जनवरी 13, 2026

POST : 2049 लूटने वाले आज भी हैं ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

          लूटने वाले आज भी हैं ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया  

राष्ट्रीय सुरक्षा कलाकार अजीत डोभाल ने युवकों को संबोधित करते हुए कहा है कि हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है ।  जाने ऐसे लोग देश की वास्तविक सुरक्षा को लेकर कितने संवेदनशील  हैं क्योंकि आजकल उनके ही कालखंड में देश की लूट में राजनेताओं अधिकारियों धनवान लोगों की मिलीभगत साफ दिखाई दी है , क्या सुरक्षा सलाहकार को वो सब उचित लगता है अथवा हज़ार साल पहले विदेशी लुटेरों से बदला लेने की सोच आधुनिक देश को लूटने वालों को लेकर खामोश रहना उनकी मानसिकता उचित हो सकती है । गंभीर समस्याओं जैसे आतंकवाद से लेकर चीन अमेरिका तक को लेकर लगता नहीं कि ऐसा ही आचरण शासक एवं सरकार का दिखाई दिया है हर बार शौर्य का डंका बजाते हैं लेकिन अंजाम तक कभी पहुंचते ही नहीं है । गीदड़ भभकी देना उचित नहीं है हम ताकतवर हैं दावा करते हैं मगर शीघ्र ही किसी के प्रभाव में आकर कदम पीछे खींच लेते हैं । काश अजीत डोभाल जी संदेश देते कि हमको पुराने इतिहास से सबक सीखना चाहिए और देश समाज को लूटने वाले चाहे जो भी हों उनका साहसपूर्ण विरोध करना चाहिए । विडंबना ही है कि जब अधिकांश राजनेता प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी बड़े बड़े उद्योगपति धर्म उपदेशक से खिलाड़ी भगवा धारण करने वाले व्यवसायी कलाकार तक तमाम जनता को गुमराह कर खुद मालामाल होने में शामिल हैं उनकी लूट खसूट की बात छोड़ पुरातन इतिहास से बदला लेने को युवकों को उकसाने का कार्य कर रहे हैं ये जानते समझते हुए कि इसका हासिल कुछ भी नहीं होगा । बल्कि शायद उनका मकसद इस युग की ऐसी तमाम खामियों से ध्यान हटाने की कोशिश लगती है ।  
 
कुछ अन्य संवैधानिक संस्थाओं की तरह से ही देश संविधान से अधिक शासक वर्ग से संबंध बनाने को ऐसा किया जाने लगा है , विशेषकर जब सुप्रीम कोर्ट ऐसी ही कितनी बातों पर हैरानी जता रहा है कि देश में नियम कानून भी कुछ ख़ास लोगों के लिए अलग अलग निर्धारित किए जाने लगे हैं उनको अपराध करने पर भी सज़ा से बचाने को संविधान संशोधन लाने लगे हैं । शासक बनकर अपनी डफली अपना अपना राग बजाने लगे हैं । लोकतंत्र को कब लूटतंत्र बना दिया गया किसी को खबर ही नहीं हुई , सांसदों विधायकों को कल्याण निधि के नाम पर ही नहीं बल्कि कितनी ही सुविधाओं पर बेतहाशा धन खर्च करना देश जनता की सेवा हर्गिज़ नहीं है बल्कि कानूनी डकैती है , जिस देश में करोड़ों को पांच किलो अनाज से जीने पर विवश किया जाता है और कितनी ही ऐसी लुभावनी योजनाओं का मकसद जनमत को प्रभावित कर सत्ता पर काबिज़ रहना है उस में प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री से अन्य सभी शासक वर्ग का विलासिता पूर्वक जीवन समाज की सेवा नहीं ख़ज़ाने की लूट ही है । अधिकांश योजनाओं में पैसे का गलत उपयोग से भ्र्ष्टाचार करने तक सामने आता रहता है । पिछले कुछ सालों में बहुत कार्य झूठे कागज़ी आंकड़ों पर ही हुए हैं मगर कभी जांच नहीं हुई कि कौन कौन कैसे शासक वर्ग से मिलकर ये लूटने का कार्य करता रहा है । जिनको इस सब पर निगरानी करनी थी उन्होंने अपनी आंखें बंद कर सब गलत होने दिया है अपने स्वार्थ की खातिर ।   
 
अजीत डोभाल जी को मालूम होना चाहिए कि देश में धर्म की आड़ में अभी भी लूट चल रही है , क्या मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे का मकसद धन दौलत ज़मीन जायदाद एकत्र करना होना चाहिए या फिर दान से मिली राशि को दीन दुःखियों को सहायता देने पर खर्च करना चाहिए । सबसे महत्वपूर्ण बात किसी भी धर्म को राजनीति को बढ़ावा देने को भेदभाव नहीं करना चाहिए जैसा आजकल होने लगा है । धर्म को अपनी सत्ता की राजनीति का माध्यम बनाना भी देश समाज और संविधान की भावना के विपरीत है । आप पढ़ लिख कर ऊंचे  पद पर नियुक्त होने के बावजूद भी युवा समाज को इस तरह से भटकाने का प्रयास कैसे कर सकते हैं । क्या आप समाज को बताएंगे कि जिस तरह सत्ता मिलते ही राजनेताओं और राजनैतिक दलों के पास धन दौलत और आलीशान दफ़्तर से महलनुमा आवास बनते जाते हैं वो कैसे संभव है बिना सत्ता का दुरूपयोग कर लूट करने के चाहे उसको चंदा इलेक्टोरल बांड कुछ भी नानकरण कर दिया जाए । अफ़सोस है इस अनुचित राजनीति पर कोई कुछ नहीं बोलता क्योंकि सभी शामिल हैं अपना अपना हिस्सा पाने में लूट के भागीदार बन सोशल मीडिया अख़बार टेलीविज़न से तथकथित समाजसेवी तक ।  अंत में इक खरी बात कभी बाद में कोई इतिहास में दर्ज करेगा कि ऐसा भी हुआ था जब पुरानी लूट पर भाषण दिए गए थे मगर उस समय हो रही लूट खसूट पर एक आवाज़ नहीं सुनाई दी थी ।  अंत में इक ग़ज़ल , सियासत बोझ बनती जा रही है , विरासत आपको समझा रही है । 
 
 

विरासत अब समझ में आ रही है ( ग़ज़ल )

 डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 

सियासत बोझ बनती जा रही है 
विरासत आपको समझा रही है । 
 
नज़र तिरछी हुई सत्ता की देखो 
लो सबको याद नानी आ रही है ।  
 
भरोसा अब नहीं कोई भी बाकी 
हक़ीक़त देख कर पछता रही है । 
 
जो शोले राख में दहके हुए हैं 
उसे वो रौशनी बतला रही है । 
 
हुआ क्या हाल ' तनहा ' देश का है
फसल को बाड़ चरती जा रही है । 
 

 

जनवरी 08, 2026

POST : 2048 अपराध करने का अधिकार ( ग़ज़ब इंसाफ़ ) डॉ लोक सेतिया

     अपराध करने का अधिकार ( ग़ज़ब इंसाफ़ ) डॉ लोक सेतिया 

संविधान में सभी एक समान हैं तो कायदे कानून नियम सभी पर समान लागू होने चाहिएं , बल्कि जिनको अदालत से सरकारी दफ़्तर तक में न्याय करना हो अगर वही किसी कारण गलत फ़ैसले करते हैं तब ऐसे में उनको सख़्त और अधिक सज़ा मिलनी चाहिए । टिप्पणी सुनकर हैरानी हुई कि निचली अदालत अथवा किसी विभाग के अधिकारी की एक समान आपराधिक घटना पर दो लोगों को अलग अलग निर्णय करने पर किसी राज्य के उच्चतम न्यायालय के बर्ख़ास्त करने के आदेश को अनुचित घोषित कर दिया । इतना ही नहीं बल्कि ये भी कहा गया कि सिर्फ गलत या त्रुटिपूर्ण फैसले से किसी न्यायधीश पर कोई विभागीय जांच या कोई करवाई नहीं की जा सकती है । सर्वोच्च न्यायालय को क्या इतना भी समझना ज़रूरी नहीं प्रतीत होता है कि देश में नीचे से ऊपर तक अदालतों से तमाम प्रशासनिक विभागीय अधिकारियों द्वारा मनमानी पूर्वक और विवादस्पद आदेशों से करोड़ों लोगों को न्याय नहीं मिलता बल्कि निर्दोष भी दोषी करार दिए जाते हैं और कैद में जीवन बिताते हैं । जबकि हमारी न्याय प्रणाली की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा होता है जब ख़ास लोगों को गंभीर अपराध करने के बाद दोषी साबित होने पर भी ज़मानत से लेकर पैरोल तक बड़ी आसानी से मिलती रहती है । खेदजनक कड़वी वास्तविकता तो ये है कि बड़े लोगों ख़ास समझे जाने वाले वीवीआईपी वर्ग पर शिकायत दर्ज करवाने से लेकर जुर्म साबित करने तक कदम कदम पर अड़चनों और मुसीबतों से टकराना पड़ता है क्योंकि शुरू से आखिर तक यही लोग जांच सबूत गवाह सभी को मिटाने को सक्षम होते हैं । शायर कृष्ण बिहारी नूर जी का शेर है धन के हाथों बिके हैं सभी अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं । 
 
प्रशासनिक बड़े अधिकारियों से अदालती प्रणाली में शामिल सभी इक ऐसी व्यवस्था का अंग हैं जहां हर जगह रिश्वत से तारीख बढ़ाने से अन्य तमाम कामकाज होता है जिसे अनिवार्य समझ लिया गया है । देश की आज की बदहाली इन्हीं सभी शासक वर्ग की आपराधिक शैली की बदौलत है जिस में भ्र्ष्टाचारी खुले फिरते हैं और गरीब पिसते रहते हैं अपना सभी कुछ दांव पर लगाकर भी इंसाफ़ नहीं मिलता । सच बताऊं तो हमारे देश की प्रशासनिक प्रणाली विधायिका मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री सभी शपथ संविधान की उठाते हैं सभी के साथ समान रूप से निष्पक्ष होकर बिना अनुराग या बैर रखे विधि अनुसार न्याय करेंगे । लेकिन ऐसा होता कभी दिखाई नहीं देता है बल्कि सभी चोर चोर मौसेरे भाई की तरह आचरण करते हैं साधरण व्यक्ति को न्याय देना उनकी प्राथमिकता ही नहीं है मगर जिनको राहत देनी होती है उनके लिए सिर्फ रास्ते ही नहीं बनाये जाते बल्कि कायदे कानून ताक पर रखने तोड़ने से बदलने तक का कार्य निसंकोच किया जाता है । राजनीति में तो खैर अपराधी होना विशेषता समझा जाने लगा है , प्रशासन भी सत्ताधारी राजनेताओं से तालमेल बिठाकर खुद अपने स्वार्थ सिद्ध करते हैं । कितनी विडंबना है कि उच्च शिक्षा ऊंचे पदों पर बैठ कर भी देश समाज के प्रति ईमानदारी से कार्य नहीं करते हैं , विवेकशीलता का नितांत आभाव है । राजनेता अधिकारी फिल्म जगत के बड़े बड़े अभिनेता नायक फिल्म निर्माता तक सभी अपराध करते हैं राजनेताओं से मिलकर और कभी उनको सज़ा नहीं मिलती है । टेलीविज़न अख़बार में उनकी ऐसी खबरों को छुपाया जाता है अन्यथा जिनको लोग ख़ुदा या फ़रिश्ता समझते हैं उनकी छवि धूमल हो सकती है । टीवी सीरीज़ और कॉमेडी शो से खिलाड़ी तक जनता को गुमराह करते हैं सिर्फ पैसा कमाना उनका एक मात्र मकसद है । 
 
सबसे बड़ी अदालत को कभी चिंता ही नहीं हुई कि देश की न्याय व्यवस्था की शोचनीय दशा को कैसे सुधारा जा सकता है । जब न्यायधीश सेवामुक्त होने के बाद सांसद अथवा किसी अन्य संसथान में नियुक्ति पाकर शानो शौकत से राजसी जीवन बिताना अधिक महत्वपूर्ण समझते है इस से कि उनको समाजिक निस्वार्थ कार्यों को करना चाहिए जनकल्याण की भावना रखते हुए , तब बदलाव क्या होगा कैसे संभव है । बड़े प्रशासनिक अधिकारी भी राजनेताओं सरकार से मेलजोल रख कर अपना कार्यकाल बढ़ाने से अन्य किसी पद पाने को लालायित रहते हैं किसी की चाहत मिटती ही नहीं है । आख़िर में अपनी इक ग़ज़ल से पहले आपको इक लोककथा की बात करते हैं । इक बादशाह ने देखा सड़क बहुत सारे गधे इक कतार में चल रहे हैं , बादशाह ने धोबी से पूछा ये इक कतार में सीधे कैसे चलते हैं । धोबी ने बताया जो कतार तोड़ता है मैं उसे सज़ा देता हूं । बादशाह ने पूछा क्या तुम मेरे राज्य में अमन कायम कर सकते हो , धोबी ने हामी भर ली । बादशाह  ने उसे मुंसिफ़ अर्थात न्यायधीश बना दिया , शहर आकर न्यायधीश बन कर फ़ैसला करने का पद पाकर अदालत में सुनवाई करने लगा । इक चोर को पकड़ कर लाया गया जुर्म साबित हुआ , धोबी ने आदेश दिया इस चोर के हाथ काट दो । सज़ा देने वाले जल्लाद ने इशारा किया कि चोर वज़ीर का ख़ास आदमी है , धोबी ने फिर कहा उसका हाथ काट दो । तब वज़ीर ने सरगोशी की अपना आदमी है थोड़ा ख़्याल करो , धोबी ने इस बार ज़ोर से आदेश दिया कि चोर का हाथ और वज़ीर की ज़ुबान दोनों काट दो । कहते हैं ऐसे अमन कायम हो गया । आजकल ऐसे भाईचारा निभाने वाले राजनेता अधिकारी पुलिस से लेकर तभी धनवान उद्योगपति टीवी फिल्म धर्म उपदेशक हैं जिनका आपसी लेन देन का हिसाब है , ऐसे लोग अन्याय अत्याचार करते ही नहीं बल्कि नियम कानून संविधान को अपनी ठोकर पर रखते हैं । सभी जानते हैं उनको सज़ा कभी नहीं मिलती लेकिन अब चाहते हैं उनके अपराध को ही उनका कर्तव्य या अधिकार घोषित कर दिया जाना चाहिए ।     
 
पहले सिर्फ देश के राष्ट्रपति को लेकर ऐसा सुनते थे क्योंकि उस पद पर आसीन व्यक्ति बेहद ईमानदार और काबिल हुआ करता था । आजकल तो उस पद की गरिमा भी बची नहीं है और लगता है कि जैसे वहां भी सत्ता धारी लोग अपनी कठपुतली बिठाने लगे हैं जो उनकी हर बात पर मोहर लगाने को विवश है । लेकिन लोकतंत्र में न्याय में भेदभाव कैसे हो सकता है , जिनके गुनाहों की सज़ा अधिक कड़ी होनी चाहिए उनको जुर्म करने की अघोषित छूट है कि उनको सुरक्षा कवच दिया जाए अपराधी होने पर भी उनकी कोई जांच तक ही नहीं हो सकती हो । ग़ज़ल पेश है :- 
 
 

फैसले तब सही नहीं होते ( ग़ज़ल ) 

डॉ लोक सेतिया "तनहा"

फैसले तब सही नहीं होते
बेखता जब बरी नहीं होते ।

जो नज़र आते हैं सबूत हमें
दर हकीकत वही नहीं होते ।

गुज़रे जिन मंज़रों से हम अक्सर
सबके उन जैसे ही नहीं होते ।

क्या किया और क्यों किया हमने
क्या गलत हम कभी नहीं होते ।

हमको कोई नहीं है ग़म  इसका
कह के सच हम दुखी नहीं होते ।

जो न इंसाफ दे सकें हमको
पंच वो पंच ही नहीं होते ।

सोचना जब कभी लिखो " तनहा "
फैसले आखिरी नहीं होते । 
 
 सेवानिवृत्ति के बाद विभागीय जांच पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, MSWC का रिकवरी  आदेश रद्द | Court Book Hindi

जनवरी 03, 2026

POST : 2047 कहां से कहां आ गये हैं ( व्यंग्य - रंग बदलती दुनिया ) डॉ लोक सेतिया

कहां से कहां आ गये हैं ( व्यंग्य - रंग बदलती दुनिया ) डॉ लोक सेतिया   

कहां आ गये हम , मेरी पुरानी ग़ज़ल है जिस का वीडियो बनाया जा रहा है मेरे यूट्यूब चैनल गीतकार पर प्रसारित होने की प्रतीक्षा है , इस रचना का शीर्षक उपयुक्त प्रतीत हुआ मुझको । मैंने दो दिन पहले बताया था कि अगली पोस्ट का विषय होगा जब हम खुद को दर्पण में देख कर आनंदित होने लगते हैं तब अपने भीतर झांकना छोड़ देते हैं । अपनी बाहरी सुंदरता सजावट पर ध्यान देते हैं अंतर्मन को देखना तक नहीं चाहते हैं क्योंकि आवरण शानदार है भीतर सब मैला कुचौला है । इक ऐसी शुरुआत हुई है कि हर मुख्यमंत्री से देश के प्रधानमंत्री तक को देश की हर दीवार पर अपनी ही तस्वीर लगवानी है शोहरत की कामना है । मैंने कितनी बार जॉर्ज सिल्वे की कही बात को दोहराया है कि लोकप्रियता की आकांक्षा करना इक अपराध जैसा है , ये आपके नैतिक आचरण एवं व्यवहार पर निर्भर करता है कि आपको शोहरत मिलेगी अथवा नहीं । देश के खज़ाने से विज्ञापन प्रचार प्रसार से अपने नाम का डंका पीटना मानसिक रोग ही कहला सकता है । अब तो सरकार के सभी विभाग एवं प्रशासक राजनेता इस मानसिकता का शिकार हैं । सभी आत्ममुग्ध हैं किसी को सामाजिक पतन बदहाली की कोई चिंता ही नहीं है , दिखावा सभी करते हैं जबकि जानते हैं उन्होंने कुछ भी सार्थक करने का प्रयास ही नहीं किया । सभी को अधिक से अधिक खुद की खातिर चाहिए और अंजाम ये है कि जनता की खातिर कुछ बचता ही नहीं , सब मिल बांटकर मौज करते हैं । ख़ुशहाली चंद घरानों के लिए आरक्षित है जैसे जो रईस हैं उन्हीं को सब की भूख है , धर्म भी बताता है कि जिस के पास सभी कुछ हो फिर भी और अधिक पाने की हवस हो वो सब से दरिद्र होते हैं । 
 
बात इंसान की नहीं है सरकार समाज की व्यवस्था से लेकर तमाम जगह की यही है , सभी शोर मचाते हैं आगे बढ़ने का मगर किस दिशा को अग्रसर हैं कोई नहीं बताता कोई नहीं समझता कोई नहीं दिखलाता कि  असलियत क्या है कौन आगे बढ़ रहे हैं और कौन और भी पिछड़ रहे हैं सामाजिक खाई इतनी बढ़ गई है । 2026 देश की आज़ादी के 78 साल बाद देश समाज का आचार विचार व्यवहार इतना बदल चुका है कि सोचने समझने लगे तो घबराहट होती है । कभी महात्मा गांधी जी गरीब लोगों को नंगे बदन देख कर सिर्फ एक धोती पहनने का संकल्प लेते हैं , लाल बहादुर शास्त्री पुराने कपड़े पहन कर शपथ ग्रहण करते हैं जबकि आजकल हर मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह भव्य आयोजित कर देश की गरीबी का नहीं करोड़ों गरीबों का उपहास किया जाता है । शासक प्रशासक कर्तव्य निभाने की चिंता ही नहीं करते उनकी प्राथमिकता खुद अपने लिए शानदार भवन हर शहर में सचिवालय राज्यों की राजधानी में शानदार बड़ी बड़ी इमारतें जिनमें सभी सुख सुविधाएं उपलब्ध हों , आधुनिक संचार माध्यम और तमाम राजसी शान ओ शौकत आवश्यक लगते हैं । उनको कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश की अधिकांश जनता को पीने का साफ पानी बुनियादी सुविधाएं नहीं हासिल हुई हैं । अगर इसको जनकल्याण देशसेवा समझते हैं तो लोकतंत्र में कितना बड़ा अपराध है मालिक भूखा और उसका नौकर सेवक बन कर छप्पन भोग खाकर भी मानता है जनता पर उपकार करते हैं । 
 
सभी दलों के राजनेताओं ने खुद अपने लिए बंगले गाड़ियां और धन दौलत के अंबार एकत्र कर लिए हैं , शायद ही कोई मिल सकता है जिस नेता या सरकारी अधिकारी के पास उनकी वास्तविक आमदनी से हज़ारों लाखों गुणा जायदाद बेनामी नहीं है । जिस पर छापा डालते हैं पुलिस प्रशासनिक बड़े अधिकारी से छोटे कर्मचारी के पास करोड़ों रूपये बरामद होते हैं । सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश तक के पास धन मिलता है कभी आग लगने से सामने आता है । जानकर हैरानी हुई कि सरकार ने ऐसा कानून बनाया हुआ है जिस में जायदाद ज़ब्त हो सकती है अथवा जुर्माना लगाया जा सकता है लेकिन उनको कोई सज़ा नहीं मिल सकती है । ऐसे ही कुछ अन्य संस्थाओं पर नियुक्त अधिकारी को अपराधी साबित होने पर भी कोई मुकदमा उन पर नहीं चलाने का नियम बनाया हुआ है , मैं चाहे जो करूं मेरी मर्ज़ी । ये कैसा मंज़र है कि देश को बताते हैं आगे बढ़ रहा है लेकिन अपराध गंभीर से गंभीर करने वाले शान से रहते हैं शायद ही कुछ को सज़ा मिलती है । हमारे देश के शासक रत्ती भर भी शर्मिंदा नहीं होते हैं ये देख जानकर कि अन्याय अत्याचार और अमीर गरीब में फ़ासला दिन पर दिन बढ़ता ही जाता है । सरकार सामान्य जनता के प्रति उदासीन है और धनवान लोगों और देश को लूटने वाले साहूकारों के प्रति दयावान है अर्थात अराजकता को बढ़ावा दे रही है । 
 
आजकल ईमानदारी नैतिकता और ऊंचे आदर्शों पर चलना तमाम बड़े लोगों ने छोड़ दिया है सच्चाई से रिश्ता तोड़ कर झूठ और आडंबर से ऐसा गठबंधन कर लिया है कि सही और गलत की परिभाषा बदलनी पड़ी है । इधर सरकारी योजनाओं का अंबार लगा हुआ है और निशदिन नई नई योजनाएं घोषित की जाती हैं जबकि तमाम घोषणाएं कागज़ी हैं कुछ भी हासिल नहीं हुआ इन सभी से सामन्य जनता को । सिर्फ कुछ खास वर्ग को लूटने और झूठे आंकड़े बनाकर जनता को दिखाने पर ही बेतहाशा धन टीवी अख़बार पर प्रचार प्रसार पर बर्बाद कर खुद अपनी पीठ थपथपाई जाती है सत्ताधारी शासकों द्वारा । हमने भौतिकता की खातिर सभी मूल्यों आदर्शों को त्याग दिया है जिस तरफ देखते हैं सभी खुदगर्ज़ी में समाज को विनाश की तरफ धकेल रहे हैं , सभी अर्थात तमाम लोग अपनी सही दिशा से भटक गए हैं और उस जगह खड़े हैं जहां कोई मंज़िल नहीं कोई रौशनी नहीं सिर्फ अंधकार दिखाई देता है दूर दूर तक ।    
 
 
 

 
 

दिसंबर 25, 2025

POST : 2046 देश समाज की बर्बादी को अग्रसर ( लूट का शासन ) डॉ लोक सेतिया

  देश समाज की बर्बादी को अग्रसर ( लूट का शासन ) डॉ लोक सेतिया 

शायद नहीं अब यकीनन कहा जा सकता है कि हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल सभी अंग विधायिका कार्यपालिका न्यायपालिका का गठजोड़ पैसे वाले और गुंडे बदमाश से लेकर गंभीर अपराधियों तक से पूर्णतया हो चुका है । देश की अधिकांश जनता के लिए इन सभी के भीतर रत्ती भर भी मानवीय संवेदना नहीं है बल्कि उसको किसी न किसी तरह बहला फुसला कर झूठे वादों प्रलोभन के जाल में फंसा कर जैसे बेबस कर दिया गया है । राजनेताओं की राजनीति सभी दलों की सिर्फ सत्ता पर काबिज़ होकर पूरी व्यवस्था को अपने लिए हथियाना बन चुका है । देशभक्ति समाजसेवा जनकल्याण गरीबी भूख असमानता ये सब किसी राजनेता किसी प्रशासक किसी न्यायधीश की प्राथमिकता नहीं रही है , इन बातों का झूठा प्रचार कर डंका पीटना जानते हैं आचरण बिल्कुल उल्टा करते हैं । धनवान बड़े बड़े पूंजीपतियों से राजनेताओं सरकारी उच्च अधिकारियों न्यायधीशों तक सत्ता और पैसे की हवस में इस सीमा तक पागल हो चुके हैं कि देश की लोकतांत्रिक प्रणाली को घुन की तरह खोखला करने के बाद और भ्र्ष्टाचार को अधिकार बनाने के बाद अब प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर मानव जीवन तक को खतरे में डालने को आतुर हैं । समाज के प्रति कोई कर्तव्य किसी को भी याद नहीं है बल्कि समाज की बुनियाद को खोखला कर रहे हैं । जनता को धोखा देने को समझाते हैं कि आने वाले इतने सालों बाद देश अर्थव्यवस्था की बुलंदी पर पहुंच जाएगा और कोई भी भूखा बेघर नहीं रहेगा ।  आज़ादी का अर्थ ये कदापि नहीं था कि कुछ लोग सरकार की योजनाओं से लेकर धर्म और समाजसेवा एवं पत्रकारिता फिल्म टेलीविज़न को अपने स्वार्थों के लिए दुरूपयोग कर उनकी असली छवि को ही धूमिल कर देंगे । 
 
आजकल सभी सरकारी योजनाएं बड़ी बड़ी कुछ कंपनियों की तिजोरियां भरकर बदले में चंदा रिश्वत लेकर खुद ऐशो आराम की ज़िंदगी हासिल कर मौज मनाने का माध्यम बन गई हैं । उद्योगपतियों की मर्ज़ी से नियम कानून बनाने बदलने में नैतिकता की बात क्या पर्यावरण तक को दांव पर लगाने का कार्य किया जाने लगा है । विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि सरकार जंगलों पहाड़ों से पर्यावरण का विनाश कर रही है जिस से भविष्य में मानवता का जीवन खतरे में पड़ने वाला है । लेकिन इन सभी को करोड़ों लोगों की कोई चिंता नहीं है क्योंकि इन सभी ने भारत देश को अपना समझा ही नहीं हैं इन सभी को कभी किसी और देश में जाकर बसना है । तमाम ऐसे लोगों ने ऐसा प्रबंध कर लिया है अपने परिवार को किसी सुरक्षित देश में भेजने का । ऐसे लोग कभी देशभक्त नहीं होते हैं सिर्फ देशभक्ति की बातें करते हैं देश को समाज को कुछ देते नहीं बल्कि बदहाल कर रहे हैं । आपको लगता होगा ये धार्मिक आचरण करते हैं जबकि वास्तविक जीवन में अधर्म ही उनका आधार है सच्चाई और ईमानदारी धर्म की राह पर चलते तो ख़ुदगर्ज़ नहीं परमार्थ की बात करते और देश समाज का ऐसा खराब हाल होता ही नहीं । आपने कभी चावार्क ऋषि की बात सुनी होगी , ऐसा केवल एक व्यक्ति नहीं था बल्कि दार्शनिक शोध करने वाले बताते हैं कि ये इक विचारधारा थी जिस के कितने ही अनुयायी हुआ करते थे ।    
 
चावार्क की सोच वाले ये सभी बड़े बड़े लोग हैं जिनको लगता है कि बस यही लोक ही वास्तविक है और कोई स्वर्ग नर्क नहीं है कोई भगवान नहीं है । आपको मौज मस्ती करनी है अपनी ख़ुशी की खातिर जीना है , जब ऐसे शासक प्रशासक अन्यायी अत्याचारी और अपराधी लोगों को संरक्षण देते हैं तब उनको पाप पुण्य भलाई बुराई की नहीं बस अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति करनी होती है । ऐसे लोगों का धार्मिकता प्रदर्शन अपने असली चरित्र को छिपाने को होता है । लेकिन सिर्फ वही नहीं हम में भी बहुत लोग यही करते हैं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे गिरजा घर जाते हैं लेकिन सभी अनुचित कर्म भी करते रहते हैं । कुछ लोग गुमराह करते हैं कि जितने भी पाप करते रहो कुछ तरीके हैं पापमुक्त होने को , जबकि वास्तव में अगर परमात्मा है तो ऐसा होने कैसे दे सकता है । अपने भीतर से अपराधबोध को हटाने का ये खोखला प्रयास है , व्यक्ति हमेशा बेचैन रहता है खुद अपनी ही अंतरात्मा से डरता है । आजकल शासक पुरानी सभी परिभाषाओं को बदल रहे हैं जिन बातों को अनैतिक और असमाजिक कहा जाता था उनको आवश्यक घोषित किया जाने लगा है , विकास के नाम पर विनाश को आमंत्रित करने लगे हैं लोभी ख़ुदगर्ज़ स्वार्थी सत्ताधारी लोग ।  पिछले कुछ सालों में सरकारी योजनाओं की भेंट करीब तीन करोड़ पेड़ काटकर किये गए हैं जबकि आदमी का सांस लेना दूभर हो गया है , मगर सरकार की बेशर्मी झलकती है जब ब्यान आता है कि फेफड़ों का स्वच्छ हवा से कोई रिश्ता नहीं है जैसे शासकों का ईमानदारी और समाज कल्याण से वास्तव में कोई नाता नहीं है उनको सभी कुछ चाहिए किसी भी कीमत पर और ऐसा करने में सामने आने वाली बाधा को मिटाया जाना उसको अपना अधिकार लगता है । 
 

ठंडी ठंडी छांव ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

घर के आंगन का वृक्ष हूं मैं
मेरी जड़ें गहराई तक फैली हैं
अपनी माटी में
प्यार से सालों साल सींचा है
माली ने पाला है जतन से
घर को देता हूं छाया मैं ।

आये हो घर में तुम अभी अभी
बैठो मेरी शीतल शीतल छांव में
खिले हैं फूल कितने मुझ पर
निहारो उनको प्यार से
तोड़ना मत मसलना नहीं
मेरी शाखों पत्तों कलियों को
लगेंगे फल जब इन पर
घर के लिये  तुम्हारे लिये 
करो उसका अभी इंतज़ार ।

काटना मत मुझे कभी भी
जड़ों से मेरी
जी नहीं सकूंगा 
इस ज़मीन को छोड़ कर
मैं कोई मनीप्लांट नहीं
जिसे ले जाओ चुरा कर
और सजा लो किसी नये गमले में ।

देखो मुझ पर बना है घौसला
उस नन्हें परिंदे का
उड़ना है उसे भी खुले गगन में
अपने स्वार्थ के पिंजरे में
बंद न करना उसको
रहने दो आज़ाद उसको भी घर में
बंद पिंजरे में उसका चहचहाना
चहचहाना नहीं रह जायेगा
समझ नहीं पाओगे तुम दर्द उसका ।

जब भी थक कर कभी
आकर बैठोगे मेरी ठंडी ठंडी छांव में
माँ की लोरी जैसी सुनोगे
इन परिंदों के चहचहाने की आवाज़ों को
और यहां चलती मदमाती हवा में
आ जाएगी तुम्हें मीठी मीठी नींद । 
 
 
 Aravali mountain range, अरावली पर्वत श्रृंखला, विश्व की सबसे पुरानी पर्वत  श्रृंखला, अरावली पर्वत, - YouTube

दिसंबर 15, 2025

POST : 2045 सतसंग की चर्चा में चर्चा ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       सतसंग की चर्चा में चर्चा   ( हास - परिहास  ) डॉ लोक सेतिया  

सभा में प्रवचन किया जा रहा है आयोजक कोई भी हो सकता है वास्तव में उसकी हैसियत प्रयोजक जैसी होती है । उपदेशक दुनिया भर को खराब बता रहे हैं बुरे लोगों को अच्छाई का सबक पढ़ा रहे हैं सुनने वाले दिल ही दिल में पछता रहे हैं वही पुरानी बातें सुनते हुए उकता रहे हैं । मकसद कुछ और था सतसंग में भक्ति पर चर्चा करनी थी उसको भुला कर जाने क्या क्या समझा रहे हैं , किसी फ़िल्मी गीत ग़ज़ल को भजन है कहकर गा कर श्रोताओं को लुभा रहे हैं । खुद अपना शुल्क लिया हुआ है सभी को माया जाल से बचने की राह दिखाने को प्रयास कर रहे हैं अपनी गागर में सागर तक भर रहे हैं । कभी किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए उपदेशक खुद यही हमेशा करते हैं । अच्छे लोग हैं जिन्होंने उनको बुलाया है उनके नाम से कितनी पहचान क्या क्या कितना महान है विस्तार से बताते हैं बस वही देवतुल्य हैं अन्य इंसान भी नहीं लगते हैं ऐसे शिखर पर बिठाते हैं सभी लोग अपनी तुलना समझ शर्माते हैं । सभागार से बाहर बैठी कुछ महिलाएं अपना समय बिताने को मेलजोल बढ़ाती हैं , जो उनकी परिचित उपस्थित नहीं उनकी असलियत सभी को बताती हैं । बड़ी झूठी है जाने खुद को क्या समझती हैं चार पैसे हैं बस तभी इतराती हैं , जलती हैं हर किसी को खुद से नीचा बताती हैं सतसंग नहीं सुनने आती पार्टियां करती झूमती गाती हैं । सभी को मालूम है दोनों कितनी करीब हैं रोज़ आपस में घंटों फोन पर बतियाती हैं , किस किस की क्या ख़बर है विषय पर दुनिया कितनी ख़राब है समझती समझाती हैं ।    
 
इक चतुर नार बड़ी होशियार सभी परिजनों को अपनी उंगलियों पर नचाती है नाच न जाने आंगन टेढ़ा बताती हैं । सभी को हर बात अपने रंग ढंग से सुनाती समझाती है हर किसी को नानी याद आती है , अपनी बात पर सभी से हामी भरवाती है कोई नहीं समझता तो उसको नादान कह कर मनवाती है । उनको किसी की किसी द्वारा तारीफ़ बिल्कुल नहीं सुहाती है ऐसे में जिसकी तारीफ़ की गई उसकी जन्म जन्म की कुंडली दिखाती है ।महिलामंडल की अध्यक्ष है सभी को आईना दिखाती है खुद को विश्वसुंदरी से भी बढ़कर हसीन बताती है । ज़िंदगी ऐसी महिला बड़ी शान से बिताती है चांदनी रात सामने उस के मैली नज़र आती है । कौन कौन है संत महात्मा सभी को अपना अध्यात्म गुरूजी बताती है हर महीने किसी को अपने आवास पर आमत्रित करती है शहर भर को अपना करिश्मा दिखलाती है । हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा ।  अल्लामा इक़बाल का शेर है , मुझको समझने वाला पारखी कद्रदान नहीं मिला अफ़सोस जताती है ।   
 
 
 
 नाच न जाने आँगन टेढ़ा मुहावरे पर आधारित प्रेरक कहानियाँ! Short Stories

दिसंबर 13, 2025

POST : 2044 कोई और करे तो गलत खुद करें तो सही ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   कोई और करे तो गलत खुद करें तो सही   ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

कुछ बातें कभी भी बदलती नहीं हैं , उनका अर्थ उनका अभिप्राय बदल देते हैं , सरकार प्रशासन ही नहीं सामान्य लोग भी कहते हैं कि हमसे पहले कितना कुछ उचित नहीं था मगर हमने वही सब किया भी , लेकिन कोई अनुचित नहीं करार दे सकता है जैसे हमने किया बढ़िया है । सही क्या गलत क्या के मापदंड बदल देते हैं और कहते हैं कि समय बदल गया है हालात बदले हुए हैं जबकि वास्तव में बदलता कुछ भी नहीं है सिर्फ नामकरण कर दिया पाप को पुण्य घोषित कर दिया , लूट को समाज की सेवा कह दिया , मनमानी करने को देश कल्याण नाम दे दिया जाता है । कौन कहता है कि लिखी हुई इबारत को कोई मिटा नहीं सकता है इधर इतिहास को अलग ढंग से समझाया जाता है सूरज को दीपक दिखलाया जाता है । झूठ को सच साबित किया जाता है काले को सफ़ेद करने को सबको आंखें बंद रखने को आदेश देकर इस तरह चूना लगाया जाता है कि दुनिया को सही मार्ग से भटकाया जाता है । नियम कानून को दरकिनार कर अपने लिए रास्ता बनाने को पेड़ों को कटवा कर पर्यावरण संरक्षण को ठेंगा दिखाया जा रहा है , बाकी दुनिया को कुछ अलग सबक पढ़ाया और समझाया जा रहा है । कठपुलियों को उंगलियों पर नचाने का हुनर जानते हैं सत्ता का नंगा नाच खुलेआम खेल कर पर्दों से छिपाया जा रहा है । रोज़ हैरानी होती है कुछ लोग आपस में चर्चा करते हैं ज़माने भर की बातें बताते हैं अवगुण सभी के उनकी आंखों को नज़र आते हैं , मगर अपने आचरण पर कभी ध्यान ही नहीं देते खुद उसी तरह से व्यहवार करने को ज़रूरी समझते हैं ये फ़रमाते हैं ।  
 
 

सच और झूठ की लड़ाई में ( हास्य- कविता ) 

डॉ लोक सेतिया 

 
शिखर पर खड़ा हुआ है झूठ सच पड़ा हुआ खाई में  
इंसाफ़ क़त्ल होता रहता सच और झूठ की लड़ाई में
 
सियासत की अर्थी भी निकलेगी मगर बरात बन कर
जनता की डोली का दुःख दर्द दब जाएगा शहनाई में
 
शासकों को क्या खबर क्या क्या होने लगा समाज में 
जंग लाज़मी है चुनावी खेल में , हर भाई और भाई में
 
आत्मा ज़मीर आदर्श और ईमानदारी से फ़र्ज़ निभाना 
कोई कबाड़ी खरीदता नहीं ये सब सामान दो पाई में 
 
जिनको इतिहास लिखना आधुनिक समय का यहां 
भर लिया इंसानी खून उन्होंने कलम की स्याही में 
 
राजनेता अधिकारी धनवान लोग शोहरत जिनकी है 
खोटे साबित हुए सब कसौटी पर हर बार कठिनाई में 
 
सबका भला नहीं सिर्फ खुद अपने लिए जीना मरना 
खूब मुनाफ़ा अब बाजार में अच्छों की झूठी बुराई में  
 
 सूरज को दीया कौन दिखा सकता है? |Yog Se Yogyata | योग से योग्यता |  #Meditation With Ojaank Sir| - YouTube
 


दिसंबर 05, 2025

POST : 2043 क़त्ल मर चुके लोगों का ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    क़त्ल मर चुके लोगों का ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया  

आपने देखा होगा राजनेता दिखावे को सफाई अभियान की शुरुआत सोशल मीडिया अख़बार टीवी चैनल पर दिखलाने को जब हाथ में झाड़ू पकड़े गंदगी को हटाते नज़र आते हैं तब उस जगह पहले बदबूदार गंदगी नहीं बल्कि ऐसा कूड़ा डाला जाता है प्रशासन द्वारा जो गंदगी नहीं होता है ।  हमारे देश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में ये चलन आधुनिक नवयुग की देन है जिसे करने की ज़रूरत है उसका उपहास बना देना । कूड़ा सबसे अधिक प्रशासनिक व्यवस्था में ही जमा है जिस की कभी सफाई कोई नहीं करता है और जिन्होंने भी कभी पहले ऐसा करने की कोई कोशिश की थी उनकी दिखाई राह पर सबसे अधिक कांटे बिछाने का कार्य बाद में आने वाले लोगों ने किया है । नतीजा देश समाज दिखलाने को शानदार लगने लगा है जबकि भीतर से खोखला और बेहद बदसूरत बनता गया है । किसी अधिकारी ने राजनीती से अपराधीकरण मिटने की कोशिश की तो तमाम लोगों ने अपराध की राजनीति की पटकथा लिखनी शुरू कर दी और अपराधी सभी को भाने लगे । राजनेता से प्रशासन तक सभी गरीबी मिटाने की जगह गरीबों को ही सताने लगे उनको ज़िंदगी और मौत का फासला समझाने लगे । देश की आज़ादी से नवनिर्माण की खातिर अपना जीवन समर्पित करने वालों को आधुनिक ख़ुदगर्ज़ लोग कटघरे में खड़ा कर उनके गुनाह गिनवाने लगे हैं खुद कुछ भी नहीं करना जानते हैं सभी कुछ मिटाना चाहते हैं । पचास साठ साल पहले मर चुके लोगों को फांसी पर चढ़ाने लगे हैं उनकी हर कुर्बानी को झुठलाने लगे हैं अपनी सूरत नहीं देखते शीशे के महल में रहते हैं पत्थर फैंक कर खुद को जो नहीं बन सकते बतलाने लगे हैं । 
 
इधर आजकल चर्चा नहीं फुसफुसाहट होने लगी है , कोई है जो सत्ता के गलियारे में बैठा सोशल मीडिया टीवी चैनल अन्य तमाम दुनिया को निर्देश जारी किया करता रहा है खुद ही भ्र्ष्टाचार की दलदल में फंसा हुआ मिला है । उसका अंजाम क्या हुआ किसी को नहीं मालूम कि छोड़ गया या निकाला गया है सत्ता की सेवा से निवृत हुआ , कुछ लोग अचानक ख़ामोशी से गायब हो रहे हैं । उनकी कारगुज़ारियों को छुपा दिया जाता है जो हर दिन सभी की खामियां ढूंढ ढूंढ कर प्रचारित किया करते थे बस इक उनके आका का आभामंडल बनाये रखने को । ख़ामोशी पसरी हुई है देश की राजधानी की सत्ता की गलियों में इस विषय पर कोई आवाज़ नहीं सुनाई देती है , जिस विभाग की जांच में उनके नाम सामने आये वो भी बेबस है अन्यथा सामन्य लोग क्या विपक्षी राजनेता होते तो कब का नोटिस भिजवा बुलवाया जाता । अपनी साख पर विभाग कालिख लगने देता है तो माजरा कुछ तो है बनाये न बने छुपाये न बने ।  
 
जो ज़िंदा नहीं कब के मर चुके हैं उनके कर्मों का हिसाब कौन ले रहे हैं जिन्होंने खुद कभी कुछ समाज की खातिर नहीं किया , जबकि धर्म संस्कृति समझाती है कि मर चुके लोगों की बुराई कभी नहीं करते हैं । खुद अपनी लकीर खींचना कठिन लगता है इतिहास से औरों की लंबी लकीरों को छोटा नहीं करना चाहते उस को मिटाकर कुछ और बनाना चाहते हैं । धनवान उद्योगपति से शासक प्रशासक तक सभी मिलकर ऐसा भयानक दृश्य बना रहे हैं कि लोग जीना छोड़ मौत को गले लगा रहे है , कैसे ख़्वाब दिखलाये थे क्या मंज़र सामने आने लगे हैं ।  बड़े बड़े पदों पर आसीन लोगों के आपराधिक कारनामे शासन वाले छुपाने लगे हैं उनको त्यागपत्र से ही राहत मिल जाती है जबकि ऐसे अपराध कोई और करे तो खूब शोर चोर चोर का मचाने लगे हैं । चोर शोर मचाने लगे हैं  , दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल याद आई है  : - 
 

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं  

गाते - गाते लोग चिल्लाने लगे हैं ।  

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो 

ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं । 

वो सलीबों के करीब आए तो हमको 

कायदे - कानून समझाने लगे हैं । 

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है 

जिसमें तहख़ानों से तहख़ाने लगे हैं । 

मछलियों में ख़लबली है , अब सफ़ीने 

उस तरफ जाने से कतराने लगे हैं ।

मैलवी से डाँट खाकर अहले मक़तब 

फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं । 

अब नयी तहज़ीब के पेशे - नज़र हम 

आदमी को भूनकर खाने लगे हैं ।   

 

चोर मचाए शोर… 😒🤦🏻‍♂️, लेकिन देश और बिहार से धोखाधड़ी के करत बा, ई जनता  सब बुझेला!, #NDA4Bihar 

दिसंबर 02, 2025

POST : 2042 कहनी है बात खरी खरी , भली लगे या लगे बुरी ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

        पापियों के पाप धोते धोते ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

               { कहनी है बात खरी खरी , भली लगे या लगे बुरी }

टी एन शेषन  ने जो अभियान देश की गंदी राजनीति को स्वच्छ करने को 1990 में मुख्य चुनाव आयुक्त का प्रभार संभालने पर शुरू किया है 2025 तक कुछ ऐसा हुआ है कि भगीरथ की गंगा खुद ही इस कदर मैली लगने लगी है कि लोग चुनाव आयोग को लेकर आशंकित हैं । अंकुश जिन पर लगाना था उन को छोड़ अन्य सभी पर कठोर होने लगी है , अपराधी राजनेताओं और अनुचित ढंग से चुनाव लड़ने वालों पर मुलायम और मेहरबान हुई लगती है । चुनाव आयोग अपनी भूमिका बदल चुका है और उधर खड़ा दिखाई देता है जिधर सभी राजनेता सत्ता पाने को नियम कानून से आदर्श नैतिकता को ताक पर रखने को अपना अधिकार समझते हैं । आजकल लोकतंत्र का अर्थ जनता और समाज को बेहतर बनाना नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ किसी भी तरह सत्ता पर अधिकार हासिल कर मनमानी करना है । खेद की बात है कि सभी दल एक जैसे हैं सरकार बदलने से भी जनता की देश की तस्वीर और तकदीर नहीं बदलती है । 
 

उन्होंने जो करना शुरू किया पहले उन पर ध्यान देना ज़रूरी है : - 

 
आचार संहिता को सख्ती से पालन करवाना । 
सभी मतदाताओं के लिए फोटो लगा पहचान पत्र शुरू करवाया । 
उम्मीदवारों के निर्धारित खर्चों पर अंकुश लगाना । 
चुनाव में पर्यवेक्षक तैनात करने की प्रक्रिया को सख़्ती से लागू किया ।  
 

कई भ्र्ष्ट प्रथाओं को ख़त्म करने की कोशिश : -

मतदाताओं को लुभाने या डराने की व्यवस्था का अंत करने का प्रयास । 
चुनाव के दौरान शराब और अन्य चीज़ें बांटने पर सख़्ती से रोक लगाना । 
प्रचार के लिए सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग पर रोकने की कोशिश करना । 
जाति या साम्प्रदायिक आधार पर मतदाताओं से वोट देने की अपील पर रोक । 
चुनाव प्रचार के लिए धर्म स्थलों के इस्तेमाल पर रोक लगाना । 
पूर्व अनुमति के बगैर लाउडस्पीकर और तेज़ आवाज़ में संगीत पर रोक लगाना । 
 
आज ये सब पढ़कर अचरज होता है कि कभी इतने शानदार साहसी ईमानदार अधिकारी हुआ करते थे , चुनाव आयुक्त पर आसीन होने से पहले जब वह वन और पर्यावरण मंत्रालय में थे तब उस को भी सार्थक और कारगर बना दिया था । बड़े से बड़े सत्ताधारी को नहीं कहने की परंपरा उन्होंने ही शुरू की थी क्योंकि उनकी निष्ठा देश संविधान और जनता के प्रति थी किसी सरकार दल या संगठन के प्रति नहीं थी । अब सब कुछ सामने है चुनाव आयोग आंखें बंद कर सभी उपरोक्त नियमों की धज्जियां उड़ाने देता है । चुनाव घोषित होते ही जनता को प्रलोभन और प्रचार के लिए सत्ता का दुरूपयोग धन बल बाहुबल का खुला प्रदर्शन जनता को भयभीत करने से अपने बिछाये जाल में फंसाने को किया जाने लगा है । ऐसे माहौल में कोई शरीफ आदमी ईमानदारी से चुनाव लड़ ही नहीं सकता है क्योंकि कोई रोकने टोकने वाला नहीं है कि सभी इक समान अधिकार से चुनाव में भागीदार बन सकते हैं । 
 
लेकिन जो चुनाव आयोग 35 साल बाद भी अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक कर जनता समाज संविधान सभी की उपेक्षा कर मनचाहे ढंग से ही नहीं बल्कि अपने अधीन कार्य करने वालों को लेकर भी निर्दयी होकर कितनी मौतों खुदकुशियों का तमाशाई बना हुआ है उस में साधरण नागरिक के प्रति संवेदना की कोई उम्मीद ही कैसे की जा सकती है । जानकारी मिली है कि इक चुनाव आयुक्त ने कुछ ऐसी टिप्पणी की थी लेकिन उसको सामने लाने की बात छोड़ रिकॉर्ड से हटाया गया तो उस पर मानवीय आधार पर विचार करने की ही कैसे होगी । हमने गंगा सफाई अभियान यमुना सफाई अभियान पर बहुत देखा समझा है मर्ज़ बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की जैसी हालत है । सरकारी तमाम योजनाओं का अंजाम लूट खसूट से सिवा कुछ भी नहीं है क्योंकि सरकार शासक प्रशासन से लेकर न्याय करने वालों और निगरानी करने वाली संस्थाओं में सभी हम्माम में नंगे हैं कोई किसी को आईना कैसे दिखाएगा । संसद भवन नया बनने से उस में बैठने वालों में कोई बदलाव अच्छा नहीं आया है अपराधी और बदमाश संख्या में बढ़ते ही गए हैं और सत्ताधरी दल में संगीन अपराध का आरोपी होना जैसे प्रवेश का रास्ता लगता है । 
 
शासकों ने जिन संस्थाओं ने अनुचित संसाधन अपनाने पर निगरानी रखनी थी , उनका उपयोग अपने लिए चंदे के नाम पर जबरन वसूली करने का माध्यम बनाकर जैसे किया उसे जंगलराज ही कहना चाहिए । काला धन नहीं मिला बल्कि अब सरकार कहती है रिज़र्व बैंक नहीं जानता कि पिछले दस साल में देश से कितना काला धन विदेश गया है । काला धन गरीबी बेरोज़गारी की बातें सत्ता पाने को माध्यम थे सत्ता पाकर कुछ भी बदलना उनकी मंशा कभी नहीं थी । हैरानी की नहीं खेद ही नहीं शर्मसार होने की बात है कि हमारे देश में समाज के सभी अंगों में निरंतर पतन होता गया है । विकास और आधुनिकता की दौड़ में हम इतने पागल हुए हैं कि खुद अपनी सुध बुध खो बैठे हैं । हर कोई जिस शाख पर बैठा है उसी को काट रहा है , ऐसा कहावत में सुनते कहते थे हक़ीक़त में देखना पड़ेगा कभी कल्पना नहीं की थी । देश की गिरावट को लगता है टी एन शेषन जी ने भांप लिया था शायद उनकी पुस्तक  ' डीजनरेशन ऑफ़ इंडिया ' पढ़ कर मालूम हो , मैंने पढ़ी नहीं है अभी तक ।  विषय गंभीर है मैंने उस को कटाक्ष करने की भूल की है शायद क्योंकि आजकल सभी कुछ ऐसा ही करने लगे है बात रोने की पर ठहाके लगाने लगे हैं और इसको रोग भगाने की विधि बताने लगे हैं । साहिर लुधियानवी की ग़ज़ल फ़िल्म बहू बेग़म आशा भौंसले की आवाज़ लगता है आज की वास्तविकता है । 
 

निकले थे कहां जाने के लिए पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं , 

अब अपने भटकते कदमों को मंज़िल के निशां मालूम नहीं । 

 

हमने भी कभी इस गुलशन में एक ख़्वाब - ए - बहारां देखा था ,

कब फूल झड़े कब गर्द उड़ी कब आई ख़िज़ां मालूम नहीं । 

 

दिल शोला - ए - ग़म से ख़ाक हुआ या आग लगी अरमानों में ,

क्या चीज़ जली क्यों सीने से उठता है धुंवा मालूम नहीं ।

 

बर्बाद वफ़ा का अफ़साना हम किससे कहें और कैसे कहें ,

ख़ामोश हैं लब और दुनिया को अश्कों की ज़ुबां मालूम नहीं । 

   
 इक हास्य व्यंग्य कविता से विषय का अर्थ समझाने की कोशिश मैंने भी की है ।    
 
 

 ग़ाफ़िल कहता ग़ाफ़िल की बात ( हास्य व्यंग्य कविता ) 

             डॉ लोक सेतिया

 
दिल ही समझा ना है दिल की बात 
लहरों से होती क्या साहिल की बात ।
 
दर्द अपना किसे बताएं लोग जब अब  
मुंसिफ़ ही कहता है क़ातिल की बात ।  

दिल्ली में कोहराम मचा हुआ है कोई
कीचड़ से सुन कर कमल की बात । 

जमुना का पानी रंग बदलता नहीं कभी  
मछलियां जब करती जलथल की बात ।
 
आई डी दफ़्तर में रखा है सर का ताज़
यही पुरानी आज बनी इस पल की बात ।
 
गूंगों बहरों की बस्ती में होता शोर बहुत 
यही है दिल्ली की हर महफ़िल की बात ।  
 

 
 
 
 

नवंबर 26, 2025

POST : 2041 सच कहने पे जाँ मत वारो ( सच मत बोलना ) डॉ लोक सेतिया

      सच कहने पे जाँ मत वारो ( सच मत बोलना   ) डॉ लोक सेतिया  

            ( ये पोस्ट सच की खातिर जान देने वाले सत्येंद्र दुबे जी की याद में लिखी है  ) 

कभी हुआ करते थे ऐसे ऊंचे आदर्शवादी लोग जो सच पर खड़े रहते थे और कभी पीछे नहीं हटते थे बेशक जान ही चली जाए । समाज में आजकल कोई सच बोलकर आफत मोल नहीं लेता जब झूठ और पाप की राह पर चलने से आपकी राहों पर फूल बिछे हों , शानदार सभाओं में मंच सजाया जाता हो खज़ाना लुटाया जाता हो , स्वागत को लाल कालीन बिछाया जाता हो । हम कब से पुराने उसूलों को छोड़ चुके हैं और अब सिर्फ आडंबर करते हैं महान आदर्शवादी बातों को भाषण में बोल कर रत्ती भर संकोच नहीं होता है । दुष्यंत कुमार के शब्दों में इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं , आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार ।   अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार , भ्र्ष्टाचार की महिमा है अपार । 

         साबिर दत्त जी की ग़ज़ल से शुरू करते हैं : - 

 
सच्ची बात कही थी मैंने , लोगों ने सूली पे चढ़ाया 
मुझको ज़हर का जाम पिलाया , फिर भी उनको चैन ना आया 
सच्ची बात कही थी मैंने , सच्ची बात कही थी मैंने ।
 
ले के जहाँ भी वक़्त गया है , ज़ुल्म मिला है ज़ुल्म सहा है 
सच का ये इनाम मिला है , सच्ची बात कही थी मैंने । 
 
सब से बेहतर कभी ना बनना , जग के रहबर कभी ना बनना 
पीर पयम्बर कभी ना बनना , सच्ची बात कही थी मैंने । 
 
चुप रह कर ही वक़्त गुज़ारो , सच कहने पे जाँ मत वारो 
कुछ तो सीखो मुझसे यारो , सच्ची बात कही थी मैंने ।   
 
अब कोई भी कुर्बान नहीं होता है सच पर , सब झूठ बोलकर  अपनी ज़िंदगी को शानदार बनाते हैं , भ्र्ष्टाचार की बहती गंगा में डुबकी लगाते हैं खुद भी खाते हैं ऊपर से नीचे तक मिल बांटकर खाते हैं । इतना बढ़ गया है सरकारी विभागों में लूट का बाज़ार कि होने लगी है रिश्वत पर आर या पार , ख़ुदकुशी करने का पढ़ लिया समाचार । खुद सत्ताधारी राजनेता ने ये बताया है कि पुलिस विभाग में बड़े अधिकारी से छोटे अधिकारी तक ख़ुदकुशी करने का कारण भ्रष्टाचार है । जानते हैं अब मुख्यमंत्री कोई और है लेकिन खुद उनकी दल की सरकार है जिस में भ्र्ष्टाचार अब अपराध नहीं शिष्टाचार है ।  खुद सरकार के मुखिया जिस शहर में जाते हैं लोग उनको मिलते हैं बताते हैं जिस झील बनाने पर करोड़ों रूपये खर्च हुआ उसकी हालत देख सकते हैं जांच करने को अधिकारी आते हैं सच और झूठ आमने सामने टकराते हैं । ये सिर्फ इक मिसाल है वास्विकता तो ये है कि हर योजना इक गोलमाल है सत्ताधारी नेता से तमाम विभाग वाले होते जाते मालामाल हैं देश की मत पूछो खज़ाना लुट चुका हुआ कंगाल है । 
 
अब कोई भी सच्चाई की ईमानदारी की बात नहीं करता है , सच की खातिर कोई नहीं मरता है । हमारे देश में धर्म का शोर बहुत है सभी शासक प्रशासक मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा गिरजाघर जाते हैं मगर जनता को छलते हैं झूठ बोलने से नहीं कतराते हैं किसी भगवान से बिल्कुल नहीं डरते मनमानी करते हैं मौज मनाते हैं । बड़े बड़े पदों से संवैधानिक संस्थाओं पर नियुक्त अफ़्सर शासक राजनेता के पांव दबाते हैं हाथ जोड़ सर को झुका जो हुक्म मेरे आका कहकर उनकी खातिर आसान राहें बनाकर बदले में मनचाहा आशिर्वाद पाते हैं । कभी बाद में वही अधिकारी खुद कितने जूते किस राजनेता से खाये थे गिनती तक बताते हैं । साधरण लोग जिन बड़े अधिकारियों से बात करते घबराते हैं बिना कोई अपराध उनसे डांट से लाठी डंडे तक खाते हैं वो अधिकारी अपनी गरिमा को शासक के दरबार में खो बैठते हैं ख़ामोश रहकर उनका हौंसला बढ़ाते हैं ।  शासक दल में शामिल संगीन अपराध में आरोपी मंत्री बनकर ग्रह मंत्रालय पाकर कानून को अपना रखवाला बनाते हैं । 
 
लोग भी भूल चुके हैं वो बस इक घटना ही थी जब इक बड़े अधिकारी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जी को इक गोपनीय पत्र लिख कर भ्र्ष्टाचार को उजागर किया है और 27 नवंबर 2003 को बिहार में क़त्ल कर दिया गया था अपने तीस साल की उम्र में जन्म दिन पर 27 नवंबर 1973 के दिन । अब शायद कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि देश में कोई अधिकारी या कोई राजनेता वास्तव में भ्र्ष्टाचार रुपी दैत्य का अंत करने भी चाहता है । अब तो सभी की रगों में यही बहता है कोई गुरु नानक नहीं है जो उनकी लूट की कमाई दौलत की रोटी को निचोड़ सके जिस में करोड़ों गरीबों का लहू बहता है । नेक कमाई मेहनत की हक की कमाई नहीं चाहता कोई भी सभी को पैसा चाहिए ऐशो आराम चाहिए मगर बिना किसी काम चाहिए । देश में लोग डरे सहमे हैं सच बोलने का अर्थ ज़िंदगी से हाथ धोना है सत्ताधारी राजनेताओं प्रशासन और धनवान लोगों के लिए लोकतंत्र इक खिलौना है , जनता को रोते रोते हंसना हैं या फिर झूठी नकली हंसी हंसते हंसते रोना है ।  लेकिन ऐसा नहीं है कि भ्र्ष्टाचार की चर्चा ही नहीं होती है सभी विभाग कभी कभी किसी दिन शपथ उठाते हैं लेकिन किस की कसम कौन जाने याद नहीं रखते भूल जाते हैं । अंत में इक ग़ज़ल पुरानी है मेरी  किताब      ' फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी ' में शामिल है पढ़ते हैं । 
 
 

बहस भ्र्ष्टाचार पर वो कर रहे थे ( ग़ज़ल ) 

डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

 

बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे
जो दयानतदार थे वो डर रहे थे ।

बाढ़ पर काबू पे थी अब वारताएं
डूब कर जब लोग उस में मर रहे थे ।

पी रहे हैं अब ज़रा थक कर जो दिन भर
मय पे पाबंदी की बातें कर रहे थे ।

खुद ही बन बैठे वो अपने जांचकर्ता
रिश्वतें लेकर जो जेबें भर रहे थे ।

वो सभाएं शोक की करते हैं ,जो कल
कातिलों से मिल के साज़िश कर रहे थे ।

भाईचारे का मिला इनाम उनको
बीज नफरत के जो रोपित कर रहे थे ।  
 

 
 
 

नवंबर 23, 2025

POST : 2040 हम लेखक कुछ नहीं करते ( विचार - विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

    हम लेखक कुछ नहीं करते ( विचार - विमर्श ) डॉ लोक सेतिया 

दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें , पूछते हैं करते क्यां है जनाब , बताते हैं कि साहित्य सृजन करते हैं तो कहते हैं ये तो आपका शौक है , लिखने को क्या है हम भी लिख सकते हैं , क्या करें इतने काम हैं कि फुर्सत ही नहीं मिलती । ऐसा हमेशा हुआ है समझते हैं कि कलम उठाई जो मन चाहा लिख दिया , कौन समझाए कि साहित्य ऐसा नहीं होता है जब तक आप आपने खुद से बाहर निकल समाज के दुःख सुःख परेशानियों से चिंतित हो कर वास्तविक संवेदनाओं को नहीं महसूस करते लिखना नहीं आता है । अधिकांश सोशल मीडिया पर ऐसा ही निर्रथक लिखा जाता है जिसका कोई प्रभाव समाज पर नहीं पड़ता है , सिर्फ़ नाम पहचान की खातिर लिखने को लिखना नहीं कहा जाता है । अधिकांश नहीं तमाम लोग समझते हैं जिस कार्य से अच्छी आमदनी नहीं हो उसको करना किस काम का और समझते हैं की हम लेखक कुछ भी नहीं करते हैं । यकीन करना ये कुछ भी नहीं करने जैसा काम बड़ा कठिन है लेकिन महत्वपूर्ण है , अगर धन दौलत की चाहत में दुनिया की इस अंधी दौड़ में शामिल होकर लोग लिखना छोड़ देते तो आज हमको कोई महान साहित्य कितने ग्रंथ कितनी कथाएं कितनी कहानियां कितनी शानदार रचनाएं पढ़ने को नहीं मिलती जो हमको मानवीयता का अर्थ समझाती हैं । साहित्य भविष्य की पीढ़ी के लिए लिखा जाता है जैसे कोई मशाल जलाई जाती है किसी घने अंधकार भरे सुनसान रास्ते में मुसाफ़िर को राह दिखलाने के लिए । वास्तविक लेखन आसान नहीं बेहद दुश्वार है कदम कदम डगर डगर लांघनी पड़ती कंटीली दीवार है । जर्जर नैया है टूटी हुई पतवार है कितने तूफ़ान हैं भंवर हैं बीच मझधार मांझी लाचार है लेकिन जाना उस पार है जिसका कोई पता ठिकाना नहीं सपनों का संसार है । 
 
लिखने वालों की खुद अपनी नई राह बनानी पड़ती है पुरानी सड़कों से उनका सफ़र नहीं चलता है , सबसे अलग अपनी मंज़िल की तलाश करते हैं । कोई साथी कोई कारवां नहीं हौंसलों से चलना है जीवन भर कहीं भी कोई ठहराव नहीं आना चाहिए साहित्य लेखन इक बहता दरिया है जिस को कभी किसी समंदर में नहीं मिलना अन्यथा अपना अस्तित्व ही मिट जाता है । मैंने जब से अपना डॉक्टर होने का रोगियों का उपचार करने का कार्य छोड़ दिया है जिस से कुछ आय हुआ करती थी 45 साल तक किसी तपस्या की तरह ही अपना कार्य किया है अब पूरा ध्यान लेखन कार्य पर है जिस से कुछ नाम दौलत मिलने की कोई चाहत भी नहीं है न ही चालीस साल लिखने के बाद कुछ मिला है सिवा आत्मसंतुष्टि के । कभी कभी लगता है लोगों को ये भी स्वीकार नहीं है कि कोई अपनी ख़ुशी से सामाजिक सरोकारों और समस्याओं पर समाज को जगाने की कोशिश भी करे । नासमझ समझते हैं तो भी कोई बात नहीं लेकिन जिनको उद्देश्य नहीं मालूम वो जब कहते हैं कि आप कुछ नहीं करते इसलिए ये कार्य करते हैं जबकि ऐसे लोग खुद कुछ भी किसी के लिए नहीं कर सकते जो भी करना है खुद अपनी ख़ातिर ही करते हैं । हमको जिस से कुछ भी भौतिक हासिल नहीं होता मानसिक सुःख और इक सुकून महसूस होता है , उस से बढ़कर भला क्या हो सकता है , कुछ भी और करते तो जितना भी कुछ मिलता कितना स्थाई होता , जबकि हमारा लेखन जो जैसा भी है दीर्घकालीन पूंजी की तरह है जिसे हमारे बाद भी दुनिया को पढ़ने को मिलेगा कुछ सार्थकता अवश्य है इस की , भले हम नहीं जानते कोई भी नहीं समझता आज तब भी । कुछ लोग महल सड़कें कितना कुछ निर्माण करते हैं लेकिन कुछ और लोग उन सभी को निर्माण करने को नक़्शा बनाते हैं योजना बनाते हैं , लेखक भी ऐसा ही करते हैं उनको इक खूबसूरत दुनिया की चाहत है परिकल्पना है उनकी और उसी को लेकर सतत प्रयास करते हैं । कुछ नहीं करते समझते हैं दुनिया वाले जबकि जो कर रहे हैं करना चाहते हैं वो अनमोल है , कोई उसकी कीमत नहीं लगा सकता है ।   
 
  
 

                              मुझे लिखना है  ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 
कोई नहीं पास तो क्या
बाकी नहीं आस तो क्या ।

टूटा हर सपना तो क्या
कोई नहीं अपना तो क्या ।

धुंधली है तस्वीर तो क्या
रूठी है तकदीर तो क्या ।

छूट गये हैं मेले तो क्या
हम रह गये अकेले तो क्या ।

बिखरा हर अरमान तो क्या
नहीं मिला भगवान तो क्या ।

ऊँची हर इक दीवार तो क्या
नहीं किसी को प्यार तो क्या ।

हैं कठिन राहें तो क्या
दर्द भरी हैं आहें तो क्या ।

सीखा नहीं कारोबार तो क्या
दुनिया है इक बाज़ार तो क्या ।

जीवन इक संग्राम तो क्या
नहीं पल भर आराम तो क्या ।

मैं लिखूंगा नयी इक कविता
प्यार की  और विश्वास की ।

लिखनी है  कहानी मुझको
दोस्ती की और अपनेपन की ।

अब मुझे है जाना वहां
सब कुछ मिल सके जहां ।

बस खुशियाँ ही खुशियाँ हों 
खिलखिलाती मुस्कानें हों ।

फूल ही फूल खिले हों
हों हर तरफ बहारें ही बहारें ।

वो सब खुद लिखना है मुझे
नहीं लिखा जो मेरे नसीब में । 
 
 
 
 
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नवंबर 20, 2025

POST : 2039 बिहारी दूल्हे की बरात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     बिहारी दूल्हे की बरात  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

    अबकी बार क्या होगी चुनावी नैया पार महीनों तक संशय था बेकार , नतीजों की आई ऐसी बहार फिर मिल बैठे चार यार शादी होगी शानदार छप चुके हैं इश्तिहार । चुनाव में शानदार प्रदर्शन करना महत्वपूर्ण नहीं रहा , उम्मीद से ज़्यादा झोली भरी हुई है सभी साथ मिलकर लड़ कर विजयी हुए थे अब कौन बनेगा क्या बनेगा की उलझन खड़ी हुई है । जैसे किसी गरीब की लॉटरी निकलती है कुछ लोग जानते ही नहीं उनको जनता ने निर्वाचित किया क्या देख समझ कर । सभी को मालूम है जनता को अभी तक सही गलत की छोड़ो भले बुरे की भी पहचान नहीं है अन्यथा अधिकांश लोग ऐसे हैं जिनको देश समाज संविधान नियम कानून की रत्ती भर भी समझ नहीं हैं शराफ़त से उनका कभी कोई नाता नहीं रहा है बदमाशी उनकी पूंजी है जिस के दम पर जनता से समर्थन मांगते नहीं छीनते हैं । अब शासन की बागडोर हाथ आई है तो सभी गठबंधन के संगी साथी आमने सामने खड़े हैं हिस्से की भागीदारी के सवाल पर । जैसे एक हसीना सौ दीवाने इक शमां सौ परवाने जैसा हाल है आग़ाज़ तो अच्छा है अंजाम खुदा जाने । 
 
कुछ असंजस की दशा बनी हुई है , दिल सभी के धड़कते हैं राजा जी कहलाने को मगर जब तक राजकुमारी हाथ में जीत की वरमाला लिए खड़ी नहीं दिखाई देती चुप रहना पड़ता है । लोकतंत्र की रीति अजीब है सत्ता की राजकुमारी खुद नहीं जानती पहचानती किस को वरमाला पहनानी है । सभी ससुराल वाले अपने अपने दावे प्रतिदावे पेश कर अपनी शर्तों से बाराती बुलाना चाहते हैं । लेकिन तमाम अटकलें थम गईं जब इक तथ्य पर चिंतन किया गया कि कहीं ऐसा नहीं हो पटना की रानी का चयन बिहारी जनता को अनुचित प्रतीत हो और पूरी की पूरी जीती हुई बाज़ी गंवा बैठें ।  दुल्हन वही जो पिया मन भाए लेकिन कौन पिया है किस किस का जी ललचाये , अपने लगने पराये रूठे कोई कोई मनाये । फिर वही कहावत लगती है जारी एक बिहारी सब पर भारी , जिसको समझे थे मज़बूरी वही बन गया इक लाचारी उस के बिना नहीं खुलता कोई ताला कौन है जीजा कौन है साला । गठबंधन है बड़ा निराला सांवला सलौना लगता है मतवाला नहीं मंज़ूर कोई बाहर वाला , ज़िद पर अड़ा हुआ है दूल्हा उसकी शादी होगी निराली , प्रेम विवाह जैसा बंधन नहीं है ये है बड़े बज़ुर्गों द्वारा तय किया रिश्ता है लेकिन कुछ भी रिश्तों संबंधों में इक समान नहीं है । हर कोई चतुर सुजान है राजनीति में कोई भी नादान नहीं है । किसी की ज़मीन नहीं किसी का कोई आसमान नहीं है । आपस का कारोबार है इक हाथ लेने इक हाथ देने का नियम है किसी का किसी पर एहसान नहीं है ।   
 
जिनकी आरज़ू दिल की अधूरी रह गई उनको लगता है कभी न कभी बिल्ली की किस्मत से छींका टूटेगा तो उनकी चाहत पूरी हो सकती है । सभी संग संग हैं तब तक जब तक कोई बेहतर विकल्प नहीं दिखाई देता ।  
आपको क्या अभी भी समझ नहीं आया कि हमारे देश में लोकतंत्र संविधान जनता समाज की भलाई देश की सेवा सभी झूठी बातें हैं असलियत सत्ता की लूट का इक खेल है । शपथ उठा ली गई है शपथ का अर्थ कोई नहीं समझता है निभाना कौन चाहता है । सत्ता की भागीदारी का बंटवारा लगता है जैसे कोई ख़ज़ाना मिल गया है हर कोई हड़पना चाहता है । बाहर कुछ दिल में कुछ और सभी की हालत ऐसी है लगता है कभी भी कोई भी कुछ भी तमाशा कर सकता है राम राम करते किसी तरह बरात तैयार हुई घुड़चढ़ी हो गई और दुल्हन भी मिल जाएगी । लेकिन आने वाले समय में सत्ता रानी कितनी स्यानी क्या सभी को खुश कर पाएगी , या आधुनिक कन्या की तरह अपना रंग दिखलाएगी सभी को तिगनी का नाच नचाएगी । दिल्ली भी बिचौलिया जैसी है क्या देगी क्या पाएगी ये उलझन कभी क्या सुलझ पाएगी । अभी अठखेलियां देखनी हैं सभी दल वाले गुल खिलाने वाले हैं इक युग्ल गीत गाने वाले हैं ।  
 
         बागों में बहार है , कलियों पे निखार है , 
         ............. तुमको मुझसे प्यार है 
 
         छोड़ो हटो जाओ पकड़ो न बैंयां , 
        आऊं न मैं तेरी बातों में सैंयां 
 
         तुमने कहा है देखो देखो मुझको सैंयां , 
         बोलो तुमको इकरार है ..............
 
        तुमने कहा था मैं सौ दुःख सहूंगी , 
        छुप के पिया तेरे मन में रहूंगी ............
 
        अच्छा चलो छेड़ो आगे कहानी , 
        होती है क्या बोलो प्यार की दीवानी 
         
        बेचैन रहती है प्रेम दीवानी 
       बोलो क्या दिल बेकरार है जीना दुश्वार है  ...........
 

       आपने ये गीत सुना हुआ है लेकिन यहां नायक की आवाज़ सुनाई दे रही है मगर 

       नायिका की ना ना ना ना आखिर में हां की आवाज़ म्यूट है जिसने धड़कनें बढ़ा दी हैं ।  

 
     Arranged Marriage Vs Love Marriage,क्या आप भी मम्मी-पापा की मर्जी से करने  जा रहे हैं शादी, तो अरेंज मैरिज करने से पहले जान लें ये बातें - these arranged  marriage facts that

नवंबर 10, 2025

POST : 2038 अनजान राहों का मुसाफ़िर ( दरअसल ) डॉ लोक सेतिया

    अनजान राहों का मुसाफ़िर ( दरअसल ) डॉ लोक सेतिया   

 मुसाफ़िर को मालूम ही नहीं सफ़र कब शुरू हुआ और कब इसका अंत होगा , चलना है रुकना नहीं बहते दरिया की तरह उसको । हमसफ़र न सही कोई हमराही तो मिलता थोड़ी दूर तलक ही सही साथ चलते मगर ऐसा भी मुमकिन नहीं हो पाया कठिनाई में सभी दामन छुड़ाते रहे । जाने कितनी बार किसी न किसी से जान पहचान हुई रास्ते में इधर उधर की कई बातें जिनको मुलाकातें कहना कठिन है यूं ही साथ चलना ख़ामोशी को तोड़ने की तरह से , जैसे कोई मौसम की बात करता है । हमेशा सभी जब तक ज़रूरी लगता साथी बनकर चलते जब मनचाहा बीच राह में रास्ता ही नहीं इरादा भी बदल लेते मौसम बदलता लोग बदल जाते । कुछ लोग वापस ही लौट जाते थक कर अलविदा कहना कभी फिर किसी अगले मोड़ पर मिलना बार बार बिछुड़ना अजीब रिश्ता बना लेते थे । संबंधों के कितने नाम लिखवाये लिख कर फिर मिटाये उनको सफ़रनामा में शामिल करने नहीं करने पर यकीन नहीं शंका या संदेह है कि कोई ख़्वाब था कि हक़ीक़त थी । कहीं किसी मंज़िल की तलाश नहीं थी बस इक आरज़ू थी कुछ लोग अपने दोस्त या कुछ भी अन्य संबंध प्यार का अपनत्व का बनाना और हमेशा साथ साथ रहना वो भी किसी अनुबंध किसी विवशता में नहीं  खुद अपनी ख़ुशी से , कहीं कोई आशियाना बनाकर ज़िंदगी बसर करते मुहब्बत की दुनिया बसाकर । 
 
ज़िंदगी कुछ इस तरह बिताई है , भीड़ में मिली हमेशा तन्हाई है , कदम कदम ठोकर खाई है कैसे कहें कौन भला कौन बुरा है किस्मत ही अपनी हरजाई है । बहुत अजीब दौर है जाने भीतर मन में कितना शोर है सच कोई कहां समझता है हर किसी का जब ख़ुदग़र्ज़ी का नाता रिश्ता है । सभी औरों पर अधिकार जताते हैं खुद चाहते हैं पाना सब कुछ लौटाना पड़ता है बदले में अवसर आने पर आंख चुराते हैं । दुनिया हमको नहीं रास आई है ज़िंदगी खुद अपनी नहीं पराई है हमको सभी ने समझा नाकाबिल और नासमझ है ख़ामोशी अपनी किसी को नहीं समझ आई है । चाहत थी कोई मेरे जज़्बात मेरे एहसास को समझता मगर हर किसी ने भावुकता को मूर्खता समझा और मेरे स्वभाव का अनुचित लाभ उठाया ।  आखिर ये बात समझ आई है इस दुनिया की प्रीत झूठी है खुद ही साथ अपना निभाना है दिल ही अपना इक ठिकाना है । दिल को किसी तरह से समझाना है चार दिन जीने को इक बहाना है कौन जाने किस दिन ये सफ़र ख़त्म होना है अभी कितना ज़हर खाना है दर्द जैसे अपना ख़ज़ाना है ज़ख़्म को दुनिया से छुपाना है । साथ कुछ इस तरह निभाना है जैसे अपना है वो भी जो हमसे बेगाना है , रस्म है यही दुनियादारी को निभाना है ,  पिजंरे के पंछी का दर्द कौन समझता है खुद हो चुपके चुपके आंसू बहाना है । आखिर इक दिन छोड़ जाना है , मुझको याद है कितना अच्छा गीत है उसको समझना है , चल उड़ जा रे पंछी ।  
 
चल उड़ जा रे पंछी , कि अब ये देश हुआ बेगाना , 
चल उड़ जा रे पंछी ।  
 
ख़त्म हुए दिन उस डाली के जिस पर तेरा बसेरा था 
आज यहां और कल हो वहां ये जोगी वाला फेरा था 
ये तेरी जागीर नहीं थी , चार घड़ी का डेरा था 
सदा रहा है इस दुनिया में किस का आबो - दाना 
चल उड़ जा रे पंछी । 
 
तूने तिनका तिनका चुनकर नगरी एक बसाई 
बारिश में तेरी भीगी पांखें धूप में गर्मी आई 
ग़म न कर जो तेरी मेहनत तेरे काम न आई 
अच्छा है कुछ ले जाने से दे कर ही कुछ जाना 
चल उड़ जा रे पंछी । 
 
भूल जा अब वो मस्त हवा वो उड़ना डाली डाली 
जग की आंख का कांटा बन गई चाल तेरी मतवाली 
कौन भला उस बाग़ को पूछे हो न जिसका माली 
तेरी किस्मत में लिखा है जीते जी मर जाना 
चल उड़ जा रे पंछी । 
 
रोते हैं वो पंख पखेरू साथ तेरे जो खेले 
जिनके साथ लगाये तूने अरमानों के मेले 
भीगी अंखियों से ही उनकी आज दुआएं ले ले 
किसको पता अब इस नगरी में कब हो तेरा आना 
चल उड़ जा रे पंछी ।  
 
 
 
 On a Path Unknown – Poppy Walks the Dog …