असली की हार नकली की जीत ( व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया
कौन समझा बनावट क्या, हक़ीक़त है क्या
वास्तविक नहीं कुछ भी कैसी शर्म ओ हया
नकली होशियारी सबको ,लुभाने लगी अब
वास्तविकता को कहना ही होगा अलविदा ।
प्यार नकली है कारोबार भी नकली है यहां
कितना खूबसरत लगता है नकली आसमां
चलो दिलदार चलो छोड़ कर असली जमीं
बनाने लगी है दुनिया काल्पनिक इक जहां ।
कागज़ी फूल हैं गुलशन है संग-ए-मरमर के
जिस्म और जान दोनों ही अलग हो गए जब
चांदनी चांद की न रौशनी भी आफ़ताब की
अब नहीं चाहिए कोई खुशबू किसी गुलाब की ।
हाथ छूने से सब कुछ बिखर ही गया लेकिन
शोर कितना था नकली पर सम्मेलन का सुना
सामना असलियत से करना पड़ेगा कभी जब
साबित होगा बेकार बहुत बजता था झुनझुना ।
नकली ईमानदारी देशभक्ति भी नकली मिली
अर्थव्यवस्था की खिलती नहीं इक भी कली
आपकी सड़कें बंद जनता के लिए आजकल
सरकार जी सुरक्षित रहने दो बस हमारी गली ।
असली कुछ भी नहीं आपने रहने दिया देश में
मिलते रावण अब कितने ही राम जी के भेस में
सच को ज़िंदा ही दफ़्न कर दिया सभी ने जैसे
कोई जगह देश में रही रहने को न ही परदेस में ।
जिधर देखते नकली का लो परचम लहरा रहा
असली कौन है दुनिया में सभी को समझा रहा
झूठी दुनिया की प्रीत है सुन अरे बांवरे आदमी
कोई कबीरा है इक भजन गाता चला जा रहा ।

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