Monday, 25 May 2020

ज़िंदगी को तबाह कर बैठे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

    ज़िंदगी को तबाह कर बैठे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 
ज़िंदगी को तबाह कर बैठे 
फिर वही हम गुनाह कर बैठे। 

कर लिया ऐतबार गैरों का 
पास था सब फ़नाह कर बैठे। 

सब चले राह उस पुरानी पर 
हम नई अपनी राह कर बैठे। 

जब हक़ीक़त खुली कहानी की 
आह भर लोग वाह कर बैठे। 

हम नहीं जानते मुहब्बत क्या 
बेवफ़ा फिर भी चाह कर बैठे। 

हम नहीं बन सके किसी के पर
इक तुझी पर विसाह कर बैठे। 

आज वादे सभी भुला "तनहा"
याद कर उसको आह कर बैठे।

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