब देता है कि हम मुसाफ़िर हैं , पणिहारिन बोलती है कि मुसाफिर तो दो ही हैं सूरज और चांद तुम कैसे मुसाफिर कहला सकते हो । तब दूसरा व्यक्ति जवाब देता है कि हम प्यासे हैं , पणिहारिन बोलती है कि दुनिया में प्यासे तो दो ही हैं एक चातक पंछी और दूसरी धरती माता तुम प्यासे कैसे कहला सकते हो । तब तीसरा व्यक्ति जवाब देता है कि हम तो बेबस हैं ,  पणिहारिन बोलती है कि तुम बेबस कैसे कहला सकते हो बेबस तो दो हैं दुनिया में इक गाय और दूसरी कन्या । ऐसे में चौथा व्यक्ति कहता है कि हम तो मूर्ख हैं , तब पणिहारिन बोलती है कि मूर्ख तो दो होते हैं जगत में इस का जवाब कहानी के आखिर में देती है पणिहारिन न्यायधीश को । पानी को लेकर बहुत कुछ समझाया गया है फिर भी समझना बहुत बाक़ी है ।  तू पी - तू पी राजस्थानी लोक कथा है तो इक नीति कथा धरती का रस भी है मगर हम पानी पानी रटते हैं प्यास कैसे बुझेगी बिना पिये पानी । धरती समंदर पर पानी ही पानी है फिर भी पीने को पानी काफ़ी नहीं खारा और खराब प्रदूषित पानी बेकार है । कभी आंख का शर्म का पानी हुआ करता था इंसानों में सबसे मूलयवान आजकल ढूंढने से दिखाई नहीं देता । ज़िंदगी भर जारी रहता है जो सफर उस में पानी की अहमियत बहुत है । पानी और प्यास का रिश्ता क्या है कोई समझ नहीं सका अभी भी , ये किस की बात है कौन जाने । 



 
 

जनवरी 15, 2023

POST : 1614 नकली की कीमत असली की चाहत नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  नकली की कीमत असली की चाहत नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   ये युग ये आधुनिक काल सब इक धोखा है छल है कुछ भी सच में असली नहीं है हम खुद असली इंसान नहीं हैं इंसान कहलाते हैं बन नहीं सकते इंसानियत झूठी है आडंबर करते हैं ज़रूरत पड़ने पर हैवानियत जाग जाती है और इंसानियत को क़त्ल कर क़ातिल हो कर भी मसीहा होने का दम भरते हैं । रिश्ते नाते खुशियां क्या दुःख-दर्द तक वास्तविक नहीं दिखावे को होते हैं । सोशल मीडिया पर सभी संदेश खोखले होते हैं जिन में भावनाएं नहीं औपचारिकताएं निभाते हैं हमदर्दी नहीं किसी के साथ न किसी से कोई वास्तविक एहसास ख़ुशी का आनंद का । मिलते नहीं मिलना ज़रूरी नहीं लगता बात तक करने की फुर्सत नहीं है हर कोई अकेला अपने आप में ग़ुम है अपने से अजनबी मगर अनजान अजनबी लोगों में अपनापन ढूंढता है । अपनी फेसबुक व्हाट्सएप्प पर लिखते हैं जो खुद भी शायद समझ नहीं पाते दुनिया को समझाते हैं और लाइक्स कमैंट्स को दौलत मनाते हैं कमाई हुई आसानी से । सोशल मीडिया से लेकर धार्मिक उपदेश तक सभी बेअसर साबित होते हैं अनुचित आचरण अनैतिक कार्य बढ़ते जाते हैं समाज नीचे गिरता जाता है । दोस्ती नकली है संख्या भर है हमेशा साथ निभाने वाला कोई नहीं मिलता है । प्यार इश्क़ मुहब्बत सब कुछ बाज़ार जैसा है कब क्या हो कोई नहीं जानता सभी ख़ुद को सच्चे आशिक़ समझते हैं और निभाने की बात पर हज़ार बहाने होते हैं । संग संग जीना मरना कोई नहीं समझता जब तक निभ सके ठीक है फिर अलग राह चुनते हैं दोनों आशिक़ मशूका । 
 
    देश सेवा का कारोबार नकली है गरीब , साहूकार नकली है जनता की चुनी उसकी सरकार हर बार नकली है , टीवी चैनल का हर इश्तिहार नकली है । भगवान असली आजकल नहीं दिखाई देता है ईश्वर के नाम पर मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे में कोई और रहता है जो बड़े छोटे अमीर गरीब ऊंचे नीचे धनवान सबको दर्शन देता है चढ़ावा और शान ओ शौकत का सामान बनकर । मन मंदिर आत्मा और सच्चे ढंग से प्रार्थना करने की कोई शर्त नहीं है मनमर्ज़ी से अधर्म करते जाओ और तीर्थ स्थल पर करोड़ों दान दे कर धर्मात्मा कहलाओ । मौसम का मिजाज़ नकली है नकली हवाएं नकली दवाएं क्या दुआएं भी असली नहीं हैं संतों महात्माओं का आशिर्वाद नकली है आश्रमों का धर्म वाला हिसाब नकली है । कीमत ऊंची है नकली चीज़ों की असली का कोई चाहने वाला नहीं मिलता है । घर भी नकली हैं गलियां चौराहे सब नकली हैं रौनकें नकली हैं उत्स्व नकली हैं मनोरंजन असली नहीं फूहड़ता और असभ्य भाषा नग्नता को परोसना फिल्म टीवी सीरियल का गंदा कारोबार बन गया है । समाज को दिशा दिखाना नहीं भटकाना फ़ायदे का कारोबार हो गया है । उपचार करने वाला सबसे बड़ा बीमार हो गया है ।  दोस्त से नफरत , दुश्मन से प्यार हो गया है , झूठों का सरदार सच का झंडाबरदार हो गया है , सच  असाध्य रोग का रोगी बन गया है उसका नहीं संभव उपचार हो गया है ।  
 
   भाग दौड़ नकली है चाहतें ख़्वाहिशें नकली हैं नकली शोहरत नकली ऊंचाई नकली मसीहाई है असली की बात मत पूछो रामदुहाई है । दिन - रात नकली दूल्हा बरात नकली है गठबंधन नकली है रस्में-क़स्में नकली हैं  शहनाई की आवाज़ नकली है सर का हर ताज़ नकली है । नकली हंसी आंसू भी नकली संबंधों के वादे नकली हैं कौन निभाना याद रखता है । खुद हम सभी अपनी असलियत छुपाते हैं जो हैं नहीं वही होने का यकीन दुनिया को दिलाते हैं । सच से डरते हैं झूठ बोलकर इतराते हैं सच का दर्पण देखते नहीं कोई दिखा दे तो घबराते हैं । ज़िंदगी भर झूठ को सच साबित करते करते आखिर सच में मर जाते हैं मौत के बाद ज़िंदा रहने की आरज़ू में ज़िंदगी भर इक बोझ उठाते हैं खुद से नज़रें चुराते हैं । असली की बात से हम सब भागते हैं डरने लगे हैं असली चेहरे से नकाब को पहचान बना बैठे हम झूठे नकली दुनिया के बनावटी लोग ।  



 
 

दिसंबर 29, 2022

POST : 1613 क़िताब की दर्दनाक दास्तां ( तिरछी नज़र ) डॉ लोक सेतिया 

   क़िताब की दर्दनाक दास्तां ( तिरछी नज़र ) डॉ लोक सेतिया 

ये लिखने वाला भी नहीं जानता था छापने वाले को भी शायद इसकी उम्मीद नहीं थी किताब की बदनसीबी थी जो नहीं होना चाहिए था वही हो गया । क़िताब की ये व्यथा कोई समझेगा भी कैसे जब किसी को कागज़ की लिखावट छपाई काले रंग की स्याही की पढ़ने को लुभाती नहीं है । कहीं किसी कोने में पड़ी हुई है कितनी किताबों के बीच दबी हुई ख़ामोश हैं सब की सब अपना अपना अकेलापन अकेले सहती हुई । कोई किताब नहीं जानती उसके साथ पड़ी किताब के पन्नों पर क्या लिखा है । किताबों में क्या क्या नहीं है खुशियां हैं संवेदनाएं हैं शिक्षा है ज्ञान है जीवन की वास्तविकता से काल्पनिक परीकथाओं मनोरंजन तक सब है दुःख दर्द मानवीय सरोकार से प्यार मुहब्बत रिश्ते समाजिक संबंध की समझ शामिल है अथाह समंदर है । लेकिन जब कोई भीतर झांकता ही नहीं तो कंकर पत्थर हीरे मोती की परख कैसे होगी । कभी किताब को सर पर माथे पर लगाते थे आजकल किताब रद्दी वाले कबाड़ी के झोले में सिसकती दिखाई देती है । आपको हैरानी हो रही है तो बताना ज़रूरी है सुबह गली से गुज़रते कबाड़ी पर नज़र पड़ी तो बिल्कुल नई नवेली दुल्हन जैसी किताब दिखाई दी मुझे छत पर खड़े हुए । आवाज़ देकर रोका तो उसको लगा मुझे भी कोई पुराना सामान बेचना है , मैंने घर से बाहर गली में जाकर बात की और किताब की बात की तो उसने कहा आपको चाहिए तो दस रूपये कीमत है । अचरज से सवाल किया जिसने बेची दस रूपये में बेची है , नहीं साहब पांच रूपये में ख़रीदी है दस में बेचूंगा । खैर मैंने उसको मनचाहे दाम देकर किताब खरीद कर सर माथे लगाया और मां सरस्वती से क्षमा याचना की कहा जिस किसी ने भी ऐसा अपराध किया उसको माफ़ करना । 
 
कितने बड़े लेखक की पुस्तक है और कितनी बहुमूल्य कालजयी रचना बताकर इक और जुर्म नहीं करना चाहता फिर भी अनचाहे ही सालों पुरानी घटना याद आ गई है । लिखता था अखबार पत्रिकाओं में भी रचनाएं छपती थी और कई साथी सलाह देते रहते थे किताब छपवानी चाहिए । महानगर जाना हुआ तो इक प्रकाशक जो खुद बड़े नाम वाले लेखक भी थे उन से मुलाक़ात करने चला गया । उनको अपनी पांडुलिपि देकर निवेदन किया कि पढ़कर बताएं रचनाएं छपने के काबिल हैं भी या नहीं । जैसे कोई हंसता है उपहास करने जैसा जवाब मिला उन्होंने कहा हिंदी में किताब पढ़ता कौन है , ये तो आपको खुद पैसे खर्च कर दोस्तों को निःशुल्क बांटनी पड़ती है । उस के बाद कितने पन्नों की कैसी किताब कितनी प्रतियां कितने हज़ार में छपेंगी हिसाब समझाने लगे थे । ये सपने में भी नहीं सोचा था बस किसी तरह निकला बाहर भागा तेज़ी से सड़क तक आते आते सांस चढ़ी हुई थी ।
 
तीस साल बीत गए फिर किसी प्रकाशक से मिलने का हौंसला नहीं कर सका । जीवन में बहुत उल्टा सीधा कर लिया तब विचार आया चलो ये भी कर देखते हैं कुछ नहीं होगा तो तजुर्बा ही सही । ये आदत रही है आगे बढ़े कदम रुकते नहीं और मंज़िल की चाह रखे बगैर सफर करता रहा हूं । जिस जहां की जिस मंज़िल की तलाश मुझे है शायद इक ख़्वाब ही है जिस को हक़ीक़त बनाना मेरी आरज़ू है । सब सोच समझ कर पूरी तैयारी से किताब छपवाने का हौसला किया और किताब छपवा कर समझा सब शानदार अनुभव है । लेकिन कहां मालूम था कि अभी दुश्वारियां ही दुश्वारियां सामने हैं । किताब छपना काफी नहीं पाठक तक किताब पहुंचाना उसको पढ़ने को उत्साहित करना टेढ़ी खीर है । लिखने वाला फिर उसी मोड़ पर खड़ा होता है कभी अखबार पत्रिका वाले खूब आमदनी करते हैं लेकिन लिखने वाले को कोई कीमत नहीं मिलती किसी बंधुआ मज़दूर की तरह या नाम को मानदेय राशि जिस से कोई जीवन यापन नहीं कर सकता है । नवोदित लेखक को आसानी से सोशल मीडिया पर किताबों के सौदागर मिलते हैं जो बिना परखे रचनाओं की किताब छापने का कारोबार कर खूब कमाई करते हैं । उस के बाद किताब की हालत पर कोई ध्यान नहीं देता , कोई खुद को लेखक समझने कहलाने पर संतोष कर लेता है कुछ हज़ार खर्च कर और कोई किताबें छापने का मुनाफ़े का व्यौपार कर मौज से रहता है । कितनी तरह की किताबें कहां अपनी बदहाली पर आंसू बहाती हैं किसी को अपनी दर्द भरी व्यथा कथा सुना नहीं सकती हैं । उस के आगे की दर्द भरी दास्तां कैसे लिखें किस को पढ़नी है क्योंकि लिखने वाला भी इक दौड़ में शामिल होने को अभिशप्त है इनामात सम्मान नाम शोहरत की भागम भाग में वास्तविक उद्देश्य समाज को आईना दिखाने का बदलाव का न्याय समानता का भेदभाव समाप्त करने वाले देश समाज दुनिया के निर्माण का पीछे छूट जाता है ।

तो इस वजह के चलते मर्दों से ज्यादा रोती हैं औरतें - Women Cry More Due To  Hormonal Changes - Amar Ujala Hindi News Live

दिसंबर 16, 2022

POST : 1612 किताबें मेरी ख़त हैं दोस्ती वाले ( अंदाज़ अलग है ) डॉ लोक सेतिया 

 किताबें मेरी ख़त हैं दोस्ती वाले ( अंदाज़ अलग है )  डॉ लोक सेतिया 

                        जनाब साक़िब लखनवी अज़ीम शायर हैं कहते हैं

               ' ज़माना बड़े शौक से सुन रहा था  ,  हमीं सो गये दास्तां कहते कहते '।

                       कोई पचास साल पहले कही थी मैंने पहली ग़ज़ल 

               ' किसे हम दास्तां अपनी सुनाएं  , कि अपना मेहरबां किस को बनाएं ।

  उसी इक दोस्त इक मेहरबां की तलाश में क्या क्या नहीं लिखता रहा । बेनाम शख़्स अनजान नगर गांव  , बिना पता - जाने , ठिकाना बताए , भेजे ख़त लिख लिख कर कोई जवाब नहीं मिला , अधिकांश ग़ुम हो गए , कुछ वापस लौट आए मेरे पास खुद ही भेजे खुद ही पढ़े बार बार । ज़माना खुद को समझदार कहता है दावा करते हैं लिफ़ाफ़ा देख कर ख़त का  मज़मून भांप लेते हैं काश किसी ने खोला होता और समझने की कोशिश की होती कि मेरे लिखे ख़त नहीं भीतर इक कोरा कागज़ भेजा है । मेरी मन की किताब को किसी ने झांका तक नहीं बस बाहर से आवरण को देख कुछ और ही समझते रहे लोग । पुस्तक का बाहरी कवर देख लोग भटक भी जाते हैं तो कभी अंदर लिखा पढ़ कर हैरान हो जाते हैं कुछ ऐसा संभव था कोई मुझे भीतर तक गहराई से जानता समझता तो जैसा सोचा उस के विपरीत पाकर दंग रह जाता । हर कोई चेहरा देखता रहा लिबास की सिलवटें गिनता रहा , साफ मन की कद्र किसी ने नहीं जानी । कभी जब लिखनी होगी किसी किताब के पन्नों पर अपनी कहानी , प्यास को हम लिखेंगे तब पानी । यही आदत रही है हमने कभी साक़ी को अपनी प्यास दिखलाई ही नहीं ज़िंदगी भर खाली जाम लिए बैठे रहे दुनिया की महफ़िल के मयख़ाने में । दोस्ती की भाषा समझते ही नहीं लोग , सभी को निस्वार्थ दोस्ती क्या होती है नहीं पता मतलब की बात सभी जानते हैं । इस दौर की दुनिया की महफ़िल में सिर्फ मैं ही तनहा नहीं रहा सच तो ये है कि भीड़ में हर कोई अकेला नज़र आया मुझे । ये कहने को लिखी अपनी पुरानी इक ग़ज़ल पढ़ता हूं , शायद समझ सके कोई ।
 

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया ' तनहा '


महफ़िल में जिसे देखा तनहा-सा नज़र आया
सन्नाटा वहां हरसू फैला-सा नज़र आया ।

हम देखने वालों ने देखा यही हैरत से
अनजाना बना अपना , बैठा-सा नज़र आया ।

मुझ जैसे हज़ारों ही मिल जायेंगे दुनिया में
मुझको न कोई लेकिन , तेरा-सा नज़र आया ।

हमने न किसी से भी मंज़िल का पता पूछा
हर मोड़ ही मंज़िल का रस्ता-सा नज़र आया ।

हसरत सी लिये दिल में , हम उठके चले आये
साक़ी ही वहां हमको प्यासा-सा नज़र आया ।   
 
   साक़िब लखनवी जी इक शेर में कहते हैं ,  कोई नक़्श और कोई दीवार समझा , ज़माना हुआ मुझ को  चुप रहते रहते । शायद यही होता है ख़ामोश रहने से मगर बोलने से कब कौन क्या समझता है कहना और भी मुश्किल है । तभी बहादुर शाह ज़फ़र जी कहते हैं बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी , जैसे अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी । मैंने कुछ और लिखा मगर ज़माने ने कुछ और पढ़ा समझा जो जिस का नज़रिया था उस ने अपने ढंग से अर्थ निकाल लिया । जब कई साल बाद मुझे अपने लेखन को  पुस्तक के आकार में छपवाना शुरू किया तब जान पहचान वाले लोगों दोस्तों को शायद लगा जैसा सभी किताब छपवाते हैं नाम शोहरत ईनाम पुरुस्कार आदि की कतार में खड़े होने को वही चाहत रही होगी । कुछ दिन बाद कुछ लोग पूछने लगे कि कैसा रहा पाठक वर्ग की प्रतिक्रिया , मुझे यकीन है ये सवाल करने वालों ने खुद मेरी किसी किताब को ठीक से पढ़ा नहीं होगा अन्यथा वो मुझ से रचनाओं भावनाओं की बात करते न कि इस तरह औपचारिक दुनियादारी की बातें । उनको रूचि थी कितनी किताबें बिकी कितनी आमदनी घाटा हुआ क्या खोया क्या पाया , मुझे इनकी चिंता कभी नहीं थी । कभी कभी होता है लेखक की बात पाठक को अपने अनुसार कुछ अलग लगती है जो स्वाभाविक है मगर कभी कोई शब्दों भावनाओं को ही नहीं समझता तब उलझन होती है । मुझे जिस की चाहत थी आखिर वो दिन वो पल-क्षण आ ही गए हैं । हर दिन कहीं से कोई फोन पर कॉल कर बात करता है क्या डॉ लोक सेतिया जी बात कर रहे हैं , हां कहने पर बताते हैं आपकी किताब मिली किसी तरह से पढ़ कर मन किया बातचीत करने को जानने समझने को । यही वास्तविक मूल्य है किताब का चाहे किसी भी लेखक की हो ।
 
   कई बार ये बात कही है पहले भी , मैंने हर वर्ष डायरी शुरू करते एक ही हिसाब याद किया है वो ये कि पिछले साल कितने दोस्त बने कितने खो गए कितने अजनबी साथ चले कितने हमराही बिछुड़ गए । जैसे अधिकांश दुनिया वाले धन दौलत सोना चांदी हीरे जवाहरात के बढ़ते घटते खज़ाने का बही खाता लगाते हैं । मेरे पास इक पलड़े में दोस्ती रिश्ते नाते रहे हैं और तराज़ू की दूजी तरफ पलड़े में सच लिखने का मेरा जूनून और दोनों को बराबर रखने का असंभव सा काम जैसे दोधारी तलवार पर चलना मेरी विवशता रही है । सदा यही भरोसा किया है कोई भी मुझे पढ़ेगा समझेगा तो दोस्त बन कर हमेशा साथ रहेगा । किताबों ने मुझे कितने ऐसे लोगों से परिचित करवाया है यही दोस्ती मेरी सच्ची पूंजी हैं । कभी पढ़ा था किसी लेखक को समझना है तो उस के लेखन को पढ़ना ज़रूरी है अन्यथा नहीं जान सकते । मुझे आप या अन्य लोग जो समझते हैं बिना पढ़े ही सही नहीं हो सकता है , जानता हूं किसी को फुर्सत कहां मुझे जाने समझे फिर भी कभी जिन को दोस्ती प्यार मुहब्बत की ज़रूरत है पढ़ कर मेरी तरह दोस्त तलाश कर सकते हैं । मुझसे करोगे दोस्ती या कोई और मुझ से बेहतर ढूंढना चाहोगे ये आपकी मर्ज़ी है । 
 

 




 

दिसंबर 12, 2022

POST : 1611 भूल गए कलम की बात लिखना ( जुर्म-बेलज़्ज़त ) डॉ लोक सेतिया 

 भूल गए कलम की बात लिखना  ( जुर्म-बेलज़्ज़त ) डॉ लोक सेतिया  

  ये कैसे हुआ कलम उदास है किसी लिखने वाले को लेखनी की याद तक नहीं आई । मुझे उसकी हालत पर रोना आ गया । हाथ में लेकर चाहा आजकल के दौर को लेकर कुछ लिखना तो लगा जैसे स्याही सूख गई है मेरी कलम की । कलम को मेरी विवशता समझ आई तो कहने लगी तुमने हमेशा अपने अश्कों से अपने लहू से समाज की दुःख दर्द की बात कही है । लिखते लिखते जीवन बिताया है और तब कहीं जाकर खुद अपने और किताबों को लेकर लिखा है अन्यथा अपना सुख दुःख ख़ुशी ग़म छोड़ समाज की खातिर आंसू बहाए हैं तुमने । आज जब मुझे थामा है उठाया है कलम को समाज की वास्तविक दशा लिखने को तब मेरी बेबसी पर परेशान हो रहे हो । मैं इस दौर की सच्ची बात लिख नहीं सकती क्योंकि समाजिक मर्यादाओं आदर्शों नैतिक मूल्यों का पतन इस सीमा तक हो चुका है कि लिखने को स्याही आंसू नहीं खून भरना पड़ेगा और लिखने वाले तुझ में खून बचा ही कितना है और किसी का लहू तुम नहीं भर सकते मुझ में , भले आदमी का लहू पानी से सस्ता बाज़ार में मिलता है । साहित्य शिक्षा से लेकर देश समाज की वास्तविकता की बात करने खुद को सच का झंडाबरदार समझने वाले तक कलम से नाता तोड़ चुके हैं कागज़ कलम स्याही की दवात बीते ज़माने की बात हो गये हैं । कलम क्या होती है तलवार को पराजित कर सकती है इस को समझना उनके बस की बात नहीं जो बिक कर लिखते हैं अपना ज़मीर मार कर चाटुकारिता करते हैं और जिसकी अनुकंपा से धन दौलत सुख सुविधा साधन पाते हैं उन्हीं की भाषा में राग दरबारी गाकर शासकों का गुणगान करते हैं उनको मसीहा बतलाते हैं । 
 
  कलम की व्यथा-कथा कोई लिखे भी तो कैसे जब कलम खुद प्यासी है और कोई भी स्याही किसी भी लिखने वाले क़लमकार के पास बची नहीं है । जिस कलम से मुहब्बत की दास्तानें लिखी प्यार वाले गीत लिखे ग़ज़ल कविता में एहसास भरे उस कलम से आधुनिक युग की खोखली झूठी मनघडंत कहनियां कोई किस तरह लिख सकता है हाथ कांपते हैं रूह बेचैन होती है ये हालात देख कर जब हर तरफ हिंसा नफरत और समाज को बांटने की कोशिश करने को बढ़ावा दिया जा रहा है । अनैतिकता आदर्श बन गई है और देशसेवा लूट का कारोबार और घना अंधकार खुद को सूरज घोषित कर रहा है । तस्वीरों ने अपनी झूठी चमक दमक से शब्दों को धुंधला कर दिया है कलम ने जो लिखा पढ़ा नहीं जा सकता है समय की धूल ने कागज़ किताब को ढक दिया है और आईना वास्तविक शक़्ल को नहीं दिखलाता है जो बहुत भयानक बदसूरत है आधुनिक समाज की और नकली रौशनी सबको परेशान कर रही है । आंखें हैं फिर भी अंधे बने हैं लोग मुंह में ज़ुबान है फिर भी गूंगे बन गए हैं सभी , सब सामने है मगर दिखाई कुछ भी नहीं देता । सभी लिखने वालों ने अपनी कलम को या तो कहीं रख छोड़ा है बेकार बेजान समझ कर या उस से रिश्ता तोड़ लिया है और लैपटॉप कंप्यूटर कीपैड पर उंगलियां चलती हैं लिखती हैं शब्द जिन में संवेदना का अभाव होता है । 
 
  ऐसे में पुरानी बंद पेटी से कितने ख़त कितने रंगों की स्याही से अलग अलग लिखावट के अनगिनत स्वरूपों वाले निकाल देख रहा हूं । इक इक शब्द एहसास से भरा हुआ महसूस होता है किसी डायरी में कोई सूखा फूल अभी भी याद ताज़ा कर रहा है और कोई किताब के पन्नों के बीच रेशमी राखी जैसा धागा आधी पढ़ी किताब की याद दिलाता है । कैसे कैसे कागज़ कितनी तरह की छवियां कितने रंग की खुशबूदार स्याही देख कर लगता है उन फूलों भरे गुलशन को छोड़ हम लोग इक तपते झुलसते रेगिस्तान में चले आये हैं , भागते फिरते हैं किसी हिरण की तरह चमकती रेत को पानी समझ मृगतृष्णा का शिकार हुए हम सभी । कितना कुछ याद रहता है जो भुलाये नहीं भूलता पुराना बेहद खूबसूरत हुआ करता था । काश कोई फिर से लौटा सकता वो गुज़रा ज़माना । कलम का कागज़ से स्याही वाला रिश्ता बहुत अच्छा था बड़ा सुहाना ।  







दिसंबर 11, 2022

POST : 1610 बनाकर खुद इस को परेशान ( इंसान भगवान ) डॉ लोक सेतिया 

   बनाकर खुद इस को परेशान ( इंसान भगवान ) डॉ लोक सेतिया 

     आदमी को भी चैन नहीं आया भगवान की दुनिया से अलग अपनी इक अजीब करिश्माई जहां की तामीर कर ली । नाम कितने हैं सोशल मीडिया व्हाट्सएप्प टीवी स्मार्ट फोन काल्पनिक कितने ही किरदार कठपुतली जैसे बनाए अपनी उंगलियों पर नचाने को खेल से लेकर जंग तक मुहब्बत से लेकर नफरत तक दोस्ती दुश्मनी दोनों आधुनिक दुनिया में कभी कुछ कभी कुछ रंग बदलने वाले । फेसबुक की झूठी दुनिया असली लगने लगी और वास्तविक धरती आसमान हवा पानी पेड़ पशु पंछियों की दुनिया किसी काम की नहीं लगने लगी है । कौन जाने जैसे खुद बनाए इस मायाजाल से आदमी परेशान हुआ लगता है चाह कर भी पीछा नहीं छुड़ा पा रहा , अनावश्यक ही समय व्यर्थ बर्बाद कर रहा है आदत बन गई है नशा बन गया है कुछ भी हासिल नहीं होता फिर भी आशिक़ी की तरह दिल लगता नहीं सोशल मीडिया के बगैर जीना बेकार लगता है , ऊपरवाला भी पशेमान रहता हो जब दुनिया उसके मनचाहे ढंग से नहीं चलती और इधर उधर जिधर किधर भटकती रहती है । इक लोक कथा में दैत्य बना कर कोई सृजनकार खुद उसी का शिकार हो जाता है और जिसको खुद तराशा हाथों से अपने , वही पूछता है बनाने वाले से निशानी होने की उसकी । भगवान से इंसान उसी तरह सवालात करता है और भगवान से जवाब देते नहीं बनता है । 
 
  फेसबुक बनाते समय लगता था यही जगह है ख़ुशी सुकून खूबसूरत रिश्ते दोस्ती प्यार सब मनचाही मुरादें मिल जाती हैं , धीरे धीरे सब कागज़ी फूल हाथ लगाते बिखरते गए । दिन भर तरसते ही रहे कोई बात तो करे  , मुझको कहां खबर भी इशारों का शहर है ये अल्फ़ाज़ मेरे इक स्वर्गवासी दोस्त की ग़ज़ल से लिये हैं । नकली जलते बुझते सितारों की रौशनी से कुदरती नज़ारे छुप गए हैं । सुनहरे ख़्वाबों की दुनिया इतनी भाई है कि हर कोई जागते हुए भी सपने देख कर मस्ती में झूमता रहता है । बंद कमरे में खुद कैद होकर समझते हैं दुनिया भर को कैद कर लिया है । अपने ख़्यालात दिल के जज़्बात ख़ुशी दर्द नर्म मुलायम से सख़्त शब्द तलवार जैसे अल्फ़ाज़ सभी भरी महफ़िल बयां करते हैं बेशक किसी को किसी से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है । बधाई शोक संदेश बुलाना सब औपचरिकता निभाते हैं सिर्फ कहने भर को संदेश भेज कर जवाब दे कर । मिलना जुलना ज़रूरी नहीं लगता है कई बार महीनों सालों वार्तालाप करते रहने के बाद पूछना पड़ता है आप कौन हैं रहते कहां करते क्या हैं । सैंकड़ों हज़ारों की भीड़ में रिश्ते इक तस्वीर बन कर रह गए हैं जो प्रोफाइल पिक्चर बदलते समय नहीं लगता है । 
 
   भगवान की बनाई दुनिया भी जैसी बनाई थी वैसी रही नहीं और इंसानों की इंसानियत ख़त्म होती गई और शैतान की हैवानियत बढ़ती गई , जिस से सभ्यता शराफ़त ईमानदारी का नामो निशान मिट गया और धोखा छल कपट हिंसा अन्याय का आलम स्थपित हो गया है । सोशल मीडिया भी संबंध बनाने के बजाय आपसी मतभेद और अनावश्यक विवाद बढ़ाने का मंच बन गए हैं गंदी राजनीती और संकीर्ण विचारधारा ने फेसबुक व्हाट्सएप्प को हथियार बना कर दोस्तों रिश्तेदारों को विरोधी बना दिया है । इतना ज़हर भर दिया है लोगों के दिल-दिमाग़ में कि लोग बिना ख़ंजर इक दूजे को ज़ख़्मी करने लगे हैं । विडंबना है हर हाथ फूल लिए है और हर सर पर घाव भी दिखाई देता है । टीवी सीरियल से फिल्म तक अख़बार टीवी की बहस से विज्ञापन तक झूठ धोखा डर और भयानक घंटनाओं कहानियों ने माहौल को इस कदर खराब कर दिया है कि हर किसी को अजनबी क्या अपने करीबी लोग तक भरोसे करने के काबिल नहीं लगते हैं । दलदल में धंसे हुए हैं निकलने की कोशिश में और धंसते जाना नियति है । उपाय शायद यही है कि कभी इंटरनेट किसी कारण ख़त्म हो जाए ये सब बेकार होकर अपनी मौत मर जाएं , विनाश करने वालों का आखिर अंत इसी तरह से होता है जब कोई उनका अंजाम आखिर अंत होना है ये बात सच कर दिखला दे । अचानक लिखते लिखते वाई फाई इंटरनेट हमेशा को जाना अर्थात इस पोस्ट का खुद ही डिलीट किए बिना अनपब्लिश रहना । 
 
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दिसंबर 03, 2022

POST : 1609 लेखक-पुस्तक संवाद ( किताब की आत्मकथा ) डॉ लोक सेतिया

  लेखक-पुस्तक संवाद ( किताब की आत्मकथा ) डॉ लोक सेतिया

लेखक बहुत दिन से चिंतित था कुछ भी नया विषय लिखने को ध्यान में नहीं आ रहा था । बिस्तर पर करवट बदलते बदलते सामने रखी अलमारी पर निगाह जाकर ठहर गई कुछ हलचल सी भीतर महसूस हुई । लगा कोई किताब कह रही है मुझे इस बंद अलमारी से बाहर निकलना है । चाबियों का गुच्छा लिया मगर कोई भी चाबी ताला खोलने में सफल नहीं हुई तो सोचा कल सुबह उठ कर चाबीवाले को घर बुलाना होगा । आंख लग गई और सपने में किताब अपनी चुप्पी तोड़कर खुद बोलने लगी । लेखक पुस्तक संवाद होता रहा और लिखने वाले की नया विषय की तलाश पूर्ण हो गई और लिखी गई आत्मकथा किताब की । 
 
किताबें असंख्य विषयों पर लिखी जाती हैं साहित्य सांस्कृतिक ऐतहासिक धार्मिक देश काल विश्व भर की नित नई जानकारी खोज शोध से लेकर शिक्षा जगत स्कूल कॉलेज से विश्वविद्यालय तक की पढ़ाई को लेकर । लेकिन साधारण ढंग से किताबों को दो मुख्य भागों में बांट कर रख सकते हैं । पहली वो जो पाठक को किसी और काल्पनिक दुनिया में लेकर जाती हैं जहां चमक दमक जगमगाहट और असंभव को संभव होते दिखाई देते हैं चमत्कार से सब होता है लेकिन उन कथा कहानियों को लेकर शंका सवाल सोचने समझने की किसी को अनुमति नहीं है । लिखा है आपको बगैर सोचे विश्वास करना होगा अन्यथा आपको नादान नासमझ आदि कहकर नकारा जा सकता है । ऐसी तमाम किताबें आपको मानसिक तौर पर आज़ाद होकर चिंतन की अनुमति नहीं देती हैं । दूसरी वो जो पाठक को वास्तविक जीवन से परिचित करवाती हैं और जिन से सबक लेकर सीख कर पाठक ज़िंदगी में उनका उपयोग कर समस्याओं को समझने और समाधान खोजने का कार्य कर सकते हैं । 
 
इधर किताबें लिखने की दौड़ लगी हुई है लेकिन मकसद समाज को बदलना नहीं बल्कि नाम शोहरत और अन्य भौतिक वस्तुओं की चाहत हो गया है । लिखने वाला खुद लिख कर भूल जाता है और पाठक को देश समाज को कोई मार्गदर्शन अथवा सकारात्मक योगदान को लेकर उदासीन है । प्रकाशक किताब की गुणवत्ता परखे बिना छापते हैं सामान्य कारोबार की तरह धन दौलत कमाने की खातिर । बड़े बड़े शहरों में किताबों का बाज़ार लगाया जाता है जहां किताबों को तोलकर खरीदा बेचा जाता है किसी भाजी तरकारी या धातु या सामान की तरह से । किताब में लिखा कितना मूलयवान है महत्वपूर्ण है अथवा व्यर्थ की गतिविधि ही है कुछ फर्क नहीं पड़ता है सब एक भाव है टके सेर भाजी टके सेर खाजा जैसी बात है । किताबों की ऐसी दुर्दशा हमारे समाज की कड़वी वास्तविकता को दिखलाता है जहां इंसान से लेकर सामाजिक आदर्श और मूल्य तक कहीं फेंक दिए गए हैं । खोखली बातें करते हैं अनुसरण करना अनावश्यक लगता है । आधुनिक शिक्षा ने आदमी को बेजान मशीन जैसा बना दिया है जैसे कोई रॉबट या कम्प्यूटर जैसा प्रोग्राम किया गया है करता है । चिंतनशील विचारवान विवेकशील नहीं बनने देती आधुनिक शिक्षा । 
 
शिक्षा विज्ञान विकास और विनाश को नहीं परखते हैं , साधन बनाने की खातिर समाज को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां बर्बादी और मानवीयता के अंत को सामने देख हैरान हैं । अब कोई सोचता तक नहीं कि हम कब कहां भटक गए और देश समाज दुनिया को बेहतर बनाने की जगह खतरनाक गहरी खाई में ले आये हैं जबकि समझते रहे कि शिखर पर चढ़ रहे हैं । जवीन उपयोगी किताबों को बंद अलमारियों में सजाकर रखना पढ़ना छोड़ कर यही करते रहने का परिणाम है । इक ताला जो हमारे दिमाग़ को लगा है खुलता नहीं है और बंद अलमारी में रखी किताबों की तरह दीमक की तरह खोखला कर रहा है । जिनके ज़हनों में अंधेरा है बहुत , दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत । मेरी इक पुरानी ग़ज़ल का मतला याद आता है ।